रविवार, 7 जून 2026

नाश्ता नहीं, हमारी पहचान है…पोहा



कुछ व्यंजन केवल भोजन नहीं होते, वे हमारी सुबह की पहचान बन जाते हैं। पोहा भी ऐसा ही एक स्वाद है, जो रसोई से उठती हल्दी, कढ़ी (करी) पत्ते और भुनी मूंगफली की खुशबू के साथ दिन की शुरुआत को खास बना देता है। चावल के साधारण दानों से तैयार यह व्यंजन भारत की विविधता का भी प्रतीक है—हर प्रदेश में इसका नाम और स्वाद बदल जाता है, लेकिन लोकप्रियता नहीं। 

हल्का, पौष्टिक और झटपट बनने वाला पोहा पीढ़ियों से भारतीय नाश्ते की शान है। शायद इसलिए एक प्लेट पोहा केवल भूख नहीं मिटाता, बल्कि अपनापन भी परोसता है। यह बात शायद कम लोग जानते होंगे कि हर वर्ष 7 जून को विश्व पोहा दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारत के सबसे लोकप्रिय और सर्वसुलभ नाश्तों में से एक पोहा को समर्पित है। भले ही इस दिवस के पीछे कोई लंबा इतिहास या आधिकारिक पृष्ठभूमि न हो, लेकिन भारतीय जनजीवन में पोहे की गहरी पैठ इसे एक विशेष पहचान दिलाती है। जिस देश में लाखों लोगों की सुबह चाय और पोहे की खुशबू से शुरू होती हो, वहां इस व्यंजन के नाम एक दिन होना बिल्कुल स्वाभाविक लगता है।

पोहा दरअसल चावल से बनाया जाता है। धान को विशेष प्रक्रिया से तैयार कर चपटा किया जाता है, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न नामों से जाना जाता है। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इसे पोहा या पोहे कहा जाता है। कहीं यह चिवड़ा कहलाता है तो कहीं चूड़ा। दक्षिण भारत में इसे अवल या अटुकुलू, बंगाल और असम में चीडा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ तथा नेपाल के कुछ हिस्सों में चिउरा/चिवड़ा कहा जाता है। नाम भले बदल जाएं, लेकिन इसका स्वाद और लोकप्रियता पूरे देश में एक समान दिखाई देती है।

देश में पोहे की सबसे प्रसिद्ध पहचान इंदौर से जुड़ी हुई है। इंदौरी पोहा अपने खास स्वाद, सेव, हरे धनिये, अनार के दानों और साथ में परोसी जाने वाली जलेबी के लिए प्रसिद्ध है। सुबह-सुबह इंदौर की गलियों में पोहा-जलेबी की दुकानों पर लगने वाली भीड़ इस व्यंजन की लोकप्रियता का प्रमाण है। वहीं महाराष्ट्र में कांदा पोहा (प्याज वाला पोहा) घरों में नाश्ते का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। कई राज्यों में इसमें मूंगफली, मटर, आलू, नारियल या मसालों का उपयोग कर स्थानीय स्वाद के अनुसार तैयार किया जाता है।


पोहा केवल स्वाद के कारण लोकप्रिय नहीं है, बल्कि इसके स्वास्थ्य लाभ भी इसे विशेष बनाते हैं। यह हल्का, सुपाच्य और पौष्टिक भोजन माना जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त मात्रा में होते हैं, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। साथ ही इसमें आयरन, कुछ आवश्यक विटामिन और खनिज तत्व भी पाए जाते हैं। कई पोषण विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पोहे में मूंगफली, हरी सब्जियां, अंकुरित दालें या सोयाबीन जैसी सामग्री मिलाई जाए तो इसका पोषण मूल्य और बढ़ जाता है।

पोहे की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि यह ग्लूटेन-फ्री भोजन है। इसलिए जिन लोगों को ग्लूटेन से संबंधित समस्याएं होती हैं, उनके लिए यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है। यह अपेक्षाकृत आसानी से पच जाता है और पेट पर अधिक भार नहीं डालता। यही कारण है कि बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर आयु वर्ग के लोग इसे पसंद करते हैं।

मधुमेह के रोगियों के लिए भी संतुलित मात्रा में तैयार किया गया पोहा उपयोगी माना जाता है। इसमें मौजूद जटिल कार्बोहाइड्रेट शरीर में ऊर्जा का धीरे-धीरे संचार करते हैं, जिससे लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है। हालांकि किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसका सेवन भी संतुलित मात्रा में ही किया जाना चाहिए।

 भारत में हजारों टन चावल हर वर्ष पोहा बनाने के लिए उपयोग किए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह वर्षों से किसानों की आय का साधन रहा है। कई स्थानों पर धार्मिक आयोजनों, त्योहारों और सामुदायिक कार्यक्रमों में भी पोहे का विशेष स्थान है। आज के समय में जब फास्ट फूड और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ रहा है, तब पोहा भारतीय पारंपरिक खानपान की उस विरासत का प्रतिनिधित्व करता है जो स्वाद और स्वास्थ्य दोनों का संतुलन बनाए रखती है। यह ऐसा व्यंजन है जो महंगे रेस्तरां से लेकर सड़क किनारे ठेलों और साधारण घरों तक हर जगह समान रूप से लोकप्रिय है।

विश्व पोहा दिवस केवल एक व्यंजन का उत्सव नहीं है, बल्कि भारतीय खाद्य संस्कृति, स्थानीय परंपराओं और स्वस्थ जीवनशैली का भी उत्सव है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे पारंपरिक भोजन केवल स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि पौष्टिक और पर्यावरण की दृष्टि से भी टिकाऊ हैं। कुल मिलाकर पोहा केवल एक नाश्ता नहीं, बल्कि भारतीय जीवनशैली का एक जीवंत हिस्सा है।

#Poha #Pohalovers. #food

गुरुवार, 4 जून 2026

क्यों घट रही है समानता की प्रतीक साइकिल की लोकप्रियता!!


साइकिल केवल एक परिवहन साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, समानता और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक रही है। भारतीय समाज में साइकिल का महत्व अनेक स्तरों पर देखा जा सकता है। साइकिल अमीर-गरीब, जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को कम करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों विद्यार्थियों, विशेषकर लड़कियों के लिए साइकिल शिक्षा तक पहुंच का साधन बनी। साइकिल ने महिलाओं को भी स्वतंत्र आवागमन की सुविधा दी है । साइकिल प्रदूषण नहीं फैलाती और ईंधन की आवश्यकता नहीं होती। बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के दौर में इसका उपयोग सामाजिक जिम्मेदारी का परिचायक माना जाता है। साइकिल चलाने से शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है। 

कहने का आशय यह है कि साइकिल केवल दो पहियों का वाहन नहीं, बल्कि समान अवसर, स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। लेकिन पिछले कुछ सालों से साइकिल का चलन घट रहा है। लोग अब साइकिल चलाने में शर्माने लगे हैं। मोटर साइकिल एवं कारों के बढ़ने चलन ने भी साइकिल की लोकप्रियता को कम किया है।

हो सकता है कि यह बात कम लोग जानते हो कि साइकिल को लोकप्रिय बनाने के लिए दुनिया भर में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा हर साल 3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। यह दिवस 2018 से शुरू किया गया है।  इस वर्ष के लिए संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक विषय "हरित भविष्य के लिए साइकिल चलाना" है। यह दिवस साइकिल को परिवहन के एक किफायती, विश्वसनीय और टिकाऊ साधन के रूप में बढ़ावा देता है जो पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभकारी है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को साइकिल चलाने के प्रति जागरुक करना है। इतना तो हम सभी जानते हैं कि नियमित तौर पर साइकिल चलाना शरीर के लिए काफी फायदेमंद है। मोटापा घटाने से लेकर शरीर की तंदुरुस्ती के लिए नियमित साइकिल चलाना वरदान है। 

जानकर कहते हैं कि रोजाना आधा घंटा साइकिल चलाने से हृदय रोग, मोटापा, मानसिक बीमारी, मधुमेह, गठिया रोग जैसी कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है। आज के समय मोटर वाहनों को बढ़ते उपयोग के कारण वातावरण में प्रदूषण काफी बढ़ रहा है। इस कारण वातावरण को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए साइकिल का उपयोग जरूरी हो गया है।  

जहां तक देश में साइकिल की कुल संख्या या इससे जुड़े आंकड़ों की बात करें तो भारत में कारों या मोटरसाइकिलों की तरह साइकिलों का कोई केंद्रीकृत सरकारी रजिस्ट्रेशन डेटाबेस नहीं है, लेकिन फिर भी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और साइकिल उद्योग संघ के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल साइकिलों की संख्या 11करोड़ से अधिक है। इसी रिपोर्ट के अनुसार भारत के लगभग आधे से अधिक 50.4 प्रतिशत परिवारों के पास कम से कम एक साइकिल अवश्य है। इस सेहतमंद दो पहिया वाहन की राज्यों में लोकप्रियता की बात करें तो साइकिल स्वामित्व के मामले में पश्चिम बंगाल देश में सबसे आगे है, जहाँ 78.9 प्रतिशत परिवारों के पास साइकिल है। इसके बाद उत्तर प्रदेश 75.6 फ़ीसदी और ओडिशा 72.5 प्रतिशत का स्थान आता है। 

उल्लेखनीय उपलब्धि यह है कि चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा साइकिल निर्माता देश है। भारत में हर साल लगभग 1.6 से 1.8 करोड़ साइकिलों का उत्पादन किया जाता है। वहीं, ऑल इंडिया साइकिल मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल 1 करोड़ से सवा करोड़ साइकिलें बेची जाती हैं। पंजाब का लुधियाना शहर तो भारत की 'साइकिल राजधानी' के रूप में जाना जाता है क्योंकि देश में बनने वाली कुल साइकिलों का लगभग 75 से 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले लुधियाना में ही तैयार होता है।


आंकड़ों से भले ही यह पता चलता है कि भले ही भारत के 50 प्रतिशत से अधिक घरों में साइकिल मौजूद है, लेकिन शहरों में सुरक्षित साइकिल ट्रैक न होने और वाहनों की भीड़ बढ़ने के कारण दैनिक आवागमन में साइकिल का उपयोग महज 2 से 5 फीसदी ही है। भारतीय शहरों में सबसे बड़ी चुनौती साइकिल चालकों की सुरक्षा और सड़कों पर भारी ट्रैफिक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, भारत में साइकिल चालकों के लिए सड़क दुर्घटनाएं एक बड़ा जोखिम हैं।

यदि हम दुनियाभर में साइकिलों की स्थिति का अध्ययन करें तो मौजूदा समय में दुनिया में 100 करोड़ से अधिक साइकिल हैं। वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा साइकिल वाले देशों में चीन सबसे आगे है। यहाँ 45 से 50 करोड़ साइकिलें हैं जबकि नीदरलैंड दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जहाँ इंसानों से ज़्यादा साइकिलें हैं। यहाँ की आबादी लगभग पौने दो करोड़ है, जबकि साइकिलों की संख्या 2.3 करोड़ से अधिक है। यहाँ प्रति व्यक्ति साइकिल का औसत दुनिया में सबसे ज़्यादा है। 

