शनिवार, 16 सितंबर 2017

कड़क चाय नहीं, सफ़ेद चाय पीजिए जनाब !!




सफ़ेद चाय...और कीमत तक़रीबन 12 हजार रुपए किलो !!! हाल ही में  अरुणाचल प्रदेश के पूर्व सियांग जिले में स्थित डोनी पोलो चाय बागान की  सफेद चाय को 12,001 रुपये प्रति किग्रा कीमत मिली। यह तमाम प्रकार की  चायों के लिए सबसे ज्यादा कीमत है। असम के गुवाहाटी  स्थित टी नीलामी केंद्र (जीटीएसी) में पहली बार शुरू हुई सफेद चाय की नीलामी  में इस नई नवेली चाय ने सबसे ज्यादा कीमत हासिल कर यहां के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। मजे की बात तो यह है कि डोनी पोलो उद्यान  के पास भी बिक्री के लिए केवल 5.7किलोग्राम चाय थी और वह भी हाथों हाथ बिक गयी। वह भी तब, जब भारत में सफेद चाय बनाने वाले सबसे अच्छे उद्यान दार्जिलिंग के माने जाते  हैं।
हम यहाँ  ज्यादा दूध और कम पत्ती डालकर बनायीं गयी सफ़ेद चाय की बात नहीं कर रहें है बल्कि हम उस चाय की बात कर रहे हैं जो उत्पादन के स्तर पर ही सफ़ेद चाय कहलाती है । मेरी तरह ही बहुत लोगों कोसफ़ेद चाय सुनकर आश्चर्य होगा। वैसे चाय हमारे देश में किसी पहचान की मोहताज की नहीं है बल्कि यह तोघर-घर की पहचान है मसलन दूध वाली चाय,अदरक-इलायची वाली चाय, मसाला चाय,कट चाय और यदिआप पूर्वोत्तर में हैं तो यहाँ की लोकप्रिय लाल चाय, लिम्बू चाय( नींबू वाली चाय) और इसीतरह की तमामअन्य किस्मों/स्वादों वाली चाय।तो फिर ये जानना लाज़मी है कि आखिर ये सफ़ेद चाय है क्या बला?
सफेद चाय दरअसल में चाय की कई शैलियों में से एक है, जिन्हें हम ताज़ा या कम प्रसंस्कृत पत्तियां कह सकते है। ऐसा माना जाता है कि चाय की कलियों और नई पत्तियों के आसपास सफ़ेद रोएं/रेशे जैसी संरचनाएं होती हैं जो इस चाय के उत्पादन में अहम् भूमिका निभाती हैं इसलिए इसका नाम सफ़ेद चाय पड़ गया।
सफेद चाय को लेकर दुनिया में कोई एक राय या सर्वमान्य परिभाषा अब तक तय नहीं हुई है ।कुछ जगह इसे कम प्रसंस्करण के साथ सुखाई गईं पत्तियां माना जाता है तो कहीं कलियों से बनाई गई चाय और कहीं अपरिपक्व चाय की पत्तियों से कुछ तैयार चाय।
हाँ,इस बात से सभी सहमत हैं कि सफेद चाय का न तो ऑक्सीकरण किया जाता है और न ही इसकी पत्तियों को कूटा-पीटा जाता है इसके परिणामस्वरूप इस चाय का स्वाद और रंग-रूप अपनी बिरादरी की हरी या पारंपरिक काली चाय की तुलना में  हल्का होता है ।
‘गूगल गुरु’ पर छानबीन के दौरान पता चला कि चीन में सोंग वंश (960-1279 एडी) के शासन के दौरान सफेद चाय की खोज की गई और इसे सबसे नाजुक चाय किस्मों में से एक माना जाता है क्योंकि यह कम से कम प्रसंस्कृत होती है। वहां पौधों के पत्तों को पूरी तरह से सफेद बाल द्वारा कवर की गई ताज़ा कली के साथ पूरी तरह से फूलने से पहले  काट लिया जाता था । उस समयआम लोगों को सफेद चाय पीने की इजाजत नहीं थी क्योंकि यह विशेष रूप से सम्राट और उनके दरबारियों के लिए तैयार की जाती थी। वैसे इस चाय की कीमत को देखते हुए आज भी आम लोग इसे पीने के बारे में सोच भी नहीं सकते  
वहीं,कुछ दस्तावेजों में सफ़ेद चाय का उल्लेख 18 वीं सदी के दरम्यान मिलता है लेकिन तब इसे आज के नाम और खूबियों से नहीं जाना जाता था। यह खास चाय मुख्य रूप से चीन के फ़ुज़ियान प्रांत में पैदा होती है, लेकिन अब भारत, ताइवान, थाईलैंड, श्रीलंका और नेपाल में भी इसका उत्पादन शुरू हो गया है।
फिर सवाल वही उठता है कि आखिर ऐसा क्या है इस सफ़ेद चाय में जिसने इसे चाय की महारानी बना दिया है ? इस चाय की अंधाधुंध कीमत का राज़ इसकी खूबियों में ही छिपा है। हम इसे ‘संजीवनी चाय’ या हर मर्ज का इलाज़ भी कह सकते हैं। सफ़ेद चाय हर स्थिति में लाभकारी है चाहे फिर बात वजन घटाने की हो या फिर फिर चेहरे से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता जैसी इच्छा की। यह कैंसर,मधुमेह, रक्तचाप,समय से पहले बुढ़ापे की रोकथाम,पाचन तंत्र को मजबूत करने,दांत-त्वचा को चमकदार बनाने ,वजन घटाने सहित कई मामलों में रामबाण मानी जाती है। मतलब बस एक कप सफ़ेद चाय और सभी शारीरिक परेशानियों की छुट्टी 
@assamtea  @tea  @whitetea  @google @china 

