जादुई पिटारे की तरह है रेडियो
रेडियो सुनना इन दिनों कितना आसान है न? मोबाइल पर ऐप डाउनलोड करो और मनचाहे गाने और कार्यक्रम सुनो, लेकिन कुछ दशक पहले तक रेडियो ‘लग्जरी’ था। रेडियो खरीदने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। ये पढ़कर आश्चर्य हो रहा है न? हकीकत यही है कि ऐसा भी दौर था जब घर में रेडियो रखने और सुनने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था? बिल्कुल वैसे ही जैसे आज कार चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस चाहिए। तब रेडियो के लिए ब्रॉडकास्ट रिसीवर लाइसेंस जरूरी था। रेडियो सेट रखने वाले को पोस्ट ऑफिस से करीब 15 रुपए सालाना शुल्क देकर लाइसेंस लेना पड़ता था। हर साल इसको रिन्यू भी कराना पड़ता था और बिना लाइसेंस के रेडियो रखना गैर-कानूनी था।
रेडियो को हम हमारे देश में सामान्य रूप से आकाशवाणी के नाम से जानते हैं। जेन ज़ी में यह एफएम, पॉडकास्ट, रेडियो ऐप्स जैसे तमाम नामों से लोकप्रिय है। यह एक जादुई पिटारा है । आप मोबाइल से, कार में, ईयर फोन के जरिए आसानी से रेडियो सुन सकते हैं लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब रेडियो एक बड़ा सा डिब्बा होता था, जिसमें एंटीना लगाकर दूर-दूर की आवाज़ें पकड़ी जाती थीं। आज वही रेडियो जेब के छोटे से स्मार्टफोन में समा गया है। अब गाने, कहानियाँ, खबरें, पॉडकास्ट – सब कुछ उँगलियों के इशारे पर उपलब्ध हैं। दुनिया भर में लोग स्पॉटिफाई, यूट्यूब, म्यूजिक ऐप्स, न्यूज ऑन एआईआर या पॉडकास्ट ऐप्स पर रेडियो सुन रहे हैं। दरअसल,
रेडियो संचार के सबसे सस्ते और आसान माध्यमों में शामिल है। यह बैटरी से चलता है और बिजली तथा इंटरनेट न हो तो भी दुनिया भर की बातें सुनाता है। दूर-दराज के इलाकों में तो आज भी ये लाइफलाइन से कम नहीं है।
शायद, आपको जानकारी होगी कि हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन 1946 में यूएन रेडियो शुरू हुआ था। संयुक्त राष्ट्र ने 2011 में 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस घोषित किया था। इस बार विश्व रेडियो दिवस की थीम है- रेडियो और एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)। यूनेस्को की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, ये थीम रेडियो के भविष्य पर फोकस करती है।
अब हम जानते हैं कि भारत में रेडियो ने अपने जन्म से लेकर अब तक किस प्रकार खुद को बदला है। वैसे इतना तो आप सभी जानते ही हो कि दुनिया में रेडियो के जन्म की कहानी इतालवी वैज्ञानिक जी मार्कोनी से शुरू हुई थी। उन्होंने पहली बार 1895 में बिना तार के संदेश भेजा और इसके बाद तो रेडियो क्रमशः दुनिया भर में फैल गया। हमारे देश में रेडियो का इतिहास और विकास समझना एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प यात्रा है। भारत में रेडियो की शुरुआत करीब सौ साल पहले एक छोटे से प्रयोग से हुई थी, लेकिन समय के साथ यह देश के सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक ताने बाने का अभिन्न हिस्सा बन गया।
अब देश ही नहीं दुनिया भर में रेडियो के माध्यम से आम लोगों को न केवल सूचना और मनोरंजन प्रदान किया जाता है, बल्कि यह एक सशक्त माध्यम के रूप में समाज में जागरूकता बढ़ाने का दायित्व भी निभाता है। भारत में रेडियो की विकास यात्रा के सबसे पहले चरण को हम प्रारंभिक चरण (1923-1947) कह सकते हैं। 1923 में भारत में पहली बार रेडियो क्लब ऑफ बॉम्बे ने रेडियो प्रसारण की शुरुआत की । इसके बाद, 1927 में भारत में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी की स्थापना की गई। 1930 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने रेडियो प्रसारण का महत्व समझकर इसकी जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली और फिर कुछ समय बाद 1936 में ऑल इंडिया रेडियो (AIR) की स्थापना की गई।
रेडियो की विकास यात्रा के दूसरे दौर को हम स्वतंत्रता के बाद (1947-1970) का चरण कह सकते हैं । स्वतंत्रता के बाद, 1947 में आल इंडिया रेडियो के केवल छह स्टेशन और महज 11 प्रतिशत जनसंख्या तक पहुंच थी। लेकिन रेडियो के महत्व को देखते हुए सरकार ने इसका विस्तार राष्ट्रीय एकता, शिक्षा और जागरूकता फैलाने के लिए किया। अब आकाशवाणी ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ के मूल भाव के साथ देश भर में करीब 470 प्रसारण केंद्रों के जरिए देश के लगभग 92 फीसदी क्षेत्र और कुल आबादी के 99.19 प्रतिशत हिस्से में उपलब्ध है। यह 23 भाषाओं और 179 बोलियों में कार्यक्रम प्रसारित करता है।यह 27 भाषाओं में 100 देशों में अपने कार्यक्रम प्रसारित करता है।
जहां तक रेडियो इतिहास के दिलचस्प तथ्यों की बात है तो आल इंडिया रेडियो को 1956 में आकाशवाणी नाम मिला था। इसके बाद,
