प्रेम में डूबी एक अल्हड़ प्रेयसी और दूसरी परिपक्व संगिनी..!!

 


…ऐसा लग रहा था जैसे किसी खूबसूरत श्वेत-वसना अल्हड़ युवती ने अपने गले में हीरे-मोतियों का अनुपम हार धारण कर लिया हो और वह अपने प्रेमी की अनंत प्रतीक्षा में बाँहें फैलाकर आतुरता से ताका झांकी कर रही है क्योंकि पहाड़ों के गोल गोल रास्ते बार बार एक ही दृश्य हमारे सामने लाते रहते हैं। बस, इस दृश्य से हमारी दूरी कुछ कम ज्यादा होती रहती है। 

धर्मशाला से मैकलोडगंज के लिए चढ़ते हुए आप कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं जैसे पहाड़ झांक झांक कर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। यहां बर्फ को हम श्वेतवासना युवती की पवित्रता और रोशनियों को उसकी मुस्कान कह सकते हैं। अपने प्रेमी (पर्यटक) के इंतजार में हर रात वह स्वयं को इस तरह के मनमोहक श्रृंगार से सजाती है।

दरअसल, जब हम धर्मशाला से मैकलोडगंज की ओर बढ़ रहे थे तब तक सूरज ढल चुका था और चांद की शह पाकर धौलाधार की ऊँची चोटियों पर बिछी बर्फ की सफेद चादर चांदी सी दमक रही थी और उसके नीचे मैकलोडगंज शहर की असंख्य रोशनियाँ जगमगा रहीं थीं। 


मैकलोडगंज के ठीक नीचे करीब 10 किमी की दूरी पर धर्मशाला है। जीवन के अनुभवों से समृद्ध, आत्मविश्वास से भरी, एक परिपक्व पत्नी की तरह। उसमें मैकलोडगंज जैसी चंचलता नहीं, बल्कि गहराई और धैर्य है। उसकी सड़कों पर पसरा सुकून, देवदार के वृक्षों की गंभीरता और पहाड़ों से उतरती शीतल हवा मानो कहती है कि प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि विश्वास का दूसरा नाम है। 

धर्मशाला से मैकलोडगंज जाते समय यहां के दृश्यों को निहारते हुए अचानक लगता है कि नीचे शांत रोशनियों में फैली धर्मशाला उसी श्वेतवसना युवती मैकलोडगंज का भविष्य है। वह अब अल्हड़ नहीं रही। जीवन ने उसे अनुभवों का सौंदर्य दिया है। वह एक परिपक्व पत्नी की तरह अपने घर के आँगन में उम्मीद का दीप जलाए बैठी है। उसे मालूम है कि प्रतीक्षा प्रेम का दूसरा नाम है। उसकी आँखों में ठहराव है, मुस्कान में अपनापन और मौन में गहरी आत्मीयता।

मैकलोडगंज और धर्मशाला का यही अंतर उन्हें एक-दूसरे का पूरक बनाता है। एक प्रेम का पहला स्पंदन है, दूसरा उसी प्रेम की स्थिर धड़कन। एक आकर्षण है, दूसरा अपनापन। एक स्वप्न है, दूसरा जीवन। धौलाधार इन दोनों के परस्पर प्रेम का साक्षी बनकर किसी ऋषि की तरह तपस्या में मग्न है। सदियों से वह प्रेम, विरह, मिलन और बिछोह के असंख्य दृश्य देखता आया है। उसकी चोटियाँ केवल बर्फ का विस्तार नहीं, समय की कसौटी  हैं। 


मैकलोडगंज और धर्मशाला…हिमाचल की गोद में बसे इन दोनों अनूठे और प्राकृतिक रूप से बेहतरीन शहरों को धौलाधार पर्वत श्रृंखला अपनी मौन उपस्थिति से जोड़ती है। हाल ही में इन दोनों शहरों से रूबरू होने का मौका मिला। 

