प्रयाग में गंगा के तट पर लगे आस्था के महाकुंभ और दिल्ली में ज्ञान कुंभ 'राष्ट्रीय पुस्तक मेले' के साथ साथ देश की सिलिकान सिटी बंगलुरु में भी एक अनूठा महाकुंभ लगा। इस कुंभ का नाम था एयरो इंडिया । इस कुम्भ का आस्था से तो कोई सरोकार नहीं था लेकिन ज्ञान के लिहाज से यह सर्वथा उपयोगी था क्योंकि यहाँ पिद्दी से ज़ेफायर विमान से लेकर तेजतर्रार तेजस और भीमकाय ग्लोबमास्टर विमान तक न केवल मौजूद थे बल्कि हवा में अपने करतब भी दिखा रहे थे। जेफायर देखने में तो नन्हा सा है परन्तु यह दुश्मन के इलाके में अन्दर तक जाकर जासूसी कर सेनाओं के लिए आँख कान का काम करता है। ग्लोबमास्टर को तो हम चलती फिरती सेना कह सकते हैं।इस विशालकाय विमान में सैनिक,टैंक,टॉप और मिसाइल तक समा जाती हैं। तेजस तो हमारा अपना अर्थात देश में बना लाडला लड़ाकू विमान है जो हमारे वैज्ञानिकों की तकनीकी प्रगति का सशक्त उदाहरण है। इनके अलावा एफ -16, राफेल एवं सुखोई जैसे हवाई जहाज भी थे जिनकी गडगडाहट से दुश्मन का कलेजा थरथराने लगता है। इन विमानों के कारनामे इतने खतरनाक थे कि देखने वालों की साँसे थम जाए। आश्चर्यजनक,अद्भुत ,अद्वितीय ,अनूठा,अनमोल जैसे तमाम शब्द भी इन विमानों के खौफनाक कारनामों के सामने छोटे लगते हैं। हेलिकाप्टरों की बात
करें तो यहाँ सरल-सौम्य ध्रुव और इसका लड़ाकू संस्करण रूद्र से लेकर धनुष तक अपनी कलाबाजियां दिखा रहे थे । इसके अलावा भारतीय वायुसेना की हेलीकाप्टर टीम सारंग,चेक गणराज्य से आई फ्लाइंग बुल्स और रूस की रसियन नाइट्स जैसी दिग्गज टीम भी थी जो आकाश में जब अपने जौहर दिखाती हैं तो देखने वालों की रूह तक काँप जाती है। आसमान में इनकी अठखेलियाँ,हैरतअंगेज़ करतब और अदभुत संतुलन को देखकर लगता है कि वास्तव में जीवन-मरण के बीच मामूली सा अंतर होता है। पांच दिनों का यह आयोजन देखने वालों के लिए जीवन भर की उपलब्धि से कम नहीं होता। इस दौरान आसमान में अलग-अलग आकार-प्रकार और इन्द्रधनुषी रंगों के इतने सारे विमान वैसे ही नजर आ रहे थे जैसे मकर संक्रान्ति,लोहड़ी और गणतंत्र दिवस पर देश के तमाम हिस्सों में उड़ती पतंगे दिखती हैं। विमानों के अलावा विमानों से जुड़े कलपुर्जे,नवीनतम प्रौद्योगिकी,वायुसेनाओं के काम आने वाले सहायक उपकरणों सहित देश की तकनीकी कार्य-कुशलता का आइना भी यहाँ दिखाई दिया । एयरो इंडिया का आयोजन 1996 से हो रहा है और हर दो साल बाद एशिया का यह सबसे बड़ा मेला बंगलुरु के करीब यलहंका एयरबेस में लगता है। इस साल फरवरी के दूसरे हफ्ते में दुनिया भर से रोमांच की तलाश में आये लोगों, हवाई जहाज बनाने वाली कम्पनियों और विमानों की खरीद-फरोख्त से जुड़े व्यवसाइयों का यहाँ जमावड़ा हुआ और जमकर व्यवसाय भी हुआ। आम लोगों के लिए तो यह किसी सपने के पूरा होने जैसा है क्योंकि एक साथ दुनिया भर के हवाई जहाजों को कारगुजारियां करते हुए करीब से देखना वाकई दिलचस्प और अविस्मरणीय अनुभव होता है और मुझे इन नितांत अलग नजारों का आनंद उठाने का मौका मिला।
जुगाली सिर्फ़ एक ब्लॉग नहीं, विचारों की यात्रा है। यहाँ यात्रा-वृत्तांत, संस्कृति, समाज, मीडिया, इतिहास, हिमाचल और समसामयिक मुद्दों पर मौलिक, अनूठे विषयों पर मजेदार,मनोरंजक शैली में हिंदी लेख पढ़िए।
रविवार, 10 फ़रवरी 2013
रविवार, 13 जनवरी 2013
‘सैनिक समाचार’:100 साल की सैन्य पत्रकारिता का जीवंत दस्तावेज
‘सैनिक समाचार’ का नाम सामने आते ही एक ऐसा
