शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

हॉस्टल ने दी जिंदगी जीने की डिग्री..!!

jugaali.blogspot.com

कुछ जगहें जिंदगी में ऐसी होती हैं, जहां हम पढ़ने जाते हैं, लेकिन लौटते समय पता चलता है कि वहां हमने विषयों से ज्यादा जिंदगी पढ़ी है। शासकीय मॉडल विज्ञान महाविद्यालय, जबलपुर (अब स्वशासी भी) के अशोक और विक्रम छात्रावास मेरे लिए ऐसी ही जगह थे। मेरे पहले के छात्र हमारे कॉलेज को रॉबर्टसन कॉलेज के नाम से जानते थे।

कॉलेज में विज्ञान की पढ़ाई तो हुई ही, लेकिन असली प्रयोगशाला शायद हॉस्टल था। यहां प्रयोग किताबों में नहीं, जिंदगी में होते थे। यहां दोस्ती का रसायन था, अनुशासन का गणित था, आत्मनिर्भरता का भौतिक विज्ञान था और भावनाओं की अपनी जीवविज्ञान।


घर से हॉस्टल आना मेरे लिए एक तरह से जिंदगी के दूसरे अध्याय में प्रवेश था। घर में मां-बाप और परिवार का सुरक्षा कवच था। यहां अपना बिस्तर भी खुद संभालना था, कपड़े भी और महीने भर के खर्च का हिसाब भी। गांव-कस्बों से आए हम जैसे कई लड़कों के लिए तो जबलपुर की दुनिया बिल्कुल नई थी। शहर की चहल-पहल, कॉलेज का माहौल, नए चेहरे और सबसे बढ़कर घर से दूर अपने दम पर जीना।


शुरुआत में हम सबके बीच झिझक थी। कौन कहां का है, किसका स्वभाव कैसा है, किससे दोस्ती होगी जैसे कई सवाल मन में थे। फिर सीनियर्स सामने आए और परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उस दौर की रैगिंग भी नए लड़कों की झिझक तोड़ने का एक अनौपचारिक तरीका थी। फिर चाहे खुले मैदान में देर रात की नागा एक्सप्रेस ट्रेन बनाना हो या टंकी में डुबकी या अपना अनूठा परिचय देना, कुछ रोचक बातें बताना, कभी अपनी प्रतिभा दिखाना.. इन सबने अनजान चेहरों को धीरे-धीरे परिचित बना दिया।


Sanjeev Sharma /hostel

और फिर शुरू हुई हॉस्टल की असल जिंदगी।


जेब में पैसे हमेशा सीमित होते थे। कहने को हम कॉलेज के छात्र थे, लेकिन महीने के आखिरी दिनों में हमारी आर्थिक स्थिति किसी छोटे-मोटे वित्त मंत्री से कम चुनौतीपूर्ण नहीं होती थी। ऐसी ही ‘कड़की’ के दिनों में सीनियर्स की ओर से सामूहिक समोसे और चाय की पार्टी झटक लेते थे तो लगता था जैसे कोई बड़ी लॉटरी लग गई हो। दो समोसे और एक कप चाय भी उस समय रईसी का ऐसा स्वाद देते थे, जिसे आज किसी महंगे रेस्तरां में बैठकर भी महसूस नहीं किया जा सकता।


लेकिन हॉस्टल का चक्र भी बड़ा दिलचस्प होता है। कल तक जो सीनियर हमें समोसे खिलाकर अपना ‘स्नेह’ दिखा रहे थे, कुछ समय बाद हम खुद सीनियर बन गए तो फिर वही परंपरा हमारे सामने थी। जेब भले कहती रही कि भाई, थोड़ा रहम करो, लेकिन हॉस्टल की परंपरा कहती थी—अब तुम्हारी बारी है! तब पता चलता था कि सीनियर होना आर्थिक दृष्टि से कितना डरावना है लेकिन तब इसकी भी अपनी शान थी क्योंकि कॉलेज के डे स्कॉलर साथियों पर रौब जो पड़ता था। इसलिए, हम भी जेब ढीली करते और जूनियर्स को चाय-समोसे खिलाते थे। शायद यही हॉस्टल की अनकही अर्थव्यवस्था थी मतलब पैसा ऊपर से नीचे नहीं, पीढ़ी दर पीढ़ी दोस्ती के साथ बहता था।


हॉस्टल ने दिखाई सामूहिकता की ताकत 


किसी एक साथी का किसी बाहर वाले से या डे स्कॉलर से झगड़ा हो जाए तो मामला केवल उस लड़के का नहीं रहता था। कुछ ही देर में रॉड की आवाज से यह खबर पूरे हॉस्टल में फैल जाती थी और फिर पता नहीं कितने लड़के किसी जवान सेना की तरह उसके साथ खड़े हो जाते। कई बार तो स्थिति यह होती कि हमें यह भी नहीं मालूम होता था कि झगड़ा शुरू किस बात पर हुआ, किसके साथ हुआ और कहां तक जाना है लेकिन इतना जरूर पता होता था कि ‘अपना हॉस्टलर’ अकेला नहीं जाएगा।


Hostel life

आज के नजरिए से उन घटनाओं को देखता हूं तो लगता है कि उनमें उतावलापन भी था और उम्र की नादानी भी, लेकिन उसके पीछे एक भावना बेहद मजबूत थी—अपने साथी को अकेला नहीं छोड़ना। बाद में जिंदगी ने सिखाया कि हर लड़ाई में कूद पड़ना समझदारी नहीं होती, लेकिन उस उम्र में साथी के लिए खड़े होने का जो जज्बा था, उसने हमें एकता का अर्थ जरूर समझाया। यही जज़्बा किसी का दूध,किसी की चीनी, किसी की चायपत्ती, किसी का हीटर और सबके अपने अपने कप के साथ फाइव स्टार चाय का मज़ा भी देता था।


हॉस्टल केवल लड़ने-भिड़ने और मौज-मस्ती की जगह भी नहीं था। पढ़ाई के समय वही लड़के एक-दूसरे के सबसे अच्छे शिक्षक बन जाते थे। किसी को कोई विषय समझ नहीं आया तो कमरे में बैठकर चर्चा शुरू हो जाती। एक के पास किताब थी, दूसरे के पास नोट्स और तीसरे को उस विषय की अच्छी समझ। सामूहिक अध्ययन में एक अजीब-सी ऊर्जा होती थी। जो बात अकेले पढ़ते हुए कठिन लगती, वह दोस्त के समझाने से अचानक आसान हो जाती।


Jugaali.blogspot.com

और जब हॉस्टल सांस्कृतिक केंद्र में बदल जाता था


गणेश जी की मूर्ति की स्थापना उन्हीं यादों में से एक है। चंदा जुटाना, मूर्ति लाना, सजावट करना, पूजा की तैयारी, प्रसाद और फिर सबका मिलकर कार्यक्रम करना। इन सबने हमें आयोजन करना सिखाया। कोई सजावट में माहिर था, कोई व्यवस्था में, कोई चंदा जुटाने में और कोई केवल उत्साह बढ़ाने में। लेकिन अंत में गणेश जी सबके थे और आयोजन भी सबका। ऐसे अवसरों पर हॉस्टल का टीवी हाल, बरामदा और आसपास का पूरा माहौल अचानक घर जैसा लगने लगता था।


मनोरंजन के सीमित साधन थे। आज की तरह हर जेब में मोबाइल और हर कमरे में इंटरनेट नहीं था। इसलिए गणेश स्थापना के ग्यारह दिनों में VCR का खास तौर पर किराए से इंतजाम किया जाता तो वह अपने आप में सबसे बड़ा आयोजन होता था। अच्छी और अन सेंसर्ड फिल्में देर रात तक देखने का अपना ही आनंद था। टीवी के सामने भीड़ लगती, जगह के लिए खींचतान होती, कोई फर्श पर बैठता, कोई कुर्सी और सोफे पर और कोई दरवाजे के पास खड़ा होकर भी फिल्म देखने को तैयार रहता।


फिल्म से ज्यादा मजा शायद उस सामूहिक माहौल में आता था। बीच-बीच में किसी की टिप्पणी पर ठहाका लग जाता और फिर कोई सीनियर चुप रहने का इशारा करते हुए अंग्रेजी संवाद समझने का पुरजोर प्रयास करता। आज के डिजिटल दौर में यह सब बहुत साधारण लग सकता है, लेकिन हमारे लिए वह सामूहिक मनोरंजन था। एक स्क्रीन और दर्जनों चेहरे,लेकिन खुशी सबकी साझा।


घर से दूर एक घर


हॉस्टल की जिंदगी ने हमें यह भी सिखाया कि घर से दूर रहकर भी परिवार बनाया जा सकता है। किसी के घर से अचार आया तो वह केवल उसी लड़के का नहीं रहा। किसी के घर से देशी घी के लड्डू,कहीं से गुझिया तो कभी खुरमा बतिया आती और चट से खत्म भी हो जाती क्योंकि खाने वाले भी दर्जनों थे। किसी को घर से चिट्ठी आई तो कई साथी उसके आसपास बैठकर उसके चेहरे का भाव पढ़ते थे। त्योहारों पर घर की याद आती थी, लेकिन उसी समय दोस्तों का साथ उस खालीपन को कुछ कम कर देता था। धीरे-धीरे हम हमउम्र लड़कों का एक ऐसा परिवार बन गए थे, जिसमें रिश्तों की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई थी, लेकिन रिश्ते बनते चले गए।


