जादुई पिटारे की तरह है रेडियो
रेडियो सुनना इन दिनों कितना आसान है न? मोबाइल पर ऐप डाउनलोड करो और मनचाहे गाने और कार्यक्रम सुनो, लेकिन कुछ दशक पहले तक रेडियो ‘लग्जरी’ था। रेडियो खरीदने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। ये पढ़कर आश्चर्य हो रहा है न? हकीकत यही है कि ऐसा भी दौर था जब घर में रेडियो रखने और सुनने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था? बिल्कुल वैसे ही जैसे आज कार चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस चाहिए। तब रेडियो के लिए ब्रॉडकास्ट रिसीवर लाइसेंस जरूरी था। रेडियो सेट रखने वाले को पोस्ट ऑफिस से करीब 15 रुपए सालाना शुल्क देकर लाइसेंस लेना पड़ता था। हर साल इसको रिन्यू भी कराना पड़ता था और बिना लाइसेंस के रेडियो रखना गैर-कानूनी था। रेडियो को हम हमारे देश में सामान्य रूप से आकाशवाणी के नाम से जानते हैं। जेन ज़ी में यह एफएम, पॉडकास्ट, रेडियो ऐप्स जैसे तमाम नामों से लोकप्रिय है। यह एक जादुई पिटारा है । आप मोबाइल से, कार में, ईयर फोन के जरिए आसानी से रेडियो सुन सकते हैं लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब रेडियो एक बड़ा सा डिब्बा होता था, जिसमें एंटीना लगाकर दूर-दूर की आवाज़ें पकड़ी जाती थीं। आज वही रेडियो जेब के छोटे से स्मार्टफोन...