जीवंत दस्तावेज सामने आ जाता है जो गुलामी के दौर से लेकर देश के आज़ाद होकर अपने
पैरों पर खड़े होने और फिर विकास के पथ पर अग्रसर होने का साक्षी है. पत्रकारिता
में गहरी रूचि नहीं रखने वाले लोगों के लिए भले ही यह नाम कुछ अनजाना सा हो सकता
है परन्तु पत्रकारों के लिए तो यह अपने आप
में इतिहास है. आखिर दो विश्व युद्धों से लेकर पाकिस्तान से लेकर बंगलादेश बनने और
फिर भारत के नवनिर्माण की गवाह इस पत्रिका को किसी ऐतिहासिक दस्तावेज से कम कैसे आंका
जा सकता है. आज के दौर में जब दुनिया भर में प्रिंट मीडिया दम तोड़ रहा है या फिर
इलेक्ट्रानिक मीडिया से लेकर न्यू सोशल मीडिया के दबाव में बदलाव के लिए आत्मसमर्पण को मजबूर है तब ‘सैनिक समाचार’ जैसी हिंदी
सहित तेरह भाषाओं में सतत रूप से प्रकाशित किसी सरकारी पत्रिका की कल्पना करना भी
दूभर लगता है जिसने बाजार के बिना किसी दबाव के अपने प्रकाशन के सौ साल पूरे कर
लिए हों.
अतीत के पन्नों से
रक्षा मंत्रालय की इस आधिकारिक पाक्षिक
पत्रिका ‘सैनिक समाचार’ ने अपनी यात्रा की शुरुआत एक सदी पहले ‘फौजी अखबार’ के नाम
से साप्ताहिक समाचार पत्र के रूप में २ जनवरी १९०९ को इलाहाबाद से की थी. ‘फौजी
अखबार’ के पहले सम्पादकीय में कहा गया था कि- “भारतीय सेना में शिक्षा के प्रसार
को देखते हुए सैनिकों के लिए एक पत्र की आवश्यकता महसूस की जा रही थी. आशा है
सैनिक कर्मचारी इसका पूरा-पूरा लाभ उठाएंगे.” प्रारंभ में सोलह पृष्ठों का यह
अखबार उर्दू में छपता था. कुछ दिन के अंतराल से हिंदी संस्करण भी शुरू हो गया. खास
बात यह है उस दौर में भी पाठकों की जरुरत को समझते हुए इसके दो पृष्ठों की भाषा
रोमन उर्दू रखी गयी ताकि तत्कालीन अंग्रेज शासकों से लेकर उर्दू नहीं पढ पाने वाले
पाठक भी इसका लाभ उठा सके. उस समय अक्षर बड़े-बड़े और खुले खुले होते थे जिससे
किरोसिन (मिट्टी के तेल) की रौशनी में भी आसानी से इसे पढ़ा जा सके. ‘फौजी अखबार’
की एक प्रति का मूल्य तब महज एक आना होता था.मजे की बात यह है कि प्रकाशन लागत
घटने पर १९११ में इसका मूल्य घटाकर तीन आना कर दिया गया. समय से साथ पृष्ठों की
संख्या,गुणवत्ता और प्रकाशन स्थल भी बदले.
विश्व युद्ध का असर
१९१४ में प्रथम विश्व युद्ध ने इसे प्रसार
संख्या और पठनीयता के मामले में इतना लोकप्रिय बना दिया कि साप्ताहिक के स्थान पर
‘फौजी अखबार’ के दैनिक संस्करण तक छापने पड़े. १९२३ में पाठकों की मांग पर अंग्रेजी
संस्करण की शुरुआत हुई. द्वितीय विश्व युद्ध तक रजत जयंती मना चुके इस अखबार की
प्रसार संख्या एक लाख को पार कर गयी. सोचिए वितरण से लेकर प्रचार-प्रसार और प्रिटिंग के संसाधनों की सीमितता के समय में एक
लाख प्रतियां छापकर वितरित करने के क्या मायने होते हैं. आज के समाचार पत्रों के
विशेष परिशिष्ट की तरह ‘फौजी अखबार’ ने भी उस समय नौ भाषाओं में चार पन्नों का एक
अर्ध साप्ताहिक परिशिष्ट ‘जंग की ख़बरें’ निकला जो इतना लोकप्रिय हुआ कि इसकी तीन
लाख से ज्यादा प्रतियां छापनी पड़ी थीं. युद्ध के दौरान इसकी प्रतियां दुनिया भर
में मंगाकर पढ़ी जाती थीं. १९४४ में भारतीय सेना में नेपाली सैनिकों की बढ़ती संख्या
के मद्देनजर गोरखाली संस्करण की शुरुआत हुई. १९४५ में परिशिष्ट ‘जंग की ख़बरों’ का
नाम बदलकर ‘जवान’ कर दिया गया क्योंकि युद्ध खत्म हो जाने के कारण पुराना नाम
सार्थक नहीं रह गया था.
