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जब हेडलाइट हार गई लेकिन हौसला जीत गया..!!

रात के करीब 11.30 बजे..विमान की खिड़की से बाहर कुछ नजर नहीं आ रहा। आमतौर पर इतनी ऊंचाई से चंडीगढ़ शहर की लाइट दिखने लगती हैं। लगा, शायद कोहरा होगा। कई मिनटों की मशक्कत के बाद विमान उतरा लेकिन असली चिंता यहीं से शुरू हुई क्योंकि कोहरा इतना घना था कि तमाम प्रबंध के बाद भी पायलट विमान को सही जगह पर नहीं उतार पाया था। ग्राउंड स्टाफ ने किसी तरह जहाज को सीधा कराकर सुरक्षित जगह तक पहुंचाया लेकिन विजिबिलिटी ज़ीरो थी यानि कुछ भी नहीं दिख रहा था। शून्य दर्शनीयता की समस्या इतनी विकराल थी कि कड़ाके की ठंड में यात्रियों को हवाई अड्डे तक पहुंचाने के लिए एयर ब्रिज बनाना तक मुश्किल था। इसलिए यात्रियों को जहाज में ही आधे घंटे से अधिक समय तक कैद रहना पड़ा। फिर, लंबे विचार विमर्श के बाद बसों का इंतजाम किया गया..वे भी किसी तरह सरकते हुए विमान तक आई, यात्री ठिठुरते हुए और अंधेरे में किसी तरह बस तक पहुंचे और बसें आहिस्ता आहिस्ता हवाई अड्डे तक।    पायलट ने तो हिम्मत दिखाकर हमें हवाई अड्डे तक लाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली लेकिन समस्या अब शुरू हुई। हवाई अड्डे से चंडीगढ़ में होटल तक पहुंचना वर्ल्ड कप...