गुरुवार, 25 जून 2026

‘माखन के लाल’ किताब नहीं, बल्कि अदरक इलायची वाली चाय है!!


यह किताब नहीं, अनुभवी हाथों से बनी कड़क चाय है.. इसमें संघर्ष के अदरक का स्वाद है तो उपलब्धियों की इलायची की खुशबू भी है। इसमें विद्यार्थियों के चायपत्ती जैसे अनुभव के सुनहरे रंग हैं तो चीनी की मिठास भी। वैसे भी, माखन के हम पहले बैच वाले ‘लालों’ से लेकर बाद के कई बैच तक की जिंदगी के कई अहम पड़ाव यहां मौजूद चाय की टपरी पर ही तय हुए थे। 

हम बात कर रहे हैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा अपने 50 से ज्यादा पूर्व विद्यार्थियों की अनुभव-गाथाओं पर केंद्रित पुस्तक ‘माखन के लाल’ की। अपने अपने क्षेत्र के महारथी इन छात्रों के अनुभवों की पूंजी से भरा यह एक ऐसा खजाना है, जिसका फायदा हर आने वाली पीढ़ी को मिलता रहेगा। इसमें मुझे भी अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिला है। यह कोई साधारण स्मृति-संग्रह नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज़ है जो पत्रकारिता के सपने देखने वाले हर युवा को सिखाता है कि सफलता का रास्ता कितना कठिन, रोमांचक और प्रेरणादायी हो सकता है। 

पुस्तक पढ़ते हुए लगता है जैसे पुराने दोस्त उसी चाय की टपरी पर पर एक बार फिर चाय की चुस्कियों के साथ अपनी अपनी सफलता एवं संघर्ष की कहानी सुना रहे हों। इसलिए, मैंने शुरुआत में ही कहा है कि ‘माखन के लाल’ बिल्कुल कड़क अदरक-इलायची वाली चाय  है..। इसमें पहली रिपोर्टिंग की घबराहट है तो बाइलाइन छपने की खुशी भी, नौकरी न मिलने का संघर्ष है तो महज 600 रुपए से लेकर 1000 रुपए महीने के वेतन में छिपी समृद्धता भी, ब्रेकिंग न्यूज़ जैसा रोमांच भी है तो किसी मीडिया हाउस में शीर्ष पद तक पहुंचने के सपने के साकार होने की कहानी भी।


‘माखन के लाल’.. एक संस्थान से विश्वविद्यालय बनने की, चार कमरों से विशाल आकर्षक परिसर में बदलने की गाथा है। इसमें चालीस विद्यार्थियों से लाखों विद्यार्थियों का परिवार बनने की महागाथा भी है । यह किताब हमें बताती है कि कैसे माखन के ये लाल साहस, सत्य और संवेदनशीलता के साथ विश्वविद्यालय की मूल परंपरा को आगे बढ़ा रहे  हैं । 

किताब का सबसे आकर्षक पक्ष सच्चाई के साथ वास्तविक जीवन की कहानियों में समाई विविधता है । यहां सिर्फ बड़े चैनलों के एंकर नहीं, बल्कि छोटे-छोटे शहरों से आए, रात-दिन मेहनत करने वाले, गाँव की खबरों को राष्ट्रीय पटल पर लाने वाले, डिजिटल युग में नई मीडिया क्रांति रचने वाले, मीडिया गुरु से गुल्लक रचने वाले और यहां तक कि शिक्षक एवं कुलगुरू बनकर नई पीढ़ी को तैयार करने वाले पूर्व छात्रों के निजी अनुभव शामिल हैं। 

कोई विद्यार्थी बताता है कि MCU (विश्वविद्यालय) की क्लास रूम में हुई बहस आज भी उनके लेखनी में झलकती है, वहीं किसी विद्यार्थी की लेखनी में मैस की चाय और दोस्तों के साथ बिताए  ठहाके याद आ जाते हैं। पुस्तक का सबसे सुंदर पहलू यह है कि यह सिर्फ सफलता की चमक नहीं दिखाती, बल्कि इसके पीछे छिपे संघर्ष, आर्थिक तंगी एवं शिक्षकों से लेकर संपादक तक की डांट को भी बेझिझक सामने लाती है। नए विद्यार्थियों के लिए तो यह पुस्तक गीता/बाइबिल/कुरान की तरह मार्गदर्शक है जो बिना किसी बौद्धिक बोझ के सहज भाव से, उनकी भाषा में, मीडिया की तमाम कठिनाइयों के बीच अनुभव पर आधारित आसान रास्ता सुझा देती है। 

माखन के लाल को पढ़ते हुए नयी पीढ़ी के छात्रों को ऐसा लगेगा जैसे कि कोई सीनियर बाजू में बैठकर सलाह दे रहा हो कि न तो डरना है, न ही गिरना है..बस, सदैव रीढ़ सीधी रखकर संघर्ष करना है क्योंकि सफलता की रोशनी किसी भी मोड़ पर हमकदम बन सकती है । मसलन, मीडिया के शिखर पर परचम लहरा रहे संजय सलिल कहते हैं कि ‘खुद को झोंकना पड़ता है और नई पीढ़ी में सबसे ज्यादा इसी की कमी दिखाई पड़ रही है। आज लोग स्मार्ट हैं लेकिन मेहनत की कमी है।’ 

पहले बैच की प्रतिनिधि आवाज़ पदम भंडारी ने बताया कि ‘हमारे बैच में 17 गोल्ड मेडलिस्ट थे’..इससे साफ होता है कि एडमिशन के लिए कितनी जद्दोजहद थी। इसी बैच के प्रकाश पंत पहली बार अखबार में नाम छपने की खुशी आज तक नहीं भूल पायें हैं तो हमारे साथी अजय उपाध्याय बताते हैं कि ‘शुरुआत में पहचान का संकट बाद में सबसे बड़ी ताकत बना एवं जिंदगी की हर चुनौती से लड़ना सिखाया।’

एक विद्यार्थी ने लिखा है कि ‘यह संस्थान मेरे लिए सिर्फ विश्वविद्यालय नहीं था बल्कि भाषा की प्रयोगशाला भी था।’ किसी ने लिखा है कि ‘विश्वविद्यालय ने हमें किताबों से बाहर की दुनिया से सीधे जोड़ा।’ एक अनुभवी विद्यार्थी ने बताया कि ‘पत्रकारिता का सफ़र सिर्फ़ प्रतिभा से तय नहीं होता, उसमें जिद भी चाहिए।’ इसी तरह हर विद्यार्थी ने अपने अनुभव से इस किताब को सींचा और सँवारा है।

खास बात यह भी है कि ‘माखन के लाल’ किताब का प्रकाशन उदंत मार्तंड से शुरू हुए भारतीय पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर किया गया है। किताब के पहले ही पन्ने पर मोटे अक्षरों में संपादक की ओर से लिखा गया है- “एक एक ईंट जोड़कर ही इतिहास स्वयं का निर्माण करता है।” इसलिए, किताब में संकलित कई पीढ़ियों के अनुभव पढ़कर मन में एक बात साफ हो जाती है कि MCU सिर्फ डिग्री नहीं देता, बल्कि एक ‘हौंसला’ देता है। 

प्रधान संपादक एवं कुलगुरू विजय मनोहर तिवारी, प्रबंध संपादक डॉक्टर पी शशिकला तथा संपादक विनयश्री के नेतृत्व में 32 लोगों की संपादकीय टीम वाकई बधाई की पात्र है क्योंकि उन्होंने पांच महीनों के परिश्रम से पचास विद्यार्थियों के सपनों में चुस्त संपादन, आकर्षक चित्रों एवं बेहतरीन शीर्षकों से मनमोहक रंग भर दिए हैं। पुस्तक का कवर, आकार, मुद्रण, फ़ॉन्ट, साइज़ सब कुछ अनूठा है । यह पुस्तक अतीत की याद नहीं, बल्कि भविष्य की प्रेरणा है। पत्रकारिता, संचार, कंटेंट क्रिएशन या मीडिया में अपना भविष्य देख रहे हर युवा को ‘माखन के लाल’ अवश्य पढ़नी चाहिए। यह पुस्तक का पहला संस्करण है । उम्मीद है कि आने वाले संस्करण और भी समृद्ध होंगे तथा माखन परिवार के और भी नगीनों से रूबरू कराएंगे।


#MCU #माखनलाल 

शनिवार, 20 जून 2026

मलाई बरफ: कतरा-कतरा स्वाद का पहाड़ी जादू

 


छह घंटे की लगातार मेहनत और डेढ़ घंटे में खेल खत्म। वैसे, हवा न लगे तो इसका जीवन करीब नौ घंटे का है लेकिन हवा लगी कि यह छुई मुई की तरह लजाकर पानी पानी हो जाती है। सबसे खास बात कि इसमें न तो कृत्रिम मलाई है और न ही बरफ..फिर भी नाम है मलाई बरफ और स्वाद ऐसा की आप पत्ता चाटते रह जाओगे। जी हां, पत्ता क्योंकि इसे पत्ते में ही दिया जाता है और पत्ते से ही खाया जाता है।

हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश की मशहूर और पारंपरिक ‘मलाई बरफ’ की। यह ऐसी अनूठी आइसक्रीम है जिसमें न तो बर्फ़ के एक भी टुकड़े का इस्तेमाल होता है और न ही फ्रिज/फ्रीजर जैसी किसी मशीन की जरूरत पड़ती है लेकिन फिर भी यह इतनी ठंडी एवं मजबूती से जमी रहती है कि आप आराम से इसका एक एक टुकड़ा मुँह में घोलते हुए जीभ पर इसके स्वाद का कतरा कतरा महसूस कर सकते हैं।

आमतौर पर आइसक्रीम का ख़्याल जेहन में आते ही फ्रीजर, बर्फ और रंग-बिरंगे कोन/कप की तस्वीर ही उभरती है लेकिन हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों की यह एक ऐसी पारंपरिक आइसक्रीम है, जो न बर्फ से बनती है और न मशीन से  बल्कि इसे बनाने के लिए बस दूध, आग और धैर्य की जरूरत पड़ती है।

देखने में, यह आमतौर पर उत्तर भारत में मिलने वाली मटका कुल्फी जैसी लगती है लेकिन इसे तैयार करने की प्रक्रिया इतनी विशिष्ट है कि यह इसमें लगने वाले परिश्रम, शुद्धता और स्वाद के कारण नामी कंपनियों की आइसक्रीम को पीछे छोड़ देती है। इस पारंपरिक आइसक्रीम शुद्ध दूध को लंबे समय तक धीमी आंच पर पकाया जाता है। लगातार चलाते हुए उसे इतना गाढ़ा किया जाता है कि उसमें एक विशेष दानेदार बनावट और स्वाद विकसित हो जाता है। यही प्रक्रिया इसके स्वाद की पहचान बनती है।


मलाई बरफ बनाने के लिए हिमाचल जैसे पहाड़ों से हौंसले एवं धैर्य की जरूरत होती है। इस प्रक्रिया में जल्दबाजी की कोई जगह नहीं होती वरना स्वाद और अंदाज़ दोनों ही ख़राब हो जाएंगे। इसके लिए, सबसे पहले, बड़े बर्तनों में दूध को घंटों तक उबाला जाता है। धीरे-धीरे उसमें मौजूद पानी सूख जाता है और दूध गाढ़ा होकर हल्की प्राकृतिक मिठास ग्रहण करने लगता है। यह प्रक्रिया काफी हद तक खोया बनाने जैसी ही है। फिर इसमें ड्राई फ्रूट्स, चीनी जैसी सामग्री डालकर अंतिम रूप दिया जाता है। ताज़ी बनाई गई मलाई बर्फ को नदी के ठंडे पानी में सेट किया जाता है, फिर ऊनी कपड़े में लपेटकर रखा जाता है ताकि पिघले नहीं।

