विरासत,बदलाव और भविष्य पर गंभीर विमर्श
‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता विशेषांक की समीक्षा
देश में शोध पर केंद्रित अनेक पत्रिकाएं या जर्नल निकल रहे हैं लेकिन अधिकतर अकादमिक संस्थानों से प्रकाशित हो रहे हैं और उनका विमर्श भी अकादमिक स्तर का ही रहता है लेकिन ‘समागम’ ने इस सीमा से न बँधकर अपने लिए विषयों का आसमान खुला रखा है। शायद, इसकी मूल वजह इस लोकप्रिय शोध पत्रिका का संपादक किसी शैक्षणिक विशेषज्ञ का न होकर खांटी पत्रकार प्रो मनोज कुमार का होना है। ‘समागम’ में विषयों की इतनी विविधता होती है कि हर अंक संग्रहणीय दस्तावेज बन जाता है।
‘समागम’ का मई माह का अंक भी विविधता की इसी श्रृंखला को आगे बढ़ा रहा है। खास बात यह है कि यह सामान्य अंक न होकर विशेषांक है। यह विशेषांक उदंत मार्तंड से लेकर अब तक हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल के इतिहास को केंद्र में रखकर तैयार किया गया एक गंभीर, बहुआयामी और शोधपरक प्रयास है। करीब डेढ़ सौ पेजों का यह अंक पत्रकारिता के विद्यार्थियों, अध्येताओं और संस्थानों के साथ साथ इस विषय में रुचि रखने वालों के लिए अत्यधिक उपयोगी है।
इस अंक की बात करते हुए संपादक प्रो मनोज कुमार बताते हैं कि- ‘हमारा प्रयास था कि 'उदन्त मार्त्तण्ड' के द्वि-शताब्दी वर्ष के अवसर पर एक ऐसे अंक का संयोजन किया जाए, जो न केवल पठनीय हो अपितु संग्रहणीय भी हो। 'उदन्त मार्त्तण्ड : ककहरा से एआई' तक के इस अंक में बहुत कुछ समेटने की कोशिश की है और बहुत कुछ छूट भी गया है. आने वाले समय में उसे भी समाहित करने का प्रयास करेंगे।’
इस अंक में ‘समागम’ ने हिंदी पत्रकारिता को केवल समाचार माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति, भाषा, ज्ञान परंपरा, लोकतंत्र और तकनीकी बदलावों से जुड़े व्यापक विमर्श के रूप में देखने का प्रयास किया है। विशेषांक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विषय-विविधता है। इसमें हिंदी पत्रकारिता के अब तक के इतिहास, विरासत, बदलाव, विकास, वैचारिक आंदोलनों, स्वतंत्रता संघर्ष और अंग्रेजी शासनकाल में प्रतिबंधित पत्रिकाओं जैसे गंभीर विषयों को शामिल किया गया है। हर अध्याय में विषय विशेषज्ञों की कलम हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक जड़ों को मौजूदा संदर्भों में समझने का गंभीर प्रयास करती है।
विशेषांक में उदंत मार्तंड से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तक हिंदी पत्रकारिता की सफल यात्रा, इस दौरान हुए बदलावों और भारतीय ज्ञान परंपरा के संबंध पर विशेष बल दिया गया है। “नारद जी, भारतीय ज्ञान परंपरा एवं हिंदी पत्रकारिता”, “भारतीय ज्ञान परंपरा में हिंदी का स्थान” तथा “हिंदी, भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा” जैसे विषय यह दर्शाते हैं कि संपादक मंडल पत्रकारिता को केवल आधुनिक सूचना तंत्र नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक परंपरा के विस्तार के रूप में देखता है। यह दृष्टिकोण इस विशेषांक को सामान्य पत्रकारिता विमर्श से अलग पहचान देता है।
‘समागम’ के इस अंक का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका समकालीन दृष्टिकोण भी है। “डिजिटल समय में मीडिया शिक्षा”, “हिंदी पत्रकारिता का बदलता स्वरूप और डिजिटल मीडिया का प्रभाव”, “भाषा प्रौद्योगिकी का स्वरूप और भविष्य”, “एआई : विकल्प नहीं, उपकरण बने” तथा “वैश्वीकरण के दौर में हिंदी भाषा” जैसे विषय वर्तमान मीडिया परिदृश्य की चुनौतियों और संभावनाओं को सामने लाते हैं। इससे यह विशेषांक केवल अतीत का दस्तावेज नहीं रह जाता, बल्कि भविष्य की पत्रकारिता पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करता है।
