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डमरू,मृदंगम और नगाड़ा पर बैठकर लीजिए भारतीय संगीत का आनंद..!!

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बाँसुरी, डमरू, एकतारा, इसराज, मृदंगम्, नगाड़ा जैसे नाम सुनकर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन कानों में गूंजने लगी न…तो तैयार रहिए, कल नईदिल्ली में विजय चौक पर आपको इन्हीं नामों पर बैठकर इनकी ही धुनों को सुनना है..और केवल यही नहीं, पखावज, संतूर, सारंगी, सारिंदा, सरोद, शहनाई, सितार, सुरबहार, तबला और वीणा भी आपकी बैठक व्यवस्था का हिस्सा होंगे। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आपको इन वाद्य यंत्रों पर बिठाया जाएगा बल्कि पहली बार इस वर्ष बीटिंग रिट्रीट समारोह के लिए विजय चौक पर बैठने के लिए बनाए गए एंक्‍लोज़र्स के नाम भारतीय वाद्य यंत्रों के नाम पर रखे गए हैं ताकि आम लोगों को ज्यादा म्यूजिकल एवं अपनापन महसूस हो। गौरतलब है कि बीटिंग द रिट्रीट एक पुरानी सैन्य परंपरा है। पहले युद्ध के समय शाम होते ही बिगुल बजाकर सैनिकों को संकेत दिया जाता था कि लड़ाई रोक दी जाए और सभी अपने शिविरों में लौट आएं। यही परंपरा अब बीटिंग द रिट्रीट समारोह के रूप में निभाई जाती है। अब हर साल विजय चौक पर 29 जनवरी को होने वाला ‘बीटिंग रिट्रीट’ गणतंत्र दिवस समारोहों के समापन का प्रतीक होता है । इसे सेनाओं की एकता, अनुशासन और गौर...

उत्सव से ज्यादा आफत है बर्फबारी

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इन दिनों टीवी और अखबारों के समाचारों में आप हिमाचल, उत्तराखंड या कश्मीर में हो रही बर्फबारी का मज़ा ले रहे पर्यटकों को देख रहे होंगे। वे कैसे एक दूसरे पर बर्फ फेंक रहे हैं, नाच रहें हैं और उत्सव मना रहे हैं। आप का मन भी मचल रहा होगा कि काश हम भी जल्दी से वहां पहुंच जाए और खूब बर्फ के गोले बनाकर खेले..लेकिन यह टीवी पर देखने में ही अच्छा लगता है क्योंकि पहाड़ों पर बर्फबारी अवसर या उत्सव भर नहीं लाती बल्कि आफत तथा आपदा भी लाती है। पहाड़ी इलाकों में सर्दियों में बर्फबारी हमेशा एक जादुई दृश्य रचती है। आसमान से गिरती सफेद रुई जैसी बर्फ, पेड़ों पर जमी बर्फ की चमकदार परत, और चारों ओर फैली सफेद चादर जैसी बर्फ… ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने खुद एक श्वेत कथा रच दी हो लेकिन इस मनभावन सुंदरता के पीछे कई कड़वी कहानियां छिपी होती हैं, जो यहां रहने वाले या फिर इस बर्फबारी को भुगतने वाले ही समझ पाते हैं। पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी के दौरान और उसके बाद कई चुनौतियां आती हैं, जैसे फिसलन भरी सड़कें, ठंड से स्वास्थ्य जोखिम, बिजली-पानी की कटौती, खाने पीने की दिक्कत,रोजगार और यात्रा में बाधाएं। सबसे पहली और बड़...

देवभूमि के बाग़ में (सफेद) दुशाला ओढ़े खड़ी है..!!