डेनमार्क भी प्रति व्यक्ति साइकिल के औसत के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। यहाँ लगभग 80 प्रतिशत लोगों के पास अपनी साइकिल है। जर्मनी में भी करीब 6.2 से 8.3 करोड़ साइकिलें हैं।  हालिया रुझानों के अनुसार, यहाँ अब सामान्य साइकिलों से ज़्यादा ई-बाइक्स (इलेक्ट्रिक साइकिल) बिक रही हैं। 

एशिया में जापान साइकिल का एक बड़ा केंद्र है। यहाँ 7.2 करोड़ से अधिक साइकिलें हैं और प्रति व्यक्ति औसत 0.57 है।  एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, नीदरलैंड के शहर साइकिल चलाने के हिसाब से सबसे सुरक्षित शहर माने जाते हैं। इसके बाद, डेनमार्क, बेल्जियम और फ्रांस जैसे देशों का नंबर आता है। कनाडा का मॉन्ट्रियल, ताइवान का ताइपे और जापान का फुकुओका शहर भी साइकिल चलाने के लिहाज से अच्छे शहरों में गिने जाते हैं।


हम सभी जानते हैं कि भारत में साइकिल कभी आम आदमी का सबसे भरोसेमंद वाहन हुआ करती थी, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसकी लोकप्रियता अपेक्षाकृत कम हुई है। इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और बुनियादी कारण हैं। मसलन भारत में साइकिल को अक्सर आर्थिक मजबूरी से जोड़ा जाता है। जैसे-जैसे लोगों की आय बढ़ी, दोपहिया और चारपहिया वाहन सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक बन गए। इसलिए बहुत से लोग साइकिल छोड़कर मोटरसाइकिल या स्कूटर की ओर बढ़ गए। मोटरसाइकिलें भी पहले की तुलना में अधिक सुलभ हो गई हैं। आसान किस्तों और ऋण सुविधाओं ने उनके प्रसार को बढ़ावा दिया है।

एक अन्य महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि हमारे देश में शहरों का आकार तेजी से बढ़ा है। नौकरी, शिक्षा और अन्य कार्यों के लिए लोगों को कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। ऐसे में साइकिल की तुलना में मोटर वाहन अधिक सुविधाजनक लगते हैं। इसके अलावा देश के अधिकांश भारतीय शहरों में साइकिल चालकों के लिए अलग लेन नहीं हैं। साइकिल चलाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा भारत में सड़कें और फ्लाईओवर भी हैं जो मुख्यतः मोटर वाहनों को ध्यान में रखकर विकसित किए गए हैं। 

हालांकि, हाल के वर्षों में स्वास्थ्य, पर्यावरण और फिटनेस के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण साइकिल का महत्व फिर से बढ़ रहा है। कई शहरों में साइकिल ट्रैक, साइकिल-शेयरिंग और फिटनेस राइड्स को खासकर बढ़ावा दिया जा रहा है। कुल मिलाकर यदि सुरक्षित मार्ग, बेहतर शहरी योजना और सकारात्मक सामाजिक दृष्टिकोण विकसित हो जाएं, तो साइकिल भारत में फिर से एक महत्वपूर्ण परिवहन साधन बन सकती है।


मंगलवार, 2 जून 2026

दो जून की या छह जून की...कौन सी रोटी है अच्छी!!


आज दो जून है तो सुबह से शाम तक सोशल मीडिया में ‘दो जून की रोटी’ छाई हुई है। हर कोई दो जून की रोटी का महत्व/संघर्ष गिनवा रहा है लेकिन मेरी समस्या यह है कि बदलते वक्त में किसे सही माने.. दो जून की रोटी को या छह जून की रोटी को। अब आप सोच रहे होंगे कि दो जून तो ठीक है पर ये छह जून क्या बला है?

आपको, छह जून की रोटी का मतलब समझाने से पहले हमारे बाद की नई पीढ़ियों और खासकर जेन जी को दो जून की रोटी का मतलब समझाना ज्यादा जरूरी है। दरअसल, दो जून की रोटी एक लोकप्रिय मुहावरा है जिसका सामान्य अर्थ है  दो वक्त की रोटी या दो वक्त का भोजन। हालांकि, यह मुहावरा सिर्फ भूख मिटाने की बात नहीं करता बल्कि यह संतोष का प्रतीक है। इसका अर्थ है मेहनत करके संतोष के साथ दो वक्त की सादी रोटी, सब्ज़ी और दाल जुटाना। 

हमारे पूर्वजों के लिए यही जीवन की असली खुशी थी। उनकी दिनचर्या भी इसी के मुताबिक निर्धारित थी..मसलन सुबह जल्दी नाश्ता, शाम को रात का खाना। बीच में कुछ नहीं क्योंकि इससे पेट को भरपूर आराम मिलता है एवं शरीर को काम करने का मौका ।


अब बात छह जून की रोटी की..तो दो जून की तरह छह जून की रोटी का मतलब है छह वक्त की सुकून भरी रोटी। छह जून की रोटी की अवधारणा आज के बदलते दौर की देन है और मौजूदा समय के तमाम डॉक्टर, न्यूट्रिशनिस्ट (पोषण विशेषज्ञ) और इंस्टाग्राम के ‘हेल्थ गुरु’ इस छह जून की नई अवधारणा को हवा दे रहे हैं। 

पोषण विशेषज्ञों की भाषा में छह जून की रोटी को ‘पीस-मील’ के नाम से जाना जाता है। पीस मील का अर्थ है दिन में 5-6 बार अलग अलग अंतराल में छोटे-छोटे टुकड़ों में खाना। जैसे सुबह नाश्ता, 11 बजे स्नैक, दोपहर लंच, शाम को टी-टाइम, फिर डिनर और रात को कुछ हेल्दी बाइट। पीस मील में पेट न तो कभी खाली रहता है और न ही ठूंस ठूंसकर भरा जाता है।

अब, दो जून पर दिमाग में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हमारी दादी-नानी के दौर की दो जून की रोटी सही है या फिर आधुनिक खानपान जानकारों की छह जून (पीस मील) की सलाह ? जैसा कि हम सभी भली भांति जानते हैं कि हमारे भारतीय परिवारों में दो वक्त की रोटी सिर्फ मजबूरी नहीं, बल्कि एक स्वस्थ आदत है। सुबह का दमदार ऊर्जा से भरपूर स्वादिष्ट नाश्ता, फिर दिन भर मेहनत और शाम को हल्का खाना। इससे पेट को 12-14 घंटे की ‘नैचुरल फास्टिंग’ भी मिल जाती है । शरीर सतत् रूप से फैट बर्न करता रहता है, इंसुलिन लेवल भी स्थिर रहता और पाचन तंत्र को भी आराम मिलता है।

 


कई रिसर्च भी इसे सही ठहराते हैं। अध्ययनों में पाया गया कि दिन में दो बड़े मील (खासकर ब्रेकफास्ट और लंच) लेने वाले लोगों में वजन कम होने की दर बेहतर रही, ब्लड शुगर कंट्रोल रहा और भूख का हॉर्मोन बेहतर तरीके से काम करता रहा । इस थ्योरी के समर्थकों का कहना है कि लगातार थोड़े थोड़े अंतराल पर छोटे-छोटे खाने से शरीर को इस बात का पता ही नहीं चलता कि कब खाना है और  कब आराम करना है। इसके फलस्वरूप हमेशा हल्की भूख, ओवर ईटिंग और पाचन की समस्या बनी रहती है।

वहीं, छह जून की रोटी यानि पीस मील के समर्थकों का मानना है कि डायबिटीज या इंसुलिन रेसिस्टेंस वाले लोगों के लिए छोटे-छोटे मील फायदेमंद होते हैं। इससे, एनर्जी लेवल कम नहीं होता। इसके अलावा, वर्तमान दौर में ऑफिस, जिम, ट्रैफिक, टीवी,मोबाइल में  लोग इतने व्यस्त रहते हैं कि एक बार में भारी खाना पचाना मुश्किल हो गया है। छोटे-छोटे स्नैक्स जैसे बादाम, फल, योगर्ट उन्हें दिन भर एक्टिव रखते हैं।


उधर, दो जून और छह जून की रोटी के इस विवाद में विज्ञान अभी भी “वन साइज फिट्स ऑल” अर्थात् सभी के लिए एक ही तरह के खानपान पर कोई आम सहमति नहीं बना पाया है। कुछ लोगों खासकर एथलीट्स, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्गों के लिए बार-बार छोटा खाना बेहतर हो सकता है। वही, वजन कम करने वाले, पीसीओडी वालों के लिए दो-तीन बड़े, पौष्टिक मील बेहतर काम करते हैं। 

इसलिए, मेरी सलाह तो यह है कि दो,चार या छह वक्त की बजाए अपने शरीर की जरूरत एवं संतोष का ध्यान रखिए। अगर दो मील में ही एनर्जी और संतोष मिल रहा है तो जबरदस्ती 6 मील मत खाओ। इसी तरह, चाहे दो बार खाओ या छह बार, जो खा रहे हो वो असल खाना हो जैसे घर का, मौसम के अनुकूल और पौष्टिक, न की प्रोसेस्ड स्नैक्स ।

कुल मिलाकर “दो जून की रोटी” का मुहावरा आज भी प्रासंगिक है। यह हमें याद दिलाता है कि जिंदगी की असली खुशी भोग-विलास में नहीं, संतोष और संयम में है। आधुनिक पीस-मील हमें सुविधा देता है, लेकिन पुरानी परंपरा हमें संतुलन सिखाती है। इसलिए, न तो दादी हमेशा सही थीं, न ही डॉक्टर। सही वो है जो आपके शरीर, लाइफस्टाइल और मेटाबॉलिज्म के साथ मैच करता हो क्योंकि स्वास्थ्य और संतोष दोनों साथ-साथ चलें, यही असली ‘मील’ है फिर चाहे वह दो जून से मिले या छह जून से।



सोमवार, 1 जून 2026

चांदनी रात में शिमला का सौंदर्य


 पूर्णिमा की रात में चंद्रमा के धवल प्रकाश के बीच शिमला की 12 से 15 डिग्री की ठंडी हवा वातावरण में सिहरन घोल रही है। मॉल रोड पर टहलते हुए पर्यटकों की भीड़ के बीच चंद्रमा की सोलह कलाओं से दमकती रात में ऐसा लग रहा है मानो पूरा शहर किसी उत्सव की तैयारी में हो। रात का अंधेरा गहराते ही पूर्ण गोलाई लिए चंद्रमा ने धीरे-धीरे आकाश पर पूरीतरह से अपना अधिकार जमा लिया ।

मॉल रोड के मध्य खड़ा ऐतिहासिक चर्च अपनी पीली रोशनी में किसी यूरोपीय चित्रकला जैसा प्रतीत हो रहा है। वहीं, चर्च की ऊंची मीनार के पीछे चमकता चंद्रमा ऐसा लग रहा है मानो किसी कलाकार ने आकाश पर चांदी का विशाल दीप टांग दिया हो।  पीली लाइट को अपने घेरे में लिए दूधिया रोशनी में नहाया चर्च और भी भव्य लग रहा है।