अभी तक ‘फौजी अखबार’ का प्रकाशन इलाहाबाद से शुरू होकर लाहौर होता हुआ शिमला
से स्थायी रूप से होने लगा था लेकिन पहाड़ी इलाके में मौसमीय बदलावों के कारण सालभर
समान रूप से अखबार का प्रकाशन और वितरण आसान काम नहीं था इसलिए १९४७ में प्रकाशन
कार्यालय दिल्ली लाया गया. देश के विभाजन ने भी अखबार के प्रकाशन पर गहरा असर
डाला. दरअसल विभाजन के कारण मुस्लिम कर्मचारियों के पाकिस्तान चले जाने के कारण
लगभग सालभर तक ‘फौजी अखबार’ का प्रकाशन स्थगित भी करना पड़ा.
बदलाव का दौर
स्वतंत्रता के साथ ही ‘फौजी अखबार’ में भी बदलाव
की प्रक्रिया शुरू हो गयी. यह बदलाव नाम से लेकर द्रष्टिकोण,गुणवत्ता,पृष्ठ संख्या
और तस्वीरों के रूप में भी देखने को मिला. सबसे बड़ा परिवर्तन तो नाम और विचारधारा में
हुआ और ‘फौजी अखबार’ के स्थान पर १९५४ में इसका नाम बदलकर ‘सैनिक समाचार’ कर दिया
गया एवं ब्रिटिश द्रष्टिकोण के स्थान पर विचारों में भारतीयता का समावेश हो गया.
इसी दौरान अखबार का आधा दर्जन नई भाषाओं में प्रकाशन भी होने लगा.इसतरह अखबार ने
अपनी स्वर्ण जयंती एवं हीरक जयंती पूरी आन-बान-शान के साथ मनाई. १९८३ तक सभी तेरह
भाषाओं हिंदी,अंग्रेजी, उर्दू,गोरखाली,पंजाबी
मराठी,तमिल,तेलुगु,कन्नड़,उड़िया,असमी,बंगाली और मलयालम में इसका प्रकाशन होने लगा
था. १९८४ में हिंदी और अंग्रेजी संस्करण ने प्लेटिनम जुबली मनाई तो १९९७ में
‘सैनिक समाचार’ की छपाई रंगीन होने लगी. इसके अलावा साप्ताहिक प्रकाशन को पाक्षिक
कर दिया गया तथा इसके पृष्ठों की संख्या भी सभी संस्करणों के लिए ३२ निर्धारित कर
दी गयी. अभी तक सभी संस्करण की पृष्ठ संख्या अलग-अलग होती थी. इसके चलते कोई
संस्करण सौ पृष्ठों का था तो कोई ४० का.
वीर गाथा की दास्तां
‘सैनिक समाचार’ को यदि भारतीय सशस्त्र सेनाओं के अदम्य साहस और अनुकरणीय
बहादुरी का दर्पण कहा जाए तो कोई अतिसयोंक्ति नहीं होगी. इसमें शामिल वीर गाथाएं
और घटनास्थल की जीवंत तस्वीरें भारतीय सैनिकों के समर्पण,बलिदान और देश की सुरक्षा
के प्रति उनकी सजगता को प्रदर्शित करती हैं. उल्लेखनीय बात यह है कि ये वीर गाथाएं
न केवल हमें भारतीय सैन्य परंपरा की गौरवशाली विरासत से रूबरू कराती हैं बल्कि नए
दौर के अनुरूप सैन्य तैयारियों और सेना में शामिल हो रहे नए हथियारों से भी परिचित
कराती हैं. सैनिक समाचार के प्रारंभिक अंकों में खुशवंत सिंह,मुल्कराज आनंद,अमिता
मालिक से लेकर इंदिरा गाँधी तक की रचनाएं पढ़ने को मिलती हैं.
