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अनूठा ज्वालामुखी..जिसके साथ ले सकते हैं सेल्फी !!

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 ‘ज्वालामुखी’ नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं..आग का दरिया, चारों ओर बहता लाल आग सा दहकता लावा, रासायनिक गैसे और बहुत कुछ..इसके पास जाना तक नामुमकिन होता है। लेकिन हम बात कर रहे हैं एक जैसे ज्वालामुखी की जहां न आग है, न लावा, फिर भी धरती अपने अंदर जमा सामग्री बाहर उड़ेल रही है। यह ज्वालामुखी ऐसा है जिसे आप छू सकते हैं, इसके पास खड़े हो सकते हैं, फोटो खिंचवा सकते हैं और इसके बाद भी आपको घबराहट के स्थान पर सुकून मिलेगा…यह ‘मड वॉल्कानो’ यानि मिट्टी वाला ज्वालामुखी। मड वॉल्कानो (Mud Volcano) वाकई प्रकृति का एक अनोखा और रहस्यमयी चमत्कार है। खास बात यह है कि भारत का एकमात्र सक्रिय मड वॉल्कानो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में बाराटांग द्वीप (Baratang Island) पर स्थित है। वैसे, गूगल गुरु के मुताबिक दुनिया भर में केवल 2500 के आसपास मड वॉल्कानो हैं लेकिन हमारे देश में अंडमान के अलावा ये कहीं और नहीं मिलते। जैसा की हम सभी जानते हैं कि सामान्य ज्वालामुखी लावा उगलते हैं, लेकिन मड वॉल्कानो या मिट्टी के ज्वालामुखी ठंडी कीचड़, पानी और गैसों का मिश्रण बाहर निकालते हैं। यहाँ कोई लावा या आग नहीं...

क्या आपने कभी देखें..!! है नमक के खेत..!!

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चने के खेत, गेहूं के खेत, गन्ने के खेत..तो हम सभी ने खूब देखें हैं और सरसों के खेत यश चोपड़ा की फिल्मों का प्रमुख आकर्षण रहा है। सरसों के खेत इतने रोमांटिक हो सकते हैं ये हमें ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ जैसी फिल्मों से ही पता चला है क्योंकि हम तो फिल्म ‘अंजाम’ के गीत ‘जोरा जोरी चने के खेत में..’ या फिल्म ‘तराजू’ के गाने ‘चल गन्ने  के खेत में अप्पा काहे शर्माए रे..’ जैसे गीतों से बेचारे खेतों का चरित्र समझते रहे हैं। खैर, यहां हम खेतों का चरित्र चित्रण नहीं कर रहे बल्कि आपको एक ऐसे खेत से मिलवाना चाहते हैं जिसके बारे आप में से कई लोगों ने शायद सुना भी नहीं होगा। मुझे भी, इनके बारे में देखने के बाद ही पता चला। हम बात कर रहे हैं ‘नमक के खेत’ की…जी हां, सही सुना आपने नमक के खेत। नमक का दारोगा, नमक हलाल और नमक हराम के बाद नमक के खेत..बिल्कुल हमारे गांवों के खेतों की तरह, बस फर्क यह है कि इनमें गेहूं-चना नहीं नमक होता है। हाल ही में, सोमनाथ की यात्रा के दौरान जब हम सड़क मार्ग से अहमदाबाद आ रहे थे तो गुजरात के शानदार हाईवे से गुजरते हुए भावनगर के आसपास हमें सफेदी से भरे खेत नजर आए..खे...

मध्यप्रदेश के दो अद्भुत और सबसे बड़े महादेव..!!

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महाशिवरात्रि पर आज मध्यप्रदेश के दो सबसे बड़े शिवलिंग की बात..भगवान शंकर के ये दोनों स्थान अपने शिवलिंग के बड़े आकार भर के कारण नहीं बल्कि महत्व के कारण भी प्रसिद्ध हैं इसलिए यहां महाशिवरात्रि पर आस्था का सैलाब उमड़ता है। इनमें से एक है रायसेन जिले में और भोपाल के करीब स्थित भोजपुर मंदिर। यह मंदिर भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। चार विशाल स्तंभों वाले इस मंदिर का शिवलिंग इतना बड़ा है कि पूजा के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह शिवलिंग एक ही विशाल चट्टान से तराशा गया है, जो दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक माना जाता है।  यहां शिवलिंग की ऊंचाई करीब 7.5 फीट और आधार सहित कुल ऊंचाई 40 फीट से अधिक है जबकि मंदिर 115 फीट लंबा, 82 फीट चौड़ा और लगभग 13 फीट ऊंचे चबूतरे पर बना है। यहां का विशाल द्वार और मंदिर का अधूरापन भी प्रमुख आकर्षण है। बताया जाता है कि 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान राजा भोज द्वारा इस मंदिर का निर्माण शुरू किया गया था, लेकिन उस समय मंदिर के मुख्य भाग और गर्भगृह का काम ही पूरा हुआ। इसे "उत्तर भारत का सोमनाथ" भी कहा जाता है। भोजपुर मंदिर भारतीय पुर...

