मंगलवार, 7 जुलाई 2026

विदाई से पुनर्मिलन तक का एक साल: वही जगह/वही साथी/वही तारीख…अद्भुत


27 जून 2025…आकाशवाणी भोपाल के हमारे ग्रुप ‘न्यूजरूम’ में उस दिन हल्की सी उदासी और ढेर सारा प्यार था। कारण यह था कि बीते सात वर्षों से रोज़ की खबरों की दुनिया में मेरे मेरे  अभिन्न साथी मुझे विदाई दे रहे थे। दरअसल,माइक, हेडफोन, न्यूज डेस्क और उन अनगिनत यादों को पीछे छोड़कर मेरा तबादला पीआईबी शिमला हो गया था। 

उस दिन भोपाल के एमपी नगर में ‘जश्न ए पैराडाइज’ होटल में विदाई- सह - मेलमिलाप कार्यक्रम रखा गया था। हँसी-मज़ाक के बीच हमारी आँखें नम हो रही थीं। भोपाल ने मुझे बहुत कुछ दिया था — अनुभव, दोस्ती, न्यूजरूम परिवार और आकाशवाणी की वह गर्मजोशी, जो कभी नहीं भूली जा सकती। 


ठीक एक साल बाद, 27 जून 2026 को वही तारीख, वही होटल जश्न ए पैराडाइज। इस बार माहौल पूरी तरह उत्साह से भरा था। आकाशवाणी भोपाल के न्यूजरूम के साथी फिर से एकत्र हुए । वही, हमारा गैट टूगेदर का कार्यक्रम था। पुरानी यादें ताज़ा हुईं, हँसी के ठहाके गूँजे और हमारी खबरों की दुनिया के रोचक किस्से दोहराए गए। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि जिस दिन विदाई हुई थी, उसी दिन एक साल बाद पुनर्मिलन हो गया.. यह संयोग कितना अद्भुत है । 

इस एक साल में बहुत कुछ बदल गया था लेकिन भोपाल की हमारी टीम नहीं बदली। वही गर्मजोशी,अपनापन,हंसी मजाक,उत्साह और स्नेह। तबादले के लिहाज से देखें तो 30 जून 2025 को ज्वाइन करने के बाद पीआईबी शिमला ने मुझे नया आयाम दिया। हिमालय की गोद में बसा शिमला शहर और प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) का माहौल पूरी तरह अलग, लेकिन उतना ही सम्मानजनक और चुनौतीपूर्ण है। 

भोपाल की गर्म हवाओं से शिमला की ठंडी हवाओं तक का सफर मेरे लिए सीखने, अनुकूलन करने और नई ऊर्जा पाने का सफर है। आकाशवाणी में जहाँ हम खबरों को आवाज़ देते थे, वहीं पीआईबी में खबरों को देश/प्रदेश के कोने-कोने तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी है। दोनों जगहों ने मुझे लगातार समृद्ध किया है।

भोपाल और शिमला.. दो शहर, दो बिल्कुल अलग रंग जैसे हमारा भोपाल  झीलों का शहर है, जहाँ आकाशवाणी का न्यूजरूम हमेशा सक्रिय रहता था। वहाँ की मिट्टी में अपनापन है और दोस्ती में स्थिरता । वहीं, शिमला देवदार और बर्फीली चोटियों का शहर है। यहां पीआईबी का कार्यालय राष्ट्र की सूचना यात्रा का अटूट हिस्सा है। यहाँ की शांति में भी गति है और ठंड में भी ऊर्जा । 

आकाशवाणी एवं पीआईबी दोनों संस्थाएँ अलग हैं, लेकिन मकसद एक ही है यानि जनता तक सही और समय पर सूचना पहुँचाना। आकाशवाणी भोपाल ने मुझे संवेदनशील रिपोर्टर बनाया, तो पीआईबी शिमला ने मुझे व्यापक दृष्टिकोण दिया। 27 जून 2026 के उस गैट टूगेदर में लगा कि जीवन में तबादले सिर्फ़ जगह नहीं, नज़रिया भी बदलते हैं। भोपाल के पुराने साथी आज भी उतनी ही गर्माहट एवं अपनापन दिखा रहे हैं जबकि शिमला के नए साथी भी अब परिवार जैसे लगने लगे हैं।

आज जब मैं दोनों जगहों को याद करता हूँ, तो मन में सिर्फ़ कृतज्ञता है। भोपाल ने मुझे तैयार किया, शिमला ने मुझे नई उड़ान दी। विदाई की वह शाम और पुनर्मिलन की दोपहर.. दोनों मेरी ज़िंदगी की अनमोल स्मृतियाँ बन गई हैं। यह सफर जारी है…नई चुनौतियों, नई यादों और नई उपलब्धियों के साथ। धन्यवाद आकाशवाणी भोपाल..धन्यवाद पीआईबी शिमला और धन्यवाद उन सभी दोस्तों/साथियों का, जो तबादले के बाद भी नहीं बदले । हम जल्दी ही फिर किसी पैराडाइज में जश्न करेंगे…वह भी कुछ और नई कहानियों के साथ, तब तक सोशल मीडिया है न😍।

आकाशवाणी भोपाल #NewsUpdate  #PIB #gettogether

शनिवार, 4 जुलाई 2026

मौसम मौसम... लवली मौसम..."


अस्सी के दौर की लोकप्रिय फिल्म थोड़ी सी बेवफाई फिल्म का प्रसिद्ध गीत "मौसम मौसम... लवली मौसम..." लिखते समय गुलज़ार साहब निश्चित ही शिमला या ऐसे ही किसी पहाड़ी इलाके से गुजरे होंगे क्योंकि मौसम को महसूस किए बिना उसे शब्दों में उतारना तभी संभव है जब आपने उसका पूरा लुत्फ़ उठाया हो । बहरहाल, यह गीत इन दिनों शिमला की फिज़ाओं पर बिल्कुल सटीक बैठता है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं इस गीत की लय पर झूम रही हो। 

मानसून की आहट के साथ पहाड़ों की रानी शिमला ने एक बार फिर अपने सौंदर्य का नया ही रूप दिखा दिया है। बादलों की सफेद चादर कभी आसमान छूती पहाड़ियों को पूरी तरह ढक लेती है, तो अगले ही पल युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी के अंदाज़ में हवा का एक जोरदार झोंका बादलों को हटाकर देवदार के ऊँचे वृक्षों और दूर तक फैली हरियाली की झलक दिखा देता है। कभी नीचे से ऊपर उठती धुंध सब कुछ ढक लेती है। यह आँख-मिचौली दिनभर चलती है और इतनी मनमोहक होती है कि हर देखने वाला कुछ पल के लिए ठहर जाता है।


इन दिनों शिमला की सुबह धुंध की चादर में लिपटी हुई होती हैं।  बिल्कुल वैसे ही जैसे 'राम तेरी गंगा मैली' में गीतकार रविंद्र जैन लिखते हैं ..'कोहरे की चादर लपेटे हूं,पानी में खुद को समेटे हूं..।' पर आप यहां मंदाकिनी के अंदाज में नहीं रह सकते बल्कि भरपूर कपड़ों और छाते के बिना इस मौसम का सामना नहीं कर सकते। सुबह ऊगते सूरज की किरणें जब बादलों के बीच से छनकर धरती पर उतरती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी चित्रकार ने तुलिका से प्रकृति के कैनवास पर सुनहरे रंग बिखेर दिए हों । दिन चढ़ने के साथ हल्की/मध्यम/ तेज फुहारें/बौछारें वातावरण को शीतल बना देती हैं। कभी महीन बूंदें चेहरे को सहलाती हैं, तो कभी बादलों की धमाचौकड़ी यह एहसास दिलाती है कि पहाड़ों का मानसून अपने पूरे शबाब पर है।

शिमला की मॉल रोड की चहल-पहल भी इस मौसम में कुछ अलग ही दिखाई देती है। रंग-बिरंगी छतरियों के साथ टहलते पर्यटक, हाथों में गर्म कॉफी या चाय का प्याला लिए मौसम का आनंद लेते लोग और बारिश से धुली साफ सुथरी सड़कें। प्रकृति के इस रूप को शब्दों में पूरी तरह बांध पाना आसान नहीं है। देवदार और चीड़ के वृक्षों से आती भीगी लकड़ी की सुगंध हवा में घुलकर मन को अनायास ही ताज़गी से भर देती है। ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने अपने इत्र की सबसे सुंदर खुशबू शिमला के नाम कर दी है।


बरसात केवल मौसम नहीं बदलती, यह मन का रंग भी बदल देती है। शहर का शोर जैसे धीमा पड़ जाता है और प्रकृति की आवाज़ें स्पष्ट सुनाई देने लगती हैं। बिल्कुल वैसे ही, जैसे फिल्म '1942 ए लव स्टोरी' में गीतकार मुकुल दत्त लिखते हैं.. 'बजता है जलतरंग टीन की छत पे जब, मोतियों जैसा जल बरसे..'। यहां भी टीन की छत पर गिरकर शोर मचाती बारिश की जवाँ बूंदें, दूर कहीं गरजते बादल, पक्षियों की धीमी पुकार, पेड़ों में छिपे बंदर और ठंडी हवा की सरसराहट। ऐसे क्षणों में शिमला केवल एक पर्यटन स्थल नहीं रहता, बल्कि वह एक ऐसी अनुभूति बन जाता है जिसे बस महसूस किया जा सकता है।


इन दिनों शिमला में हल्की से मध्यम बारिश, घने बादल और ठंडी हवाओं का सिलसिला बना हुआ है। तापमान लगभग 15 से 24 डिग्री सेल्सियस के बीच है, जिससे मौसम और भी सुहावना है। सच ही है, जब बादल धरती को चूमने उतर आएँ, हवा प्रेम गीत गुनगुनाने लगे, देवदार धुंध की चादर ओढ़ लें और हर ओर हरियाली मुस्कुरा उठे, तब अनायास ही मन गुनगुनाते लगता है—"मौसम मौसम... लवली मौसम..."। 

#shimla #mansoonvibes #मानसून #mountains

बुधवार, 1 जुलाई 2026

भोपाल की जामुन,शिमला की जामुन..कुछ स्वाद खरीदे नहीं जाते!!


