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सुनो वोटर…कि अब गए दिन चुनाव (बहार) के..!!

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जब टीन के बने सांचे पर कभी 'हलधर किसान' तो कभी 'गाय बछड़ा' या फिर 'पंजा' और 'कमल' के फूल की छाप दीवार पर लगाने के लिए जब रंग के साथ लोग आते थे तो हम बच्चों में यह काम करने की होड़ लग जाती थी। पार्टी पॉलिटिक्स से परे छीना झपटी के बाद बच्चे दीवारें रंगने में तल्लीन हो जाते थे और यह काम करने आए लोग मस्त बीड़ी पीने में। जब पार्टी के कार्यकर्ता झंडे/बिल्ले/ बैनर और पोस्टर लेकर आते थे तो टीन और गत्ते के बने बिल्लों को लेने और कमीज़ पर लगाने के लिए मारामारी हो जाती थी। जिसको रिबन के साथ या रिबन के फूल वाला बिल्ला मिल जाता था वो स्वयंभू बॉस बन जाता था। झंडे और बैनर तो बच्चों को मिलना दूर की कौड़ी थी। चुनाव के बाद पार्टियों के बैनर और झंडे कई घरों में पोंछे के कपड़े, खिड़कियों के परदे और इसी तरह के दर्जनों दीगर कामों में खुलकर इस्तेमाल होते थे। गरीब परिवारों में तो वे बुजुर्गों की चड्डी और तकिए के कवर तक बन जाते थे। शहर मानो रंग बिरंगे पोस्टरों,बैनर और झंडों से पट जाता था और आज की चुनावी तिथियों के संदर्भ में कहें तो दीपावली पर भी होली का सा रंगीन नजारा दिखाई पड़...

भेज रहे हैं स्नेह निमंत्रण

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  भेज रहे हैं स्नेह निमंत्रण मतदाता तुम्हें बुलाने को 17 नवंबर भूल न जाना वोट डालने आने को।' आमतौर पर विवाह समारोह के निमंत्रण कार्ड पर छपने वाली ये पंक्तियां इस बार मध्य प्रदेश में मतदाताओं को बुलाने और मतदान के लिए जागरूक करने में इस्तेमाल की जा रही हैं। भोपाल में जिला प्रशासन ने मतदाताओें को मतदान केंद्र तक बुलाने के लिए वैवाहिक कार्ड की तर्ज पर आकर्षक निमंत्रण पत्र तैयार किए हैं। ये कार्ड मतदाता पर्चियों के साथ घर घर पहुंचाए गए हैं। जिस प्रकार वैवाहिक कार्ड में दिनांक,समय और कार्यक्रम स्थल का उल्लेख होता है,उसी प्रकार इस कार्ड में भी मतदान की तिथि 17 नवंबर, समय सुबह 7 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक और आयोजन स्थल की जगह आपका मतदान केंद्र लिखा गया है। कार्ड में स्वागत कर्ता की जगह बूथ लेबल अधिकारी,निवेदक जिला निर्वाचन अधिकारी और दर्शनाभिलाषी में पीठासीन अधिकारी सहित मतदान दल के सभी सदस्य शामिल हैं। वोटवीर की ओर से जारी इन कार्ड का समापन सभी निमंत्रण पत्रों की लोकप्रिय बाल मनुहार पंक्तियों 'हमारे कार्यक्रम में जरूर जरूर आना'... की तर्ज पर किया गया है। इसमें लिखा गया है कि -...

"हम भारत के लोग…!!"

