रविवार, 23 मार्च 2025

भारत में रेडियो की विकास यात्रा

भारत में रेडियो का इतिहास एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प यात्रा है। इसकी शुरुआत करीब सौ साल पहले एक छोटे से प्रयोग से हुई थीलेकिन समय के साथ यह देश के सांस्कृतिकसामाजिकऔर राजनीतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। रेडियो के माध्यम से न केवल सूचना और मनोरंजन प्रदान किया जाता हैबल्कि यह एक सशक्त माध्यम के रूप में समाज की जागरूकता बढ़ाने का कार्य भी करता है। भारत में रेडियो की विकास यात्रा के विभिन्न चरणों पर बात करें तो हम उन्हें कुछ इस प्रकार विभाजित कर सकते हैं:

1. प्रारंभिक चरण (1920-1947)

भारत में रेडियो की शुरुआत ब्रिटिश काल के दौरान हुई। 1920 मेंभारत में पहली बार रेडियो प्रसारण का प्रयोग हुआ। यह प्रसारण भारत में पहली बार कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। इसका उद्देश्य संगीतसमाचार और जानकारी फैलाना था।

·  1927 मेंभारत में 'Indian Broadcasting Company' (IBC) की स्थापना की गई। हालांकियह कंपनी आर्थिक कारणों से अधिक समय तक नहीं चल पाई। बॉम्बे प्रेसिडेंसी रेडियो क्लब और अन्य रेडियो क्लबों के कार्यक्रमों के साथ ब्रिटिश राज के दौरान जून 1923 में प्रसारण आरम्भ हुआ। 23 जुलाई 1927 को दो रेडियो स्टेशन शुरू हुए. 23 जुलाई 1927 को बॉम्बे स्टेशन आरम्भ हुआ और कलकत्ता स्टेशन 26 अगस्त 1927 को आरम्भ हुआ था। 

·  इसके बाद1930 में भारतीय सरकार ने रेडियो प्रसारण की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली और All India Radio (AIR) की स्थापना की। अप्रैल 1930 को दो वर्ष के लिए प्रायोगिक आधार पर भारतीय स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (ISBS) की शुरुआत की और मई 1932 में स्थायी रूप से ऑल इंडिया रेडियो बन गया। इसका उद्देश्य सूचना प्रसारण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का प्रसार करना था।

2. स्वतंत्रता के बाद का दौर (1947-1970)

भारत की स्वतंत्रता के बादरेडियो प्रसारण के महत्व में वृद्धि हुई। सरकार ने इसका इस्तेमाल राष्ट्रीय एकताशिक्षा और जागरूकता फैलाने के लिए किया।

·  1947 के बाद, AIR का दायरा बढ़ाया गया और इसे देशभर में फैला दिया गया। इसके माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की जीवनीसांस्कृतिक कार्यक्रम और समसामयिक घटनाओं के बारे में जानकारी दी गई।

·  1950 में, AIR ने अपनी पहली राष्ट्रीय सेवा शुरू कीजो प्रमुख रूप से समाचार और शैक्षिक कार्यक्रमों पर केंद्रित थी। विविध भारती की शुरुआत  3 अक्टूबर 1957  को हुई थी। यह देश मे सार्वजनिक क्षेत्र के रेडियो की एक प्रमुख प्रसारण सेवा है। भारत में  श्रोताओं के बीच ये सर्वाधिक सुनी जाने वाली और बहुत लोकप्रिय सेवा है।

·  1957 मेंभारत ने टेलीविजन प्रसारण की दिशा में भी कदम बढ़ाएलेकिन रेडियो का महत्व तब भी बरकरार रहा।

·  1970 के दशक मेंरेडियो का विस्तार हुआ और विभिन्न भाषाओं में कार्यक्रमों की प्रस्तुति शुरू हुई। AIR ने विभिन्न राज्यों में अपनी क्षेत्रीय सेवाएं शुरू की और इसके कार्यक्रमों में विविधता आई।

·  आकाशवाणी का समाचार सेवा प्रभाग (NSD) भारत और विदेशों में श्रोताओं को समाचार और चर्चाएँ प्रसारित करता है। 1939-40 में 27 समाचार बुलेटिनों सेआकाशवाणी आज राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और विदेशी सेवाओं में 82 भाषाओं/बोलियों में प्रतिदिन लगभग 52 घंटे में 510 से अधिक बुलेटिन प्रसारित करता है। इनमें से89 बुलेटिन प्रतिदिन अंग्रेजीहिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में दिल्ली से प्रसारित किए जाते हैं। 44 क्षेत्रीय समाचार इकाइयाँ (RNU) 67 भाषाओं में 355 दैनिक समाचार बुलेटिन प्रसारित करती हैं। इसमें 22 आकाशवाणी स्टेशनों से विशेष रूप से एफएम गोल्ड’ चैनल पर प्रसारित समाचार बुलेटिन शामिल हैं। दैनिक समाचार बुलेटिनों के अलावासमाचार सेवा प्रभाग प्रतिदिन दिल्ली और कुछ अन्य क्षेत्रीय समाचार इकाइयों से सामयिक विषयों पर कई समाचार-आधारित कार्यक्रम भी प्रसारित करता है।

3. एफएम रेडियो का आगमन (1990-2000)

1990 के दशक मेंभारत में एफएम-फ्रीक्वेंसी मॉडुलेशन रेडियो का आगमन हुआजिसने रेडियो प्रसारण के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। एफएम रेडियो का मुख्य आकर्षण इसके बेहतर ध्वनि गुणवत्ता और संगीत पर आधारित कार्यक्रम थे।

·  भारत में एफएम प्रसारण पहले केवल सरकारी नियंत्रण में था। यह प्रसारण अधिकतर शहरी इलाकों तक सीमित था। भारत सरकार ने एफएम रेडियो के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू की और निजी एफएम रेडियो चैनल्स को अनुमति दी। इससे रेडियो पर विविधता और प्रतिस्पर्धा बढ़ीऔर शहरी जनता को अधिक कार्यक्रमों का चयन करने का अवसर मिला।

