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मीठे राजमार्ग के माथे पर क्यों लगी हैं लाल बिंदी…!!

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इन दिनों यदि आप ‘मीठे राजमार्ग’ से गुजर रहे होंगे तो आपको ताजे गुड़ की मदहोश करने वाली मिठास के साथ सड़क पर कुछ अनूठा..कुछ अलग भी नजर आएगा। ऐसा लगता है जैसे किसी ने राजमार्ग के माथे पर सुंदर सी लाल बिंदी लगा दी है। यह अनूठापन आकर्षक भी है और आपकी सुरक्षा का पहरेदार भी। मीठे राजमार्ग के बारे में और विस्तार से जानना हो तो आप इस लिंक के जरिए पढ़ सकते हैं। मीठा राजमार्ग: जहां बन रहे मदहोश करने… https://jugaali.blogspot.com/2024/12/blog-post_59.html बहरहाल, अभी बात मीठे राजमार्ग के अनूठेपन की। दरअसल भोपाल से जबलपुर तक बिना किसी रुकावट के जाने के लिए बनाया गया नेशनल हाइवे क्रमांक 45 इन दिनों अपने रेड कार्पेट के कारण देश भर में चर्चा में है। ये टेबिल टॉप शैली में बने रेड कार्पेट पूरी सड़क की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे हैं। ये ऐसे लगते हैं जैसे महिलाएं माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी लगाती हैं। जैसे बिंदी सुहाग की सुरक्षा का प्रतीक मानी जाती है,इसी तरह यह रेड कार्पेट भी वाहन चालकों की सुरक्षा का प्रतीक है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एन एच ए आई) ने देश में संभवतः पहली बार यह अनूठा प्रयोग...

25 वें जन्मदिन पर पिता का पत्र बेटी के नाम

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 🌹जन्मदिन मुबारक प्रिंसेस..🌹 हमारी नन्ही सी परी…देखते ही देखते सजीली राजकुमारी बन गई है। आज जब घड़ी ने बारह बजाए और हमने आँखें बंद कीं तो पूरे 25 साल का गुजरा समय किसी मनभावन फिल्म की भांति आंखों के सामने आ गया…11 दिसंबर, 2000 को सोमवार का दिन था और उस दिन पूर्णिमा थी। पूरी  दुनिया को दूधिया रोशनी से जगमगाते हुए तुमने रात करीब 10 बजे हमारे जीवन में हौले से कदम रखा और फिर क्या था..हमारी दुनिया भी रोशन होती चली गई। तुमको शायद न पता हो कि 11 दिसम्बर का दिन पर्वतीय पर्यावरण के महत्व के लिए मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस के रूप में भी जाना जाता है और जन्म के बाद आज तुम्हारे 25वें जन्मदिन का जश्न भी हिमालय की गोद में पहाड़ों की रानी शिमला की बाहों में मनाने का अवसर मिला है। जब तुमने अपने नन्हे हाथ को मेरे हाथ में रखा था तो लगा कि चांद हथेली पर उतर आया हो। जब पहली बार तुमने मेरी अंगुली पकड़ी थी तो इतना जोर लगाया था कि आज तक उसकी गर्माहट महसूस होती है और लगा जैसे तुम कह रही हो, कि पापा इसी तरह अंगुली थामे रहना। उस पल से लेकर आज तक, सच में हम लोग बस तुम्हारे लिए, तुम्हारे स...

