शेखचिल्ली: हास्य कथाओं का नायक या आध्यात्मिक गुरु..!!


…जैसे ही कोई हमारे बीच लंबी चौड़ी हांकने की कोशिश करता है, तो हम तुरंत कह देते हैं न कि शेख चिल्ली मत बनो। आमतौर, शेख चिल्ली की छवि एक मजाकिया, भोले भाले, अनपढ़ और ख्यालीपुलाव पकाने वाले किरदार की है। शेखचिल्ली पर केंद्रित न जाने कितनी ऐसी कहानियां और मुहावरे प्रचलित हैं जिनमें उसे बढ़ चढ़कर सोचने वाला या ख्यालीपुलाव पकाने वाला बताया गया है।

एक कहानी में शेख चिल्ली को उसकी माँ दही बेचने बाज़ार भेजती है। रास्ते में दही का कटोरा सिर पर रखे चलते हुए वह सोचता है कि दही बिकेगा तो पैसे आएँगे, इन पैसों से मैं पहले बकरियाँ खरीदूँगा, फिर बकरियाँ बच्चे देंगी, बकरी का दूध बेचकर भेड़ खरीद लूंगा और फिर ऊन बेचूँगा। जब ज्यादा पैसा जमा हो जाएगा तो घोड़ा खरीद लूंगा और फिर घोड़े पर सवार होकर निकलूँगा तो राजकुमारी मुझ पर फिदा हो जाएगी और फिर हमारी शादी हो जाएगी। शादी के बाद बच्चे होंगे लेकिन यदि बच्चे शैतानी करेंगे तो मैं डाँटूँगा भी और मारूंगा भी... बस, फिर क्या था सोचते हुए शेखचिल्ली बच्चों को मारने लगता है और कटोरा गिर जाता है और सारा दही फैल जाता है । खाली हाथ घर लौटने पर माँ पूछती है कि दही कहाँ है? तो शेख चिल्ली जवाब देता है कि माँ, मेरे बच्चे शैतानी कर रहे थे एवं मैं उन्हें डाँट रहा था..।


इसी तरह, एक और कहानी आपने भी सुनी होगी कि एक बार किसी ने शेख चिल्ली को सलाह दी कि अमीर बनना है तो कोई व्यापार करो । सलाह मानकर शेख चिल्ली अपनी जमापूंजी से एक टोकरा अंडे लेकर बाजार चल पड़ता है। आदत के मुताबिक वह रास्ते में सोचने लगता है कि अंडे बेचूँगा और फिर मिले पैसों से मुर्गियाँ खरीदूँगा। मुर्गियाँ अंडे देंगी तो फिर और मुर्गियाँ खरीद लूंगा। लेकिन, मुर्गियां दड़बों से निकलकर भागने लगी तो मुझे ही पकड़ना पड़ेगा। वह अपनी कल्पना में इतना खोया रहता है कि ख्याली मुर्गियों को पकड़ने के लिए टोकरा सिर से नीचे पटक देता है और सारे अंडे टूट गए। पास से गुजर रहे लोग चिंता करते हुए कहते हैं कि शेख साहब, आपके सारे अंडे टूट गए तो शेख चिल्ली उत्तर देता है कि अरे कोई बात नहीं, मुर्गियाँ तो बच गईं न। 


शेखचिल्ली को लेकर ऐसे ही कई किस्से कहानियां जन मानस में प्रचलित हैं लेकिन हम आज एक और शेख चिल्ली की बात कर रहे हैं। जो स्वभाव में इस शेखचिल्ली से अलग हैं। क्या आप जानते हैं कि इसी नाम के एक सूफी संत भी हुए हैं और उनके मकबरे को आज ‘कुरुक्षेत्र के ताजमहल’ के रूप जाना जाता है। अब इन दोनों शेख चिल्ली के बीच कोई संबंध है या ये दोनों एक ही व्यक्ति हैं या अलग अलग...यह शोध का विषय हो सकता है। वैसे इनके बीच अंतर्संबंध तलाशने की जुगत में हमने गूगल गुरु और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भी मदद ली लेकिन वे भी कोई सीधा या कोई सॉलिड संबंध नहीं तलाश पाए । 


वैसे, स्थानीय तौर पर इन दोनों की कहानियां कहीं कहीं परस्पर जुड़ती और कहीं अलग नज़र आती हैं। जहां तक, सूफी संत शेख चिल्ली की बात है तो उनके बारे में जरूर कुछ आधिकारिक जानकारी मिलती है और वह भी सीधे भारतीय पुरातत्व विभाग से। कुरुक्षेत्र के थानेश्वर में सूफी संत शेख चिल्ली के मकबरे में लगे बोर्ड में बताया गया है कि यह सुन्दर मकबरा सूफी सन्त अब्द-उर-रहीम उर्फ अब्द-उर-करीम से सम्बन्धित है। जिन्हें शेख चिल्ली के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये मुगल शहजादे दारा शिकोह (1650 ईस्वी) के धार्मिक गुरु थे। 