शनिवार, 3 जून 2017

बिना पंखों के शिखर छूती प्रतिभाएं

प्रतिभाएं कभी सुविधाओं की मोहताज नहीं होती बल्कि वे अवसरों का इंतज़ार करती हैं ताकि वक्त की कसौटी पर स्वयं को कस सकें. असम बोर्ड की इस बार की परीक्षाओं में कई ऐसे मेधावी छात्रों ने अपने परिश्रम का लोहा मनवाया है जिनके घर में पढाई का खर्च निकालना तो दूर, दो वक्त के खाने के भी लाले पड़े रहते हैं. 

सिलचर के राज सरकार के पास रंग और ब्रश खरीदने के पैसे नहीं हैं फिर भी उसने फाइन आर्ट्स में पूरे राज्य में अव्वल स्थान हासिल किया है. राज को 100 में से 100 अंक मिले हैं. आलम यह है कि उसके स्कूल में इस विषय को पढ़ाने-सिखाने वाले शिक्षक तक नहीं है और उसके माता-पिता भी दैनिक मजदूर हैं इसलिए घर में इस कला को समझने वाला कोई नहीं है लेकिन एकलव्य की तरह साधना करते हुए राज ने अपने परिश्रम से ऐसा मुकाम हासिल कर लिया है अब राज्य सरकार से लेकर कई स्थानीय संस्थाएं भी उसकी मदद को आगे आ रही हैं.

राजदीप दास की कहानी तो और भी पीड़ादायक है. बचपन से ही पोलियो के कारण वह चल फिर नहीं सकता था लेकिन पढाई के प्रति लगन देखकर उसके पिता प्रतिदिन गोद में लेकर स्कूल आते थे. ऐन परीक्षा के पहले उसके दाहिने हाथ ने भी काम करना बंद कर दिया. रिक्शा चालक पिता की हैसियत इतनी नहीं थी कि तुरंत इलाज करा सकें. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी राजदीप ने पढाई नहीं छोड़ी और उसने बोर्ड परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर परिवार और स्कूल का नाम रोशन कर दिया. अनपढ़ माता पिता के लिए तो अपने दिव्यांग बेटे की यह सफलता मेरिट लिस्ट में पहला स्थान पाने जैसी है. अब राजदीप प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए बड़ा अधिकारी बनकर न केवल अपने परिवार के आर्थिक संकट को दूर करना चाहता है बल्कि अन्य बच्चों के लिए भी आदर्श बनना चाहता है.  

मजदूर परिवार की दायिता पुष्पा की कहानी तो और भी अनूठी है. असम बोर्ड के 12वीं के नतीजों में उसे फेल दिखाया गया था। छात्रा और उसके स्कूल ने जब बोर्ड से इस संबंध में बात की तो पता चला कि वह फेल नहीं, बल्कि उसने टॉप टेन में शामिल है।

दरअसल बोर्ड की गफलत के चलते दायिता को एक विषय में अनुपस्थित मानकर फेल कर दिया गया । जांच में पता चला कि छात्रा अनुपस्थित नहीं थी बल्कि गलती से उसके अंक जुड़ नहीं पाए थे। बोर्ड ने अपनी गलती मानते हुए तत्काल ही उसका संशोधित रिजल्ट घोषित करते हुए बताया कि दायिता पुष्पा ने टॉप टेन में सातवां स्थान हासिल किया है। उसे कुल 500 में 471 अंक मिले हैं।


लिंटन नामसुद्र, अमन कुर्मी,विक्रम सूत्रधार जैसे कई नाम हैं जिन्होंने इस वर्ष गरीबी, स्कूल से दूरी, संसाधनों का अभाव जैसी तमाम प्रतिकूल स्थितियों में भी अपनी मेहनत से साबित कर दिया है कि यदि किसी भी काम को करने की लगन और उत्साह हो तो सफलता की राह कोई नहीं रोक सकता. 