करीब पचास साल से मलाई बरफ बना रहे करमचन्द बताते हैं कि इसका असल स्वाद केवल सामग्री से नहीं, बल्कि समय, अनुभव और खास विधि से आता है। यही कारण है कि पारंपरिक तरीके से बनी मलाई बरफ का स्वाद लंबे समय तक जीभ पर बना रहता है। इसका पहला टुकड़ा मुँह में रखते ही सबसे पहले छह घंटे के परिश्रम से तैयार मलाई का, दूध की गाढ़ी रबड़ी सा, खोया, इलायची और बादाम के टुकड़ों का मनमोहक स्वाद जुबां पर उतरने लगता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे भीषण गर्मी में पहाड़ों की ओर आए पर्यटकों को तन बदन में गुदगुदाती ठंडक का अहसास होता है।

यह न तो बहुत मीठी होती है और न ही बर्फ सी ठंडी बल्कि मध्यम ठंडक के साथ मखमली नरमी लिए दूध की प्राकृतिक मिठास का कमाल है। शहरी आइसक्रीम की तरह कृत्रिम स्वाद या रंग नहीं, बस शुद्ध दूध, पहाड़ी धैर्य और हिमाचली जुनून। उल्लेखनीय बात यह भी है कि हिमाचल प्रदेश में मलाई बरफ सभी जगह नहीं मिलती बल्कि मुख्य रूप से कांगड़ा जिले में, खासकर कांगड़ा, धर्मशाला, पालमपुर और आसपास के बाजारों में अप्रैल से सितंबर तक में मिलती है। हिमाचल प्रदेश की घाटियों में जब गर्मी चरम पर होती है, तब कांगड़ा की सड़कों पर मलाई बरफ का जलवा देखने को मिलता है।

वैसे, इसे तलाशने के लिए भी पहाड़ों सा धैर्य चाहिए क्योंकि पारंपरिक मलाई बरफ विक्रेता आज भी लकड़ी के पुराने पिटारे/डब्बे में रखकर मोटे कपड़े से ढककर बाजार के किसी कोने में बिना प्रचार प्रसार के बेचते मिलते हैं। इसलिए यदि आप हिमाचल प्रदेश के बाहर से हैं तो स्थानीय लोगों से पूछ लेना ही बेहतर है क्योंकि छह घंटे में तैयार मलाई बरफ डेढ़ दो घंटे में बिक जाती है और विक्रेता अगले दिन की तैयारी के लिए वापस चल पड़ते हैं।

मलाई बरफ को खाने खिलाने का तरीका भी बिल्कुल अलग है। इसे स्थानीय तौर पर उपलब्ध पत्तों में परोसा जाता है और पत्तों की ही चम्मच बनाकर खाया जाता है। यह तरीका पहाड़ों की परंपरा के साथ साथ उनकी पर्यावरण के प्रति चिंता को दर्शाता है। इससे पहाड़ों के लोगों के  प्रकृति के साथ जुड़ाव का भी पता चलता है।

दादा-परदादा के दौर से मलाई बरफ बनाने में लगे करमचंद जैसे लोग महज 50 रुपए प्रति पत्ता (प्लेट) के बाद भी इस कारोबार को पीढ़ियों से जिन्दा रखे हुए हैं। इसलिए, मलाई बर्फ सिर्फ आइसक्रीम नहीं, हिमाचल की सादगी, शुद्धता और ठंडक का प्रतीक है।  यह हमें पहाड़ों की संस्कृति एवं स्वाद से भी जोड़ती है। 


मंगलवार, 16 जून 2026

विरासत,बदलाव और भविष्य पर गंभीर विमर्श

 ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता विशेषांक की समीक्षा














देश में शोध पर केंद्रित अनेक पत्रिकाएं या जर्नल निकल रहे हैं लेकिन अधिकतर अकादमिक संस्थानों से प्रकाशित हो रहे हैं और उनका विमर्श भी अकादमिक स्तर का ही रहता है लेकिन ‘समागम’ ने इस सीमा से न बँधकर अपने लिए विषयों का आसमान खुला रखा है। शायद, इसकी मूल वजह इस लोकप्रिय शोध पत्रिका का संपादक किसी शैक्षणिक विशेषज्ञ का न होकर खांटी पत्रकार प्रो मनोज कुमार का होना है। ‘समागम’ में विषयों की इतनी विविधता होती है कि हर अंक संग्रहणीय दस्तावेज बन जाता है।

‘समागम’ का मई माह का अंक भी विविधता की इसी श्रृंखला को आगे बढ़ा रहा है। खास बात यह है कि यह सामान्य अंक न होकर विशेषांक है। यह विशेषांक उदंत मार्तंड से लेकर अब तक हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल के इतिहास को केंद्र में रखकर तैयार किया गया एक गंभीर, बहुआयामी और शोधपरक प्रयास है। करीब डेढ़ सौ पेजों का यह अंक पत्रकारिता के विद्यार्थियों, अध्येताओं और संस्थानों के साथ साथ इस विषय में रुचि रखने वालों के लिए अत्यधिक उपयोगी है। 

इस अंक की बात करते हुए संपादक प्रो मनोज कुमार बताते हैं कि- ‘हमारा प्रयास था कि 'उदन्त मार्त्तण्ड' के द्वि-शताब्दी वर्ष के अवसर पर एक ऐसे अंक का संयोजन किया जाए, जो न केवल पठनीय हो अपितु संग्रहणीय भी हो। 'उदन्त मार्त्तण्ड : ककहरा से एआई' तक के इस अंक में बहुत कुछ समेटने की कोशिश की है और बहुत कुछ छूट भी गया है. आने वाले समय में उसे भी समाहित करने का प्रयास करेंगे।’

इस अंक में ‘समागम’ ने हिंदी पत्रकारिता को केवल समाचार माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति, भाषा, ज्ञान परंपरा, लोकतंत्र और तकनीकी बदलावों से जुड़े व्यापक विमर्श के रूप में देखने का प्रयास किया है। विशेषांक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विषय-विविधता है। इसमें हिंदी पत्रकारिता के अब तक के इतिहास, विरासत, बदलाव, विकास, वैचारिक आंदोलनों, स्वतंत्रता संघर्ष और अंग्रेजी शासनकाल में प्रतिबंधित पत्रिकाओं जैसे गंभीर विषयों को शामिल किया गया है। हर अध्याय में विषय विशेषज्ञों की कलम हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक जड़ों को मौजूदा संदर्भों में समझने का गंभीर प्रयास करती है।

विशेषांक में उदंत मार्तंड से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तक हिंदी पत्रकारिता की सफल यात्रा, इस दौरान हुए बदलावों और भारतीय ज्ञान परंपरा के संबंध पर विशेष बल दिया गया है। “नारद जी, भारतीय ज्ञान परंपरा एवं हिंदी पत्रकारिता”, “भारतीय ज्ञान परंपरा में हिंदी का स्थान” तथा “हिंदी, भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा” जैसे विषय यह दर्शाते हैं कि संपादक मंडल पत्रकारिता को केवल आधुनिक सूचना तंत्र नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक परंपरा के विस्तार के रूप में देखता है। यह दृष्टिकोण इस विशेषांक को सामान्य पत्रकारिता विमर्श से अलग पहचान देता है।

‘समागम’ के इस अंक का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका समकालीन दृष्टिकोण भी है। “डिजिटल समय में मीडिया शिक्षा”, “हिंदी पत्रकारिता का बदलता स्वरूप और डिजिटल मीडिया का प्रभाव”, “भाषा प्रौद्योगिकी का स्वरूप और भविष्य”, “एआई : विकल्प नहीं, उपकरण बने” तथा “वैश्वीकरण के दौर में हिंदी भाषा” जैसे विषय वर्तमान मीडिया परिदृश्य की चुनौतियों और संभावनाओं को सामने लाते हैं। इससे यह विशेषांक केवल अतीत का दस्तावेज नहीं रह जाता, बल्कि भविष्य की पत्रकारिता पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करता है।

विशेषांक में मीडिया और समाज के संबंधों को भी पर्याप्त स्थान दिया गया है। बाजारवाद, लोकतंत्र, सामाजिक समरसता, स्त्री संघर्ष, आदिवासी अस्मिता, पर्यावरणीय चिंतन और दलित विमर्श जैसे विषय पत्रकारिता को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ‘समागम’ पत्रकारिता को केवल सूचना उद्योग नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के माध्यम के रूप में देखता है। हिंदी पत्रकारिता के साथ सिनेमा, फिल्म पत्रकारिता, आकाशवाणी का प्रसारण, बाल पत्रकारिता और व्यंग्य लेखन की परंपरा जैसे विषयों का समावेश विशेषांक को और समृद्ध बनाता है। इससे पाठक को हिंदी मीडिया जगत के विविध आयामों का व्यापक परिचय मिलता है।

‘समागम’ के पहले भाग में  'उदन्त मार्तण्ड' से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक का सफर, भारत की बाल पत्रकारिता, व्यंग्य लेखन की परंपरा, हिंदी पत्रकारिता में बंगाल का योगदान, अंग्रेजी राज में प्रतिबंधित पत्रिकाएं, वैचारिक आंदोलन, नवजागरण काल, स्वाधीनता आंदोलन, आकाशवाणी का इतिहास, डिजिटल समय में मीडिया शिक्षा आदि को व्यवस्थित रूप से शामिल किया गया है। इस भाग में  श्री गिरीश पंकज, डॉ विकास दवे, संजीव शर्मा, डॉ. शैलेश शुक्ला, डॉ. संतोष भदौरिया, डॉ. अल्पना सिंह, डॉ. संध्या द्विवेदी, डॉ. संगीता पाठक, अनिल माथुर, डॉ. आरती सारंग, प्रो. संजय द्विवेदी, राजकुमार जैन, डॉ. अर्पण जैन और डॉ. नरेन्द्र त्रिपाठी जैसे विद्वानों के लेख इस खंड को मजबूत बनाते हैं।

वहीं,शोध विमर्श पर आधारित दूसरा खंड  समकालीन और विश्लेषणात्मक है। इसमें नाट्य समीक्षा, डिजिटल मीडिया का प्रभाव, वैश्विक परिप्रेक्ष्य, सिनेमा और पत्रकारिता, दलित-आदिवासी विमर्श, नारी मुद्दे, पर्यावरण, लोकतंत्र और भाषा शुद्धि जैसे विविध विषय शामिल हैं। डॉ. दीपा वाडिया, डॉ. नीता सक्सेना, डॉ. हरिओम कुमार, प्रो आशुतोष कुमार द्विवेदी, कविता आर, डॉ. विजयकुमार रोड़े, सिलपाका वेंकटाद्री आदि शोधकर्ताओं के योगदान से यह खंड शोध की गहराई प्रदान करता है।

‘समागम’ का आकर्षक और विषय के अनुरूप आवरण, त्रुटि रहित छपाई और कम कीमत में ज्यादा जानकारी इसे और भी पठनीय बनाते हैं। हालांकि, कुछ विषयों जैसे क्षेत्रीय हिंदी पत्रकारिता पर और अधिक विस्तार दिया जा सकता था। साथ ही, शहरी व ग्रामीण पाठक वर्ग के दृष्टिकोण और हिंदी पत्रकारिता की आर्थिक व्यवहार्यता जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर भी शोध परक आलेख होते तो पाठकों की समझ और बेहतर हो सकती थी।