आपको यह भी बता दें कि थानेसर वही स्थान है जहां महाभारत का युद्ध हुआ था। दरअसल, इसी शेखचिल्ली के मकबरे के परिसर में पुरातत्व संग्रहालय है और यहां दर्ज आधिकारिक जानकारी के मुताबिक: पौराणिक मान्यता के अनुसार यह क्षेत्र महाभारत युद्ध का प्रमुख स्थल है । थानेसर (प्राचीन स्थाणेश्वर) एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक नगर है, जो वर्धन या पुष्यभूति वंश के प्रमुख राजा हर्षवर्धन के राज्य की राजधानी थी, जिसने उत्तर भारत के अधिकांश भू-भाग पर 606-647 ईस्वी सदी के मध्य शासन किया था । संस्कृत कवि बाणभट्ट ने अपने ग्रन्थ "हर्षचरित" में हर्षवर्धन एवं उसके थानेसर के साथ सम्बन्धों पर विस्तारपूर्वक विवरण दिया है। सन् 634 ई. में चीनी यात्री हेनसांग ने भी थानेसर की यात्रा की । उसने यहाँ अनेक हिन्दू मंदिरों तथा कई बौद्ध विहारों को देखा था । थानेसर एवं कुरूक्षेत्र का वर्णन अल्बरुनी द्वारा रचित "किताब- उल-हिन्द" में भी मिलता है जो कि गजनी के सुल्तान महमूद के साथ भारत आया था और जिसने अक्तूबर 1014 ईस्वी में थानेसर पर आक्रमण किया। यहीं पर सन् 1759 ईस्वी में मराठा सैनिकों ने अफगानों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया।

एक अष्टभुजी चबूतरे पर निर्मित यह मकबरा हल्के पीले बलुवे प्रस्तर से निर्मित है। जिसका प्रवेश दक्षिण की ओर से है तथा इसका नाशपातीनुमा गुम्बद सफेद संगमरमर से बना है। मकबरे के प्रत्येक प्रवेश द्वार में मेहराब बने हैं जो संगमरमर की जालियों से सुसज्जित हैं। छत के चारों दिशाओं में बाहर की ओर छतरियां बनी हैं जिनके गुम्बद पर हरे, नीले पीले एवं जामुनी रंग की चमकदार टाइल्स से निर्मित विभिन्न प्रकार की ज्यामितिय आकृतियां देखी जा सकती हैं।

सन्त शेखचिल्ली की समाधि भी अष्टभुजी कक्ष के मध्य निर्मित है, जबकि वास्तविक कब्र उसके ठीक नीचे के कक्ष में बनी है जिसका प्रवेश द्वार मदरसे के एक संकरे गलियारे से हो कर जाता है। छत के पश्चिमी भाग में बलुवा प्रस्तर से निर्मित एक अन्य मकबरा है जिसका बेलनाकार गुम्बद सफेद संगमरमर से सजा हुआ है। इसे शेख की पत्नी से सम्बन्धित माना जाता है। भू-सतह में मदरसे के प्रत्येक और नौ-नौ मेहराब बने हैं तथा दालान के मध्य एक वर्गाकार जलाशय निर्मित हैं। 


मदरसे के बाहरी और दक्षिण-पश्चिम किनारे पर लाल बलुआ प्रस्तर से निर्मित 'पत्थर मस्जिद' हैं जिसकी छत चार अलंकृत स्तम्भों तथा छह अर्ध-स्तम्भों पर टिका है । वास्तु शिल्पीय विशेषताओं के आधार पर इस पत्थर मस्जिद को पूर्व तुगलक काल से सम्बन्धित माना गया है। ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह स्मारक भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। वैसे, सूफी संत शेख चिल्ली के बारे  कहीं यह भी पढ़ने को मिला कि वे शायद बलूचिस्तान से भारत आए थे। 

खैर, शेख चिल्ली की हकीकत जो भी हो लेकिन मौजूदा सच्चाई यह है कि उनका मकबरा हरियाणा के कुरुक्षेत्र के थानेश्वर इलाके में है और यह मुगलकालीन वास्तुकला का नमूना है। इसे देखने के लिए भारतीय पर्यटकों को 20 रुपए और विदेशी नागरिकों को 250 रुपए प्रवेश शुल्क देना पड़ता है। बहरहाल, हो सकता है कि दोनों शेख चिल्ली एक ही हों लेकिन उनके विविध व्यक्तित्व उन्हें अलग अलग व्यक्ति बनाते हैं जैसे एक हंसोड़, मजाकिया और हास्य कथाओं का नायक है जबकि दूसरे आध्यात्मिक गुरु।

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