सेल्यूलर जेल: खूबसूरत भवन की निर्मम और दर्दनाक दास्तां..!!


विशाल फूल की सात आकर्षक पंखुड़ियां कहो या घड़ी के कांटे या साइकिल के पहिए की तर्ज पर सीधी और चक्र की भांति घूमती हुई सात कतारों से बनी इमारत.. जो वास्तुकला का उत्कृष्ट एवं बेजोड़ नमूना है। न उस समय देश में इतनी आकर्षक कोई इमारत थी और न ही आज है। यह इमारत कुछ इस तरह बनी है कि यहां कभी रहने वाले छह सौ से ज्यादा लोग एक दूसरे से बात करना तो दूर परस्पर देख भी नहीं सकते थे। वे, बस अपने मन की आंखों से यह महसूस कर सकते थे कि उनके आसपास भी उनके ही जैसे लोग मौजूद हैं। लेकिन इन सैकड़ों लोगों पर नज़र रखने के लिए महज एक ही पहरेदार की जरूरत पड़ती थी और वह इमारत के बीचों बीच बैठकर सातों विंग की बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के निगरानी रखता था। 


कभी इस इमारत की खूबसूरती बढ़ाने वाली लाल ईंटे आज रक्त रंजित दिखाई पड़ती हैं। ऐसा लगता है जैसे खून से रंगी ये दीवारें चीख चीखकर निर्मम यातना के पीड़ादायक किस्से सुना रहीं हैं और इस इमारत के परिसर में मौजूद पीपल का वृक्ष इन भयावह किस्सों की गवाही दे रहा है। हम बात कर रहे हैं अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर (अब श्री विजयपुरम) में स्थित सेल्यूलर जेल की..जिसे आमतौर पर आज भी ‘काला पानी’ के रूप में जाना जाता है। 


शानदार वास्तुकला वाली सेल्यूलर जेल का निर्माण 1896 से 1906 के बीच कराया गया था। जेल के निर्माण में मुख्य रूप से कैदियों को ही मजदूर बनाकर शोषण किया गया था। इसके निर्माण के लिए ईंटें बर्मा (अब म्यांमार) से और लोहे का सामान ब्रिटेन से मंगाया गया था। बताया जाता है कि उस समय इस जेल को बनाने में 5 लाख 17 हजार 352 रुपये का खर्च आया था। इस जेल की कुल सात विंग में प्रत्येक में तीन मंज़िलें थीं और कुल मिलाकर 693 काल कोठरियाँ थीं। हर कोठरी का आकार एक समान था और उसमें हवा और प्रकाश के लिए केवल एक छोटी सी खिड़की थी। इन कोठरियों को इस प्रकार बनाया गया था कि एक कैदी दूसरे कैदी को देख या सुन न सके और न ही बाहर का कोई दृश्य उन्हें दिखाई दे..वे बस जेल की दीवारों के बीच घुटते रहे । जेल की इस संरचना का उद्देश्य कैदियों को मानसिक रूप से तोड़ना था।

सेल्यूलर जेल के नाम को लेकर विभिन्न स्त्रोत एवं स्थानीय गाइड अलग-अलग कहानियां बताते हैं। सबसे पुख्ता कहानी यह है कि जेल एक ही आकार प्रकार के अलग अलग सेल (छोटे कमरों) से मिलकर बनी है इसलिए इसे सेल्यूलर जेल नाम मिला। इसी तरह, बताते हैं कि काला पानी वास्तव में पहले ‘काल पानी’ कहा जाता था मतलब ऐसा पानी जहां काल (मृत्यु) तय है लेकिन समय के साथ यह बदलकर काला पानी हो गया। यह बात इसलिए भी सही लगती है क्योंकि अंडमान के चारों ओर फैला समंदर खूबसूरत नीली-हरी आभा लिए है। यदि समंदर के रंग से नाम रखा जाता तो इसका नाम नीला पानी/हरा पानी जैसा कुछ होता, इसलिए काल पानी वाली बात ज्यादा सही लगती है।



जब, हम सेल्यूलर जेल के मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करते हैं तो यह महज दर्शनीय स्थल की यात्रा नहीं होती बल्कि सैकड़ों दर्द भरी आंखों, हजारों तड़पते परिवारों, इंसानी चीखों, ज़ुल्म की इंतहा तथा अंग्रेजों की खौफनाक सजा से रूबरू होने की यात्रा है…और इतने ज़ुल्म-ओ-सितम के बाद भी मातृभूमि की आजादी के लिए मर मिटने वालों के जज्बे से साक्षात्कार करने का अवसर है। कभी स्वतंत्रता सेनानियों की तड़प एवं वंदे मातरम् जैसे नारों से दहल जाने वाली यहां की दीवारें अब मौन रहकर भी हकीकत बयां करती हैं। अब यह आप पर है कि आप उनसे रिसते दर्द को कितना महसूस कर पाते हैं।


