शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

अंडमान की लाइम स्टोन केव्स: प्रकृति की अद्भुत कारीगरी !!

एक अद्भुत दुनिया.. जहां इंसानी शिल्पकला भी पूरी विनम्रता के साथ पराजय स्वीकार कर ले पर यहां तक पहुंचना किसी तपस्या से कम नहीं है। यह तपस्या सुबह चार बजे से शुरू होती है और ज़ाहिर है चार बजे किसी लंबी यात्रा पर निकलने के लिए घंटे दो घंटे पहले उठना ही पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि अद्भुत दुनिया से रूबरू होने की राह इतनी आसान तो नहीं ही होगी । करीब दो घंटे की 100 किमी की सड़क यात्रा, घंटे भर की लिखा पढ़ी और फिर दो किस्तों में पहले फेरी से एवं बाद में स्पीड बोट से नीले समंदर की शोर मचाती उछलती लहरों पर सवारी..इसके बाद करीब दो किमी तक लकड़ी के पुल, कच्चे एवं ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर पैदल यात्रा…तब जाकर मिलता है प्रकृति का ऐसा आश्चर्यजनक खजाना जो हमारी सफ़र की सारी थकान उतार देता है।


प्रकृति के इस नायाब खजाने में भगवान गणेश हैं, शंख है, देवी देवता, इंसान, हाथी, बंदर, जैली फिश और पता नहीं क्या क्या..हम देखते ही रह जाते हैं और हमारी आँखें आकृतियां बुनने एवं चुनने लगती हैं..वह भी मोबाइल की टॉर्च की रोशनी में।आइए, अब इस खजाने के रहस्य की परतें खोलते हैं। हम बात कर रहे हैं अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बाराटांग (बारतांग) की अपनी तरह की इकलौती लाइम स्टोन केव्स यानि चूना पत्थर की गुफाओं की।


अब किसी को ये लग सकता है कि इन चूना पत्थर की गुफाओं में ऐसा क्या है कि घंटों के सफ़र और नींद खराब करके देखा जाए तो उनके लिए उत्तर यही है पहले आओ और खुद देख जाओ। दरअसल,अंडमान या यहां के विभिन्न द्वीपों की यात्रा केवल नीले समुद्र, सफेद रेत और नारियल-सुपारी के पेड़ों की यात्रा भर नहीं है बल्कि यह प्रकृति के ऐसे कई अद्भुत नजारों की यात्रा है जो संभवतः देश में आमतौर पर कहीं और देखने को नहीं मिलते।

इस मायावी दुनिया के सफर की शुरुआत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से शुरू होती है । सबसे पहले हम सड़क मार्ग से लगभग 100 किलोमीटर दूर ज़िरकाटांग पहुंचते हैं। यह रास्ता घने जंगल, पेड़ पौधों की सरसराहट, प्रकृति की मनमोहक खुशबू, पक्षियों के कलरव और एक कतार में एवं एक ही दिशा में चलती सौ गाड़ियों के काफिले के साथ करीब दो घंटे में पूरा होता है। ज़िरकाटांग में तमाम सुरक्षा औपचारिकताओं को पूरा कर हम फेरी में चढ़कर बाराटांग पहुंचते हैं। इस फेरी में हमारे साथ बस, ट्रक, मोटरसाइकिल भी सफर करती हैं..खैर, फेरी की कहानी फिर कभी। 

फेरी से बाराटांग पहुंचकर आगे की यात्रा स्पीड बोट से होती है। लहरों की अठखेलियों के साथ उछल कूद करती हमारी नाव जब मैंग्रोव वन में घुसती है तो वे झूम कर हमारा इस्तकबाल करते हैं। मैंग्रोव पेड़ों/झाड़ियों के बीच लहराती हमारी नाव गंतव्य तक पहुंच जाती है लेकिन असल यात्रा अब शुरू होती है जो हरे भरे पेड़ों के बीच समुद्र के पानी को लकड़ी के पुल से पार करके पूरी होती है। यहां तक पहुँचना अपने-आप में एक रोमांचक अनुभव है क्योंकि यह रास्ता घने जंगलों, समुद्री खाड़ियों और संकरे जलमार्गों से होकर गुजरता है।