हॉस्टल ने हमें वित्तीय अनुशासन भी सिखाया। महीने की शुरुआत में जेब में पैसा देखकर लगता था कि खूब खर्च करेंगे। महीने का मध्य आते-आते गणित बदल जाता और आखिरी सप्ताह में चाय भी सोच-समझकर पीनी पड़ती। तब समझ में आया कि सीमित साधनों में प्राथमिकताएं तय करना क्या होता है। शायद इसी कारण बाद में सीनियर बनकर जब जूनियर्स को समोसे-चाय खिलाने के लिए जेब ढीली करनी पड़ती थी, तब हमें अपने पुराने सीनियर्स याद आते थे। समझ आता था कि उन्होंने सिर्फ समोसे नहीं खिलाए थे, एक परंपरा सौंपी थी।


Hostel life

हॉस्टल एक और बड़ी चीज देता है हिम्मत


घर से पहली बार दूर निकलना, अनजान लोगों के बीच रहना, अपनी बात रखना, जरूरत पड़ने पर किसी शिक्षक या अधिकारी से बात करना, अपने खर्च का हिसाब रखना, बीमारी या परेशानी में खुद निर्णय लेना जैसी छोटी-छोटी घटनाएं मिलकर व्यक्तित्व बनाती थीं। मुसीबत की घड़ी में कभी सीनियर्स हमारे लोकल गार्जियन बन जाते कभी हम किसी जूनियर के अभिभावक।


हॉस्टल ने हमें रहन-सहन का सलीका भी सिखाया। कमरे में दूसरे लोग हैं तो अपनी सुविधा के साथ उनकी सुविधा का भी ख्याल रखना है। देर रात लौटे हैं तो सो रहे साथी की नींद का सम्मान करना है। किसी से मदद ली है तो मौका आने पर उसकी मदद करनी है। वरिष्ठ हैं तो कनिष्ठ को दबाना नहीं, उसे संभालना है। इन सबके बीच अनुशासन भी था और शरारत भी। पढ़ाई भी थी और मस्ती भी। बहस भी थी और दोस्ती भी। कभी रूठना था, कभी मनाना था। कभी जेब खाली थी तो कभी किसी दोस्त की वजह से चाय मुफ्त हो जाती थी।


आज इतने वर्षों बाद जब उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है कि अशोक और विक्रम जैसे छात्रावास वास्तव में हमारे जीवन की अनौपचारिक पाठशाला थे। वहां किसी ने ब्लैकबोर्ड पर लिखकर नहीं बताया कि एकता क्या होती है। हमने उसे दोस्तों के साथ खड़े होकर महसूस किया। किसी किताब ने वित्तीय अनुशासन का अध्याय नहीं पढ़ाया। हमने महीने के आखिरी पांच दिनों में खाली जेब से सीखा। आत्मनिर्भरता का कोई व्याख्यान नहीं हुआ। घर से दूर रहकर हमने उसे रोज जिया। भाईचारे की परिभाषा नहीं पढ़ी। किसी एक साथी के साथ खड़े होकर समझी। 


इसी तरह, बड़ों का सम्मान किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं था। सीनियर्स के व्यवहार और परंपराओं से सीखा। सामूहिक अध्ययन की उपयोगिता किसी शिक्षक ने बताई होगी, लेकिन उसे हमने रात-दर-रात साथ बैठकर अनुभव किया। और परिवार से दूर रहकर परिवार बनाने की कला—वह शायद हॉस्टल का सबसे बड़ा उपहार था।


आज मेरे या हम सभी दोस्तों के जीवन में कई उपलब्धियां हैं, कई अनुभव हैं, कई शहर हैं और कई रिश्ते हैं लेकिन जब कभी मन अतीत की ओर लौटता है तो जबलपुर का हॉस्टल, साथी, हमारे वे कमरे, वे चेहरे, चाय-समोसे की छोटी-छोटी पार्टियां, जूनियर्स की खातिर ढीली होती जेब, गणेश जी की स्थापना, VCR के सामने देर रात तक बैठी भीड़ और किसी साथी के लिए एकजुट होकर खड़ा पूरा हॉस्टल..सब एक साथ आंखों के सामने आ जाते हैं।


तब लगता है कि हम वहां केवल पढ़ने नहीं गए थे। हम वहां बड़े होने गए थे। कॉलेज ने शायद हमें डिग्री दी, लेकिन हॉस्टल ने जिंदगी जीने की डिग्री दी। और उस डिग्री की सबसे खूबसूरत बात यह है कि उसका प्रमाणपत्र आज भी मेरे भीतर सुरक्षित है—कुछ दोस्तों की यादों में, कुछ शरारतों में, कुछ संस्कारों में और उस विश्वास में कि जिंदगी चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए, अपने लोगों के साथ मिलकर जी जाए तो हर मुश्किल थोड़ी आसान हो जाती है और यही हमारे हॉस्टल परिवार की सबसे बड़ी सीख है।


#Hostel #Hostellife #ScienceCollege #Robertsoncollege #RDVV


बुधवार, 5 अगस्त 2026

पहाड़, चोटी वाला और परांठे का बाप..!!


शिमला से रामपुर की ओर राष्ट्रीय राजमार्ग-5 पर सफर करने वालों के लिए पहाड़ सिर्फ मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता नहीं होते, बल्कि वे अपने भीतर अनगिनत छोटे-छोटे अनुभव समेटे रहते हैं। कहीं देवदार की खुशबू, कहीं सतलुज की गूंज, कहीं बादलों की धुंध और कहीं सड़क किनारे चूल्हे पर सिकते परांठों की महक। इन्हीं अनुभवों में एक नाम ऐसा है, जो यात्रियों की यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है—बधाल का 'चोटी वाला ढाबा'।

नाम सुनते ही ऋषिकेश के प्रसिद्ध चोटीवाला रेस्तरां की याद आ सकती है, लेकिन बधाल का यह ढाबा अपनी अलग पहचान रखता है। न यहां कोई भव्य इमारत है, न चमचमाती सजावट और न ही आधुनिक कैफे जैसा माहौल। लकड़ी के खंभों, टिन की छत और पहाड़ी सादगी से बना यह ढाबा इस बात का प्रमाण है कि स्वाद का वास्ता आलीशान इमारतों से नहीं, बल्कि ईमानदारी से पकाए गए भोजन और आत्मीयता से होता है।

पहाड़ों की घुमावदार सड़कें एक अलग तरह की भूख पैदा करती हैं। लगातार चढ़ाई, ठंडी हवा और लंबे सफर के बाद जैसे ही बधाल के पास पहुंचते हैं, चूल्हे पर सिकते परांठों की सोंधी खुशबू हवा के साथ गाड़ियों तक आ जाती है। कई बार तो लगता है कि भूख नहीं, बल्कि यही खुशबू गाड़ियों को ब्रेक लगाने पर मजबूर कर देती है।

इस ढाबे की सबसे बड़ी पहचान है इसका विशाल आकार का परांठा। एक परांठा ही कई लोगों की भूख मिटाने के लिए काफी होता है। आलू, गोभी, पनीर या मिक्स सब्जियों की भराई वाले ये परांठे तवे से उतरते ही शुद्ध देसी घी या मक्खन के साथ परोसे जाते हैं। साथ में घर की पिसी हुई तीखी हरी चटनी ऐसी होती है कि हर कौर के बाद अगला निवाला खुद-ब-खुद मुंह तक पहुंच जाता है।

लेकिन यहां की सबसे अनोखी परंपरा है—जग भरकर मिलने वाली अनलिमिटेड छाछ। गुजरात की मेहमाननवाजी की याद दिलाने वाली यह छाछ सिर्फ भोजन का हिस्सा नहीं, बल्कि सफर की थकान मिटाने वाली ठंडी राहत है। बड़े जग में भरकर बार-बार परोसी जाने वाली छाछ इस ढाबे की उदारता का परिचय देती है। पहाड़ की चढ़ाई के बाद इसका हर घूंट शरीर और मन दोनों को तरोताजा कर देता है।


अगर आप पारंपरिक भोजन पसंद करते हैं, तो यहां की थाली किसी दावत से कम नहीं। मक्के की गरमागरम रोटी, सरसों का साग, पहाड़ी कढ़ी, राजमा और मौसमी सब्जियां... और सबसे खास बात यह कि यहां कोई यह नहीं पूछता कि "और चाहिए?" बल्कि तब तक परोसते रहते हैं, जब तक आप खुद हाथ जोड़कर यह न कह दें कि अब बस।

ढाबे की एक और खासियत है इसकी खुली रसोई। ग्राहक चाहें तो खुद किचन तक जाकर देख सकते हैं कि उनका परांठा कैसे तैयार हो रहा है। आटे की लोई से लेकर तवे पर सुनहरा होने तक की पूरी प्रक्रिया भोजन के प्रति भरोसा और अपनापन दोनों बढ़ा देती है।

और फिर आते हैं इस ढाबे के असली आकर्षण—इसके मालिक। सिर पर लंबी चोटी उनकी पहचान है। मुस्कुराते हुए वे मजाक में अपनी चोटी को "एंटीना" बताते हैं और कहते हैं कि इसी से उन्हें दूर से ही पता चल जाता है कि कौन-सी गाड़ी भूखी आ रही है। उनकी किस्सागोई, आत्मीय व्यवहार और पहाड़ी अपनापन भोजन के स्वाद में ऐसा तड़का लगाते हैं कि लोग सिर्फ खाना खाने नहीं, बल्कि उनसे मिलने भी रुकते हैं।

आज जब हाईवे पर बड़े-बड़े फूड चेन और ब्रांडेड रेस्तरां तेजी से बढ़ रहे हैं, तब भी बधाल का यह साधारण-सा ढाबा यह साबित करता है कि असली पहचान स्वाद, आत्मीयता और मेहमाननवाजी से बनती है। शायद यही वजह है कि शिमला-रामपुर मार्ग पर नियमित यात्रा करने वाले लोग कहते हैं—"अगर बधाल के चोटी वाले ढाबे पर नहीं रुके, तो सफर अधूरा रह गया।"

