सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कड़क चाय नहीं, सफ़ेद चाय पीजिए जनाब !!




सफ़ेद चाय...और कीमत तक़रीबन 12 हजार रुपए किलो !!! हाल ही में  अरुणाचल प्रदेश के पूर्व सियांग जिले में स्थित डोनी पोलो चाय बागान की  सफेद चाय को 12,001 रुपये प्रति किग्रा कीमत मिली। यह तमाम प्रकार की  चायों के लिए सबसे ज्यादा कीमत है। असम के गुवाहाटी  स्थित टी नीलामी केंद्र (जीटीएसी) में पहली बार शुरू हुई सफेद चाय की नीलामी  में इस नई नवेली चाय ने सबसे ज्यादा कीमत हासिल कर यहां के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। मजे की बात तो यह है कि डोनी पोलो उद्यान  के पास भी बिक्री के लिए केवल 5.7किलोग्राम चाय थी और वह भी हाथों हाथ बिक गयी। वह भी तब, जब भारत में सफेद चाय बनाने वाले सबसे अच्छे उद्यान दार्जिलिंग के माने जाते  हैं।
हम यहाँ  ज्यादा दूध और कम पत्ती डालकर बनायीं गयी सफ़ेद चाय की बात नहीं कर रहें है बल्कि हम उस चाय की बात कर रहे हैं जो उत्पादन के स्तर पर ही सफ़ेद चाय कहलाती है । मेरी तरह ही बहुत लोगों कोसफ़ेद चाय सुनकर आश्चर्य होगा। वैसे चाय हमारे देश में किसी पहचान की मोहताज की नहीं है बल्कि यह तोघर-घर की पहचान है मसलन दूध वाली चाय,अदरक-इलायची वाली चाय, मसाला चाय,कट चाय और यदिआप पूर्वोत्तर में हैं तो यहाँ की लोकप्रिय लाल चाय, लिम्बू चाय( नींबू वाली चाय) और इसीतरह की तमामअन्य किस्मों/स्वादों वाली चाय।तो फिर ये जानना लाज़मी है कि आखिर ये सफ़ेद चाय है क्या बला?
सफेद चाय दरअसल में चाय की कई शैलियों में से एक है, जिन्हें हम ताज़ा या कम प्रसंस्कृत पत्तियां कह सकते है। ऐसा माना जाता है कि चाय की कलियों और नई पत्तियों के आसपास सफ़ेद रोएं/रेशे जैसी संरचनाएं होती हैं जो इस चाय के उत्पादन में अहम् भूमिका निभाती हैं इसलिए इसका नाम सफ़ेद चाय पड़ गया।
सफेद चाय को लेकर दुनिया में कोई एक राय या सर्वमान्य परिभाषा अब तक तय नहीं हुई है ।कुछ जगह इसे कम प्रसंस्करण के साथ सुखाई गईं पत्तियां माना जाता है तो कहीं कलियों से बनाई गई चाय और कहीं अपरिपक्व चाय की पत्तियों से कुछ तैयार चाय।
हाँ,इस बात से सभी सहमत हैं कि सफेद चाय का न तो ऑक्सीकरण किया जाता है और न ही इसकी पत्तियों को कूटा-पीटा जाता है इसके परिणामस्वरूप इस चाय का स्वाद और रंग-रूप अपनी बिरादरी की हरी या पारंपरिक काली चाय की तुलना में  हल्का होता है ।
‘गूगल गुरु’ पर छानबीन के दौरान पता चला कि चीन में सोंग वंश (960-1279 एडी) के शासन के दौरान सफेद चाय की खोज की गई और इसे सबसे नाजुक चाय किस्मों में से एक माना जाता है क्योंकि यह कम से कम प्रसंस्कृत होती है। वहां पौधों के पत्तों को पूरी तरह से सफेद बाल द्वारा कवर की गई ताज़ा कली के साथ पूरी तरह से फूलने से पहले  काट लिया जाता था । उस समयआम लोगों को सफेद चाय पीने की इजाजत नहीं थी क्योंकि यह विशेष रूप से सम्राट और उनके दरबारियों के लिए तैयार की जाती थी। वैसे इस चाय की कीमत को देखते हुए आज भी आम लोग इसे पीने के बारे में सोच भी नहीं सकते  
वहीं,कुछ दस्तावेजों में सफ़ेद चाय का उल्लेख 18 वीं सदी के दरम्यान मिलता है लेकिन तब इसे आज के नाम और खूबियों से नहीं जाना जाता था। यह खास चाय मुख्य रूप से चीन के फ़ुज़ियान प्रांत में पैदा होती है, लेकिन अब भारत, ताइवान, थाईलैंड, श्रीलंका और नेपाल में भी इसका उत्पादन शुरू हो गया है।
फिर सवाल वही उठता है कि आखिर ऐसा क्या है इस सफ़ेद चाय में जिसने इसे चाय की महारानी बना दिया है ? इस चाय की अंधाधुंध कीमत का राज़ इसकी खूबियों में ही छिपा है। हम इसे ‘संजीवनी चाय’ या हर मर्ज का इलाज़ भी कह सकते हैं। सफ़ेद चाय हर स्थिति में लाभकारी है चाहे फिर बात वजन घटाने की हो या फिर फिर चेहरे से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता जैसी इच्छा की। यह कैंसर,मधुमेह, रक्तचाप,समय से पहले बुढ़ापे की रोकथाम,पाचन तंत्र को मजबूत करने,दांत-त्वचा को चमकदार बनाने ,वजन घटाने सहित कई मामलों में रामबाण मानी जाती है। मतलब बस एक कप सफ़ेद चाय और सभी शारीरिक परेशानियों की छुट्टी 
@assamtea  @tea  @whitetea  @google @china 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुछ तो अलग था हमारे वेद में .....!

