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गुरु पूर्णिमा विशेष: जब हर जेब में ‘ज्ञान’ है, तब ‘गुरु’ का क्या होगा!!

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  आज हर जेब में ज्ञान का भंडार है। एक समय वह था जब ज्ञान तक पहुँचने के लिए शिष्य को गुरु के पास जाना पड़ता था। अब समय ऐसा आ गया है कि मोबाइल के जरिए ज्ञान हर जेब तक पहुंच गया है। एक क्लिक पर लाखों पुस्तकें उपलब्ध हैं, हजारों व्याख्यान हैं, अनगिनत वीडियो हैं, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तो हर सवाल का उत्तर चुटकियों में देने को तैयार है। कुल मिलाकर इंटरनेट ने पूरी दुनिया को एक विशाल डिजिटल पुस्तकालय में बदल दिया है। ऐसे समय में प्रश्न उठता है कि क्या अब गुरु की आवश्यकता समाप्त हो रही है? गुरु पूर्णिमा का पर्व हमें इसी प्रश्न का सबसे सार्थक उत्तर देता है। दरअसल, ज्ञान और गुरु कभी एक-दूसरे के विकल्प नहीं रहे। ज्ञान सूचना दे सकता है, लेकिन गुरु दृष्टि देता है। इंटरनेट तथ्यों का महासागर है, लेकिन उस महासागर में कौन-सा मोती चुनना है, यह विवेक गुरु ही सिखाता है। आज की जेन जी (Gen Z) दुनिया की सबसे अधिक डिजिटल पीढ़ी है। उसके लिए मोबाइल सिर्फ़ फोन नहीं, बल्कि स्कूल, लाइब्रेरी, सिनेमा, बैंक, बाज़ार और मित्र सब कुछ है। वह किसी भी विषय पर कुछ ही सेकंड में जानकारी जुटा सकती है। लेकिन इस पीढ़ी के...

वास्तेगुना हुइंया नहीं है ‘पापा की परी’

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  पापा की परी' शब्द का असली अर्थ और सोशल मीडिया ने इसे कैसे बदल दिया ‘अरे, रहने दो... ये तो पापा की परी है!’ सोशल मीडिया पर यह वाक्य आजकल इतनी बार सुनाई देता है कि लगता है जैसे पापा की परी कोई रिश्ता नहीं, बल्कि मूर्खता का तमगा हो। अब स्थिति यह हो गई है कि सड़क पर किसी लड़की से छोटी-सी लापरवाही हुई या उसने किसी बात पर अधिकार जताया या कोई युवती  ज़्यादा भावुक हो गई या फिर उसने थोड़ा सा अपरिपक्व व्यवहार कर दिया…तुरंत ही कोई टिप्पणी आ जाएगी कि ‘पापा की परी है।’ लेकिन पापा की परी कोई ‘वास्तेगुना हुइंया’ नहीं है कि कहीं भी इस्तेमाल कर दिया। पापा की परी संबोधन में पिता का अथाह लाड़-प्यार, स्नेह, गर्व और सुरक्षा का भाव छिपा है जिसे आज इंटरनेट या सोशल मीडिया की भाषा में मूर्खता एवं नासमझी का प्रतीक बना दिया गया है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर पापा की परी जैसा स्नेहिल और आत्मीय संबोधन निगेटिव कैसे बन गया?  मैंने गूगल गुरु से लेकर AI के अक्लमंद चैटबॉट से भी पूछा लेकिन वे भी सही सही उत्तर नहीं दे पाए। दरअसल वास्तेगुना हुइंया जैसे भाषा के कई नए मुहावरों की तरह पापा की परी का अर्थ भी धीर...

न्यूज़ चैनल से नाराज़गी जायज़, पर ‘रिपोर्टर’ पर हमला क्यों?