धूप और बर्फीली हवाओं में कुश्ती!!

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  मैदानी शहरों में भले ही पारे ने 30 डिग्री तक छलांग लगाकर गर्मी की आमद की आहट दर्ज करा दी हो लेकिन पहाड़ों पर  सर्दी और गर्मी के बीच कुश्ती जारी है। जब धूप जोर मारती है तो सड़कों के किनारे जमा बर्फ की मोटी परत भी सिसकने लगती है और शरीर में लिपटी कपड़ों की लेयर चुभने लगती हैं। ..लेकिन जैसे ही बर्फीली हवाओं को मौका मिलता है वे धूप को दबोच लेती हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे कबड्डी में रेडर को दूसरी टीम के खिलाड़ी दबोचते हैं। फिर क्या है..बर्फीली हवाओं के आगोश में आकर धूप भी ठंडी हो जाती है और कपड़ों की लेयर हमारा सुरक्षा कवच।  अधिकतम 15 डिग्री से लेकर न्यूनतम 1 डिग्री सेल्सियस के बीच सर्दी गर्मी की इस धमा चौकड़ी में आपको हर वक्त तैयार रहना पड़ता है। दक्षिण भारत और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में आ रहे सैलानियों के लिए तो अभी भी शायद यह कड़ाके की ठंड है इसलिए वे पूरे जिरह बख्तर मतलब ऊनी कपड़ों के साथ आते हैं इसलिए पहाड़ी इलाके उनकी रंग बिरंगी ऊनी टोपियों, मफलर और स्वेटर से गुलजार हैं। ...जबकि हनीमून कपल के लिए शायद यह मौसम सबसे मुफीद है इसलिए शादी के बाद लगता है वे सीधे पहाड़ों प...

जादुई पिटारे की तरह है रेडियो

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रेडियो सुनना इन दिनों कितना आसान है न? मोबाइल पर ऐप डाउनलोड करो और मनचाहे गाने और कार्यक्रम सुनो, लेकिन कुछ दशक पहले तक रेडियो ‘लग्जरी’ था। रेडियो खरीदने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। ये पढ़कर आश्चर्य हो रहा है न? हकीकत यही है कि ऐसा भी दौर था जब घर में रेडियो रखने और सुनने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था? बिल्कुल वैसे ही जैसे आज कार चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस चाहिए। तब रेडियो के लिए ब्रॉडकास्ट रिसीवर लाइसेंस जरूरी था। रेडियो सेट रखने वाले को पोस्ट ऑफिस से करीब 15 रुपए सालाना शुल्क देकर लाइसेंस लेना पड़ता था। हर साल इसको रिन्यू भी कराना पड़ता था और बिना लाइसेंस के रेडियो रखना गैर-कानूनी था। रेडियो को हम हमारे देश में सामान्य रूप से आकाशवाणी के नाम से जानते हैं। जेन ज़ी में यह एफएम, पॉडकास्ट, रेडियो ऐप्स जैसे तमाम नामों से लोकप्रिय है। यह एक जादुई पिटारा है । आप मोबाइल से, कार में, ईयर फोन के जरिए आसानी से रेडियो सुन सकते हैं लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब रेडियो एक बड़ा सा डिब्बा होता था, जिसमें एंटीना लगाकर दूर-दूर की आवाज़ें पकड़ी जाती थीं। आज वही रेडियो जेब के छोटे से स्मार्टफोन...

सरला माहेश्वरी: समाचार प्रसारण के एक युग का अंत..!!

