'हिंदी पत्रकारिता : 200 साल की महागाथा' — इतिहास, विमर्श और समकालीन पत्रकारिता का प्रामाणिक दस्तावेज़

Udant Martand
हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी केवल एक ऐतिहासिक पड़ाव नहीं, बल्कि भारतीय समाज की चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय अस्मिता की दो सौ वर्षों की यात्रा का उत्सव भी है। इसी ऐतिहासिक अवसर पर दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) और प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'हिंदी पत्रकारिता : 200 साल की महागाथा' इस विरासत को व्यापक और बहुआयामी दृष्टि से प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण प्रयास है। लगभग 304 पृष्ठों की यह पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहासकार विजयदत्त श्रीधर तथा डॉ. सच्चिदानंद जोशी के संपादन में प्रकाशित हुई है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि देश के नामचीन लेखकों के बीच मुझे भी इस पुस्तक में रेडियो पत्रकारिता पर केंद्रित एक चैप्टर लिखने का गौरव मिला है।

जहां तक पुस्तक की बात है तो इसका सबसे बड़ा गुण इसकी विषयगत विविधता है। यह केवल हिंदी पत्रकारिता का कालक्रम नहीं बताती, बल्कि उसके वैचारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यावसायिक विकास को भी रेखांकित करती है। अनुक्रमणिका पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि इसमें उदंत मार्तंड से लेकर ई-पत्रकारिता, विज्ञान, रक्षा, पर्यावरण, खेल, कृषि, सिनेमा, रेडियो, महिला, धार्मिक, संसदीय और वैश्विक हिंदी पत्रकारिता जैसे लगभग सभी प्रमुख आयामों को समाहित किया गया है।

पुस्तक की विशेषता यह भी है कि इसमें पत्रकारिता जगत के अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों और अनुभवी पत्रकारों के लेख संकलित हैं। जैसे सुप्रसिद्ध पत्रकार रामबहादुर राय, देश में पत्रकारिता शिक्षा के अहम दायित्व संभाल चुके डॉ सच्चिदानंद जोशी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलगुरू श्री विजय मनोहर तिवारी, गिरीश्वर मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश, संत समीर, वरिष्ठ संपादक प्रकाश दुबे, इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी के लेख शामिल हैं ।

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वहीं, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. विकास दवे, शिरीष खरे, वरिष्ठ टीवी पत्रकार श्री राजेश बादल, भोपाल स्थित देश के इकलौते ज्ञानतीर्थ माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध केंद्र की प्रमुख कर्ता धर्ता डॉ. मंगला अनुजा, प्रभाकर मणि तिवारी, रक्षा पत्रकारिता के विशेषज्ञ श्री कृष्ण मोहन मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह, भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक डॉ संजय द्विवेदी, डॉ. रजनीश कुमार चतुर्वेदी, डॉ. नितिप कपूर, त्र्यंबक शर्मा, डॉ. मनोज चतुर्वेदी और प्रदीप सरदाना जैसे लेखकों की उपस्थिति पुस्तक को बहुविचारात्मक स्वर प्रदान करती है। पुस्तक में  रेडियो पत्रकारिता पर केंद्रित अध्याय में मैंने इस अनूठे प्रसारण माध्यम की ऐतिहासिक भूमिका, उसके विकास और रेडियो पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को प्रभावी ढंग से सामने लाने का प्रयास किया है।

पुस्तक का आरंभ 'उदंत मार्तंड' को नमन करते हुए हिंदी पत्रकारिता की उस ऐतिहासिक यात्रा से होता है, जिसने भारतीय समाज में जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना का आधार तैयार किया। आगे बढ़ते हुए यह पुस्तक बताती है कि पत्रकारिता केवल समाचारों का संकलन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक मूल्यों की संरक्षक भी रही है।

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हालाँकि, भरपूर व्यापकता के बाद भी डिजिटल पत्रकारिता, सोशल मीडिया, क्षेत्रीय पत्रकारिता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित पत्रकारिता और डेटा जर्नलिज्म जैसे अत्यंत समकालीन विषयों  को भी स्थान मिलता तो यह ग्रंथ और अधिक समृद्ध बन सकता था। संभवतः पृष्ठ संख्या की मजबूरी या फिर अगले संस्करण की तैयारियों को दृष्टिगत रखते हुए शायद इन विषयों को स्थान नहीं दिया गया होगा।

फिर भी, यह पुस्तक हिंदी पत्रकारिता के इतिहास और वर्तमान को समझने का एक विश्वसनीय संदर्भ ग्रंथ है। शोधार्थियों, पत्रकारिता के विद्यार्थियों, मीडिया शिक्षकों, पत्रकारों और हिंदी भाषा के गंभीर पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है। यह केवल अतीत का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भविष्य की पत्रकारिता के लिए भी दिशा-सूचक ग्रंथ है।

'हिंदी पत्रकारिता : 200 साल की महागाथा' अपने शीर्षक के अनुरूप हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की यात्रा को समग्रता, गंभीरता और प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली अतीत का सम्मान करते हुए उसके वर्तमान का मूल्यांकन और भविष्य की संभावनाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। 

।।संक्षिप्त ब्यौरा।।

पुस्तक: 'हिंदी पत्रकारिता : 200 साल की महागाथा'

संपादक: श्री विजय दत्त श्रीधर और डॉ सच्चिदानंद जोशी 

कुल पृष्ठ: 300 प्लस 

मूल्य: 350 रुपए

प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र

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