समग्र रूप से देखा जाए तो ‘समागम’ का यह विशेषांक हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक यात्रा, वैचारिक चेतना, सामाजिक सरोकार और तकनीकी संक्रमण का एक गंभीर दस्तावेज है। यह केवल शोधार्थियों और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए ही उपयोगी नहीं होगा, बल्कि हिंदी भाषा, मीडिया अध्ययन और भारतीय ज्ञान परंपरा में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए भी महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री सिद्ध हो सकता है। यह विशेषांक इस बात का भी प्रमाण है कि हिंदी पत्रकारिता पर गंभीर अकादमिक विमर्श आज भी जीवित है और बदलते डिजिटल युग में अपनी नई दिशा खोज रहा है।



शनिवार, 13 जून 2026

किरदार में जीता एक उम्दा कलाकार

 














रोहिताश्व गौड़ किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। ‘भाबीजी घर पर हैं’ के मनमोहन तिवारी और ‘लापतागंज’ के मुकुंदीलाल गुप्ता के उनके किरदारों ने उन्हें घर घर में लोकप्रिय बना दिया है। रोहिताश्व गौड़ की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे हर भूमिका में जान फूंक देते हैं। वे हिंदी रंगमंच और टेलीविजन की उस परंपरा के प्रतिनिधि कलाकार हैं जिन्होंने अभिनय को केवल लोकप्रियता का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन के साधारण पात्रों को असाधारण ढंग से प्रस्तुत करने की कला बनाया है।

लोकप्रिय धारावाहिक ‘भाबीजी घर पर हैं’ में निभाया गया उनका चरित्र केवल हास्य नहीं रचता, बल्कि छोटे शहरों की मानसिकता, महत्वाकांक्षा और घरेलू जीवन की विडंबनाओं को भी हल्के-फुल्के अंदाज़ में सामने लाता है। उनकी कॉमेडी में शोर नहीं, बल्कि अवलोकन की सूक्ष्मता दिखाई देती है।

@RohitashvGour रोहिताश्व गौड़ की खासियत है कि वे अपने पात्रों में अभिनय करते हुए दिखाई नहीं देते, बल्कि उनमें घुल मिल जाते हैं। चाहे व्यंग्य हो, हास्य हो या आम भारतीय परिवारों के बीच का सहज संवाद, रोहिताश्व अपने चेहरे के भाव, संवाद की लय और देहभाषा से पात्र को विश्वसनीय बना देते हैं।

धारावाहिक ही नहीं, फिल्मों में भी छोटी छोटी भूमिकाओं को उन्होंने अपने अभिनय से बड़ा बना दिया है और दर्शक उनके किरदार को भूल नहीं पाए हैं। फिल्म ‘पीके’ में पुलिस इंस्पेक्टर पांडे हों या फिर ‘डंकी’ तथा ‘ए वेडनसडे’ में उनका प्रभावशाली अभिनय..रोहिताश्व ने अलग ही छाप छोड़ी है। मुन्ना भाई सीरीज की फिल्में ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ का नारियल पानी वाला और ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ का कुक्कू जैसे क्षणिक किरदार भी उनके कारण स्मृतियों का हिस्सा बन गए। ‘अतिथि तुम कब जाओगे’, ‘मातृभूमि:ए नेशन विदाउट विमेन’ और ‘पिंजर’ जैसी तमाम फिल्मों में उनकी मेहनत अलग ही नज़र आती है। 

रोहिताश्व गौर की अभिनय यात्रा यह भी बताती है कि लंबे समय तक टिके रहने के लिए केवल लोकप्रियता नहीं, बल्कि निरंतर मेहनत, मंचीय अनुशासन और पात्रों की गहरी समझ आवश्यक होती है। वे उन कलाकारों में हैं जिनकी उपस्थिति किसी दृश्य को विश्वसनीय और आत्मीय बना देती है।

रोहिताश्व गौड़ के बारे में यह बात कम लोग जानते होंगे कि उनका शिमला से गहरा सांस्कृतिक और रंगमंचीय रिश्ता है। उनके पिता सुदर्शन गौड़ शिमला के रंगमंच आंदोलन से जुड़े प्रमुख नाम थे। उन्होंने 1950 के दशक में शिमला में नाट्य और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। रोहिताश्व गौड़ ने भी कई बार कहा है कि उनके अभिनय की जड़ें थिएटर में हैं और उनका शुरुआती रंगमंचीय जुड़ाव शिमला से ही शुरू हुआ। बाद में वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली पहुँचे।

वर्तमान में वे अपने पिता के सपनों को धरातल पर उतार रहे हैं। वे ऑल इंडिया आर्टिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं और जो सात दशकों से शिमला में रंगमंच को प्रोत्साहित कर रही है। हाल ही में उनकी इस संस्था ने 71 वीं अखिल भारतीय नाटक एवं नृत्य प्रतियोगिता का शिमला के गैटी थियेटर और कालीबाड़ी सभागार में सफल आयोजन किया। 

इस साल प्रतियोगिता में देश भर के लगभग 27 नाट्य दलों और 260 से अधिक नृत्य प्रस्तुतियों ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित किया। इस दौरान, तमाम व्यस्तताओं के बाद भी वे करीब एक हफ्ते तक शिमला में जमे रहे और पूरे दिन गैटी में रहकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाते रहे..वाकई,विरासत और वर्तमान के बीच ऐसा संतुलन उन जैसा विरला कलाकार ही बना सकता है।





बुधवार, 10 जून 2026

लेखकों को क्यों इतना पसंद आता है शिमला..!!

 














आखिर, शिमला में ऐसा क्या है कि दुनिया भर के नामी लेखक यहां खिंचे चले आते हैं? कोई यहां रहकर किताब लिखना चाहता है तो कोई यहां की वादियों पर ही शब्द चित्र उकेरने लगता है। कुछ तो ऐसा खास है देवभूमि हिमाचल प्रदेश और इसकी राजधानी में, जो हर छोटे बड़े रचनाकार को अपने मोहपाश में जकड़ लेता है।

यह तो ज़ाहिर बात है कि लेखन के लिए मानसिक शांति और एकांत की आवश्यकता होती है। शिमला के घने देवदार-चीड़ के जंगल, धुंध भरी सुबह और आमतौर पर बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों की शांति लेखकों को रचनात्मक वातावरण प्रदान करती हैं। जिससे वे बाहरी शोर से दूर होकर अपने विचारों को शब्द दे पाते हैं। शायद, यही कारण है कि निर्मल वर्मा जैसे लेखकों की रचनाओं में शिमला का शांत और सुकून भरा माहौल स्पष्ट रूप से झलकता है।

हिमालय की गोद में बसे इस शहर का प्राकृतिक सौंदर्य भी कवियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने यहाँ की वादियों से प्रभावित होकर अपनी प्रसिद्ध कविताओं की रचना की। यहां के पहाड़ों का बदलता मौसम, बर्फबारी और मनमोहक सूर्यास्त लेखकों की कल्पनाशीलता को नई उड़ान देते हैं।

शिमला की एक अनूठी विशेषता यह भी है कि यह कभी भी केवल एक पहाड़ी क्षेत्र भर नहीं रहा बल्कि अंग्रेजों के प्रभाव के कारण यहाँ शुरू से ही दुनिया भर के बुद्धिजीवी, राजनेता और कलाकार आते रहे हैं। इस विविधता ने यहाँ बौद्धिक माहौल बनाया और साहित्य, नाटक और कला जैसी कलाओं को फलने फूलने का भरपूर अवसर दिया । गेयटी थिएटर जैसी विश्व स्तरीय जगहों ने भी रचनात्मक ऊर्जा को और विस्तार देने का काम किया ।


इसके अलावा, ब्रिटिश काल में शिमला भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। यहाँ के शीर्ष अफसरों,उनके परिवारों, नामी क्लबों और आए दिन होने वाली पार्टियों के हाई-प्रोफाइल जीवन ने भी लेखकों को औपनिवेशिक समाज के चरित्रों और किस्सों पर लिखने के लिए भरपूर मसाला दिया।

शिमला में लेखन के विस्तार का एक कारण यह भी है कि अंग्रेजी सत्ता का केंद्र होने के कारण यहां पठन पाठन की सबसे अच्छी सुविधाएं एवं केंद्र बने। इसके फलस्वरूप बिशप कॉटन, सेंट एडवर्ड्स और ऑकलैंड हाउस जैसे प्रतिष्ठित स्कूलों की मौजूदगी ने बचपन से ही छात्रों में साहित्य के प्रति रुचि पैदा की। रस्किन बॉन्ड इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान ही लिखना शुरू कर दिया था।

वहीं, कई लेखकों के लिए शिमला उनकी यादों का हिस्सा है। यहाँ की पुरानी इमारतें, संकरी गलियाँ और ऐतिहासिक रिज एवं माल रोड लेखकों को अतीत की कहानियों की ओर ले जाते हैं। यही कारण है कि आज भी कई लेखक यहाँ के हेरिटेज होम्स में रहकर लिखना पसंद करते हैं।

 शिमला के सहज,शांत और सुकून भरे पर्वतीय क्षेत्रों ने भी कई विख्यात देशी विदेशी लेखकों, कवियों , कहानीकारों को आकर्षित किया है। मसलन, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने तो शिमला के वुडफील्ड कॉटेज को अपना सेकेंड होम ही बना लिया था। यहाँ उन्होंने अपनी प्रसिद्ध काव्य कृति 'सोनार तरी' की कई कविताओं की रचना की। मशहूर लेखक निर्मल वर्मा का तो जन्म ही शिमला में हुआ इसलिए उनका प्रसिद्ध उपन्यास 'लाल टीन की छत' शिमला की सर्दियों और यहाँ के एकांत जीवन का जीवंत चित्रण करता है। उनकी कहानियों के पहले संग्रह 'परिंदे' में भी इस पहाड़ी शहर की गहरी झलक मिलती है।

जाने माने लेखक रुडयार्ड किपलिंग का परिवार शिमला में गर्मियों की छुट्टियाँ बिताता था। उनकी प्रसिद्ध कहानियों का संग्रह 'प्लेन टेल्स फ्रॉम द हिल्स' पूरी तरह से शिमला और उसके आसपास की पृष्ठभूमि पर आधारित है। उन्होंने 'अंडर द देवदार्स' में भी यहाँ के औपनिवेशिक समाज का सूक्ष्म चित्रण किया है। एक अन्य लोकप्रिय लेखक रस्किन बॉन्ड ने अपनी स्कूली शिक्षा शिमला से ही पूरी की थी। उन्होंने अपनी पहली काल्पनिक रचना 'नाइन मंथ्स' इसी स्कूल के छात्रावास में रहते हुए लिखी थी। उनकी कई कहानियों में शिमला के रेलवे स्टेशन और यहाँ के बागानों के संस्मरण मिलते हैं। 

जानी मानी लेखिका मीनाक्षी चौधरी ने यहाँ रहकर शिमला की लोककथाओं और रहस्यों पर 'घोस्ट स्टोरीज ऑफ शिमला हिल्स' जैसी अत्यधिक लोकप्रिय पुस्तक लिखी है। लेखक राजा भसीन तो लेखन में शिमला के पर्याय हैं। इन्होंने शिमला पर 5 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें शिमला: द समर कैपिटल ऑफ ब्रिटिश इंडिया और शिमला ऑन फुट काफी लोकप्रिय हैं ।