विशेषांक में मीडिया और समाज के संबंधों को भी पर्याप्त स्थान दिया गया है। बाजारवाद, लोकतंत्र, सामाजिक समरसता, स्त्री संघर्ष, आदिवासी अस्मिता, पर्यावरणीय चिंतन और दलित विमर्श जैसे विषय पत्रकारिता को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ‘समागम’ पत्रकारिता को केवल सूचना उद्योग नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के माध्यम के रूप में देखता है। हिंदी पत्रकारिता के साथ सिनेमा, फिल्म पत्रकारिता, आकाशवाणी का प्रसारण, बाल पत्रकारिता और व्यंग्य लेखन की परंपरा जैसे विषयों का समावेश विशेषांक को और समृद्ध बनाता है। इससे पाठक को हिंदी मीडिया जगत के विविध आयामों का व्यापक परिचय मिलता है।
‘समागम’ के पहले भाग में 'उदन्त मार्तण्ड' से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक का सफर, भारत की बाल पत्रकारिता, व्यंग्य लेखन की परंपरा, हिंदी पत्रकारिता में बंगाल का योगदान, अंग्रेजी राज में प्रतिबंधित पत्रिकाएं, वैचारिक आंदोलन, नवजागरण काल, स्वाधीनता आंदोलन, आकाशवाणी का इतिहास, डिजिटल समय में मीडिया शिक्षा आदि को व्यवस्थित रूप से शामिल किया गया है। इस भाग में श्री गिरीश पंकज, डॉ विकास दवे, संजीव शर्मा, डॉ. शैलेश शुक्ला, डॉ. संतोष भदौरिया, डॉ. अल्पना सिंह, डॉ. संध्या द्विवेदी, डॉ. संगीता पाठक, अनिल माथुर, डॉ. आरती सारंग, प्रो. संजय द्विवेदी, राजकुमार जैन, डॉ. अर्पण जैन और डॉ. नरेन्द्र त्रिपाठी जैसे विद्वानों के लेख इस खंड को मजबूत बनाते हैं।
वहीं,शोध विमर्श पर आधारित दूसरा खंड समकालीन और विश्लेषणात्मक है। इसमें नाट्य समीक्षा, डिजिटल मीडिया का प्रभाव, वैश्विक परिप्रेक्ष्य, सिनेमा और पत्रकारिता, दलित-आदिवासी विमर्श, नारी मुद्दे, पर्यावरण, लोकतंत्र और भाषा शुद्धि जैसे विविध विषय शामिल हैं। डॉ. दीपा वाडिया, डॉ. नीता सक्सेना, डॉ. हरिओम कुमार, प्रो आशुतोष कुमार द्विवेदी, कविता आर, डॉ. विजयकुमार रोड़े, सिलपाका वेंकटाद्री आदि शोधकर्ताओं के योगदान से यह खंड शोध की गहराई प्रदान करता है।
‘समागम’ का आकर्षक और विषय के अनुरूप आवरण, त्रुटि रहित छपाई और कम कीमत में ज्यादा जानकारी इसे और भी पठनीय बनाते हैं। हालांकि, कुछ विषयों जैसे क्षेत्रीय हिंदी पत्रकारिता पर और अधिक विस्तार दिया जा सकता था। साथ ही, शहरी व ग्रामीण पाठक वर्ग के दृष्टिकोण और हिंदी पत्रकारिता की आर्थिक व्यवहार्यता जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर भी शोध परक आलेख होते तो पाठकों की समझ और बेहतर हो सकती थी।
समग्र रूप से देखा जाए तो ‘समागम’ का यह विशेषांक हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक यात्रा, वैचारिक चेतना, सामाजिक सरोकार और तकनीकी संक्रमण का एक गंभीर दस्तावेज है। यह केवल शोधार्थियों और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए ही उपयोगी नहीं होगा, बल्कि हिंदी भाषा, मीडिया अध्ययन और भारतीय ज्ञान परंपरा में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए भी महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री सिद्ध हो सकता है। यह विशेषांक इस बात का भी प्रमाण है कि हिंदी पत्रकारिता पर गंभीर अकादमिक विमर्श आज भी जीवित है और बदलते डिजिटल युग में अपनी नई दिशा खोज रहा है।

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