बरसात का अपना एक संस्कार होता है..इस दौरान केवल बादल आकर बरसते भर नहीं हैं बल्कि वे प्रकृति की पूरी रंगत बदल देते हैं, मिट्टी की मनमोहक सुगंध वातावरण में बिखर जाती है और मन के भीतर बारिश से जुड़ी सालों पुरानी यादें दस्तक देने लगती हैं। बारिश में किसी की यादों में चटपटे पकौड़े उभरते होंगे तो किसी के लिए भुट्टे परंतु मेरी यादों में अब सबसे ज्यादा जामुन का पेड़ शामिल हैं।

इन्हीं दिनों जब जब बाज़ार में जामुन दिखाई देती है, मन अनायास ही भोपाल की ओर लौट जाता है—आकाशवाणी कॉलोनी के उस सरकारी आवास की ओर, जहाँ एक जामुन का पेड़ हमारे जीवन का मौन लेकिन सबसे लोकप्रिय सदस्य हुआ करता था।

वह पेड़ पता नहीं किसने रोपा था या अपने आप पल बढ़ गया था क्योंकि हमारे इससे रिश्ते तब बने जब हम दोनों उम्र की परिपक्व दहलीज पर खड़े थे। फिर क्या था यह साल दर साल हमारे जीवन की मीठी स्मृतियों का हिस्सा बनता गया और कई अनजान परिवारों से मधुर संबंधों का आधार भी। वह हमारे हर अच्छे बुरे दिनों का साथी था, मौसमों का कथाकार और उदारता का जीवंत पाठ ।

बरसात शुरू होते ही उसकी शाखाएँ फलों से लद जाती थीं। पहले फूल आते,फिर नन्हें फल ,फिर युवा होते फलों की हरियाली गहराती, फिर गहरे बैंगनी रंग के छोटे-छोटे फल हवा के साथ झूमते और धीरे धीरे पूरा वृक्ष जामुनी हो जाता। हवा चलती तो मीठे मीठे फल स्वयं धरती पर बिखर जाते और उनकी खुशबू से पूरी कालोनी महकने लगती। उन दिनों, सुबह उठते ही यहाँ वहां बिखरे जामुन चुनना मेरी और खासतौर पर मनीषा जी की दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा होता था। अच्छे फल चुनना,फिर उन्हें नजाकत से कई बार धोना और आखिर में सहेजकर फ़्रिज में रखना।

हमारी सुबह भी जामुन खाने से ही होती। जामुन हमारे लिए बेड टी/ ब्रेकफास्ट बन जाती। हम दोनों खाली पेट किलो किलो तक जामुन खा जाते। सच में, किलो किलो..अब यह उस पेड़ का प्यार था या हमारे पाचन क्षमता बेहतर थी लेकिन न तो पेटदर्द होता,न अपच..बस, जीवन का स्वाद एवं जीभ पर जामुन का रंग जरूर भरपूर उतर आता था। यह पेड़ इतनी ज्यादा जामुन देता था कि फ्रिज भर जाता..हम खाते, दोस्त खाते,रिश्तेदार खाते,पूरी कालोनी खाती,हमारे न्यूजरुम की टीम खाती और फिर भी इतनी बच जाती कि दूरदराज के लोगों तक भी पहुंच जाती। हाल ही हमारी गैट टूगैदर में भी सभी ने सबसे ज्यादा चर्चा जामुन की ही हुई। असल बात यह है कि उस समय जामुन का स्वाद था, मूल्य नहीं।

घर आने वाला कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता था। पड़ोसी अपने हिस्से की खुशी लेकर जाते । किसी ने कभी नहीं पूछा—एक किलो कितने की है? क्योंकि वहाँ जामुन मूल्यवान नहीं, साझा आनंद थी।

बचपन और प्रकृति दोनों की यही विशेषता होती है—वे हिसाब नहीं रखते लेकिन जीवन का एक स्वभाव है कि वह स्थिर नहीं रहता। समय ने करवट ली। तबादला हुआ और सात साल में जामुन का जीवनभर का कोटा पूरा कर हम शिमला आ गए। शहर बदला तो केवल दृश्य नहीं बदले, वस्तुओं के अर्थ भी बदलने लगे। शिमला से बीच-बीच में गृह नगर करेली और भोपाल आना जाना चलता रहा। बाजारों में जामुन दिखी और मन भी मचला इसलिए पहली बार पेड़ ने नहीं, दुकानदार ने जामुन के मूल्य से परिचित कराया। तब पता चला कि जामुन की कीमत भी होती है और वह भी 50 से 100 रुपये किलो।


जामुन तो खानी ही थी इसलिए खरीदनी पड़ी । उस दिन अनुभव हुआ कि जो कभी बिना माँगे मिलता था, उसे खरीदने में एक हल्की-सी झिझक होती है। स्वाद वही था। जीभ फिर जामुनी हुई.. लेकिन अनुभव वैसा नहीं था क्योंकि स्वाद केवल फल में नहीं होता, उसके संदर्भ में भी होता है।

और फिर शिमला में उसी जामुन को 300 रुपये किलो बिकते देखा। बिना दाम चुकाए सहजता से भरपूर मात्रा में मिलने वाले जामुन को इतना बेशकीमती देखकर मन भी ठिठका और जेब में रखे पैसे भी। पर, सात साल से चढ़ा स्वादिष्ट जामुन के स्वाद का नशा कैसे उतरता इसलिए खरीदनी पड़ी। न जामुन बदली,न स्वाद पर मूल्य जरूर बदल गया। तब, प्रकृति ने दूसरा सबक सिखाया कि वस्तु वही रहती है, पर दूरी उसका मूल्य बदल देती है। यह केवल बाजार का सिद्धांत नहीं, जीवन का दर्शन भी है।

घर के पिछवाड़े का पेड़, रोज़ मिलने वाले लोग, माता-पिता की उपस्थिति, अपने शहर की सहजता—जब तक पास रहते हैं, सामान्य लगते हैं लेकिन जैसे ही दूरी आती है, उनका महत्व बढ़ जाता है। तात्पर्य यह है कि हमारी दुनिया में कई चीज़ों का मूल्य उनकी गुणवत्ता नहीं, उनकी उपलब्धता तय करती है। शायद इसी कारण बचपन हमें सबसे सुंदर लगता है क्योंकि उस समय बहुत कुछ बिना मूल्य मिला होता है।

आज भी जब शिमला में जामुन खरीदी तो मन के भीतर यह तुलना लगातार चलती रही कि एक तरफ बाजार का तराजू और दूसरी तरफ भोपाल के उस सरकारी क्वार्टर का पेड़। एक तरफ रुपये हैं, दूसरी तरफ स्मृतियाँ और हर बार स्मृतियाँ भारी पड़ जाती हैं। धीरे-धीरे समझ आया कि जीवन का सबसे बड़ा वैभव वह नहीं होता जिसे हम खरीद सकते हैं; वह होता है जिसे हमने कभी सहज रूप से जिया हो। 

जामुन अब भी जीभ पर रंग छोड़ती है लेकिन अब वह रंग केवल बैंगनी नहीं होता। उसमें थोड़ा-सा भोपाल होता है, थोड़ा-सा शिमला, थोड़ा-सा समय और बहुत सारे जीवन मूल्य। शायद जामुन के उस पेड़ ने भी हमें जीवन के सबसे बड़े सत्य से रूबरू करा दिया कि जो चीज़ें हमारे पास सहज रूप से उपलब्ध हैं, वे साधारण नहीं होतीं; हम केवल उनके साथ इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उनका मूल्य देर से समझते हैं इसलिए जो भी सहजता से उपलब्ध है उसका भरपूर सम्मान कीजिए चाहे वे माता पिता हों, भाई बहन,दोस्त या संबंधी..या फिर प्रकृति में निःशुल्क उपलब्ध हवा,धूप,पानी,पेड़,फल एवं फूल... क्योंकि ऐसा न हो कि समय का अंतराल उन्हें आपसे दूर ले जाए और वे इतने बेशकीमती हो जाएं कि आप उन्हें बस याद ही करते रह जाएं।

#जामुन #Jamun #BlackPlum 

गुरुवार, 25 जून 2026

‘माखन के लाल’ किताब नहीं, बल्कि अदरक इलायची वाली चाय है!!