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आज, 12 फरवरी 2026 को, भारतीय टेलीविजन इतिहास की एक चमकती हुई शख्सियत, दूरदर्शन की पूर्व समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी का निधन हो गया।  71 वर्ष की आयु में उनका यह अवसान न केवल मीडिया जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है, बल्कि उन लाखों दर्शकों के लिए भी है, जिनके घरों में उनकी शांत, मधुर और स्पष्ट आवाज़ ने समाचारों को विश्वसनीयता का पर्याय बना दिया था। सरला माहेश्वरी, एक ऐसी महिला जो सादगी, संयम और सटीकता की मिसाल बनीं; जिन्होंने काले-सफेद टेलीविजन से रंगीन युग तक का सफर तय किया और समाचार प्रसारण को गरिमा प्रदान की।  सरला माहेश्वरी  उस दौर की प्रतिनिधि थी जब महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और पेशेवर जीवन का संतुलन बनाना आसान नहीं था लेकिन सरला जी ने इसे न केवल संभाला, बल्कि एक मिसाल कायम की। उनकी सादगी और संयमपूर्ण व्यक्तित्व ने उन्हें हमेशा लोगों और अपनी जड़ों से जोड़े रखा । दूरदर्शन में उनकी शुरुआत बच्चों के कार्यक्रमों से हुई लेकिन जल्दी ही वे समाचार वाचिका बनकर उस स्थान पर आ गई जो शायद उन्हीं के लिए बना था। यह वह समय था जब भारत का टेलीविजन काले-सफेद से रंगीन युग में प्रवेश कर रहा ...

वाघा बार्डर से आंखों देखी:राष्ट्र गौरव की अमिट अभिव्यक्ति

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  ठंड की शामें उत्तर भारत में एक अनोखी रंगत भरी होती हैं। सूरज ढलते-ढलते आकाश में गुलाबी केसरिया आभा बिखेरता है, ठंडी हवाएँ हल्की सी कंपकंपी पैदा करती हैं और दूर से आती धुंध की चादर वातावरण को अपने आगोश में समेट लेती है। ऐसे में पाकिस्तान के लाहौर से महज 20 किमी और पंजाब के अमृतसर से 30 किलोमीटर दूर अटारी-वाघा बॉर्डर पर बीटिंग रिट्रीट समारोह देखना ठंड में भी गर्माहट ला देता है क्योंकि यहां प्रकृति की सर्दी देशभक्ति की गर्मी से टकराती है।  शाम के करीब साढ़े चार बज रहे हैं। ठंड से बचने के लिए हम भी सपरिवार शॉल, स्वेटर और जैकेट जैसे सुरक्षा कवच के साथ स्टेडियम में सबसे सामने वीआईपी सीट पर अपनी जगह ले लेते हैं। वैसे, यहां लोगों के आने का सिलसिला करीब तीन बजे से शुरू हो गया था और दर्शक दीर्घा धीरे धीरे भरने लगी है। स्टेडियम के बाहर तिरंगा ध्वज से लेकर तिरंगा कैप बेचने  एवं चेहरे पर राष्ट्रीय ध्वज की छाप छोड़ने वाले कलाकार मौजूद हैं। उनके लिए भी क्रिकेट मैच की तरह यही कमाई का अवसर है।  उधर, दर्शकों की भीड़ में बच्चे, बुजुर्ग, देशी विदेशी पर्यटक…सभी हैं और सबके चेहरे पर ग़ज़ब...

हिमाचल में गंगा.. है न वाकई चमत्कार..!!

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  कल्पना कीजिए, जब चारों तरफ चमकती धूप खिली हो लेकिन इसके बाद भी एक स्थान ऐसा हो जहां पूरा पानी कांच की तरह मोटी परत में जमा हो.. पत्थर का बना फर्श इतना ठंडा हो कि पैर जम जाए, लेकिन हवा इतनी शुद्ध एवं साफ की अंतर्मन तक महसूस हो.. अकल्पनीय लगता है न..लेकिन यह हकीकत है और वह भी क्वीन ऑफ हिल्स शिमला से तकरीबन सौ सवा सौ किलोमीटर दूर।  यहां तक पहुंचने का रास्ता भी इतना मनमोहक और रोमांचक है कि आप देश के तमाम दुर्गम सफर को भूल जाएंगे। एक तरफ पहाड़ की चोटियों से ऊंचाई में मुकाबला करता चीड़ देवदार का घना जंगल है तो ऊंचाई से विपरीत दिशा में प्रतिस्पर्धा करतीं गहरी खाई और बीच बीच में आवाजाही करते सियार एवं उनके जंगली दोस्त भी। हम भी वापसी में सियार के जोड़े से रूबरू हुए और वह भी इतने दमदार जोड़े से जो बिना डरे आंखों में आंखें डालकर देख रहे थे। हम बात कर रहे हैं गिरी गंगा की.. हरिद्वार की तरह मां गंगा का एक पवित्र स्थान। शिमला जिले के कड़ापत्थर एरिया के पास स्थित यह स्थान अभी तक पर्यटकों की भीड़, वाहनों की चिल्लपों और शोरगुल से बचा हुआ है। हर तरफ सुकून बिखरा है और चारों ओर बिखरी है बर्फ। ...

