क्या, अपने देखा है मोमबत्तियों का पेड़!!


कोई इसे मोमबत्तियों का पेड़ (कैंडल्स ट्री) कहता है तो किसी को इसमें गंगा घाट पर होने वाली आरती में इस्तेमाल होने वाली आरतियां नज़र आती हैं। किसी को यह क्रिसमस ट्री का गुलदस्ता लगता है और हमने इसमें दीपावली के रोशनी से जगमगाते दीपक देख लिए..। यह अपने अपने नजरिए की बात है और इसलिए यह ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’ वाले भाव से सभी अलग,अनूठा पर आकर्षक नजर आता है।

यह संभवतः इकलौता पेड़ होगा जो अपने फूलों का रस चूसने के लिए मधुमक्खियों को सिग्नल देता है और फिर यह भी बताता है कि कौन से फूल में रस बचा है और कौन फूल रसहीन हो गया है। आम लोगों के लिए पूर्ण परिपक्व वृक्ष गोवर्धन पर्वत की तरह विशाल छाते से कम नहीं है जो धूप एवं बारिश से बचाता है। दरअसल, इसकी बड़ी एवं लंबी पत्तियों का समूह हमारे पंजे जैसा होता है इसलिए अन्य वृक्षों की तुलना में इस पेड़ से ज्यादा छाया मिलती है। 

यह सेहत का भी पिटारा है और वैरिकोज वेंस, सूजन, बवासीर और शुक्राणु की गुणवत्ता सुधारने जैसे कई काम आता है। लेकिन सावधान, इसके कच्चे बीज, पत्तियां, छाल या फूल सामान्य रूप से इतने जहरीले हो सकते हैं कि बिना जाने उपयोग करने से गंभीर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।

सुंदरता और गुणों की खान इस वृक्ष को हिमालयन हॉर्स चेस्टनट (Aesculus indica) के नाम से जाना जाता है। वैसे, इसका एक विदेशी भाई भी है। उसे हॉर्स चेस्टनट (Aesculus hippocastanum) कहा जाता है। पादप विज्ञानियों के लिए भले ही ये अलग-अलग हों लेकिन हम जैसे लोगों को तो ये कुंभ के मेले में बिछड़े भाइयों जैसे या बाली-सुग्रीव, राम-श्याम या सीता-गीता टाइप एक समान ही लगते हैं। 

इसके बारे में ज्यादा जानकारी जुटाने पर यह पता चला कि अठारहवीं सदी के मध्य में इस पेड़ को इसकी खूबसूरती के कारण ब्रिटेन और यूरोप के अन्य हिस्सों में ले जाया गया था। अब यह वहां पार्कों और बगीचों में सजावटी पेड़ के रूप में शोभा बढ़ा रहा है। मतलब सीधा सा यह है कि जैसे अंग्रेज हमारे देश में अपने साथ कई प्रकार के पेड़ पौधे लाए तो निश्चित ही उसी तरह वे यहां से भी कई पेड़ पौधे अपने साथ ले भी गए होंगे। इसलिए मुझे हॉर्स चेस्टनट कुल के पेड़ों के कुंभ के मेले में बिछड़ने की थ्योरी सही लगती है।

हिमालयन हॉर्स चेस्टनट यानि भारतीय प्रजाति का मूल जन्म स्थान और प्राकृतिक आवास उत्तर-पश्चिमी हिमालय का पर्वतीय क्षेत्र माना जाता है। वैसे भी, यह पेड़ मुख्य रूप से 900 मीटर से 3,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित नम और छायादार घाटियों में प्राकृतिक रूप से उगता है। इसलिए यह हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू एवं कश्मीर में आमतौर पर होता है। अब तो इसने अपनी जड़ें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और नेपाल तक फैला ली हैं। 

स्थानीय तौर पर इसे कनोर, बानखोर, वन अखरोट, बैंकहोर, खनोर, गुग्गू, हनुदुन, ककरा, पांगर, कारु, घोड़े पांगरो, घोड़े का शाहबलूत और नारु जैसे तमाम जाने अनजाने नामों से जाना जाता है। इसके वैज्ञानिक नाम के पीछे भी यही कहानी बताई जाती है कि इससे घोड़ों के पैरों की सूजन ठीक की जाती थी इसलिए शायद इसका नाम ‘हॉर्स चेस्टनट’ पड़ गया।

इन दिनों, यह पेड़ अपने परवान पर है इसलिए जमकर फूल रहा है और उतना ही हरा भरा भी है। इस पेड़ को दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे किसी ने पूरे पेड़ को सफेद-गुलाबी मोमबत्तियों से सजा दिया हो या इस पर सफेद गुलाबी आइसक्रीम के कोन लगा दिए हों। हिमाचल प्रदेश के शिमला के रिज (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर यह पेड़ अपने बंधु बांधवों के साथ इन दिनों पूरे शबाव पर है। 

मजे की बात यह भी है कि इसी पेड़ के पास यहां सैलानियों को घूमने के लिए घोड़े मिलते हैं इसलिए यह हॉर्स चेस्टनट नाम सार्थक सा लगता है। मॉल रोड के सबसे बड़े हॉर्स चेस्टनट की लोकेशन एवं आकार इतना विशाल है कि आमतौर पर लोग यहां रुक कर एक दूसरे का इंतजार करते हैं इसलिए कुछ लोग इसे ‘वेटिंग ट्री’ भी कहने लगे हैं। वैसे, मॉल रोड पर इसके छोटे बड़े आधा दर्जन पेड़ हैं और पूरे इलाक़े के सौंदर्य में चार चांद लगा रहे हैं।

पहाड़ों पर मिलने वाले पेड़ पौधे हमारे मैदानी इलाकों में सामान्य तौर पर मिलने वाले आम, जामुन, पीपल, नीम, बरगद से अलग होते हैं इसलिए जब भी किसी पहाड़ी क्षेत्र में जाने का अवसर मिले इस वानस्पतिक विविधता का भी भरपूर आनंद लीजिए क्योंकि हर मौसम में यहां कोई न कोई बुरांश, देवदार, पाइन, नीला गुलमोहर या हॉर्स चेस्टनट अपनी खूबसूरती से आपका मन मोह ही लेगा।





टिप्पणियाँ

  1. सर, ये तो हमें पहाड़ी आम लग रहा है। फूल पगलाए से लगते हैं। यानी खराब तरीके से बौरा गए हैं....

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  2. Very insightful example, sir.
    Himalayan Horse Chestnut me nectar-guided floral colour transition (yellow to red) plant -pollinator co-evolution ka 1 well-documented mechanism mana jata hai...Bees UV-sensitive compound eyes ke through visual cues ko detect karke targeted foraging karti hai, so... pollination efficiency & energy optimization improve hota hai...
    Isi prakar ke nectar signalling systems ke bare me pollination ecology & applied entomology literature me bhi milta hai....
    Nice share sir... 👍

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    1. शुक्रिया, इसी को शायद पहले पैरे में मैंने शामिल किया है कि पेड़ खुद मधुमक्खियों को बताया है कि कहां रस है और कहां नहीं।

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