क्या है ओल्ड मंक, जनरल डायर और देवभूमि का रिश्ता..!!


आजादी की लड़ाई की सबसे निर्मम घटना जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए जिम्मेदार क्रूर ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर का देवभूमि हिमाचल प्रदेश से क्या संबंध है? इसी तरह, भारत सहित दुनिया भर में मशहूर रम ‘ओल्ड मंक’ का देवभूमि से क्या रिश्ता है?..और इस सबसे जरूरी सवाल कि जनरल डायर,ओल्ड मंक एवं हिमाचल प्रदेश आपस में कैसे जुड़े हैं? 

सबसे पहले बात ओल्ड मंक की। रम का पर्याय यह ब्रांड अपनी विरासत, विशिष्ट स्वाद और कम हैंगओवर के लिए भारत ही नहीं दुनिया के 50 से ज्यादा देशों में लोकप्रिय है। वर्ष 2024-25 में ओल्ड मंक ने लगभग 1.3 करोड़ पेटी की बिक्री की जो प्रतिद्वंद्वी ब्रांड से बहुत ज़्यादा हैं लेकिन यह बात कम लोग ही जानते होंगे कि ‘बूढ़े साधू’ यानि ओल्ड मंक का जन्म देवभूमि हिमाचल प्रदेश में हुआ है। आज करीब 70 साल बाद भी यह डार्क रम सेगमेंट में मार्केट लीडर है। कंपनी की कुल बिक्री का 80 फ़ीसदी हिस्सा इसी ब्रांड से आता है।

अब रही जनरल डायर के हिमाचल कनेक्शन की बात तो ओल्ड मंक ब्रांड ने जिस डिस्टिलरी या ब्रूअरी में जन्म लिया है,उसकी स्थापना जनरल डायर के पिता ने ही की थी और यह ब्रूअरी हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित है। इसतरह खूंखार एवं निर्मम जनरल डायर के पिता द्वारा देवभूमि में स्थापित ब्रूअरी में दुनिया के इस मशहूर रम ब्रांड ने जन्म लिया और अपनी जन्मदाता कंपनी की कमाई को कई गुना बढ़ा दिया। लेकिन, इसके पीछे की कहानी इतनी सरल नहीं है। इसमें सालों की मेहनत, रिसर्च, सोच और पीढ़ीगत बदलाव की अहम भूमिका है। हम सभी जानते हैं कि अब ओल्ड मंक किसी परिचय की मोहताज नहीं है लेकिन इस ब्रांड की शुरुआत में भी कंपनी को कभी प्रचार करने की जरूरत नहीं पड़ी। इससे भी 

मजेदार बात यह है कि इस लोकप्रिय ब्रांड के पीछे एक ऐसी विरासत है जो स्क्रैप और खाली बोतलों की सप्लाई से लेकर भारत के सबसे बड़े शराब कारोबारी बनने तक के सफर की कहानी है। 

जानकारी के मुताबिक ब्रिटिश फौज को सस्ती बीयर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 1855 में एडवर्ड डायर ने हिमाचल प्रदेश के कसौली में एशिया की सबसे पहली ब्रूअरी स्थापित की। इसको  'डायर ब्रूअरी' नाम दिया गया।  यहां एशिया की सबसे पहली बीयर 'लॉयन' बनाई जाती थी। यह बीयर इतनी पसंद की गई कि यह धीरे धीरे उस दौर की शाही दावतों का हिस्सा बन गई । 

‘लॉयन’ की सफलता से उत्साहित 'डायर ब्रूअरी' ने कसौली के करीब एवं हिमाचल प्रदेश के ही सोलन में 1920 में शराब बनाने के लिए दूसरा कारखाना स्थापित किया। यह ब्रूअरी ब्रिटिश उद्योगपति एच जी मीकिन के साथ साझेदारी में स्थापित की गई थी इसलिए इसका नाम डायर मीकिन ब्रूअरी रखा गया। इन दोनों शराब कारखानों के संस्थापक एडवर्ड अब्राहम डायर थे जो जनरल डायर के नाम से कुख्यात ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर के पिता थे। 