उधर, दूर जाखू पहाड़ी की चोटी पर विराजमान हनुमान जी की विशाल प्रतिमा भी अद्भुत आभा बिखेर रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे स्वयं बजरंगबली शिमला की रक्षा के लिए रात्रि प्रहरी बनकर खड़े हों। नीचे मॉल रोड पर टहलते लोगों की चहल-पहल, नवयुगलों का मीठा सा कोलाहल, देवदार के वृक्षों की सरसराहट और ऊपर शांत, उज्ज्वल चंद्रमा—इन सबने मिलकर ऐसा दृश्य रचा था जिसे शब्दों में पूरी तरह बांध पाना कठिन है। 

इस बीच, मॉल रोड पर सजे कैफे और दुकानों की रोशनियां भी जगमगाने लगी हैं। पहाड़ों की ढलानों पर बसे घरों की चमचमाती बत्तियां दूर से ऐसी दिखाई दे रही हैं जैसे धरती पर असंख्य जुगनू उतर आए हों। चेहरे को छूकर गुजरते और देवदार की भीनी सुगंध अपने साथ ले आते ठंडी हवा के झोंके बीच बीच में इस स्वप्न लोक से बाहर ले आते हैं।


वही, पर्यटक रुक-रुककर चांदनी के आगोश में समाएं शिमला के इन दृश्यों को अपने कैमरों में कैद कर साथ ले जाने में जुट हैं, लेकिन आंखों में समा रहा यह सौंदर्य किसी भी तस्वीर से कहीं अधिक जीवंत, मोहक और स्मरणीय है।

आकाश में घुमड़ती काले बादलों की कतार कभी-कभी चंद्रमा के सामने से गुजरकर उसने ढकने का असफल प्रयास करती हैं तो ऐसा लगता है जैसे मॉल रोड पर हनीमून मनाने आई किसी नववधू ने अपने किसी आदरणीय को एकाएक सामने देखकर दुपट्टे से घूंघट ओढ़ने की कोशिश की हो।

 कुछ ही क्षण बाद जब बादल हट जाते हैं और चंद्रमा फिर पूरी शान से चमक उठता है तो नव युगलों की अठखेलियां भी बेपर्दा होने लगती हैं। चर्च के इर्दगिर्द पसरी नवविवाहित जोड़ों की खिलखिलाहट घंटियों की सी मधुर ध्वनि और दूर जाखू की पहाड़ी पर पसरी निस्तब्धता मिलकर वातावरण को रोमांटिक एवं आध्यात्मिक सा स्पर्श दे रहे हैं ।


जब देश के अधिकतर इलाके सूरज के गुस्से से दो चार हो रहे हैं और गर्म हवा के थपेड़े चेहरे को किसी थप्पड़ की तरह लाल कर रहे हैं.. तब शिमला में चंद्रमा की धवल रोशनी में ठंडी हवा के झोंके धरती पर स्वर्ग से कम महसूस नहीं होते।

आज शिमला केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति, आस्था और सौंदर्य का जीवंत संगम है। पूर्णिमा का चंद्रमा पूरे शहर को अपनी चांदनी में भिगोकर शायद यही संदेश दे रहा था कि प्रकृति के सबसे सुंदर दृश्य अक्सर शोर में नहीं, बल्कि शांति में रचे जाते हैं।


शनिवार, 30 मई 2026

उदन्त मार्त्तण्ड' से लेकर आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस तक हिंदी पत्रकारिता

 

हिंदी पत्रकारिता की दो शताब्दियों की यात्रा केवल समाचारों के प्रसार की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज, संस्कृति, राजनीति और तकनीकी विकास का जीवंत दस्तावेज भी है। 1826 में 'उदन्त मार्तण्ड' के प्रकाशन से लेकर आज के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित मीडिया युग तक, हिंदी पत्रकारिता ने अनेक उतार-चढ़ाव, संघर्ष, प्रयोग और नवाचार देखे हैं। यह यात्रा परंपरा और आधुनिकता के संगम की ऐसी गाथा है, जिसने न केवल पत्रकारिता को समृद्ध किया बल्कि जनमानस को भी जागरूक और सशक्त बनाया।

कोलकाता के कोलूटोला इलाके की अमरतल्ला गली से कानपुर निवासी वकील, पंडित युगल किशोर शुक्ल ने 30 मई 1826 को साप्ताहिक पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' पहला अंक प्रकाशित किया। 'उदन्त मार्त्तण्ड' न केवल भारत का पहला हिन्दी समाचार पत्र था, बल्कि यह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक साहसिक भाषाई और सांस्कृतिक प्रयोग भी था। इसका पूरा श्रेय पंडित युगल किशोर शुक्ल को जाता है। उस दौर में जब अंग्रेजी, बांग्ला और फारसी का बोलबाला था, इसने देवनागरी लिपि में छपाई कर हिन्दी भाषियों को अपनी पहचान और आवाज दी। पंडित युगल किशोर शुक्ल ने जब 'उदन्त मार्त्तण्ड' का पहला अंक प्रकाशित किया होगा, तब शायद उन्हें भी इस बात का आभास नहीं रहा होगा कि वे एक ऐसी मशाल जला रहे हैं जो आने वाली दो सदियों तक भारत की सामाजिक और राजनीतिक चेतना को आलोकित करेगी।

अल्पायु में ही 'उदन्त मार्तण्ड' ने भविष्य के राष्ट्रवादी समाचार पत्रों के लिए एक ढाँचा तैयार किया। इसने भारतीय मानस में सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना जगाने का कार्य किया, जो आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनी। इसे मध्यदेशीय भाषा का पत्र कहा गया, जिसने उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संवाद का एक सेतु बनाने का प्रयास किया, भले ही उस समय कलकत्ता में हिन्दी भाषियों की संख्या कम थी।

यह पत्र केवल समाचारों का माध्यम नहीं था, बल्कि इसने सामाजिक बुराइयों पर कड़ा प्रहार किया और समाज में जागरूकता लाने का काम किया। इसने तत्कालीन भारतीय समाज के सरोकारों को केंद्र में रखा। अपनी संक्षिप्त प्रकाशन अवधि में ही इसने ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई। सरकारी सहायता और डाक सुविधाओं के अभाव के बावजूद, इसने एक 'क्रांतिकारी अखबार' के रूप में अपनी पहचान बनाई। 'उदन्त मार्तण्ड' भाषाई बाधाओं और संसाधनों की कमी के कारण केवल 79 अंक तक ही प्रकाशित हो पाया, लेकिन इसने हिंदी में सोचने और लिखने की नींव रख दी। 1827 में अंतिम अंक में श्री शुक्ल ने लिखा था कि 'आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तंड उदन्त, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत।' अल्पायु में ही 'उदन्त मार्तण्ड' ने भविष्य के राष्ट्रवादी समाचार पत्रों के लिए एक ढाँचा तैयार किया। इसने भारतीय मानस में सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना जगाने का कार्य किया, जो आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनी। इसे मध्यदेशीय भाषा का पत्र कहा गया, जिसने उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संवाद का एक सेतु बनाने का प्रयास किया, भले ही उस समय कलकत्ता में हिन्दी भाषियों की संख्या कम थी। यही कारण है कि 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाकर पूरा देश इस पत्र के ऐतिहासिक साहस और योगदान को याद करता है।


हिंदी पत्रकारिता ने 200 वर्षों में साम्राज्यवाद से लड़ाई लड़ी, स्वतंत्रता दिलाई, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनी, डिजिटल उछाल लिया और अब एआई की चुनौती का सामना कर रही है। यह यात्रा सिर्फ अखबारों की नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक राजनीतिक चेतना की कहानी है। रोचक किस्सों, गुमनाम नायकों, बलिदानों और तकनीकी क्रांतियों से भरी यह विकास यात्रा हमें पत्रकारिता के तमाम पहलुओं और बदलावों से रूबरू कराती है। इन परिवर्तनों को आसानी से समझाने के लिए हम हिंदी पत्रकारिता की इस मैराथन यात्रा को निम्नलिखित भागों में विभक्त कर आसानी से सकते हैं।

उद्भव और प्रारंभिक संघर्ष (1826-1873):

जैसा कि हम सभी भली-भाँति जानते हैं कि हिंदी पत्रकारिता का जन्म बंगाल में हुआ, जहाँ अंग्रेजी, बंगाली और फारसी पहले से सक्रिय थी। पहले हिंदी समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' के लिए पंडित युगल किशोर शुक्ल ने 16 फरवरी 1826 को लाइसेंस लिया और इसी साल 30 मई को पहला अंक प्रकाशित हुआ। फिर 1829 में राजा राममोहन रॉय ने हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली और फारसी में 'बेंगदूत' निकाला। यह अखबार भी मात्र 12 अंक तक ही प्रकाशित हो पाया। लेकिन यह साप्ताहिक पत्र सती प्रथा का विरोध जैसे सुधारों का माध्यम भी बना। 1854 में कोलकाता से ही श्याम सुन्दर सेन के संपादन में समाचार 'सुधावर्षन' प्रकाशित हुआ। बनारस से 'बनारस अखबार' ने हिंदी पट्टी में समाचार पत्रों का प्रवेश कराया। राजा शिव प्रसाद के सितारे-हिंद ने उर्दू-हिंदुस्तानी शैली अपनाई। इस युग में दर्जनों प्रयोग हुए जैसे सुधाकर, प्रजा हितैषी, ज्ञानदीप आदि लेकिन अधिकांश छोटे और अल्पकालिक थे। चूँकि उस समय देश में साक्षरता मात्र 3-4 फीसदी थी और सुविधाओं का भी अभाव था फिर भी ये पत्र गाँवों तक पहुँचे। इस दौरान कई सकारात्मक बातें भी हुई जैसे कि भाषा संस्कृत से हिंदी और भारी से सरल की ओर बढ़ी। अखबारों प्रकाशन की छोटी आयु के बाद भी प्रकाशकों में ब्रिटिश सेंसरशिप, आर्थिक दबाव, मुद्रण तकनीक की कमी के बाद भी प्रकाशन का हौंसला बढ़ता गया। मोटेतौर पर इस दौर की पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य सूचना देना कम और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति जागृति के साथ धार्मिक-सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करना अधिक था।

साहित्य और सुधार का दौर (1873-1900):

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1873 में हरिश्चंद्र मैगजीन (बाद में हरिश्चंद्र चंद्रिका) शुरू किया। इससे पहले 1867 में उनका 'कवि वचन सुधा' आ चुका था। एक तरह से भारतेंदु युग ने हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी। इसी दौरान भारत मित्र, हिंदी प्रदीप, उचित वक्ता आदि समाचार पत्र निकले। इसी दौर में भाषा शुद्ध हुई और खड़ी बोली का विकास भी हुआ। इस दौर में विधवा विवाह, बाल विवाह विरोध, शिक्षा प्रसार, जाति प्रथा जैसे मुद्दों के जरिये पत्रकारिता सिर्फ खबर नहीं, सामाजिक क्रांति का हथियार बन गयी। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने जहाँ 'सरस्वती' के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता को मजबूत किया। वहाँ, भारतेंदु ने साहित्यकारों को पत्रकारिता से जोड़कर मुंशी प्रेमचंद जैसे स्तंभ लेखक पत्रकारिता को दिए। इस दौर में पत्रकारिता केवल समाचार नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक सांस्कृतिक विरोध था। 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल' के मंत्र ने हिंदी को जन-जन की भाषा बनाया। इस दौर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन की नींव पड़ रही थी और पत्रकारिता इस आंदोलन का महत्वपूर्ण हथियार बन रही थी।