क्या नियति के क्रूर पंजों में इतनी ताकत है कि वो हमसे हमारा वेद छीन सके? या फिर काल इतना हठी हो सकता है कि उसे पूरी दुनिया में बस हमारा वेद ही पसंद आए? सब कह रहे हैं कि वेद हमारे बीच नहीं रहा,हमारा प्यारा वेद अब ईश्वर के दरबार में अपना रंग जमाएगा. हम में से कोई भी यह सोच भी नहीं सकता था कि ईश्वर के कथित ‘पैरोकारों’ से हमेशा दो-दो हाथ करने वाले वेद की जरुरत खुद ईश्वर को पड़ सकती है.शायद ईश्वर सीधे वेद से ही यह जानना चाहता होगा कि समस्याओं,चिंताओं और परेशानियों से भरी मेरी दुनिया में तुम इतने बेफ़िक्र-बेलौस और खिलंदड कैसे रह सकते हो?     वेद यानि वेदव्रत गिरि, एटा के पास छोटे से गाँव की एक ऐसी शख्सियत जिसके लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं था.वह पत्रकार भी था और यारों का यार भी,लेखक भी था और दोस्तों का आलोचक भी,कवि भी था और मित्रों का गुणगान करने वाला भी,पटकथा लेखक भी था और अपने ही भविष्य से खेलने वाला अभिनेता भी...क्या नहीं था हमारा वेद और क्या नहीं कर सकता था हमारा वेद. कल ही की बात लगती है जब हम सब यानि कुल जमा ४० युवा भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में मिले थे औ

हमारी बेटिओं को ‘सेनेटरी नेपकिन’ नहीं, स्कूल-अस्पताल चाहिए

एक मशहूर चुटकुला है:एक बार एक व्यक्ति कपड़े की दुकान पर पहुंचा और बढ़िया सी टाई दिखाने को कहा.दुकानदार ने कई टाईयां दिखाई.ग्राहक को एक टाई पसंद आ गई.कीमत पूछने पर दुकानदार ने कहा-५४० रूपए,तो वह व्यक्ति बोला क्या बात करते हो इतने में तो बढ़िया जूते आ जाते हैं?तो दुकानदार बोला-पर आप जूते तो गले में नहीं लटका सकते न! इस चुटकुले का सार यही है कि जिस चीज़ की ज़रूरत हो उसको खरीदना चाहिए न हर-कुछ. अब हमारी सरकार को ही देख लीजिए उसे आज़ादी के ६० साल बाद भी नहीं पता कि आम जनता को किस चीज़ की दरकार है इसलिए वह ऊल-ज़लूल योजनाए बनाकर करदाताओं के गाढ़े पसीने की कमी को फ़िजूल में उड़ाती रहती है.सरकार की नासमझी का नया उदाहारण देश के गाँवों की बेटियों को सेनेटरी नेपकिन बाँटना है. सरकार ने किशोर लड़कियों में मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य को बढावा देने के लिए 150 करोड़ रुपए की योजना को मंजूरी दी है ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में किशोर लड़कियों के लिए उच्च स्तर के सेनेटरी नेपकिनों की उपलब्धता आसान की जा सके. योजना के अनुसार छ: सेनेटरी नेपकिनों का एक पैकेट गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की लड़कियों को एक रुपया प्रति पैकेट मिलेगा

क्यों न अब अखबारों और चैनलों पर लिखा जाए “केवल वयस्कों के लिए”

               क्यों न अब न्यूज़ चैनलों और अख़बारों की ख़बरों के साथ “ केवल वयस्कों के लिए ” जैसा कोई टैग लगाना चाहिए? हो सकता है यह सवाल सुनकर आपको आश्चर्य हो और आप प्रारंभिक तौर पर इससे सहमत भी न हो लेकिन यदि आप मेरी पूरी बात पर गंभीरता से विचार करेंगे तो शायद आपको भी इस सवाल में दम नज़र आ सकता है. देश में कई बातों को बच्चो के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता इसलिए ‘केवल वयस्कों के लिए’ नामक श्रेणी को बनाया गया. इसका उद्देश्य बच्चों या अवयस्कों को ऐसी सामग्री से दूर रखना है जो उम्र के लिहाज़ से उनके लिए उपयुक्त नहीं मानी जा सकती क्योंकि वयस्कों के लिए निर्धारित सामग्री देखने से उनके अपरिपक्व मन पर गहरा असर पड़ सकता है. यही कारण है कि हिंसात्मक दृश्यों से भरपूर फिल्मों, अश्लीलता परोसने वाले कार्यक्रमों, फूहड़ भाषा का इस्तेमाल करने वाली पत्रिकाओं और इन विषयों पर केंद्रित चित्रों का प्रकाशन-प्रसारण करने वाली सामग्री को बच्चों से दूर रखने के लिए उन पर साफ़ तौर पर इस बात का उल्लेख किया जाता है कि ‘यह सामग्री केवल वयस्कों के लिए है’. कानून व्यवस्था से जुडी एजेंसियां भी इस बात का खास ख्याल रखती