मलाई बरफ: कतरा-कतरा स्वाद का पहाड़ी जादू

 


छह घंटे की लगातार मेहनत और डेढ़ घंटे में खेल खत्म। वैसे, हवा न लगे तो इसका जीवन करीब नौ घंटे का है लेकिन हवा लगी कि यह छुई मुई की तरह लजाकर पानी पानी हो जाती है। सबसे खास बात कि इसमें न तो कृत्रिम मलाई है और न ही बरफ..फिर भी नाम है मलाई बरफ और स्वाद ऐसा की आप पत्ता चाटते रह जाओगे। जी हां, पत्ता क्योंकि इसे पत्ते में ही दिया जाता है और पत्ते से ही खाया जाता है।

हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश की मशहूर और पारंपरिक ‘मलाई बरफ’ की। यह ऐसी अनूठी आइसक्रीम है जिसमें न तो बर्फ़ के एक भी टुकड़े का इस्तेमाल होता है और न ही फ्रिज/फ्रीजर जैसी किसी मशीन की जरूरत पड़ती है लेकिन फिर भी यह इतनी ठंडी एवं मजबूती से जमी रहती है कि आप आराम से इसका एक एक टुकड़ा मुँह में घोलते हुए जीभ पर इसके स्वाद का कतरा कतरा महसूस कर सकते हैं।

आमतौर पर आइसक्रीम का ख़्याल जेहन में आते ही फ्रीजर, बर्फ और रंग-बिरंगे कोन/कप की तस्वीर ही उभरती है लेकिन हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों की यह एक ऐसी पारंपरिक आइसक्रीम है, जो न बर्फ से बनती है और न मशीन से  बल्कि इसे बनाने के लिए बस दूध, आग और धैर्य की जरूरत पड़ती है।

देखने में, यह आमतौर पर उत्तर भारत में मिलने वाली मटका कुल्फी जैसी लगती है लेकिन इसे तैयार करने की प्रक्रिया इतनी विशिष्ट है कि यह इसमें लगने वाले परिश्रम, शुद्धता और स्वाद के कारण नामी कंपनियों की आइसक्रीम को पीछे छोड़ देती है। इस पारंपरिक आइसक्रीम शुद्ध दूध को लंबे समय तक धीमी आंच पर पकाया जाता है। लगातार चलाते हुए उसे इतना गाढ़ा किया जाता है कि उसमें एक विशेष दानेदार बनावट और स्वाद विकसित हो जाता है। यही प्रक्रिया इसके स्वाद की पहचान बनती है।


मलाई बरफ बनाने के लिए हिमाचल जैसे पहाड़ों से हौंसले एवं धैर्य की जरूरत होती है। इस प्रक्रिया में जल्दबाजी की कोई जगह नहीं होती वरना स्वाद और अंदाज़ दोनों ही ख़राब हो जाएंगे। इसके लिए, सबसे पहले, बड़े बर्तनों में दूध को घंटों तक उबाला जाता है। धीरे-धीरे उसमें मौजूद पानी सूख जाता है और दूध गाढ़ा होकर हल्की प्राकृतिक मिठास ग्रहण करने लगता है। यह प्रक्रिया काफी हद तक खोया बनाने जैसी ही है। फिर इसमें ड्राई फ्रूट्स, चीनी जैसी सामग्री डालकर अंतिम रूप दिया जाता है। ताज़ी बनाई गई मलाई बर्फ को नदी के ठंडे पानी में सेट किया जाता है, फिर ऊनी कपड़े में लपेटकर रखा जाता है ताकि पिघले नहीं।

करीब पचास साल से मलाई बरफ बना रहे करमचन्द बताते हैं कि इसका असल स्वाद केवल सामग्री से नहीं, बल्कि समय, अनुभव और खास विधि से आता है। यही कारण है कि पारंपरिक तरीके से बनी मलाई बरफ का स्वाद लंबे समय तक जीभ पर बना रहता है। इसका पहला टुकड़ा मुँह में रखते ही सबसे पहले छह घंटे के परिश्रम से तैयार मलाई का, दूध की गाढ़ी रबड़ी सा, खोया, इलायची और बादाम के टुकड़ों का मनमोहक स्वाद जुबां पर उतरने लगता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे भीषण गर्मी में पहाड़ों की ओर आए पर्यटकों को तन बदन में गुदगुदाती ठंडक का अहसास होता है।

यह न तो बहुत मीठी होती है और न ही बर्फ सी ठंडी बल्कि मध्यम ठंडक के साथ मखमली नरमी लिए दूध की प्राकृतिक मिठास का कमाल है। शहरी आइसक्रीम की तरह कृत्रिम स्वाद या रंग नहीं, बस शुद्ध दूध, पहाड़ी धैर्य और हिमाचली जुनून। उल्लेखनीय बात यह भी है कि हिमाचल प्रदेश में मलाई बरफ सभी जगह नहीं मिलती बल्कि मुख्य रूप से कांगड़ा जिले में, खासकर कांगड़ा, धर्मशाला, पालमपुर और आसपास के बाजारों में अप्रैल से सितंबर तक में मिलती है। हिमाचल प्रदेश की घाटियों में जब गर्मी चरम पर होती है, तब कांगड़ा की सड़कों पर मलाई बरफ का जलवा देखने को मिलता है।

वैसे, इसे तलाशने के लिए भी पहाड़ों सा धैर्य चाहिए क्योंकि पारंपरिक मलाई बरफ विक्रेता आज भी लकड़ी के पुराने पिटारे/डब्बे में रखकर मोटे कपड़े से ढककर बाजार के किसी कोने में बिना प्रचार प्रसार के बेचते मिलते हैं। इसलिए यदि आप हिमाचल प्रदेश के बाहर से हैं तो स्थानीय लोगों से पूछ लेना ही बेहतर है क्योंकि छह घंटे में तैयार मलाई बरफ डेढ़ दो घंटे में बिक जाती है और विक्रेता अगले दिन की तैयारी के लिए वापस चल पड़ते हैं।

मलाई बरफ को खाने खिलाने का तरीका भी बिल्कुल अलग है। इसे स्थानीय तौर पर उपलब्ध पत्तों में परोसा जाता है और पत्तों की ही चम्मच बनाकर खाया जाता है। यह तरीका पहाड़ों की परंपरा के साथ साथ उनकी पर्यावरण के प्रति चिंता को दर्शाता है। इससे पहाड़ों के लोगों के  प्रकृति के साथ जुड़ाव का भी पता चलता है।

दादा-परदादा के दौर से मलाई बरफ बनाने में लगे करमचंद जैसे लोग महज 50 रुपए प्रति पत्ता (प्लेट) के बाद भी इस कारोबार को पीढ़ियों से जिन्दा रखे हुए हैं। इसलिए, मलाई बर्फ सिर्फ आइसक्रीम नहीं, हिमाचल की सादगी, शुद्धता और ठंडक का प्रतीक है।  यह हमें पहाड़ों की संस्कृति एवं स्वाद से भी जोड़ती है। 


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