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क्वीन ऑफ हिल्स शिमला के साथ साथ देवभूमि हिमाचल में नए साल की आज 23 जनवरी ने लोगों की खोई मुस्कान वापस लौटा दी है। यह एक ऐसा दिन है जब आसमान ने अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलटे और सफ़ेद स्याही से नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया..ऐसा अध्याय जिसे हर कोई पढ़ना चाहता है..स्थानीय लोग, पर्यटक, होटल व्यवसाई और स्वयं प्रकृति भी।  सुबह-सुबह जब लोगों की आँखें खुलीं, तो उनकी खिड़की के शीशे पर कोई अनजान बच्चा उँगली से दिल नहीं बना रहा था—बल्कि बादल खुद बर्फ के छोटे-छोटे चमकदार सफेद टुकड़े बिखेर रहे थे। शहर का मशहूर रिज मैदान (आम लोगों के लिए मॉल रोड), जो कल तक धूप में अपनी पुरानी कॉलर वाली कोट पहने उदास सा था, आज सुबह-सुबह एकदम सफ़ेद शॉल ओढ़े खिलखिला रहा था—जैसे कोई देवदूत या परी सफेद दुशाला ओढ़े आ गई है और सबकी नज़रें उसी पर टिक गई हों।  मॉल रोड पर आज बर्फ़ के बीच चाय की केतली से अदरक-इलायची की खुशबू ज्यादा मनमोहक लग रही है। स्कूटर, कार और घरों की लाल-हरी छतों ने जगमग सफेदी भरा दुपट्टा ओढ़ लिया है । बर्फ़ की ठंडक पाकर कई वाहन चैन की नींद सो रहे हैं और मालिक से शायद फुसफुसाकर कह भी रहे हैं.. ...

देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क पर सफ़र !!

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बर्फ के बीच हाड़ कंपाती ठंड, मूसलाधार बारिश, आए दिन हो रहे भूस्खलन, पहाड़ से गिरते पत्थरों के बीच न डायनामाइट, न जेसीबी, न कोई ड्रिल मशीन..बस छैनी- हथौड़ी…और इंसानी हौंसला। मौत के साए में दिन रात बिना रुके काम करते हुए 18 हज़ार मज़दूरों ने मौसम की बेदर्दी और पहाड़ की कठोरता पर जीत हासिल कर दिखाई और बना दी देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क। इसी सड़क पर हमें एनाकोंडा के चट्टानी रूप से भी रूबरू होने का मौका मिलता है। हम बात कर रहे हैं राष्ट्रीय राजमार्ग-5 की। यह केवल एक सड़क भर नहीं, बल्कि इतिहास, साहस और रोमांच की जीवित धरोहर  है। यह इंसानी जिद का प्रमाण है। जिसमें महज हाथों ने असंभव को संभव बनाते हुए न केवल मजबूत पहाड़ों को काट डाला बल्कि झुकने पर भी मजबूर कर दिया। कभी हिंदुस्तान-तिब्बत रोड कहलाने वाली यह सड़क कालका से शुरू होकर शिमला, रामपुर, किन्नौर और शिपकिला दर्रे तक जाती है। लगभग 450 किलोमीटर लंबी यह पहाड़ी राह सतलुज नदी के साथ-साथ चलती हुई हिमालय के सबसे दुर्गम और सुंदर इलाकों से गुजरती है। यह एक ऐसी सड़क है, जो हमें प्रकृति की विराटता, मानव साहस और इतिहास की गहराइयों से जोड़...