पहाड़ों में कुछ जगहें मंज़िल नहीं होतीं, वे सफर की सबसे खूबसूरत याद बन जाती हैं। बधाल का 'चोटी वाला ढाबा' भी ऐसी ही एक याद है, जहां परोसा सिर्फ भोजन नहीं जाता, बल्कि पहाड़ का दिल भी आपकी थाली में उतर आता है।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

'हिंदी पत्रकारिता : 200 साल की महागाथा' — इतिहास, विमर्श और समकालीन पत्रकारिता का प्रामाणिक दस्तावेज़

Udant Martand
हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी केवल एक ऐतिहासिक पड़ाव नहीं, बल्कि भारतीय समाज की चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय अस्मिता की दो सौ वर्षों की यात्रा का उत्सव भी है। इसी ऐतिहासिक अवसर पर दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) और प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'हिंदी पत्रकारिता : 200 साल की महागाथा' इस विरासत को व्यापक और बहुआयामी दृष्टि से प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण प्रयास है। लगभग 304 पृष्ठों की यह पुस्तक वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहासकार विजयदत्त श्रीधर तथा डॉ. सच्चिदानंद जोशी के संपादन में प्रकाशित हुई है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि देश के नामचीन लेखकों के बीच मुझे भी इस पुस्तक में रेडियो पत्रकारिता पर केंद्रित एक चैप्टर लिखने का गौरव मिला है।

जहां तक पुस्तक की बात है तो इसका सबसे बड़ा गुण इसकी विषयगत विविधता है। यह केवल हिंदी पत्रकारिता का कालक्रम नहीं बताती, बल्कि उसके वैचारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यावसायिक विकास को भी रेखांकित करती है। अनुक्रमणिका पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि इसमें उदंत मार्तंड से लेकर ई-पत्रकारिता, विज्ञान, रक्षा, पर्यावरण, खेल, कृषि, सिनेमा, रेडियो, महिला, धार्मिक, संसदीय और वैश्विक हिंदी पत्रकारिता जैसे लगभग सभी प्रमुख आयामों को समाहित किया गया है।

पुस्तक की विशेषता यह भी है कि इसमें पत्रकारिता जगत के अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों और अनुभवी पत्रकारों के लेख संकलित हैं। जैसे सुप्रसिद्ध पत्रकार रामबहादुर राय, देश में पत्रकारिता शिक्षा के अहम दायित्व संभाल चुके डॉ सच्चिदानंद जोशी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलगुरू श्री विजय मनोहर तिवारी, गिरीश्वर मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश, संत समीर, वरिष्ठ संपादक प्रकाश दुबे, इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी के लेख शामिल हैं ।

Hindi journalism
वहीं, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. विकास दवे, शिरीष खरे, वरिष्ठ टीवी पत्रकार श्री राजेश बादल, भोपाल स्थित देश के इकलौते ज्ञानतीर्थ माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध केंद्र की प्रमुख कर्ता धर्ता डॉ. मंगला अनुजा, प्रभाकर मणि तिवारी, रक्षा पत्रकारिता के विशेषज्ञ श्री कृष्ण मोहन मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह, भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक डॉ संजय द्विवेदी, डॉ. रजनीश कुमार चतुर्वेदी, डॉ. नितिप कपूर, त्र्यंबक शर्मा, डॉ. मनोज चतुर्वेदी और प्रदीप सरदाना जैसे लेखकों की उपस्थिति पुस्तक को बहुविचारात्मक स्वर प्रदान करती है। पुस्तक में  रेडियो पत्रकारिता पर केंद्रित अध्याय में मैंने इस अनूठे प्रसारण माध्यम की ऐतिहासिक भूमिका, उसके विकास और रेडियो पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को प्रभावी ढंग से सामने लाने का प्रयास किया है।

पुस्तक का आरंभ 'उदंत मार्तंड' को नमन करते हुए हिंदी पत्रकारिता की उस ऐतिहासिक यात्रा से होता है, जिसने भारतीय समाज में जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना का आधार तैयार किया। आगे बढ़ते हुए यह पुस्तक बताती है कि पत्रकारिता केवल समाचारों का संकलन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक मूल्यों की संरक्षक भी रही है।

Hindi journalism
हालाँकि, भरपूर व्यापकता के बाद भी डिजिटल पत्रकारिता, सोशल मीडिया, क्षेत्रीय पत्रकारिता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित पत्रकारिता और डेटा जर्नलिज्म जैसे अत्यंत समकालीन विषयों  को भी स्थान मिलता तो यह ग्रंथ और अधिक समृद्ध बन सकता था। संभवतः पृष्ठ संख्या की मजबूरी या फिर अगले संस्करण की तैयारियों को दृष्टिगत रखते हुए शायद इन विषयों को स्थान नहीं दिया गया होगा।

फिर भी, यह पुस्तक हिंदी पत्रकारिता के इतिहास और वर्तमान को समझने का एक विश्वसनीय संदर्भ ग्रंथ है। शोधार्थियों, पत्रकारिता के विद्यार्थियों, मीडिया शिक्षकों, पत्रकारों और हिंदी भाषा के गंभीर पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है। यह केवल अतीत का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भविष्य की पत्रकारिता के लिए भी दिशा-सूचक ग्रंथ है।

'हिंदी पत्रकारिता : 200 साल की महागाथा' अपने शीर्षक के अनुरूप हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की यात्रा को समग्रता, गंभीरता और प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली अतीत का सम्मान करते हुए उसके वर्तमान का मूल्यांकन और भविष्य की संभावनाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। 

।।संक्षिप्त ब्यौरा।।

पुस्तक: 'हिंदी पत्रकारिता : 200 साल की महागाथा'

संपादक: श्री विजय दत्त श्रीधर और डॉ सच्चिदानंद जोशी 

कुल पृष्ठ: 300 प्लस 

मूल्य: 350 रुपए

प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र

#हिंदी #पत्रकारिता #मीडिया #रेडियो #टीवी #HindiJournalism #Defence #culture #IGNCA



शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

क्या हर गाली एक जैसी होती है?

Jugaali on gali

क्या गाली हमेशा एक जैसी होती हैं? क्या देश, काल, परिस्थिति, बोलने वाले, सुनने वाले और सामाजिक संदर्भ के साथ उसके अर्थ नहीं बदलते हैं? गालियों को लेकर इस बुनियादी सवाल का कारण यह है कि जंतर-मंतर पर हुए हालिया प्रदर्शन में सबसे अधिक चर्चा मुख्य विषय की नहीं, बल्कि वहाँ खुलेआम दी गई गालियों और अश्लील पोस्टरों की हो रही है। पहले मुझे लगा कि इस विषय पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए लेकिन गालियों/अश्लील पोस्टरों के पक्ष में आ रहे तर्कों के कारण मुझे अपनी बात रखना जरूरी लगा।

इस लेख में उठाए गए प्रश्न को दो प्रमुख उदाहरणों से समझा जा सकता है। पंजाब के अनेक हिस्सों में कुछ पारिवारिक गालियाँ मित्रों और रिश्तेदारों के बीच आत्मीयता या सहज बातचीत का हिस्सा हैं। मसलन भैं*द, पैन*द, बहन दी, माँ दी, हरामी, उल्लू दा पट्ठा जैसी गालियां सहज बोलचाल का हिस्सा हैं। वहीं, भोपाल में भी मा*ड़े-भैं*ड़े जैसे शब्द सार्वजनिक रूप से बोले जाते हैं। पूर्वांचल, हरियाणा, राजस्थान और बुंदेलखंड में भी कई ऐसे संबोधन हैं जो बाहर के व्यक्ति को असभ्य लग सकते हैं, पर स्थानीय संस्कृति में हल्के फुल्के अंदाज में लिया जाता है। 

इसके उलट, यही शब्द यदि किसी अदालत, संसद, विश्वविद्यालय के मंच, टीवी बहस या किसी शोकसभा में बोले जाएं तो उनका अर्थ बदल जाता है। कहने का आशय यह है कि गाली का वजन शब्दों में नहीं, उसके संदर्भ में ज्यादा छिपा होता है।

अश्लील पोस्टर
यही कारण है कि भाषा को केवल शब्दों से नहीं, उसके सामाजिक संदर्भ से समझना जरूरी है। जंतर-मंतर का आंदोलन निजी बातचीत नहीं थी, न दोस्तों की महफ़िल थी और न ही किसी क्षेत्रीय बोली का स्वाभाविक प्रयोग। यह राष्ट्रीय राजधानी में हुआ सार्वजनिक प्रदर्शन था। यहाँ मीडिया, सोशल मीडिया, बच्चे, बुज़ुर्ग महिलाएं और विभिन्न विचारधाराओं के लोग मौजूद थे। ऐसे मंच पर गाली केवल व्यक्तिगत भाषाई अभिव्यक्ति नहीं बल्कि सार्वजनिक वक्तव्य की तरह है।

जंतर मंतर पर जो गालियां दी गईं और पोस्टरों पर जो अश्लील बातें लिखी गईं..वे किसी निजी कमरे, कॉलेज के हॉस्टल या दोस्तों की पार्टी का हिस्सा नहीं थीं। वे राष्ट्रीय राजधानी के प्रमुख सार्वजनिक स्थल पर, कैमरों के सामने, हजारों लोगों की मौजूदगी में प्रदर्शित की गई थीं इसलिए उन्हें केवल जेन ज़ी की भाषा कहकर नहीं टाला जा सकता।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन हर स्वतंत्रता के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। तीखा व्यंग्य, कठोर आलोचना और सत्ता से असहमति लोकतंत्र की शक्ति हैं, किंतु जब संवाद का स्थान गाली लेने लगती है, तो तर्क कमजोर पड़ने लगते हैं। इससे विरोध का नैतिक बल भी प्रभावित होता है, क्योंकि लोगों का ध्यान मूल मुद्दे से हटकर भाषा पर केंद्रित हो जाता है।