यह किताब नहीं, अनुभवी हाथों से बनी कड़क चाय है.. इसमें संघर्ष के अदरक का स्वाद है तो उपलब्धियों की इलायची की खुशबू भी है। इसमें विद्यार्थियों के चायपत्ती जैसे अनुभव के सुनहरे रंग हैं तो चीनी की मिठास भी। वैसे भी, माखन के हम पहले बैच वाले ‘लालों’ से लेकर बाद के कई बैच तक की जिंदगी के कई अहम पड़ाव यहां मौजूद चाय की टपरी पर ही तय हुए थे। 

हम बात कर रहे हैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा अपने 50 से ज्यादा पूर्व विद्यार्थियों की अनुभव-गाथाओं पर केंद्रित पुस्तक ‘माखन के लाल’ की। अपने अपने क्षेत्र के महारथी इन छात्रों के अनुभवों की पूंजी से भरा यह एक ऐसा खजाना है, जिसका फायदा हर आने वाली पीढ़ी को मिलता रहेगा। इसमें मुझे भी अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिला है। यह कोई साधारण स्मृति-संग्रह नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज़ है जो पत्रकारिता के सपने देखने वाले हर युवा को सिखाता है कि सफलता का रास्ता कितना कठिन, रोमांचक और प्रेरणादायी हो सकता है। 

पुस्तक पढ़ते हुए लगता है जैसे पुराने दोस्त उसी चाय की टपरी पर पर एक बार फिर चाय की चुस्कियों के साथ अपनी अपनी सफलता एवं संघर्ष की कहानी सुना रहे हों। इसलिए, मैंने शुरुआत में ही कहा है कि ‘माखन के लाल’ बिल्कुल कड़क अदरक-इलायची वाली चाय  है..। इसमें पहली रिपोर्टिंग की घबराहट है तो बाइलाइन छपने की खुशी भी, नौकरी न मिलने का संघर्ष है तो महज 600 रुपए से लेकर 1000 रुपए महीने के वेतन में छिपी समृद्धता भी, ब्रेकिंग न्यूज़ जैसा रोमांच भी है तो किसी मीडिया हाउस में शीर्ष पद तक पहुंचने के सपने के साकार होने की कहानी भी।


‘माखन के लाल’.. एक संस्थान से विश्वविद्यालय बनने की, चार कमरों से विशाल आकर्षक परिसर में बदलने की गाथा है। इसमें चालीस विद्यार्थियों से लाखों विद्यार्थियों का परिवार बनने की महागाथा भी है । यह किताब हमें बताती है कि कैसे माखन के ये लाल साहस, सत्य और संवेदनशीलता के साथ विश्वविद्यालय की मूल परंपरा को आगे बढ़ा रहे  हैं । 

किताब का सबसे आकर्षक पक्ष सच्चाई के साथ वास्तविक जीवन की कहानियों में समाई विविधता है । यहां सिर्फ बड़े चैनलों के एंकर नहीं, बल्कि छोटे-छोटे शहरों से आए, रात-दिन मेहनत करने वाले, गाँव की खबरों को राष्ट्रीय पटल पर लाने वाले, डिजिटल युग में नई मीडिया क्रांति रचने वाले, मीडिया गुरु से गुल्लक रचने वाले और यहां तक कि शिक्षक एवं कुलगुरू बनकर नई पीढ़ी को तैयार करने वाले पूर्व छात्रों के निजी अनुभव शामिल हैं। 

कोई विद्यार्थी बताता है कि MCU (विश्वविद्यालय) की क्लास रूम में हुई बहस आज भी उनके लेखनी में झलकती है, वहीं किसी विद्यार्थी की लेखनी में मैस की चाय और दोस्तों के साथ बिताए  ठहाके याद आ जाते हैं। पुस्तक का सबसे सुंदर पहलू यह है कि यह सिर्फ सफलता की चमक नहीं दिखाती, बल्कि इसके पीछे छिपे संघर्ष, आर्थिक तंगी एवं शिक्षकों से लेकर संपादक तक की डांट को भी बेझिझक सामने लाती है। नए विद्यार्थियों के लिए तो यह पुस्तक गीता/बाइबिल/कुरान की तरह मार्गदर्शक है जो बिना किसी बौद्धिक बोझ के सहज भाव से, उनकी भाषा में, मीडिया की तमाम कठिनाइयों के बीच अनुभव पर आधारित आसान रास्ता सुझा देती है। 

माखन के लाल को पढ़ते हुए नयी पीढ़ी के छात्रों को ऐसा लगेगा जैसे कि कोई सीनियर बाजू में बैठकर सलाह दे रहा हो कि न तो डरना है, न ही गिरना है..बस, सदैव रीढ़ सीधी रखकर संघर्ष करना है क्योंकि सफलता की रोशनी किसी भी मोड़ पर हमकदम बन सकती है । मसलन, मीडिया के शिखर पर परचम लहरा रहे संजय सलिल कहते हैं कि ‘खुद को झोंकना पड़ता है और नई पीढ़ी में सबसे ज्यादा इसी की कमी दिखाई पड़ रही है। आज लोग स्मार्ट हैं लेकिन मेहनत की कमी है।’ 

पहले बैच की प्रतिनिधि आवाज़ पदम भंडारी ने बताया कि ‘हमारे बैच में 17 गोल्ड मेडलिस्ट थे’..इससे साफ होता है कि एडमिशन के लिए कितनी जद्दोजहद थी। इसी बैच के प्रकाश पंत पहली बार अखबार में नाम छपने की खुशी आज तक नहीं भूल पायें हैं तो हमारे साथी अजय उपाध्याय बताते हैं कि ‘शुरुआत में पहचान का संकट बाद में सबसे बड़ी ताकत बना एवं जिंदगी की हर चुनौती से लड़ना सिखाया।’

एक विद्यार्थी ने लिखा है कि ‘यह संस्थान मेरे लिए सिर्फ विश्वविद्यालय नहीं था बल्कि भाषा की प्रयोगशाला भी था।’ किसी ने लिखा है कि ‘विश्वविद्यालय ने हमें किताबों से बाहर की दुनिया से सीधे जोड़ा।’ एक अनुभवी विद्यार्थी ने बताया कि ‘पत्रकारिता का सफ़र सिर्फ़ प्रतिभा से तय नहीं होता, उसमें जिद भी चाहिए।’ इसी तरह हर विद्यार्थी ने अपने अनुभव से इस किताब को सींचा और सँवारा है।

खास बात यह भी है कि ‘माखन के लाल’ किताब का प्रकाशन उदंत मार्तंड से शुरू हुए भारतीय पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर किया गया है। किताब के पहले ही पन्ने पर मोटे अक्षरों में संपादक की ओर से लिखा गया है- “एक एक ईंट जोड़कर ही इतिहास स्वयं का निर्माण करता है।” इसलिए, किताब में संकलित कई पीढ़ियों के अनुभव पढ़कर मन में एक बात साफ हो जाती है कि MCU सिर्फ डिग्री नहीं देता, बल्कि एक ‘हौंसला’ देता है। 

प्रधान संपादक एवं कुलगुरू विजय मनोहर तिवारी, प्रबंध संपादक डॉक्टर पी शशिकला तथा संपादक विनयश्री के नेतृत्व में 32 लोगों की संपादकीय टीम वाकई बधाई की पात्र है क्योंकि उन्होंने पांच महीनों के परिश्रम से पचास विद्यार्थियों के सपनों में चुस्त संपादन, आकर्षक चित्रों एवं बेहतरीन शीर्षकों से मनमोहक रंग भर दिए हैं। पुस्तक का कवर, आकार, मुद्रण, फ़ॉन्ट, साइज़ सब कुछ अनूठा है । यह पुस्तक अतीत की याद नहीं, बल्कि भविष्य की प्रेरणा है। पत्रकारिता, संचार, कंटेंट क्रिएशन या मीडिया में अपना भविष्य देख रहे हर युवा को ‘माखन के लाल’ अवश्य पढ़नी चाहिए। यह पुस्तक का पहला संस्करण है । उम्मीद है कि आने वाले संस्करण और भी समृद्ध होंगे तथा माखन परिवार के और भी नगीनों से रूबरू कराएंगे।


#MCU #माखनलाल 

शनिवार, 20 जून 2026

मलाई बरफ: कतरा-कतरा स्वाद का पहाड़ी जादू

 


छह घंटे की लगातार मेहनत और डेढ़ घंटे में खेल खत्म। वैसे, हवा न लगे तो इसका जीवन करीब नौ घंटे का है लेकिन हवा लगी कि यह छुई मुई की तरह लजाकर पानी पानी हो जाती है। सबसे खास बात कि इसमें न तो कृत्रिम मलाई है और न ही बरफ..फिर भी नाम है मलाई बरफ और स्वाद ऐसा की आप पत्ता चाटते रह जाओगे। जी हां, पत्ता क्योंकि इसे पत्ते में ही दिया जाता है और पत्ते से ही खाया जाता है।

हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश की मशहूर और पारंपरिक ‘मलाई बरफ’ की। यह ऐसी अनूठी आइसक्रीम है जिसमें न तो बर्फ़ के एक भी टुकड़े का इस्तेमाल होता है और न ही फ्रिज/फ्रीजर जैसी किसी मशीन की जरूरत पड़ती है लेकिन फिर भी यह इतनी ठंडी एवं मजबूती से जमी रहती है कि आप आराम से इसका एक एक टुकड़ा मुँह में घोलते हुए जीभ पर इसके स्वाद का कतरा कतरा महसूस कर सकते हैं।

आमतौर पर आइसक्रीम का ख़्याल जेहन में आते ही फ्रीजर, बर्फ और रंग-बिरंगे कोन/कप की तस्वीर ही उभरती है लेकिन हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों की यह एक ऐसी पारंपरिक आइसक्रीम है, जो न बर्फ से बनती है और न मशीन से  बल्कि इसे बनाने के लिए बस दूध, आग और धैर्य की जरूरत पड़ती है।

