क्या आपको पता है कि हमारे देश में एक प्रदेश ऐसा भी है जहां का हर बच्चा मोगली है..वही, जंगल बुक वाला मोगली। अब मोगली तो रुडयार्ड किपलिंग की कल्पना मानी जाती है लेकिन मैं जिस राज्य की बात कर रहा हूं वहां हर बच्चा अपना जंगल लेकर पैदा होता है और जैसे जैसे वह बड़ा होता है,उसका जंगल भी उसके साथ बढ़ता जाता है..खास बात है कि यह जंगल भी कोई छोटा मोटा जंगल बल्कि पूरे 108 पेड़ वाला होता है। हम कह सकते हैं कि यहां हर बच्चे का मोगली की तरह अपना जंगल है।
खैर, पहेलियाँ न बुझाते हुए सीधे इस अभिनव पहल पर आते हैं। दरअसल हमारे देश में अष्टलक्ष्मी के नाम से विख्यात पूर्वोत्तर के एक राज्य सिक्किम में यह अद्भुत पहल हुई है। वैसे, सामान्य बोलचाल में उत्तर पूर्व के आठ राज्यों में से सात को सेवन सिस्टर्स और सिक्किम को वन ब्रदर कहा जाता है..मतलब सात बहनों का इकलौता भाई। तो इस भाई यानि सिक्किम में बच्चे के जन्म को प्रकृति से जोड़कर यह अनूठी परंपरा शुरू की गई है। इसे स्थानीय भाषा में ‘मेरो रुख, मेरो संतति’ यानी मेरा पेड़, मेरी संतान कहा जाता है।
आमतौर पर,किसी घर में बच्चे के जन्म की खबर आती है तो माना जाता है कि खुशियों ने उनके दरवाजे पर दस्तक दी है। इन खुशियों में शामिल होने के लिए रिश्तेदार आते हैं, मिठाइयां बंटती हैं, बच्चे के लिए कपड़े और खिलौनों का ढेर लग जाता है लेकिन सिक्किम में बच्चे के जन्म के साथ यह अनूठी परंपरा भी जुड़ जाती है और इससे हासिल खुशी तात्कालिक न होकर सदियों तक स्मृतियों का हिस्सा बन जाती है। दरअसल, यहां हर नवजात के नाम पर 108 पेड़ लगाए जाते हैं।
यह पहल वास्तव में पौधरोपण को सरकारी अभियान की सीमा से आगे ले जाकर परिवार में पीढ़ियों की स्मृति से जोड़ देती है। सामान्यतः बच्चे के जन्म की तारीख जन्म प्रमाणपत्र में दर्ज होती है, फोटो एलबम में सुरक्षित रहती है और परिवार की यादों में बनी रहती है लेकिन सिक्किम में इस तारीख के साथ पेड़ों को भी जोड़ दिया गया है।
इस योजना का एक और दिलचस्प पहलू इसका आर्थिक पक्ष भी है। जिसके तहत हर पात्र नवजात के नाम पर सरकार द्वारा 10,800 रुपये की राशि जमा की जाती है। इस तरह एक ओर बच्चे के नाम पर प्रकृति में निवेश होता है और दूसरी ओर उसके भविष्य के लिए आर्थिक बचत की शुरुआत भी हो जाती है। जब बच्चा 18 साल का होता है तो उसके साथ 108 पेड़ भी बड़े हो जाते हैं और साथ में जमा पैसे बढ़कर करीब 40 हजार रुपए तक पहुंच जाते हैं।
इस योजना की उल्लेखनीय बात यह भी है कि 108 पेड़ लगाने के लिए यहां वन एवं पर्यावरण विभाग पौधे भी उपलब्ध कराता है और जमीन भी, तकनीकी सहायता भी देता है और मौसम के अनुरूप पौधे लगाने की सलाह भी । अब आपके दिमाग में यह सवाल आ सकता है कि ऐसे तो देश भर में लाखों पौधे लगाए जाते हैं लेकिन जीवित कितने बचते हैं? इसलिए सिक्किम में पौधों की निगरानी और रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था भी की गई है। यहां 108 पौधों का रिकॉर्ड रखने के लिए संतति दस्तावेज बनता है। इसमें लगाए गए 108 पौधों का विवरण दर्ज किया जाता है। वैसे, बच्चे का परिवार इन पेड़ों की देखभाल अपने बच्चे की ही तरह करता है।
इस अनूठी परंपरा में अब तक करीब 8 हजार बच्चे जुड़ चुके हैं और लाखों पेड़ लग चुके हैं इसलिए सिक्किम के पहाड़ भरपूर हरियाली से ढके हुए हैं। यहां यह माना जाता है कि एक बच्चे का भविष्य केवल उसके परिवार से नहीं, उस प्रकृति से भी जुड़ा है जिसमें वह बड़ा होगा।
यही वजह है कि सिक्किम जैसे पहाड़ी राज्य में जंगल केवल हरियाली नहीं हैं। वे जलस्रोतों की सुरक्षा करते हैं, मिट्टी को थामते हैं, जैव विविधता को आश्रय देते हैं, पहाड़ों के पारिस्थितिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, भरपूर ऑक्सीजन देते हैं, शुद्ध हवा, स्वच्छ वातावरण और हरा भरा परिवेश बनाते हैं। ऐसे में बच्चे के जन्म को पेड़ लगाने से जोड़ना पर्यावरण संरक्षण को परिवार की रोजमर्रा की संवेदना से जोड़ने का एक अभिनव तरीका है।
खासतौर पर, आज जब दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और घटते वन क्षेत्र की चिंता हो रही है। इसमें सुधार के लिए बड़े-बड़े सम्मेलन हो रहे हैं, लक्ष्य तय किए जा रहे हैं और कार्बन उत्सर्जन कम करने की बातें हो रही हैं। ऐसे समय में सिक्किम की यह अनूठी पहल उम्मीद जगाती है कि यदि पर्यावरण को जीवन से जोड़ दिया जाए तो प्रकृति हमारे साथ साथ गुनगुनाएगी।

वाह, बहुत अच्छे ....क्या ऐसा सभी राज्यों में संभव नहीं हो सकता ?
जवाब देंहटाएंएकदम क्रांतिकारी योजना है “पर्यावरण है तो ही हम हैं", हमारा अस्तित्व पूरी तरह से शुद्ध हवा, पानी और मिट्टी पर निर्भर है। , बहुत ज्ञानवर्धक लेख 🙏🏻
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