एक और मजेदार तथ्य यह भी है कि अपनी ऐतिहासिक विरासतों के लिए पहले से विख्यात इस शहर को नामी लेखकों के ठिकानों ने भी पाठकों के बीच अलग पहचान दी है। ये बंगले/कॉटेज आज भी लेखकों से जुड़ी स्मृतियां समेटे हुए हैं। मसलन वुडफील्ड कॉटेज गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के कारण ज्यादा पहचाना जाता है क्योंकि वे यहाँ लगभग आठ महीने रहे ।

वहीं, नॉर्थ बैंक और टेंड्रिल कॉटेज को रुडयार्ड किपलिंग के कारण जाना जाता है। नॉर्थ बैंक में किपलिंग अपने परिवार के साथ रहे थे जबकि टेंड्रिल कॉटेज में भी वे अक्सर रुकते रहे हैं। भज्जी हाउस और हर्बर्ट विला लेखक निर्मल वर्मा से जुड़े हैं तो बिशप कॉटन स्कूल को रस्किन बॉन्ड से जोड़कर देखा जाता है।

कुल मिलाकर देखें तो शिमला शहर के समृद्ध इतिहास और औपनिवेशिक विरासत पर 19वीं सदी से लेकर आज तक निरंतर लेखन हो रहा है। शिमला पर केंद्रित पुस्तकों की संख्या सैकड़ों में हो सकती है। इनमें सबसे ज्यादा संख्या यहां के इतिहास, विरासत,संस्कृति और भूगोल पर आधारित पुस्तकों की है। यदि अकादमिक शोध, सरकारी गजेटियर, ऐतिहासिक वृत्तांतों और आधुनिक कथा साहित्य को भी शामिल कर लिया जाए मिला तो शिमला पर केंद्रित पुस्तकों की संख्या और भी अधिक हो जाएगी ।



रविवार, 7 जून 2026

नाश्ता नहीं, हमारी पहचान है…पोहा



कुछ व्यंजन केवल भोजन नहीं होते, वे हमारी सुबह की पहचान बन जाते हैं। पोहा भी ऐसा ही एक स्वाद है, जो रसोई से उठती हल्दी, कढ़ी (करी) पत्ते और भुनी मूंगफली की खुशबू के साथ दिन की शुरुआत को खास बना देता है। चावल के साधारण दानों से तैयार यह व्यंजन भारत की विविधता का भी प्रतीक है—हर प्रदेश में इसका नाम और स्वाद बदल जाता है, लेकिन लोकप्रियता नहीं। 

हल्का, पौष्टिक और झटपट बनने वाला पोहा पीढ़ियों से भारतीय नाश्ते की शान है। शायद इसलिए एक प्लेट पोहा केवल भूख नहीं मिटाता, बल्कि अपनापन भी परोसता है। यह बात शायद कम लोग जानते होंगे कि हर वर्ष 7 जून को विश्व पोहा दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारत के सबसे लोकप्रिय और सर्वसुलभ नाश्तों में से एक पोहा को समर्पित है। भले ही इस दिवस के पीछे कोई लंबा इतिहास या आधिकारिक पृष्ठभूमि न हो, लेकिन भारतीय जनजीवन में पोहे की गहरी पैठ इसे एक विशेष पहचान दिलाती है। जिस देश में लाखों लोगों की सुबह चाय और पोहे की खुशबू से शुरू होती हो, वहां इस व्यंजन के नाम एक दिन होना बिल्कुल स्वाभाविक लगता है।

पोहा दरअसल चावल से बनाया जाता है। धान को विशेष प्रक्रिया से तैयार कर चपटा किया जाता है, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न नामों से जाना जाता है। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इसे पोहा या पोहे कहा जाता है। कहीं यह चिवड़ा कहलाता है तो कहीं चूड़ा। दक्षिण भारत में इसे अवल या अटुकुलू, बंगाल और असम में चीडा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ तथा नेपाल के कुछ हिस्सों में चिउरा/चिवड़ा कहा जाता है। नाम भले बदल जाएं, लेकिन इसका स्वाद और लोकप्रियता पूरे देश में एक समान दिखाई देती है।

देश में पोहे की सबसे प्रसिद्ध पहचान इंदौर से जुड़ी हुई है। इंदौरी पोहा अपने खास स्वाद, सेव, हरे धनिये, अनार के दानों और साथ में परोसी जाने वाली जलेबी के लिए प्रसिद्ध है। सुबह-सुबह इंदौर की गलियों में पोहा-जलेबी की दुकानों पर लगने वाली भीड़ इस व्यंजन की लोकप्रियता का प्रमाण है। वहीं महाराष्ट्र में कांदा पोहा (प्याज वाला पोहा) घरों में नाश्ते का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। कई राज्यों में इसमें मूंगफली, मटर, आलू, नारियल या मसालों का उपयोग कर स्थानीय स्वाद के अनुसार तैयार किया जाता है।


पोहा केवल स्वाद के कारण लोकप्रिय नहीं है, बल्कि इसके स्वास्थ्य लाभ भी इसे विशेष बनाते हैं। यह हल्का, सुपाच्य और पौष्टिक भोजन माना जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त मात्रा में होते हैं, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। साथ ही इसमें आयरन, कुछ आवश्यक विटामिन और खनिज तत्व भी पाए जाते हैं। कई पोषण विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पोहे में मूंगफली, हरी सब्जियां, अंकुरित दालें या सोयाबीन जैसी सामग्री मिलाई जाए तो इसका पोषण मूल्य और बढ़ जाता है।

पोहे की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि यह ग्लूटेन-फ्री भोजन है। इसलिए जिन लोगों को ग्लूटेन से संबंधित समस्याएं होती हैं, उनके लिए यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है। यह अपेक्षाकृत आसानी से पच जाता है और पेट पर अधिक भार नहीं डालता। यही कारण है कि बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर आयु वर्ग के लोग इसे पसंद करते हैं।

मधुमेह के रोगियों के लिए भी संतुलित मात्रा में तैयार किया गया पोहा उपयोगी माना जाता है। इसमें मौजूद जटिल कार्बोहाइड्रेट शरीर में ऊर्जा का धीरे-धीरे संचार करते हैं, जिससे लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है। हालांकि किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसका सेवन भी संतुलित मात्रा में ही किया जाना चाहिए।

 भारत में हजारों टन चावल हर वर्ष पोहा बनाने के लिए उपयोग किए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह वर्षों से किसानों की आय का साधन रहा है। कई स्थानों पर धार्मिक आयोजनों, त्योहारों और सामुदायिक कार्यक्रमों में भी पोहे का विशेष स्थान है। आज के समय में जब फास्ट फूड और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ रहा है, तब पोहा भारतीय पारंपरिक खानपान की उस विरासत का प्रतिनिधित्व करता है जो स्वाद और स्वास्थ्य दोनों का संतुलन बनाए रखती है। यह ऐसा व्यंजन है जो महंगे रेस्तरां से लेकर सड़क किनारे ठेलों और साधारण घरों तक हर जगह समान रूप से लोकप्रिय है।

विश्व पोहा दिवस केवल एक व्यंजन का उत्सव नहीं है, बल्कि भारतीय खाद्य संस्कृति, स्थानीय परंपराओं और स्वस्थ जीवनशैली का भी उत्सव है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे पारंपरिक भोजन केवल स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि पौष्टिक और पर्यावरण की दृष्टि से भी टिकाऊ हैं। कुल मिलाकर पोहा केवल एक नाश्ता नहीं, बल्कि भारतीय जीवनशैली का एक जीवंत हिस्सा है।

#Poha #Pohalovers. #food

गुरुवार, 4 जून 2026

क्यों घट रही है समानता की प्रतीक साइकिल की लोकप्रियता!!


साइकिल केवल एक परिवहन साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, समानता और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक रही है। भारतीय समाज में साइकिल का महत्व अनेक स्तरों पर देखा जा सकता है। साइकिल अमीर-गरीब, जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को कम करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों विद्यार्थियों, विशेषकर लड़कियों के लिए साइकिल शिक्षा तक पहुंच का साधन बनी। साइकिल ने महिलाओं को भी स्वतंत्र आवागमन की सुविधा दी है । साइकिल प्रदूषण नहीं फैलाती और ईंधन की आवश्यकता नहीं होती। बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के दौर में इसका उपयोग सामाजिक जिम्मेदारी का परिचायक माना जाता है। साइकिल चलाने से शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है। 

कहने का आशय यह है कि साइकिल केवल दो पहियों का वाहन नहीं, बल्कि समान अवसर, स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। लेकिन पिछले कुछ सालों से साइकिल का चलन घट रहा है। लोग अब साइकिल चलाने में शर्माने लगे हैं। मोटर साइकिल एवं कारों के बढ़ने चलन ने भी साइकिल की लोकप्रियता को कम किया है।

हो सकता है कि यह बात कम लोग जानते हो कि साइकिल को लोकप्रिय बनाने के लिए दुनिया भर में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा हर साल 3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। यह दिवस 2018 से शुरू किया गया है।  इस वर्ष के लिए संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक विषय "हरित भविष्य के लिए साइकिल चलाना" है। यह दिवस साइकिल को परिवहन के एक किफायती, विश्वसनीय और टिकाऊ साधन के रूप में बढ़ावा देता है जो पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभकारी है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को साइकिल चलाने के प्रति जागरुक करना है। इतना तो हम सभी जानते हैं कि नियमित तौर पर साइकिल चलाना शरीर के लिए काफी फायदेमंद है। मोटापा घटाने से लेकर शरीर की तंदुरुस्ती के लिए नियमित साइकिल चलाना वरदान है। 

जानकर कहते हैं कि रोजाना आधा घंटा साइकिल चलाने से हृदय रोग, मोटापा, मानसिक बीमारी, मधुमेह, गठिया रोग जैसी कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है। आज के समय मोटर वाहनों को बढ़ते उपयोग के कारण वातावरण में प्रदूषण काफी बढ़ रहा है। इस कारण वातावरण को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए साइकिल का उपयोग जरूरी हो गया है।  

जहां तक देश में साइकिल की कुल संख्या या इससे जुड़े आंकड़ों की बात करें तो भारत में कारों या मोटरसाइकिलों की तरह साइकिलों का कोई केंद्रीकृत सरकारी रजिस्ट्रेशन डेटाबेस नहीं है, लेकिन फिर भी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और साइकिल उद्योग संघ के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल साइकिलों की संख्या 11करोड़ से अधिक है। इसी रिपोर्ट के अनुसार भारत के लगभग आधे से अधिक 50.4 प्रतिशत परिवारों के पास कम से कम एक साइकिल अवश्य है। इस सेहतमंद दो पहिया वाहन की राज्यों में लोकप्रियता की बात करें तो साइकिल स्वामित्व के मामले में पश्चिम बंगाल देश में सबसे आगे है, जहाँ 78.9 प्रतिशत परिवारों के पास साइकिल है। इसके बाद उत्तर प्रदेश 75.6 फ़ीसदी और ओडिशा 72.5 प्रतिशत का स्थान आता है। 