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  जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए एक युवा आंदोलन की तस्वीरों ने एक असहज सवाल हमारे सामने खड़ा कर दिया। कुछ पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की हुई, कैमरे छीनने की कोशिश की गई और महिला पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार की घटनाएं भी सामने आईं। यह केवल किसी एक चैनल या एक आंदोलन का मामला नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग आंदोलनों, चुनावी रैलियों और संवेदनशील घटनाओं की कवरेज के दौरान भी ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं। यह मान लेना आसान है कि भीड़ किसी चैनल की संपादकीय नीति से नाराज़ थी। लेकिन मुश्किल सवाल यह है कि यदि नाराज़गी किसी चैनल से है तो उसका शिकार मैदान में खबर जुटाने वाला रिपोर्टर क्यों बने? वह कैमरापर्सन क्यों बने, जो घंटों धूप, बारिश और भीड़ के बीच केवल घटनाओं को रिकॉर्ड कर रहा है? और सबसे अधिक चिंता की बात यह कि महिला पत्रकारों को भी अभद्र टिप्पणियों और दुर्व्यवहार का सामना क्यों करना पड़े? मेरी नज़र में इस पूरे घटनाक्रम का एक डरावना और दूरगामी पक्ष भी है जो इन्हीं युवाओं से जुड़ा है, जिस पर शायद सबसे कम चर्चा हो रही है। देश के सैकड़ों विश्वविद्यालयों और मीडिया संस्थानों में हर साल हजा...

मौसम तो जीवन का आनंद है,आफ़त नहीं

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  मिट्टी के लोग: आधुनिक जीवन में प्रकृति से दूर होता इंसान बारिश.. केवल एक मौसम नहीं है । वह बच्चों की कागज़ की नाव है, पेड़ों की संजीवनी है, प्रकृति का श्रृंगार है, किसानों की उम्मीद है, प्रेमियों का संगीत और कवियों की सबसे प्रिय प्रेरणा है। पहले महीनों पहली फुहार का इंतज़ार होता था, उसके आते ही लोग घरों से बाहर निकल पड़ते थे लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। अब बारिश शुरू होते ही सबसे पहले छाता खुलता है, कार के शीशे चढ़ते हैं और कपड़ों/मोबाइल को बचाने की चिंता सताने लगती है। प्रकृति, जिसके साथ कभी हमारा आत्मीय रिश्ता था, आज सुविधाओं और कृत्रिम जीवनशैली के बीच पीछे छूटती जा रही है।  आमतौर पर हम जीवन की सहजता को अपने आसपास सोच की कंटीली बाड़ लगाकर जटिल बनाते जा रहे हैं। सोचिये, कितनी विचित्र बात है कि जिस बारिश के लिए किसान टकटकी लगाए रहता है, बच्चे घरों से भागकर गलियों में आ जाते थे, हम भी गर्मी से निपटने के लिए दिन रात मानसून की खबरों पर कान लगाए रहते हैं..आज उसी बारिश से बचने के लिए हम सबसे पहले छाता ढूंढ़ते हैं। महीनों तक मौसम के जिस अमृत का इंतज़ार किया, उसके आते ही हम उससे दूर...

मिलिए, इडली के भाई और मोमोज के मालदार मामा से...!!

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  यह गोल मटोल और धवल रंग से भरपूर व्यंजन सिड्डू है जो देखने में इडली का हट्टा-कट्टा भाई और मोमोज का मालदार मामा लगता है। सिड्डू दरअसल हिमाचल प्रदेश का एक पारंपरिक और लोकप्रिय व्यंजन है । इसे सिदु या सिद्दो भी कहा जाता है जबकि अंग्रेजी अंदाज में बोलने के कारण अब इसे सिड्डू भी पुकारा जाने लगा है। चूँकि, ब्रिटिश काल में शिमला अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी रही है इसलिए अंग्रेज भी इस गोलू-मोलू के मुरीद बने और यह जनाब सिद्दू से सिड्डू हो गए लेकिन एक बात बिलकुल साफ़ है कि इसका क्रिकेटर नवजोत सिंह ‘सिद्धू’ से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। सिद्दू/सिड्डू न केवल हिमाचल के ग्रामीण इलाकों में, बल्कि शहरी रेस्तरां और शिमला-मनाली जैसे पर्यटक स्थलों में भी लोकप्रिय है। यह हिमाचली थाली का अभिन्न हिस्सा है। बस, फर्क इतना है कि शिमला में सिद्दू अंडाकार बनता है तो ग्रामीण इलाकों में गोलाकार और कुल्लू में कुछ चपटा सा होता है। साधारण भाषा में समझने के लिए हम कह सकते हैं कि यह एक स्टीम्ड ब्रेड या बन है, जिसे गेहूं के आटे से बनाया जाता है और इसमें विभिन्न प्रकार की मसालेदार या मीठी स्टफिंग (भरावन) ...