भारतीय इतिहास के सबसे प्रभावी आंदोलनों को उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि सभी ने सशक्त भाषा का प्रयोग किया, लेकिन गालियों और अश्लीलता का नहीं । चाहे महात्मा गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी हो या जयप्रकाश नारायण का आंदोलन हो या हालिया दौर का अन्ना हजारे आंदोलन..सभी में मुद्दे अहम रहे हैं और भाषा सार्वजनिक मंचों के अनुरूप।

जंतर मंतर प्रदर्शन

ऐसा भी नहीं है कि, इस सबके लिए केवल जेन ज़ी या आज के युवा ही दोषी हैं। हमने स्वयं ऐसी संस्कृति विकसित होने दी है जिसमें फिल्मों, वेब सीरीज़, गीतों, स्टैंड-अप कॉमेडी और सोशल मीडिया पर गालियाँ सामान्य मनोरंजन का हिस्सा बन गई हैं। यही कारण है कि आज के युवाओं की शब्दावली में एफ-शब्द या लिंग केंद्रित गालियां सहजता से शामिल हो गई हैं। वही भाषा अब युवा सड़क पर ले आ रहे हैं। यह समस्या हमारे देश भर की नहीं बल्कि तमाम विकसित कहलाने वाले देशों की भी है।

जंतर-मंतर की घटना यह भी बताती है कि डिजिटल संस्कृति और सार्वजनिक संस्कृति के बीच की सीमाएँ तेजी से मिट रही हैं। इसलिए, अब समाज को ही यह तय करना पड़ेगा कि सार्वजनिक जीवन की भाषा कैसी हो?...क्योंकि संसद, सड़क, शैक्षणिक संस्थान, दफ्तर, सोशल मीडिया, घर, दोस्तों की महफ़िल और जंतर-मंतर जैसे सार्वजनिक मंच की भाषा एक जैसी नहीं हो सकतीं। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि गाली हमारे आक्रोश को क्षणिक संतोष तो दे सकती है, पर समाज को आगे बढ़ाने का काम अंततः अच्छा संवाद ही करता है और संवाद से ही समस्या का समाधान निकलता है।

#Gali #JanterManter #Genz #language #culture #socialmedia #webseries 

बुधवार, 29 जुलाई 2026

गुरु पूर्णिमा विशेष: जब हर जेब में ‘ज्ञान’ है, तब ‘गुरु’ का क्या होगा!!

 

Monestry at Rivalsar, Himachal

आज हर जेब में ज्ञान का भंडार है। एक समय वह था जब ज्ञान तक पहुँचने के लिए शिष्य को गुरु के पास जाना पड़ता था। अब समय ऐसा आ गया है कि मोबाइल के जरिए ज्ञान हर जेब तक पहुंच गया है। एक क्लिक पर लाखों पुस्तकें उपलब्ध हैं, हजारों व्याख्यान हैं, अनगिनत वीडियो हैं, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तो हर सवाल का उत्तर चुटकियों में देने को तैयार है। कुल मिलाकर इंटरनेट ने पूरी दुनिया को एक विशाल डिजिटल पुस्तकालय में बदल दिया है। ऐसे समय में प्रश्न उठता है कि क्या अब गुरु की आवश्यकता समाप्त हो रही है?

गुरु पूर्णिमा का पर्व हमें इसी प्रश्न का सबसे सार्थक उत्तर देता है। दरअसल, ज्ञान और गुरु कभी एक-दूसरे के विकल्प नहीं रहे। ज्ञान सूचना दे सकता है, लेकिन गुरु दृष्टि देता है। इंटरनेट तथ्यों का महासागर है, लेकिन उस महासागर में कौन-सा मोती चुनना है, यह विवेक गुरु ही सिखाता है।

आज की जेन जी (Gen Z) दुनिया की सबसे अधिक डिजिटल पीढ़ी है। उसके लिए मोबाइल सिर्फ़ फोन नहीं, बल्कि स्कूल, लाइब्रेरी, सिनेमा, बैंक, बाज़ार और मित्र सब कुछ है। वह किसी भी विषय पर कुछ ही सेकंड में जानकारी जुटा सकती है। लेकिन इस पीढ़ी के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती जानकारी की कमी नहीं, बल्कि जानकारी की अधिकता या सूचनाओं का विस्फोट है।

हजारों उत्तरों के बीच सही उत्तर चुनना, सच और झूठ में अंतर करना, एल्गोरिद्म द्वारा परोसे जा रहे विचारों से स्वतंत्र सोच विकसित करना आज की सबसे बड़ी शिक्षा है। यह काम कोई सर्च इंजन नहीं बल्कि अच्छा एवं योग्य गुरु ही कर सकता।

Teacher

मौजूदा दौर में एआई कविता लिख सकता है, शोधपत्र तैयार कर सकता है, चित्र बना सकता है और जटिल समस्याओं का समाधान भी सुझा सकता है लेकिन वह यह तय नहीं कर सकता कि किसी निर्णय में संवेदना कहाँ आवश्यक है, नैतिकता किस पक्ष में खड़ी है और मनुष्य होने का असल अर्थ क्या है। यहीं से गुरु की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

वरना अब तो गुरु भी नकल और फर्जीवाड़े वाले हो गये हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्व विद्यालय के कुलगुरू रहे  श्री के जी सुरेश सर ने तो कहा है कि अब गुरुजी AI से किताबें लिख रहे हैं और उसमें ऐसे तथ्य इस्तेमाल कर रहे हैं जो हैं ही नहीं। इसतरह का एक मामला कोर्ट में भी आ चुका है जब फर्जी नतीजों के सहारे जज को गुमराह करने के प्रयास हुए हैं।

भारतीय संस्कृति में गुरु केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं रहा। गुरु वह है जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए। वह केवल सूचना नहीं देता, बल्कि व्यक्तित्व गढ़ता है। वह केवल करियर नहीं बनाता, बल्कि चरित्र भी बनाता है। यही सबसे बड़ा फर्क है कि तकनीक उत्तर देती है, लेकिन गुरु प्रश्न पूछना सिखाता है।

आज शिक्षा का अर्थ भी बदल रहा है और गुरु का भी। पहले शिक्षक ज्ञान का एकमात्र स्रोत था। अब वह ज्ञान का संरक्षक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक (Mentor) है। उसका कार्य तथ्यों को दोहराना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में जिज्ञासा, आलोचनात्मक सोच, नैतिक विवेक, संवाद क्षमता और मानवीय संवेदनाएँ विकसित करना है। नई पीढ़ी को ऐसे गुरु चाहिए जो एआई को प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी मानें; जो विद्यार्थियों को उत्तर रटाने के बजाय सही प्रश्न पूछना सिखाएँ।

यह भी सच है कि आज के विद्यार्थी केवल शिक्षक से नहीं सीखते। वे यूट्यूब, पॉडकास्ट, ऑनलाइन कोर्स, सोशल मीडिया, ओपन-सोर्स प्लेटफ़ॉर्म और एआई से भी सीख रहे हैं। इसलिए आज गुरु का अधिकार आदेश देने में नहीं, बल्कि अपने आचरण, अनुभव और विश्वसनीयता से अर्जित सम्मान में है।

गुरु पूर्णिमा हमें यह भी याद दिलाती है कि जीवन में हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में गुरु हो सकता है। माता-पिता, शिक्षक, पुस्तकें, प्रकृति, अनुभव, असफलताएँ और कभी-कभी अपने विद्यार्थी भी हमें बहुत कुछ सिखा जाते हैं। सीखने की यह विनम्रता ही भारतीय गुरु-परंपरा की आत्मा है।

आने वाले वर्षों में एआई और अधिक बुद्धिमान होगा। मोबाइल और अधिक शक्तिशाली होंगे। डिजिटल पुस्तकालय और भी विशाल हो जाएंगे। लेकिन मनुष्य को तब भी ऐसे किसी गुरु की आवश्यकता रहेगी जो केवल रास्ता न बताए, बल्कि गिरने पर संभाल भी ले क्योंकि संस्कार आज भी किसी ऐप से डाउनलोड नहीं होते बल्कि योग्य गुरु के सान्निध्य में ही जन्म लेते हैं।

#guru #गुरुपूर्णिमा #teachers #mobilelegends

सोमवार, 27 जुलाई 2026

वास्तेगुना हुइंया नहीं है ‘पापा की परी’

 पापा की परी' शब्द का असली अर्थ और सोशल मीडिया ने इसे कैसे बदल दिया

Daughter and father
‘अरे, रहने दो... ये तो पापा की परी है!’ सोशल मीडिया पर यह वाक्य आजकल इतनी बार सुनाई देता है कि लगता है जैसे पापा की परी कोई रिश्ता नहीं, बल्कि मूर्खता का तमगा हो। अब स्थिति यह हो गई है कि सड़क पर किसी लड़की से छोटी-सी लापरवाही हुई या उसने किसी बात पर अधिकार जताया या कोई युवती  ज़्यादा भावुक हो गई या फिर उसने थोड़ा सा अपरिपक्व व्यवहार कर दिया…तुरंत ही कोई टिप्पणी आ जाएगी कि ‘पापा की परी है।’

लेकिन पापा की परी कोई ‘वास्तेगुना हुइंया’ नहीं है कि कहीं भी इस्तेमाल कर दिया। पापा की परी संबोधन में पिता का अथाह लाड़-प्यार, स्नेह, गर्व और सुरक्षा का भाव छिपा है जिसे आज इंटरनेट या सोशल मीडिया की भाषा में मूर्खता एवं नासमझी का प्रतीक बना दिया गया है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर पापा की परी जैसा स्नेहिल और आत्मीय संबोधन निगेटिव कैसे बन गया? 