उल्लेखनीय उपलब्धि यह है कि चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा साइकिल निर्माता देश है। भारत में हर साल लगभग 1.6 से 1.8 करोड़ साइकिलों का उत्पादन किया जाता है। वहीं, ऑल इंडिया साइकिल मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल 1 करोड़ से सवा करोड़ साइकिलें बेची जाती हैं। पंजाब का लुधियाना शहर तो भारत की 'साइकिल राजधानी' के रूप में जाना जाता है क्योंकि देश में बनने वाली कुल साइकिलों का लगभग 75 से 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले लुधियाना में ही तैयार होता है।


आंकड़ों से भले ही यह पता चलता है कि भले ही भारत के 50 प्रतिशत से अधिक घरों में साइकिल मौजूद है, लेकिन शहरों में सुरक्षित साइकिल ट्रैक न होने और वाहनों की भीड़ बढ़ने के कारण दैनिक आवागमन में साइकिल का उपयोग महज 2 से 5 फीसदी ही है। भारतीय शहरों में सबसे बड़ी चुनौती साइकिल चालकों की सुरक्षा और सड़कों पर भारी ट्रैफिक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, भारत में साइकिल चालकों के लिए सड़क दुर्घटनाएं एक बड़ा जोखिम हैं।

यदि हम दुनियाभर में साइकिलों की स्थिति का अध्ययन करें तो मौजूदा समय में दुनिया में 100 करोड़ से अधिक साइकिल हैं। वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा साइकिल वाले देशों में चीन सबसे आगे है। यहाँ 45 से 50 करोड़ साइकिलें हैं जबकि नीदरलैंड दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जहाँ इंसानों से ज़्यादा साइकिलें हैं। यहाँ की आबादी लगभग पौने दो करोड़ है, जबकि साइकिलों की संख्या 2.3 करोड़ से अधिक है। यहाँ प्रति व्यक्ति साइकिल का औसत दुनिया में सबसे ज़्यादा है। 

डेनमार्क भी प्रति व्यक्ति साइकिल के औसत के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। यहाँ लगभग 80 प्रतिशत लोगों के पास अपनी साइकिल है। जर्मनी में भी करीब 6.2 से 8.3 करोड़ साइकिलें हैं।  हालिया रुझानों के अनुसार, यहाँ अब सामान्य साइकिलों से ज़्यादा ई-बाइक्स (इलेक्ट्रिक साइकिल) बिक रही हैं। 

एशिया में जापान साइकिल का एक बड़ा केंद्र है। यहाँ 7.2 करोड़ से अधिक साइकिलें हैं और प्रति व्यक्ति औसत 0.57 है।  एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, नीदरलैंड के शहर साइकिल चलाने के हिसाब से सबसे सुरक्षित शहर माने जाते हैं। इसके बाद, डेनमार्क, बेल्जियम और फ्रांस जैसे देशों का नंबर आता है। कनाडा का मॉन्ट्रियल, ताइवान का ताइपे और जापान का फुकुओका शहर भी साइकिल चलाने के लिहाज से अच्छे शहरों में गिने जाते हैं।


हम सभी जानते हैं कि भारत में साइकिल कभी आम आदमी का सबसे भरोसेमंद वाहन हुआ करती थी, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसकी लोकप्रियता अपेक्षाकृत कम हुई है। इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और बुनियादी कारण हैं। मसलन भारत में साइकिल को अक्सर आर्थिक मजबूरी से जोड़ा जाता है। जैसे-जैसे लोगों की आय बढ़ी, दोपहिया और चारपहिया वाहन सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक बन गए। इसलिए बहुत से लोग साइकिल छोड़कर मोटरसाइकिल या स्कूटर की ओर बढ़ गए। मोटरसाइकिलें भी पहले की तुलना में अधिक सुलभ हो गई हैं। आसान किस्तों और ऋण सुविधाओं ने उनके प्रसार को बढ़ावा दिया है।

एक अन्य महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि हमारे देश में शहरों का आकार तेजी से बढ़ा है। नौकरी, शिक्षा और अन्य कार्यों के लिए लोगों को कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। ऐसे में साइकिल की तुलना में मोटर वाहन अधिक सुविधाजनक लगते हैं। इसके अलावा देश के अधिकांश भारतीय शहरों में साइकिल चालकों के लिए अलग लेन नहीं हैं। साइकिल चलाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा भारत में सड़कें और फ्लाईओवर भी हैं जो मुख्यतः मोटर वाहनों को ध्यान में रखकर विकसित किए गए हैं। 

हालांकि, हाल के वर्षों में स्वास्थ्य, पर्यावरण और फिटनेस के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण साइकिल का महत्व फिर से बढ़ रहा है। कई शहरों में साइकिल ट्रैक, साइकिल-शेयरिंग और फिटनेस राइड्स को खासकर बढ़ावा दिया जा रहा है। कुल मिलाकर यदि सुरक्षित मार्ग, बेहतर शहरी योजना और सकारात्मक सामाजिक दृष्टिकोण विकसित हो जाएं, तो साइकिल भारत में फिर से एक महत्वपूर्ण परिवहन साधन बन सकती है।


मंगलवार, 2 जून 2026

दो जून की या छह जून की...कौन सी रोटी है अच्छी!!


आज दो जून है तो सुबह से शाम तक सोशल मीडिया में ‘दो जून की रोटी’ छाई हुई है। हर कोई दो जून की रोटी का महत्व/संघर्ष गिनवा रहा है लेकिन मेरी समस्या यह है कि बदलते वक्त में किसे सही माने.. दो जून की रोटी को या छह जून की रोटी को। अब आप सोच रहे होंगे कि दो जून तो ठीक है पर ये छह जून क्या बला है?

आपको, छह जून की रोटी का मतलब समझाने से पहले हमारे बाद की नई पीढ़ियों और खासकर जेन जी को दो जून की रोटी का मतलब समझाना ज्यादा जरूरी है। दरअसल, दो जून की रोटी एक लोकप्रिय मुहावरा है जिसका सामान्य अर्थ है  दो वक्त की रोटी या दो वक्त का भोजन। हालांकि, यह मुहावरा सिर्फ भूख मिटाने की बात नहीं करता बल्कि यह संतोष का प्रतीक है। इसका अर्थ है मेहनत करके संतोष के साथ दो वक्त की सादी रोटी, सब्ज़ी और दाल जुटाना। 

हमारे पूर्वजों के लिए यही जीवन की असली खुशी थी। उनकी दिनचर्या भी इसी के मुताबिक निर्धारित थी..मसलन सुबह जल्दी नाश्ता, शाम को रात का खाना। बीच में कुछ नहीं क्योंकि इससे पेट को भरपूर आराम मिलता है एवं शरीर को काम करने का मौका ।


अब बात छह जून की रोटी की..तो दो जून की तरह छह जून की रोटी का मतलब है छह वक्त की सुकून भरी रोटी। छह जून की रोटी की अवधारणा आज के बदलते दौर की देन है और मौजूदा समय के तमाम डॉक्टर, न्यूट्रिशनिस्ट (पोषण विशेषज्ञ) और इंस्टाग्राम के ‘हेल्थ गुरु’ इस छह जून की नई अवधारणा को हवा दे रहे हैं। 

पोषण विशेषज्ञों की भाषा में छह जून की रोटी को ‘पीस-मील’ के नाम से जाना जाता है। पीस मील का अर्थ है दिन में 5-6 बार अलग अलग अंतराल में छोटे-छोटे टुकड़ों में खाना। जैसे सुबह नाश्ता, 11 बजे स्नैक, दोपहर लंच, शाम को टी-टाइम, फिर डिनर और रात को कुछ हेल्दी बाइट। पीस मील में पेट न तो कभी खाली रहता है और न ही ठूंस ठूंसकर भरा जाता है।

अब, दो जून पर दिमाग में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हमारी दादी-नानी के दौर की दो जून की रोटी सही है या फिर आधुनिक खानपान जानकारों की छह जून (पीस मील) की सलाह ? जैसा कि हम सभी भली भांति जानते हैं कि हमारे भारतीय परिवारों में दो वक्त की रोटी सिर्फ मजबूरी नहीं, बल्कि एक स्वस्थ आदत है। सुबह का दमदार ऊर्जा से भरपूर स्वादिष्ट नाश्ता, फिर दिन भर मेहनत और शाम को हल्का खाना। इससे पेट को 12-14 घंटे की ‘नैचुरल फास्टिंग’ भी मिल जाती है । शरीर सतत् रूप से फैट बर्न करता रहता है, इंसुलिन लेवल भी स्थिर रहता और पाचन तंत्र को भी आराम मिलता है।

 


कई रिसर्च भी इसे सही ठहराते हैं। अध्ययनों में पाया गया कि दिन में दो बड़े मील (खासकर ब्रेकफास्ट और लंच) लेने वाले लोगों में वजन कम होने की दर बेहतर रही, ब्लड शुगर कंट्रोल रहा और भूख का हॉर्मोन बेहतर तरीके से काम करता रहा । इस थ्योरी के समर्थकों का कहना है कि लगातार थोड़े थोड़े अंतराल पर छोटे-छोटे खाने से शरीर को इस बात का पता ही नहीं चलता कि कब खाना है और  कब आराम करना है। इसके फलस्वरूप हमेशा हल्की भूख, ओवर ईटिंग और पाचन की समस्या बनी रहती है।

वहीं, छह जून की रोटी यानि पीस मील के समर्थकों का मानना है कि डायबिटीज या इंसुलिन रेसिस्टेंस वाले लोगों के लिए छोटे-छोटे मील फायदेमंद होते हैं। इससे, एनर्जी लेवल कम नहीं होता। इसके अलावा, वर्तमान दौर में ऑफिस, जिम, ट्रैफिक, टीवी,मोबाइल में  लोग इतने व्यस्त रहते हैं कि एक बार में भारी खाना पचाना मुश्किल हो गया है। छोटे-छोटे स्नैक्स जैसे बादाम, फल, योगर्ट उन्हें दिन भर एक्टिव रखते हैं।


उधर, दो जून और छह जून की रोटी के इस विवाद में विज्ञान अभी भी “वन साइज फिट्स ऑल” अर्थात् सभी के लिए एक ही तरह के खानपान पर कोई आम सहमति नहीं बना पाया है। कुछ लोगों खासकर एथलीट्स, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्गों के लिए बार-बार छोटा खाना बेहतर हो सकता है। वही, वजन कम करने वाले, पीसीओडी वालों के लिए दो-तीन बड़े, पौष्टिक मील बेहतर काम करते हैं। 

इसलिए, मेरी सलाह तो यह है कि दो,चार या छह वक्त की बजाए अपने शरीर की जरूरत एवं संतोष का ध्यान रखिए। अगर दो मील में ही एनर्जी और संतोष मिल रहा है तो जबरदस्ती 6 मील मत खाओ। इसी तरह, चाहे दो बार खाओ या छह बार, जो खा रहे हो वो असल खाना हो जैसे घर का, मौसम के अनुकूल और पौष्टिक, न की प्रोसेस्ड स्नैक्स ।

कुल मिलाकर “दो जून की रोटी” का मुहावरा आज भी प्रासंगिक है। यह हमें याद दिलाता है कि जिंदगी की असली खुशी भोग-विलास में नहीं, संतोष और संयम में है। आधुनिक पीस-मील हमें सुविधा देता है, लेकिन पुरानी परंपरा हमें संतुलन सिखाती है। इसलिए, न तो दादी हमेशा सही थीं, न ही डॉक्टर। सही वो है जो आपके शरीर, लाइफस्टाइल और मेटाबॉलिज्म के साथ मैच करता हो क्योंकि स्वास्थ्य और संतोष दोनों साथ-साथ चलें, यही असली ‘मील’ है फिर चाहे वह दो जून से मिले या छह जून से।