विद्रोह का दौर (1900-1947):

यह पत्रकारिता का स्वर्णिम दौर था जिससे समाचार पत्रों को समाज और देश की जनता की आवाज बनने का अवसर दिया। हम कह सकते हैं कि 20वीं सदी में हिंदी पत्रकारिता राष्ट्रीय चेतना का स्वर बनी। इस दौर में क्रांति की अलख जगाने वाले प्रमुख समाचार पत्रों की बात करें तो 1913 में कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी ने 'प्रताप' का प्रकाशन आरंभ किया और यही 16 पृष्ठों का यह साप्ताहिक क्रांतिकारियों का हथियार बन गया। प्रताप का संपादन करते हुए विद्यार्थी जी ने सीधेतौर पर लिखा था कि 'हम जो कुछ लिखते हैं, सत्य के लिए लिखते हैं।' इस बात से भी हम सभी बखूबी परिचित हैं कि प्रताप के क्रांतिकारी शब्द अंग्रेजों को बुरी तरह चुभते थे और यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बार-बार जेल भेजा। प्रताप की जगाई स्वराज की अलख को 'अभ्युदय', 'मतवाला' और 'आज' जैसे समाचार पत्रों ने लहर बना दिया। इस लहर को आगे बढ़ाने में वंदे मातरम, स्वदेश, तरुण भारत ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। गांधी जी द्वारा चलाये गए असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा एवं भारत छोड़ो आंदोलन को देशव्यापी बनाने में हिंदी प्रेस की प्रभावी भूमिका थी। इसी दौर में गांधी का 'नवजीवन' और 'हरिजन' जनता की आवाज बने और महात्मा गांधी के संदेश को गाँव-गाँव पहुँचाने का माध्यम भी। इन अखबारों की धमक से घबराकर अंग्रेज सरकार ने दमन चक्र शुरू किया और तमाम हिंदी पत्र बंद कर दिए गए, प्रेस जब्त हुए तथा संपादक जेल भेजे गए। पत्रकारिता उस समय कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि राष्ट्र-सेवा का संकल्प थी। इस समय के पत्रकार केवल लेखक नहीं थे, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने जेल यात्राएं की, आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। इस दौर में लेखन शैली में भी बदलाव आया। भाषा सरल और जनसुलभ हुई, ताकि अधिक से अधिक लोग जुड़ सकें। संपादकीय लेखों का प्रभाव इतना गहरा था कि वे जनमत निर्माण का मुख्य स्रोत बन गए।

विस्तार, नियंत्रण और चुनौतियों का दौर (1947-1990):

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हिंदी पत्रकारिता ने लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनने और देश के नवनिर्माण में सहभागी बनने का दायित्व संभाला। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, अमर उजाला, नवभारत, नई दुनिया देशबंधु, जनसत्ता, दैनिक भास्कर जैसे कई अखबार प्रभावी रूप से उभरे। सरकारी नीतियों, योजनाओं और विकास कार्यों तक जनता तक पहुँचाने में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही। साथ ही, सत्ता की आलोचना और लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व भी अखबारों ने निभाया। इसी दौर में आपातकाल के दौरान हिंदी अखबारों की ताकत देखने को मिली। आपातकाल हिंदी पत्रकारिता के लिए एक कठिन परीक्षा थी। सेंसरशिप लागू कर दी गई थी और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा दिया गया था। इस समय कुछ समाचार पत्रों ने सरकार के दबाव में झुकने का रास्ता चुना, जबकि कुछ ने विरोध का साहस दिखाया। यह दौर इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र का प्रहरी भी है। आपातकाल के बाद पत्रकारिता में आत्ममंथन हुआ और स्वतंत्रता तथा निष्पक्षता के मूल्यों को और अधिक मजबूती मिली।


वहीं, तकनीकी का विस्तार भी हुआ और 1980-90 में ऑफसेट प्रिंटिंग और कंप्यूटर कंपोजिंग आई। समाचार पत्रों ने क्षेत्रीय विस्तार किया। धर्मयुग, दिनमान, साप्ताहिक, इण्डिया टुडे और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाओं और अखबारों ने सम-सामयिक एवं साहित्यिक पत्रकारिता को लोकप्रिय बनाया। सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन 'अज्ञेय' (दिनमान), धर्मवीर भारती (धर्मयुग) और मनोहर श्याम जोशी (साप्ताहिक हिंदुस्तान) जैसे दिग्गजों ने पत्रकारिता को बौद्धिक रूप से समृद्ध किया।

नई सदी का उफान (1991-2020):

 देश में आर्थिक उदारीकरण की हवा बही तो मिशनरी अखबार, उद्योग में परिवर्तित हो गए। अखबार उद्योग को भी नए पंख लग गए। आर्थिक सुधारों ने मीडिया को पूर्ण रूप से एक 'उद्योग' बना दिया। उन्हें दुनिया भर से श्रेष्ठ संसाधन जुटाने और पाठकों तक सौंदर्यपरक और व्यवस्थित तरीके से पहुँचने का मौका मिला और यहीं से पत्रकारिता का स्वरूप मीडिया हो गया और वह यह नये किस्म का चोला पहनकर मिशन से बिजनेस हो गया। इसी दौर में ब्रेकिंग न्यूज की संस्कृति शुरू हुई और रिपोर्टिंग का भी तौर-तरीका बदल गया। उल्लेखनीय बात यह है कि इस दौर में न्यूज चैनलों की टीवी क्रांति के बावजूद हिंदी प्रेस मजबूत और मजबूत होती गयी। दैनिक भास्कर, अमर उजाला, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, नई दुनिया, राजस्थान पत्रिका जैसे तमाम अखबार समूहों ने बहु संस्करण का मॉडल अपनाया और साथ ही इंटरनेट पर भी उनके ऑनलाइन एडिशन और एप्स की धमक सुनाई देने लगी। बड़े मीडिया हाउस बने और कॉर्पोरेट प्रभाव बढ़ने लगा। हालाँकि इससे संसाधनों और तकनीक में सुधार हुआ, लेकिन निष्पक्षता और गुणवत्ता पर प्रश्न भी उठने लगे।

सोशल मीडिया का क्रांतिकारी दौर 2010 के बाद सोशल मीडिया ने आँधी-तूफान की तरह इस क्षेत्र में घुसपैठ की और धीरे-धीरे यह पत्रकारिता का 2.0 संस्करण बन गया। मोबाइल के कंधे पर चढ़कर इंटरनेट शहरों से गाँवों तक पहुँच गया और उसी तेजी से सोशल मीडिया की पैठ बढ़ती गयी। इंटरनेट ने छोटे-छोटे इलाकों के वीडियो, न्यूज, लाइव अपडेट को देशव्यापी बना दिया और तब शुरुआत हुई पत्रकारिता की एक नयी विधा 'डेटा जर्नलिज्म' की जिसने भाषा को और सरल करते हुए इसे गली मोहल्लों की भाषा बना दिया। सोशल मीडिया ने इमोजी के जरिये भाषा को अलग ही रूप दे दिया। सरल शब्दों में कहें तो स्मार्टफोन और सस्ते डेटा ने पत्रकारिता का लोकतंत्रीकरण कर दिया। लगभग सभी बड़े समाचार पत्रों और चैनलों ने अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए। वीडियो कंटेंट, लाइव अपडेट्स और इंटरैक्टिव फीचर्स ने समाचारों को अधिक आकर्षक बना दिया। अब केवल बड़े घराने ही प्रकाशक नहीं थे; हर व्यक्ति एक 'सिटीजन जर्नलिस्ट' बन गया। ट्विटर (अब एक्स), फेसबुक और यूट्यूब समाचारों के प्राथमिक स्रोत बन गए।

सोशल मीडिया के विस्तार ने 'फेक' न्यूज जैसी बीमारियों को भी जन्म दिया और कई मामलों में सही-गलत की पहचान खत्म हो गयी। स्थिति यहाँ तक आ गयी कि कई मीडिया संस्थानों सहित खुद सरकार को फेक्ट चैक इकाइयाँ बनानी पड़ी। लेकिन इन सभी बाधाओं के बाद भी हिंदी ने दुनिया का सबसे बड़ा भाषाई मीडिया बनने का परचम लहरा दिया और हिंदी अखबार विश्वसनीयता में सबसे आगे बने रहे। हालाँकि, इस दौर में डिजिटल पत्रकारिता ने गति और पहुँच तो बढ़ाई, लेकिन फेकन्यूज और अपुष्ट सूचनाओं की समस्या से विश्वसनीयता एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी।

आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआई) दौर (2020 से आगे):

 आज हिंदी पत्रकारिता अपने सबसे चुनौतीपूर्ण और रोमांचक मोड़ पर है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआई) की पदचाप से ही 2025-26 में हिंदी पत्रकारिता में खलबली मच गयी। किसी को आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस पत्रकारिता पर सबसे बड़ा खतरा नजर आया तो किसी को, यह काम को और आसान बनाने का जरिया। Reuters और India AI Summit 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार 70 प्रतिशत से ज्यादा न्यूज संगठन अब एआई का उपयोग कर रहे हैं और इसके जरिये ऑटोमेटेड राइटिंग, डेटा एनालिसिस, पर्सनलाइजेशन, अनुवाद, फेकन्यूज डिटेक्शन जैसे विभिन्न काम करने लगे हैं। कई अखबारों के न्यूजरूम में अब आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस ट्रेंडिंग टॉपिक्स स्कैन करता है, हेडलाइंस सुझाता है, वॉइस ओवर जेनरेट करता है। अब पाठक खबर नहीं ढूंढता बल्कि खबर पाठक को ढूंढती है। गूगल और मेटा के एल्गोरिदम तय करते हैं कि आप क्या पढ़ेंगे। हेडलाइन लिखना, डेटा का विश्लेषण करना और यहाँ तक कि लेखों का सारांश तैयार करना अब सेकंडों में एआई द्वारा किया जा रहा है। दुनिया के विकसित देशों को तो छोड़ो आज भारत में ही 'सना' (आज तक) और 'लीसा' जैसे एआई न्यूज एंकर्स अब खबरें पढ़ रहे हैं।

सही मायने में प्रिंट मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का मिलन पत्रकारिता के इतिहास में एक दुधारी तलवार की तरह है। जहाँ एक ओर एआई ने काम की गति एवं सहजता बढ़ाई है, वहीं दूसरी ओर इसने पत्रकारिता की साख और मौलिकता के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। एआई द्वारा जनरेट की गई गलत सूचनाएँ या मनगढ़ंत तथ्य (Hallucinations) प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी पूँजी विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा सकते हैं। एक बार छप जाने के बाद अखबारों में गलती सुधारना डिजिटल की तुलना में कठिन होता है। इसके साथ साथ, एआई मॉडल अक्सर मौजूदा पत्रकारिता के आधार पर तैयार होते हैं, जिससे बौद्धिक संपदा के उल्लंघन और मौलिक लेखकों के हक मारे जाने का खतरा बढ़ गया है। इससे नौकरियाँ जाने एवं मानवीय मेधा के ह्रास का खतरा भी बढ़ गया है।