मैंने गूगल गुरु से लेकर AI के अक्लमंद चैटबॉट से भी पूछा लेकिन वे भी सही सही उत्तर नहीं दे पाए। दरअसल वास्तेगुना हुइंया जैसे भाषा के कई नए मुहावरों की तरह पापा की परी का अर्थ भी धीरे-धीरे सोशल मीडिया की प्रयोगशाला में बदल गया।  हालांकि इन दिनों वायरल वाक्य ‘वास्तेगुना हुइंया’ का तो वाकई कोई अर्थ नहीं है लेकिन पापा की परी तो भावुक भाव लिए है । 

जानकारी मिलती है कि लगभग 2018-19 के बाद इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर (अब एक्स) और विशेष रूप से छोटे वीडियो प्लेटफॉर्मों पर ऐसे मीम और वीडियो आने लगे जिनमें कुछ लड़कियों को बेहद लाड़-प्यार में पली, ज़िम्मेदारी से दूर या वास्तविक दुनिया से अनजान दिखाया जाता था। इन वीडियो के साथ पापा की परी लिखना एक चलन बन गया। धीरे धीरे यह वाक्य इंटरनेट संस्कृति का हिस्सा बन गया।

Parasar lake, Himachal
चिंताजनक बात यह है कि यह बदलाव किसी शब्दकोश ने नहीं किया, बल्कि सोशल मीडिया की मीम संस्कृति ने किया। बिल्कुल वैसे ही जैसे आजकल रील में ‘तेरी गलियों में मुहब्बत होगी..’ गाने की ऊटपटांग चेहरे बनाकर टांग खींची जा रही है। इस लिहाज से देखें तो आज सोशल मीडिया केवल शब्दों का नहीं, उनके अर्थों का भी निर्माता बन चुका है।

मेरी समस्या यह नहीं कि कुछ लड़कियों के व्यवहार पर व्यंग्य क्यों किया जाता है। मेरी समस्या यह है कि व्यंग्य का निशाना एक खूबसूरत संबोधन को बना दिया गया है। क्या, अपनी बेटी को परी कहना, भरपूर लाड प्यार देना गलत है? पापा की परी को ऐसा लेबल बना दिया गया जिसे किसी भी लड़की पर चिपका दिया जाता है।

सोचिए, क्या कोई भी पिता यह चाहेगा कि उसकी बेटी के लिए उसका प्यार मज़ाक का विषय बने? हर बेटी अपने पिता के लिए सचमुच परी ही होती है। वह पहली बार जब उंगली पकड़कर चलती है, पहली बार स्कूल जाती है, पहली बार स्कूल के सालाना उत्सव में परफॉर्म करती है, पहली बार हारती है, पहली बार जीतती है, पहली बार कॉलेज जाती है, घर से बाहर निकलती है, नौकरी करती है…हर पड़ाव पर पिता के मन में उसके लिए वही परी जैसा भाव रहता है क्योंकि इस रिश्ते में न प्रदर्शन है, न दिखावा… केवल विश्वास और अपनापन है।

मुझे अभी भी याद है जब पांचवीं क्लास में मेरी परी ने ताईक्वांडो के जिला स्तरीय टूर्नामेंट के फाइनल में प्रवेश किया तो हमारा पूरा परिवार गर्व से फूल गया था लेकिन फाइनल में जब उसे मुकाबले में राज्यस्तरीय विजेता और नौंवी क्लास की तथा उससे दो गुनी लंबी लड़की के सामने उतारा गया तो मैंने बिना लड़े वॉकओवर दे दिया क्योंकि मेरी बिटिया उसके सामने नाजुक थी और मेरी परी तो थी ही.. ऐसे कई किस्से हैं जीवन में जब बेटी वाकई ‘एंजल’ बन जाती है और हर पिता के पास ऐसे दर्जनों किस्से होंगे।

Roses and Princess
हालांकि, यह भी सच है कि कुछ परिवारों में अत्यधिक लाड़-प्यार बच्चों को ज़िम्मेदार बनने से रोक देता है लेकिन यह केवल बेटियों के साथ नहीं, बेटों के साथ भी होता है। तो फिर केवल पापा की परी  क्यों?  ‘मम्मी का राजा बेटा’ या ‘मम्मी का मुन्ना’, ‘पापा का पप्पू’ या राजा बाबू टाइप कुछ क्यों नहीं? मुझे तो पापा की परी शब्द भी पीढ़ियों से चले आ रहे लैंगिक पूर्वाग्रह का ही विस्तार लगता है ।

मैं, कई ऐसी परियों को जानता हूं जो अपने बुजुर्ग माँ बाप की सेवा में दिनरात एक किए हैं और जिन्हें राजा बाबू बना कर बड़ा किया गया वे मम्मी पापा को वृद्धाश्रम भेजने की जुगत में हैं। ऐसी बेटियां क्या किसी एंजल से कम हैं। क्या भावुक होना, सहज रहना, सरल होना मूर्खता है?

माना कि भाषा समाज का आइना होती है लेकिन जब किसी सम्मानजनक संबोधन का अर्थ का अनर्थ कर दिया जाए तो यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं होता, बल्कि हमारी सोच का भी संकेत होता है। मीम हमें कुछ सेकंड की हँसी मजाक का मौका तो दे सकते हैं, लेकिन वे धीरे-धीरे संवेदनाओं का अर्थ भी बदल देते हैं।

आज जरूरत इस बात की है कि हम व्यवहार की आलोचना करें, रिश्तों की नहीं। यदि कोई व्यक्ति अपरिपक्व है तो उसे अपरिपक्व कहें पर किसी बेटी के अपने पिता से मिले स्नेह को व्यंग्य का पर्याय बनाना तो उचित नहीं।

आखिर, पापा की परी होना कोई कमजोरी नहीं बल्कि सौभाग्य है जिसमें एक पिता अपनी बेटी को बिना शर्त प्यार करता है, उस पर विश्वास करता है और उसे जीवन में ऊँची उड़ान भरते देखना चाहता है इसलिए अगली बार जब आप भी ‘पापा की परी’ कहकर किसी बेटी की हंसी उड़ाएं तो एक पल रुककर सोचिए जरूर क्योंकि दुनिया चाहे इस शब्द का कोई भी अर्थ ले..हर पिता के लिए उसकी बेटी हमेशा एक परी ही रहती है..जिम्मेदार परी, आत्मनिर्भर परी, परिवार की नींव रखने वाली और सबसे लाड़ली परी।

#Papakipari  #वास्तेगुना हुइंया #Angel


शनिवार, 25 जुलाई 2026

न्यूज़ चैनल से नाराज़गी जायज़, पर ‘रिपोर्टर’ पर हमला क्यों?

 


जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए एक युवा आंदोलन की तस्वीरों ने एक असहज सवाल हमारे सामने खड़ा कर दिया। कुछ पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की हुई, कैमरे छीनने की कोशिश की गई और महिला पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार की घटनाएं भी सामने आईं। यह केवल किसी एक चैनल या एक आंदोलन का मामला नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग आंदोलनों, चुनावी रैलियों और संवेदनशील घटनाओं की कवरेज के दौरान भी ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं।

यह मान लेना आसान है कि भीड़ किसी चैनल की संपादकीय नीति से नाराज़ थी। लेकिन मुश्किल सवाल यह है कि यदि नाराज़गी किसी चैनल से है तो उसका शिकार मैदान में खबर जुटाने वाला रिपोर्टर क्यों बने? वह कैमरापर्सन क्यों बने, जो घंटों धूप, बारिश और भीड़ के बीच केवल घटनाओं को रिकॉर्ड कर रहा है? और सबसे अधिक चिंता की बात यह कि महिला पत्रकारों को भी अभद्र टिप्पणियों और दुर्व्यवहार का सामना क्यों करना पड़े?

मेरी नज़र में इस पूरे घटनाक्रम का एक डरावना और दूरगामी पक्ष भी है जो इन्हीं युवाओं से जुड़ा है, जिस पर शायद सबसे कम चर्चा हो रही है। देश के सैकड़ों विश्वविद्यालयों और मीडिया संस्थानों में हर साल हजारों युवा पत्रकारिता की पढ़ाई करते हैं। वे कैमरे के सामने खड़े होने का नहीं, बल्कि समाज के बीच जाकर सच तलाशने का सपना लेकर निकलते हैं। कोई अपने गांव से बड़े शहर आता है, कोई परिवार की जमा-पूंजी खर्च कर मीडिया की डिग्री लेता है, तो कोई यह विश्वास लेकर कि एक दिन किसी प्रतिष्ठित समाचार संस्थान का हिस्सा बनेगा।

जब ऐसे युवाओं को किसी राष्ट्रीय चैनल या अखबार में नौकरी मिलती है, तो उनके लिए वह केवल रोजगार नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष का परिणाम होता है। लेकिन यदि किसी चैनल की संपादकीय नीति से असहमति का गुस्सा उसी नए-नए रिपोर्टर पर उतारा जाएगा, तो सवाल उठता है—उस युवा पत्रकार का कसूर क्या है?क्या उसने चैनल की बहस तय की? क्या उसने प्राइम टाइम की भाषा लिखी? क्या उसने संपादकीय नीति बनाई? अधिकांश मामलों में उत्तर होगा—नहीं। वह तो केवल अपने पेशे का पहला कदम रख रहा है। उसके हाथ में माइक है, लेकिन फैसले उसके हाथ में नहीं हैं।

सोचिए, यदि किसी अस्पताल की प्रशासनिक नीति से असहमति हो तो क्या डॉक्टर या नर्स से मारपीट उचित हो जाएगी? यदि किसी बैंक की सेवा पसंद न आए तो क्या कैशियर पर हमला जायज़ हो जाएगा? बिल्कुल नहीं। फिर किसी चैनल से नाराज़गी का निशाना उस रिपोर्टर को क्यों बनाया जाए, जो कई बार मामूली वेतन पर, धूप-बारिश और जोखिम के बीच सिर्फ घटनाओं को दर्ज कर रहा होता है?

