अबोलेपन से परिवारों में बढ़ता अलगाव..!!
तकनीक ने हमारे जीवन को सहज बनाने के साथ-साथ जटिल भी बना दिया है। इसका सबसे ज्यादा असर मां-बाप और बच्चों के बीच के रिश्ते पर पड़ रहा है और परिवार एक अनजानी दूरी का शिकार हो रहे हैं । यह दूरी केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक अधिक है। अविश्वास, अबोलापन और संवाद की कमी ने इस परिवारों के करीबी रिश्तों को कहीं न कहीं खोखला करना शुरू कर दिया है।
चिंता की बात यह है कि मां-बाप और बच्चों के बीच अविश्वास की जड़ें आमतौर पर छोटी-छोटी गलतफहमियों से शुरू होती हैं। आज के बच्चे डिजिटल दुनिया में पल रहे हैं, जहां उनकी निजता और डिजिटल स्वतंत्रता उनके लिए सर्वोपरि है। दूसरी ओर, पारंपरिक मूल्यों और अनुभवों से निर्देशित माता पिता अपने बच्चों की इस नई दुनिया को पूरी तरह समझ नहीं पाते। नतीजा यह होता है कि बच्चे अपनी बातें खुलकर साझा नहीं कर पाते हैं और माता-पिता को लगता है कि बच्चे उनसे कुछ छिपा रहे हैं। यह आगे चलकर अविश्वास का एक दुष्चक्र बन जाता है।
मसलन, एक किशोर जो अपने दोस्तों के साथ सोशल मीडिया पर घंटों समय बिताता है, वह माता-पिता की नजर में गलत संगत में पड़ सकता है। माता-पिता की बार-बार पूछताछ या ताक झांक बच्चे को खुद में और अधिक समेट देती है। वह सोचता है कि मां बाप उसे समझते ही नहीं हैं! जबकि, माता-पिता को लगता है कि उनका लाडला बच्चा भटक रहा है। इस तरह, अविश्वास की यह छोटी सी चिंगारी धीरे-धीरे रिश्ते में एक बड़ी खाई बन जाती है।
अविश्वास के साथ-साथ अबोलापन भी इस समय एक बड़ा मुद्दा है। पहले, परिवार एक साथ बैठकर भोजन करते थे, गपशप करते थे और एक-दूसरे की जिंदगी का हिस्सा बनते थे। लेकिन आज, मोबाइल फोन, ईयर फोन, बड्स, लैपटॉप और हेडफोन ने परिवार के बीच की बातचीत को लगभग खत्म कर दिया है। बच्चे अपनी दुनिया में खोए रहते हैं, और माता-पिता अपनी.. या फिर वे अपने काम में व्यस्त रहते हैं। कई बार वे बच्चों की इस आधुनिकता के साथ तालमेल बिठाने में असमर्थ हो जाते हैं।
यह अबोलापन केवल शब्दों की कमी नहीं है, बल्कि भावनाओं के आदान-प्रदान की कमी भी बन रहा है। एक मां जो अपने बेटे से पूछती है कि आज स्कूल में क्या हुआ? और जवाब में केवल कुछ नहीं सुनती है तो वह भी धीरे-धीरे पूछना बंद कर देती है। इधर, बच्चा सोचता है कि माता-पिता को उसकी जिंदगी में कोई दिलचस्पी नहीं है। समय के साथ दोनों पक्ष खामोशी की इस दीवार को और ऊंचा करते जाते हैं।
संवाद की यह कमी वह गहरी खाई है जो अविश्वास और अबोलापन को लगातार गहरा करती जाती है। हम सभी जानते हैं कि संवाद केवल बातचीत नहीं है बल्कि यह परिवार में एक-दूसरे को समझने, उनकी भावनाओं को महसूस करने और उनके दृष्टिकोण को स्वीकार करने की कला है। आज के समय में, माता-पिता और बच्चे एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दो अलग-अलग दुनियाओं में जीते हैं। यह संवादहीनता कई बार पीढ़ीगत अंतर के कारण भी बढ़ती जाती है क्योंकि माता-पिता अपने अनुभवों के आधार पर बच्चों को सलाह देते हैं, जो आज की डिजिटल और वैश्विक दुनिया में शायद उतने प्रासंगिक नहीं लगते। उधर, बच्चे चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए, न कि उनकी गलतियों पर लंबा व्याख्यान दिया जाए।
इस अंतर को पाटने के लिए दोनों पक्षों को एक-दूसरे की ओर कदम बढ़ाने की जरूरत है। बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार अपनाकर भी इस दूरी को पाट सकते हैं । जैसे बच्चों की बातों को बिना आलोचना किए सुनना चाहिए। बच्चों के पसंदीदा गेम या सोशल मीडिया ट्रेंड के बारे में बात करके भी उनके करीब आया जा सकता है। इसी तरह खासतौर पर माता-पिता को यह समझना होगा कि आज की पीढ़ी का दबाव और चुनौतियां उनकी पीढ़ी से बिल्कुल अलग हैं। साथ ही, उन्हें अपने बच्चों को भी यह समझाना पड़ेगा कि उनकी चिंता का कारण प्रेम है, न कि नियंत्रण की इच्छा।
इसके अलावा, अभिभावकों को हर दिन कुछ समय ऐसा समय नियत करना चाहिए जब पूरा परिवार एक साथ बिना किसी डिजिटल हस्तक्षेप के समय बिताए। यह समय खाने की मेज पर, पार्क में सैर करते हुए या कोई भी साझा गतिविधि हो सकती है। इसके माध्यम से माता-पिता को अपने व्यवहार से यह दिखाना होगा कि वे बच्चों पर पूरा भरोसा करते हैं, ताकि बच्चे अपनी बातें खुलकर साझा करें।
किसी भी परिवार में परस्पर रिश्ता विश्वास, प्रेम और संवाद की नींव पर टिका होता है। अविश्वास, अबोलापन और संवाद की कमी इस नींव को कमजोर कर सकती है, लेकिन इसे ठीक करना असंभव नहीं है। बस, यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें दोनों पक्षों को धैर्य, समझ और प्रेम के साथ आगे बढ़ना होगा।
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Bahut hi shandar sir 🙏
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