सफेद बर्फ, काली बर्फ़..में छिपी हमारी कहानी!!
वैसे देखा जाए तो ये सिर्फ पहाड़ों पर फैली बर्फ भर की कहानी नहीं है बल्कि ये हमारी अपनी कहानी भी है। हमारा बचपन भी तो ऐसा ही रहता है झक सफेद बर्फ की तरह बिल्कुल साफ दिल, हँसता- खिलखिलाता, बिना वजह रोता और फिर हंसता सा। कोई बैर नहीं, किसी से कोई ईर्ष्या नहीं, कोई लालच नहीं। बस, मासूमियत के साथ जीते हैं खुशमिजाजी से, खुशी से और सरलता से। समय के साथ हम बड़े होते जाते हैं..कद से,दिमाग से और हावभाव से।
फिर दुनिया हमें सिखाना शुरू करती है जैसे परीक्षा में अच्छे नंबर लाओ, अच्छी एवं भरपूर ऊपरी कमाई वाली नौकरी करो, बड़ा सा घर लो, बड़ी वाली कार वरना लोग क्या कहेंगे... और ‘लोग क्या कहेंगे’ के पीछे भागते हुए हमारे सहज, श्वेत और सरल मन पर धीरे-धीरे जलन/तुलनाओं/ विरोधाभास की धूल जमने लगती है । फिर हम छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगते हैं, अपने ही साथियों की तरक्की देखकर ईर्ष्या करने लगते हैं, झूठ बोलकर, बहाने बनाकर, लापरवाही से काम करने लगते हैं..फिर तो रातों को नींद हराम होना ही है। मन सवालों और अफसोस के बीच भटकने लगता है। हमारे व्यक्तित्व की सफेद बर्फ धीरे धीरे काली पड़ने लगती है बिल्कुल पहाड़ों की काली बर्फ़ की तरह.. जो फिसलन, भटकाव, अलगाव और जीवन की तमाम बुराइयां लाती है।लेकिन, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है दोस्तों…क्योंकि बर्फ पिघलकर पहले पानी बनती है और फिर भाप एवं कुछ दिन में नई सफेद, निर्मल,धवल और चमकदार बर्फ बनकर फिर खूबसूरती बिखेरने लगती है। हम भी चाहे तो समय के साथ अपने मन की कालिख धो सकते हैं और फिर से बर्फ़ की तरह अपने मन को निर्मल और सरल बना सकते हैं। इसके लिए ज्यादा मशक्कत भी नहीं करना है, बस छोटे छोटे प्रयास करने हैं जैसे कभी-कभी किसी की बात पर पलटकर जवाब न देकर चुप रह जाना, पुरानी बातों को छोड़ देना, किसी से माफी माँग लेना तो किसी को माफ कर देना और सारे गिले शिकवे भुलाकर अपनी शुरुआती सहजता पुनः हासिल कर लेना..कितना आसान है।
पहाड़ों की बर्फ़ भी शायद जीवन की यही सीख देती है कि सफेद यानि बेदाग रहना आसान नहीं होता और खासतौर पर गिरकर साफ रहना तो और भी मुश्किल होता है। स्वयं को दुनियादारी की फिसलन से बचाने एवं अपने उजलेपन को बनाए रखने के लिए सच्चाई और मन का साफ होना जरूरी है। मन साफ है तो दुनिया भी सुंदर लगेगी । फिर मन के शिखर भी पहले जैसे चमकने लगेंगे..बिल्कुल बर्फ़ से ढके पहाड़ों की तरह।
इसलिए, अब कभी पहाड़ों पर बर्फबारी देखने जाएं तो यह अवश्य याद रखें कि हमारे अंतर्मन भी बर्फ सा शांत, उजला, नरम और स्वच्छ है। यदि स्वभाव की यह खासियत खो गई है तो उसे फिर से जगाना जरूरी है एवं यदि अब तक कायम है तो उसे सहेजकर रखना भी उतना ही आवश्यक है। पहाड़ों की बर्फ़ बार बार गिरकर हमें शायद यही संदेश देती है कि हम कितने खूबसूरत थे/हैं/ और हो सकते हैं…बस, थोड़ा सा धीरज, सहजता, अपनापन और ईमानदारी चाहिए ।



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