देखने में, यह आमतौर पर उत्तर भारत में मिलने वाली मटका कुल्फी जैसी लगती है लेकिन इसे तैयार करने की प्रक्रिया इतनी विशिष्ट है कि यह इसमें लगने वाले परिश्रम, शुद्धता और स्वाद के कारण नामी कंपनियों की आइसक्रीम को पीछे छोड़ देती है। इस पारंपरिक आइसक्रीम शुद्ध दूध को लंबे समय तक धीमी आंच पर पकाया जाता है। लगातार चलाते हुए उसे इतना गाढ़ा किया जाता है कि उसमें एक विशेष दानेदार बनावट और स्वाद विकसित हो जाता है। यही प्रक्रिया इसके स्वाद की पहचान बनती है।


मलाई बरफ बनाने के लिए हिमाचल जैसे पहाड़ों से हौंसले एवं धैर्य की जरूरत होती है। इस प्रक्रिया में जल्दबाजी की कोई जगह नहीं होती वरना स्वाद और अंदाज़ दोनों ही ख़राब हो जाएंगे। इसके लिए, सबसे पहले, बड़े बर्तनों में दूध को घंटों तक उबाला जाता है। धीरे-धीरे उसमें मौजूद पानी सूख जाता है और दूध गाढ़ा होकर हल्की प्राकृतिक मिठास ग्रहण करने लगता है। यह प्रक्रिया काफी हद तक खोया बनाने जैसी ही है। फिर इसमें ड्राई फ्रूट्स, चीनी जैसी सामग्री डालकर अंतिम रूप दिया जाता है। ताज़ी बनाई गई मलाई बर्फ को नदी के ठंडे पानी में सेट किया जाता है, फिर ऊनी कपड़े में लपेटकर रखा जाता है ताकि पिघले नहीं।

करीब पचास साल से मलाई बरफ बना रहे करमचन्द बताते हैं कि इसका असल स्वाद केवल सामग्री से नहीं, बल्कि समय, अनुभव और खास विधि से आता है। यही कारण है कि पारंपरिक तरीके से बनी मलाई बरफ का स्वाद लंबे समय तक जीभ पर बना रहता है। इसका पहला टुकड़ा मुँह में रखते ही सबसे पहले छह घंटे के परिश्रम से तैयार मलाई का, दूध की गाढ़ी रबड़ी सा, खोया, इलायची और बादाम के टुकड़ों का मनमोहक स्वाद जुबां पर उतरने लगता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे भीषण गर्मी में पहाड़ों की ओर आए पर्यटकों को तन बदन में गुदगुदाती ठंडक का अहसास होता है।

यह न तो बहुत मीठी होती है और न ही बर्फ सी ठंडी बल्कि मध्यम ठंडक के साथ मखमली नरमी लिए दूध की प्राकृतिक मिठास का कमाल है। शहरी आइसक्रीम की तरह कृत्रिम स्वाद या रंग नहीं, बस शुद्ध दूध, पहाड़ी धैर्य और हिमाचली जुनून। उल्लेखनीय बात यह भी है कि हिमाचल प्रदेश में मलाई बरफ सभी जगह नहीं मिलती बल्कि मुख्य रूप से कांगड़ा जिले में, खासकर कांगड़ा, धर्मशाला, पालमपुर और आसपास के बाजारों में अप्रैल से सितंबर तक में मिलती है। हिमाचल प्रदेश की घाटियों में जब गर्मी चरम पर होती है, तब कांगड़ा की सड़कों पर मलाई बरफ का जलवा देखने को मिलता है।

वैसे, इसे तलाशने के लिए भी पहाड़ों सा धैर्य चाहिए क्योंकि पारंपरिक मलाई बरफ विक्रेता आज भी लकड़ी के पुराने पिटारे/डब्बे में रखकर मोटे कपड़े से ढककर बाजार के किसी कोने में बिना प्रचार प्रसार के बेचते मिलते हैं। इसलिए यदि आप हिमाचल प्रदेश के बाहर से हैं तो स्थानीय लोगों से पूछ लेना ही बेहतर है क्योंकि छह घंटे में तैयार मलाई बरफ डेढ़ दो घंटे में बिक जाती है और विक्रेता अगले दिन की तैयारी के लिए वापस चल पड़ते हैं।

मलाई बरफ को खाने खिलाने का तरीका भी बिल्कुल अलग है। इसे स्थानीय तौर पर उपलब्ध पत्तों में परोसा जाता है और पत्तों की ही चम्मच बनाकर खाया जाता है। यह तरीका पहाड़ों की परंपरा के साथ साथ उनकी पर्यावरण के प्रति चिंता को दर्शाता है। इससे पहाड़ों के लोगों के  प्रकृति के साथ जुड़ाव का भी पता चलता है।

दादा-परदादा के दौर से मलाई बरफ बनाने में लगे करमचंद जैसे लोग महज 50 रुपए प्रति पत्ता (प्लेट) के बाद भी इस कारोबार को पीढ़ियों से जिन्दा रखे हुए हैं। इसलिए, मलाई बर्फ सिर्फ आइसक्रीम नहीं, हिमाचल की सादगी, शुद्धता और ठंडक का प्रतीक है।  यह हमें पहाड़ों की संस्कृति एवं स्वाद से भी जोड़ती है। 


मंगलवार, 16 जून 2026

विरासत,बदलाव और भविष्य पर गंभीर विमर्श

 ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता विशेषांक की समीक्षा














देश में शोध पर केंद्रित अनेक पत्रिकाएं या जर्नल निकल रहे हैं लेकिन अधिकतर अकादमिक संस्थानों से प्रकाशित हो रहे हैं और उनका विमर्श भी अकादमिक स्तर का ही रहता है लेकिन ‘समागम’ ने इस सीमा से न बँधकर अपने लिए विषयों का आसमान खुला रखा है। शायद, इसकी मूल वजह इस लोकप्रिय शोध पत्रिका का संपादक किसी शैक्षणिक विशेषज्ञ का न होकर खांटी पत्रकार प्रो मनोज कुमार का होना है। ‘समागम’ में विषयों की इतनी विविधता होती है कि हर अंक संग्रहणीय दस्तावेज बन जाता है।

‘समागम’ का मई माह का अंक भी विविधता की इसी श्रृंखला को आगे बढ़ा रहा है। खास बात यह है कि यह सामान्य अंक न होकर विशेषांक है। यह विशेषांक उदंत मार्तंड से लेकर अब तक हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल के इतिहास को केंद्र में रखकर तैयार किया गया एक गंभीर, बहुआयामी और शोधपरक प्रयास है। करीब डेढ़ सौ पेजों का यह अंक पत्रकारिता के विद्यार्थियों, अध्येताओं और संस्थानों के साथ साथ इस विषय में रुचि रखने वालों के लिए अत्यधिक उपयोगी है। 

इस अंक की बात करते हुए संपादक प्रो मनोज कुमार बताते हैं कि- ‘हमारा प्रयास था कि 'उदन्त मार्त्तण्ड' के द्वि-शताब्दी वर्ष के अवसर पर एक ऐसे अंक का संयोजन किया जाए, जो न केवल पठनीय हो अपितु संग्रहणीय भी हो। 'उदन्त मार्त्तण्ड : ककहरा से एआई' तक के इस अंक में बहुत कुछ समेटने की कोशिश की है और बहुत कुछ छूट भी गया है. आने वाले समय में उसे भी समाहित करने का प्रयास करेंगे।’

इस अंक में ‘समागम’ ने हिंदी पत्रकारिता को केवल समाचार माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति, भाषा, ज्ञान परंपरा, लोकतंत्र और तकनीकी बदलावों से जुड़े व्यापक विमर्श के रूप में देखने का प्रयास किया है। विशेषांक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विषय-विविधता है। इसमें हिंदी पत्रकारिता के अब तक के इतिहास, विरासत, बदलाव, विकास, वैचारिक आंदोलनों, स्वतंत्रता संघर्ष और अंग्रेजी शासनकाल में प्रतिबंधित पत्रिकाओं जैसे गंभीर विषयों को शामिल किया गया है। हर अध्याय में विषय विशेषज्ञों की कलम हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक जड़ों को मौजूदा संदर्भों में समझने का गंभीर प्रयास करती है।

विशेषांक में उदंत मार्तंड से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तक हिंदी पत्रकारिता की सफल यात्रा, इस दौरान हुए बदलावों और भारतीय ज्ञान परंपरा के संबंध पर विशेष बल दिया गया है। “नारद जी, भारतीय ज्ञान परंपरा एवं हिंदी पत्रकारिता”, “भारतीय ज्ञान परंपरा में हिंदी का स्थान” तथा “हिंदी, भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा” जैसे विषय यह दर्शाते हैं कि संपादक मंडल पत्रकारिता को केवल आधुनिक सूचना तंत्र नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक परंपरा के विस्तार के रूप में देखता है। यह दृष्टिकोण इस विशेषांक को सामान्य पत्रकारिता विमर्श से अलग पहचान देता है।

‘समागम’ के इस अंक का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका समकालीन दृष्टिकोण भी है। “डिजिटल समय में मीडिया शिक्षा”, “हिंदी पत्रकारिता का बदलता स्वरूप और डिजिटल मीडिया का प्रभाव”, “भाषा प्रौद्योगिकी का स्वरूप और भविष्य”, “एआई : विकल्प नहीं, उपकरण बने” तथा “वैश्वीकरण के दौर में हिंदी भाषा” जैसे विषय वर्तमान मीडिया परिदृश्य की चुनौतियों और संभावनाओं को सामने लाते हैं। इससे यह विशेषांक केवल अतीत का दस्तावेज नहीं रह जाता, बल्कि भविष्य की पत्रकारिता पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करता है।