चुनौतियाँ और भविष्य:

 दो सदियों की पत्रकारिता की इस यात्रा में हिंदी पत्रकारिता के सामने अब सबसे बड़ा संकट साख का है क्योंकि फेक न्यूज और क्लिकबेट पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती बन गए हैं। इसी तरह हिंग्लिश के बढ़ते प्रयोग से मूल हिंदी की शुद्धता प्रभावित हुई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग से यह सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या यह मानवीय संवेदनाओं और ग्राउंड रिपोटिंग की जगह ले पाएगा क्योंकि पत्रकारिता का मूल सहानुभूति और सत्य की खोज है। प्रिंट मीडिया के लिए एआई एक सहायक तो हो सकता है, लेकिन वह संपादक की जगह नहीं ले सकता। फिलहाल यह तो दावे से कहा जा सकता है कि भविष्य उसी संस्थान का उज्ज्वल है जो एआई की तकनीकी सटीकता और मनुष्य के नैतिक विवेक के बीच संतुलन बिठा पाएगा।

'उदन्त मार्त्तण्ड' से शुरू हुई हिंदी पत्रकारिता की यात्रा आज एआई और डिजिटल मीडिया के अत्याधुनिक युग तक जरूर पहुँच चुकी है। इन 200 वर्षों में उसने न केवल तकनीकी बदलावों को अपनाया, बल्कि समाज के हर परिवर्तन को अपने भीतर समाहित किया। 'उदन्त मार्तण्ड' के हाथ से लिखे जाने वाले दौर से लेकर आज चैट-जीपीटी जैसे एआई टूल द्वारा न्यूज बुलेटिन तैयार करने तक, हिंदी पत्रकारिता ने लंबा सफर तय किया है। स्वरूप बदला है, माध्यम बदले हैं और गति बदली है, लेकिन इसकी आत्मा आज भी वही है-जनता की आवाज बनना। यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि पत्रकारिता केवल खबरों का संकलन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और दिशा-निर्देशक है। भविष्य में चाहे तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, पत्रकारिता का मूल उद्देश्य-सत्य, निष्पक्षता और जनहित- सदैव सर्वोपरि रहना चाहिए। हिंदी पत्रकारिता की यह विकास यात्रा एक जीवंत परंपरा है, जो निरंतर आगे बढ़ रही है-नए प्रश्नों, नई चुनौतियों और नई संभावनाओं के साथ।

(यह लेख अंतर राष्ट्रीय शोध पत्रिका *समागम* के विशेषांक में प्रकाशित हुआ है।)

मंगलवार, 26 मई 2026

कहाँ से लाते हो इतना तेज़, सौंदर्य और अहसास...अमलतास !!!!

 


गर्मी से दहक रहे मैदानी इलाकों में सुनहरी आभा से जगमगाता यह पेड़ बरबस ही/ बार बार अपनी ओर खींच रहा था..और फिर क्या था हम भी खुद को रोक न सके और उससे जान पहचान बढ़ाने के लिए उसके पास जाने के लिए विवश हो गए… वैसे इश्क़ भी तो यही करता है..अपनी ओर खींचता है और आप बेबस से खिंचे चले जाते हैं। मैंने पहले कभी इतने ध्यान से इस पेड़ को फूलते नहीं देखा था क्योंकि प्रकृति से थोड़ा सा भी प्यार करने वाले हर शहर/इलाक़े में चटक केसरिया-लाल फूलों से लदे गुलमोहर और रंग बिरंगे तितलियों से फूलों से भरे बोगनबेलिया आपको कुछ और देखने ही नहीं देते या फिर शाम ढलते ही मधुमालती की महक हमारा आपका ध्यान भटका देती है लेकिन जब तपती दोपहर में 45 डिग्री तापमान में सूरज से निडर होकर नैन मटक्का करते इन फूलों को देखा तो फिर न मन माना और न ही मोबाइल का कैमरा।..आख़िर सूरज की तपिश से उसी का रंग लेकर मनमोहक नजारों वाले इस ‘अमलतास’ के पेड़ में कुछ तो अलग है,जो इसे खास और बहुत खास बनाता है। 

अमलतास की खास बात यह भी है कि गर्मियों की तपती दोपहर में जब अधिकांश पेड़ मुरझाए से दिखाई देते हैं, तब पीले फूलों से लदा यह पेड़ मानो धरती पर उतरी धूप का उत्सव बन जाता है। इसकी लंबी-लंबी झूलती सुनहरी लड़ियाँ हवा के साथ ऐसे लहराती हैं, जैसे प्रकृति ने अपने हाथों से स्वर्णिम श्रृंगार किया हो। युवा सौंदर्य की तरह सड़क किनारे खिला अमलतास हमें पल भर ठहरकर उसे निहारने पर मजबूर कर देता है। इसकी चमकती पीली आभा केवल आंखों को सुकून नहीं देती, बल्कि मन में भी एक अजीब-सी ताजगी और प्रसन्नता भर देती है। 


तपते मौसम में अमलतास का खिलना यह एहसास कराता है कि कठिन समय में भी सुंदरता और उम्मीद अपनी पूरी चमक के साथ जीवित रह सकती है। तभी तो कवियत्री काव्या ने अपने पेज पर लिखा है:

"पीले झूमरों से सजा

महल सा लगता है

मई की गर्मी में

दिल को सुकून बाँटता

बस यूँ ही मुड़ जाते कदम

उस रमणीय वृक्ष के पास

कौतूहल से भरा

यह मन चिल्लाया था

कौन है यह मनमोहन

कौन है यह वृक्षों में

उगलता स्वर्ण?

अमलतास!!"

जैसे वृहस्पतिवार/गुरुवार को पीले कपड़ों में दफ्तरों-बाजारों में सौंदर्य बिखरा रहता है वैसे ही जब आँखें सड़कों पर बिखरे अमलतास के खिलखिलाते पीले फूलों पर ठहरी तो हाथ इंटरनेट पर इसका पता-ठिकाना (तथ्य) जानने के लिए मचल उठे। फिर गूगल गुरु ने बताया कि अपन तो इसके नए नए आशिक़ हैं और हमसे पहले तमाम बड़े कवि-लेखक अमलतास से इश्क़ लड़ा चुके हैं। रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' ने तो अपनी कविता में पूछा है:

"धरती तपती लोहे जैसी

गरम थपेड़े लू भी मारे ।

अमलतास तुम किसके बल पर

खिल- खिल करते बाँह पसारे ।

पीले फूलों के गजरे तुम

भरी दुपहरी में लटकाए ।

चुप हैं राहें, सन्नाटा है

फिर भी तुम हो आस लगाए ।"

वाकई, झूमर से लटकते खिले खिले फूल, अपने रंग पर इतराते, यौवन पर इठलाते और क्षण भर में सड़कों की झोली को अपनी चपलता से भर देने वाले अमलतास में कुछ तो खास है वरना मई के सुलगते समय में किस की मज़ाल है जो सूरज को चुनौती दे सके। अमलतास के बारे में कहा जाता है कि इस पर फूल तभी लगना शुरू होते हैं जब इसकी जड़ें मजबूती से जम जाती हैं अर्थात परिपक्व होने के बाद...बिल्कुल वैसे ही जैसे चालीस पचास साल बाद का इश्क़… गम्भीर /परिपक्व/ स्थायी और हर पल गुदगुदाने वाला। तभी तो शायद कवियत्री मनप्रीत कौर 'मन' को लिखना पड़ा है:

"अमलतास की तरह महकता है,

मुरझाए से प्राणों में संगीत बुनता है ।

तुम्हारा प्रेम।।"

अमलतास आशिक़ों की ही पसंद नहीं बल्कि औषधि के जानकारों के लिए भी उतना ही खास है। आयुर्वेद के अनुसार, अमलतास के इस्तेमाल से बुखार, पेट की बीमारियां, त्वचा रोग, खांसी, टीबी और ह्रदय रोग आदि में लाभ लिया जा सकता है। इसके अलावा, मधुमेह, पीलिया, गठिया, छाले सहित तमाम रोगों के उपचार में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। 

अब तक मेरी तरह अमलतास से अनजान लोगों के लिए- इसे इंग्लिश में गोल्डन शॉवर और संस्कृत में राजवृक्ष भी कहा गया है। यह मूल रूप से स्वदेशी यानि हमारा अपना है जो म्यामांर से लेकर थाईलैंड तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। मजे की बात यह है कि थाईलैंड का यह राष्ट्रीय वृक्ष और फूल दोनों है। इसलिए आप चाहें तो अमलतास की मादकता का ‘बैंकाक कनेक्शन’ स्थापित कर सकते हैं। 

वैसे केरल में भी इसे राजकीय फूल का दर्जा हासिल है। अब फिर बात, इस पर मर मिटने की क्योंकि इन दिनों जब भी आप इसके क़रीब से गुजरेंगे, यह हौले से आप पर मुट्ठी भर पीले जगमग सितारे बिखेर देगा और बस आप भी कवियत्री 'काव्या' की तरह कह उठेंगे:

"रोक दे राहों में, 

ऐसा तुम्हारा मोहपाश।

तुम कैसे इतना खिलखिलाते हो,

कह दो न सुंदर अमलतास।।"


…..वैसे तो अंगुलियां भी उतावली हैं और मन भी मचल रहा है कि आज का दिन बस अमलतास के नाम कर दिया जाए लेकिन बुद्धि कहती है कल के लिए भी कुछ पल बचाकर रखे जाएं इसलिए  समापन  रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' की इन पंक्तियों के साथ,जो सब कुछ कह देती हैं:

"तुझे देखकर तो लगता है,

जो जितना तप जाता है ।

इन सोने के झूमर –जैसी,

खरी चमक वही पाता है ।

जीवन की कठिन दुपहरी में,

तुझसे सब मुस्काना सीखें ।

घूँट –घूँट पी रंग धूप का,

सब कुन्दन बन जाना सीखें ।"

इसलिए, यदि आप तपती दुपहरी में मन मारकर किसी काम से घर से बाहर निकले तो बस, अमलतास से थोड़ी सी ऊर्जा ले लें..यह आपकी तपन,मजबूरी और बेरुखी को भी मनमोहक बना देगा।


शनिवार, 23 मई 2026

क्या, अपने देखा है मोमबत्तियों का पेड़!!