  • भारत में पहली एफएम सेवा 23 जुलाई, 1977 को मद्रास में शुरू हुई थी। 1983 मेंएआईआर बड़ौदा एक सीबीएस स्टेशन बन गया जबकि 1984 मेंपहला स्थानीय स्टेशन नागरकोइल में शुरू हुआ। सरकार ने दिल्लीकोलकातामुंबई और चेन्नई में निजी एफएम प्रसारण के साथ प्रयोग किया। 2001 मेंरेडियो सिटी बैंगलोर भारत का पहला निजी एफएम रेडियो स्टेशन बन गया।

 

4. डिजिटल रेडियो और इंटरनेट का युग (2000-आजकल)

2000 के दशक के अंत मेंतकनीकी विकास के साथ रेडियो प्रसारण में भी परिवर्तन हुआ। इंटरनेट रेडियो और डिजिटल रेडियो प्रसारण की शुरुआत के बादरेडियो का स्वरूप पूरी तरह बदल गया।

·  2006 में भारत में डिजिटल रेडियो प्रसारण की शुरुआत की गई।

·  इसके अलावाइंटरनेट के माध्यम से रेडियो सुनने की प्रक्रिया भी लोकप्रिय हुई। ऑनलाइन रेडियो और पॉडकास्टिंग का विस्तार हुआजिससे रेडियो श्रोताओं के लिए नई संभावनाओं का द्वार खुला।

 

5. वर्तमान स्थिति और भविष्य

·         आजकल भारत में रेडियो का स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। अब यह न केवल सूचना और मनोरंजन का साधन हैबल्कि समाज के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी जानकारी देने और जागरूकता फैलाने का भी एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। हाल ही ऑल इंडिया रेडियो का नाम बदलकर हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी में भी आकाशवाणी कर दिया गया है.  फिलहाल आकाशवाणी के 742 ट्रांसमीटर हैं जो एफ़एम ट्रांसमीटरों का कवरेज क्षेत्र के हिसाब से 90% और जनसंख्या के हिसाब से 98%  क्षेत्र कवर कर रहे हैं . 

आज के डिजिटल युग में रेडियो ने अपने पारंपरिक रूप से एक सशक्त और आधुनिक रूप में बदलाव देखा है। टेक्नोलॉजी में तेजी से बदलाव और इंटरनेट की उपलब्धता ने रेडियो के स्वरूपप्रसारण विधि और श्रोताओं के साथ इसके संबंध को बदल दिया है। आज रेडियो केवल एक एंटरटेनमेंट का माध्यम नहींबल्कि सूचनाशिक्षा और सामाजिक जागरूकता का महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है। आइएजानते हैं आधुनिक समय में रेडियो के बदलते रूप के बारे में:

1. एफएम रेडियो का विस्तार और विविधता

एफएम रेडियो (Frequency Modulation) का आगमन पिछले कुछ दशकों में रेडियो प्रसारण का स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। एफएम रेडियो ने उच्च गुणवत्ता वाली आवाज़साफ़ ध्वनिऔर प्रचलित संगीत के कार्यक्रमों के कारण श्रोताओं को आकर्षित किया। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रसार भारती के अंतर्गत 470 से ज्यादा और निजी क्षेत्र के 388से ज्यादा चैनल हैं. जो पूरे देश का मनोरंजन कर रहे हैं. इसके अलावा, आगामी FM रेडियो स्पेक्ट्रम नीलामी में भाग लेने के लिए 20 कंपनियों ने रुचि दिखाई है। ये नीलामी 254 कस्बों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों को कवर करेगी।

·  निजी एफएम चैनलों की संख्या में वृद्धि ने रेडियो को ज्यादा प्रतिस्पर्धी और विविध बनाया है। अब विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम जैसे संगीतसमाचारटॉक शोलाइव इंटरव्यूखेलऔर शिक्षा पर आधारित शो हर प्रकार के श्रोताओं की जरूरतों को पूरा करते हैं।

·  शहरी क्षेत्रों मेंजहां रेडियो स्टेशन अधिक होते हैंएफएम चैनल्स की विविधता और स्थानीय भाषा में कार्यक्रमों का प्रसारण भी बढ़ा है।

2. डिजिटल रेडियो और इंटरनेट रेडियो

इंटरनेट के विकास के साथ रेडियो का रूप और भी अधिक वैश्विक हो गया है। अब रेडियो प्रसारण इंटरनेट के माध्यम से सुनने की सुविधा मिलती है। भारत में डिजिटल रेडियो की शुरुआत 2017 में हुई थी। भारत सरकार ने डिजिटल रेडियो को बढ़ावा देने के लिए "डिजिटल रेडियो मिशन" शुरू किया है। इस मिशन का लक्ष्य सभी रेडियो प्रसारण को डिजिटल में बदलना है। सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने भारत के 13 प्रमुख शहरों में डिजिटल FM रेडियो प्रसारण शुरू करने की योजना बनाई है। यह कदम रेडियो इंडस्ट्री को आधुनिक बनाने और स्पेक्ट्रम दक्षता को बेहतर करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

डिजिटल रेडियो का आगमन रेडियो की ध्वनि गुणवत्ता को बेहतर बनाने में सहायक हुआ है। अब सिग्नल की कोई समस्या नहीं होतीऔर श्रोता बिना किसी व्यवधान के विभिन्न कार्यक्रम सुन सकते हैं।

ऑनलाइन रेडियो और पॉडकास्ट के रूप में एक नई शुरुआत हुई है। लोग अब इंटरनेट के माध्यम से कहीं भीकभी भी अपने पसंदीदा रेडियो चैनल्स को सुन सकते हैं। इस प्रकाररेडियो अब सीमाओं से बाहर निकलकर विश्व भर में उपलब्ध हो गया है। भारत में इंटरनेट रेडियो प्लेटफ़ॉर्मऑनलाइन रेडियो स्टेशन और पॉडकास्ट को सुनने के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं मसलन ऑनलाइन रेडियो स्टेशन,पॉडकास्ट,मोबाइल ऐप,स्मार्ट स्पीकर,डेस्कटॉप और इंटरनेट रेडियो प्रसारण सॉफ़्टवेयर. आकाशवाणी का न्यूज़ ऑन एआईआर बहुत लोकप्रिय है.