#result #divyang  #fine arts   

रविवार, 12 मार्च 2017

अब नहीं सुनाई देगी ‘बाउल’ के बाज़ीगर की मखमली आवाज़

ढपली, ढोलक और डुगडुगी जैसे वाद्ययंत्र तो बंगाल की प्रसिद्ध लोकशैली ‘बाउल’ में अब भी अपनी मौजूदगी उतनी ही शिद्दत से दर्ज कराएँगे लेकिन शायद उनमें वो चिर-परिचित तान/खनक और जोश नहीं होगा क्योंकि लोक संगीत ‘बाउल’ के बाज़ीगर कालिका प्रसाद भट्टाचार्य की मखमली आवाज़ जो अब हमारे बीच नहीं होगी।
बंगाल के मशहूर लोक गीत गायक कालिका प्रसाद भट्टाचार्य का 7 मार्च 2017 को पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर एक्सप्रेस वे पर एक सड़क हादसे में निधन हो गया था। वे अपने बैंड "दोहार" के सदस्यों के साथ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में पेश करने जा रहे थे। कालिका प्रसाद की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया था।
गायक एवं संगीतकार शांतनु मोइत्रा ने भट्टाचार्य के निधन पर दुख व्यक्त करते हुए कहा था, ‘‘ मैं चाहता हूं कि यह खबर गलत हो।'' वहीँ,संगीतकार देबोज्योति मिश्रा ने कहा, ‘‘ बंगाली संगीत में नए लोक तत्वों को शामिल करने का श्रेय उन्हें ही जाता है और जब भी मैं उनसे मिलता था उनकी रचनात्मक सोच मुझे स्तब्ध कर देती थी।''
ऐसा नहीं है कि असम के सिलचर में जन्मे कालिका प्रसाद से पहले बाउल लोकप्रिय नहीं था या अब इसे गाने वाले नहीं बचे हैं लेकिन बाउल को जीने वाले और लोक संगीत को अपनी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बनाने वाला जरुर चला गया है। कालिका प्रसाद ने हमेशा ही लोक संगीत के साथ अद्भुत प्रयोग किए हैं। उन्होंने फ्यूजन से लेकर गुमनाम वाद्य यंत्रों को खोज निकालने और फिर उनका बाउल में बखूबी इस्तेमाल करने जैसे अनेक अविस्मरणीय काम किए हैं। यही कारण है कि उनकी टीम ‘दोहार’ के प्रदर्शन का लोगों को इंतज़ार रहता था और कालिका प्रसाद भी अपने चाहने वालों को विविधता के मामले में कभी निराशा नहीं करते थे इसलिए नागालैंड के ‘ताती’ से लेकर मिज़ोरम के ‘खुआंग’ तक और त्रिपुरा के ‘सारिन्दा’ से लेकर मणिपुर के ‘पेना’ जैसे वाद्य यंत्र तक उनके इशारों पर नाचते थे। जब वे तल्लीन होकर बाउल में खो जाते थे तो उनके साथ दर्शक भी लय-ताल मिलाने लगते थे।  
कालिका प्रसाद दरअसल ‘अध्येता-गायक’ थे। वे केवल लोकगीत नहीं ढूंढते थे बल्कि उसकी उत्पत्ति, उसमें शुमार शब्दों के अर्थ और लोक संस्कृति में उस गीत के महत्व तक का अध्ययन करते थे। तभी तो उन्हें बंगाली लोक संगीत का ‘एनसाइक्लोपीडिया’ कहा जाता है। टीवी चैनलों पर आने वाले संगीत कार्यक्रमों में उनके इस लोक-ज्ञान से आए दिन नए गायकों और आयोजकों को रूबरू होने का अवसर मिलता रहता था। कालिका प्रसाद के पास भारत से लेकर बंगलादेश देश तक की स्थानीय जीवन शैली से जुड़े 6000 से ज्यादा गीतों का शोधपरक संग्रह था। उन्होंने जत्तीश्वर' (2014), ‘मोनोर मानूष' (2010) और बहुबन माझी' (2017) जैसी फिल्मों में न केवल गीत गाए हैं बल्कि अभिनय भी किया है।
 उनके करीबी लोग जानते हैं कि ‘दोहार’ कलिका प्रसाद के लिए एक लोक गायन समूह भर नहीं था बल्कि उनका सपना था जहाँ वे लोक संगीत की अपनी अलग दुनिया रचते थे और फिर उसमें संगीत रसिकों को शामिल कर उन्हें भाव-विभोर कर देते थे। बांग्ला भाषा के शब्द ‘दोहार’ का मतलब होता है दोहराना जैसे भजन मण्डली में समूह के अन्य सदस्य अपने मुख्य गायक की लाइन दोहराते हैं। जब सड़क दुर्घटना हुई तो उनके साथ ‘दोहार’ के बाकी सदस्य भी थे और बिल्कुल इस ग्रुप की गायन शैली के अंदाज़ में उन सभी ने इस दुर्घटना का एक साथ सामना किया। कालिका तो नहीं रहे परन्तु उनके अन्य साथियों की हालत भी गंभीर हैं जैसे कह रहे हैं कि कालिका तुम जो करोगे हम भी उसका अनुशरण करेंगे। 
कालिका प्रसाद का एक लोकप्रिय गीत है-“तोरे रीत माझारे राखवो छेड़े देवो न..”, इसका तात्पर्य है कि ‘मैं तुम्हें सदैव अपने दिल में रखूँगा कभी भूलूंगा नहीं’, परन्तु कालिका के चाहने वालों को शायद यह पता नहीं था कि यह केवल गीत नहीं बल्कि हक़ीकत है। अब उन्हें कालिका को अपने दिल में सहेज कर रखना होगा और उनके गीतों में जिंदा रखना होगा क्योंकि वे तो अपना वादा तोड़कर चले गए-सबसे दूर..बहुत दूर।   