सोमवार, 1 जून 2026

चांदनी रात में शिमला का सौंदर्य


 पूर्णिमा की रात में चंद्रमा के धवल प्रकाश के बीच शिमला की 12 से 15 डिग्री की ठंडी हवा वातावरण में सिहरन घोल रही है। मॉल रोड पर टहलते हुए पर्यटकों की भीड़ के बीच चंद्रमा की सोलह कलाओं से दमकती रात में ऐसा लग रहा है मानो पूरा शहर किसी उत्सव की तैयारी में हो। रात का अंधेरा गहराते ही पूर्ण गोलाई लिए चंद्रमा ने धीरे-धीरे आकाश पर पूरीतरह से अपना अधिकार जमा लिया ।

मॉल रोड के मध्य खड़ा ऐतिहासिक चर्च अपनी पीली रोशनी में किसी यूरोपीय चित्रकला जैसा प्रतीत हो रहा है। वहीं, चर्च की ऊंची मीनार के पीछे चमकता चंद्रमा ऐसा लग रहा है मानो किसी कलाकार ने आकाश पर चांदी का विशाल दीप टांग दिया हो।  पीली लाइट को अपने घेरे में लिए दूधिया रोशनी में नहाया चर्च और भी भव्य लग रहा है।


उधर, दूर जाखू पहाड़ी की चोटी पर विराजमान हनुमान जी की विशाल प्रतिमा भी अद्भुत आभा बिखेर रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे स्वयं बजरंगबली शिमला की रक्षा के लिए रात्रि प्रहरी बनकर खड़े हों। नीचे मॉल रोड पर टहलते लोगों की चहल-पहल, नवयुगलों का मीठा सा कोलाहल, देवदार के वृक्षों की सरसराहट और ऊपर शांत, उज्ज्वल चंद्रमा—इन सबने मिलकर ऐसा दृश्य रचा था जिसे शब्दों में पूरी तरह बांध पाना कठिन है। 

इस बीच, मॉल रोड पर सजे कैफे और दुकानों की रोशनियां भी जगमगाने लगी हैं। पहाड़ों की ढलानों पर बसे घरों की चमचमाती बत्तियां दूर से ऐसी दिखाई दे रही हैं जैसे धरती पर असंख्य जुगनू उतर आए हों। चेहरे को छूकर गुजरते और देवदार की भीनी सुगंध अपने साथ ले आते ठंडी हवा के झोंके बीच बीच में इस स्वप्न लोक से बाहर ले आते हैं।


वही, पर्यटक रुक-रुककर चांदनी के आगोश में समाएं शिमला के इन दृश्यों को अपने कैमरों में कैद कर साथ ले जाने में जुट हैं, लेकिन आंखों में समा रहा यह सौंदर्य किसी भी तस्वीर से कहीं अधिक जीवंत, मोहक और स्मरणीय है।

आकाश में घुमड़ती काले बादलों की कतार कभी-कभी चंद्रमा के सामने से गुजरकर उसने ढकने का असफल प्रयास करती हैं तो ऐसा लगता है जैसे मॉल रोड पर हनीमून मनाने आई किसी नववधू ने अपने किसी आदरणीय को एकाएक सामने देखकर दुपट्टे से घूंघट ओढ़ने की कोशिश की हो।

 कुछ ही क्षण बाद जब बादल हट जाते हैं और चंद्रमा फिर पूरी शान से चमक उठता है तो नव युगलों की अठखेलियां भी बेपर्दा होने लगती हैं। चर्च के इर्दगिर्द पसरी नवविवाहित जोड़ों की खिलखिलाहट घंटियों की सी मधुर ध्वनि और दूर जाखू की पहाड़ी पर पसरी निस्तब्धता मिलकर वातावरण को रोमांटिक एवं आध्यात्मिक सा स्पर्श दे रहे हैं ।


जब देश के अधिकतर इलाके सूरज के गुस्से से दो चार हो रहे हैं और गर्म हवा के थपेड़े चेहरे को किसी थप्पड़ की तरह लाल कर रहे हैं.. तब शिमला में चंद्रमा की धवल रोशनी में ठंडी हवा के झोंके धरती पर स्वर्ग से कम महसूस नहीं होते।

आज शिमला केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति, आस्था और सौंदर्य का जीवंत संगम है। पूर्णिमा का चंद्रमा पूरे शहर को अपनी चांदनी में भिगोकर शायद यही संदेश दे रहा था कि प्रकृति के सबसे सुंदर दृश्य अक्सर शोर में नहीं, बल्कि शांति में रचे जाते हैं।


शनिवार, 30 मई 2026

उदन्त मार्त्तण्ड' से लेकर आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस तक हिंदी पत्रकारिता

 

हिंदी पत्रकारिता की दो शताब्दियों की यात्रा केवल समाचारों के प्रसार की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज, संस्कृति, राजनीति और तकनीकी विकास का जीवंत दस्तावेज भी है। 1826 में 'उदन्त मार्तण्ड' के प्रकाशन से लेकर आज के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित मीडिया युग तक, हिंदी पत्रकारिता ने अनेक उतार-चढ़ाव, संघर्ष, प्रयोग और नवाचार देखे हैं। यह यात्रा परंपरा और आधुनिकता के संगम की ऐसी गाथा है, जिसने न केवल पत्रकारिता को समृद्ध किया बल्कि जनमानस को भी जागरूक और सशक्त बनाया।

कोलकाता के कोलूटोला इलाके की अमरतल्ला गली से कानपुर निवासी वकील, पंडित युगल किशोर शुक्ल ने 30 मई 1826 को साप्ताहिक पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' पहला अंक प्रकाशित किया। 'उदन्त मार्त्तण्ड' न केवल भारत का पहला हिन्दी समाचार पत्र था, बल्कि यह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक साहसिक भाषाई और सांस्कृतिक प्रयोग भी था। इसका पूरा श्रेय पंडित युगल किशोर शुक्ल को जाता है। उस दौर में जब अंग्रेजी, बांग्ला और फारसी का बोलबाला था, इसने देवनागरी लिपि में छपाई कर हिन्दी भाषियों को अपनी पहचान और आवाज दी। पंडित युगल किशोर शुक्ल ने जब 'उदन्त मार्त्तण्ड' का पहला अंक प्रकाशित किया होगा, तब शायद उन्हें भी इस बात का आभास नहीं रहा होगा कि वे एक ऐसी मशाल जला रहे हैं जो आने वाली दो सदियों तक भारत की सामाजिक और राजनीतिक चेतना को आलोकित करेगी।

अल्पायु में ही 'उदन्त मार्तण्ड' ने भविष्य के राष्ट्रवादी समाचार पत्रों के लिए एक ढाँचा तैयार किया। इसने भारतीय मानस में सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना जगाने का कार्य किया, जो आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनी। इसे मध्यदेशीय भाषा का पत्र कहा गया, जिसने उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संवाद का एक सेतु बनाने का प्रयास किया, भले ही उस समय कलकत्ता में हिन्दी भाषियों की संख्या कम थी।

यह पत्र केवल समाचारों का माध्यम नहीं था, बल्कि इसने सामाजिक बुराइयों पर कड़ा प्रहार किया और समाज में जागरूकता लाने का काम किया। इसने तत्कालीन भारतीय समाज के सरोकारों को केंद्र में रखा। अपनी संक्षिप्त प्रकाशन अवधि में ही इसने ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई। सरकारी सहायता और डाक सुविधाओं के अभाव के बावजूद, इसने एक 'क्रांतिकारी अखबार' के रूप में अपनी पहचान बनाई। 'उदन्त मार्तण्ड' भाषाई बाधाओं और संसाधनों की कमी के कारण केवल 79 अंक तक ही प्रकाशित हो पाया, लेकिन इसने हिंदी में सोचने और लिखने की नींव रख दी। 1827 में अंतिम अंक में श्री शुक्ल ने लिखा था कि 'आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तंड उदन्त, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत।' अल्पायु में ही 'उदन्त मार्तण्ड' ने भविष्य के राष्ट्रवादी समाचार पत्रों के लिए एक ढाँचा तैयार किया। इसने भारतीय मानस में सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना जगाने का कार्य किया, जो आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनी। इसे मध्यदेशीय भाषा का पत्र कहा गया, जिसने उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संवाद का एक सेतु बनाने का प्रयास किया, भले ही उस समय कलकत्ता में हिन्दी भाषियों की संख्या कम थी। यही कारण है कि 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाकर पूरा देश इस पत्र के ऐतिहासिक साहस और योगदान को याद करता है।


हिंदी पत्रकारिता ने 200 वर्षों में साम्राज्यवाद से लड़ाई लड़ी, स्वतंत्रता दिलाई, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनी, डिजिटल उछाल लिया और अब एआई की चुनौती का सामना कर रही है। यह यात्रा सिर्फ अखबारों की नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक राजनीतिक चेतना की कहानी है। रोचक किस्सों, गुमनाम नायकों, बलिदानों और तकनीकी क्रांतियों से भरी यह विकास यात्रा हमें पत्रकारिता के तमाम पहलुओं और बदलावों से रूबरू कराती है। इन परिवर्तनों को आसानी से समझाने के लिए हम हिंदी पत्रकारिता की इस मैराथन यात्रा को निम्नलिखित भागों में विभक्त कर आसानी से सकते हैं।

उद्भव और प्रारंभिक संघर्ष (1826-1873):

जैसा कि हम सभी भली-भाँति जानते हैं कि हिंदी पत्रकारिता का जन्म बंगाल में हुआ, जहाँ अंग्रेजी, बंगाली और फारसी पहले से सक्रिय थी। पहले हिंदी समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' के लिए पंडित युगल किशोर शुक्ल ने 16 फरवरी 1826 को लाइसेंस लिया और इसी साल 30 मई को पहला अंक प्रकाशित हुआ। फिर 1829 में राजा राममोहन रॉय ने हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली और फारसी में 'बेंगदूत' निकाला। यह अखबार भी मात्र 12 अंक तक ही प्रकाशित हो पाया। लेकिन यह साप्ताहिक पत्र सती प्रथा का विरोध जैसे सुधारों का माध्यम भी बना। 1854 में कोलकाता से ही श्याम सुन्दर सेन के संपादन में समाचार 'सुधावर्षन' प्रकाशित हुआ। बनारस से 'बनारस अखबार' ने हिंदी पट्टी में समाचार पत्रों का प्रवेश कराया। राजा शिव प्रसाद के सितारे-हिंद ने उर्दू-हिंदुस्तानी शैली अपनाई। इस युग में दर्जनों प्रयोग हुए जैसे सुधाकर, प्रजा हितैषी, ज्ञानदीप आदि लेकिन अधिकांश छोटे और अल्पकालिक थे। चूँकि उस समय देश में साक्षरता मात्र 3-4 फीसदी थी और सुविधाओं का भी अभाव था फिर भी ये पत्र गाँवों तक पहुँचे। इस दौरान कई सकारात्मक बातें भी हुई जैसे कि भाषा संस्कृत से हिंदी और भारी से सरल की ओर बढ़ी। अखबारों प्रकाशन की छोटी आयु के बाद भी प्रकाशकों में ब्रिटिश सेंसरशिप, आर्थिक दबाव, मुद्रण तकनीक की कमी के बाद भी प्रकाशन का हौंसला बढ़ता गया। मोटेतौर पर इस दौर की पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य सूचना देना कम और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति जागृति के साथ धार्मिक-सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करना अधिक था।