कोई इसे मोमबत्तियों का पेड़ (कैंडल्स ट्री) कहता है तो किसी को इसमें गंगा घाट पर होने वाली आरती में इस्तेमाल होने वाली आरतियां नज़र आती हैं। किसी को यह क्रिसमस ट्री का गुलदस्ता लगता है और हमने इसमें दीपावली के रोशनी से जगमगाते दीपक देख लिए..। यह अपने अपने नजरिए की बात है और इसलिए यह ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’ वाले भाव से सभी अलग,अनूठा पर आकर्षक नजर आता है।

यह संभवतः इकलौता पेड़ होगा जो अपने फूलों का रस चूसने के लिए मधुमक्खियों को सिग्नल देता है और फिर यह भी बताता है कि कौन से फूल में रस बचा है और कौन फूल रसहीन हो गया है। आम लोगों के लिए पूर्ण परिपक्व वृक्ष गोवर्धन पर्वत की तरह विशाल छाते से कम नहीं है जो धूप एवं बारिश से बचाता है। दरअसल, इसकी बड़ी एवं लंबी पत्तियों का समूह हमारे पंजे जैसा होता है इसलिए अन्य वृक्षों की तुलना में इस पेड़ से ज्यादा छाया मिलती है। 

यह सेहत का भी पिटारा है और वैरिकोज वेंस, सूजन, बवासीर और शुक्राणु की गुणवत्ता सुधारने जैसे कई काम आता है। लेकिन सावधान, इसके कच्चे बीज, पत्तियां, छाल या फूल सामान्य रूप से इतने जहरीले हो सकते हैं कि बिना जाने उपयोग करने से गंभीर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।

सुंदरता और गुणों की खान इस वृक्ष को हिमालयन हॉर्स चेस्टनट (Aesculus indica) के नाम से जाना जाता है। वैसे, इसका एक विदेशी भाई भी है। उसे हॉर्स चेस्टनट (Aesculus hippocastanum) कहा जाता है। पादप विज्ञानियों के लिए भले ही ये अलग-अलग हों लेकिन हम जैसे लोगों को तो ये कुंभ के मेले में बिछड़े भाइयों जैसे या बाली-सुग्रीव, राम-श्याम या सीता-गीता टाइप एक समान ही लगते हैं। 

इसके बारे में ज्यादा जानकारी जुटाने पर यह पता चला कि अठारहवीं सदी के मध्य में इस पेड़ को इसकी खूबसूरती के कारण ब्रिटेन और यूरोप के अन्य हिस्सों में ले जाया गया था। अब यह वहां पार्कों और बगीचों में सजावटी पेड़ के रूप में शोभा बढ़ा रहा है। मतलब सीधा सा यह है कि जैसे अंग्रेज हमारे देश में अपने साथ कई प्रकार के पेड़ पौधे लाए तो निश्चित ही उसी तरह वे यहां से भी कई पेड़ पौधे अपने साथ ले भी गए होंगे। इसलिए मुझे हॉर्स चेस्टनट कुल के पेड़ों के कुंभ के मेले में बिछड़ने की थ्योरी सही लगती है।

हिमालयन हॉर्स चेस्टनट यानि भारतीय प्रजाति का मूल जन्म स्थान और प्राकृतिक आवास उत्तर-पश्चिमी हिमालय का पर्वतीय क्षेत्र माना जाता है। वैसे भी, यह पेड़ मुख्य रूप से 900 मीटर से 3,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित नम और छायादार घाटियों में प्राकृतिक रूप से उगता है। इसलिए यह हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू एवं कश्मीर में आमतौर पर होता है। अब तो इसने अपनी जड़ें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और नेपाल तक फैला ली हैं। 

स्थानीय तौर पर इसे कनोर, बानखोर, वन अखरोट, बैंकहोर, खनोर, गुग्गू, हनुदुन, ककरा, पांगर, कारु, घोड़े पांगरो, घोड़े का शाहबलूत और नारु जैसे तमाम जाने अनजाने नामों से जाना जाता है। इसके वैज्ञानिक नाम के पीछे भी यही कहानी बताई जाती है कि इससे घोड़ों के पैरों की सूजन ठीक की जाती थी इसलिए शायद इसका नाम ‘हॉर्स चेस्टनट’ पड़ गया।

इन दिनों, यह पेड़ अपने परवान पर है इसलिए जमकर फूल रहा है और उतना ही हरा भरा भी है। इस पेड़ को दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे किसी ने पूरे पेड़ को सफेद-गुलाबी मोमबत्तियों से सजा दिया हो या इस पर सफेद गुलाबी आइसक्रीम के कोन लगा दिए हों। हिमाचल प्रदेश के शिमला के रिज (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर यह पेड़ अपने बंधु बांधवों के साथ इन दिनों पूरे शबाव पर है। 

मजे की बात यह भी है कि इसी पेड़ के पास यहां सैलानियों को घूमने के लिए घोड़े मिलते हैं इसलिए यह हॉर्स चेस्टनट नाम सार्थक सा लगता है। मॉल रोड के सबसे बड़े हॉर्स चेस्टनट की लोकेशन एवं आकार इतना विशाल है कि आमतौर पर लोग यहां रुक कर एक दूसरे का इंतजार करते हैं इसलिए कुछ लोग इसे ‘वेटिंग ट्री’ भी कहने लगे हैं। वैसे, मॉल रोड पर इसके छोटे बड़े आधा दर्जन पेड़ हैं और पूरे इलाक़े के सौंदर्य में चार चांद लगा रहे हैं।

पहाड़ों पर मिलने वाले पेड़ पौधे हमारे मैदानी इलाकों में सामान्य तौर पर मिलने वाले आम, जामुन, पीपल, नीम, बरगद से अलग होते हैं इसलिए जब भी किसी पहाड़ी क्षेत्र में जाने का अवसर मिले इस वानस्पतिक विविधता का भी भरपूर आनंद लीजिए क्योंकि हर मौसम में यहां कोई न कोई बुरांश, देवदार, पाइन, नीला गुलमोहर या हॉर्स चेस्टनट अपनी खूबसूरती से आपका मन मोह ही लेगा।





रविवार, 17 मई 2026

इस बरफी को खाने की गलती मत करना, वरना..!!

 


क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि महज कुछ हजार की आबादी वाले एक कस्बाई शहर की एक साधारण सी मिठाई के लिए सुबह से लाइन लगती होगी और लाइन भी ऐसी की बाकायदा पुलिस लगानी पड़े!! इसके बाद भी जरूरी नहीं है कि आपके हाथ मनचाही मात्रा में मिठाई हाथ लग जाए ।..और मिठाई भी कोई अनोखी नहीं बल्कि बेसन की बरफी..जी हां, वही बेसन की बरफी जो हर गली-मोहल्ले की मिठाई की दुकान पर आसानी से मिल जाती है। 

बेसन की बरफी राजस्थान एवं गुजरात में मोहनथाल व दिलखुशाल तो कुछ राज्यों में बेसन चक्की के नाम से जानी जाती है। यह दिल्ली से लेकर उत्तरप्रदेश तक तथा राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश तक लोकप्रिय है। वही बेसन की बरफी, जो भारत में हर शादी-विवाह, तीज-त्यौहार एवं हर छोटे-बड़े अवसर पर घर-घर में  आमतौर पर बनती है और शायद सोन पापड़ी के बाद नई पीढ़ी द्वारा सबसे ज्यादा हिकारत से देखी/खाई जाती है।

लेकिन, इस कस्बे की बेसन की बरफी के स्वाद का जादू ऐसा है कि दिन भर में एक क्विंटल मतलब सौ-डेढ़ सौ किलो से ज्यादा बरफी बिक जाना सामान्य बात है जबकि खास अवसरों पर दो-तीन सौ किलो बरफी लोग खा जाते हैं। इस बेसन की बरफी का प्रताप ऐसा है कि बरफी बनाने वाली दुकान दिन भर में इस ‘स्टार प्रोडक्ट’ के सहारे एक हजार किलो मिठाई बेच लेती है और फिर भी ग्राहकों का मन नहीं भरता बल्कि दुकान ही बंद करनी पड़ती है।

हम बात कर रहे हैं चंडीगढ़ से शिमला के रास्ते में राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर पांच पर मौजूद हिमाचल प्रदेश के छोटे से कस्बे कंडाघाट की सुप्रसिद्ध बेसन की बरफी की। बरफी की खुशबू, स्वाद तथा लोकप्रियता का अंदाजा आपको कंडाघाट पहुंचते ही होने लगता है। आमतौर पर भीड़, सीमित उपलब्धता और अपनी कार से काफी दूर तक चलकर जब आपके हाथ में कंडाघाट की बरफी का डिब्बा आता है तो मैडल जीतने से कम खुशी महसूस नहीं होती।

असल मज़ा अब शुरू होता है..जब आप लक्ष्मण जी की इस दुकान से जेब के अनुकूल कीमत पर खरीदे गए एक खूबसूरत डिब्बे से सुनहरी आभा लिए मनमोहक खुशबू वाली, सुडौल, करीने से सजी बरफी का एक टुकड़ा मुंह में रखते हैं.. अहा, बरफी का कण कण मुंह में घुलने लगता है। बरफी का मुंह में हौले हौले घुलता हुआ स्वाद, देसी घी की खुशबू, बेसन का सोंधापन और चीनी की संतुलित मिठास मिलकर ऐसा एहसास कराते हैं मानो हर टुकड़ा खुशी से भरा हो। बरफी का स्वाद धीरे-धीरे जीभ पर फैलता है और उसके साथ मन बार-बार एक और टुकड़ा लेने को करता है, क्योंकि इसका स्वाद भीतर तक आनंद का एहसास करा देता है।

…और फिर डिब्बे, हाथ एवं मुंह के बीच का फासला पता नहीं कैसे खत्म हो जाता है क्योंकि इसका ग़ज़ब का स्वाद हाथ को रुकने ही नहीं देता.. दिल-ओ-दिमाग पर ‘डोपामिन’ बनकर छाया कंडाघाट की इस बरफी के स्वाद के जादू के आगे बीपी और शुगर का डर भी पीछे छूट जाता है। इस बरफी की लोकप्रियता के पीछे दशकों का परिश्रम, विश्वास, स्वाद, शुद्धता और तमाम मिश्रण के संतुलन का जादू है इसलिए कंडाघाट में ही दूसरी कई दुकानों पर लक्ष्मण जी जैसा स्वाद नहीं मिलता। 

आलम यह है कि अब कंडाघाट, लक्ष्मण जी और बेसन की बरफी एक दूसरे की पहचान बन गए हैं क्योंकि यह कोई साधारण मिठाई नहीं – यह परंपरा, मेहनत, शुद्धता और स्वाद का अनोखा संगम है। बताया जाता है कि इस सफलता की कहानी 1940 के आसपास शुरू हुई थी जब स्थानीय व्यवसाई नंद किशोर वर्मा ने आभूषणों का काम शुरू किया था, लेकिन जल्द ही उन्होंने मिठाइयों का सफर चुन लिया। शुरू में वर्मा स्वीट्स के नाम से चली यह छोटी-सी दुकान हिमालय की बर्फ़ के स्वादिष्ट जल,पहाड़ी आवोहवा और शुद्ध परिवेश में धीरे-धीरे लोकप्रिय होने लगी लेकिन असल नाम मिला उनके बेटे लक्ष्मण दास वर्मा के परिश्रम से। 