मंडी की मंडियाली कचौरी..स्वाद और अंदाज, दोनों निराले

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  मंडी की प्रसिद्ध कचौरी: इतिहास, स्वाद  और हिमाचली पहचान यह फोटो देखकर सबसे पहले आपके दिमाग में कौन सा नाम या मुंह में कौन सा स्वाद आता है?..अगर आप हिंदी पट्टी से हैं तो निश्चित ही पूड़ी/पूरी कहेंगे और पंजाब-दिल्ली से हैं तो भटूरा..लेकिन न तो यह पूड़ी है और न ही भटूरा। यह कचौरी है..लेकिन आमतौर पर मिलने वाली कचौरियों की जमात से बिल्कुल अलग स्वाद,अंदाज, आकार वाली और दमदार इतनी कि हम जैसों के लिए एक ही दिनभर के लिए पर्याप्त है। यह है मंडी की ‘मंडियाली कचौरी’ । इसे हिमाचली व्यंजनों में "बेडुआं" (Beduon) के नाम से भी जाना जाता है। आकार और भरावन छोड़ दें तो इसे बेड़मी पूड़ी का मोटू पतलू टाइप रिश्तेदार कह सकते हैं। यह तो आप जानते ही होंगे कि मंडी हिमाचल प्रदेश का एक प्रमुख शहर है जिसे ‘छोटी काशी’ भी कहा जाता है। मंडी की यह कचौरी कोई साधारण कचौरी नहीं है बल्कि अब यहां की संस्कृति एवं पहचान है। पहली नज़र में यह भले ही अन्य शहरों की कचौरियों जैसी या बस थोड़ी बड़ी लगे लेकिन पहला कौर लेते ही इसका अलग स्वाद मुंह में घुल जाता है। बाहर से हल्की कुरकुरी, भीतर से नरम और उड़द की दाल तथा प...

‘इमोजी’…मतलब भाव ने भाषा की छुट्टी कर दी..!!

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 विश्व इमोजी दिवस यानी उन पीले-पीले गोल चेहरों का दिन, जिन्होंने दुनिया की हजारों भाषाओं को चुनौती दे दी है। यह दिन हाल ही में मनाया गया। जब दिन है तो उस पर चर्चा भी जरूरी है और इस विषय पर बातचीत तो इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि भाव पर आधारित ये चंद चित्रों ने भाषा की छुट्टी करने के लिए कमर कस ली है। कभी शब्दों के सहारे रिश्ते बनते थे, अब एक 😊, 😍, 😡 या 👍 तय कर देता है कि सामने वाला खुश है, नाराज़ है या केवल औपचारिकता निभा रहा है। किसी समय हम सभी चिट्ठी में लिखते थे  कि “प्रिय मित्र, तुम्हारा पत्र पाकर हृदय गदगद हो उठा।” आज इस भाव को एक ❤️ में समेट दिया गया है। कभी किसी की उपलब्धि पर हम खुलकर लिखते थे कि “हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ।” अब बस... 🎉👏और काम खत्म। अब तो ऐसा लगने लगा है कि भाषा पुस्तकों/शब्दकोश/अखबारों में कैद हो गई है और बातचीत इमोजी कीबोर्ड पर आ बसी है। सोशल मीडिया में तो बिना इमोजी के गुजारा ही नहीं है। सारा सुख-दुख बस चंद कार्टून नुमा चेहरों में सिमट गया है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इमोजी ने उम्र का, अनुभव का,रिश्तों का अंतर भी लगभग मिटा दिय...

हर बेटी के नाम... एक पिता का पत्र!!