साहित्य और सुधार का दौर (1873-1900):

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1873 में हरिश्चंद्र मैगजीन (बाद में हरिश्चंद्र चंद्रिका) शुरू किया। इससे पहले 1867 में उनका 'कवि वचन सुधा' आ चुका था। एक तरह से भारतेंदु युग ने हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी। इसी दौरान भारत मित्र, हिंदी प्रदीप, उचित वक्ता आदि समाचार पत्र निकले। इसी दौर में भाषा शुद्ध हुई और खड़ी बोली का विकास भी हुआ। इस दौर में विधवा विवाह, बाल विवाह विरोध, शिक्षा प्रसार, जाति प्रथा जैसे मुद्दों के जरिये पत्रकारिता सिर्फ खबर नहीं, सामाजिक क्रांति का हथियार बन गयी। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने जहाँ 'सरस्वती' के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता को मजबूत किया। वहाँ, भारतेंदु ने साहित्यकारों को पत्रकारिता से जोड़कर मुंशी प्रेमचंद जैसे स्तंभ लेखक पत्रकारिता को दिए। इस दौर में पत्रकारिता केवल समाचार नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक सांस्कृतिक विरोध था। 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल' के मंत्र ने हिंदी को जन-जन की भाषा बनाया। इस दौर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन की नींव पड़ रही थी और पत्रकारिता इस आंदोलन का महत्वपूर्ण हथियार बन रही थी।

विद्रोह का दौर (1900-1947):

यह पत्रकारिता का स्वर्णिम दौर था जिससे समाचार पत्रों को समाज और देश की जनता की आवाज बनने का अवसर दिया। हम कह सकते हैं कि 20वीं सदी में हिंदी पत्रकारिता राष्ट्रीय चेतना का स्वर बनी। इस दौर में क्रांति की अलख जगाने वाले प्रमुख समाचार पत्रों की बात करें तो 1913 में कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी ने 'प्रताप' का प्रकाशन आरंभ किया और यही 16 पृष्ठों का यह साप्ताहिक क्रांतिकारियों का हथियार बन गया। प्रताप का संपादन करते हुए विद्यार्थी जी ने सीधेतौर पर लिखा था कि 'हम जो कुछ लिखते हैं, सत्य के लिए लिखते हैं।' इस बात से भी हम सभी बखूबी परिचित हैं कि प्रताप के क्रांतिकारी शब्द अंग्रेजों को बुरी तरह चुभते थे और यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बार-बार जेल भेजा। प्रताप की जगाई स्वराज की अलख को 'अभ्युदय', 'मतवाला' और 'आज' जैसे समाचार पत्रों ने लहर बना दिया। इस लहर को आगे बढ़ाने में वंदे मातरम, स्वदेश, तरुण भारत ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। गांधी जी द्वारा चलाये गए असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा एवं भारत छोड़ो आंदोलन को देशव्यापी बनाने में हिंदी प्रेस की प्रभावी भूमिका थी। इसी दौर में गांधी का 'नवजीवन' और 'हरिजन' जनता की आवाज बने और महात्मा गांधी के संदेश को गाँव-गाँव पहुँचाने का माध्यम भी। इन अखबारों की धमक से घबराकर अंग्रेज सरकार ने दमन चक्र शुरू किया और तमाम हिंदी पत्र बंद कर दिए गए, प्रेस जब्त हुए तथा संपादक जेल भेजे गए। पत्रकारिता उस समय कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि राष्ट्र-सेवा का संकल्प थी। इस समय के पत्रकार केवल लेखक नहीं थे, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने जेल यात्राएं की, आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। इस दौर में लेखन शैली में भी बदलाव आया। भाषा सरल और जनसुलभ हुई, ताकि अधिक से अधिक लोग जुड़ सकें। संपादकीय लेखों का प्रभाव इतना गहरा था कि वे जनमत निर्माण का मुख्य स्रोत बन गए।

विस्तार, नियंत्रण और चुनौतियों का दौर (1947-1990):

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हिंदी पत्रकारिता ने लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनने और देश के नवनिर्माण में सहभागी बनने का दायित्व संभाला। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, अमर उजाला, नवभारत, नई दुनिया देशबंधु, जनसत्ता, दैनिक भास्कर जैसे कई अखबार प्रभावी रूप से उभरे। सरकारी नीतियों, योजनाओं और विकास कार्यों तक जनता तक पहुँचाने में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही। साथ ही, सत्ता की आलोचना और लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व भी अखबारों ने निभाया। इसी दौर में आपातकाल के दौरान हिंदी अखबारों की ताकत देखने को मिली। आपातकाल हिंदी पत्रकारिता के लिए एक कठिन परीक्षा थी। सेंसरशिप लागू कर दी गई थी और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा दिया गया था। इस समय कुछ समाचार पत्रों ने सरकार के दबाव में झुकने का रास्ता चुना, जबकि कुछ ने विरोध का साहस दिखाया। यह दौर इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र का प्रहरी भी है। आपातकाल के बाद पत्रकारिता में आत्ममंथन हुआ और स्वतंत्रता तथा निष्पक्षता के मूल्यों को और अधिक मजबूती मिली।


वहीं, तकनीकी का विस्तार भी हुआ और 1980-90 में ऑफसेट प्रिंटिंग और कंप्यूटर कंपोजिंग आई। समाचार पत्रों ने क्षेत्रीय विस्तार किया। धर्मयुग, दिनमान, साप्ताहिक, इण्डिया टुडे और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाओं और अखबारों ने सम-सामयिक एवं साहित्यिक पत्रकारिता को लोकप्रिय बनाया। सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन 'अज्ञेय' (दिनमान), धर्मवीर भारती (धर्मयुग) और मनोहर श्याम जोशी (साप्ताहिक हिंदुस्तान) जैसे दिग्गजों ने पत्रकारिता को बौद्धिक रूप से समृद्ध किया।

नई सदी का उफान (1991-2020):

 देश में आर्थिक उदारीकरण की हवा बही तो मिशनरी अखबार, उद्योग में परिवर्तित हो गए। अखबार उद्योग को भी नए पंख लग गए। आर्थिक सुधारों ने मीडिया को पूर्ण रूप से एक 'उद्योग' बना दिया। उन्हें दुनिया भर से श्रेष्ठ संसाधन जुटाने और पाठकों तक सौंदर्यपरक और व्यवस्थित तरीके से पहुँचने का मौका मिला और यहीं से पत्रकारिता का स्वरूप मीडिया हो गया और वह यह नये किस्म का चोला पहनकर मिशन से बिजनेस हो गया। इसी दौर में ब्रेकिंग न्यूज की संस्कृति शुरू हुई और रिपोर्टिंग का भी तौर-तरीका बदल गया। उल्लेखनीय बात यह है कि इस दौर में न्यूज चैनलों की टीवी क्रांति के बावजूद हिंदी प्रेस मजबूत और मजबूत होती गयी। दैनिक भास्कर, अमर उजाला, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, नई दुनिया, राजस्थान पत्रिका जैसे तमाम अखबार समूहों ने बहु संस्करण का मॉडल अपनाया और साथ ही इंटरनेट पर भी उनके ऑनलाइन एडिशन और एप्स की धमक सुनाई देने लगी। बड़े मीडिया हाउस बने और कॉर्पोरेट प्रभाव बढ़ने लगा। हालाँकि इससे संसाधनों और तकनीक में सुधार हुआ, लेकिन निष्पक्षता और गुणवत्ता पर प्रश्न भी उठने लगे।

सोशल मीडिया का क्रांतिकारी दौर 2010 के बाद सोशल मीडिया ने आँधी-तूफान की तरह इस क्षेत्र में घुसपैठ की और धीरे-धीरे यह पत्रकारिता का 2.0 संस्करण बन गया। मोबाइल के कंधे पर चढ़कर इंटरनेट शहरों से गाँवों तक पहुँच गया और उसी तेजी से सोशल मीडिया की पैठ बढ़ती गयी। इंटरनेट ने छोटे-छोटे इलाकों के वीडियो, न्यूज, लाइव अपडेट को देशव्यापी बना दिया और तब शुरुआत हुई पत्रकारिता की एक नयी विधा 'डेटा जर्नलिज्म' की जिसने भाषा को और सरल करते हुए इसे गली मोहल्लों की भाषा बना दिया। सोशल मीडिया ने इमोजी के जरिये भाषा को अलग ही रूप दे दिया। सरल शब्दों में कहें तो स्मार्टफोन और सस्ते डेटा ने पत्रकारिता का लोकतंत्रीकरण कर दिया। लगभग सभी बड़े समाचार पत्रों और चैनलों ने अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए। वीडियो कंटेंट, लाइव अपडेट्स और इंटरैक्टिव फीचर्स ने समाचारों को अधिक आकर्षक बना दिया। अब केवल बड़े घराने ही प्रकाशक नहीं थे; हर व्यक्ति एक 'सिटीजन जर्नलिस्ट' बन गया। ट्विटर (अब एक्स), फेसबुक और यूट्यूब समाचारों के प्राथमिक स्रोत बन गए।

सोशल मीडिया के विस्तार ने 'फेक' न्यूज जैसी बीमारियों को भी जन्म दिया और कई मामलों में सही-गलत की पहचान खत्म हो गयी। स्थिति यहाँ तक आ गयी कि कई मीडिया संस्थानों सहित खुद सरकार को फेक्ट चैक इकाइयाँ बनानी पड़ी। लेकिन इन सभी बाधाओं के बाद भी हिंदी ने दुनिया का सबसे बड़ा भाषाई मीडिया बनने का परचम लहरा दिया और हिंदी अखबार विश्वसनीयता में सबसे आगे बने रहे। हालाँकि, इस दौर में डिजिटल पत्रकारिता ने गति और पहुँच तो बढ़ाई, लेकिन फेकन्यूज और अपुष्ट सूचनाओं की समस्या से विश्वसनीयता एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी।

आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआई) दौर (2020 से आगे):

 आज हिंदी पत्रकारिता अपने सबसे चुनौतीपूर्ण और रोमांचक मोड़ पर है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआई) की पदचाप से ही 2025-26 में हिंदी पत्रकारिता में खलबली मच गयी। किसी को आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस पत्रकारिता पर सबसे बड़ा खतरा नजर आया तो किसी को, यह काम को और आसान बनाने का जरिया। Reuters और India AI Summit 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार 70 प्रतिशत से ज्यादा न्यूज संगठन अब एआई का उपयोग कर रहे हैं और इसके जरिये ऑटोमेटेड राइटिंग, डेटा एनालिसिस, पर्सनलाइजेशन, अनुवाद, फेकन्यूज डिटेक्शन जैसे विभिन्न काम करने लगे हैं। कई अखबारों के न्यूजरूम में अब आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस ट्रेंडिंग टॉपिक्स स्कैन करता है, हेडलाइंस सुझाता है, वॉइस ओवर जेनरेट करता है। अब पाठक खबर नहीं ढूंढता बल्कि खबर पाठक को ढूंढती है। गूगल और मेटा के एल्गोरिदम तय करते हैं कि आप क्या पढ़ेंगे। हेडलाइन लिखना, डेटा का विश्लेषण करना और यहाँ तक कि लेखों का सारांश तैयार करना अब सेकंडों में एआई द्वारा किया जा रहा है। दुनिया के विकसित देशों को तो छोड़ो आज भारत में ही 'सना' (आज तक) और 'लीसा' जैसे एआई न्यूज एंकर्स अब खबरें पढ़ रहे हैं।