शुक्रवार, 10 मार्च 2017

किगाली से सीखिए सफाई क्या होती है..!!!

My visit to Rwanda-Uganda with Vice President: Three 
हमारे देश में भले ही आज भी एक बड़ा वर्ग सरकार के स्वच्छता अभियान को बेमन से स्वीकार कर सफाई के नाम पर ढकोसला कर रहा हो लेकिन पूर्वी अफ़्रीकी देश रवांडा में सफाई ढकोसला नहीं दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा है और हर महीने के आखिरी शनिवार को यह साफ़ नजर भी आता है जब पूरा देश अनिवार्य रूप से साफ़-सफाई में जुट जाता है. रवांडा में 18 साल से लेकर 65 साल तक के हर महिला-पुरुष को सफाई अभियान में शामिल होना अनिवार्य है वरना उसे कठोर सज़ा का सामना करना पड़ता है. यहाँ तक की रवांडा के राष्ट्रपति से लेकर हर आम-ओ-खास को स्वच्छता अभियान में अनिवार्य रूप से शामिल होना पड़ता है तथा वह भी तस्वीर भर खिंचाने के लिए नहीं बल्कि वास्तविक सफाई के लिए और यह रवांडा के हर गली-कूंचे की सफाई को देखकर समझा जा सकता है. यही वजह है कि रवांडा की राजधानी किगाली को अफ्रीका के सबसे साफ़-सुथरे और सुरक्षित शहर का तमगा हासिल है
एक और बात, यहाँ 2008 से किसी भी तरह के प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध है और यह कोई दिखावटी प्रतिबन्ध नहीं है बल्कि इस पर कड़ाई से अमल होता है. नियम तोड़ने वालों के लिए 150 डालर तक का जुर्माना है. रवांडा की मुद्रा यानि रवांडन फ्रेंक में यह राशि करीब 1 लाख 24 हजार फ्रेंक होती है. यह जुर्माना तो प्लास्टिक का इस्तेमाल करने वालों के लिए है लेकिन यदि किसी दुकानदार ने आपको प्लास्टिक के बैग में सामान दे दिया तो समझो वह गया 6 माह से लेकर एक साल तक के लिए जेल. यही कारण है कि यहाँ माल से लेकर मामूली दुकान तक प्लास्टिक का कोई नामलेवा नहीं मिलता और बाहर से आने वाले हम जैसे पर्यटकों को गाइड या होटल संचालक पहले ही आगाह कर देते हैं कि आप अपने साथ लाये प्लास्टिक के बैग बाहर लेकर मत निकलिए.
शायद यही कारण है कि कभी दुनिया के सबसे बड़े नरसंहार (Rwandan Genocide) के लिए बदनाम यह देश आज ‘हंड्रेड्स आफ माउन्टेन्स एंड मिलियंस आफ स्माइल’ अर्थात सैकड़ों पर्वतों और लाखों मुस्कराहटों वाला देश कहलाता है.....शायद हम रवांडा से कुछ सीख पाएं!!!