विशेषांक में मीडिया और समाज के संबंधों को भी पर्याप्त स्थान दिया गया है। बाजारवाद, लोकतंत्र, सामाजिक समरसता, स्त्री संघर्ष, आदिवासी अस्मिता, पर्यावरणीय चिंतन और दलित विमर्श जैसे विषय पत्रकारिता को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ‘समागम’ पत्रकारिता को केवल सूचना उद्योग नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के माध्यम के रूप में देखता है। हिंदी पत्रकारिता के साथ सिनेमा, फिल्म पत्रकारिता, आकाशवाणी का प्रसारण, बाल पत्रकारिता और व्यंग्य लेखन की परंपरा जैसे विषयों का समावेश विशेषांक को और समृद्ध बनाता है। इससे पाठक को हिंदी मीडिया जगत के विविध आयामों का व्यापक परिचय मिलता है।

‘समागम’ के पहले भाग में  'उदन्त मार्तण्ड' से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक का सफर, भारत की बाल पत्रकारिता, व्यंग्य लेखन की परंपरा, हिंदी पत्रकारिता में बंगाल का योगदान, अंग्रेजी राज में प्रतिबंधित पत्रिकाएं, वैचारिक आंदोलन, नवजागरण काल, स्वाधीनता आंदोलन, आकाशवाणी का इतिहास, डिजिटल समय में मीडिया शिक्षा आदि को व्यवस्थित रूप से शामिल किया गया है। इस भाग में  श्री गिरीश पंकज, डॉ विकास दवे, संजीव शर्मा, डॉ. शैलेश शुक्ला, डॉ. संतोष भदौरिया, डॉ. अल्पना सिंह, डॉ. संध्या द्विवेदी, डॉ. संगीता पाठक, अनिल माथुर, डॉ. आरती सारंग, प्रो. संजय द्विवेदी, राजकुमार जैन, डॉ. अर्पण जैन और डॉ. नरेन्द्र त्रिपाठी जैसे विद्वानों के लेख इस खंड को मजबूत बनाते हैं।

वहीं,शोध विमर्श पर आधारित दूसरा खंड  समकालीन और विश्लेषणात्मक है। इसमें नाट्य समीक्षा, डिजिटल मीडिया का प्रभाव, वैश्विक परिप्रेक्ष्य, सिनेमा और पत्रकारिता, दलित-आदिवासी विमर्श, नारी मुद्दे, पर्यावरण, लोकतंत्र और भाषा शुद्धि जैसे विविध विषय शामिल हैं। डॉ. दीपा वाडिया, डॉ. नीता सक्सेना, डॉ. हरिओम कुमार, प्रो आशुतोष कुमार द्विवेदी, कविता आर, डॉ. विजयकुमार रोड़े, सिलपाका वेंकटाद्री आदि शोधकर्ताओं के योगदान से यह खंड शोध की गहराई प्रदान करता है।

‘समागम’ का आकर्षक और विषय के अनुरूप आवरण, त्रुटि रहित छपाई और कम कीमत में ज्यादा जानकारी इसे और भी पठनीय बनाते हैं। हालांकि, कुछ विषयों जैसे क्षेत्रीय हिंदी पत्रकारिता पर और अधिक विस्तार दिया जा सकता था। साथ ही, शहरी व ग्रामीण पाठक वर्ग के दृष्टिकोण और हिंदी पत्रकारिता की आर्थिक व्यवहार्यता जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर भी शोध परक आलेख होते तो पाठकों की समझ और बेहतर हो सकती थी।

समग्र रूप से देखा जाए तो ‘समागम’ का यह विशेषांक हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक यात्रा, वैचारिक चेतना, सामाजिक सरोकार और तकनीकी संक्रमण का एक गंभीर दस्तावेज है। यह केवल शोधार्थियों और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए ही उपयोगी नहीं होगा, बल्कि हिंदी भाषा, मीडिया अध्ययन और भारतीय ज्ञान परंपरा में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए भी महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री सिद्ध हो सकता है। यह विशेषांक इस बात का भी प्रमाण है कि हिंदी पत्रकारिता पर गंभीर अकादमिक विमर्श आज भी जीवित है और बदलते डिजिटल युग में अपनी नई दिशा खोज रहा है।



शनिवार, 13 जून 2026

किरदार में जीता एक उम्दा कलाकार

 














रोहिताश्व गौड़ किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। ‘भाबीजी घर पर हैं’ के मनमोहन तिवारी और ‘लापतागंज’ के मुकुंदीलाल गुप्ता के उनके किरदारों ने उन्हें घर घर में लोकप्रिय बना दिया है। रोहिताश्व गौड़ की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे हर भूमिका में जान फूंक देते हैं। वे हिंदी रंगमंच और टेलीविजन की उस परंपरा के प्रतिनिधि कलाकार हैं जिन्होंने अभिनय को केवल लोकप्रियता का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन के साधारण पात्रों को असाधारण ढंग से प्रस्तुत करने की कला बनाया है।

लोकप्रिय धारावाहिक ‘भाबीजी घर पर हैं’ में निभाया गया उनका चरित्र केवल हास्य नहीं रचता, बल्कि छोटे शहरों की मानसिकता, महत्वाकांक्षा और घरेलू जीवन की विडंबनाओं को भी हल्के-फुल्के अंदाज़ में सामने लाता है। उनकी कॉमेडी में शोर नहीं, बल्कि अवलोकन की सूक्ष्मता दिखाई देती है।

@RohitashvGour रोहिताश्व गौड़ की खासियत है कि वे अपने पात्रों में अभिनय करते हुए दिखाई नहीं देते, बल्कि उनमें घुल मिल जाते हैं। चाहे व्यंग्य हो, हास्य हो या आम भारतीय परिवारों के बीच का सहज संवाद, रोहिताश्व अपने चेहरे के भाव, संवाद की लय और देहभाषा से पात्र को विश्वसनीय बना देते हैं।

धारावाहिक ही नहीं, फिल्मों में भी छोटी छोटी भूमिकाओं को उन्होंने अपने अभिनय से बड़ा बना दिया है और दर्शक उनके किरदार को भूल नहीं पाए हैं। फिल्म ‘पीके’ में पुलिस इंस्पेक्टर पांडे हों या फिर ‘डंकी’ तथा ‘ए वेडनसडे’ में उनका प्रभावशाली अभिनय..रोहिताश्व ने अलग ही छाप छोड़ी है। मुन्ना भाई सीरीज की फिल्में ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ का नारियल पानी वाला और ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ का कुक्कू जैसे क्षणिक किरदार भी उनके कारण स्मृतियों का हिस्सा बन गए। ‘अतिथि तुम कब जाओगे’, ‘मातृभूमि:ए नेशन विदाउट विमेन’ और ‘पिंजर’ जैसी तमाम फिल्मों में उनकी मेहनत अलग ही नज़र आती है। 

रोहिताश्व गौर की अभिनय यात्रा यह भी बताती है कि लंबे समय तक टिके रहने के लिए केवल लोकप्रियता नहीं, बल्कि निरंतर मेहनत, मंचीय अनुशासन और पात्रों की गहरी समझ आवश्यक होती है। वे उन कलाकारों में हैं जिनकी उपस्थिति किसी दृश्य को विश्वसनीय और आत्मीय बना देती है।

रोहिताश्व गौड़ के बारे में यह बात कम लोग जानते होंगे कि उनका शिमला से गहरा सांस्कृतिक और रंगमंचीय रिश्ता है। उनके पिता सुदर्शन गौड़ शिमला के रंगमंच आंदोलन से जुड़े प्रमुख नाम थे। उन्होंने 1950 के दशक में शिमला में नाट्य और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। रोहिताश्व गौड़ ने भी कई बार कहा है कि उनके अभिनय की जड़ें थिएटर में हैं और उनका शुरुआती रंगमंचीय जुड़ाव शिमला से ही शुरू हुआ। बाद में वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली पहुँचे।

वर्तमान में वे अपने पिता के सपनों को धरातल पर उतार रहे हैं। वे ऑल इंडिया आर्टिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं और जो सात दशकों से शिमला में रंगमंच को प्रोत्साहित कर रही है। हाल ही में उनकी इस संस्था ने 71 वीं अखिल भारतीय नाटक एवं नृत्य प्रतियोगिता का शिमला के गैटी थियेटर और कालीबाड़ी सभागार में सफल आयोजन किया। 

इस साल प्रतियोगिता में देश भर के लगभग 27 नाट्य दलों और 260 से अधिक नृत्य प्रस्तुतियों ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित किया। इस दौरान, तमाम व्यस्तताओं के बाद भी वे करीब एक हफ्ते तक शिमला में जमे रहे और पूरे दिन गैटी में रहकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाते रहे..वाकई,विरासत और वर्तमान के बीच ऐसा संतुलन उन जैसा विरला कलाकार ही बना सकता है।





बुधवार, 10 जून 2026

लेखकों को क्यों इतना पसंद आता है शिमला..!!