सही मायने में प्रिंट मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का मिलन पत्रकारिता के इतिहास में एक दुधारी तलवार की तरह है। जहाँ एक ओर एआई ने काम की गति एवं सहजता बढ़ाई है, वहीं दूसरी ओर इसने पत्रकारिता की साख और मौलिकता के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। एआई द्वारा जनरेट की गई गलत सूचनाएँ या मनगढ़ंत तथ्य (Hallucinations) प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी पूँजी विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा सकते हैं। एक बार छप जाने के बाद अखबारों में गलती सुधारना डिजिटल की तुलना में कठिन होता है। इसके साथ साथ, एआई मॉडल अक्सर मौजूदा पत्रकारिता के आधार पर तैयार होते हैं, जिससे बौद्धिक संपदा के उल्लंघन और मौलिक लेखकों के हक मारे जाने का खतरा बढ़ गया है। इससे नौकरियाँ जाने एवं मानवीय मेधा के ह्रास का खतरा भी बढ़ गया है।

चुनौतियाँ और भविष्य:

 दो सदियों की पत्रकारिता की इस यात्रा में हिंदी पत्रकारिता के सामने अब सबसे बड़ा संकट साख का है क्योंकि फेक न्यूज और क्लिकबेट पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती बन गए हैं। इसी तरह हिंग्लिश के बढ़ते प्रयोग से मूल हिंदी की शुद्धता प्रभावित हुई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग से यह सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या यह मानवीय संवेदनाओं और ग्राउंड रिपोटिंग की जगह ले पाएगा क्योंकि पत्रकारिता का मूल सहानुभूति और सत्य की खोज है। प्रिंट मीडिया के लिए एआई एक सहायक तो हो सकता है, लेकिन वह संपादक की जगह नहीं ले सकता। फिलहाल यह तो दावे से कहा जा सकता है कि भविष्य उसी संस्थान का उज्ज्वल है जो एआई की तकनीकी सटीकता और मनुष्य के नैतिक विवेक के बीच संतुलन बिठा पाएगा।

'उदन्त मार्त्तण्ड' से शुरू हुई हिंदी पत्रकारिता की यात्रा आज एआई और डिजिटल मीडिया के अत्याधुनिक युग तक जरूर पहुँच चुकी है। इन 200 वर्षों में उसने न केवल तकनीकी बदलावों को अपनाया, बल्कि समाज के हर परिवर्तन को अपने भीतर समाहित किया। 'उदन्त मार्तण्ड' के हाथ से लिखे जाने वाले दौर से लेकर आज चैट-जीपीटी जैसे एआई टूल द्वारा न्यूज बुलेटिन तैयार करने तक, हिंदी पत्रकारिता ने लंबा सफर तय किया है। स्वरूप बदला है, माध्यम बदले हैं और गति बदली है, लेकिन इसकी आत्मा आज भी वही है-जनता की आवाज बनना। यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि पत्रकारिता केवल खबरों का संकलन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और दिशा-निर्देशक है। भविष्य में चाहे तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, पत्रकारिता का मूल उद्देश्य-सत्य, निष्पक्षता और जनहित- सदैव सर्वोपरि रहना चाहिए। हिंदी पत्रकारिता की यह विकास यात्रा एक जीवंत परंपरा है, जो निरंतर आगे बढ़ रही है-नए प्रश्नों, नई चुनौतियों और नई संभावनाओं के साथ।

(यह लेख अंतर राष्ट्रीय शोध पत्रिका *समागम* के विशेषांक में प्रकाशित हुआ है।)

मंगलवार, 26 मई 2026

कहाँ से लाते हो इतना तेज़, सौंदर्य और अहसास...अमलतास !!!!

 


गर्मी से दहक रहे मैदानी इलाकों में सुनहरी आभा से जगमगाता यह पेड़ बरबस ही/ बार बार अपनी ओर खींच रहा था..और फिर क्या था हम भी खुद को रोक न सके और उससे जान पहचान बढ़ाने के लिए उसके पास जाने के लिए विवश हो गए… वैसे इश्क़ भी तो यही करता है..अपनी ओर खींचता है और आप बेबस से खिंचे चले जाते हैं। मैंने पहले कभी इतने ध्यान से इस पेड़ को फूलते नहीं देखा था क्योंकि प्रकृति से थोड़ा सा भी प्यार करने वाले हर शहर/इलाक़े में चटक केसरिया-लाल फूलों से लदे गुलमोहर और रंग बिरंगे तितलियों से फूलों से भरे बोगनबेलिया आपको कुछ और देखने ही नहीं देते या फिर शाम ढलते ही मधुमालती की महक हमारा आपका ध्यान भटका देती है लेकिन जब तपती दोपहर में 45 डिग्री तापमान में सूरज से निडर होकर नैन मटक्का करते इन फूलों को देखा तो फिर न मन माना और न ही मोबाइल का कैमरा।..आख़िर सूरज की तपिश से उसी का रंग लेकर मनमोहक नजारों वाले इस ‘अमलतास’ के पेड़ में कुछ तो अलग है,जो इसे खास और बहुत खास बनाता है। 

अमलतास की खास बात यह भी है कि गर्मियों की तपती दोपहर में जब अधिकांश पेड़ मुरझाए से दिखाई देते हैं, तब पीले फूलों से लदा यह पेड़ मानो धरती पर उतरी धूप का उत्सव बन जाता है। इसकी लंबी-लंबी झूलती सुनहरी लड़ियाँ हवा के साथ ऐसे लहराती हैं, जैसे प्रकृति ने अपने हाथों से स्वर्णिम श्रृंगार किया हो। युवा सौंदर्य की तरह सड़क किनारे खिला अमलतास हमें पल भर ठहरकर उसे निहारने पर मजबूर कर देता है। इसकी चमकती पीली आभा केवल आंखों को सुकून नहीं देती, बल्कि मन में भी एक अजीब-सी ताजगी और प्रसन्नता भर देती है। 


तपते मौसम में अमलतास का खिलना यह एहसास कराता है कि कठिन समय में भी सुंदरता और उम्मीद अपनी पूरी चमक के साथ जीवित रह सकती है। तभी तो कवियत्री काव्या ने अपने पेज पर लिखा है:

"पीले झूमरों से सजा

महल सा लगता है

मई की गर्मी में

दिल को सुकून बाँटता

बस यूँ ही मुड़ जाते कदम

उस रमणीय वृक्ष के पास

कौतूहल से भरा

यह मन चिल्लाया था

कौन है यह मनमोहन

कौन है यह वृक्षों में

उगलता स्वर्ण?

अमलतास!!"

जैसे वृहस्पतिवार/गुरुवार को पीले कपड़ों में दफ्तरों-बाजारों में सौंदर्य बिखरा रहता है वैसे ही जब आँखें सड़कों पर बिखरे अमलतास के खिलखिलाते पीले फूलों पर ठहरी तो हाथ इंटरनेट पर इसका पता-ठिकाना (तथ्य) जानने के लिए मचल उठे। फिर गूगल गुरु ने बताया कि अपन तो इसके नए नए आशिक़ हैं और हमसे पहले तमाम बड़े कवि-लेखक अमलतास से इश्क़ लड़ा चुके हैं। रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' ने तो अपनी कविता में पूछा है:

"धरती तपती लोहे जैसी

गरम थपेड़े लू भी मारे ।

अमलतास तुम किसके बल पर

खिल- खिल करते बाँह पसारे ।

पीले फूलों के गजरे तुम

भरी दुपहरी में लटकाए ।

चुप हैं राहें, सन्नाटा है

फिर भी तुम हो आस लगाए ।"

वाकई, झूमर से लटकते खिले खिले फूल, अपने रंग पर इतराते, यौवन पर इठलाते और क्षण भर में सड़कों की झोली को अपनी चपलता से भर देने वाले अमलतास में कुछ तो खास है वरना मई के सुलगते समय में किस की मज़ाल है जो सूरज को चुनौती दे सके। अमलतास के बारे में कहा जाता है कि इस पर फूल तभी लगना शुरू होते हैं जब इसकी जड़ें मजबूती से जम जाती हैं अर्थात परिपक्व होने के बाद...बिल्कुल वैसे ही जैसे चालीस पचास साल बाद का इश्क़… गम्भीर /परिपक्व/ स्थायी और हर पल गुदगुदाने वाला। तभी तो शायद कवियत्री मनप्रीत कौर 'मन' को लिखना पड़ा है:

"अमलतास की तरह महकता है,

मुरझाए से प्राणों में संगीत बुनता है ।

तुम्हारा प्रेम।।"

अमलतास आशिक़ों की ही पसंद नहीं बल्कि औषधि के जानकारों के लिए भी उतना ही खास है। आयुर्वेद के अनुसार, अमलतास के इस्तेमाल से बुखार, पेट की बीमारियां, त्वचा रोग, खांसी, टीबी और ह्रदय रोग आदि में लाभ लिया जा सकता है। इसके अलावा, मधुमेह, पीलिया, गठिया, छाले सहित तमाम रोगों के उपचार में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। 

अब तक मेरी तरह अमलतास से अनजान लोगों के लिए- इसे इंग्लिश में गोल्डन शॉवर और संस्कृत में राजवृक्ष भी कहा गया है। यह मूल रूप से स्वदेशी यानि हमारा अपना है जो म्यामांर से लेकर थाईलैंड तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। मजे की बात यह है कि थाईलैंड का यह राष्ट्रीय वृक्ष और फूल दोनों है। इसलिए आप चाहें तो अमलतास की मादकता का ‘बैंकाक कनेक्शन’ स्थापित कर सकते हैं। 

वैसे केरल में भी इसे राजकीय फूल का दर्जा हासिल है। अब फिर बात, इस पर मर मिटने की क्योंकि इन दिनों जब भी आप इसके क़रीब से गुजरेंगे, यह हौले से आप पर मुट्ठी भर पीले जगमग सितारे बिखेर देगा और बस आप भी कवियत्री 'काव्या' की तरह कह उठेंगे:

"रोक दे राहों में, 

ऐसा तुम्हारा मोहपाश।

तुम कैसे इतना खिलखिलाते हो,

कह दो न सुंदर अमलतास।।"


…..वैसे तो अंगुलियां भी उतावली हैं और मन भी मचल रहा है कि आज का दिन बस अमलतास के नाम कर दिया जाए लेकिन बुद्धि कहती है कल के लिए भी कुछ पल बचाकर रखे जाएं इसलिए  समापन  रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' की इन पंक्तियों के साथ,जो सब कुछ कह देती हैं:

"तुझे देखकर तो लगता है,

जो जितना तप जाता है ।

इन सोने के झूमर –जैसी,

खरी चमक वही पाता है ।

जीवन की कठिन दुपहरी में,

तुझसे सब मुस्काना सीखें ।

घूँट –घूँट पी रंग धूप का,

सब कुन्दन बन जाना सीखें ।"

इसलिए, यदि आप तपती दुपहरी में मन मारकर किसी काम से घर से बाहर निकले तो बस, अमलतास से थोड़ी सी ऊर्जा ले लें..यह आपकी तपन,मजबूरी और बेरुखी को भी मनमोहक बना देगा।


हिमाचल की पर्वत चोटियों पर राष्ट्रीय ध्वज की अनूठी उड़ान।

हिमाचल प्रदेश में कभी डाकिया पहाड़ों की पगडंडियों पर चिट्ठियों का थैला कंधे पर लादकर चलता था। तब किसी गांव में महीनों बाद बेटे की चिट्ठी पहु...