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व पर सनातन का जयघोष

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सनातन संस्कृति का जयघोष करती अरब सागर की लहरें, हवा में 'हर-हर महादेव' के जयकारों के बीच आस्था का सैलाब लेकर आराधना में जुटे हजारों श्रद्धालु, डमरूओं की मधुर ध्वनि के साथ 'ओम नमः शिवाय' के जाप से सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर पूरा परिसर, महादेव के स्वर्ण कलश की आभा को सौ गुना बढ़ाती दिलकश साज सज्जा एवं इन सभी के बीच खड़ा एक ऐसा अनूठा, दिव्य,भव्य और प्रतिष्ठित मंदिर… जो समय की हर चुनौती को गरिमा के साथ पार करता आ रहा है। हम बात कर रहे हैं देवों के देव महादेव के सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ की और यहां आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व की। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर न सिर्फ भारतीय सांस्कृतिक विरासत में अहम धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक है। यह मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि विनाश और पुनर्निर्माण की, आस्था और संघर्ष की एक जीवंत कहानी है ।   सोमनाथ मंदिर की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे सीधे पौराणिक काल से जुड़ी हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक चंद्रमा ने खुद इस मंदिर की स्थापना की थी, ताकि शिव की कृपा पाकर श्राप...

जब हेडलाइट हार गई लेकिन हौसला जीत गया..!!

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रात के करीब 11.30 बजे..विमान की खिड़की से बाहर कुछ नजर नहीं आ रहा। आमतौर पर इतनी ऊंचाई से चंडीगढ़ शहर की लाइट दिखने लगती हैं। लगा, शायद कोहरा होगा। कई मिनटों की मशक्कत के बाद विमान उतरा लेकिन असली चिंता यहीं से शुरू हुई क्योंकि कोहरा इतना घना था कि तमाम प्रबंध के बाद भी पायलट विमान को सही जगह पर नहीं उतार पाया था। ग्राउंड स्टाफ ने किसी तरह जहाज को सीधा कराकर सुरक्षित जगह तक पहुंचाया लेकिन विजिबिलिटी ज़ीरो थी यानि कुछ भी नहीं दिख रहा था। शून्य दर्शनीयता की समस्या इतनी विकराल थी कि कड़ाके की ठंड में यात्रियों को हवाई अड्डे तक पहुंचाने के लिए एयर ब्रिज बनाना तक मुश्किल था। इसलिए यात्रियों को जहाज में ही आधे घंटे से अधिक समय तक कैद रहना पड़ा। फिर, लंबे विचार विमर्श के बाद बसों का इंतजाम किया गया..वे भी किसी तरह सरकते हुए विमान तक आई, यात्री ठिठुरते हुए और अंधेरे में किसी तरह बस तक पहुंचे और बसें आहिस्ता आहिस्ता हवाई अड्डे तक।    पायलट ने तो हिम्मत दिखाकर हमें हवाई अड्डे तक लाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली लेकिन समस्या अब शुरू हुई। हवाई अड्डे से चंडीगढ़ में होटल तक पहुंचना वर्ल्ड कप...

पाकिस्तान के जनरल जिया-उल-हक, कांग्रेस के संस्थापक ए ओ ह्यूम और अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई के बीच क्या है कनेक्शन..!!

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भारत के प्रथम चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत, पाकिस्तान के तख्ता पलट जनरल जिया-उल-हक,कांग्रेस के संस्थापक ए ओ ह्यूम,म्यांमार की लोकतांत्रिक नेता आंग सान सू की और अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई के बीच भारत के संबंध में क्या कॉमन है? इसी तरह, फिल्म अभिनेता अनुपम खेर, बलराज साहनी, प्राण, प्रिटी जिंटा, उस्ताद विलायत खां, राजिंदर कृष्ण और के एल सहगल में फिल्म के अलावा क्या कॉमन कनेक्शन है? चलिए, एक और पहेली.. गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर, अमृता शेरगिल, निर्मल वर्मा, रुडयार्ड किपलिंग और रस्किन बांड में लेखन के अलावा और क्या कॉमन है? नहीं पता..चलिए हम बताते हैं। इन सभी में शिमला कनेक्शन है। शिमला कनेक्शन मतलब या तो ये शिमला में पले बढ़े हैं या शिक्षित हुए हैं और यहीं से उनके व्यक्तित्व का विकास हुआ है। शिमला शहर वर्षों से नामचीन हस्तियों की जन्मभूमि/कर्मभूमि रहा है। मसलन म्यांमार की दिग्गज नेता आंग सान सू की का शिमला से गहरा संबंध है क्योंकि उन्होंने 1987 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्ट्डीज में फेलोशिप के दौरान अपने पति और बच्चों के साथ शिमला में काफी समय बिताया...