AI and Media

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि देश के युवा यह महसूस करने लगें कि पत्रकारिता का अर्थ है—हर विरोध प्रदर्शन में अपमान, गाली, धक्का-मुक्की और जान का जोखिम—तो कल कौन इस पेशे में आएगा? क्या हम ऐसी पीढ़ी तैयार करना चाहते हैं जो सच दिखाने से पहले अपनी सुरक्षा की चिंता करे?

मीडिया विशेषज्ञ लंबे समय से एक महत्वपूर्ण बात कहते रहे हैं कि दर्शकों का बड़ा वर्ग "मीडिया" को एक ही इकाई मान लेता है। टीवी स्क्रीन पर जो चेहरा सबसे अधिक दिखाई देता है, वही पूरे संस्थान का प्रतीक बन जाता है। एंकर, रिपोर्टर, संपादक, कैमरापर्सन और प्रोड्यूसर—इन सभी की भूमिकाओं का अंतर आम दर्शक तक स्पष्ट रूप से नहीं पहुंच पाता। परिणाम यह होता है कि स्टूडियो में बैठकर बहस संचालित करने वाले एंकर से नाराज़गी का गुस्सा घटनास्थल पर मौजूद रिपोर्टर पर उतर आता है।

कई वरिष्ठ संपादकों और मीडिया विश्लेषकों ने समय-समय पर यह कहा है कि फील्ड रिपोर्टर अक्सर संपादकीय नीतियां तय नहीं करते। उनका काम घटनास्थल से तथ्य जुटाना, लोगों से बात करना और दृश्य रिकॉर्ड करना होता है। कौन-सी खबर किस रूप में दिखाई जाएगी, किस शीर्षक के साथ चलेगी या किस एंगल से प्रस्तुत होगी, यह निर्णय प्रायः संपादकीय स्तर पर लिया जाता है। इसलिए किसी रिपोर्टर को चैनल की पूरी नीति का प्रतिनिधि मान लेना वास्तविकता से दूर है।

दुर्भाग्य से सोशल मीडिया ने इस भ्रम को और गहरा किया है। छोटे-छोटे वीडियो क्लिप, अधूरी जानकारी और उत्तेजक टिप्पणियां लोगों की राय को तेजी से प्रभावित करती हैं। कई बार किसी चैनल की बहस देखकर लोगों में गुस्सा पैदा होता है और वही गुस्सा अगली बार सड़क पर दिखाई देने वाले पहले माइक पर निकल पड़ता है। भीड़ यह भूल जाती है कि सामने खड़ा व्यक्ति भी एक पेशेवर है, जो अपना दायित्व निभा रहा है।

यह स्थिति लोकतंत्र के लिए भी चिंताजनक है। पत्रकार पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं होता, बल्कि समाज के सूचना के अधिकार पर भी चोट होती है। यदि रिपोर्टर घटनास्थल पर जाने से डरने लगेंगे तो सबसे पहले नुकसान जनता का होगा, क्योंकि घटनाओं की प्रत्यक्ष और स्वतंत्र जानकारी कम होती जाएगी।


महिला पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार का कोई भी औचित्य नहीं हो सकता। किसी विचारधारा, आंदोलन या राजनीतिक मतभेद के नाम पर महिलाओं के सम्मान से समझौता लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। असहमति का अधिकार और गरिमा का सम्मान—दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।

इस समस्या का समाधान केवल कानून से नहीं होगा। सबसे पहले मीडिया साक्षरता (Media Literacy) को बढ़ावा देना होगा। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में यह समझ विकसित की जानी चाहिए कि समाचार कैसे तैयार होता है, एंकर और रिपोर्टर की भूमिकाएं क्या होती हैं और संपादकीय निर्णय किस स्तर पर लिए जाते हैं। जब लोग मीडिया की कार्यप्रणाली समझेंगे तो उनका आक्रोश सही दिशा में व्यक्त होगा।

यदि किसी चैनल की प्रस्तुति या नीति से असहमति है तो उसके शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके मौजूद हैं—चैनल का बहिष्कार, शिकायत दर्ज कराना, नियामक संस्थाओं से संपर्क करना, तथ्यात्मक आलोचना करना, सोशल मीडिया पर संयमित विरोध दर्ज कराना या वैकल्पिक मीडिया को समर्थन देना। लेकिन हिंसा, धमकी, कैमरे तोड़ना या पत्रकारों से मारपीट कभी भी लोकतांत्रिक विरोध का हिस्सा नहीं हो सकते।

दूसरी ओर मीडिया संस्थानों को भी आत्ममंथन करना होगा। निष्पक्षता, तथ्यपरकता और सनसनी से दूरी ही जनता का विश्वास वापस ला सकती है। जब दर्शकों का भरोसा बढ़ेगा तो टकराव की संभावना भी कम होगी। युवा किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं। यदि वही संवाद की जगह हिंसा का रास्ता चुनेंगे तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होगा। असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन असहमति का तरीका भी लोकतांत्रिक होना चाहिए।

आलोचना कीजिए, सवाल पूछिए, चैनल बदलिए, बहिष्कार कीजिए—यह आपका अधिकार है। लेकिन मैदान में सच जुटाने निकले पत्रकार को दुश्मन मत बनाइए। आखिरकार, कैमरे के पीछे खड़ा वह व्यक्ति भी आपका साथी है और वह आपकी आवाज़ दुनिया तक पहुंचाने के लिए हर दिन जोखिम उठाता है।

लोकतंत्र केवल अच्छे नेताओं, अच्छे न्यायालयों और अच्छे कानूनों से नहीं चलता; उसे अच्छे पत्रकार भी चाहिए। लेकिन अच्छे पत्रकार तभी मिलेंगे, जब समाज उन्हें सम्मान और सुरक्षा दोनों देगा। इसलिए यदि किसी चैनल से शिकायत है तो विरोध भी उसी स्तर पर होना चाहिए—चैनल को देखना बंद कीजिए, उसके विज्ञापनदाताओं पर लोकतांत्रिक दबाव बनाइए, प्रेस परिषद, नियामक संस्थाओं या अदालत का दरवाजा खटखटाइए, तथ्य आधारित आलोचना कीजिए। लेकिन मैदान में रिपोर्टिंग कर रहे युवा पत्रकार को यह महसूस मत कराइए कि उसने गलत पेशा चुन लिया है क्योंकि जिस दिन योग्य और ईमानदार युवा पत्रकारिता से मुंह मोड़ने लगेंगे, उस दिन सबसे बड़ा नुकसान किसी चैनल का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का होगा।



बुधवार, 22 जुलाई 2026

मौसम तो जीवन का आनंद है,आफ़त नहीं

 मिट्टी के लोग: आधुनिक जीवन में प्रकृति से दूर होता इंसान

Parasar lake Himachal

बारिश.. केवल एक मौसम नहीं है । वह बच्चों की कागज़ की नाव है, पेड़ों की संजीवनी है, प्रकृति का श्रृंगार है, किसानों की उम्मीद है, प्रेमियों का संगीत और कवियों की सबसे प्रिय प्रेरणा है। पहले महीनों पहली फुहार का इंतज़ार होता था, उसके आते ही लोग घरों से बाहर निकल पड़ते थे लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। अब बारिश शुरू होते ही सबसे पहले छाता खुलता है, कार के शीशे चढ़ते हैं और कपड़ों/मोबाइल को बचाने की चिंता सताने लगती है। प्रकृति, जिसके साथ कभी हमारा आत्मीय रिश्ता था, आज सुविधाओं और कृत्रिम जीवनशैली के बीच पीछे छूटती जा रही है। 

आमतौर पर हम जीवन की सहजता को अपने आसपास सोच की कंटीली बाड़ लगाकर जटिल बनाते जा रहे हैं। सोचिये, कितनी विचित्र बात है कि जिस बारिश के लिए किसान टकटकी लगाए रहता है, बच्चे घरों से भागकर गलियों में आ जाते थे, हम भी गर्मी से निपटने के लिए दिन रात मानसून की खबरों पर कान लगाए रहते हैं..आज उसी बारिश से बचने के लिए हम सबसे पहले छाता ढूंढ़ते हैं। महीनों तक मौसम के जिस अमृत का इंतज़ार किया, उसके आते ही हम उससे दूर भागने लगे। हम मिट्टी से बने लोग मिट्टी को भिगोने वाली बारिश से ही डरने लगे। 

हम वाकई अज़ीब होते जा रहे हैं..पानी बरसे तो दिक्कत,कम बरसे तो परेशानी और ज्यादा हो तो संकट। हम चाहते हैं कि हमारे ऑफिस जाते और लौटते समय बारिश न हो, रात को हो और वह भी जब सब काम निपटाकर हम सोने लगें तब। न्यूज़ चैनलों पर भी बारिश गुनगुनाती नहीं है बल्कि कहर ढाती है। दरअसल, यह केवल बारिश की कहानी नहीं है। यह आधुनिकता का लिबास पहनकर घूम रहे हमारी और हमारे समाज की कहानी है, जिसने प्रकृति को जीना लगभग छोड़ दिया है। 