सैनिकों की आवाज
सियाचिन ग्लेशियर में शून्य से कई
डिग्री नीचे के तापमान से लेकर रेगिस्तान के तमतमाती रेत और पूर्वोत्तर के झमाझम
बरसाती इलाकों तक में अपनी जान दांव पर लगाकर देश की सुरक्षा के लिए सरहद पर तैनात
जवानों को आज भी ‘सैनिक समाचार’ का बेसब्री से इन्तजार रहता है ताकि वे अपनी और
अपने साथियों की ख़बरें सत्यता,सटीकता,पारदर्शिता और बिना किसी भेदभाव के साथ जान
सकें. सैकड़ों समाचार पत्रों,दर्जनों न्यूज़ चैनलों और अनगिनत सोशल मीडिया की भीड़
के बीच भी इतने लंबे अंतराल तक अपने अस्तित्व को कायम रखना और पाठकों की जिज्ञासा
को अपने प्रति बनाए रखना किसी भी पत्र-पत्रिका के गर्व की बात हो सकती है लेकिन जब
बात किसी सरकारी पत्रिका की हो तो यह उपलब्धि और भी सराहनीय हो जाती है .
शनिवार, 22 दिसंबर 2012
क्या हम सब भी बलात्कारियों से कुछ कम हैं..?
क्या हम सब उन चंद बलात्कारियों से कुछ कम हैं? बस फर्क यह
है कि उनकी बर्बरता और क्रूरता उजागर हो गयी है और हम अपनी खाल में अब तक छिपे हुए
हैं.शायद हमारी असलियत सामने आना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि हमने अपने असली चेहरों
को मुखोटों से छिपा रखा है,हमारे खून से सने नाख़ून खुलेआम नजर नहीं आते और अंदर से
जानवर और हैवान होते हुए भी बाहरी आवरण के कारण हम संभ्रांत दिखाई पड़ते हैं. क्या
महिलाओं के साथ यौन अत्याचार ही बलात्कार है?..तो फिर वह क्या है जो हम रोज,हरदिन
सालों साल से महिलाओं के साथ करते आ रहे हैं? चंद पैसों के लिए गर्भ में बेटियों
की मौजूदगी के बारे में बताने वाले डाक्टर क्या बलात्कारियों से कम क्रूर हैं. डाक्टर
तो फिर भी पैसों के कारण अपने पवित्र पेशे से बेईमानी कर रहे हैं पर हम स्वयं क्या
अपनी जिम्मेदारी ढंग से निभा रहे हैं? अपनी अजन्मी बेटी को कोख में मारने की
अनुमति और उसका खर्च भी तो हम ही देते हैं.नवजात बच्ची को कभी दूध में डुबाकर तो
कभी ज़िंदा जमीन में दफ़न करने वाले भी तो हम ही हैं...और यदि इतनी अमानवीयता के बाद
भी बेटियों ने जीने की इच्छाशक्ति दिखाई तो फिर उसे कूड़े के ढेर पर आवारा कुत्तों
के सामने भी हम ‘तथाकथित’ संभ्रांत लोग ही फेंककर आते हैं. क्या हमारा यह अपराध इन
बलात्कारियों से किसी तरह कम है?
बेटियों को
बचपन से ही समाज से डरना हम ही सिखाते हैं. उसे हमेशा सिर झुकाकर चलने, दिनभर घर
में कैद रहने, कायदे के कपडे पहनने, जींस जैसे आधुनिक परिधानों से दूर रहने और
मोबाइल लेकर नहीं चलने जैसे आदेश भी हम ही देते हैं.लड़के और लड़कियों में रोजमर्रा
के काम-काज में भेदभाव भी हम ही करते हैं और एकतरह से बचपन से ही लड़कियों को उनकी
औकात में रखने के जतन में हम सपरिवार जुटे रहते हैं.उनकी शिक्षा तथा परवरिश से
ज्यादा चिंता हमें उनके विवाह और दहेज की होती है.आखिर दहेज लेने वाले और देने
वाले भी तो हम ही हैं. कम दहेज पर ससुराल में बहू को प्रताड़ित करने और जलाकर मार
डालने वाले भी तो हम ही हैं. तो फिर बलात्कारियों की हैवानियत और हमारी पाशविकता
में क्या फर्क है?
