क्या है प्री 42, सेटलर और 10 इयर्स की कहानी..!!


प्री 42, सेटलर, 10 इयर्स और 2003/04 को पढ़कर आपके दिमाग में क्या आ रहा है? यही न, की यह कोई गणितीय पहेली है लेकिन हकीकत यह है कि यह कोई गणित का जोड़ घटाना नहीं बल्कि सुविधाएं प्रदान करने की सीमा है। वैसे, इन संख्याओं को देखकर मुझे भोपाल के बस स्टॉप की याद जरूर आ गई क्योंकि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में बस स्टॉप के नाम नहीं बल्कि नंबर हैं। यहां 6 नंबर, 7 नंबर, 10 नंबर, 11 नंबर जैसे दसियों बस स्टॉफ हैं । अब तो बस स्टॉप के नामों की संख्या पौने छह, सवा छह और साढ़े छह तक पहुंच गई है। 
खैर, अभी बात इस लेख में दी गई संख्याओं की करते हैं। आमतौर पर देश में आरक्षण या सुविधाएं देने के लिए आबादी, अनुसूचित जाति या जनजाति जैसे अलग अलग आधारों का सहारा लिया जाता है लेकिन हमारे देश में एक राज्य ऐसा भी है जहां लोगों को सुविधाएं या सुविधाओं में आरक्षण प्रदान करने के लिए वर्ष को आधार बनाया गया है। यह है अंडमान और निकोबार द्वीप समूह..जहां  स्थानीय लोगों को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए वर्ष मुख्य आधार है।


मुझे लगता है कि अब आप शायद बात को कुछ कुछ समझने लगे होंगे। फिर भी और सहज भाषा में समझे तो प्री 42, सेटलर या इसी तरह के अन्य आधार यहां मूल निवासी तय करने के लिए निर्धारित किए गए हैं। जो जितना पुराना होगा उसे मूल निवासी के हिसाब से उतनी ज्यादा सुविधाएं मिलेंगी। दरअसल,अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत का एक अनोखा संघ राज्य क्षेत्र है, जहाँ करीब 836 द्वीपों में से मात्र 31 पर ही मानव बसावट है। इससे भी उल्लेखनीय बात यह है कि यहां सरकार को अन्य राज्यों से लोगों को लाकर बसाना पड़ा है। इसी बसाहट ने यहां नंबर प्रणाली को जन्म दे दिया। 

सबसे पहले बात प्री-42 की…यह नाम अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 1942 से पहले के बसने वालों और उनके वंशजों को दिया गया है। इसका मतलब यह है कि ऐसे लोग जो इस द्वीप समूह में मार्च 1942 में जापानी कब्जे से पहले यहाँ रहते थे। ये इन द्वीपों के गैर-आदिवासी मूल निवासी माने जाते हैं, जिन्हें लोकल बोर्न या आइलैंड ओरिजिन भी कहा जाता है। प्री-42 समुदाय ब्रिटिश उपनिवेशवाद, काला पानी की सजा, विश्व युद्ध और भारत की स्वतंत्रता सहित तमाम ऐतिहासिक बदलावों का साक्षी है।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक प्री-42 समुदाय के पूर्वज मुख्य रूप से 1858 के बाद ब्रिटिश काल में अंडमान आए थे या लाए गए थे। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार ने अंडमान के द्वीपों को दंडात्मक बस्ती का रूप दे दिया । क्रांतिकारियों के साथ साथ कैदियों, सिपाहियों, मजदूरों, किसानों, शिक्षकों और प्रशासनिक कर्मचारियों को सहयोग के लिए यहाँ भेजा गया। इनमें बड़ी संख्या में बंगाल, बिहार, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे इलाकों के लोग शामिल थे । अधिकांश  लोग जबरन यहां लाए या भेजे गए थे । इन लोगों ने सब कुछ भुलाकर 1858 से 1942 तक इन द्वीपों को बसाने, खेती करने और प्रशासन चलाने में जुट गए । 


कुछ इतिहासकारों के अनुसार, प्री-42 समुदाय के सदस्यों ने तो चोल साम्राज्य के दौर को भी देखा है। वैसे, तथ्य यही बताते हैं कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सबसे पुराना इतिहास आदिवासियों का ही है और यह भी हज़ारों साल पुराना है । यहाँ मुख्य रूप से 6 जनजातियाँ निवास करती हैं, जिन्हें अंडमानी (नेग्रिटो समूह) और निकोबारी (मंगोलॉयड समूह) में बांटा गया है। वे पारंपरिक रूप से शिकार, मछली पकड़ने एवं जंगलों पर निर्भर हैं। अंडमान समूह में जारवा, सेंटिनलीज़, ओंगे और ग्रेट अंडमानी शामिल हैं जबकि निकोबार समूह में निकोबारी और शोम्पेन आदिवासी शामिल हैं। इनमें  खासतौर पर सेंटिनलीज़ और जारवा बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह कटे हुए हैं, जबकि ओंगे और महान अंडमानी आंशिक रूप से संपर्क में हैं। माना जाता है कि अंडमान के आदिवासी लगभग 60,000 साल पहले अफ्रीका से प्रवास करके यहां आए थे।

लेकिन, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थायी बसावट ब्रिटिश काल से ही शुरू हुई। 1942 में जापानी सेना ने अंडमान-निकोबार पर कब्जा कर लिया। प्री-42 परिवारों ने इस काल में भारी कीमत चुकाई । कई लोगों ने अपनी जान गँवाई, परिवार बिखरे और अत्याचार सहन करने पड़े। 1945 में जापान की हार के बाद फिर ब्रिटिश वापस आए लेकिन इन लोगों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया। स्वतंत्रता के बाद 1947 से जरूर इन द्वीपों का स्वरूप बदलना शुरू हुआ ।

इनके बाद आता है सेटलर का नंबर। दरअसल, स्वतंत्रता के बाद सरकार ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के विभिन्न द्वीपों की आबादी बढ़ाने और खेती किसानी को बढ़ावा देने के लिए ‘सेटलर स्कीम’ चलाई। इसके अंतर्गत तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में लोगों को यहां लाया गया । इन नए बसने वाले लोगों को भूमि, सरकारी नौकरियाँ और व्यापारिक अवसर दिए गए। इसी तरह 10 ईयर की श्रेणी उन लोगों की है जो सेटलर के बाद यहां आए।  सबसे आखिरी श्रेणी में वे लोग शामिल हैं जो 2003/4 में यहां आकर बसे हैं।


हालांकि, अब जनसंख्या बढ़ने और विभिन्न राज्यों के लोगों की मौजूदगी के कारण अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भी अन्य राज्यों की तरह हो गए हैं। लेकिन एक सबसे बड़ा फर्क आज भी है..वह यह कि यह द्वीप समूह चारों ओर से समुद्र से घिरा है। यह इतना बड़ा फर्क है कि यह मैदानी राज्यों एवं यहां के द्वीपों में अंतर कम ही नहीं होने देता। यहां जरूरत की अधिकतर चीजें तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे अन्य मैदानी राज्यों से आती हैं इसलिए उनकी उपलब्धता एवं कीमत में भी फर्क साफ दिखाई देता है। यहां बाह्य संपर्क के लिए हवाई और जलमार्ग जैसे बस दो ही साधन हैं। हमारे राज्यों की तरह रेल या बस सेवा नहीं है। कुल मिलाकर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण हमारे सामान्य मैदानी राज्यों से अलग है और इसका असर यहां हर क्षेत्र में दिखाई पड़ता है।

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