हम पहाड़ों पर इसलिए जाते हैं कि प्रकृति का आनंद लें, लेकिन होटल के कमरे की खिड़की से बाहर झांककर या उसे मोबाइल में समेटकर लौट आते हैं। तेज़ धूप से बचने के लिए एयर कंडीशनर, बारिश से बचने के लिए रेनकोट, ठंडी हवा से बचने के लिए बंद कमरे और सर्दी से बचने के लिए हीटर। धीरे-धीरे हमने हर मौसम को एक समस्या में बदल दिया है।

सुबह की धूप कभी विटामिन और ऊर्जा का स्रोत मानी जाती थी। आज वही धूप हमें टैनिंग का डर दिखाती है। चांदनी रातें कभी चौपालों और आंगनों की साथी थीं, आज वे बंद खिड़कियों के बाहर अकेली रह जाती हैं। हवा कभी पेड़ों की पत्तियों से बात करती थी, अब उसे एयर प्यूरीफायर के फिल्टर से होकर गुजरना पड़ता है।

अब यह विडंबना नहीं तो क्या है कि हमने पेड़ों को इसलिए काटा कि सड़क/पार्किंग बन सके, फिर सप्ताहांत में उसी हरियाली की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर दूर निकल जाते हैं और असली पेड़ों की जगह घर आँगन को सजावटी पौधों से सजाते हैं। 

पहले नदियों को गंदा किया और फिर बोतलबंद पानी खरीदकर पीने लगे। पक्षियों के घोंसले उजाड़ दिए और फिर मोबाइल में उनकी आवाज़ें डाउनलोड करके नेचर साउंड सुनने लगे। यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि हम प्रकृति की तस्वीरें हजारों खींचते हैं, लेकिन प्रकृति के साथ कुछ पल नहीं बिताते।

Parasar lake Himachal

हम सभी के बचपन में बारिश का मतलब होता था कागज़ की नाव, भीगे कपड़े, मिट्टी की सोंधी खुशबू, गरमागरम पकौड़े और मां की डांट लेकिन आज हमारे लिए बारिश का मतलब ट्रैफिक जाम, कपड़े/मोबाइल खराब होने का डर और सोशल मीडिया पर स्टेट्स रह गया है। अपने बच्चों को तो हमने कब से स्कूल एवं कैरियर की भूख में ऐसा बाँध दिया है कि उनके लिए बारिश बस कैलेंडर के कुछ महीने बनकर रह गई है और वे शुरुआत से ही रेन रेन गो अवे.. सीखने लगते हैं।

हमने अपने आपको, परिवार और बच्चों को सुविधाओं का ऐसा कवच पहना दिया है कि अब मौसम हमें छू भी नहीं पाते। हम हरियाली देखना चाहते हैं, लेकिन धूल नहीं। नदी देखना चाहते हैं, लेकिन उसके किनारे बैठना नहीं। पहाड़ पसंद हैं, लेकिन पैदल चलना नहीं। बारिश अच्छी लगती है, लेकिन भीगना नहीं इसलिए हम पहले से अधिक सुविधासंपन्न तो हो गए हैं, पर प्रकृति-संपन्न नहीं।

प्रकृति हमसे क्या मांगती है, कुछ नहीं..बस, जरा सी देखभाल। वह केवल इतना चाहती है कि हम उसके साथ कुछ वक्त बिताएं मसलन कभी बारिश में बिना वजह भीग लें, कभी किसी पेड़ की छांव में चुपचाप बैठ जाएं, कभी नदी के कलकल बहाव को बिना मोबाइल निकाले देखते रहें, कभी सूर्योदय को केवल महसूस करें, चिड़ियों की चहचहाहट सुने, प्रकृति का मधुर संगीत और सुगंध महसूस करें।

लेकिन हमारी विडंबना यह है कि हम मंगल ग्रह पर तो जीवन खोज रहे हैं, जबकि पृथ्वी पर जीवन जीने की कला धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं। 

शायद कवि मणि मोहन की कविता मिट्टी के लोग भी हमसे यही जानना चाहती है कि क्या सचमुच हम अब भी मिट्टी के लोग हैं या फिर कंक्रीट के जंगलों में रहने वाले ऐसे लोग बन चुके हैं जिनके लिए बारिश की चंद बूंदें भी अब असुविधा लगने लगी हैं? जिस दिन हम इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर खोज लेंगे, शायद उसी दिन बारिश फिर से केवल मौसम नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव बन जाएगी और प्रकृति हमारे आसपास पहले की तरह खिलखिलाएगी।

#rain #rainyday #बारिश #मौसम #weather

रविवार, 19 जुलाई 2026

मिलिए, इडली के भाई और मोमोज के मालदार मामा से...!!

 

Siddu/Siddhu,food of Himachal

यह गोल मटोल और धवल रंग से भरपूर व्यंजन सिड्डू है जो देखने में इडली का हट्टा-कट्टा भाई और मोमोज का मालदार मामा लगता है। सिड्डू दरअसल हिमाचल प्रदेश का एक पारंपरिक और लोकप्रिय व्यंजन है । इसे सिदु या सिद्दो भी कहा जाता है जबकि अंग्रेजी अंदाज में बोलने के कारण अब इसे सिड्डू भी पुकारा जाने लगा है। चूँकि, ब्रिटिश काल में शिमला अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी रही है इसलिए अंग्रेज भी इस गोलू-मोलू के मुरीद बने और यह जनाब सिद्दू से सिड्डू हो गए लेकिन एक बात बिलकुल साफ़ है कि इसका क्रिकेटर नवजोत सिंह ‘सिद्धू’ से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है।

सिद्दू/सिड्डू न केवल हिमाचल के ग्रामीण इलाकों में, बल्कि शहरी रेस्तरां और शिमला-मनाली जैसे पर्यटक स्थलों में भी लोकप्रिय है। यह हिमाचली थाली का अभिन्न हिस्सा है। बस, फर्क इतना है कि शिमला में सिद्दू अंडाकार बनता है तो ग्रामीण इलाकों में गोलाकार और कुल्लू में कुछ चपटा सा होता है। साधारण भाषा में समझने के लिए हम कह सकते हैं कि यह एक स्टीम्ड ब्रेड या बन है, जिसे गेहूं के आटे से बनाया जाता है और इसमें विभिन्न प्रकार की मसालेदार या मीठी स्टफिंग (भरावन) होती है। 

सर्दियों में इसे देसी घी, दाल या चटनी के साथ खाया जाता है, जो शरीर को गर्म तो रखता ही है और स्वाद को भी दोगुना कर देता है। सिद्दू प्रोटीन और फाइबर जैसे तमाम पोषक तत्वों से भरपूर है इसलिए स्वादिष्ट होने के साथ-साथ यह पौष्टिक भी है।

जानकारों का कहना है कि सिद्दू की स्टीमिंग (भाप से पकाना) तकनीक कुछ कुछ तिब्बती और लद्दाखी व्यंजनों जैसे मोमोज की तरह है। वैसे भी, हिमाचल और तिब्बत बहुत करीब हैं। सिद्दू बनाने के तरीके को लेकर हमारे दक्षिण भारतीय मित्र भी इस पर दावा कर सकते हैं क्योंकि जैसा मैंने ऊपर लिखा है कि यह कुछ कुछ इडली जैसा है और अब तो स्टफ्ड इडली और घी के साथ इडली भी चलन में हैं। 

लिट्टी में सत्तू भरने के कारण पूर्वांचल और खासकर बिहार के लोग भी इस पर दावा कर सकते हैं। इसीतरह यदि इसे रोटी की तरह बेल दिया जाए तो यह पूरण पोली खानदान में शामिल हो सकता है...और यदि तेल में तल दिया जाए तो यह हमारे आलूबड़े का सगा भाई लगेगा। हालांकि, इन तमाम समानताओं के बाद भी मुख्य और मूल बात यह है कि सिद्दू का उद्भव, विकास, स्वाद और बनावट खालिस हिमाचली है।

यहाँ सिद्दू सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि हिमाचली आतिथ्य, सामुदायिकता और प्रकृति के साथ तालमेल का प्रतीक है। इसे बनाने की प्रक्रिया मसलन आटा तैयार करना, स्टफिंग बनाना, स्टीम करना...परिवारों को एक साथ लाती है। यह हिमाचल की जमीन से थाली तक की अवधारणा को दर्शाता है क्योंकि इसमें स्थानीय उपज और पारंपरिक तरीकों का ही उपयोग होता है।

सिद्दू के इतिहास के बारे में ज्यादा लिखित साक्ष्य तो नहीं मिलते क्योंकि यह मूल रूप से मौखिक परंपराओं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे ज्ञान पर आधारित है। हिमाचल के स्थानीय लोग और खानपान के जानकार इसे यहाँ की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानते हैं। बनाने के तौर तरीके के कारण भी यह यहां का मूल व्यंजन है। शिमला और किन्नौर में सिद्दू को अक्सर अखरोट या खसखस की स्टफिंग के साथ बनाया जाता है जबकि कुल्लू और मंडी में उड़द दाल या मटर की मसालेदार स्टफिंग आम है । इसी तरह,रोहड़ू और चंबा में कुछ जगहों पर सिद्दू को गुड़ और नारियल की मीठी स्टफिंग के साथ इसे मिठाई जैसा बनाया जाता है लेकिन देशी घी का साथ यह कहीं नहीं छोड़ता।

वैसे, सिद्दू की उत्पत्ति हिमाचल के ग्रामीण इलाकों में मानी जाती है । भाप में पकाने की तकनीक के कारण ठंडे मौसम में यह आसानी से तैयार हो जाता है और यही इसकी लोकप्रियता का कारण है । सिद्दू को अक्सर विशेष अवसरों जैसे शादी, त्योहार और पारिवारिक समारोहों में बनाया जाता था। स्थानीय कथाओं के अनुसार, सिद्दू को पहाड़ी महिलाएं अपने परिवार के उन पुरुषों के लिए बनाती थीं जो लंबी यात्राओं या खेतों में काम करने के लिए जाते थे। यह पेट भरने वाला और लंबे समय तक ताजा रहने वाला भोजन है ।