·   

·  पॉडकास्टिंग का भी विस्तार हुआ है। श्रोताओं को उनकी रुचि के अनुसार खास विषयों पर आधारित रिकॉर्डेड शो उपलब्ध होते हैंजिन्हें वे अपनी सुविधा से सुन सकते हैं। देश में इन दिनों स्पॉटीफाई, जिओ सावन, गाना, विंक म्यूजिक, एप्पल पॉडकास्ट्स, पॉकेट एफएम और सुनो इंडिया जैसे कई लोकप्रिय पॉडकास्ट प्लेटफार्म हैं.

3. मोबाइल ऐप्स और स्मार्ट डिवाइस के माध्यम से रेडियो

अब स्मार्टफोन और अन्य स्मार्ट डिवाइस के माध्यम से रेडियो सुनना बहुत ही आसान हो गया है।

·  रेडियो ऐप्स जैसे TuneIn, Gaana, JioSaavn, और अन्य प्लेटफ़ॉर्म्स के जरिए श्रोता पूरी दुनिया के रेडियो स्टेशन सुन सकते हैं। ये ऐप्स न केवल पारंपरिक रेडियोबल्कि डिजिटल और ऑनलाइन रेडियो भी उपलब्ध कराते हैं। आकाशवाणी का न्यूज़ ऑन एआईआर बहुत लोकप्रिय है.

·  स्मार्ट स्पीकर्स (जैसे Alexa, Google Home) के जरिए भी रेडियो सुनना अब बहुत सरल हो गया है। श्रोता सिर्फ एक कमांड दे कर अपने पसंदीदा रेडियो चैनल्स और कार्यक्रमों का आनंद ले सकते हैं।

4. लोकल और कम्युनिटी रेडियो

·         अब रेडियो केवल बड़े शहरों और राज्यों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों और गांवों में भी कम्युनिटी रेडियो स्टेशन का प्रचलन बढ़ा है। देश में पांच सौ से ज्यादा सामुदायिक रेडियो स्टेशन (सीआरएस) हैं. भारत में सामुदायिक रेडियो की यात्रा वर्ष 2002 में उस समय शुरू हुईजब भारत सरकार ने आईआईटी/आईआईएम सहित विभिन्न प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों को सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की स्थापना के लिए लाइसेंस देने की नीति को मंजूरी दी। पहले सामुदायिक रेडियो स्टेशन का उद्घाटन भारत रत्न श्री लालकृष्ण आडवाणी द्वारा फरवरी 2004 को किया गया। 

·  कम्युनिटी रेडियो का उद्देश्य स्थानीय समुदाय को जानकारी और शिक्षा प्रदान करना है। ये छोटे रेडियो स्टेशन स्थानीय मुद्दोंसंस्कृतिपरंपराओंऔर घटनाओं पर आधारित कार्यक्रम प्रसारित करते हैं। देश में 2024 तक सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की संख्या 481 हो गई थी.

·  लोकल कंटेंट पर आधारित रेडियो स्टेशन श्रोताओं से सीधे जुड़ते हैं और उनकी समस्याओं और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम प्रसारित करते हैं। सामुदायिक रेडियो स्वास्थ्यपोषणशिक्षाकृषि आदि से संबंधित मुद्दों पर स्थानीय समुदाय के बीच स्थानीय आवाजों को प्रसारित करने का एक मंच प्रदान करता है।

5. रेडियो और सोशल मीडिया का संयोजन

आजकल रेडियो और सोशल मीडिया के बीच कड़ी साझेदारी देखी जा रही है। देश में आकाशवाणी सहित रेडियो स्टेशन अब सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी मौजूद होते हैंजैसे Youtube,Facebook, Instagram, और Twitter (अब X) पर।

·  लाइव इंटरएक्टिव शोजश्रोता अब लाइव शो के दौरान सोशल मीडिया के माध्यम से सवाल पूछ सकते हैं या कार्यक्रम में भाग ले सकते हैं। यह श्रोताओं को कार्यक्रम से और भी अधिक जुड़ने का मौका देता है।

·  सहयोग और प्रचाररेडियो और सोशल मीडिया के बीच सहयोग से विज्ञापन और प्रचार के नए तरीके पैदा हुए हैं। यह रेडियो चैनल्स को अपने श्रोताओं के साथ अधिक प्रभावी रूप से संवाद करने का अवसर प्रदान करता है।

6. पर्सनलाइज्ड रेडियो एक्सपीरियंस

आधुनिक समय में रेडियो का अनुभव पहले से कहीं अधिक व्यक्तिगत हो गया है। अब श्रोता अपनी पसंद के अनुसार कार्यक्रमों को चुन सकते हैं और अपने हिसाब से सुन सकते हैं। सारेगामा कारवां जैसे रेडियो प्रयोगों ने भी इसकी लोकप्रियता बढाने का काम किया है.