उन्होंने न केवल इसे नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया बल्कि बेसन की बरफी के अनूठे स्वाद का ब्रांड भी बनाया। यही वजह रही कि उनके बाद की पीढ़ी ने दुकान का नाम ही ‘लक्ष्मण जी स्वीट्स’ कर दिया। आज भले ही तीसरी-चौथी पीढ़ी इसे संभाल रही है, लेकिन स्वाद अभी भी वही है। इसलिए यह छोटी सी साधारण सी दुकान आज भी बिना ब्रांडिंग, पैकेजिंग, ऑनलाइन बिक्री और बिना किसी तामझाम के बड़ी एवं नामी ब्रांड से भी ज्यादा मिठाई बेच रही है। यहां से गुजरने वाले सैलानियों के साथ साथ विदेशों में बसे भारतीयों के बीच भी इसकी जमकर मांग है। आज भी यह दुकान दिनभर नहीं खुलती और उस कम समय में भी यह बरफी हमेशा नहीं मिलती क्योंकि चुटकियों में ही इसका स्टॉक खत्म हो जाता है।

अब आप के दिमाग में भी यह सवाल कुलबुला रहा होगा कि यह बरफी इतनी खास क्यों है? इसमें, लक्ष्मण जी ऐसी क्या सीक्रेट सामग्री डालते हैं? तो जान लीजिए कि इसमें कोई रहस्य नहीं है बल्कि दशकों पुराना अनुभव, सभी सामग्रियों का शुद्ध, मिलावट रहित, संतुलित, सधा हुआ और पारंपरिक मिश्रण है। स्थानीय देसी घी का इस्तेमाल बरफी को मोहक सुगंध देता है तो धीरज से भूना जाने वाला बेसन घी के साथ मिलकर बरफी को स्मूद और परफेक्ट बनता है। 

सबसे जरूरी बात यह है कि कंडाघाट की इस बरफी में कोई आर्टिफिशियल फ्लेवर या शॉर्टकट नहीं होता । यही वजह है कि एक टुकड़ा मुंह में रखते ही बेसन की खुशबू, घी का स्वाद, हल्की मिठास और मुलायम अंदाज मुंह में घुलकर यह अहसास करा देता है कि बेसन की बरफी का असल स्वाद कैसा होता है। इसको एक बार खाने के बाद आप खुद इसे बार बार खाना चाहोगे क्योंकि यह सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि हिमाचली मेहमाननवाजी और परंपरा का स्वाद है।

#Barfi #बरफी #Shimla #himachal #hills #sweet #kandaghat 





मंगलवार, 12 मई 2026

अमेरिकी जादूगर के नीले जादू की क़ैद में हिमाचल..!!


दुनिया भर के लोगों को अपने श्वेत-बर्फीले हुस्न, आकाश छूते चीड़-देवदार और प्रकृति के हरियाली भरे श्रृंगार से अपनी ओर खींचने वाला हिमाचल प्रदेश इन दिनों एक अमेरिकी जादूगर के नीले जादू के मोहपाश में बंधा हुआ है। आमतौर पर जादूगर वैसे तो काला जादू करते हैं लेकिन इस विदेशी जादूगर ने नीला जादू किया है और आलम यह है कि देवभूमि के अधिकतर इलाके अपनी सुध बुध खोकर इस जादू के रंग में रंग गए हैं..वहीं, हिमाचल की दिव्यता एवं भव्यता को निहारने आए पर्यटक भी इस नीले जादू के सम्मोहन से बच नहीं पा रहे हैं।

इस नीली आभा का ऐसा अद्भुत असर है जैसे आसमान स्वयं धरती से आलिंगन कर रहा है। जगह जगह बिछे नरम मुलायम नीले कालीन ने इस सौंदर्य में चार चांद लगा दिए हैं। यह जादूगर दक्षिण अमेरिका का मूल निवासी है एवं ब्राजील, अर्जेंटीना, बोलीविया, पैराग्वे में जवान हुआ है और अब दबे पांव हिमाचल में घुसपैठ कर गया है। इन दिनों इसका जादू  धर्मशाला, कुल्लू, कांगड़ा और सोलन जैसे इलाकों से होते हुए पूरे राज्य में परवान चढ़ रहा है। वैसे, हिमाचल के पहले यह जादूगर अपने नीले जादू से अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, यूरोप, फ्लोरिडा, कैलिफोर्निया को भी अपने रंग में रंग चुका है। आस्ट्रेलिया में तो इस पर बाकायदा फेस्टिवल बन गए हैं।


ज्यादा पहेलियां न बुझाते हुए अब बता ही देते हैं कि कौन है यह अमेरिका जादूगर और क्या है इसका नीला जादू…हम बात कर रहे हैं जैकारंडा (Jacaranda) की जो इन दिनों हिमाचल प्रदेश सहित देश के तमाम उष्णकटिबंधीय (tropical) क्षेत्रों को अपनी नीले सौंदर्य से आकर्षित कर रहा है। इस जादूगर का पूरा नाम Jacaranda mimosifolia है। इसका नाम भी ब्राजील से उपजा है । हालांकि हमारे यहां इसे नीला गुलमोहर, फर्न ट्री, नीलकंठ, नील मोहर, नूपुर, बांग्ला में नील कृष्ण चूड़ा, केरल में नीलवाका जैसे विविध नामों से जाना जाता है। जैकारंडा का अर्थ होता है सुगंधित एवं कठोर लकड़ी। यह पेड़ अपने नीले-बैंगनी एवं पुंगी (ट्रम्पेट) के आकार वाले फूलों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। हम इसे मैदानी इलाकों को अपने चटक लाल केसरिया फूलों से दहकाने वाले गुलमोहर का दूर के रिश्ते का भाई कह सकते हैं क्योंकि यह वैज्ञानिक रूप से अलग परिवार का होने के बाद भी आकार प्रकार और सजावट में गुलमोहर जैसा ही नजर आता है।  

हमारे देश में अप्रैल से लेकर जून तक जैकारंडा का जादू सिर चढ़कर बोलता है। यह हिमाचल की प्राकृतिक सुंदरता को नया आयाम दे देता है। एक तरफ देवदार, चीड़ और बुरांश के हरे-लाल-गुलाबी रंग, दूसरी तरफ ये बैंगनी-नीला सैलानी। जैसे किसी विदेशी मेहमान ने घर आकर अपने उपहारों से पूरे परिवार को नए उत्साह से भर दिया हो। इन दिनों हिमाचल प्रदेश के तमाम इलाकों में मसलन सड़क के किनारे, होटलों के बगीचों में, मंदिरों के आसपास..हर जगह ये जादूगर बिना शोर शराबे के अपनी नीलिमा का कमाल दिखा रहा है।


इतना ही नहीं, इसकी खासियत यह भी है कि जब तक फूल खिले रहते हैं तो चारों ओर नीली आभा फैली रहती है और जब ये फूल झड़ते हैं तो ज़मीन पर नीला गलीचा सा बिछ जाता है। इसकी हवा में फैली हल्की सुगंध और मनमोहक नीला रंग मन को शांत कर देते है और हमें आध्यात्मिक सुकून का सा एहसास होता है । शायद यही वजह है कि हिमाचल में ये पेड़ भले ही सजावट बनकर आए थे लेकिन अब दिल जीतने का हिस्सा बन गए हैं । 

जैकारंडा का ये जादू सिर्फ खूबसूरत नीले रंग भर का नहीं है, बल्कि भाव का भी है। हिमाचल की ठंडी, शांत सुबह में जब सूरज की पहली किरण इन फूलों पर पड़ती है, तो पूरा माहौल जादुई हो जाता है और हम बस प्रकृति की इस अनुपम जादूगरी में खो जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे हमारी हिंदी फिल्मों के कई गीतों जैसे फिल्म ‘कलाकार’ का ‘नीले नीले अंबर पर..’ या फिर ‘हमराज’ का ‘नीले गगन के तले..’ या फिर फिल्म ‘आशा ज्योति’ का ‘नीले अंबर के दो नैना..’, लिखते समय गीतकार के दिल-ओ-दिमाग पर भी इस नीले जादूगर का जादू छाया हुआ था।

#Jacaranda  #Gulmohar  #Nature  #Tree











बुधवार, 6 मई 2026

अकेलापन..पैसे नहीं, समय मांगता है !!!


...शहर के एक व्यस्त इलाके में राहुल नाम का एक युवक डिलीवरी बॉय का काम करता था। ज्यादातर उसकी शाम की शिफ्ट होती। एक दिन रात नौ बजे उसने आखिरी ऑर्डर उठाया। रेस्टोरेंट से पैकेट लेते समय उसने देखा — बहुत छोटा ऑर्डर था। बस सादी खिचड़ी, दही और दो केले। पता पुराने शहर का था। एक जर्जर पुरानी इमारत, तीसरी मंजिल।

सीढ़ियाँ चढ़कर उसने घंटी बजाई। दरवाजा एक वृद्ध महिला ने खोला। सफेद बाल, काँपते हाथ, मोटे चश्मे। चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी, पर आवाज में मिठास थी —"बेटा, अंदर रख दो... मेरे हाथ काँपते हैं। "राहुल ने खाना टेबल पर रखा और लौटने लगा तो अम्मा ने कहा —"बेटा, दो मिनट बैठोगे? अकेले खाना खाने में मन नहीं लगता।" राहुल ने घड़ी देखी। शिफ्ट खत्म हो चुकी थी। थकान भी हो रही थी। फिर भी कुछ अनकहा भाव उसके मन में उठा और वह बैठ गया। 

कमरा सन्नाटे में डूबा था। दीवार पर पुरानी घड़ी टिक-टिक कर रही थी। एक कोने में भगवान की छोटी सी तस्वीर। दूसरी दीवार पर परिवार की दर्जनों फोटो लगी थीं। अम्मा ने प्लेट खोली। धीरे-धीरे खिचड़ी खाने लगीं। हर दो कौर के बाद वे राहुल की ओर देखकर मुस्कुरातीं। फिर बोलीं —"बेटा, रोज बाहर का खाना नहीं मँगाती। आज बस मन किया... किसी इंसानी आवाज को सुनने का। "राहुल चुप रहा। अम्मा ने दीवार पर एक फोटो की ओर इशारा किया —"ये मेरे पति जी। रेलवे में नौकरी करते थे। पाँच साल पहले चले गए। "फिर दूसरी तस्वीर —"ये मेरा बेटा। कनाडा में है। बहुत अच्छा कर रहा है... हर महीने पैसे भेजता है। "थोड़ी देर चुप रहकर उनकी आँखें भर आईं —"बस... समय नहीं भेज पाता।"

कमरे में घड़ी की टिक-टिक अचानक बहुत तेज सुनाई देने लगी। अम्मा ने एक और कौर लिया और बोलीं —"ये मेरी बेटी। बेंगलुरु में है। अपनी दुनिया में खुश है। होना भी चाहिए। बच्चों ने उड़ना न सीखा तो हमने उन्हें पाला ही क्यों था?" आवाज भर्रा गई, लेकिन चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी — सिर्फ सूना खालीपन था। उन्होंने राहुल से पूछा —"तुम्हारी माँ है बेटा? "हाँ अम्मा।" "हर दिन फोन करते हो?" राहुल खामोश हो गया। 