यह केवल एक जेल नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की वह कठोर दंड व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य भारतीय क्रांतिकारियों के मनोबल को तोड़ना था। शायद, अंग्रेजों को भी यह अंदेशा नहीं था कि यह जेल आगे चलकर स्वतंत्रता के संघर्ष का प्रतीक बन जाएगी एवं भविष्य में राष्ट्रीय स्मारक। दस्तावेजों के मुताबिक इस जेल के पोर्ट ब्लेयर में निर्माण का आधिकारिक आदेश 13 सितंबर 1893 को जारी किया गया था। 

इस निर्णय के पीछे ब्रिटिश हुकूमत का मकसद ही यही था कि भारत से बाहर तथा समुद्र से चारों ओर घिरे इन द्वीपों से भागना असंभव था और एकाकीपन के कारण क्रांतिकारियों एवं राजनीतिक बंदियों को भावनात्मक रूप से तोड़ना आसान था लेकिन गोरी सरकार का यह दांव उल्टा पड़ गया। सेल्यूलर जेल स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों का तीर्थ बन गई। इस जेल में भारत के अनेक महान क्रांतिकारियों और राजनीतिक बंदियों को सजा के लिए लाया गया एवं उन्हें अत्यंत अमानवीय यातनाएँ दी जाती थीं। कैदियों से नारियल से तेल निकालने के लिए भारी कोल्हू चलवाया जाता था। उनसे जानवरों से कई गुना अधिक श्रम और छोटी-छोटी बातों पर कठोर दंड के साथ साथ उन्हें भोजन तक नसीब नहीं होता था। कई कैदियों को तो बेड़ियों में जकड़ कर रखा जाता था और फिर भी कठोर परिश्रम से रियायत नहीं दी जाती थी।

भारत की स्वतंत्रता के बाद सेल्यूलर जेल को एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया। 11 फरवरी 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई ने इसे आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया। इसका उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और पीड़ा को सम्मान देना था। अब इस इमारत की सात में से साढ़े तीन विंग ही सुरक्षित बची हैं। कुछ विंग समय के साथ ढह गईं और कुछ विंग के स्थान पर सरकार ने स्थानीय लोगों के लिए सर्व सुविधायुक्त अस्पताल बना दिया है।

यहां अब प्रतिदिन शाम को होने वाला लाइट एंड साउंड शो पर्यटकों के लिए एक बेहद भावनात्मक अनुभव है। अंधेरे में जब जेल की दीवारों पर रोशनी पड़ती है और एक गहरी आवाज़ इतिहास में दफन दर्द की कहानी सुनाना शुरू करती है, तो लगता है जैसे जेल की दीवारें स्वयं बोल उठी हों। यहां स्थित पीपल का पेड़ इस कार्यक्रम में सूत्रधार बनकर क्रांतिकारियों पर अत्याचार की कहानी सुनाता है तो दर्शकों की आँखें नम हो जाती हैं। गाइड बताते हैं कि पुराना पीपल का पेड़ तो अब नहीं है लेकिन उसकी जगह रोपा गया नया पेड़ भी यहां के चप्पे चप्पे की यातना को बखूबी बयान करता है।


आज यहाँ आने वाले पर्यटक पीपल के पेड़, यातना कक्ष, फांसी घर, स्वातंत्र्य ज्योत, शहीद स्मारक, संग्रहालय और अन्य निशानियों के जरिए उस दौर के क्रूरतम इतिहास को करीब से महसूस करते हैं, जिसने सब कुछ सहते हुए भी भारत की आज़ादी की नींव मजबूत की। सही मायनों में, सेल्यूलर जेल केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं है, बल्कि यह उन हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान की जीवंत कहानी है, जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अपने जीवन की परवाह नहीं की।

जब हम इस ऐतिहासिक स्थल की कोठरियों के बीच से गुजरते हैं, तो एहसास होता है कि आज जिस स्वतंत्र वातावरण में हम सहज भाव से जी रहें हैं, उसके पीछे कितनी पीड़ा, संघर्ष,दर्द और बलिदान छिपा है। सेल्यूलर जेल भारत के स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐसी जीवंत स्मृति है, जो आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और त्याग का संदेश देती है। यह केवल हमारे अतीत की कहानी नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान की बुनियाद है और भविष्य की स्वर्णिम उपलब्धियों का आधार भी।

 

  


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