जाड़ों की ‘ठंडी’ धूप में,आँगन में लेट कर..

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फिल्म ‘आंधी’ का मशहूर गीत ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन…’, जरूर गुलज़ार साहब ने शिमला या इस जैसे किसी पहाड़ पर ठंड के दिनों में बैठकर लिखा होगा क्योंकि तभी वे लिख पाए कि ‘..जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट कर...’ या फिर ‘..बर्फ़ीली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर वादी में गूँजती हुई खामोशियाँ सुने..।’ दरअसल, ऐसी कल्पना वही कर सकता है जिसने पहाड़ों पर मौसम का अतरंगी मिजाज जिया हो और खासतौर पर जाड़ों की ठंडी धूप को महसूस किया हो। वैसे, गुलज़ार साहब ने काव्यात्मक रूप देने के लिए शायद नर्म धूप लिख दिया है लेकिन इसे नर्म नहीं बल्कि ठंडी धूप कहना ज्यादा बेहतर होगा।  इसकी वजह यह है कि शिमला जैसे पहाड़ी इलाकों में सर्दियों की जो धूप होती है, वह नर्म या गर्म नहीं बल्कि ठंडी होती है। यह धूप शरीर को उतना गर्म नहीं करती,जितना दिल को गुदगुदाती है। इसे हम ठंडी धूप कह सकते हैं…और यह बात भी उतनी ही सच है कि पहाड़ों के बाहर शायद ही कोई इसे समझ पाए। तमाम भूमंडलीय बदलावों, कम होते पेड़, जनसंख्या एवं वाहनों के बढ़ते बोझ तथा पर्यटकों की बेतहाशा भीड़ के बाद भी सर्दियों में शिमला जैसे पहाड़ी इला...

बर्फ के बिना भी बर्फीला जश्न..!!

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क्वीन ऑफ हिल्स शिमला,हमेशा से सर्दियों की परी कथा सी लगती है और इस दौरान बर्फ़ से ढके पहाड़ों के बीच होने वाला विंटर कार्निवल यहां की जान है, लेकिन इस बार का विंटर कार्निवल कुछ खास है – प्रकृति ने बर्फ नहीं बरसाई, फिर भी शहर ने खुद को कृत्रिम बर्फ, चमकती लाइटों और रंग-बिरंगी झंडियों की सजावट से ऐसा सजाया कि लगता है पूरा शिमला बर्फ की चादर ओढ़े नाच रहा हो। कल 24 दिसंबर शुरू होकर 1 जनवरी तक चलने वाला यह विंटर कार्निवल नौ दिन का उत्सव भर नहीं, बल्कि हिमाचली संस्कृति, संगीत और जीवंतता का जीता-जागता प्रमाण है। आज क्रिसमस पर अलग ही रौनक है और दुनिया भर में मशहूर यहां का चर्च रंगों से नहाकर प्रार्थनाओं में डूबा है। विंटर कार्निवल के दौरान रिज मैदान (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर शाम ढलते ही हजारों लोग इकट्ठा होते हैं। इनमें स्थानीय लोगों से ज्यादा पर्यटक हैं। हवा में ठंडक है, लेकिन दिलों में गर्माहट। उत्सवी माहौल का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू खुद महानाटी में थिरकते दिखे। ढोल-नगाड़ों की थाप पर पूरा रिज मैदान एक साथ नाच उठता है।  यहां नाटी...

अरे बाप रे…40 हजार रुपए में एक किलो सब्जी !!