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 प्रिय बेटी, पिछले कुछ दिनों से मन बहुत विचलित है। सोशल मीडिया पर हिमाचल की कुछ बेटियों का एक वीडियो वायरल है जिसमें वे कथित तौर पर नशे, बॉय फ्रेंड, सेक्स जैसे मुद्दों पर गाली-गलौज और मारपीट के बीच परस्पर आरोप प्रत्यारोप लगाते दिखाई दे रही हैं। यही क्यों, आजकल ऐसे वीडियो, किस्से, खबरें हर छोटे बड़े शहर में सामान्य बात हो गई है। मैं, यह बात भी सबसे पहले पूरीतरह स्पष्ट कर दूं कि यह पत्र किसी डर से नहीं लिख रहा हूं क्योंकि डर से लिखे गए पत्र रिश्तों में दीवारें खड़ी कर देते हैं। मैं यह पत्र विश्वास से लिख रहा हूँ। विश्वास ही वह धागा है जो पिता और बेटी के रिश्ते को सबसे मज़बूती से बाँधता है। अरे हाँ, तुमने भी तो बताया था कि कुछ दिन पहले ही तुम्हारे पड़ोस में ऐसी ही कुछ लड़कियों रहने आई थी जो वीडियो वाली लड़कियों जैसी ही हरकत करती थीं। हालांकि तुम्हारे लैंडलॉर्ड ने उन्हें एक ही दिन में बाहर का रास्ता दिखाकर मिसाल कायम की थी। वैसे भी, ये वीडियो सोलन या किसी और शहर का है। फिर भी, एक जिम्मेदार पिता के नाते मुझे लगा कि क्यों न तुम्हारे जरिए तमाम बेटियों को समझाया जाए और उनके माता पिता के दर्...

प्रेम में डूबी एक अल्हड़ प्रेयसी और दूसरी परिपक्व संगिनी..!!

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  …ऐसा लग रहा था जैसे किसी खूबसूरत श्वेत-वसना अल्हड़ युवती ने अपने गले में हीरे-मोतियों का अनुपम हार धारण कर लिया हो और वह अपने प्रेमी की अनंत प्रतीक्षा में बाँहें फैलाकर आतुरता से ताका झांकी कर रही है क्योंकि पहाड़ों के गोल गोल रास्ते बार बार एक ही दृश्य हमारे सामने लाते रहते हैं। बस, इस दृश्य से हमारी दूरी कुछ कम ज्यादा होती रहती है।  धर्मशाला से मैकलोडगंज के लिए चढ़ते हुए आप कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं जैसे पहाड़ झांक झांक कर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। यहां बर्फ को हम श्वेतवासना युवती की पवित्रता और रोशनियों को उसकी मुस्कान कह सकते हैं। अपने प्रेमी (पर्यटक) के इंतजार में हर रात वह स्वयं को इस तरह के मनमोहक श्रृंगार से सजाती है। दरअसल, जब हम धर्मशाला से मैकलोडगंज की ओर बढ़ रहे थे तब तक सूरज ढल चुका था और चांद की शह पाकर धौलाधार की ऊँची चोटियों पर बिछी बर्फ की सफेद चादर चांदी सी दमक रही थी और उसके नीचे मैकलोडगंज शहर की असंख्य रोशनियाँ जगमगा रहीं थीं।  मैकलोडगंज के ठीक नीचे करीब 10 किमी की दूरी पर धर्मशाला है। जीवन के अनुभवों से समृद्ध, आत्मविश्वास से भरी, एक परिपक्व पत्नी की...

कुछ लोग उम्र नहीं बढ़ाते… वे जीवन को बड़ा कर देते हैं।

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कुछ रिश्ते जितने कम बोले जाएँ, उतने ही अधिक महसूस किए जाते हैं लेकिन जीवन में कुछ अवसर ऐसे भी आते हैं, जब मन की कृतज्ञता शब्दों का सहारा मांग ही लेती है। आज ऐसा ही एक दिन है। आज मनीषा जी का 51वाँ जन्मदिन है—जीवन के स्वर्ण जयंती वर्ष के बाद का पहला पड़ाव। यह पड़ाव केवल कैलेंडर के पन्नों पर जुड़ी एक संख्या नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, त्याग, धैर्य और अपनत्व से रचे गए अनगिनत अध्यायों का उत्सव है। लगभग 26 वर्षों के हमारे साथ में, मैंने एक बात बहुत गहराई से समझी है कि किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से बनती है..और यदि मुझे मनीषा जी को एक ही वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं बस इतना कहूँगा—वे उन दुर्लभ लोगों में हैं जो स्वयं से अधिक दूसरों की खुशियों में जीते हैं। कई लोग अच्छे होते हैं, कई लोग सज्जन भी होते हैं, लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिनके मन में किसी के लिए ईर्ष्या, द्वेष या कटुता का स्थान ही नहीं होता। मनीषा जी उन्हीं विरले लोगों में से हैं। किसी के सुख में प्रसन्न होना, किसी की परेशानी में बिना बुलाए साथ खड़े हो जाना, किसी की छोटी-सी उपलब्धि ...