बुधवार, 8 मार्च 2017

युगांडा का जिंजा शहर : जहां बसते है गांधी जी के प्राण

  My Rwanda-Uganda visit with Vice President: One       जैसा कि आप सभी जानते ही हैं कि मुझे उपराष्ट्रपति श्री मो हामिद अंसारी जी के साथ 19-23 फरवरी 2017 तक अफ्रीकी देशों Rwanda और Uganda की यात्रा का सुअवसर मिला।मैं प्रयास करूंगा कि इस यात्रा के किस्सों, इन देशों की खूबसूरती एवं खूबियों से आपको रूबरू कराऊं।फिलहाल शुरुआत जिंजा में महात्मा गांधी की प्रतिमा से।नील नदी के उद्गम स्थल पर 1997 से स्थापित यह प्रतिमा यहां भारतीयता के साथ साथ शांति और सद्भाव की भी परिचायक है। यहां इसकी देखभाल की जिम्मेदारी बैंक आफ बड़ौदा ने संभाल रखी है। खास बात यह है कि यहीं नील नदी के उद्गम स्थल पर महात्मा गांधी की इच्छा के मुताबिक उनकी अस्थियां भीं विसर्जित की गई थी। जिंजा, राजधानी कंपाला से करीब 81किमी दूर है और भारतीय लोगों का गढ़ है। यहां के सबसे धनी लोगों में माधवानी समूह(अभिनेत्री मुमताज वाला),जय मेहता (मिस्टर जूही चावला) और रूपारेलिया समूह है जो तीनों भारतीय हैं।
   #Uganda #Nile #MahatmaGandhi #Jinja #Vicepresident #Mehtagroup #MadhvaniGroup #RupareliaGroup
#HamidAnsari


स्टेट हाउस यानि युगांडा में सत्ता का शक्तिशाली गढ़

                                 
My Rwanda-Uganda visit with Vice President: Two        ये है युगांडा के राष्ट्रपति का आधिकारिक निवास यानि स्टेट हाउस (State House) या राष्ट्रपति भवन...वैसा ही जैसा दिल्ली में हमारा राष्ट्रपति भवन है या फिर अमेरिका का व्हाइट हाउस. राजधानी कम्पाला(Kampala) से लगभग 37 किलोमीटर दूर एंटेबे (Entebbe) शहर में बना यह स्टेट हाउस तक़रीबन साढ़े 17 हजार वर्गमीटर में फैला है. अन्य देशों से आने वाले मेहमानों का स्वागत यहीं किया जाता है. हाल ही में 22-23 फरवरी के दौरान हमारे उपराष्ट्रपति श्री मो हामिद अंसारी युगांडा गए थे हमें भी इस स्टेट हाउस को अन्दर से देखने का मौका मिला. इस झक सफेद इमारत का निर्माण हमारे राष्ट्रपति भवन (पहले वाइसराय भवन) की तरह ब्रिटिश हुकूमत ने कराया था. तब एंटेबे  ही युगांडा की राजधानी थी. युगांडा को 1966 में आज़ादी मिली और तब से यह यहाँ के राष्ट्रपति का स्थायी आवास और सत्ता का आधिकारिक केंद्र है. चूँकि एंटेबे में ही युगांडा का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है इसलिए कम्पाला के राजधानी बनने के बाद भी एंटेबे शहर का महत्व बना हुआ है. वैसे युगांडा में एक से ज्यादा स्टेट हाउस हैं लेकिन फिलहाल सत्ता की धुरी यही भवन है.

युगांडा के प्रथम राष्ट्रपति सर एडवर्ड मुतिसा (Sir Edward Muteesa) ने यहाँ रहना पसंद नहीं किया क्योंकि वे अपने महलों का मोह नहीं छोड़ पाए. इसीतरह युगांडा के सबसे चर्चित राष्ट्रपति ईदी अमीन (Idi Amin) ने भी 1971 की शुरुआत में तो इसका इस्तेमाल किया लेकिन बाद सुरक्षा के लिहाज से वे भी 1976 में इस सरकारी आवास को छोड़कर चले गए. बाद के राष्ट्रपतियों ने भी स्टेट हाउस की उतनी कद्र नहीं की लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति योवेरी के मुसेवनी (Yoweri K Museveni) ने न केवल इसको अपना आधिकारिक आवास बनाया बल्कि इसकी साज-संवार भी की. स्टेट हाउस को महज 1584 वर्गमीटर से बढ़ाकर साढ़े 17 हजार वर्गमीटर तक फैलाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है. यहाँ के सम्मलेन कक्ष में एक साथ 500 मेहमान बैठ सकते हैं. इसके अलावा, स्टेट हाउस परिसर में प्रथम महिला (First Lady) का निवास, राष्ट्रपति के सलाहकारों के घर, सुरक्षा भवन, संचार भवन, कई सम्मलेन कक्ष, अतिथि कक्ष, मनोरंजन कक्ष और हेल्थ क्लब भी है. यह खूबसूरत भवन अब युगांडा की पहचान और सत्ता का प्रतीक है. स्टेट हाउस हमारे उपराष्ट्रपति के अलावा ब्रिटेन की महारानी सहित कई दिग्गजों की मेजबानी कर चुका है.