हमारी अमानवीयता
इतने के बाद भी नहीं रूकती बल्कि जीवनभर कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली पत्नी की
हैसियत हमारे लिए महज एक नौकरानी,हमारे बच्चों की आया और मुफ्त में यौन सुख देने
वाली मशीन से ज्यादा कुछ नहीं होती. उसे बचपन से इस ‘पति सेवा’ का पुण्य कमाकर स्वर्ग
जाने का मार्ग भी हम जैसे लोग ही सुझाते हैं और अपने(पति) से पहले उसकी मृत्यु पर
संसार से ‘सुहागन’ जाने जैसी कामना को हम ही जन्म देते हैं परन्तु पति को दूसरे
विवाह के लिए खुला भी हम ही छोड़ते हैं. यदि स्थिति उलट हुई तो फिर विधवा महिला के
लिए हमारे पास नियम-कानूनों और बंधनों की पूरी फेहरिस्त है.यदि इन तमाम उपक्रमों
के बाद भी महिलाएं किसी तरह बच गयी तो वृद्धा माँ को महज कुछ साल अपने साथ ढंग से रख
पाने की जिम्मेदारी भी हम नहीं निभा पाते इसलिए शायद कभी वृद्धाश्रम तो कभी खुलेआम
सड़क पर छोड़कर हम ‘पुरुष’ होने के अपने कर्तव्यों से मुक्ति पा जाते हैं. क्या
हमारी ये हरकतें किसी बलात्कारी के अपराध से कम हैं? आज भी जब पूरा देश महिलाओं की
सुरक्षा के मुद्दे पर आंदोलित है तब भी छह साल की बच्ची से लेकर साठ साल की बुजुर्ग
महिला का मान-मर्दन करने, आँखों के जरिए सड़क पर चलती लड़कियों का शारीरिक भूगोल
मापने और अवसर मिलते ही मनमानी करने जैसी घटनाओं में ज़रा भी कमी नहीं आई है. जब
पूरे समाज में ही अराजकता,महिलाओं के प्रति असम्मान,बेटियों के शोषण की भावना और
उनके प्रति हिंसा पसरी हो तो फिर कोई कानून,कोई फांसी या फिर जिंदगी भर की कैद भी
हमें कैसे सुधार सकती है?(picture courtesy:iluvsa.blogspot.in)
रविवार, 2 दिसंबर 2012
कुछ तो अलग था हमारे वेद में .....!
क्या नियति के क्रूर पंजों में इतनी ताकत है कि वो हमसे हमारा वेद छीन सके? या फिर काल इतना हठी हो सकता है कि उसे पूरी दुनिया में बस हमारा वेद ही पसंद आए? सब कह रहे हैं कि वेद हमारे बीच नहीं रहा,हमारा प्यारा वेद अब ईश्वर के दरबार में अपना रंग जमाएगा. हम में से कोई भी यह सोच भी नहीं सकता था कि ईश्वर के कथित ‘पैरोकारों’ से हमेशा दो-दो हाथ करने वाले वेद की जरुरत खुद ईश्वर को पड़ सकती है.शायद ईश्वर सीधे वेद से ही यह जानना चाहता होगा कि समस्याओं,चिंताओं और परेशानियों से भरी मेरी दुनिया में तुम इतने बेफ़िक्र-बेलौस और खिलंदड कैसे रह सकते हो?
वेद यानि वेदव्रत गिरि, एटा के पास छोटे से
गाँव की एक ऐसी शख्सियत जिसके लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं था.वह पत्रकार भी था और यारों
का यार भी,लेखक भी था और दोस्तों का आलोचक भी,कवि भी था और मित्रों का गुणगान करने
वाला भी,पटकथा लेखक भी था और अपने ही भविष्य से खेलने वाला अभिनेता भी...क्या नहीं
था हमारा वेद और क्या नहीं कर सकता था हमारा वेद. कल ही की बात लगती है जब हम सब
यानि कुल जमा ४० युवा भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में
मिले थे और पंख लगाकर उड़ते समय के साथ पत्रकार कहलाने लगे.जब हम सभी भोपाल और
मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपना भविष्य तलाश रहे थे तो वेद को दिल्ली में अपनी
मंजिल नज़र आ रही थी...आखिर सबसे अलग जो था हमारा वेद.जब दिल्ली में उसके पैर जमे
तो उसने मुंबई की राह पकड़ ली और मुंबई में सराहना मिलने लगी तो इंदौर-भोपाल को
पड़ाव बना लिया. कुछ तो खास था वेद में तभी तो वह जहाँ भी जाता मंजिल साथ चलने
लगती. शायद यही कारण था कि साथ-साथ पढ़ने के कई साल बाद एकाएक इंदौर में अल्पना का
हाथ थामा तो अल्पना की पढ़ाई और परीक्षा की तैयारियों में ‘जान’ आ गयी और वह पढते-पढते
कालेज में अपने हमउम्र छात्रों को पढाने वाली प्राध्यापक बन गयी...कुछ तो अलग करता
था वेद को हमसे तभी तो जब हम सब अपने बच्चों को ब्रांडनेम बन चुके स्कूलों में
पढ़ाने की जद्दोजहद में जुटे थे तब वेद ने अपने बेटे को अपने से दूर बनारस में लीक
से हटकर पढ़ाई करने के लिए भेज दिया ताकि वह भी हमारे वेद की तरह सबसे हटकर परन्तु
सभी का चहेता इन्सान बने.