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हमारे संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत ही इन शब्दों से होती है, ‘हम भारत के लोग’..। हम भारत के लोग वाकई अद्भुत हैं और अलग भी। हमें समझना आसान नहीं है पर हमसे जुड़ना बहुत सरल है क्योंकि हम सहज हैं। शायद तभी ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ फिल्म में गीतकार ने लिखा है: “हम लोगों को समझ सको तो समझो दिलबर जानी जितना भी तुम समझोगे उतनी होगी हैरानी” हम भारत के लोग… वाकई दुनिया से अलग हैं और शायद इसी वजह से पूरी दुनिया में कभी भी-कहीं भी घुल मिल जाते हैं और मौका मिलते ही उस देश के रंग में पूरी तरह मिलकर वहीं बस तक जाते हैं लेकिन फिर भी अपनी पहचान का सबसे गाढ़ा रंग सहेजकर रखते हैं यह रंग है भारतीयता का और उदघोष है हम भारत के लोग का। हम, अमेरिका में भी भारतीय बने रहते हैं और कई बार भारत में भी ‘मेड इन यूएसए’ (उल्लासनगर सिंधी एसोसिएशन) जैसा कारनामा कर दिखाते हैं। हम इतने बेफिक्र हैं कि कारगिल पर पाकिस्तानी घुसपैठियों को नजर अंदाज़ करते रहते हैं लेकिन जब उन्हें मारकर बाहर निकालने की ठान लेते हैं तो फिर ‘ये दिल मांगे मोर’ को जयघोष बनाकर उन्हें कारगिल की उन्हीं बर्फीली चोटियों पर दफन करके ही छोड़ते हैं...

मैं, मुख्यमंत्री निवास हूं…प्रदेश के मुखिया का आधिकारिक निवास…!!

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मैं, मुख्यमंत्री निवास हूं…प्रदेश के मुखिया का आधिकारिक निवास। फिलहाल मेरी पहचान भोपाल के ‘6-श्यामला हिल्स’ के तौर पर है जहां मौजूदा मुख्यमंत्री रह रहे हैं। यह बंगला शायद मेरा अब तक का सबसे आदर्श पता है। श्यामला हिल्स की ऊंची और हरियाली की चादर ओढ़े खूबसूरत पहाड़ी पर बना मेरा यह घर मुख्यमंत्री पद की आन-बान-शान के बिल्कुल अनुरूप है। मेरे सामने मौजूद बड़ा तालाब अपनी उछलकूद करती लहरों के बाद भी शांत रहकर मुझमें भी धैर्य का संचार करता है और दिन भर की राजनीतिक सरगर्मियों के बाद भी मेरे अंदर ठहराव का कारण यही है। बड़ा तालाब अपने विस्तार और प्रवाह से मेरे अंदर के बड़प्पन का स्मरण कराता रहता है। आखिर,मुख्यमंत्री की मेजबानी,उनकी चिंताओं, खुशियों, दुःख, राजनीतिक उठा पटक, साज़िश और पद के सुकून सहित इतना कुछ सहने के बाद भी बड़े तालाब सा शांत रहने के लिए बड़प्पन तो चाहिए ही। अब एक बार फिर सभी की निगाह मुझ पर टिकी हैं…राजनीति के उद्भट खिलाड़ियों से लेकर गुणा भाग में माहिर नेताओं तक,मीडिया के सीधे तने सिद्धांत प्रिय पत्रकारों से लेकर रीढ़ विहीन कलमकार और बाइट वीर तक मेरी ओर टकटकी लगाकर देख रहे हैं। आ...

भोपाल में क्यों मंडरा रहे हैं खौफनाक गर्जना के साथ लड़ाकू विमान...!!

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आमतौर पर अपनी शांत तासीर के लिए मशहूर भोपाल का आसमान इन दिनों लड़ाकू विमानों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा है, बिल्कुल युद्ध सा माहौल है…सुखोई,जगुआर,मिराज जैसे दुश्मन के कलेजे में खौफ पैदा कर देने वाले 50 से ज्यादा लड़ाकू एवं परिवहन विमान और हेलीकाप्टर भोपाल के ऊपर मंडरा रहे है। उनकी गर्जना से पूरे शहर और खासतौर पर मुख्यमंत्री निवास,भारत भवन, श्यामला हिल्स और न्यू मार्केट सहित तमाम इलाक़े इन विमानों की गर्जना से थरथरा रहे हैं। आलम यह है कि नए जमाने की तकनीक संपन्न कारें इन विमानों की गर्जना से पिपयाने लगती हैं और जैसे ही वे किसी तरह शांत होती हैं फिर कोई विमान गड़गड़ाहट के जरिए अपनी आन-बान और शान का मुजाहरा पेश करते हुए गुजर जाता है और फिर बेचारी कारें डर के कारण घिघयाने लगती हैं। हालांकि,बच्चों और महिलाओं को यह गर्जना अचंभित कर रही है तो युवाओं के लिए यह किसी जयघोष के समान है,देश की शक्ति संपन्नता का जयकार और सुरक्षित भविष्य का विजयनाद है। वहीं,बुजुर्ग हो चली पीढ़ी के लिए आसमान में मंडरा रहे ये विमान पुराने युद्धों पर यादों की जुगाली का मसाला प्रदान कर रहे हैं। विमानों की यह चहलकदमी बीते क...