व्यंग्य: गो मूत्र से वोट कहते हैं

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आवश्यकता आविष्कार की जननी है और भारत आविष्कारों (पढ़िये चमत्कारों) का देश है। आविष्कार (चमत्कार) भी ऐसे-ऐसे कि अमेरिका-जापान जैसे 'आविष्कार केंद्रित' देश और नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक भी दांतों तले अंगुली दबा लें। हमें स्कूल के दिनों से रटाया जाता है कि शून्य का आविष्कार भारत ने ही किया था। इस खोज का कितना लाभ हम उठा पाए यह तो वैदिक, ज्योतिष एवं कर्मकांडों को स्कूल-कालेजों में अनिवार्य विषय बनवाने वाले 'शिक्षा शंकराचार्य' जाने, पर इस शून्य को एक से लेकर नौ अंकों के साथ मनचाही बार प्रयुक्त कर 'रिश्वत' का आविष्कार जरूर हमने कर दिखाया है क्योंकि 'रिश्वत हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, इसे हम लेकर रहेंगे' की तर्ज पर 'रिश्वोत्री' (रिश्वत की गंगोत्री) को पूरे देश में समान गति से बहते देखकर इस आविष्कार की सार्थकता एवं कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है जैसी 'राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण' होता है। 'राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण' वाक्य का इस्तेमाल करने के लिए मैं हमारे हिन्दू मठाधीशों से माफी मांगता हूं। दरअसल इसका तो उन्हें पेटेंट करा...

वर्षा विगत चुनाव ऋतु आई...

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वर्षा विगत चुनाव ऋतु आई...... पढ़ कर इस गुस्ताख़ी के लिए संत तुलसीदास जी माफ़ करें क्योंकि उन्होंने तो वर्षा विगत शरद ऋतु आई... लिखा है। मौसम विभाग के बाबू भी नाराज़ न हों क्योंकि मौसम परिवर्तन की सूचना देना तो उनकी बपौती है। फिर चाहे वे गर्मी में पानी गिरने की और वर्षा में तीखी गर्मी की भविष्यवाणी क्यों न करते हों और उनके पूर्वानुमानों पर आस लगाकर कितने ही किसान हर साल बर्बाद होते हों। खैर, मौसम विभाग के किस्से तो कहानी घर घर की तरह देशभर में समान रुप से चर्चित हैं। यहाँ पेश है संत तुलसीदास की इन प्रसिद्ध पंक्तियों पर रामायण काल और आधुनिक काल की दो सखियों की बात-चीत:   सखी (एक): हे सखी, देख वर्षा ऋतु बीतने को है। शरद ऋतु के स्वागत की तैयारियों में धरती हरियाली और रंग-बिरंगे फूलों से सज गयी है।   सखी (दो): तुम गलत समझ रही हो सहेली, यह सजावट शरद ऋतु के स्वागत की नहीं, बल्कि चुनाव की तैयारियाँ हैं। जिसे तुम हरियाली और रंग-बिरंगे फूल समझ रही हो वे राजनीतिक पार्टियों के झंडे, बैनर, पोस्टर है। पगली ये चुनाव ऋतु है।   सखी (एक): पर देख, फूले काँस सकल महि छाये वर्षा...

कूड़ा नहीं ज़नाब, सोना कहिए सोना...!!!

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एक विज्ञापन की चर्चित पंचलाइन थी कि "जब घर में पड़ा है सोना, तो फिर काहे को रोना”, और आज लगभग यही स्थिति हमारे नगरों/महानगरों में की है क्योंकि वे भी हर दिन जमा हो रहे टनों की मात्रा में कचरा अर्थात सोना रखकर रो रहे हैं। इसका कारण शायद यह है कि या तो उनको ये नहीं पता कि उनके पास जो टनों कचरा है वह दरअसल में कूड़ा नहीं बल्कि कमाऊ सोना है और या फिर वे जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं? अब यह पढ़कर एक सवाल तो आपके दिमाग में भी आ रहा होगा कि बदबूदार/गन्दा और घर के बाहर फेंकने वाला कूड़ा आखिर सोना कैसे हो सकता है? इस पहेली को सुलझाकर आपका इस निबंध को आगे पढ़ने का उत्साह खत्म करने से पहले हम इस बात पर चर्चा करते हैं कि सही तरह से निपटान की व्यवस्था नहीं होने के कारण कैसे आज कचरा हमारे नगरों/महानगरों और गांवों के लिए संकट बन रहा है। दिल्ली में रहने वाले लोगों ने तो गाज़ियाबाद आते जाते समय अक्सर ही कचरे के पहाड़ देखे होंगे। ऊँचे-ऊँचे, प्राकृतिक पर्वत मालाओं को भी पीछे छोड़ते कूड़े के ढेर, उनसे निकलता ज़हरीला धुंआ और उस पर मंडराते चील-कौवे...ये पहाड़ शहर का सौन्दर्य बढ़ने के स्थान पर धब्बे की...