#Uganda  #VicePresidentvisit  #StateHouse  #Kampala   #Entebbe  #Yoweri K Museveni   #PresidentHouse #HamidAnsari


गुरुवार, 24 नवंबर 2016

नोटबंदी के बाद मीडिया में आ रही निराशाजनक ख़बरों के बीच रोशनी की किरणें बन रही........ असल किरदारों की सच्ची कहानियां

 एक: रणविजय महज 22 साल के हैं और सिविल इंजीनियर होने के बाद भी पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण सिलचर (असम) में अपने पैतृक फल व्यवसाय में पिता का हाथ बंटाते हैं. जब उन्होंने 8 नवम्बर के बाद आम लोगों को छोटे नोटों के लिए जूझते/मारामारी करते देखा तो खुद के पास मौजूद 10 हज़ार मूल्य के सौ-सौ के नोट लेकर खुद ही बैंक पहुँच गए और बदले में बड़े नोट ले आए. इतना ही नहीं, फिर इन्होने अपने आस-पास के फल व्यवसायियों को समझाना शुरू किया और चार दिन बाद ही स्टेट बैंक की लाइन में नोट बदलने के लिए लगे सैंकड़ों लोगों की तालियों के बीच उन्होंने 50 हज़ार के छोटे नोट बैंक को सौंपे...अब वे इस राशि को और बढ़ाने की योजना में जुटे हैं....सलाम रणविजय 

दो: प्रमोद शर्मा युवा व्यवसायी हैं और सिलचर के व्यापारिक क्षेत्र गोपालगंज में रहते हैं. नोटबंदी/बदलाव के बाद,वे रोज देखते थे कि आम लोग दो हज़ार का नया नोट लेकर छुट्टे पैसे के लिए यहाँ-वहां भटक रहे हैं और अपने लिए जरुरी सामान भी नहीं खरीद पा रहे. उन्होंने राजू वैद्य,शांति सुखानी और अबीर पाल जैसे अपने अन्य दोस्तों से सलाह मशविरा किया और जुट गए आम लोगों को बैंक के अलावा छोटे नोट उपलब्ध कराने में. पहले दिन उन्होंने 1 लाख रुपए के छोटे नोट बांटे लेकिन यह राशि आधे घंटे में ही ख़त्म हो गयी क्योंकि दो हजार के नोट ज्यादा थे और खुल्ले पैसे कम. दूसरे दिन युवा व्यवसाइयों की इस टीम ने 12 लाख के छोटे नोट जुटा लिए और सैकड़ों लोगों की मुश्किल हल कर दी. अब इनका लक्ष्य 20 लाख रुपए जुटाना है. छोटे नोट जुटाने के लिए ये इलाके के अन्य व्यापारियों, बिग बाज़ार- विशाल जैसे बड़े प्रतिष्ठानों की मदद लेते हैं. ‘बूंद बूंद से घड़ा भरता है’ और फिर भरे हुए घड़े का मीठा-ठंडा पानी कई लोगों की प्यास बुझा देता है.

इन युवाओं की कहानियाँ बताती हैं कि मामूली प्रयासों से भी बड़े बदलाव लाये जा सकते हैं और पहाड़ जैसी कठिनाइयों का हल भी समझ-बूझ से निकला जा सकता है. यदि हम भी सोशल मीडिया में दिन-रात व्यवस्था को कोसते रहने के बजाए अपने स्तर पर इसीतरह की पहल करें तो कई लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं. कुछ नहीं, तो बस हमारे आस पास मौजूद ऐसे सच्चे और अच्छे किरदारों को खोज निकाले और उनकी कहानी अन्य लोगों तक पहुंचाए....शायद इससे कुछ और लोगों को प्रेरणा मिले और अच्छाई की इस चेन/श्रृंखला में नई कड़ियाँ जुड़ती जाएँ. बस जरुरत पहल करने की है तो शुरुआत आज और अभी से ही क्यों नहीं..

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

सोचिए, कहीं आप देश विरोधी तत्वों की कठपुतली तो नहीं बन रहे !!