·  कस्टमाइज्ड प्ले लिस्टश्रोता अपनी पसंद का संगीत और कंटेंट चुन सकते हैं। उदाहरण के लिए, Spotify, Apple Music, और Gaana जैसी ऐप्स श्रोताओं को उनके पसंदीदा गानेकलाकारऔर शैलियों के आधार पर प्ले लिस्ट तैयार करने की सुविधा देते हैं।

·  ऑन डिमांड कंटेंटअब श्रोता जब चाहें तब अपने पसंदीदा रेडियो शो और पॉडकास्ट को सुन सकते हैंजिससे रेडियो का अनुभव और भी व्यक्तिगत बन जाता है।

रेडियो की उपयोगिता

रेडियो की उपयोगिता बहुत व्यापक और महत्वपूर्ण है। यह केवल एक मनोरंजन का साधन नहींबल्कि समाजशिक्षासूचना और जागरूकता फैलाने का प्रभावी माध्यम भी है। निम्नलिखित बिंदुओं में रेडियो की उपयोगिता को समझा जा सकता है:

1सूचना का प्रभावी स्रोत

रेडियो का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग सूचना प्रसारण के रूप में होता है। यह एक त्वरित और विश्वसनीय माध्यम है जिसके द्वारा समाचार और समसामयिक घटनाओं के बारे में तुरंत जानकारी प्राप्त होती है। यह विशेष रूप से प्राकृतिक आपदाओंराष्ट्रीय संकटों और महत्वपूर्ण घटनाओं के समय में अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। राजनीतिकसामाजिक और आर्थिक मामलों पर अद्यतन जानकारी प्रदान करता है।

2शिक्षा का साधन

रेडियो शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेषकर दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में जहां इंटरनेट और अन्य डिजिटल माध्यमों तक पहुंच नहीं होतीरेडियो शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है।

·  व्यक्तिगत विकास और करियर मार्गदर्शन जैसे विषयों पर जागरूकता फैलाता है।

·  साक्षरता अभियानों और हेल्थ संबंधी जागरूकता के कार्यक्रमों के लिए रेडियो का उपयोग किया जाता है।

3. मनोरंजन का स्रोत

रेडियो मनोरंजन का एक सस्ता और सुलभ साधन है। यह:

·  संगीत और चर्चित कार्यक्रमों के माध्यम से श्रोताओं को मनोरंजन प्रदान करता है।

·  लाइव शोइंटरव्यूकॉमेडी और कहानी प्रसारण के द्वारा श्रोताओं का मनोरंजन करता है।

4. सामाजिक जागरूकता और संवाद

रेडियो एक महत्वपूर्ण मंच है जिसके द्वारा:

·  समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए जागरूकता फैलाई जाती है। जैसेस्वास्थ्यपर्यावरणऔर महिलाओं के अधिकारों पर कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं।

·  यह स्थानीय समुदायों को एकजुट करने और उनके मुद्दों को उजागर करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनता है।

5. आपातकालीन सेवाएं

आपातकाल के दौरानरेडियो एक तत्काल सूचना स्रोत के रूप में कार्य करता है। प्राकृतिक आपदाओंयुद्धया किसी भी अन्य संकट की स्थिति में रेडियो:

·  प्रभावित क्षेत्रों में शरणार्थियों और नागरिकों को आपातकालीन जानकारी और सहायता प्रदान करता है।

·  खतरे की चेतावनी और सुरक्षित स्थानों की जानकारी देता है।

6. लोकल और क्षेत्रीय संस्कृति का संरक्षण

रेडियो स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृतियों को जीवित रखने का एक प्रभावी तरीका है। यह:

·  स्थानीय भाषा में कार्यक्रम प्रसारित करता हैजिससे क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण होता है।

·  स्थानीय लोक संगीतकलाऔर सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिए संस्कृति को बढ़ावा देता है।

7सस्ता और सुलभ माध्यम

रेडियो अन्य मीडिया के मुकाबले एक सस्ता और सुलभ माध्यम है। यह:

·  कम लागत में अधिक श्रोताओं तक पहुंचने में सक्षम होता है।

·  विभिन्न जगहों और परिस्थितियों में आसानी से सुना जा सकता हैजैसे गाड़ी मेंघर में या खेतों में काम करते समय।

8. प्रचार और विज्ञापन का प्लेटफ़ॉर्म

व्यवसायों के लिए रेडियो एक प्रभावी विज्ञापन माध्यम बन चुका है। यह:

·  स्थानीय उत्पादों और सेवाओं के प्रचार के लिए एक सस्ता और प्रभावी तरीका प्रदान करता है।

·  स्मरणीय और आकर्षक विज्ञापन के द्वारा व्यवसायों की पहुंच बढ़ाने का एक अच्छा साधन बनता है।

आधुनिक समय में रेडियो ने अपनी पारंपरिक सीमाओं को पार करते हुए डिजिटलइंटरनेटऔर स्मार्ट डिवाइस जैसे आधुनिक तकनीकी रूपों में खुद को ढाल लिया है। अब यह न केवल एक मनोरंजन का स्रोत हैबल्कि सूचनाशिक्षाऔर जागरूकता फैलाने का एक अत्यधिक प्रभावी और पहुंच योग्य माध्यम बन चुका है। रेडियो का बदलता रूप समाज में इसके महत्व को और बढ़ाता हैऔर यह भविष्य में और भी नए रूपों में विकसित होता रहेगा।

भारत में रेडियो की विकास यात्रा न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण हैबल्कि इसका सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव भी गहरा रहा है। आज भीरेडियो एक सशक्त और सामर्थ्यवान माध्यम बना हुआ हैजो न केवल शहरोंबल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों के बीच जागरूकता फैलाने का काम कर रहा है। भविष्य में भी रेडियो के तकनीकी विकास और विविधता के साथ यह और भी अधिक प्रभावी बन सकता है।

(यह लेख शोध पत्रिका समागम में भी प्रकाशित हुआ है)

 




तपस्या से भी कठिन है अंतरिक्ष में खाना,पीना और रहना !!

भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स के मंगलवार को सकुशल वापस लौटने से सब मंगल हो गया और तमाम तरह के संशय के बादल छट गए ।  वे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर 9 महीने 14 दिन तक रहीं और 17 घंटे का सफर कर समंदर में उतरी और फिर सुरक्षित वहां पहुंच गईं जहां उन्हें नौ महीने पहले होना चाहिए था। इसके पहले का किस्सा हम सब जानते हैं कि सुनीता विलियम्स और उनके साथी बुच विल्मोर को  5 जून 2024 को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर एक टेस्ट मिशन के लिए भेजा गया था। यह मिशन मूल रूप से 8 दिनों का था, लेकिन यान में तकनीकी खराबी के कारण उनकी वापसी में देरी हुई। नतीजतन, उन्हें 9 महीने से ज्यादा समय तक अंतरिक्ष में रहना पड़ा, और वे 19 मार्च को धरती पर लौट पाईं। 

इस सफलता के जश्न में आपके दिमाग में भी यह ख्याल आया होगा कि इस लंबे प्रवास के दौरान सुनीता और उनके साथी क्या खाते होंगे? कैसे खाते होंगे? उनकी दिनचर्या कैसे संचालित होती होंगी? सवाल वाकई गंभीर हैं क्योंकि जहां पैर जमीन पर नहीं टिकते हैं और सब कुछ हवा में उड़ता रहता है, वहां ये तो संभव नहीं है कि अंतरिक्ष यात्री हमारी तरह डाइनिंग टेबल पर बैठकर दाल, चावल, सब्ज़ी और रोटी का लुत्फ लें क्योंकि सब्ज़ी तो ठीक है लेकिन यदि चावल के दाने उड़ने लगे तो उनको इकट्ठा करना मुश्किल तो हो ही जाएगा बल्कि जानलेवा भी हो सकता है इसलिए यह सवाल उठना लाज़िमी है कि सुनीता विलियम्स एवं उनके साथी क्या और कैसे खाते थे ?

 दरअसल, अंतरिक्ष में यात्री विशेष रूप से तैयार किया गया खाना खाते हैं, जो पौष्टिक, हल्का, और स्टोर करने में आसान होता है। ये भोजन आमतौर पर सूखा, प्री-पैकेज्ड और वहां के वातावरण के अनुरूप होता है ताकि अंतरिक्ष के वातावरण में खराब न हो और गुरुत्वाकर्षण की कमी में भी आसानी से खाया जा सके। गुरुत्वाकर्षण न होने के कारण, भोजन को ऐसे डिज़ाइन किया जाता है कि वह हवा में न तैरे। अंतरिक्ष यात्री  इसे छोटे टुकड़ों में खाते हैं और खाने को पाउच या कंटेनर से सीधे मुँह में डालते हैं। यहां तक कि स्वाद के लिए नमक और मसाले भी लिक्विड फॉर्म में होते हैं।

वैसे, मिशन की शुरुआत में सुनीता और उनकी टीम के पास ताजे फल, सब्जियां, रोस्ट चिकन, पिज्जा जैसे खाद्य पदार्थ भी थे।  यह स्टॉक तीन महीने में खत्म हो गया। फिर उन्हें फ्रीज-ड्रायड यानि सूखे भोजन पर निर्भर रहना पड़ा।  इस फ्रीज-ड्रायड भोजन को अंतरिक्ष स्टेशन के टैंक से पानी मिलाकर तैयार करना पड़ता था और  यह पानी भी अंतरिक्ष यात्रियों के मूत्र को रिसाइकिल करके ही बनाया जाता था। चौंकिए मत, अंतरिक्ष में यह एक सामान्य प्रक्रिया है।  लेकिन, सुनीता ठहरी आधी भारतीय तो बिना चटपटा खाए उनका मन कैसे लगता इसलिए वे अपने साथ समोसे जैसे भारतीय स्नैक्स भी ले गयी थीं । 

अब बात दैनिक क्रियाओं की… मसलन ब्रश करना,नहाना और मल मूत्र विसर्जन जैसे काम क्योंकि इनके बिना जीवन संभव नहीं है। अंतरिक्ष में खाना ही नहीं, दाँत ब्रश करना भी पृथ्वी से थोड़ा अलग होता है, क्योंकि वहाँ गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण पानी और टूथपेस्ट हवा में तैर सकते हैं। यही कारण है कि अंतरिक्ष यात्री इसे सावधानी से और विशेष तरीके से करते हैं। उनका ब्रश कुछ हमारी तरह ही होता है लेकिन पेस्ट ऐसा होता है कि उसे खा भी सकते हैं ताकि थूकना न पड़े और उस थूक या कुल्ले के उड़ने का खतरा न रहे। वैसे कुल्ला करने के लिए खास तरह का पाउच और तौलिया भी होता है जिसमें पानी बाहर निकलने का खतरा नहीं रहता। दरअसल, अंतरिक्ष स्टेशन पर पानी बहुत कीमती होता है, इसलिए इसे बहुत संभालकर खर्च किया जाता है ।

अंतरिक्ष में स्नान करना पृथ्वी की तरह नहीं होता कि शावर चलाया और पूरे बाथरूम में घूम घूमकर नहा लिया। असल में वहाँ गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण पानी बहता नहीं, बल्कि हवा में तैरने लगता है। इसलिए अंतरिक्ष यात्री पारंपरिक शावर या बाल्टी से नहाने की जगह विशेष तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। नहाने के लिए अंतरिक्ष यात्रियों को पानी से भीगा हुआ तौलिया या वेट वाइप्स दिए जाते हैं। ये तौलिये पहले से साबुन या खास सफाई के घोल से तैयार होते हैं। बालों को साफ करने के लिए उन्हें नो-रिंस शैम्पू यानि जिसे धोने के लिए पानी की जरूरत नहीं होती, इस्तेमाल करना पड़ता है। अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक एक ही कपड़े पहनते हैं, क्योंकि वहाँ धोने की सुविधा नहीं होती। इसलिए गंदे कपड़ों को सील बंद बैग में रखा जाता है और बाद में उन्हें धरती पर लाकर नष्ट कर दिया जाता है।