नाव से उतरने के बाद लकड़ी के पुल से होते हुए करीब एक दो किलोमीटर पैदल चलकर हम बाराटांग की विश्वप्रसिद्ध लाइमस्टोन गुफाओं तक पहुंच जाते हैं। यहां से शुरू होता है प्रकृति की कारीगरी से साक्षात्कार..पहली नजर में हो सकता है कि आपको ये गुफाएं साधारण लग सकती हैं लेकिन जैसे-जैसे हम आगे कदम दर कदम बढ़ते हैं, प्रकृति अपनी सम्पूर्ण कलाओं के साथ पूरी शिद्दत एवं भव्यता के साथ सामने आती है। कहीं मंदिर के स्तंभ दिखते हैं, कहीं मूर्ति, कई इंसान,कहीं कमल और कहीं पत्थर की जमी हुई जलधारा।

ये गुफ़ाएँ इंसान की बनाई कोई इमारत नहीं हैं बल्कि प्रकृति की सैकड़ों साल की साधना और कला का नमूना हैं। चूने के पत्थरों की यह कारीगरी प्रकृति के विभिन्न तत्वों का लाखों वर्षों का खेल है इसमें समुद्री जीवों के खोल, कोरल, कंकाल, पानी, पेड़, रासायनिक क्रियाएं सब कुछ शामिल हैं। यहां बनी आकृतियां तकनीकी शब्दावली में ‘स्टैलेकटाइट’ और ‘स्टैलेग्माइट’ कहलाती हैं। मतलब गुफा की छत से लटकते पत्थर नुमा आकार प्रकार स्टैलेकटाइट और जमीन से ऊपर उठते पत्थरों के स्तंभ स्टैलेग्माइट कहलाते हैं। 

दरअसल, लाखों वर्षों में पानी की बूँदों के साथ घुला हुआ चूना/कैल्शियम पत्थर धीरे-धीरे जमा होता रहा और समय ने इन्हें यह अद्भुत आकार दे दिए। इन गुफाओं की सबसे रोचक बात यह है कि यहाँ बनने वाली संरचनाएँ बहुत धीमी गति से विकसित होती हैं—कभी-कभी एक सेंटीमीटर बनने में सैकड़ों साल लग जाते हैं। इसलिए हर आकृति वास्तव में समय का एक जीवंत दस्तावेज है। यहाँ पहुँचकर एहसास होता है कि समुद्र के इस दूरस्थ द्वीप में प्रकृति ने केवल सुंदरता ही नहीं, बल्कि समय की अद्भुत शिल्पकला भी सहेज कर रखी है।

बारातांग की ये गुफ़ाएँ अंडमान -निकोबार द्वीप समूह की सबसे बड़ी भूमिगत गुफ़ा प्रणाली का हिस्सा हैं । इन गुफाओं का रखरखाव करने वाले वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि यहां इस तरह की करीब पौने दो सौ से ज़्यादा गुफाएं हैं लेकिन आम पर्यटक सिर्फ़ दो गुफाएं ही देख सकते हैं। बाकी गुफाएं घने जंगल में छिपी हैं। कहीं प्राकृतिक रूप से संरक्षित पक्षियों का बसेरा है तो कहीं पहुंच मार्ग नहीं है और किसी गुफा को अब तक टटोला ही नहीं गया है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझे तो लाइमस्टोन गुफाओं का निर्माण एक धीमी और जटिल रासायनिक प्रक्रिया है जो लाखों-करोड़ों वर्षों में होती है। इसे स्पेलियोजेनेसिस (speleogenesis) कहते हैं। यहां दर्ज विवरण के मुताबिक बारिश का पानी जब वायुमंडल से गुजर कर आता है, तो उसमें कार्बन डाइऑक्साइड भी घुल जाती है। यह पानी मिट्टी में मिलकर सड़ते हुए पौधों और जीवों से और भी कार्बन डाइ ऑक्साइड हासिल करके कार्बोनिक अम्ल में बदल जाता है। यह अम्ल धीरे धीरे चूने की चट्टानों को घोलता जाता है और प्रकृति की अलग अलग कलाकृतियां बनने लगती हैं लेकिन यह एक दो नहीं बल्कि लाखों सालों की रासायनिक क्रिया का नतीजा है।

बाराटांग की इन गुफाओं तक पहुँचना केवल पर्यटन नहीं बल्कि प्रकृति के साथ एक संवाद जैसा अनुभव है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह आने वाले अधिकांश लोग समुद्र तटों की ओर आकर्षित होते हैं, लेकिन जो लोग प्रकृति के रहस्यों को करीब से देखना चाहते हैं, उनके लिए बाराटांग की लाइमस्टोन गुफाएँ एक अनोखा अनुभव हैं।


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