आज के दौर में जब लोग गाँव से दूर भाग रहे हैं
और परम्पराओं के नाम पर औपचारिकताएं निभा रहे हैं तब वेद ने त्यौहार मनाने के लिए
भी अपने गाँव की राह पकड़ ली. वह आंधी की तरह आता था,ठेठ अंदाज़ में दिल की बात
कह-सुन जाता था और फिर तूफ़ान की तरह चला भी जाता था. उसका अंदाज़ सबसे जुदा था और
यही बेफ़िक्र शैली वेद को सबसे अलग,सबसे जुदा,सबका प्रिय और सबका चहेता बनाती थी.
वेद, आत्मा के सिद्धांतों में न मुझे विश्वास था और न ही तुम भरोसा करते थे लेकिन
अब होने लगा है इसलिए मैं न केवल तुमसे बल्कि अपने सभी दोस्तों से कह सकता हूँ
तुमको हमसे कोई नहीं छीन सकता.तुम्हारी जिम्मेदारी भरी बेफिक्री,गहराईपूर्ण
खिलंदडपन,आलोचना भरा अपनापन और गंभीरता के साथ बेलौस अंदाज़ हमारे साथ है. हम उसे
जीवित रखेंगे और अपने झूठे बाहरी आवरणों,दिखावे की गंभीरता और तनाव बढ़ाती फ़िक्र को
परे रखकर तुम्हारी तरह बनने का प्रयास करेंगे.हम एक वेद से अनेक वेद बनकर
दिखायेंगे क्योंकि हम सभी वेद बन जायेंगे इसलिए मेरा दावा है कि वेद तुमको हमसे
कोई नहीं छीन सकता..काल भी नहीं,नियति भी नहीं,तुम्हारी बेफिक्री भी नहीं और आँखों
देखी सच्चाई भी नहीं...!!! (वेदव्रत गिरि देश के
जाने-माने पत्रकार थे.दैनिक भास्कर से लेकर देश के तमाम समाचार पत्रों में वे रहे
हैं और ‘मेरीखबर डाट काम’ तथा ‘मायन्यूज़ डाट काम’ नामक न्यूज़ पोर्टल का संचालन
कर रहे थे.उनका हाल ही में एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया है)
गुरुवार, 13 सितंबर 2012
पापा, भैया लोग मुझे ऐसी अजीब सी नज़रों से क्यों घूर रहे थे?
ग्यारह बसंत पूरे कर चुकी मेरी बिटिया के एक सवाल ने मुझे न केवल चौंका दिया
बल्कि उससे ज्यादा डरा दिया.उसने बताया कि आज ट्यूशन जाते समय कुछ भैया लोग उसे
अजीब ढंग से घूर रहे थे.यह बताते हुए हुए उसने पूछा कि-"पापा भैया लोग ऐसे
क्यों घूर रहे थे? भैया लोग से उसका मतलब उससे बड़ी उम्र के और उसके भाई जैसे लड़कों
से था.खैर मैंने उसकी समझ के मुताबिक उसके सवाल का जवाब तो दे दिया लेकिन एक सवाल
मेरे सामने भी आकर खड़ा हो गया कि क्या अब ग्यारह साल की बच्ची भी कथित भैयाओं की
नजर में घूरने लायक होने लगी है? साथ ही उसका यह कहना भी चिंतन का विषय था कि वे
अजीब निगाह से घूर रहे थे.इसका मतलब यह है कि बिटिया शायद महिलाओं को मिले प्रकृति
प्रदत्त 'सेन्स' के कारण यह तो समझ गयी कि वे लड़के उसे सामान्य रूप से नहीं देख
रहे थे लेकिन कम
उम्र के कारण यह नहीं बता पा रही थी कि 'अजीब' से उसका मतलब क्या है.हाँ इस पहले
अनुभव(दुर्घटना) ने उसे चौंका जरुर दिया था. दरअसल सामान्य मध्यमवर्गीय भारतीय
परिवारों की तरह उसने भी अभी तक यही सीखा था कि हमउम्र लड़के-लड़कियां उसके दोस्त
हैं तो बड़े लड़के-लड़कियां भैया और दीदी. इसके अलावा कोई और रिश्ता न तो उसे अब तक
पता है और न ही उसने अभी तक जानने की कोशिश की, लेकिन इतना जरुर है कि इस अजीब सी
निगाहों से घूरने की प्रक्रिया ने हमें समय से पहले उसे समाज के अन्य रिश्तों के
बारे में समझाने के लिए मजबूर जरुर कर दिया.
