क्यों घट रही है समानता की प्रतीक साइकिल की लोकप्रियता!!


साइकिल केवल एक परिवहन साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, समानता और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक रही है। भारतीय समाज में साइकिल का महत्व अनेक स्तरों पर देखा जा सकता है। साइकिल अमीर-गरीब, जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को कम करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों विद्यार्थियों, विशेषकर लड़कियों के लिए साइकिल शिक्षा तक पहुंच का साधन बनी। साइकिल ने महिलाओं को भी स्वतंत्र आवागमन की सुविधा दी है । साइकिल प्रदूषण नहीं फैलाती और ईंधन की आवश्यकता नहीं होती। बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के दौर में इसका उपयोग सामाजिक जिम्मेदारी का परिचायक माना जाता है। साइकिल चलाने से शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है। 

कहने का आशय यह है कि साइकिल केवल दो पहियों का वाहन नहीं, बल्कि समान अवसर, स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। लेकिन पिछले कुछ सालों से साइकिल का चलन घट रहा है। लोग अब साइकिल चलाने में शर्माने लगे हैं। मोटर साइकिल एवं कारों के बढ़ने चलन ने भी साइकिल की लोकप्रियता को कम किया है।

हो सकता है कि यह बात कम लोग जानते हो कि साइकिल को लोकप्रिय बनाने के लिए दुनिया भर में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा हर साल 3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। यह दिवस 2018 से शुरू किया गया है।  इस वर्ष के लिए संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक विषय "हरित भविष्य के लिए साइकिल चलाना" है। यह दिवस साइकिल को परिवहन के एक किफायती, विश्वसनीय और टिकाऊ साधन के रूप में बढ़ावा देता है जो पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभकारी है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को साइकिल चलाने के प्रति जागरुक करना है। इतना तो हम सभी जानते हैं कि नियमित तौर पर साइकिल चलाना शरीर के लिए काफी फायदेमंद है। मोटापा घटाने से लेकर शरीर की तंदुरुस्ती के लिए नियमित साइकिल चलाना वरदान है। 

जानकर कहते हैं कि रोजाना आधा घंटा साइकिल चलाने से हृदय रोग, मोटापा, मानसिक बीमारी, मधुमेह, गठिया रोग जैसी कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है। आज के समय मोटर वाहनों को बढ़ते उपयोग के कारण वातावरण में प्रदूषण काफी बढ़ रहा है। इस कारण वातावरण को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए साइकिल का उपयोग जरूरी हो गया है।  

जहां तक देश में साइकिल की कुल संख्या या इससे जुड़े आंकड़ों की बात करें तो भारत में कारों या मोटरसाइकिलों की तरह साइकिलों का कोई केंद्रीकृत सरकारी रजिस्ट्रेशन डेटाबेस नहीं है, लेकिन फिर भी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और साइकिल उद्योग संघ के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल साइकिलों की संख्या 11करोड़ से अधिक है। इसी रिपोर्ट के अनुसार भारत के लगभग आधे से अधिक 50.4 प्रतिशत परिवारों के पास कम से कम एक साइकिल अवश्य है। इस सेहतमंद दो पहिया वाहन की राज्यों में लोकप्रियता की बात करें तो साइकिल स्वामित्व के मामले में पश्चिम बंगाल देश में सबसे आगे है, जहाँ 78.9 प्रतिशत परिवारों के पास साइकिल है। इसके बाद उत्तर प्रदेश 75.6 फ़ीसदी और ओडिशा 72.5 प्रतिशत का स्थान आता है। 

उल्लेखनीय उपलब्धि यह है कि चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा साइकिल निर्माता देश है। भारत में हर साल लगभग 1.6 से 1.8 करोड़ साइकिलों का उत्पादन किया जाता है। वहीं, ऑल इंडिया साइकिल मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल 1 करोड़ से सवा करोड़ साइकिलें बेची जाती हैं। पंजाब का लुधियाना शहर तो भारत की 'साइकिल राजधानी' के रूप में जाना जाता है क्योंकि देश में बनने वाली कुल साइकिलों का लगभग 75 से 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले लुधियाना में ही तैयार होता है।