नोट बदलने की प्रक्रिया को आमजन की समस्या से देशव्यापी विकराल मुद्दा बनाने के पीछे कहीं वे लोग तो नहीं है जिनकी करोड़ों की संपत्ति पर चंद घंटों में पानी फिर गया? आम जनता की आड़ में कहीं पेशेवर दिमाग तो काम नहीं कर रहे जो समस्या को हाहाकार में बदलने में जुटे हैं और भविष्य में सरकार के इस अच्छे कदम को बुरे अंजाम में बदलने की साजिश रच रहे हैं ? जैसे कश्मीर में भीड़ की आड़ में आतंकियों के सुरक्षा बलों पर हमला करने की ख़बरें मिली रहती हैं इसीतरह धीरज और स्वेच्छा से नोट बदलने लाइन में लगे आम आदमी के मनोबल को तोड़ने के लिए कहीं राजनीतिक ताकतें और माफिया तो षड्यंत्र में नहीं जुट गए हैं ? और मीडिया महज उनके हाथ की कठपुतली बन रहा हो ? मुझे पता है मेरी इस बात से असहमत लोग मुझे ‘भक्त’ करार दे सकते हैं परन्तु कुछ तो खटक रहा है और कहीं न कहीं कुछ तो पक रहा है !
भीड़ को अराजक बनाने के लिए एक पत्थर ही काफी होता है जबकि यहाँ तो पूरा मसाला मौजूद है. कहीं भीड़ की आड़ में काले धन को सफ़ेद करने का धंधा तो शुरू नहीं हो गया ? सामान्य समझ तो यही कहती है कि कुछ तो गड़बड़ है और शायद सरकार ने भी इसे भांप लिया है तभी नोट बदलने वालों के हाथ पर चुनाव स्याही जैसा कुछ निशान लगाने और उनकी पहचान सुनिश्चित करने की पहल शुरू हो रही है. आखिर क्या कारण है कि सालभर से सूखे पड़े जन-धन एकाउंट एकाएक लबालब भरने लगे है तो वहीँ,वर्षों से बैंक का रुख नहीं करने वाले भी दावा कर रहे हैं कि वे दो बजे रात से लाइन में लगे हैं. मजे की बात तो यह है कि ये सभी किस्से महानगरों और बड़े शहरों में ज्यादा सुनने/देखने को मिल रहे हैं. हालाँकि ये भी हो सकता है कि महानगरों को ही देश मानने वाला और अपनी सुविधा के मुताबिक रिपोर्टिंग करने वाला मीडिया अपने आप ही शहरों की ख़बरों तक सीमित हो परन्तु मेरे सवालों या आशंकाओं को समझने के लिए कुछ बातों पर गौर करना जरुरी है. मसलन जिन महानगरों/शहरों में हाहाकार दिखाया जा रहा है वहां बहुसंख्यक लोग प्लास्टिक मनी( डेबिट/क्रेडिट/एटीएम कार्ड) और आनलाइन बैंकिंग को अपना चुके हैं. वैसे भी शहरों में बिग बाज़ार नुमा खरीद-फरोख्त केन्द्रों की भरमार हैं जहाँ सब कुछ कैशलैस है इसलिए यदि वे दो-चार हफ्ते रुपए न निकाले/बदले तो भी उनकी दिनचर्या पर जरा भी फर्क नहीं पड़ेगा. इसके बाद भी यदि आपने एक बार में दो-चार हजार रुपए भी निकाल लिए तो वह हफ्ते-दो हफ्ते की सब्जी-भाजी-दूध जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए काफी हैं. तब तक स्थिति सामान्य हो जाएगी और बैंकिंग व्यवस्था भी. ऐसे लोग या तो लाइन में नहीं होंगे या एक बार के बाद फिलहाल नहीं आएंगे.
लाइन में लगे लोग अक्सर टीवी का कैमरा देखते ही कहना शुरू कर देते हैं कि घर में आटा नहीं है, बच्चे की फ़ीस नहीं है इत्यादि इत्यादि. आजकल फीस से लेकर दूध तक सब या तो आनलाइन है या फिर प्लास्टिक मनी से मिल जाता है फिर किस बात की जल्दबाजी. इसके अलावा चैक से पेमेंट की व्यवस्था तो कायम है ही. मैं अपने ऐसे कई दोस्तों को जानता हूँ जो कभी भी सब्जी मंडी जाकर सब्जी-फल नहीं खरीदते क्योंकि उनके मुताबिक वहां सब ‘अन-हाइजीनिक’ मिलता है परन्तु इन दिनों वे भी सोशल मीडिया पर ऐसा दिखा रहे हैं मानो नोट बदलने से उनके घर में भी कई दिन से चूल्हा नहीं जला.