बिटिया के सवाल के जवाब की
जद्दोजहद के बीच अखबार में छपी उस खबर ने और भी सहमा दिया जिसमें बताया गया था कि
एक नामी स्कूल के बस चालक और कंडक्टर ने छः साल की नन्ही सी बच्ची का दो माह तक
यौन शोषण किया और डरी सहमी बच्ची अपनी टीचर की पिटाई की धमकी के डर से यह सहती
रही. क्या हो गया है हम पुरुषों को? क्या अब बच्चियों को घर में बंद रखना पड़ेगा
ताकि वह उस उम्र में किसी पुरुष की कामुक निगाहों का शिकार न बन जाए जबकि उसके लिए
पुरुष पापा,भाई,अंकल,ताऊ,दादा जैसे रिश्तों के अलावा और कुछ नहीं होते और जिनकी
गोद में वह स्त्री-पुरुष का भेद किये बिना आराम से बैठ एवं खेल सकती है. यदि अभी
से बच्चियों पर इस तरह की पाबन्दी थोपनी पड़ी तो फिर वह भविष्य में लार टपकाते
पुरुषों का सामना कैसे करेगी?आखिर कहाँ जा रहा है हमारा समाज! हम बेटियों को कोख
में ही मारने का षड्यंत्र रचते हैं,यदि वे किसी तरह बच गयी तो सड़क पर या कूड़ेदान
में फेंक दी जाती हैं और यदि यहाँ भी उनमें जीवन की लालसा रह गयी तो फिर हम कामुक
निगाहों से घूरते हुए उनके साथ अशालीन हरकतों पर उतर आते हैं.किसी तरह उनकी शादी
हुई तो दहेज के नाम पर शोषण और फिर बेटी को जन्म देने के नाम पर तो घर से ही छुट्टी
मानो बेटी पैदा करने में उसकी अकेले की भूमिका है? यह सिलसिला चलता आ रहा है और हम
चुपचाप देख रहे हैं. क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्यों नहीं हम अपने
बेटे को भैया और उसकी निगाहों को शालीन रहने के संस्कार देते?बड़े होने पर उसे
लड़कियों का भक्षक बनने की बजाय रक्षक बनने की शिक्षा क्यों नहीं देते?बच्चियों को
ताऊ,पिता और भैया की आयु के पुरुषों और
शिक्षक से भी यौन हिंसा का डर सताने लगे तो फिर इस सामाजिक ताने-बाने का क्या होगा?
महिला में हमें उपभोग की वस्तु ही क्यों दिखती है? ऐसे कई ज्वलंत प्रश्न हैं जिन
पर अभी विचार नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हमारा समाज महिला विहीन हो
जायेगा और माँ-बहन-बेटी जैसे रिश्ते पौराणिक कथाओं के पात्र!.
मंगलवार, 14 अगस्त 2012
विश्व मच्छर दिवस यानि एक दिन मच्छरों के नाम
विश्व मच्छर दिवस? चौंकिए मत, हर साल 20 अगस्त को दुनियाभर
में विश्व मच्छर दिवस मनाया जाता है. अभी तक वैलेंटाइन डे से लेकर फादर-मदर डे,नेशनल
यूथ डे,आर्मी डे,रिपब्लिक डे और स्वतंत्रता दिवस से लेकर पर्यावरण दिवस एवं बाल
दिवस जैसे तमाम राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय दिवसों के बारे में तो हम सभी ने खूब
सुना और पढ़ा है लेकिन मच्छरों का भी कोई दिवस मनाया जा सकता है यह बात मेरी तरह कई
और लोगों के लिए भी कल्पना से परे होगी. खासतौर पर उस मच्छर को समारोहिक तौर पर
याद करना जो मानव प्रजाति के सबसे बड़े दुश्मनों में से एक है,बात समझ से परे लगती
है. यह कपोल कल्पना नहीं बल्कि वास्तविकता है कि हर साल दुनिया भर के सभी प्रमुख
देश अगस्त महीने की २० तारीख को मच्छरों का यह दिवस मनाते हैं. एक और मजेदार बात
यह है कि विश्व मच्छर दिवस न तो गिफ्ट और कार्ड आधारित बाजार की देन है और न ही
युवा पीढ़ी के विभिन्न नव-रचित पर्वों की तरह का कोई आधारहीन त्यौहार बल्कि इसका
आयोजन लगभग सवा सौ साल से हो रहा है.