सफेद बर्फ, काली बर्फ़..में छिपी हमारी कहानी!!

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ये न तो आपके हमारे घर के पुराने गद्दों की मैली हो चुकी रुई है और न ही सर्फ या साबुन का झाग..इन दिनों शिमला जैसे तमाम पर्वतीय इलाकों में ये नजारा आम है। ये बर्फ़ है, वही बर्फ जिसको देखने के लिए हजारों लाखों लोग पहाड़ों पर जमा होते हैं। पहाड़ों पर जब पहली बार बर्फ गिरती है, तो सब कुछ कितना सुंदर लगता है न...श्वेत चादर ओढ़े खड़े पहाड़, बिल्कुल निर्मल, चमकदार, किसी संत की तरह। लेकिन धीरे-धीरे... हवा में उड़ती धूल, धुआँ, ट्रकों की कालिख, और हमारी अपनी जिंदगी की भागदौड़—सब मिलकर उस सफेद बर्फ़ पर कालिख की परत चढ़ा देते हैं। इसके फलस्वरूप खूबसूरत सफेद बर्फ अब काली होकर बदसूरत दिखने लगती है.. गंदी और नकारात्मकता से भरपूर उदास सी। हम इसे ‘काली बर्फ़’ कह सकते हैं। वैसे पहाड़ों पर काली बर्फ़ के अंग्रेजी नाम ब्लैक आइस का अलग ही खौफ है।यह बर्फ इतनी पारदर्शी होती है कि काली सड़क पर बिल्कुल घुल मिल जाती है और इस पर चलना लगभग नामुमकिन होता है। इस पर लोग सटासट फिसलते हैं, बिल्कुल बच्चों वाली फिसल पट्टी की तरह। अनजाने में कई लोग अपनी कमर,हाथ पैर तक तुड़वा लेते हैं। अब बात पुनः काली गंदी बर्फ की, वैसे...

प्रेम तो भावनात्मक अहसास है, दिखावा नहीं…!!

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  प्रिय ओशो के अनुसार, सच्चा प्रेम स्वतंत्रता है, न कि बंधन या स्वामित्व। उनका मानना था कि प्रेम एक अवस्था है। आप प्रेम में होते नहीं, बल्कि आप प्रेम होते हैं। जो भयमुक्त और साझा करने की भावना पर आधारित है। प्रेम, जीवन को सुंदरता और अर्थ देता है। भले ही यह बात ओशो ने कही है लेकिन तुम भी यह बात बखूबी जानती हो कि हमारा परस्पर प्यार या प्रेम भी एक अनूठा एहसास है, जो दिमाग से नहीं दिल से है और इसमें अनेक भावनाओं और अलग अलग विचारों का समावेश है। जाहिर सी बात है, आप जिससे प्यार से जुड़ जाते हैं उसका प्रेम स्नेह से लेकर खुशी के शिखर तक अपने आप पहुंचने लगता है। प्यार एक मजबूत आकर्षण और परस्पर जुड़ाव की भावना है जो सब भूलकर साथ साथ जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करती है..जैसे की हम । मेरा मानना है कि सच्चा प्यार वह होता है जो सभी हालातों में आप के साथ हो, यानी दुख में भी और सुख में भी.. आप को और आप की खुशियों और परेशानियों को अपनी खुशियां या दुख माने… जैसे मेरा और तुम्हारा प्यार।  मनीषा, तुम मेरी पत्नी भर नहीं हो बल्कि दो दशकों से ज्यादा से मेरी हम कदम हो । प्यार का मतलब हमारे लिए सिर...