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यह हिमालय की राजकुमारी है.. नाज़ुक, दुर्लभतम एवं इतनी शर्मीली की लाख तलाशने पर भी नज़र नहीं आती..और कीमती इतनी की इसके सामने सोना चांदी भी शरमा जाएं। यह कोई धातु नहीं है फिर भी इसे पहाड़ों का सोना कहा जाता है..इंसान नहीं है फिर भी राजकुमारी है और दवा नहीं है फिर भी दुनिया के किसी भी बेशकीमती नुस्खे से कम नहीं है। बर्फीली चोटियों पर पूरी शान-ओ-शौकत से रहने वाली यह नाजुक सी राजकुमारी दरअसल सब्जियों की दुनिया की ‘रॉयल प्रिंसेस’ है और इसका नाम भी कुछ अलग सा है - गुच्छी।  मधुमक्खी के छत्ते (honeycomb) सा स्पंजी क्राउन पहने यह प्रिंसेस आमतौर पर जंगलों में छिपकर रहती है। जैसे ही हिमालय की बर्फ पिघलती है तो यह हौले से लजाते हुए बाहर झांकती है, जैसे शाही परिवार का कोई चश्म-ओ-चिराग अपने महल से निकल रहा हो। लेकिन राजकुमारी गुच्छी इतनी नखरेबाज है कि आसानी से नहीं मिलती बल्कि जंगलों में घंटों भटककर एवं जोखिम उठाकर ही इसे मनाना और लाना पड़ता है। अब रही कीमत की बात तो यह सब्जियों की सरताज है क्योंकि एक किलो सूखी गुच्छी की कीमत 30,000 से 40,000 रुपये है। इतनी कीमती कि, फाइव स्टार होटल में इसे डिश ...

मीठे राजमार्ग के माथे पर क्यों लगी हैं लाल बिंदी…!!

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इन दिनों यदि आप ‘मीठे राजमार्ग’ से गुजर रहे होंगे तो आपको ताजे गुड़ की मदहोश करने वाली मिठास के साथ सड़क पर कुछ अनूठा..कुछ अलग भी नजर आएगा। ऐसा लगता है जैसे किसी ने राजमार्ग के माथे पर सुंदर सी लाल बिंदी लगा दी है। यह अनूठापन आकर्षक भी है और आपकी सुरक्षा का पहरेदार भी। मीठे राजमार्ग के बारे में और विस्तार से जानना हो तो आप इस लिंक के जरिए पढ़ सकते हैं। मीठा राजमार्ग: जहां बन रहे मदहोश करने… https://jugaali.blogspot.com/2024/12/blog-post_59.html बहरहाल, अभी बात मीठे राजमार्ग के अनूठेपन की। दरअसल भोपाल से जबलपुर तक बिना किसी रुकावट के जाने के लिए बनाया गया नेशनल हाइवे क्रमांक 45 इन दिनों अपने रेड कार्पेट के कारण देश भर में चर्चा में है। ये टेबिल टॉप शैली में बने रेड कार्पेट पूरी सड़क की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे हैं। ये ऐसे लगते हैं जैसे महिलाएं माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी लगाती हैं। जैसे बिंदी सुहाग की सुरक्षा का प्रतीक मानी जाती है,इसी तरह यह रेड कार्पेट भी वाहन चालकों की सुरक्षा का प्रतीक है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एन एच ए आई) ने देश में संभवतः पहली बार यह अनूठा प्रयोग...