 














आखिर, शिमला में ऐसा क्या है कि दुनिया भर के नामी लेखक यहां खिंचे चले आते हैं? कोई यहां रहकर किताब लिखना चाहता है तो कोई यहां की वादियों पर ही शब्द चित्र उकेरने लगता है। कुछ तो ऐसा खास है देवभूमि हिमाचल प्रदेश और इसकी राजधानी में, जो हर छोटे बड़े रचनाकार को अपने मोहपाश में जकड़ लेता है।

यह तो ज़ाहिर बात है कि लेखन के लिए मानसिक शांति और एकांत की आवश्यकता होती है। शिमला के घने देवदार-चीड़ के जंगल, धुंध भरी सुबह और आमतौर पर बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों की शांति लेखकों को रचनात्मक वातावरण प्रदान करती हैं। जिससे वे बाहरी शोर से दूर होकर अपने विचारों को शब्द दे पाते हैं। शायद, यही कारण है कि निर्मल वर्मा जैसे लेखकों की रचनाओं में शिमला का शांत और सुकून भरा माहौल स्पष्ट रूप से झलकता है।

हिमालय की गोद में बसे इस शहर का प्राकृतिक सौंदर्य भी कवियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने यहाँ की वादियों से प्रभावित होकर अपनी प्रसिद्ध कविताओं की रचना की। यहां के पहाड़ों का बदलता मौसम, बर्फबारी और मनमोहक सूर्यास्त लेखकों की कल्पनाशीलता को नई उड़ान देते हैं।

शिमला की एक अनूठी विशेषता यह भी है कि यह कभी भी केवल एक पहाड़ी क्षेत्र भर नहीं रहा बल्कि अंग्रेजों के प्रभाव के कारण यहाँ शुरू से ही दुनिया भर के बुद्धिजीवी, राजनेता और कलाकार आते रहे हैं। इस विविधता ने यहाँ बौद्धिक माहौल बनाया और साहित्य, नाटक और कला जैसी कलाओं को फलने फूलने का भरपूर अवसर दिया । गेयटी थिएटर जैसी विश्व स्तरीय जगहों ने भी रचनात्मक ऊर्जा को और विस्तार देने का काम किया ।


इसके अलावा, ब्रिटिश काल में शिमला भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। यहाँ के शीर्ष अफसरों,उनके परिवारों, नामी क्लबों और आए दिन होने वाली पार्टियों के हाई-प्रोफाइल जीवन ने भी लेखकों को औपनिवेशिक समाज के चरित्रों और किस्सों पर लिखने के लिए भरपूर मसाला दिया।

शिमला में लेखन के विस्तार का एक कारण यह भी है कि अंग्रेजी सत्ता का केंद्र होने के कारण यहां पठन पाठन की सबसे अच्छी सुविधाएं एवं केंद्र बने। इसके फलस्वरूप बिशप कॉटन, सेंट एडवर्ड्स और ऑकलैंड हाउस जैसे प्रतिष्ठित स्कूलों की मौजूदगी ने बचपन से ही छात्रों में साहित्य के प्रति रुचि पैदा की। रस्किन बॉन्ड इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान ही लिखना शुरू कर दिया था।

वहीं, कई लेखकों के लिए शिमला उनकी यादों का हिस्सा है। यहाँ की पुरानी इमारतें, संकरी गलियाँ और ऐतिहासिक रिज एवं माल रोड लेखकों को अतीत की कहानियों की ओर ले जाते हैं। यही कारण है कि आज भी कई लेखक यहाँ के हेरिटेज होम्स में रहकर लिखना पसंद करते हैं।

 शिमला के सहज,शांत और सुकून भरे पर्वतीय क्षेत्रों ने भी कई विख्यात देशी विदेशी लेखकों, कवियों , कहानीकारों को आकर्षित किया है। मसलन, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने तो शिमला के वुडफील्ड कॉटेज को अपना सेकेंड होम ही बना लिया था। यहाँ उन्होंने अपनी प्रसिद्ध काव्य कृति 'सोनार तरी' की कई कविताओं की रचना की। मशहूर लेखक निर्मल वर्मा का तो जन्म ही शिमला में हुआ इसलिए उनका प्रसिद्ध उपन्यास 'लाल टीन की छत' शिमला की सर्दियों और यहाँ के एकांत जीवन का जीवंत चित्रण करता है। उनकी कहानियों के पहले संग्रह 'परिंदे' में भी इस पहाड़ी शहर की गहरी झलक मिलती है।

जाने माने लेखक रुडयार्ड किपलिंग का परिवार शिमला में गर्मियों की छुट्टियाँ बिताता था। उनकी प्रसिद्ध कहानियों का संग्रह 'प्लेन टेल्स फ्रॉम द हिल्स' पूरी तरह से शिमला और उसके आसपास की पृष्ठभूमि पर आधारित है। उन्होंने 'अंडर द देवदार्स' में भी यहाँ के औपनिवेशिक समाज का सूक्ष्म चित्रण किया है। एक अन्य लोकप्रिय लेखक रस्किन बॉन्ड ने अपनी स्कूली शिक्षा शिमला से ही पूरी की थी। उन्होंने अपनी पहली काल्पनिक रचना 'नाइन मंथ्स' इसी स्कूल के छात्रावास में रहते हुए लिखी थी। उनकी कई कहानियों में शिमला के रेलवे स्टेशन और यहाँ के बागानों के संस्मरण मिलते हैं। 

जानी मानी लेखिका मीनाक्षी चौधरी ने यहाँ रहकर शिमला की लोककथाओं और रहस्यों पर 'घोस्ट स्टोरीज ऑफ शिमला हिल्स' जैसी अत्यधिक लोकप्रिय पुस्तक लिखी है। लेखक राजा भसीन तो लेखन में शिमला के पर्याय हैं। इन्होंने शिमला पर 5 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें शिमला: द समर कैपिटल ऑफ ब्रिटिश इंडिया और शिमला ऑन फुट काफी लोकप्रिय हैं ।

एक और मजेदार तथ्य यह भी है कि अपनी ऐतिहासिक विरासतों के लिए पहले से विख्यात इस शहर को नामी लेखकों के ठिकानों ने भी पाठकों के बीच अलग पहचान दी है। ये बंगले/कॉटेज आज भी लेखकों से जुड़ी स्मृतियां समेटे हुए हैं। मसलन वुडफील्ड कॉटेज गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के कारण ज्यादा पहचाना जाता है क्योंकि वे यहाँ लगभग आठ महीने रहे ।

वहीं, नॉर्थ बैंक और टेंड्रिल कॉटेज को रुडयार्ड किपलिंग के कारण जाना जाता है। नॉर्थ बैंक में किपलिंग अपने परिवार के साथ रहे थे जबकि टेंड्रिल कॉटेज में भी वे अक्सर रुकते रहे हैं। भज्जी हाउस और हर्बर्ट विला लेखक निर्मल वर्मा से जुड़े हैं तो बिशप कॉटन स्कूल को रस्किन बॉन्ड से जोड़कर देखा जाता है।

कुल मिलाकर देखें तो शिमला शहर के समृद्ध इतिहास और औपनिवेशिक विरासत पर 19वीं सदी से लेकर आज तक निरंतर लेखन हो रहा है। शिमला पर केंद्रित पुस्तकों की संख्या सैकड़ों में हो सकती है। इनमें सबसे ज्यादा संख्या यहां के इतिहास, विरासत,संस्कृति और भूगोल पर आधारित पुस्तकों की है। यदि अकादमिक शोध, सरकारी गजेटियर, ऐतिहासिक वृत्तांतों और आधुनिक कथा साहित्य को भी शामिल कर लिया जाए मिला तो शिमला पर केंद्रित पुस्तकों की संख्या और भी अधिक हो जाएगी ।



रविवार, 7 जून 2026

नाश्ता नहीं, हमारी पहचान है…पोहा



कुछ व्यंजन केवल भोजन नहीं होते, वे हमारी सुबह की पहचान बन जाते हैं। पोहा भी ऐसा ही एक स्वाद है, जो रसोई से उठती हल्दी, कढ़ी (करी) पत्ते और भुनी मूंगफली की खुशबू के साथ दिन की शुरुआत को खास बना देता है। चावल के साधारण दानों से तैयार यह व्यंजन भारत की विविधता का भी प्रतीक है—हर प्रदेश में इसका नाम और स्वाद बदल जाता है, लेकिन लोकप्रियता नहीं। 

हल्का, पौष्टिक और झटपट बनने वाला पोहा पीढ़ियों से भारतीय नाश्ते की शान है। शायद इसलिए एक प्लेट पोहा केवल भूख नहीं मिटाता, बल्कि अपनापन भी परोसता है। यह बात शायद कम लोग जानते होंगे कि हर वर्ष 7 जून को विश्व पोहा दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारत के सबसे लोकप्रिय और सर्वसुलभ नाश्तों में से एक पोहा को समर्पित है। भले ही इस दिवस के पीछे कोई लंबा इतिहास या आधिकारिक पृष्ठभूमि न हो, लेकिन भारतीय जनजीवन में पोहे की गहरी पैठ इसे एक विशेष पहचान दिलाती है। जिस देश में लाखों लोगों की सुबह चाय और पोहे की खुशबू से शुरू होती हो, वहां इस व्यंजन के नाम एक दिन होना बिल्कुल स्वाभाविक लगता है।

पोहा दरअसल चावल से बनाया जाता है। धान को विशेष प्रक्रिया से तैयार कर चपटा किया जाता है, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न नामों से जाना जाता है। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इसे पोहा या पोहे कहा जाता है। कहीं यह चिवड़ा कहलाता है तो कहीं चूड़ा। दक्षिण भारत में इसे अवल या अटुकुलू, बंगाल और असम में चीडा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ तथा नेपाल के कुछ हिस्सों में चिउरा/चिवड़ा कहा जाता है। नाम भले बदल जाएं, लेकिन इसका स्वाद और लोकप्रियता पूरे देश में एक समान दिखाई देती है।