चुटकियों में जिंदगी का फ़लसफ़ा समझाती रोचक किस्सागोई

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कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो बिना किसी गूढ़ और अलंकृत भाषा के भी जीवन के अहम फलसफे आसानी से समझा देती हैं। बिल्कुल परिवार के उस सदस्य की तरह  जो बच्चों से लेकर बड़ों तक के बीच हल्के फुल्के अंदाज में अपनी बात कह जाता है। वरिष्ठ लेखक एवं संचार विशेषज्ञ संजय सक्सेना एवं उनकी नई किताब ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ भी परिवार के सदस्य की तरह है जो बिना लाग लपेट के जरूरी संदेश दे जाती है लेकिन अंदाजे बयां ऐसा है कि आप मुस्कराते हुए उस संदेश को आत्मसात कर सकते हैं। ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ न केवल बिना किसी बनावटीपन के आपको ज़िंदगी की सच्चाई से रूबरू कराती हैं बल्कि यह किताब आपको अपनी डायरी खोलकर कोई संदेश, कोई सबक या बस एक ईमानदार एहसास जैसा कुछ न कुछ लिखने के लिए प्रेरित भी करती है। ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ वास्तव में रोज़मर्रा की ज़िंदगी के उन छोटे-छोटे किस्सों का संग्रह है, जो सतह पर साधारण लगते हैं, लेकिन गहराई में जीवन के गहरे संदेश छिपाए हुए हैं। यह किताब ठीक उसी तरह है जैसे हमारी अपनी डायरी का आखिरी पन्ना…जहाँ हम वे सभी बातें लिखते हैं जो कहीं और नहीं लिख पाते, जो सच्ची, ईमानदार और बिना किसी फि...

डमरू,मृदंगम और नगाड़ा पर बैठकर लीजिए भारतीय संगीत का आनंद..!!

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बाँसुरी, डमरू, एकतारा, इसराज, मृदंगम्, नगाड़ा जैसे नाम सुनकर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन कानों में गूंजने लगी न…तो तैयार रहिए, कल नईदिल्ली में विजय चौक पर आपको इन्हीं नामों पर बैठकर इनकी ही धुनों को सुनना है..और केवल यही नहीं, पखावज, संतूर, सारंगी, सारिंदा, सरोद, शहनाई, सितार, सुरबहार, तबला और वीणा भी आपकी बैठक व्यवस्था का हिस्सा होंगे। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आपको इन वाद्य यंत्रों पर बिठाया जाएगा बल्कि पहली बार इस वर्ष बीटिंग रिट्रीट समारोह के लिए विजय चौक पर बैठने के लिए बनाए गए एंक्‍लोज़र्स के नाम भारतीय वाद्य यंत्रों के नाम पर रखे गए हैं ताकि आम लोगों को ज्यादा म्यूजिकल एवं अपनापन महसूस हो। गौरतलब है कि बीटिंग द रिट्रीट एक पुरानी सैन्य परंपरा है। पहले युद्ध के समय शाम होते ही बिगुल बजाकर सैनिकों को संकेत दिया जाता था कि लड़ाई रोक दी जाए और सभी अपने शिविरों में लौट आएं। यही परंपरा अब बीटिंग द रिट्रीट समारोह के रूप में निभाई जाती है। अब हर साल विजय चौक पर 29 जनवरी को होने वाला ‘बीटिंग रिट्रीट’ गणतंत्र दिवस समारोहों के समापन का प्रतीक होता है । इसे सेनाओं की एकता, अनुशासन और गौर...

उत्सव से ज्यादा आफत है बर्फबारी

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इन दिनों टीवी और अखबारों के समाचारों में आप हिमाचल, उत्तराखंड या कश्मीर में हो रही बर्फबारी का मज़ा ले रहे पर्यटकों को देख रहे होंगे। वे कैसे एक दूसरे पर बर्फ फेंक रहे हैं, नाच रहें हैं और उत्सव मना रहे हैं। आप का मन भी मचल रहा होगा कि काश हम भी जल्दी से वहां पहुंच जाए और खूब बर्फ के गोले बनाकर खेले..लेकिन यह टीवी पर देखने में ही अच्छा लगता है क्योंकि पहाड़ों पर बर्फबारी अवसर या उत्सव भर नहीं लाती बल्कि आफत तथा आपदा भी लाती है। पहाड़ी इलाकों में सर्दियों में बर्फबारी हमेशा एक जादुई दृश्य रचती है। आसमान से गिरती सफेद रुई जैसी बर्फ, पेड़ों पर जमी बर्फ की चमकदार परत, और चारों ओर फैली सफेद चादर जैसी बर्फ… ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने खुद एक श्वेत कथा रच दी हो लेकिन इस मनभावन सुंदरता के पीछे कई कड़वी कहानियां छिपी होती हैं, जो यहां रहने वाले या फिर इस बर्फबारी को भुगतने वाले ही समझ पाते हैं। पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी के दौरान और उसके बाद कई चुनौतियां आती हैं, जैसे फिसलन भरी सड़कें, ठंड से स्वास्थ्य जोखिम, बिजली-पानी की कटौती, खाने पीने की दिक्कत,रोजगार और यात्रा में बाधाएं। सबसे पहली और बड़...