सबसे ज्यादा समस्या मल मूत्र विसर्जन को लेकर रहती है इसलिए  इसके लिए भी विशेष इंतजाम करने पड़ते हैं। जैसा कि ऊपर भी मैने लिखा है कि अंतरिक्ष स्टेशन में करीब 90 फीसदी पानी मूत्र से ही बनता है।  इसके लिए अंतरिक्ष स्टेशन में  खास तकनीक से मूत्र को साफ करके पीने योग्य पानी में बदला जाता है ।

अंतरिक्ष में यात्री पेशाब करने के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं, जो गुरुत्वाकर्षण की कमी में काम करने के लिए बनाए गए हैं इसलिए तैरते हुए मूत्र से बचने के लिए इनमें सक्शन सिस्टम लगा होता है। यात्री इसे इस्तेमाल करने से पहले विधिवत प्रशिक्षण लेते हैं। कुछ यही स्थिति मल त्याग की होती है। अंतरिक्ष यात्रियों को विशेष प्रशिक्षण के बाद खास किस्म की टॉयलेट सीट का इस्तेमाल करना होता है। वह भी सक्शन सिस्टम पर आधारित होती है। हालांकि, अभी तक मूत्र की तरह मल को रिसाइकिल नहीं किया जाता लेकिन वैज्ञानिक इसको रिसाइकल करने की तकनीक पर भी काम कर रहे हैं ताकि इसका उपयोग खाद में बदलने या ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जा सके ।

यह सब पढ़ने में अजीब लग सकता है, लेकिन अंतरिक्ष में स्वच्छता और सुरक्षा के लिए यह बहुत जरूरी है और सुनीता विलियम्स ही नहीं तमाम अंतरिक्ष यात्री इसका पूरी तत्परता,सजगता और सावधानी के साथ पालन करते हैं क्योंकि वे भी जानते हैं कि जरा सी चूक उनके पूरे मिशन को मुश्किल में डाल सकती है। यही कारण है कि पग पग पर सावधानी बरती जाती है। फिर चाहे, अंतरिक्ष यात्रियों को नौ दिन की बजाए नौ महीने तक अंतरिक्ष में रखना पड़े।

(यह लेख राग दिल्ली में भी प्रकाशित हुआ है)

भारत के लिए भी सबक है पाकिस्तान का ट्रेन हाइजैक!!

फिल्म ‘शोले’ का वह दृश्य याद करिए जब डाकू गब्बर सिंह और उसकी गैंग ट्रेन को चारों ओर से घेरकर लूटने का प्रयास करते हैं और फिर जांबाज पुलिस अफसर बने संजीव कुमार के साथ जय वीरू (अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र) की जोड़ी डकैती के प्रयास को असफल कर देती है। हाल ही में पाकिस्तान की यात्री ट्रेन जाफर एक्सप्रेस को हाइजैक करने वाले बलूचिस्तान के लड़ाकों के जेहन में कहीं न कहीं शोले का यह दृश्य भी रहा होगा। वैसे भी, फिल्म शोले में इस दृश्य को फिल्माने के लिए चुना गया इलाका और बलूचिस्तान का भौगोलिक क्षेत्र करीब करीब एक जैसा ही दिखता है।

अभी तक इस ट्रेन हाइजैक की गुत्थियां और असल परते खुलना बाकी हैं। अभी पाकिस्तान की सेना और बलूचिस्तान के लड़ाकों के दावों प्रतिदावों की पुष्टि नहीं हो पाई है। शायद, समय के साथ तथ्य और खुलकर सामने आ पाएंगे और तभी दुनिया इस घटना की वास्तविक भयावहता से रूबरू हो पाएगी।

खैर, हमारा विषय कौन सही और कौन गलत नहीं है तथा न ही हम तथ्यों की छानबीन में जुटना चाहते हैं। हमारा मकसद इस घटना से पूरी दुनिया के सामने मंडराने वाले खतरे के प्रति आगाह करना है। ट्रेन हाइजैक केवल पाकिस्तान भर के लिए खतरा नहीं है बल्कि भारत सहित उन सभी मुल्कों के लिए खतरे की घंटी है जो दुर्गम से दुर्गम इलाकों तक ट्रेन सेवाएं उपलब्ध कराकर आम लोगों को सस्ती एवं सुलभ परिवहन सेवा उपलब्ध कराकर उनका जीवन आसान बना रहे हैं।

आज के दौर में ट्रेन हाइजैक की यह हरकत अमेरिका में हवाई जहाज के जरिए ट्विन टावर पर हमले से कम नहीं है। सोचिए, जब एक विमान के अपहरण से आतंकी संगठन सरकारों को झुकने पर मजबूर कर देते हैं तो पूरी की पूरी ट्रेन के अपहरण के बाद तो वे सरकारों को घुटने पर ला सकते हैं। वैसे भी ट्रेन संचालन एयर सेवाओं की तरह एक्सक्लूसिव और सीमित नहीं है बल्कि ट्रेन तो असीमित हैं और दुर्गम से दुर्गम क्षेत्रों से गुजरती हैं। भारत जैसे देश में तो ट्रेन परिवहन का सबसे साथ और सुलभ साधन तो है ही,देशव्यापी पहुंच रखता है। 

भारत क्या, किसी भी देश के लिए यह संभव नहीं है कि वह हर ट्रेन की चाक चौबंद सुरक्षा सुनिश्चित कर सके क्योंकि 22 से 24 कोच की ट्रेन में सरकार कुछ सुरक्षा कर्मी तो तैनात कर सकती हैं लेकिन हर कोच में बड़ी संख्या में सुरक्षा उपलब्ध कराना मुश्किल है। इसके लिए बड़े पैमाने पर मानव और अन्य संसाधनों की जरूरत पड़ेगी और यह खर्चीला भी है। ऐसी सूरत में कश्मीर से लेकर पंजाब तक और नक्सलियों से लेकर पाकिस्तान परस्त आतंकियों तक कोई भी सिरफिरा संगठन बलूची लोगों से प्रेरित होकर इसतरह की साजिश रच सकता है।