धौलाधार पर बिछी बर्फ़ की सफेद चादर पर जब सुबह सूरज की सुनहरी किरणें पड़ती हैं, तब लगता है जैसे किसी ने धौलाधार की चाँदी सी धवल चादर पर सोने का रंग चढ़ा दिया हो और वह सुनहरी आभा से दमकने लगती हैं लेकिन रात में वही बर्फ चाँदनी के साथ मिलकर एक ऐसा दृश्य रचती है कि उसके सामने शब्द भी फीके पड़ जाते हैं ।

जब हम मैकलोडगंज/ मक्लोडगंज/ मैक्लॉडगंज में प्रवेश करते हैं तो यहां की गलियों में कहीं तिब्बती संस्कृति की मधुर सुगंध महसूस होती है तो कहीं प्रार्थना चक्रों की ध्वनि से बिखरते मंत्र। हवा के साथ पंख फैलाकर अपनी आवाज से पर्यटकों को अपनी और खींचती रंग बिरंगी छोटी बड़ी झंडियां सुकून की एक अलग ही दुनिया में ले जाती हैं। 

मैक्लॉडगंज तिब्बती संस्कृति का एक जीवंत कैनवास है, जहाँ आध्यात्मिकता, प्रकृति और मानवता का संगम होता है। इसे लिटिल ल्हासा भी कहा जाता है। धर्मगुरु हिज हॉलीनेस दलाई लामा की उपस्थिति ने इस स्थान को तिब्बती बौद्ध धर्म का वैश्विक केंद्र बना दिया है।

 

यहाँ की गलियों में प्रार्थना चक्र (प्रेयर व्हील्स) घुमाते हुए लाल और केसरिया वस्त्रों में लिपटे भिक्षु, अगरबत्ती की सुगंध और मंत्रों की गूंज एक अनूठा माहौल रचते हैं और यहां आप एक अलग दुनिया में होते हैं। यहां का वातावरण एवं आवोहवा हमारे शहरों से बिल्कुल अलग है, अनूठी है और आध्यात्मिक सुकून से भरी भी।

वहीं, धर्मशाला अपने विस्तृत आकाश, हरियाली और सहज जीवन-लय के साथ मन को स्थिर कर देती है। धर्मशाला अपनी शांत जीवनशैली, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करता है। धर्मशाला का हर कोना सादगी, सौम्यता और आत्मीयता का एहसास कराता है। 

यहाँ की वादियों में बहती ठंडी हवाएँ, पक्षियों का मधुर कलरव, देवदार की मोहक खुशबू और हरियाली से भरे पहाड़ मन को ऐसी शांति देते हैं, जो लंबे समय तक स्मृतियों में बनी रहती है। यहां सुविधाएं हैं,साधन हैं और शांति भी। दुनिया के सबसे खूबसूरत क्रिकेट स्टेडियम ने यहां के आकर्षण में चार चांद लगा दिए हैं। वैसे, यह मैकलोडगंज का प्रवेश द्वार भी है। इस साल ही महज मई जून में 8 लाख से ज्यादा लोग धौलाधार से वशीभूत होकर यहां आ चुके हैं।

 

सच्चाई भी यही है कि जो भी धौलाधार की इन वादियों में एक बार आता है, वह केवल तस्वीरें लेकर नहीं लौटता, वह अपने भीतर कुछ अनकहे भाव भी साथ ले जाता है। उसे महसूस होने लगता है कि पर्वत भी प्रेम करते हैं, बर्फ भी प्रतीक्षा करती है और रोशनियाँ भी किसी के आने की आशा में पूरी रात जागती हैं।

मैकलोडगंज और धर्मशाला.. केवल दो पर्यटन स्थल नहीं हैं। वे प्रेम और धैर्य, आकर्षण और विश्वास, यौवन और परिपक्वता की दो जीवंत कहानी हैं। धौलाधार की गोद में बसे ये दोनों शहर प्रकृति की ऐसी प्रेम-कथा रचते हैं, जिसे देखने वाला हर व्यक्ति अपने भीतर एक कवि, एक प्रेमी और एक यात्री सा महसूस करने लगता है।

#Dharamshala #McLeodGanj #Himachal #dholadhar #Mountain



टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आज ‘भारत रत्न’ तो कल शायद ‘परमवीर चक्र’ भी!

कुछ तो अलग था हमारे वेद में .....!

...सुकून संक्रामक है !!