1957 में फिल्मी संगीत के लिए लोकप्रिय विविध भारती सेवा की शुरुआत हुई जबकि 1993 में इसने एफएम रेनबो के जाइए प्रसारण की नई शुरुआत की। आकाशवाणी ने विभिन्न राज्यों में भी अलग अलग भाषाओं में अपनी क्षेत्रीय सेवाएं शुरू की और जिसने कार्यक्रमों में विविधता और अनेकता में एकता का रंग भरा।
रेडियो की विकास यात्रा के तीसरे चरण (1990-2000) में एफएम रेडियो का विस्तार हुआ। जिसने रेडियो प्रसारण के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। एफएम रेडियो का मुख्य आकर्षण इसके बेहतर ध्वनि गुणवत्ता और संगीत पर आधारित कार्यक्रम थे। इसके बाद 1997 में प्रसार भारती का गठन कर आकाशवाणी एवं दूरदर्शन की जिम्मेदारी इसे सौंप दी। रेडियो की विकास यात्रा का चौथा चरण (2000 से अब तक) को हम डिजिटल रेडियो और इंटरनेट का युग कह सकते हैं। इंटरनेट रेडियो और डिजिटल रेडियो प्रसारण की शुरुआत के बाद से रेडियो का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। इससे ऑनलाइन रेडियो और पॉडकास्टिंग का विस्तार हुआ, जिससे रेडियो श्रोताओं के लिए नई संभावनाओं के द्वार खुले।
मौजूदा वक्त में रेडियो को लोकप्रिय बनाने में ‘मन की बात’ कार्यक्रम का बहुत योगदान है। 2014 से शुरू हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के इस मासिक कार्यक्रम ने रेडियो को फिर से जन जन तक पहुंचा दिया है। ये कार्यक्रम हर महीने के आखिरी रविवार को आता है। अपनी तरह के अनूठे मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री श्री मोदी आम लोगों की कहानियाँ, प्रेरणादायक बातें, देश की प्रगति की जानकारी और अभिभावक की तरह निजी अनुभव पर आधारित सकारात्मक सलाह देते हैं। इस कार्यक्रम को गाँव से शहर तक करोड़ों लोग सुनते हैं।
आजकल भारत में रेडियो का स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। अब यह न केवल सूचना और मनोरंजन का साधन है, बल्कि समाज के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी जानकारी देने और जागरूकता फैलाने का भी एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। आज के डिजिटल युग में रेडियो ने अपने पारंपरिक रूप में बदलाव किया है। तकनीकी बदलाव और इंटरनेट की उपलब्धता ने रेडियो के स्वरूप, प्रसारण विधि और श्रोताओं के साथ इसके संबंध को बदल दिया है।
ऑनलाइन रेडियो और पॉडकास्ट के रूप में एक नई शुरुआत हुई है। लोग अब इंटरनेट के माध्यम से कहीं भी, कभी भी अपने पसंदीदा रेडियो चैनल्स को सुन सकते हैं। इस प्रकार, रेडियो अब सीमाओं से बाहर निकलकर विश्व भर में उपलब्ध हो गया है। आकाशवाणी का ‘न्यूज़ ऑन एआईआर’ एप भी बहुत लोकप्रिय है। इन दिनों पॉडकास्टिंग का भी जमकर विस्तार हुआ है। इसमें श्रोताओं को उनकी रुचि के अनुसार खास विषयों पर लाइव एवं रिकॉर्डेड शो उपलब्ध होते हैं, जिन्हें वे अपनी सुविधा से सुन सकते हैं। देश में इन दिनों स्पॉटीफाई, जिओ सावन, गाना, विंक म्यूजिक, एप्पल पॉडकास्ट्स, पॉकेट एफएम जैसे कई लोकप्रिय पॉडकास्ट प्लेटफार्म हैं। ऐप्स के साथ स्मार्ट स्पीकर्स (जैसे Alexa, Google Home) के जरिए भी रेडियो सुनना अब बहुत सरल हो गया है।
अब रेडियो केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों और गांवों में भी कम्युनिटी (सामुदायिक) रेडियो स्टेशन का प्रचलन बढ़ा है। कम्युनिटी रेडियो का उद्देश्य स्थानीय विषय वस्तु, मुद्दों, संस्कृति, परंपराओं और घटनाओं पर आधारित कार्यक्रम प्रसारित करना है। सारेगामा कारवां जैसे रेडियो प्रयोगों ने भी इसकी लोकप्रियता बढाने का काम किया है। रेडियो की उपयोगिता बहुत व्यापक और महत्वपूर्ण है। यह केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज, शिक्षा, सूचना और जागरूकता फैलाने का प्रभावी माध्यम भी है। यह एक त्वरित और विश्वसनीय माध्यम है जिसके द्वारा समाचार और समसामयिक घटनाओं के बारे में तुरंत जानकारी प्राप्त होती है। यह विशेष रूप से प्राकृतिक आपदाओं, राष्ट्रीय संकटों और महत्वपूर्ण घटनाओं के समय में अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मामलों पर अद्यतन जानकारी प्रदान करता है।रेडियो शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेषकर दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में जहां इंटरनेट और अन्य डिजिटल माध्यमों तक पहुंच नहीं होती, रेडियो शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है। कोविड महामारी के दौरान सामाजिक जागरूकता,शिक्षा और संवाद के लिए रेडियो एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ है।
कुल मिलाकर आधुनिक समय में रेडियो ने अपनी पारंपरिक सीमाओं को पार करते हुए डिजिटल, इंटरनेट, और स्मार्ट डिवाइस जैसे आधुनिक तकनीकी रूपों में ढाल लिया है। अब यह न केवल भरपूर मनोरंजन का स्रोत है, बल्कि सूचना, शिक्षा और जागरूकता फैलाने का एक अत्यधिक प्रभावी और सशक्त माध्यम बन चुका है।
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