जांबाजों की वीरता का साक्षी है मिनी इंडिया गेट..!!


हम इसे ‘मिनी इंडिया गेट’ कह सकते हैं..छोटा इंडिया गेट लेकिन महत्व के मामले में जरा भी पीछे नहीं..बस, आकार प्रकार, डिजाइन और शहीदों के दर्ज नामों की संख्या के लिहाज से हम इसे मिनी इंडिया गेट कह रहे हैं। वैसे, इसका वास्तविक नाम ‘घंटाघर’ है जिसे ‘क्लॉक टॉवर’ के नाम से भी जाना जाता है। देश का गौरव इंडिया गेट राष्ट्रीय राजधानी के सबसे महत्वपूर्ण इलाके में बना है जबकि घंटाघर दिल्ली से लगभग ढाई हज़ार किलोमीटर दूर एवं चारों ओर से समुद्र से घिरे पोर्ट ब्लेयर में।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर (अब श्री विजयपुरम) के बीचों बीच बना घंटाघर यहां का एक प्रमुख ऐतिहासिक स्थल और पहचान का प्रतीक है। पीले रंग का यह स्तंभ शहर का गौरव है। खास बात यह है कि इस घंटाघर में चारों ओर चार घड़ी लगीं हैं जो किसी दौर में अलग-अलग समय क्षेत्र दिखाती थीं और दशकों से इस शहर के लोगों के समय पर काम करने का माध्यम थीं । अब रखरखाव के अभाव एवं तकनीकी जटिलताओं की वजह से घड़ियों की यह खूबी तो नहीं रही लेकिन यह स्तंभ आज भी शहर की धड़कन का अहम स्थान है।


बताया जाता है कि घंटाघर का निर्माण 1921-1922 में हुआ था। यह प्रथम विश्व युद्ध  के दौरान 1914-20 में अंडमान द्वीपों की रक्षा करने वाले भारतीय और ब्रिटिश सैनिकों की स्मृति में बनाया गया था। इस पर मिलिट्री पुलिस फोर्स, ब्रिटिश कैप्टन E B fawcett, सूबेदार मुजम्मल खान, नायक मंगत चंद, लांस नायक अली शेर और सिपाही फिरोज जैसे तमाम नाम हैं जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में अपनी जांबाजी दिखाई थी। 

यह तो हम सभी जानते हैं कि इंडिया गेट का निर्माण 1921 में शुरू होकर 1931 में पूरा हुआ था। इसे ब्रिटिश सरकार ने प्रथम विश्व युद्ध और तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध में शहीद हुए ब्रिटिश-भारतीय सेना के करीब 90,000 से अधिक सैनिकों की याद में बनवाया था। इसपर 13 हजार से अधिक सैनिकों के नाम अंकित हैं।

घंटाघर युद्ध स्मारक होने के साथ-साथ उस समय की औपनिवेशिक वास्तुकला का एक प्रभावशाली नमूना भी है। जानकार घंटाघर की वास्तुकला को ओबिलिस्क शैली कहते हैं। यह शैली प्राचीन मिस्र से प्रेरित एक कलात्मक रूप है, जो एक ऊंचे, चार-तरफ आकृति वाले पतले पत्थर के स्तंभ को प्रदर्शित करती  है। इस शैली में स्तंभ ऊपर की ओर पतला होकर एक पिरामिड के आकार बनाता है। ये स्मारक आमतौर पर ऐतिहासिक घटनाओं की याद में निर्मित किए जाते थे। यह मिस्र में सूर्य देवता को भी प्रतिबिंबित करता है।

 घंटाघर आज के पोर्ट ब्लेयर के सबसे व्यस्त एबरडीन बाजार (Aberdeen Bazaar) के ठीक बीचों-बीच स्थित है, जहाँ से शहर की धड़कन महसूस होती है। इसके चारों ओर दुकानें, लोग, अनगिनत वाहनों की आवाजाही और भरपूर शोरगुल है लेकिन यह पीला स्मारक शांति, सुकून, ठहराव और इतिहास की अनुभूति देता है। हम जैसे तमाम पर्यटकों के लिए यह आज भी आकर्षण का केंद्र है और हर कोई इसे अपनी स्मृतियों में सहेजना चाहता है। पर्यटक न केवल यहाँ आकर कुछ देर रुकते हैं एवं फोटो लेते हैं बल्कि इसके इतिहास को जानने का प्रयास भी करते हैं।

यह घंटाघर पोर्ट ब्लेयर के बदलते समय भर का नहीं बल्कि समय के साथ बदलते इतिहास की गवाही भी देता है । एक तरफ औपनिवेशिक काल की यादें, दूसरी तरफ आजादी के बाद का नया भारत। इसलिए आप पोर्ट ब्लेयर जाएं तो एबरडीन बाजार में घूमते हुए इस मिनी इंडिया गेट यानि घंटाघर के पास जरूर रुकें क्योंकि यह स्मारक अपने अंदर सैनिकों के बलिदान, समय का प्रवाह और अंडमान की अनोखी विरासत सहित कई बड़ी कहानियां समेटे है। 





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