अब रही बात वाकई गरीब परिवारों की, तो ऐसे अधिकतर परिवार रोज कमाने-खाने वाले होते हैं और उन्हें मजदूरी में पांच सौ-हजार के नोट नहीं मिलते जिन्हें बदलने के लिए उन्हें दो बजे रात से लाइन में लगना पड़े. हमारे देश में अभी भी असंगठित वर्ग की मजदूरी सौ-पचास के नोटों तक ही केन्द्रित है. इस वर्ग को फिलहाल नोट बदलने की जगह मजदूरी मिलने की समस्या है क्योंकि उनके कथित मालिकों ने सरकार के इस फैसले की आड़ में फिलहाल मजदूरी देना या तो बंद कर दिया है या फिर अपने बड़े नोट निकलने का जरिया बना लिया है. मसलन असम सहित पूर्वोत्तर में चाय श्रमिकों को मजदूरी देने के नाम पर चाय बागानों के मालिकों ने अनाप-सनाप पैसा निकालने की अनुमति सरकार से मांगी और जब सरकार ने इसे मंजूर नहीं किया तो मजदूरी देना बंद कर दिया. हालाँकि सरकार ने सम्बंधित ज़िले के कलेक्टर/डीसी के नाम पर खाता खुलवा कर उनके इरादों पर पानी फेर दिया और अब मजदूरी की प्रक्रिया भी सामान्य होने लगी है. कहने का आशय यह है कि इस वर्ग को भी लाइन में लगने की जरुरत तुलनात्मक रूप से कम ही है.
ऐसे में यह सवाल उठता है कि कहीं भीड़ में गरीबों के नाम पर लगे लोग काला धन रखने वालों के ‘कमीशन एजेंट’ तो नहीं है जो सौ-पांच सौ रुपये के लालच में उनके हाथ की कठपुतली बन गए हैं. यदि एक धन्ना सेठ प्रतिदिन सौ लोगों को लाइन में लगा दे तो वह 4 से 5 लाख रुपए के काले धन को एक दिन में नए नोट में बदल सकता है. अब इसी आंकड़े को हफ्ते भर में तोलिये तो स्थिति साफ़ हो जाती है. ऐसा भी हो सकता है कि अपने दिहाड़ी मजदूरों को नोटों के जमाखोरों ने इसी काम में लगा दिया हो. इसीतरह देश के कुछ राज्यों और समुदायों में तो महिलाओं को सामान्यतौर पर घूँघट में भी घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता परन्तु अब उन्हीं क्षेत्रों में महिलायें आधी रात से लाइन में लगी हैं,पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलकर, वह भी कम्बल-चादर लेकर, तो बात खटकती है और खटकनी भी चाहिए.
मेरे कहने का यह आशय कतई नहीं है कि देश में नोट बदलने/निकालने को लेकर कोई दिक्कत नहीं है. दिक्कत तो है और बहुत है लेकिन जो कृत्रिम हाहाकार मचाया जा रहा है वह चिंताजनक है. ऐसा न हो ही देश विरोधी तत्व इसका फायदा उठाकर हमारी-आपकी शांति और कानून व्यवस्था को खतरे में डाल दें और हम चंद लोगों के हाथ की कठपुतली बनकर अपना और अपने देश का नुकसान करा बैठे. मीडिया में यह ख़बरें भी आने लगी हैं कि एक तरह पूर्वोत्तर में उल्फा,एनडीएफबी, बोडो जैसे तमाम उग्रवादी संगठनों की अब तक की काली कमाई काग़ज में बदल गयी है और उनकी छटपटाहट बढ़ रही है. देश के अन्य राज्यों में भी विद्रोही संगठनों की कमोवेश यही स्थिति है. दाउद जैसे माफिया सरगना भी बेचैन हैं. वहीँ दूसरी तरफ, कई राजनीतिक दल भी कंगाल हो गए हैं और वे अपनी जमीन बचाने के लिए विरोध के नाम पर किसी भी हद तक जा सकते हैं.
पैसा देकर राजनीतिक सभाओं में भीड़ जुटाना, पैसा देकर दंगे कराना और पत्थर फिंकवाना देश के लिए कोई नई बात नहीं है और जब बात राजनीतिक विरोध की हो,माफिया का पैसा बर्बाद होने की हो या फिर सरकार को गलत साबित करने की तो देश विरोधी तत्वों के लिए सबसे आसान शिकार आम लोग ही हैं इसलिए हमारा भी यह दायित्व बनता है कि हम न तो किसी की कठपुतली बने और न ही किसी को अपने कंधे से बंदूक चलाने दे वरना न केवल काला धन बाहर निकलवाने की यह मुहिम धरी रह जाएगी बल्कि भविष्य में कोई भी सरकार ऐसा कठोर फैसला लेने से भी डरेगी.(picture courtesy :rediff.com)

    

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