25 वें जन्मदिन पर पिता का पत्र बेटी के नाम

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 🌹जन्मदिन मुबारक प्रिंसेस..🌹 हमारी नन्ही सी परी…देखते ही देखते सजीली राजकुमारी बन गई है। आज जब घड़ी ने बारह बजाए और हमने आँखें बंद कीं तो पूरे 25 साल का गुजरा समय किसी मनभावन फिल्म की भांति आंखों के सामने आ गया…11 दिसंबर, 2000 को सोमवार का दिन था और उस दिन पूर्णिमा थी। पूरी  दुनिया को दूधिया रोशनी से जगमगाते हुए तुमने रात करीब 10 बजे हमारे जीवन में हौले से कदम रखा और फिर क्या था..हमारी दुनिया भी रोशन होती चली गई। तुमको शायद न पता हो कि 11 दिसम्बर का दिन पर्वतीय पर्यावरण के महत्व के लिए मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस के रूप में भी जाना जाता है और जन्म के बाद आज तुम्हारे 25वें जन्मदिन का जश्न भी हिमालय की गोद में पहाड़ों की रानी शिमला की बाहों में मनाने का अवसर मिला है। जब तुमने अपने नन्हे हाथ को मेरे हाथ में रखा था तो लगा कि चांद हथेली पर उतर आया हो। जब पहली बार तुमने मेरी अंगुली पकड़ी थी तो इतना जोर लगाया था कि आज तक उसकी गर्माहट महसूस होती है और लगा जैसे तुम कह रही हो, कि पापा इसी तरह अंगुली थामे रहना। उस पल से लेकर आज तक, सच में हम लोग बस तुम्हारे लिए, तुम्हारे स...

व्यंग्य: गो मूत्र से वोट कहते हैं

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आवश्यकता आविष्कार की जननी है और भारत आविष्कारों (पढ़िये चमत्कारों) का देश है। आविष्कार (चमत्कार) भी ऐसे-ऐसे कि अमेरिका-जापान जैसे 'आविष्कार केंद्रित' देश और नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक भी दांतों तले अंगुली दबा लें। हमें स्कूल के दिनों से रटाया जाता है कि शून्य का आविष्कार भारत ने ही किया था। इस खोज का कितना लाभ हम उठा पाए यह तो वैदिक, ज्योतिष एवं कर्मकांडों को स्कूल-कालेजों में अनिवार्य विषय बनवाने वाले 'शिक्षा शंकराचार्य' जाने, पर इस शून्य को एक से लेकर नौ अंकों के साथ मनचाही बार प्रयुक्त कर 'रिश्वत' का आविष्कार जरूर हमने कर दिखाया है क्योंकि 'रिश्वत हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, इसे हम लेकर रहेंगे' की तर्ज पर 'रिश्वोत्री' (रिश्वत की गंगोत्री) को पूरे देश में समान गति से बहते देखकर इस आविष्कार की सार्थकता एवं कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है जैसी 'राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण' होता है। 'राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण' वाक्य का इस्तेमाल करने के लिए मैं हमारे हिन्दू मठाधीशों से माफी मांगता हूं। दरअसल इसका तो उन्हें पेटेंट करा...

वर्षा विगत चुनाव ऋतु आई...

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वर्षा विगत चुनाव ऋतु आई...... पढ़ कर इस गुस्ताख़ी के लिए संत तुलसीदास जी माफ़ करें क्योंकि उन्होंने तो वर्षा विगत शरद ऋतु आई... लिखा है। मौसम विभाग के बाबू भी नाराज़ न हों क्योंकि मौसम परिवर्तन की सूचना देना तो उनकी बपौती है। फिर चाहे वे गर्मी में पानी गिरने की और वर्षा में तीखी गर्मी की भविष्यवाणी क्यों न करते हों और उनके पूर्वानुमानों पर आस लगाकर कितने ही किसान हर साल बर्बाद होते हों। खैर, मौसम विभाग के किस्से तो कहानी घर घर की तरह देशभर में समान रुप से चर्चित हैं। यहाँ पेश है संत तुलसीदास की इन प्रसिद्ध पंक्तियों पर रामायण काल और आधुनिक काल की दो सखियों की बात-चीत:   सखी (एक): हे सखी, देख वर्षा ऋतु बीतने को है। शरद ऋतु के स्वागत की तैयारियों में धरती हरियाली और रंग-बिरंगे फूलों से सज गयी है।   सखी (दो): तुम गलत समझ रही हो सहेली, यह सजावट शरद ऋतु के स्वागत की नहीं, बल्कि चुनाव की तैयारियाँ हैं। जिसे तुम हरियाली और रंग-बिरंगे फूल समझ रही हो वे राजनीतिक पार्टियों के झंडे, बैनर, पोस्टर है। पगली ये चुनाव ऋतु है।   सखी (एक): पर देख, फूले काँस सकल महि छाये वर्षा...