सच तो यह था कि वह भी कई-कई दिन घर को फोन नहीं करता। थकान, काम, भागदौड़... हर बार सोचता, कल कर लूँगा। उसकी चुप्पी पढ़कर अम्मा ने धीरे से कहा —"बेटा, माता-पिता पैसे नहीं गिनते... वे आवाजें गिनते हैं। "राहुल के अंदर कुछ टूट गया। खाना खत्म हुआ। अम्मा ने पानी पिया। फिर पर्स से पाँच सौ रुपये निकालकर आगे बढ़ाए —"ये टिप नहीं है बेटा। ये उस आधे घंटे की कीमत है, जब तुमने मुझे अकेले नहीं खाने दिया।" राहुल ने मना किया, "नहीं अम्मा, मैं नहीं ले सकता।" अम्मा मुस्कुराईं —"ले लो। आज तुमने खाना नहीं डिलीवर किया... साथ और समय दिया है।" राहुल ने रुपये लिए, लेकिन जेब में नहीं डाले — हाथ में ही थामे रखे। जाते समय अम्मा ने कहा —"और हाँ — आज घर जाकर अपनी माँ को जरूर फोन करना।"

उस रात राहुल ने इमारत के नीचे बाइक स्टार्ट नहीं की। सबसे पहले उसने माँ को फोन लगाया। दूसरी तरफ से माँ की आवाज आई —"अरे! आज अचानक फोन? सब ठीक तो है ना?" बस इतना सुनकर राहुल का गला रुँध गया। वह बोला, "हाँ माँ... बस तुम्हारी आवाज सुननी थी।" कुछ पल खामोशी रही। फिर माँ ने पूछा, "तुमने खाना खाया?" सड़क किनारे खड़े होकर राहुल रो पड़ा। उस रात के बाद उसने रोज अपनी माँ को फोन करना शुरू कर दिया। और सिर्फ माँ को ही नहीं — अब हर डिलीवरी उसके लिए सिर्फ ऑर्डर नहीं रह गई थी। कुछ घरों को दवा चाहिए, कुछ को अकेलेपन से छुटकारा, कुछ को इंतजार का अंत, कुछ को बस एक आवाज चाहिए।

अब जब भी कोई दरवाजा खुलता, राहुल जल्दी में नहीं होता। चेहरे को देखता, आवाज सुनता और कभी-कभी पूछ लेता — "और सब ठीक है ना?"ज्यादातर लोग कह देते, "हाँ।"

कुछ मुस्कुरा देते। और कुछ चेहरे बता देते कि पूरे दिन किसी से बात ही नहीं हुई। 

दो महीने बाद उसी पते से फिर ऑर्डर आया।राहुल जल्दी से पहुँचा। इस बार पड़ोस की आंटी ने दरवाजा खोला। धीरे से बोलीं —"अम्मा पिछले हफ्ते चली गईं।" राहुल कुछ पल दरवाजे पर खड़ा रहा। हाथ खाली थे, लेकिन अंदर कुछ बहुत भारी टूट रहा था।आंटी ने अंदर से एक छोटा लिफाफा निकाला —"अम्मा ने ये तुम्हारे लिए छोड़ा था।" काँपते हाथों से राहुल ने लिफाफा खोला। अंदर पाँच सौ रुपये और एक छोटा सा नोट था। नोट पर लिखा था —"बेटा, जब यह पढ़ रहे हो, मैं चली गई हूँ। उस रात मेरे साथ खाने के लिए धन्यवाद। तुमने मुझे खाना नहीं — सम्मान दिया था। हाँ — अपनी माँ को फोन करते रहना— अम्मा।"

आज भी वे पाँच सौ रुपये राहुल के बैग के अंदर वाले पॉकेट में रखे हैं। उसने उन्हें खर्च नहीं किया क्योंकि उस रात उसे पहली बार समझ आया था —हर दरवाजे के पीछे सिर्फ ग्राहक नहीं होता।

कभी कोई माँ होती है।

कभी कोई इंतजार होता है।

कभी आखिरी मुलाकात होती है। हम सब अपनी-अपनी चाह लेकर जीते हैं —

किसी को रोटी चाहिए,

किसी को दवा,

और किसी को बस दो मिनट का साथ। इंसान को हमेशा सामान की डिलीवरी नहीं चाहिए...

कभी-कभी तो सिर्फ उपस्थिति की डिलीवरी चाहिए।

निष्कर्ष यह है कि बुढ़ापा और अकेलापन साथ आएँ तो बहुत भयानक होता है और अगर संसाधनों की कमी भी जुड़ जाए, तो यह अंतिम त्रासदी है। इसलिए, अपने माता-पिता को आज ही फोन कीजिए।

वे पैसे नहीं — आपकी आवाज गिनते हैं।

(मूल अंग्रेजी पोस्ट का हिंदी अनुवाद..पोस्ट सोशल मीडिया पर अलग अलग नामों के साथ दिख/मिल रही है।)


शनिवार, 2 मई 2026

नारद मुनि: केवल पत्रकार नहीं, प्रथम ‘सोशल मीडिया पत्रकार’..!!

आज सूचना क्रांति के दौर में जब सूचना की रफ्तार इंटरनेट और सोशल मीडिया से तय हो रही है एवं सोशल मीडिया पर हर सेकंड लाखों खबरें, रील्स और पोस्ट वायरल हो रही हैं, तब यह सवाल दिलचस्प लगता है कि क्या प्राचीन काल में भी ऐसा कोई संचार तंत्र था? इसका उत्तर पौराणिक कथाओं में ही मिलता है। पौराणिक संदर्भों में देवर्षि नारद का व्यक्तित्व इस सवाल का सटीक जवाब प्रस्तुत करता है। उन्हें केवल एक ऋषि या भक्त के रूप में नहीं, बल्कि सूचना और संवाद के प्राचीन वाहक के रूप में भी देखा जाता रहा है।

धार्मिक कथा कहानियों के अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और भगवान विष्णु के परम भक्त नारद मुनि तीनों लोकों—स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—में निर्बाध विचरण करते थे। वे जहां भी जाते, वहां की घटनाओं, परिस्थितियों और संदेशों को एकत्र कर दूसरे स्थान तक पहुंचाते। यह कार्य आधुनिक पत्रकारिता की मूल परिभाषा से काफी हद तक मेल खाता है—सूचना जुटाना, उसका संप्रेषण करना और समाज को प्रभावित करना।


नारद मुनि की सबसे प्रमुख खासियत उनकी निष्पक्षता और गतिशीलता थी। वे देवताओं, असुरों और मनुष्यों—सभी के बीच समान रूप से संवाद स्थापित करते थे। उनकी वीणा केवल संगीत का साधन नहीं, बल्कि संदेश प्रसार का माध्यम भी थी। यह आज के मोबाइल फोन और कैमरे की तरह उपयोगी थी। वे कथाओं और भजनों के जरिए सूचनाएं इस तरह प्रस्तुत करते थे कि वे जनमानस में गहराई तक उतर जाएं—कुछ वैसा ही जैसा आज पॉडकास्ट या वायरल कंटेंट करता है। आधुनिक भाषा में कहें तो वे वायरल न्यूज मेकर थे, जिनकी एक खबर पूरे ब्रह्मांड में तुरंत फैलकर आज की तरह वायरल हो जाती थी।

पौराणिक कथाओं में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जो उनकी पत्रकारिता के विविध रूपों को स्पष्ट करते हैं। जैसे एक प्रसंग में वे महर्षि बाल्मीकि के आश्रम पहुंचकर उन्हें राम कथा सुनाते हैं । यही कथा आगे चलकर रामायण जैसे महाकाव्य की प्रेरणा बन जाती है। यह घटना आधुनिक संदर्भ में एक ‘डिटेल्ड फीचर स्टोरी’ या ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ की तरह देखी जा सकती है, जिसने इतिहास रच दिया।

इसी तरह महाभारत काल में नारद मुनि ने पांडवों और कौरवों दोनों पक्षों के बीच संवाद और सूचना का आदान-प्रदान किया। उन्होंने युधिष्ठिर को राज्य नीति और धर्म के विषय में सलाह दी, वहीं दूसरी ओर कौरवों की स्थिति का भी आकलन किया। यह भूमिका आज के इन्वेस्टिगेटिव पत्रकार से कम नहीं लगती।

नारद मुनि केवल सूचना वाहक ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक संवेदना के प्रतिनिधि भी थे। उन्होंने भक्त प्रह्लाद और ध्रुव जैसे पात्रों को भक्ति का मार्ग दिखाया और उनकी स्थिति को देवताओं तक पहुंचाया। यह आधुनिक पत्रकारिता के उस पहलू से मेल खाता है, जहां मीडिया कमजोर और वंचित वर्ग की आवाज़ बनता है।


अगर सोशल मीडिया के नजरिए से देखें, तो नारद मुनि का कार्य और भी प्रासंगिक लगता है। वे उस दौर में बिना किसी तकनीक के त्वरित सूचना प्रसार करते थे। उनकी एक बात पूरे ब्रह्मांड में प्रभाव डालती थी,कुछ वैसा ही जैसा आज कोई पोस्ट वायरल हो जाती है। उनकी “नारायण-नारायण” की उद्घोषणा एक तरह से उनकी पहचान थी, जिसकी तुलना हम आज के हैशटैग से कर सकते हैं।

हालांकि नारद जी एवं आज के सोशल मीडिया के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर भी है। आज सोशल मीडिया में जहां फेक न्यूज, ट्रोलिंग और सनसनीखेज खबरें आम बात हो गई है, वहीं नारद मुनि का उद्देश्य हमेशा जनकल्याण और सत्य की स्थापना रहा। वे सूचना को हथियार नहीं, बल्कि सही संवाद का माध्यम मानते थे। वर्तमान डिजिटल युग में पत्रकारिता और सोशल मीडिया दोनों को नैतिकता की सख्त जरूरत है। नारद मुनि की तीनों लोकों की यात्राएँ हमें याद दिलाती हैं कि सच्चा संचारक वही है जो सूचना को हथियार नहीं, बल्कि समाज से जुड़ने का पुल बनाता है और धरातल पर जाकर आम लोगों की वास्तविकताओं से रूबरू कराता है।

समसामयिक संदर्भ में बात करें तो नारद मुनि का उदाहरण यह संदेश देता है कि पत्रकारिता केवल खबर देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने की जिम्मेदारी भी है। निष्पक्षता, सत्य, विश्वसनीयता और जनहित जैसे मूल्य आज भी उतने ही जरूरी हैं जितने प्राचीन काल में थे।

शायद यही कारण है कि नारद जयंती को पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाने की परंपरा विकसित हुई । यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उस विचार का सम्मान है कि सूचना का सही उपयोग समाज को जोड़ सकता है, जागरूक बना सकता है और सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

देवर्षि नारद की जयंती के अवसर पर यह याद करना प्रासंगिक है कि पत्रकारिता कोई नया पेशा नहीं है। यह सृष्टि के आरंभ से चला आ रहा एक दिव्य कर्तव्य है। यदि आज का ‘मैराथन मीडिया’ नारद मुनि की निष्पक्षता, गतिशीलता और लोकमंगल की भावना को अपनाए, तो सोशल मीडिया भी ज्ञान और सद्भाव का साधन बन सकता है।



सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...