चार देश चालीस कहानियां

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 पुस्तक: चार देश चालीस कहानियां लेखक:संजीव शर्मा विधा: यात्रा वृतांत/रिपोर्ताज पृष्ठ: 164 मूल्य: 200 रुपए प्रकाशक: लोक प्रकाशन, भोपाल समीक्षक: प्रवीण दुबे,वरिष्ठ पत्रकार इन दिनों अपने नए काम की व्यस्तता में इतना उलझा हूँ कि कुछ पढने लिखने का वक्त ही नहीं मिल पा रहा है..इस बीच संजीव शर्मा जी की नई किताब "चार देश चालीस कहानियां" की प्रति प्राप्त हुई... अमूमन मैं कोई भी किताब निरंतरता में ही पढ़ता हूँ यानी जब तक ख़त्म नहीं होती,तब तक छोड़ता नहीं... इसके साथ वैसी संभावना मेरी नई ज़िम्मेदारियों के चलते नहीं थी लेकिन जैसे ही मैंने पढ़ना शुरू किया तो इतनी रोचक और इतने प्रवाह के साथ इसमें तथ्यों को पिरोया गया है कि वही पाठक वाली निरंतरता इसमें भी बनी रही... पूरा पढने के बाद खुद तय नहीं कर पाया कि इसे किस श्रेणी में रखा जाए...ये यात्रा संस्मरण है....रिपोर्ताज है..सांस्कृतिक संकलन है...या फिर किसी यायावरी का दस्तावेज...चूंकि संजीव जी खुद बेहतरीन पत्रकार हैं..भाषा पर नियंत्रण उनका बहुत अच्छा है...दूसरे, वे उस इलाके से आते हैं जहाँ भगोने का पका हुआ एक चावल देखना हो तो ओशो और यदि दूसरा चावल द...

फ्लाईपास्ट और आलू की सब्जी-पूरी…

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फ्लाईपास्ट और आलू की सब्जी-पूरी…आप भी चौंक गए न और चौंकना लाज़िमी भी है क्योंकि आलू की सब्जी-पूरी का रिश्ता तो जन्म जन्मांतर से भारतीय रेल के साथ रहा है। आज भी स्लीपर क्लास से लेकर नए नवेले इकोनॉमी क्लास तक में लंबी यात्रा के दौरान डिब्बे के अलग-अलग कोनों से महकते अचार,आलू की सूखी सब्जी और पूरियों (पूड़ियों) की खुशबू को हम कैसे भूल सकते हैं। हालांकि, बीच में एक दौर ऐसा भी आया था जब हवाई यात्रा के दौरान भी कभी-कभार पूरी-सब्जी महकने लगी थी। यह वह दौर था, जब केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए पूर्वोत्तर राज्यों, कश्मीर और लद्दाख की यात्रा के दौरान हवाई यात्रा के दरवाजे खोल दिए थे। तब, पहली बार परिवार के परिवार इस उड़न खटोले की यात्रा का स्वप्न लेकर अचार-पूरी के साथ हवाई अड्डों पर नजर आने लगे थे। हवाई जहाज़ में सीट पर पालती मारकर आलू की सब्जी और पूरी के साथ चूड़ा/नमकीन खाते परिवारों ने 'इलीट क्लास' या संपन्न वर्ग को नाक-मुंह सिकोड़ने पर मजबूर कर दिया था। हालांकि, अब तो ट्रेन में भी घर की बनी आलू-पूरी का स्थान जोमेटो, स्वीगी और इस तरह के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए सुविधा के सा...