विदाई से पुनर्मिलन तक का एक साल: वही जगह/वही साथी/वही तारीख…अद्भुत

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27 जून 2025…आकाशवाणी भोपाल के हमारे ग्रुप ‘न्यूजरूम’ में उस दिन हल्की सी उदासी और ढेर सारा प्यार था। कारण यह था कि बीते सात वर्षों से रोज़ की खबरों की दुनिया में मेरे मेरे  अभिन्न साथी मुझे विदाई दे रहे थे। दरअसल,माइक, हेडफोन, न्यूज डेस्क और उन अनगिनत यादों को पीछे छोड़कर मेरा तबादला पीआईबी शिमला हो गया था।  उस दिन भोपाल के एमपी नगर में ‘जश्न ए पैराडाइज’ होटल में विदाई- सह - मेलमिलाप कार्यक्रम रखा गया था। हँसी-मज़ाक के बीच हमारी आँखें नम हो रही थीं। भोपाल ने मुझे बहुत कुछ दिया था — अनुभव, दोस्ती, न्यूजरूम परिवार और आकाशवाणी की वह गर्मजोशी, जो कभी नहीं भूली जा सकती।  ठीक एक साल बाद, 27 जून 2026 को वही तारीख, वही होटल जश्न ए पैराडाइज। इस बार माहौल पूरी तरह उत्साह से भरा था। आकाशवाणी भोपाल के न्यूजरूम के साथी फिर से एकत्र हुए । वही, हमारा गैट टूगेदर का कार्यक्रम था। पुरानी यादें ताज़ा हुईं, हँसी के ठहाके गूँजे और हमारी खबरों की दुनिया के रोचक किस्से दोहराए गए। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि जिस दिन विदाई हुई थी, उसी दिन एक साल बाद पुनर्मिलन हो गया.. यह संयोग कितना अद्भुत है ।...

मौसम मौसम... लवली मौसम..."

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अस्सी के दौर की लोकप्रिय फिल्म थोड़ी सी बेवफाई फिल्म का प्रसिद्ध गीत "मौसम मौसम... लवली मौसम..." लिखते समय गुलज़ार साहब निश्चित ही शिमला या ऐसे ही किसी पहाड़ी इलाके से गुजरे होंगे क्योंकि मौसम को महसूस किए बिना उसे शब्दों में उतारना तभी संभव है जब आपने उसका पूरा लुत्फ़ उठाया हो । बहरहाल, यह गीत इन दिनों शिमला की फिज़ाओं पर बिल्कुल सटीक बैठता है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं इस गीत की लय पर झूम रही हो।  मानसून की आहट के साथ पहाड़ों की रानी शिमला ने एक बार फिर अपने सौंदर्य का नया ही रूप दिखा दिया है। बादलों की सफेद चादर कभी आसमान छूती पहाड़ियों को पूरी तरह ढक लेती है, तो अगले ही पल युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी के अंदाज़ में हवा का एक जोरदार झोंका बादलों को हटाकर देवदार के ऊँचे वृक्षों और दूर तक फैली हरियाली की झलक दिखा देता है। कभी नीचे से ऊपर उठती धुंध सब कुछ ढक लेती है। यह आँख-मिचौली दिनभर चलती है और इतनी मनमोहक होती है कि हर देखने वाला कुछ पल के लिए ठहर जाता है। इन दिनों शिमला की सुबह धुंध की चादर में लिपटी हुई होती हैं।  बिल्कुल वैसे ही जैसे 'राम तेरी गंगा मैली' म...

भोपाल की जामुन,शिमला की जामुन..कुछ स्वाद खरीदे नहीं जाते!!