देवभूमि के बाग़ में (सफेद) दुशाला ओढ़े खड़ी है..!!

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क्वीन ऑफ हिल्स शिमला के साथ साथ देवभूमि हिमाचल में नए साल की आज 23 जनवरी ने लोगों की खोई मुस्कान वापस लौटा दी है। यह एक ऐसा दिन है जब आसमान ने अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलटे और सफ़ेद स्याही से नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया..ऐसा अध्याय जिसे हर कोई पढ़ना चाहता है..स्थानीय लोग, पर्यटक, होटल व्यवसाई और स्वयं प्रकृति भी।  सुबह-सुबह जब लोगों की आँखें खुलीं, तो उनकी खिड़की के शीशे पर कोई अनजान बच्चा उँगली से दिल नहीं बना रहा था—बल्कि बादल खुद बर्फ के छोटे-छोटे चमकदार सफेद टुकड़े बिखेर रहे थे। शहर का मशहूर रिज मैदान (आम लोगों के लिए मॉल रोड), जो कल तक धूप में अपनी पुरानी कॉलर वाली कोट पहने उदास सा था, आज सुबह-सुबह एकदम सफ़ेद शॉल ओढ़े खिलखिला रहा था—जैसे कोई देवदूत या परी सफेद दुशाला ओढ़े आ गई है और सबकी नज़रें उसी पर टिक गई हों।  मॉल रोड पर आज बर्फ़ के बीच चाय की केतली से अदरक-इलायची की खुशबू ज्यादा मनमोहक लग रही है। स्कूटर, कार और घरों की लाल-हरी छतों ने जगमग सफेदी भरा दुपट्टा ओढ़ लिया है । बर्फ़ की ठंडक पाकर कई वाहन चैन की नींद सो रहे हैं और मालिक से शायद फुसफुसाकर कह भी रहे हैं.. ...

देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क पर सफ़र !!

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बर्फ के बीच हाड़ कंपाती ठंड, मूसलाधार बारिश, आए दिन हो रहे भूस्खलन, पहाड़ से गिरते पत्थरों के बीच न डायनामाइट, न जेसीबी, न कोई ड्रिल मशीन..बस छैनी- हथौड़ी…और इंसानी हौंसला। मौत के साए में दिन रात बिना रुके काम करते हुए 18 हज़ार मज़दूरों ने मौसम की बेदर्दी और पहाड़ की कठोरता पर जीत हासिल कर दिखाई और बना दी देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क। इसी सड़क पर हमें एनाकोंडा के चट्टानी रूप से भी रूबरू होने का मौका मिलता है। हम बात कर रहे हैं राष्ट्रीय राजमार्ग-5 की। यह केवल एक सड़क भर नहीं, बल्कि इतिहास, साहस और रोमांच की जीवित धरोहर  है। यह इंसानी जिद का प्रमाण है। जिसमें महज हाथों ने असंभव को संभव बनाते हुए न केवल मजबूत पहाड़ों को काट डाला बल्कि झुकने पर भी मजबूर कर दिया। कभी हिंदुस्तान-तिब्बत रोड कहलाने वाली यह सड़क कालका से शुरू होकर शिमला, रामपुर, किन्नौर और शिपकिला दर्रे तक जाती है। लगभग 450 किलोमीटर लंबी यह पहाड़ी राह सतलुज नदी के साथ-साथ चलती हुई हिमालय के सबसे दुर्गम और सुंदर इलाकों से गुजरती है। यह एक ऐसी सड़क है, जो हमें प्रकृति की विराटता, मानव साहस और इतिहास की गहराइयों से जोड़...