हमारे देश के लिए तो यह वाकई चिंता की बात है और मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा भरोसा है कि सरकार और उसकी सुरक्षा एजेंसियों ने इस दिशा में सोचना शुरू भी कर दिया होगा। भारतीय रेलवे, दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है, जिसका कुल ट्रैक नेटवर्क लगभग 68 हजार 103 किलोमीटर है, जिसमें करीब 7 हजार 349 रेलवे स्टेशन शामिल हैं। प्रतिदिन चलने वाली 9 हजार से ज्यादा ट्रेनों में लगभग ढाई करोड़ यात्री सफर करते हैं। इसके अलावा, कीमती सामान और खाद्य पदार्थों को देश के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचाने वाली ट्रेनों की संख्या अलग है। 

भारतीय ट्रेनें डेढ़ लाख से ज्यादा छोटे बड़े पुल और हजारों सुरंगों से होकर गुजरती हैं। रेलवे में बड़ी संख्या में सुरंगे हैं और उनका लगातार निर्माण भी जारी है। सिर्फ उधमपुर-श्रीनगर-बारामुल्ला रेल लिंक परियोजना में 38 सुरंगें हैं । इनमें सबसे लंबी सुरंग 12.75 किलोमीटर की है । इसके अलावा, कश्मीर में पीर पंजाल टनल, संगलदहन टनल, कोंकण रेलवे की करबूड टनल और महाराष्ट्र की नाथूवाडी टनल जैसी अनेक विशाल सुरंगें भी हैं जहां से ट्रेन प्रतिदिन गुजरती है। 

देश में रामेश्वरम को जोड़ने वाला पंबन पुल, नीलगिरी पर्वतीय मार्ग, कालका शिमला रेल मार्ग,मेट्टुपालयम-ऊटी नीलगिरी रूट और जम्मू- ऊधमपुर- श्रीनगर- बारामुला रेलवे लिंक जैसे खतरनाक रेल रूट पहले से मौजूद हैं जो हमारे इंजीनियरों के दिमाग और सरकार के हौंसले के सशक्त उदाहरण हैं।

कहने का आशय यह है कि हमारे देश में रेल नेटवर्क इतना व्यापक है कि वह कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला है और आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों के साथ पूर्वोत्तर में उग्रवाद संक्रमित क्षेत्रों तक से गुजरता है। 

इतने विशाल नेटवर्क की सुरक्षा आसान काम नहीं है और पग पग पर पहरा बिठाना किसी भी देश के लिए असंभव है। फिर भी हमें बलूचिस्तान की ट्रेन हाइजैक की घटना से सबक लेते हुए न केवल ज्यादा चौकस होने की जरूरत है बल्कि ज्यादा से ज्यादा तकनीक को सुरक्षा से जोड़ने की भी जरूरत है ताकि ऐसे किसी षडयंत्र के दौरान वक्त पर तत्काल कदम उठाएं जा सकें और देशद्रोहियों के मंसूबों पर पानी फेरते हुए उन्हें तत्काल सबक सिखाया जा सके।


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शनिवार, 15 मार्च 2025

क्यों जरूरी है एक देश एक कानून

भारत में विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं का संगम है। इसके बावजूद, भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और समान न्याय सुनिश्चित करने का प्रावधान किया है। फिर भी, व्यक्तिगत कानूनों का अस्तित्व एक विवादास्पद मुद्दा बना हुआ है। भारत में एक देश, एक कानून की अवधारणा का लक्ष्य इस विषमताओं को समाप्त करना और समग्र समाज में समानता को बढ़ावा देना है। व्यक्तिगत कानूनों का मुद्दा भारत में विभिन्न धर्मों के नागरिकों के लिए अलग-अलग कानून होते हैं। उदाहरण के तौर पर: हिंदुओं के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, और अन्य संबंधित कानून। मुसलमानों के लिए शरिया कानून और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून। ईसाई समुदाय के लिए ईसाई विवाह और तलाक अधिनियम। पारसी समुदाय के लिए पारसी विवाह और तलाक अधिनियम। इन अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण यह बहस उठती रही है कि क्या भारत में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून नहीं होना चाहिए?

 एक देश, एक कानून की आवश्यकता 

"एक देश, एक कानून" की अवधारणा को भारत में लागू करने का मुख्य उद्देश्य है: सामाजिक समानता: विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिए समान अधिकार और कर्तव्यों की सुनिश्चितता। यह विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के बीच समानता और सामाजिक समरसता को बढ़ावा दे सकता है। संविधानिक समानता: भारतीय संविधान में समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) सभी नागरिकों को समान सुरक्षा और अवसर प्रदान करता है। व्यक्तिगत कानूनों का अस्तित्व इस समानता के सिद्धांत से टकराता है। न्याय की समानता: विभिन्न समुदायों के लिए अलग-अलग कानून होने के कारण न्याय में भेदभाव उत्पन्न हो सकता है। एक समान कानून से न्याय का दायरा अधिक व्यापक और समतामूलक होगा।

 सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता भारत एक सांस्कृतिक रूप से विविध देश है, जहां विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग रहते हैं। हर समुदाय की अपनी परंपराएँ और मान्यताएँ हैं, जो उनके व्यक्तिगत कानूनों का हिस्सा हैं। इस विविधता के बावजूद, संविधान की मंशा सभी नागरिकों को समान अधिकार देने की है, और यदि यह सिद्धांत सही तरीके से लागू होता है, तो यह समाज में एकता और भाईचारे को बढ़ावा दे सकता है। 

हालांकि, यह विचार बहुत संवेदनशील भी है। विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोगों के बीच यह अवधारणा विवादों का कारण बन सकती है। एक समुदाय की परंपराएँ या धार्मिक विश्वासों के लिए कानून बदलने का प्रयास किसी अन्य समुदाय में असंतोष पैदा कर सकता है। क्या यह संभव है? 