आंकड़ों से भले ही यह पता चलता है कि भले ही भारत के 50 प्रतिशत से अधिक घरों में साइकिल मौजूद है, लेकिन शहरों में सुरक्षित साइकिल ट्रैक न होने और वाहनों की भीड़ बढ़ने के कारण दैनिक आवागमन में साइकिल का उपयोग महज 2 से 5 फीसदी ही है। भारतीय शहरों में सबसे बड़ी चुनौती साइकिल चालकों की सुरक्षा और सड़कों पर भारी ट्रैफिक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, भारत में साइकिल चालकों के लिए सड़क दुर्घटनाएं एक बड़ा जोखिम हैं।

यदि हम दुनियाभर में साइकिलों की स्थिति का अध्ययन करें तो मौजूदा समय में दुनिया में 100 करोड़ से अधिक साइकिल हैं। वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा साइकिल वाले देशों में चीन सबसे आगे है। यहाँ 45 से 50 करोड़ साइकिलें हैं जबकि नीदरलैंड दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जहाँ इंसानों से ज़्यादा साइकिलें हैं। यहाँ की आबादी लगभग पौने दो करोड़ है, जबकि साइकिलों की संख्या 2.3 करोड़ से अधिक है। यहाँ प्रति व्यक्ति साइकिल का औसत दुनिया में सबसे ज़्यादा है। 

डेनमार्क भी प्रति व्यक्ति साइकिल के औसत के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। यहाँ लगभग 80 प्रतिशत लोगों के पास अपनी साइकिल है। जर्मनी में भी करीब 6.2 से 8.3 करोड़ साइकिलें हैं।  हालिया रुझानों के अनुसार, यहाँ अब सामान्य साइकिलों से ज़्यादा ई-बाइक्स (इलेक्ट्रिक साइकिल) बिक रही हैं। 

एशिया में जापान साइकिल का एक बड़ा केंद्र है। यहाँ 7.2 करोड़ से अधिक साइकिलें हैं और प्रति व्यक्ति औसत 0.57 है।  एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, नीदरलैंड के शहर साइकिल चलाने के हिसाब से सबसे सुरक्षित शहर माने जाते हैं। इसके बाद, डेनमार्क, बेल्जियम और फ्रांस जैसे देशों का नंबर आता है। कनाडा का मॉन्ट्रियल, ताइवान का ताइपे और जापान का फुकुओका शहर भी साइकिल चलाने के लिहाज से अच्छे शहरों में गिने जाते हैं।


हम सभी जानते हैं कि भारत में साइकिल कभी आम आदमी का सबसे भरोसेमंद वाहन हुआ करती थी, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसकी लोकप्रियता अपेक्षाकृत कम हुई है। इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और बुनियादी कारण हैं। मसलन भारत में साइकिल को अक्सर आर्थिक मजबूरी से जोड़ा जाता है। जैसे-जैसे लोगों की आय बढ़ी, दोपहिया और चारपहिया वाहन सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक बन गए। इसलिए बहुत से लोग साइकिल छोड़कर मोटरसाइकिल या स्कूटर की ओर बढ़ गए। मोटरसाइकिलें भी पहले की तुलना में अधिक सुलभ हो गई हैं। आसान किस्तों और ऋण सुविधाओं ने उनके प्रसार को बढ़ावा दिया है।

एक अन्य महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि हमारे देश में शहरों का आकार तेजी से बढ़ा है। नौकरी, शिक्षा और अन्य कार्यों के लिए लोगों को कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। ऐसे में साइकिल की तुलना में मोटर वाहन अधिक सुविधाजनक लगते हैं। इसके अलावा देश के अधिकांश भारतीय शहरों में साइकिल चालकों के लिए अलग लेन नहीं हैं। साइकिल चलाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा भारत में सड़कें और फ्लाईओवर भी हैं जो मुख्यतः मोटर वाहनों को ध्यान में रखकर विकसित किए गए हैं। 

हालांकि, हाल के वर्षों में स्वास्थ्य, पर्यावरण और फिटनेस के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण साइकिल का महत्व फिर से बढ़ रहा है। कई शहरों में साइकिल ट्रैक, साइकिल-शेयरिंग और फिटनेस राइड्स को खासकर बढ़ावा दिया जा रहा है। कुल मिलाकर यदि सुरक्षित मार्ग, बेहतर शहरी योजना और सकारात्मक सामाजिक दृष्टिकोण विकसित हो जाएं, तो साइकिल भारत में फिर से एक महत्वपूर्ण परिवहन साधन बन सकती है।


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