दरअसल, इस इलाके का पानी और उसका स्वाद कुछ खास है और शराब उत्पादन के लिए बहुमूल्य भी। अंग्रेज व्यवसायियों डायर और मीकिन को भी शायद यह जानकारी थी इसलिए उन्होंने इस जिले को बीयर एवं शराब बनाने के चुना । बताया जाता है कि यह पानी करोल पर्वत से बहकर नीचे को आता है। करोल पर्वत को करोल टिब्बा भी कहा जाता है। यह हिमाचल प्रदेश के सोलन शहर की सबसे ऊंची चोटी है, जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 7,349 फीट है।

उधर, जब देश में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष ने जोर पकड़ा तो आजादी की लड़ाई का असर मौजूदा हिमाचल प्रदेश में भी दिखने लगा इसलिए अंग्रेजों की रुचि इन कारखानों में घटने लगी और 1947 में भारत के स्वतंत्र होते ही डायर और मीकिन के परिजनों ने कसौली तथा सोलन के कारखानों से पल्ला झाड़ लिया। उस दौर में एक भारतीय व्यवसायी नरेंद्र नाथ मोहन भी थे जो स्क्रैप और खाली बोतलों का व्यापार करते थे। करोल पर्वत के पानी की खासियत नरेंद्र नाथ मोहन भी बखूबी जानते थे और वे भी शराब कारोबार में उतरना चाहते थे।


इसलिए, जब नरेंद्र नाथ मोहन को पता चला कि अंग्रेज इन शराब कारखानों को बेचना चाहते हैं तो उन्होंने खरीदने में ज़रा भी देर नहीं की। देश के स्वतंत्र होते ही, दो साल के भीतर 1949 में नरेंद्र नाथ मोहन ने अंग्रेजों से डायर मीकिन ब्रूअरी खरीद ली। 1966 में इसका नाम बदलकर मोहन मीकिन लिमिटेड कर दिया गया। मोहन मीकिन आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। फुटबॉल की इसी नाम की टीम बहुत मशहूर रही है। कंपनी का कारोबार अब केवल शराब तक सीमित नहीं है। यह फलों के जूस, ब्रेकफास्ट सीरियल्स और मिनरल वाटर जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भी सक्रिय है।

नरेंद्र नाथ मोहन के निधन के बाद उनके बेटे कर्नल वेद रतन मोहन ने कंपनी को आधुनिक रूप दिया। 1950 के दशक में उन्होंने नई दिल्ली और गाजियाबाद में नई यूनिटें शुरू की और इसी दौर में 'ओल्ड मंक' का जन्म हुआ। आधिकारिक तौर पर इसे 19 दिसंबर 1954 को लॉन्च किया गया था। बताया जाता है कि वेद रतन मोहन ब्लैक मॉन्क्स (बेनेडिक्टिन मॉन्क्स) की सादगी और अनुशासन से बहुत प्रभावित थे इसलिए उन्होंने रम के अपने नए ब्रांड का नाम 'ओल्ड मंक' रखा।  ऐसा कहा जाता है कि इसका नाम उन भिक्षुओं से प्रेरित है, जो अपनी गुफाओं में शराब को लंबे समय तक सहेज कर रखते थे।

वेद रतन मोहन के निधन के बाद उनके भाई ब्रिगेडियर कपिल मोहन ने कंपनी की कमान संभाली। वे प्रादेशिक सेना में ब्रिगेडियर थे। ब्रिगेडियर कपिल मोहन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने 'ओल्ड मंक' का कभी विज्ञापन नहीं किया। उनका मानना था कि उत्पाद की गुणवत्ता ही उसका सबसे बड़ा विज्ञापन है। ब्रिगेडियर कपिल मोहन ने लगभग 40 वर्षों तक कंपनी का नेतृत्व किया और इसे वैश्विक पहचान दिलाई। 


हालांकि 'ओल्ड मंक' को उनके भाई वेद रतन मोहन ने लॉन्च किया था, लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध करने का श्रेय ब्रिगेडियर कपिल मोहन को जाता है। उनके नेतृत्व में यह दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बिकने वाली रम बनी। मजेदार तथ्य यह भी है कि पूरी दुनिया को रम पिलाने वाले कपिल मोहन खुद चाय प्रेमी थे। उन्होंने कभी शराब को हाथ नहीं लगाया। वे समाज सेवा में भी काफी सक्रिय रहे और सोलन में बना अनूठा मोहन मीकिन विरासत पार्क कपिल मोहन की ही कल्पना का प्रतिबिंब है।

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