देश में पोहे की सबसे प्रसिद्ध पहचान इंदौर से जुड़ी हुई है। इंदौरी पोहा अपने खास स्वाद, सेव, हरे धनिये, अनार के दानों और साथ में परोसी जाने वाली जलेबी के लिए प्रसिद्ध है। सुबह-सुबह इंदौर की गलियों में पोहा-जलेबी की दुकानों पर लगने वाली भीड़ इस व्यंजन की लोकप्रियता का प्रमाण है। वहीं महाराष्ट्र में कांदा पोहा (प्याज वाला पोहा) घरों में नाश्ते का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। कई राज्यों में इसमें मूंगफली, मटर, आलू, नारियल या मसालों का उपयोग कर स्थानीय स्वाद के अनुसार तैयार किया जाता है।


पोहा केवल स्वाद के कारण लोकप्रिय नहीं है, बल्कि इसके स्वास्थ्य लाभ भी इसे विशेष बनाते हैं। यह हल्का, सुपाच्य और पौष्टिक भोजन माना जाता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त मात्रा में होते हैं, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। साथ ही इसमें आयरन, कुछ आवश्यक विटामिन और खनिज तत्व भी पाए जाते हैं। कई पोषण विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पोहे में मूंगफली, हरी सब्जियां, अंकुरित दालें या सोयाबीन जैसी सामग्री मिलाई जाए तो इसका पोषण मूल्य और बढ़ जाता है।

पोहे की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि यह ग्लूटेन-फ्री भोजन है। इसलिए जिन लोगों को ग्लूटेन से संबंधित समस्याएं होती हैं, उनके लिए यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है। यह अपेक्षाकृत आसानी से पच जाता है और पेट पर अधिक भार नहीं डालता। यही कारण है कि बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर आयु वर्ग के लोग इसे पसंद करते हैं।

मधुमेह के रोगियों के लिए भी संतुलित मात्रा में तैयार किया गया पोहा उपयोगी माना जाता है। इसमें मौजूद जटिल कार्बोहाइड्रेट शरीर में ऊर्जा का धीरे-धीरे संचार करते हैं, जिससे लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है। हालांकि किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसका सेवन भी संतुलित मात्रा में ही किया जाना चाहिए।

 भारत में हजारों टन चावल हर वर्ष पोहा बनाने के लिए उपयोग किए जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह वर्षों से किसानों की आय का साधन रहा है। कई स्थानों पर धार्मिक आयोजनों, त्योहारों और सामुदायिक कार्यक्रमों में भी पोहे का विशेष स्थान है। आज के समय में जब फास्ट फूड और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ रहा है, तब पोहा भारतीय पारंपरिक खानपान की उस विरासत का प्रतिनिधित्व करता है जो स्वाद और स्वास्थ्य दोनों का संतुलन बनाए रखती है। यह ऐसा व्यंजन है जो महंगे रेस्तरां से लेकर सड़क किनारे ठेलों और साधारण घरों तक हर जगह समान रूप से लोकप्रिय है।

विश्व पोहा दिवस केवल एक व्यंजन का उत्सव नहीं है, बल्कि भारतीय खाद्य संस्कृति, स्थानीय परंपराओं और स्वस्थ जीवनशैली का भी उत्सव है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे पारंपरिक भोजन केवल स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि पौष्टिक और पर्यावरण की दृष्टि से भी टिकाऊ हैं। कुल मिलाकर पोहा केवल एक नाश्ता नहीं, बल्कि भारतीय जीवनशैली का एक जीवंत हिस्सा है।

#Poha #Pohalovers. #food

गुरुवार, 4 जून 2026

क्यों घट रही है समानता की प्रतीक साइकिल की लोकप्रियता!!


साइकिल केवल एक परिवहन साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, समानता और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक रही है। भारतीय समाज में साइकिल का महत्व अनेक स्तरों पर देखा जा सकता है। साइकिल अमीर-गरीब, जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को कम करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों विद्यार्थियों, विशेषकर लड़कियों के लिए साइकिल शिक्षा तक पहुंच का साधन बनी। साइकिल ने महिलाओं को भी स्वतंत्र आवागमन की सुविधा दी है । साइकिल प्रदूषण नहीं फैलाती और ईंधन की आवश्यकता नहीं होती। बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के दौर में इसका उपयोग सामाजिक जिम्मेदारी का परिचायक माना जाता है। साइकिल चलाने से शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है। 

कहने का आशय यह है कि साइकिल केवल दो पहियों का वाहन नहीं, बल्कि समान अवसर, स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। लेकिन पिछले कुछ सालों से साइकिल का चलन घट रहा है। लोग अब साइकिल चलाने में शर्माने लगे हैं। मोटर साइकिल एवं कारों के बढ़ने चलन ने भी साइकिल की लोकप्रियता को कम किया है।

हो सकता है कि यह बात कम लोग जानते हो कि साइकिल को लोकप्रिय बनाने के लिए दुनिया भर में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा हर साल 3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। यह दिवस 2018 से शुरू किया गया है।  इस वर्ष के लिए संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक विषय "हरित भविष्य के लिए साइकिल चलाना" है। यह दिवस साइकिल को परिवहन के एक किफायती, विश्वसनीय और टिकाऊ साधन के रूप में बढ़ावा देता है जो पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभकारी है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को साइकिल चलाने के प्रति जागरुक करना है। इतना तो हम सभी जानते हैं कि नियमित तौर पर साइकिल चलाना शरीर के लिए काफी फायदेमंद है। मोटापा घटाने से लेकर शरीर की तंदुरुस्ती के लिए नियमित साइकिल चलाना वरदान है। 

जानकर कहते हैं कि रोजाना आधा घंटा साइकिल चलाने से हृदय रोग, मोटापा, मानसिक बीमारी, मधुमेह, गठिया रोग जैसी कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है। आज के समय मोटर वाहनों को बढ़ते उपयोग के कारण वातावरण में प्रदूषण काफी बढ़ रहा है। इस कारण वातावरण को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए साइकिल का उपयोग जरूरी हो गया है।  

जहां तक देश में साइकिल की कुल संख्या या इससे जुड़े आंकड़ों की बात करें तो भारत में कारों या मोटरसाइकिलों की तरह साइकिलों का कोई केंद्रीकृत सरकारी रजिस्ट्रेशन डेटाबेस नहीं है, लेकिन फिर भी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और साइकिल उद्योग संघ के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल साइकिलों की संख्या 11करोड़ से अधिक है। इसी रिपोर्ट के अनुसार भारत के लगभग आधे से अधिक 50.4 प्रतिशत परिवारों के पास कम से कम एक साइकिल अवश्य है। इस सेहतमंद दो पहिया वाहन की राज्यों में लोकप्रियता की बात करें तो साइकिल स्वामित्व के मामले में पश्चिम बंगाल देश में सबसे आगे है, जहाँ 78.9 प्रतिशत परिवारों के पास साइकिल है। इसके बाद उत्तर प्रदेश 75.6 फ़ीसदी और ओडिशा 72.5 प्रतिशत का स्थान आता है। 

उल्लेखनीय उपलब्धि यह है कि चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा साइकिल निर्माता देश है। भारत में हर साल लगभग 1.6 से 1.8 करोड़ साइकिलों का उत्पादन किया जाता है। वहीं, ऑल इंडिया साइकिल मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल 1 करोड़ से सवा करोड़ साइकिलें बेची जाती हैं। पंजाब का लुधियाना शहर तो भारत की 'साइकिल राजधानी' के रूप में जाना जाता है क्योंकि देश में बनने वाली कुल साइकिलों का लगभग 75 से 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले लुधियाना में ही तैयार होता है।


आंकड़ों से भले ही यह पता चलता है कि भले ही भारत के 50 प्रतिशत से अधिक घरों में साइकिल मौजूद है, लेकिन शहरों में सुरक्षित साइकिल ट्रैक न होने और वाहनों की भीड़ बढ़ने के कारण दैनिक आवागमन में साइकिल का उपयोग महज 2 से 5 फीसदी ही है। भारतीय शहरों में सबसे बड़ी चुनौती साइकिल चालकों की सुरक्षा और सड़कों पर भारी ट्रैफिक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, भारत में साइकिल चालकों के लिए सड़क दुर्घटनाएं एक बड़ा जोखिम हैं।

यदि हम दुनियाभर में साइकिलों की स्थिति का अध्ययन करें तो मौजूदा समय में दुनिया में 100 करोड़ से अधिक साइकिल हैं। वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा साइकिल वाले देशों में चीन सबसे आगे है। यहाँ 45 से 50 करोड़ साइकिलें हैं जबकि नीदरलैंड दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जहाँ इंसानों से ज़्यादा साइकिलें हैं। यहाँ की आबादी लगभग पौने दो करोड़ है, जबकि साइकिलों की संख्या 2.3 करोड़ से अधिक है। यहाँ प्रति व्यक्ति साइकिल का औसत दुनिया में सबसे ज़्यादा है। 

डेनमार्क भी प्रति व्यक्ति साइकिल के औसत के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। यहाँ लगभग 80 प्रतिशत लोगों के पास अपनी साइकिल है। जर्मनी में भी करीब 6.2 से 8.3 करोड़ साइकिलें हैं।  हालिया रुझानों के अनुसार, यहाँ अब सामान्य साइकिलों से ज़्यादा ई-बाइक्स (इलेक्ट्रिक साइकिल) बिक रही हैं। 