एक मुलाकात…फलों के राजा से!!

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आइए, आपको मिलवाते हैं फलों के राजा हिमाचल से…जहाँ फल केवल उत्पाद नहीं बल्कि गर्व हैं। शिमला की पहाड़ियों पर लाल-गुलाबी सेब किसी राजकुमार से कम नहीं हैं। किन्नौर का अखरोट इतना चटकदार जैसे फलों का सेनापति। कुल्लू की चेरी महारानी सी लजाती है तो आड़ू गालों पर लाली लिए किसी राजकुमारी सा लगता है। नाशपाती, खुबानी, आलू बुखारा, केला, जापानी फल, मशरूम और कीवी राजा के नवरत्नों में शामिल हैं। यहाँ की मिट्टी में हिमालय का गौरव घुला मिला है…हवा में बर्फ की शान है तो धूप इतनी नफ़ासत से पड़ती है कि हर फल ‘रॉयल’ और ‘डिलिशियस’ बन जाता है। इसलिए आप जब भी कोई फल खाओ और मुँह से वाह निकले, तो समझ जाइए कि  वह फलों के राजा के दरबार से आया है। हिमाचल प्रदेश को प्रकृति ने शिद्दत से संवारा और अपनी पूरी उदारता से नवाजा है। हिमालय की गोद में बसा यह प्रदेश केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही विख्यात नहीं है, बल्कि अपने विविध,लज़ीज़,रसीले और सेहत से भरपूर फलों के कारण भी प्रसिद्ध है इसलिए इसे भारत का फलों का टोकरा (Fruit Basket of India) भी कहा जाता है। यहाँ देश के सबसे स्वादिष्ट, रसीले और उच्च गुणवत्ता वाले फलो...

शिमला से क्यों रूठा है रूमानियत का रहबर

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  शिमला में दिलकश मौसम के कारण मॉल रोड इन दिनों प्रेमी जोड़ों और नव युगलों की रूमानियत में सराबोर है। देश भर से हनीमून मनाने के लिए शिमला पहुंचने वाले जोड़ों की संख्या रोज बढ़ रही है लेकिन अपने अद्भुत रंग,कलेवर एवं पतझड़ से पूरे वातावरण में रोमांस बिखेरने वाले चिनार पर इस रूमानियत का कोई असर नजर नहीं आ रहा। यश चोपड़ा से लेकर कई फिल्म निर्माताओं ने अपनी फिल्मों में चिनार के पीले,गुलाबी और दहकते सौंदर्य का इस्तेमाल कर जबरदस्त रोमांस दर्शाया है। शिमला में चिनार की इस बेरुखी की वजह से युवा न तो शाहरुख खान की तरह बांहे फैलाकर अपनी ‘सेनोरिटा’ को लुभा पा रहे हैं और न ही उनकी ‘बंदी’ चिनार के खूबसूरत पत्तों से इज़हार-ए-लव कर पा रही हैं। रूमानियत के प्रतीक चिनार को पता नहीं क्यों शिमला की वादियां अब तक रास नहीं आ रहीं। कश्मीर की वादियों में तो यह अपने मनभावन रंग भरपूर बिखेरता है। एक एक पत्ता प्रेम,प्यार एवं रोमांस की पूरी कहानी का साक्षी बन जाता है लेकिन शिमला में चिनार के पेड़ न तो आतिश ए चिनार रच पा रहे हैं और न ही हरुद जैसा कुछ यहां नजर आ रहा है। गौरतलब है कि कश्मीर में चिनार के पेड़ों के...