कूड़ा नहीं ज़नाब, सोना कहिए सोना...!!!

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एक विज्ञापन की चर्चित पंचलाइन थी कि "जब घर में पड़ा है सोना, तो फिर काहे को रोना”, और आज लगभग यही स्थिति हमारे नगरों/महानगरों में की है क्योंकि वे भी हर दिन जमा हो रहे टनों की मात्रा में कचरा अर्थात सोना रखकर रो रहे हैं। इसका कारण शायद यह है कि या तो उनको ये नहीं पता कि उनके पास जो टनों कचरा है वह दरअसल में कूड़ा नहीं बल्कि कमाऊ सोना है और या फिर वे जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं? अब यह पढ़कर एक सवाल तो आपके दिमाग में भी आ रहा होगा कि बदबूदार/गन्दा और घर के बाहर फेंकने वाला कूड़ा आखिर सोना कैसे हो सकता है? इस पहेली को सुलझाकर आपका इस निबंध को आगे पढ़ने का उत्साह खत्म करने से पहले हम इस बात पर चर्चा करते हैं कि सही तरह से निपटान की व्यवस्था नहीं होने के कारण कैसे आज कचरा हमारे नगरों/महानगरों और गांवों के लिए संकट बन रहा है। दिल्ली में रहने वाले लोगों ने तो गाज़ियाबाद आते जाते समय अक्सर ही कचरे के पहाड़ देखे होंगे। ऊँचे-ऊँचे, प्राकृतिक पर्वत मालाओं को भी पीछे छोड़ते कूड़े के ढेर, उनसे निकलता ज़हरीला धुंआ और उस पर मंडराते चील-कौवे...ये पहाड़ शहर का सौन्दर्य बढ़ने के स्थान पर धब्बे की...

एक मुलाकात…फलों के राजा से!!

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आइए, आपको मिलवाते हैं फलों के राजा हिमाचल से…जहाँ फल केवल उत्पाद नहीं बल्कि गर्व हैं। शिमला की पहाड़ियों पर लाल-गुलाबी सेब किसी राजकुमार से कम नहीं हैं। किन्नौर का अखरोट इतना चटकदार जैसे फलों का सेनापति। कुल्लू की चेरी महारानी सी लजाती है तो आड़ू गालों पर लाली लिए किसी राजकुमारी सा लगता है। नाशपाती, खुबानी, आलू बुखारा, केला, जापानी फल, मशरूम और कीवी राजा के नवरत्नों में शामिल हैं। यहाँ की मिट्टी में हिमालय का गौरव घुला मिला है…हवा में बर्फ की शान है तो धूप इतनी नफ़ासत से पड़ती है कि हर फल ‘रॉयल’ और ‘डिलिशियस’ बन जाता है। इसलिए आप जब भी कोई फल खाओ और मुँह से वाह निकले, तो समझ जाइए कि  वह फलों के राजा के दरबार से आया है। हिमाचल प्रदेश को प्रकृति ने शिद्दत से संवारा और अपनी पूरी उदारता से नवाजा है। हिमालय की गोद में बसा यह प्रदेश केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही विख्यात नहीं है, बल्कि अपने विविध,लज़ीज़,रसीले और सेहत से भरपूर फलों के कारण भी प्रसिद्ध है इसलिए इसे भारत का फलों का टोकरा (Fruit Basket of India) भी कहा जाता है। यहाँ देश के सबसे स्वादिष्ट, रसीले और उच्च गुणवत्ता वाले फलो...