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बरसात का अपना एक संस्कार होता है..इस दौरान केवल बादल आकर बरसते भर नहीं हैं बल्कि वे प्रकृति की पूरी रंगत बदल देते हैं, मिट्टी की मनमोहक सुगंध वातावरण में बिखर जाती है और मन के भीतर बारिश से जुड़ी सालों पुरानी यादें दस्तक देने लगती हैं। बारिश में किसी की यादों में चटपटे पकौड़े उभरते होंगे तो किसी के लिए भुट्टे परंतु मेरी यादों में अब सबसे ज्यादा जामुन का पेड़ शामिल हैं। इन्हीं दिनों जब जब बाज़ार में जामुन दिखाई देती है, मन अनायास ही भोपाल की ओर लौट जाता है—आकाशवाणी कॉलोनी के उस सरकारी आवास की ओर, जहाँ एक जामुन का पेड़ हमारे जीवन का मौन लेकिन सबसे लोकप्रिय सदस्य हुआ करता था। वह पेड़ पता नहीं किसने रोपा था या अपने आप पल बढ़ गया था क्योंकि हमारे इससे रिश्ते तब बने जब हम दोनों उम्र की परिपक्व दहलीज पर खड़े थे। फिर क्या था यह साल दर साल हमारे जीवन की मीठी स्मृतियों का हिस्सा बनता गया और कई अनजान परिवारों से मधुर संबंधों का आधार भी। वह हमारे हर अच्छे बुरे दिनों का साथी था, मौसमों का कथाकार और उदारता का जीवंत पाठ । बरसात शुरू होते ही उसकी शाखाएँ फलों से लद जाती थीं। पहले फूल आते,फिर नन्हें फल ,...

‘माखन के लाल’ किताब नहीं, बल्कि अदरक इलायची वाली चाय है!!

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यह किताब नहीं, अनुभवी हाथों से बनी कड़क चाय है.. इसमें संघर्ष के अदरक का स्वाद है तो उपलब्धियों की इलायची की खुशबू भी है। इसमें विद्यार्थियों के चायपत्ती जैसे अनुभव के सुनहरे रंग हैं तो चीनी की मिठास भी। वैसे भी, माखन के हम पहले बैच वाले ‘लालों’ से लेकर बाद के कई बैच तक की जिंदगी के कई अहम पड़ाव यहां मौजूद चाय की टपरी पर ही तय हुए थे।  हम बात कर रहे हैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा अपने 50 से ज्यादा पूर्व विद्यार्थियों की अनुभव-गाथाओं पर केंद्रित पुस्तक ‘माखन के लाल’ की। अपने अपने क्षेत्र के महारथी इन छात्रों के अनुभवों की पूंजी से भरा यह एक ऐसा खजाना है, जिसका फायदा हर आने वाली पीढ़ी को मिलता रहेगा। इसमें मुझे भी अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिला है। यह कोई साधारण स्मृति-संग्रह नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज़ है जो पत्रकारिता के सपने देखने वाले हर युवा को सिखाता है कि सफलता का रास्ता कितना कठिन, रोमांचक और प्रेरणादायी हो सकता है।  पुस्तक पढ़ते हुए लगता है जैसे पुराने दोस्त उसी चाय की टपरी पर पर एक बार फिर चाय की चुस्कियों के साथ अ...

मलाई बरफ: कतरा-कतरा स्वाद का पहाड़ी जादू

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  छह घंटे की लगातार मेहनत और डेढ़ घंटे में खेल खत्म। वैसे, हवा न लगे तो इसका जीवन करीब नौ घंटे का है लेकिन हवा लगी कि यह छुई मुई की तरह लजाकर पानी पानी हो जाती है। सबसे खास बात कि इसमें न तो कृत्रिम मलाई है और न ही बरफ..फिर भी नाम है मलाई बरफ और स्वाद ऐसा की आप पत्ता चाटते रह जाओगे। जी हां, पत्ता क्योंकि इसे पत्ते में ही दिया जाता है और पत्ते से ही खाया जाता है। हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश की मशहूर और पारंपरिक ‘मलाई बरफ’ की। यह ऐसी अनूठी आइसक्रीम है जिसमें न तो बर्फ़ के एक भी टुकड़े का इस्तेमाल होता है और न ही फ्रिज/फ्रीजर जैसी किसी मशीन की जरूरत पड़ती है लेकिन फिर भी यह इतनी ठंडी एवं मजबूती से जमी रहती है कि आप आराम से इसका एक एक टुकड़ा मुँह में घोलते हुए जीभ पर इसके स्वाद का कतरा कतरा महसूस कर सकते हैं। आमतौर पर आइसक्रीम का ख़्याल जेहन में आते ही फ्रीजर, बर्फ और रंग-बिरंगे कोन/कप की तस्वीर ही उभरती है लेकिन हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों की यह एक ऐसी पारंपरिक आइसक्रीम है, जो न बर्फ से बनती है और न मशीन से  बल्कि इसे बनाने के लिए बस दूध, आग और धैर्य की जरूरत पड़ती है। देखने में,...