दरअसल, इस दिन का नाम भले ही विश्व मच्छर दिवस है परन्तु इसको मनाने का
उद्देश्य मच्छरों को महिमामंडित करना नहीं बल्कि मच्छरों के खात्मे के लिए नई
दवाओं और नए तरीकों के निर्माण के लिए मिल-जुलकर प्रयास करना है.विश्व मच्छर दिवस
की शुरुआत 20 अगस्त 1897 को हुई थी जब भारत
में कार्यरत ब्रिटिश डाक्टर सर रोनाल्ड रास ने लंबे शोध और परिश्रम के बाद इस तथ्य
को खोज निकाला कि मनुष्य में मलेरिया जैसी जानलेवा बीमारी के लिए मादा मच्छर
जिम्मेदार है.आज शायद यह जानकारी उतनी महत्वपूर्ण न लगे लेकिन एक सदी पूर्व उस दौर
की कल्पना कीजिये जब हर साल लाखों-करोड़ों लोग मलेरिया के कारण जान गवां देते थे और
विशेषज्ञ यह समझ ही नहीं पाते थे कि इतनी बड़ी संख्या में लोग क्यों बेमौत मारे जा
रहे हैं. डाक्टर रोनाल्ड रास की इस खोज से मच्छरों के संक्रमण से निपटने के तरीके
और दवाएं खोजी जा सकी और मलेरिया पर नियंत्रण के उपाय शुरू हुए.
वैसे, अफ़्रीकी देशों के साथ-साथ भारत में भी मच्छर किसी समस्या से कम नहीं
हैं. हमारे वैज्ञानिक और चिकित्सा विशेषज्ञ मच्छरों से निपटने के नए-नए तरीके
तलाशते हैं और मच्छर स्वयं को इन तरीकों तथा दवाओं के अनुकूल ढालकर मानव प्रजाति
के लिए खतरे को कम नहीं होने देते. यही कारण है दशकों बाद भी मलेरिया पर पूरी तरह
से काबू नहीं पाया जा सका है. आज भी पूर्वोत्तर के राज्यों में हमारी फौज के
जांबाज़ सिपाहियों के लिए दुश्मन से ज्यादा खतरा मच्छरों से है. अब तो मच्छरों ने
अपनी बिरादरी और भाई-बंधुओं के साथ मिलकर जानलेवा बीमारियों की पूरी सूची बना ली
है जिसमें चिकनगुनिया, जापानी इंसेफ्लाइटिस और डेंगू प्रमुख हैं. इन बीमारियों के
कारण अभी भी दुनिया भर में लाखों लोग अपने प्राण गंवा रहे हैं. सिर्फ हमारे देश
में ही हर साल 40 से 50 हजार लोगों की मौत
मच्छरों के कारण हो जाती है और तक़रीबन 10 लाख लोग इन बीमारियों का शिकार बन जाते हैं.भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद
के अनुसार 2010 में 46,800 लोगों को मलेरिया लील
गया था. बच्चों के लिए तो मच्छर जानी दुश्मन से कम नहीं है.अफ्रीकी देशों में तो
हर 45 सेकेण्ड में एक बच्चे
की मौत मलेरिया के कारण हो जाती है इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर भारत
सरकार तक मच्छरों के खिलाफ़ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्यक्रम चला रहे
हैं. इन कार्यक्रमों से उम्मीदें तो जगी हैं लेकिन मच्छरों के साथ भ्रष्टाचार के
मिल जाने से उम्मीदों पर पानी फिरने में भी देर नहीं लगेगी. डाक्टर रोनाल्ड रास के
लिए विश्व मच्छर दिवस का मतलब मच्छरों से छुटकारा दिलाना था लेकिन आज सरकारी
योजनाओं के जरिये मच्छरों से निपटने में जुटे महकमों के लिए इस दिन का मतलब पैसा
बनाना हो गया है.शायद इसलिए तमाम अच्छी योजनाओं और प्रयासों के बाद भी मच्छर
फल-फूल रहे हैं और उसी अनुपात में योजनाओं
का बजट एवं बीमारियों का संक्रमण भी साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है.(picture courtesy:jokes-prank.com)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!
धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...
-
प्रिय बेटी, पिछले कुछ दिनों से मन बहुत विचलित है। सोशल मीडिया पर हिमाचल की कुछ बेटियों का एक वीडियो वायरल है जिसमें वे कथित तौर पर नशे, बॉय...
-
सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न क्यों? उनसे पहले प्रख्यात समाजसेवी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने वाले अन्ना हजारे को क्यों नही...