एशिया में जापान साइकिल का एक बड़ा केंद्र है। यहाँ 7.2 करोड़ से अधिक साइकिलें हैं और प्रति व्यक्ति औसत 0.57 है।  एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, नीदरलैंड के शहर साइकिल चलाने के हिसाब से सबसे सुरक्षित शहर माने जाते हैं। इसके बाद, डेनमार्क, बेल्जियम और फ्रांस जैसे देशों का नंबर आता है। कनाडा का मॉन्ट्रियल, ताइवान का ताइपे और जापान का फुकुओका शहर भी साइकिल चलाने के लिहाज से अच्छे शहरों में गिने जाते हैं।


हम सभी जानते हैं कि भारत में साइकिल कभी आम आदमी का सबसे भरोसेमंद वाहन हुआ करती थी, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसकी लोकप्रियता अपेक्षाकृत कम हुई है। इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और बुनियादी कारण हैं। मसलन भारत में साइकिल को अक्सर आर्थिक मजबूरी से जोड़ा जाता है। जैसे-जैसे लोगों की आय बढ़ी, दोपहिया और चारपहिया वाहन सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक बन गए। इसलिए बहुत से लोग साइकिल छोड़कर मोटरसाइकिल या स्कूटर की ओर बढ़ गए। मोटरसाइकिलें भी पहले की तुलना में अधिक सुलभ हो गई हैं। आसान किस्तों और ऋण सुविधाओं ने उनके प्रसार को बढ़ावा दिया है।

एक अन्य महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि हमारे देश में शहरों का आकार तेजी से बढ़ा है। नौकरी, शिक्षा और अन्य कार्यों के लिए लोगों को कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। ऐसे में साइकिल की तुलना में मोटर वाहन अधिक सुविधाजनक लगते हैं। इसके अलावा देश के अधिकांश भारतीय शहरों में साइकिल चालकों के लिए अलग लेन नहीं हैं। साइकिल चलाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा भारत में सड़कें और फ्लाईओवर भी हैं जो मुख्यतः मोटर वाहनों को ध्यान में रखकर विकसित किए गए हैं। 

हालांकि, हाल के वर्षों में स्वास्थ्य, पर्यावरण और फिटनेस के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण साइकिल का महत्व फिर से बढ़ रहा है। कई शहरों में साइकिल ट्रैक, साइकिल-शेयरिंग और फिटनेस राइड्स को खासकर बढ़ावा दिया जा रहा है। कुल मिलाकर यदि सुरक्षित मार्ग, बेहतर शहरी योजना और सकारात्मक सामाजिक दृष्टिकोण विकसित हो जाएं, तो साइकिल भारत में फिर से एक महत्वपूर्ण परिवहन साधन बन सकती है।


मंगलवार, 2 जून 2026

दो जून की या छह जून की...कौन सी रोटी है अच्छी!!


आज दो जून है तो सुबह से शाम तक सोशल मीडिया में ‘दो जून की रोटी’ छाई हुई है। हर कोई दो जून की रोटी का महत्व/संघर्ष गिनवा रहा है लेकिन मेरी समस्या यह है कि बदलते वक्त में किसे सही माने.. दो जून की रोटी को या छह जून की रोटी को। अब आप सोच रहे होंगे कि दो जून तो ठीक है पर ये छह जून क्या बला है?

आपको, छह जून की रोटी का मतलब समझाने से पहले हमारे बाद की नई पीढ़ियों और खासकर जेन जी को दो जून की रोटी का मतलब समझाना ज्यादा जरूरी है। दरअसल, दो जून की रोटी एक लोकप्रिय मुहावरा है जिसका सामान्य अर्थ है  दो वक्त की रोटी या दो वक्त का भोजन। हालांकि, यह मुहावरा सिर्फ भूख मिटाने की बात नहीं करता बल्कि यह संतोष का प्रतीक है। इसका अर्थ है मेहनत करके संतोष के साथ दो वक्त की सादी रोटी, सब्ज़ी और दाल जुटाना। 

हमारे पूर्वजों के लिए यही जीवन की असली खुशी थी। उनकी दिनचर्या भी इसी के मुताबिक निर्धारित थी..मसलन सुबह जल्दी नाश्ता, शाम को रात का खाना। बीच में कुछ नहीं क्योंकि इससे पेट को भरपूर आराम मिलता है एवं शरीर को काम करने का मौका ।


अब बात छह जून की रोटी की..तो दो जून की तरह छह जून की रोटी का मतलब है छह वक्त की सुकून भरी रोटी। छह जून की रोटी की अवधारणा आज के बदलते दौर की देन है और मौजूदा समय के तमाम डॉक्टर, न्यूट्रिशनिस्ट (पोषण विशेषज्ञ) और इंस्टाग्राम के ‘हेल्थ गुरु’ इस छह जून की नई अवधारणा को हवा दे रहे हैं। 

पोषण विशेषज्ञों की भाषा में छह जून की रोटी को ‘पीस-मील’ के नाम से जाना जाता है। पीस मील का अर्थ है दिन में 5-6 बार अलग अलग अंतराल में छोटे-छोटे टुकड़ों में खाना। जैसे सुबह नाश्ता, 11 बजे स्नैक, दोपहर लंच, शाम को टी-टाइम, फिर डिनर और रात को कुछ हेल्दी बाइट। पीस मील में पेट न तो कभी खाली रहता है और न ही ठूंस ठूंसकर भरा जाता है।

अब, दो जून पर दिमाग में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हमारी दादी-नानी के दौर की दो जून की रोटी सही है या फिर आधुनिक खानपान जानकारों की छह जून (पीस मील) की सलाह ? जैसा कि हम सभी भली भांति जानते हैं कि हमारे भारतीय परिवारों में दो वक्त की रोटी सिर्फ मजबूरी नहीं, बल्कि एक स्वस्थ आदत है। सुबह का दमदार ऊर्जा से भरपूर स्वादिष्ट नाश्ता, फिर दिन भर मेहनत और शाम को हल्का खाना। इससे पेट को 12-14 घंटे की ‘नैचुरल फास्टिंग’ भी मिल जाती है । शरीर सतत् रूप से फैट बर्न करता रहता है, इंसुलिन लेवल भी स्थिर रहता और पाचन तंत्र को भी आराम मिलता है।

 


कई रिसर्च भी इसे सही ठहराते हैं। अध्ययनों में पाया गया कि दिन में दो बड़े मील (खासकर ब्रेकफास्ट और लंच) लेने वाले लोगों में वजन कम होने की दर बेहतर रही, ब्लड शुगर कंट्रोल रहा और भूख का हॉर्मोन बेहतर तरीके से काम करता रहा । इस थ्योरी के समर्थकों का कहना है कि लगातार थोड़े थोड़े अंतराल पर छोटे-छोटे खाने से शरीर को इस बात का पता ही नहीं चलता कि कब खाना है और  कब आराम करना है। इसके फलस्वरूप हमेशा हल्की भूख, ओवर ईटिंग और पाचन की समस्या बनी रहती है।

वहीं, छह जून की रोटी यानि पीस मील के समर्थकों का मानना है कि डायबिटीज या इंसुलिन रेसिस्टेंस वाले लोगों के लिए छोटे-छोटे मील फायदेमंद होते हैं। इससे, एनर्जी लेवल कम नहीं होता। इसके अलावा, वर्तमान दौर में ऑफिस, जिम, ट्रैफिक, टीवी,मोबाइल में  लोग इतने व्यस्त रहते हैं कि एक बार में भारी खाना पचाना मुश्किल हो गया है। छोटे-छोटे स्नैक्स जैसे बादाम, फल, योगर्ट उन्हें दिन भर एक्टिव रखते हैं।


उधर, दो जून और छह जून की रोटी के इस विवाद में विज्ञान अभी भी “वन साइज फिट्स ऑल” अर्थात् सभी के लिए एक ही तरह के खानपान पर कोई आम सहमति नहीं बना पाया है। कुछ लोगों खासकर एथलीट्स, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्गों के लिए बार-बार छोटा खाना बेहतर हो सकता है। वही, वजन कम करने वाले, पीसीओडी वालों के लिए दो-तीन बड़े, पौष्टिक मील बेहतर काम करते हैं। 

इसलिए, मेरी सलाह तो यह है कि दो,चार या छह वक्त की बजाए अपने शरीर की जरूरत एवं संतोष का ध्यान रखिए। अगर दो मील में ही एनर्जी और संतोष मिल रहा है तो जबरदस्ती 6 मील मत खाओ। इसी तरह, चाहे दो बार खाओ या छह बार, जो खा रहे हो वो असल खाना हो जैसे घर का, मौसम के अनुकूल और पौष्टिक, न की प्रोसेस्ड स्नैक्स ।

कुल मिलाकर “दो जून की रोटी” का मुहावरा आज भी प्रासंगिक है। यह हमें याद दिलाता है कि जिंदगी की असली खुशी भोग-विलास में नहीं, संतोष और संयम में है। आधुनिक पीस-मील हमें सुविधा देता है, लेकिन पुरानी परंपरा हमें संतुलन सिखाती है। इसलिए, न तो दादी हमेशा सही थीं, न ही डॉक्टर। सही वो है जो आपके शरीर, लाइफस्टाइल और मेटाबॉलिज्म के साथ मैच करता हो क्योंकि स्वास्थ्य और संतोष दोनों साथ-साथ चलें, यही असली ‘मील’ है फिर चाहे वह दो जून से मिले या छह जून से।



सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...