भारत में एक समान कानून लागू करने के लिए कुछ प्रमुख बाधाएँ हैं:

 धार्मिक स्वतंत्रता: भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, और यदि व्यक्तिगत कानूनों को समाप्त किया जाता है, तो यह धार्मिक समुदायों की स्वतंत्रता पर सवाल खड़ा कर सकता है। 

राजनीतिक जटिलताएँ: भारत में धर्म और राजनीति एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, और विभिन्न राजनीतिक दल इस मुद्दे पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं। कुछ दल धार्मिक तत्त्वों के पक्षधर हो सकते हैं, जबकि अन्य इसे सामाजिक समानता के नाम पर बदलने का समर्थन कर सकते हैं। 

सांस्कृतिक असहमति: हर समुदाय की अपनी मान्यताएँ और परंपराएँ होती हैं। एक समान कानून लागू करने के प्रयास से सांस्कृतिक असहमति पैदा हो सकती है, जो समाज में तनाव और असहमति उत्पन्न कर सकती है।

 भारत में एक देश, एक कानून की अवधारणा का उद्देश्य सामाजिक समानता, न्याय, और भाईचारे को बढ़ावा देना है। हालांकि, यह एक जटिल और विवादास्पद मुद्दा है, जिसे ध्यान से और संवेदनशीलता से सुलझाने की आवश्यकता है। व्यक्तिगत कानूनों को समाप्त करना या उन्हें एकीकृत करना एक लंबी और सावधानीपूर्वक प्रक्रिया हो सकती है, जिसमें सभी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का सम्मान किया जाए। समय के साथ, यह देखना होगा कि क्या भारत इस दिशा में कोई महत्वपूर्ण कदम उठा सकता है, जो समग्र समाज के हित में हो। 

 "एक देश, एक कानून" की अवधारणा में समाज में समानता, न्याय, और समरसता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक समान कानूनी प्रणाली को लागू करने की बात की जाती है। इसके कई लाभ हो सकते हैं: 

1. सामाजिक समानता "एक देश, एक कानून" से सभी नागरिकों के लिए समान कानून लागू होते हैं, जो किसी भी प्रकार के धर्म, जाति, या समुदाय के भेदभाव को समाप्त करने में मदद करता है। इससे हर व्यक्ति को समान अधिकार और अवसर मिलते हैं, और समाज में समानता का वातावरण बनता है। 

2. न्याय का समान वितरण जब सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी प्रणाली होती है, तो न्याय का वितरण भी समान होता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी भी व्यक्ति को धर्म, जाति, या समाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ेगा।

 3. कानूनी जटिलताओं में कमी भारत में विभिन्न धर्मों और समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून होते हैं, जैसे हिंदू विवाह अधिनियम, शरिया कानून आदि। इससे कानूनी प्रक्रिया जटिल हो सकती है। "एक देश, एक कानून" लागू होने से इन जटिलताओं को कम किया जा सकता है और कानूनी प्रक्रिया सरल हो सकती है। 

4. राष्ट्रीय एकता और समरसता जब सभी नागरिकों पर एक ही कानून लागू होता है, तो यह राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देता है। यह विभिन्न समुदायों के बीच एक समान जुड़ाव और विश्वास की भावना उत्पन्न करता है, जिससे समाज में समरसता और भाईचारे का वातावरण बनता है।

 5. आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता "एक देश, एक कानून" से प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में स्पष्ट जानकारी होती है, जिससे वह अपने अधिकारों का सही तरीके से उपयोग कर सकता है। यह नागरिकों को अपने जीवन के फैसलों में अधिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता प्रदान करता है। 

6. संविधानिक सिद्धांतों का पालन भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार प्रदान करता है, जो सभी नागरिकों को समान सुरक्षा और अवसर देता है। "एक देश, एक कानून" का उद्देश्य इस संविधानिक सिद्धांत को लागू करना है, जिससे किसी भी नागरिक को उसके धर्म, जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव का सामना न करना पड़े। 

7. राजनीतिक स्थिरता एक समान कानूनी ढांचा समाज में राजनीतिक स्थिरता को भी बढ़ावा दे सकता है। जब सभी नागरिक एक ही कानून का पालन करते हैं, तो विभिन्न समुदायों के बीच कानूनी विवाद कम होते हैं, जिससे राजनीतिक विवाद भी कम होते हैं। 

8. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि में सुधार जब भारत में एक समान और निष्पक्ष कानूनी व्यवस्था होगी, तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को बेहतर बनाएगा। यह भारत को एक प्रगतिशील और समानता के पक्षधर देश के रूप में प्रस्तुत करेगा। 

 "एक देश, एक कानून" की अवधारणा सामाजिक समानता, न्याय, और समरसता को बढ़ावा देने में मदद कर सकती है। यह कानून की जटिलताओं को समाप्त करता है, नागरिकों को समान अधिकार देता है, और एकता तथा भाईचारे का माहौल बनाता है। हालांकि, इसे लागू करने में संवेदनशीलता और सभी धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं का सम्मान करना आवश्यक होगा।

हिमाचल की पर्वत चोटियों पर राष्ट्रीय ध्वज की अनूठी उड़ान।

हिमाचल प्रदेश में कभी डाकिया पहाड़ों की पगडंडियों पर चिट्ठियों का थैला कंधे पर लादकर चलता था। तब किसी गांव में महीनों बाद बेटे की चिट्ठी पहु...