इन दिनों सोशल मीडिया और फूड ब्लॉगर के चलते सिद्दू को हिमाचल से बाहर भी पहचान मिल रही है । इसे अब अन्य राज्यों में फूड फेस्टिवल्स और हिमाचली खानपान को बढ़ावा देने वाले आयोजनों में भी आमतौर पर प्रदर्शित किया जाने लगा है। अब यदि आप हिमाचल प्रदेश जाएँ तो अपनी डायबिटीज भूलकर मीठा सिद्दू और नमकीन के शौकीन हैं तो साथ में एक मसालेदार सिद्दू जरूर खाइए क्योंकि सिद्दू के बिना हिमाचल की यात्रा अधूरी है।

#himachalpradesh  #हिमाचल  #himachal  #siddu 

मंडी की मंडियाली कचौरी..स्वाद और अंदाज, दोनों निराले










 मंडी की प्रसिद्ध कचौरी: इतिहास, स्वाद 
और हिमाचली पहचान

यह फोटो देखकर सबसे पहले आपके दिमाग में कौन सा नाम या मुंह में कौन सा स्वाद आता है?..अगर आप हिंदी पट्टी से हैं तो निश्चित ही पूड़ी/पूरी कहेंगे और पंजाब-दिल्ली से हैं तो भटूरा..लेकिन न तो यह पूड़ी है और न ही भटूरा। यह कचौरी है..लेकिन आमतौर पर मिलने वाली कचौरियों की जमात से बिल्कुल अलग स्वाद,अंदाज, आकार वाली और दमदार इतनी कि हम जैसों के लिए एक ही दिनभर के लिए पर्याप्त है। यह है मंडी की ‘मंडियाली कचौरी’ । इसे हिमाचली व्यंजनों में "बेडुआं" (Beduon) के नाम से भी जाना जाता है। आकार और भरावन छोड़ दें तो इसे बेड़मी पूड़ी का मोटू पतलू टाइप रिश्तेदार कह सकते हैं।

यह तो आप जानते ही होंगे कि मंडी हिमाचल प्रदेश का एक प्रमुख शहर है जिसे ‘छोटी काशी’ भी कहा जाता है। मंडी की यह कचौरी कोई साधारण कचौरी नहीं है बल्कि अब यहां की संस्कृति एवं पहचान है। पहली नज़र में यह भले ही अन्य शहरों की कचौरियों जैसी या बस थोड़ी बड़ी लगे लेकिन पहला कौर लेते ही इसका अलग स्वाद मुंह में घुल जाता है। बाहर से हल्की कुरकुरी, भीतर से नरम और उड़द की दाल तथा पारंपरिक मसालों की सुगंध से भरपूर यह कचौरी स्वाद की ऐसी परतें खोलती है, जिन्हें  बस खाकर ही महसूस किया जा सकता है।

केवल मंडी या मंडियाली संस्कृति में उपलब्ध इस खास कचौरी की सबसे बड़ी विशेषता इसको बनाने का पारंपरिक तरीका है। अधिकतर हलवाई आज भी पीढ़ियों से चली आ रही विधि से इसका आटा तैयार करते हैं। सबसे पहले आटे को हल्का खमीर दिया जाता है, जिससे इसकी बनावट और स्वाद दोनों अलग हो जाते हैं। इसके बाद उड़द की दाल में हींग, जीरा, धनिया, सौंफ और अन्य मसालों का संतुलित मिश्रण भरकर इसे धीमी आँच पर सुनहरा तला जाता है। इसकी एक प्रमुख खासियत यह भी है कि तेल से भरी कड़ाही में भरपूर गोता लगाने और फुदक फुदककर नाचने के बाद भी इस पर तेल की एक बूंद नज़र  नहीं आती। यही धैर्य एवं कुशलता इसकी असली पहचान है।

 मंडी सदियों तक व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। बताया जाता है कि कुल्लू, लाहौल, किन्नौर और तिब्बत से आने वाले व्यापारी यहां रुकते थे एवं उन्हें ऐसा भोजन चाहिए होता था जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पेट भी भर दे और लंबे समय तक ताजा रहे। माना जाता है कि इन्हीं आवश्यकताओं के बीच मंडी की इस विशेष कचौरी का जन्म हुआ और धीरे धीरे इसने अपनी अलग पहचान बनाई। यद्यपि इसका कोई आधिकारिक लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय लोग इसे शहर की पुरानी खाद्य विरासत का हिस्सा मानते हैं। कहते भी हैं कि किसी शहर का इतिहास उसके भोजन में भी दर्ज होता है।

खासतौर पर, यहां के प्रसिद्ध महाशिवरात्रि महोत्सव के दौरान तो इस कचौरी की लोकप्रियता देखने लायक होती है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक मंदिरों के दर्शन के बाद गरमागरम कचौरी का स्वाद लेना अपनी यात्रा का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं। यह कुछ कुछ वैसा ही है जैसे कोलकाता में दक्षिणेश्वर काली मंदिर के दर्शन के बाद मंदिर के सामने मिलने वाले पुड़ी छोले का अनूठा स्वाद।

आज फास्ट फूड, चाइनीज, मोमो और बहुराष्ट्रीय व्यंजनों के दौर में भी मंडी की कचौरी अपनी पहचान बनाए हुए है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी शहर की असली ताकत उसकी परंपराओं में होती है। आधुनिकता चाहे जितनी आगे बढ़ जाए, पीढ़ियों से चला आ रहा स्वाद लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखता है।

#Mandi #himachalpradesh  #himachaliculture #कचौरी #foodie #culture

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

‘इमोजी’…मतलब भाव ने भाषा की छुट्टी कर दी..!!

 विश्व इमोजी दिवस यानी उन पीले-पीले गोल चेहरों का दिन, जिन्होंने दुनिया की हजारों भाषाओं को चुनौती दे दी है। यह दिन हाल ही में मनाया गया। जब दिन है तो उस पर चर्चा भी जरूरी है और इस विषय पर बातचीत तो इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि भाव पर आधारित ये चंद चित्रों ने भाषा की छुट्टी करने के लिए कमर कस ली है। कभी शब्दों के सहारे रिश्ते बनते थे, अब एक 😊, 😍, 😡 या 👍 तय कर देता है कि सामने वाला खुश है, नाराज़ है या केवल औपचारिकता निभा रहा है।

किसी समय हम सभी चिट्ठी में लिखते थे  कि “प्रिय मित्र, तुम्हारा पत्र पाकर हृदय गदगद हो उठा।” आज इस भाव को एक ❤️ में समेट दिया गया है। कभी किसी की उपलब्धि पर हम खुलकर लिखते थे कि “हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ।” अब बस... 🎉👏और काम खत्म।

Emoji

अब तो ऐसा लगने लगा है कि भाषा पुस्तकों/शब्दकोश/अखबारों में कैद हो गई है और बातचीत इमोजी कीबोर्ड पर आ बसी है। सोशल मीडिया में तो बिना इमोजी के गुजारा ही नहीं है। सारा सुख-दुख बस चंद कार्टून नुमा चेहरों में सिमट गया है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इमोजी ने उम्र का, अनुभव का,रिश्तों का अंतर भी लगभग मिटा दिया है। दस बारह साल का बच्चा भी 😂 भेजता है और सत्तर पचहत्तर वर्ष के दादाजी भी। दोनों का हँसना अब एक ही चेहरे से व्यक्त होता है। दुख भी एक 😢 है, गुस्सा भी 😡 और प्यार भी ❤️। भावनाओं की विविधता चंद चित्रों में सिमटती जा रही है।

Emoji

इस बदलाव का एक दूसरा पहलू भी है। पहले किसी की बात पसंद आती थी तो हम लिखते थे कि "आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ।"असहमति होती तो तर्क दिए जाते थे..विषय पर चर्चा/बहस और तर्क वितर्क होते थे। अब पूरी बहस का निष्कर्ष केवल दो बटन हैं 👍 या ❤️।

कई बार तो समझ ही नहीं आता कि सामने वाले ने पोस्ट पढ़ी भी है या केवल अंगूठा दिखाकर आगे बढ़ गया। कुल मिलाकर संवाद की जगह प्रतिक्रिया ने ले ली है, और प्रतिक्रिया भी इतनी छोटी कि उसमें विचारों की कोई जगह नहीं बचती। बाकी कई बार तो रिएक्शन (प्रतिक्रिया) का स्थान भी व्यूज (views) ले जाते हैं और लिखने/पोस्ट करने वाले की पूरी मेहनत व्यूज की संख्या में सिमट जाती है। अब तो सोशल मीडिया में लोकप्रियता आंकने का पैरामीटर व्यूज ही रह गया है और व्यूज के आधार पर कमाई ने तो सारे मनोभाव/क्रिया प्रतिक्रिया को व्यूज में समेट दिया है।

Emojis

इमोजी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह हर व्यक्ति के लिए अलग अर्थ भी रख सकता है। किसी के लिए 🙂 शिष्ट मुस्कान है, तो किसी के लिए व्यंग्य। 😂 किसी के लिए ठहाका है, तो किसी के लिए मज़ाक उड़ाना। यानी भाषा, जो स्पष्टता लाती थी, उसकी जगह कई बार अनुमान ने ले ली है। वैसे भी, आमतौर पर कुछ नियमित इस्तेमाल होने वाले इमोजी को छोड़कर अधिकतर लोगों को इन इमोजी के सही अर्थ भी नहीं पता होते। इसलिए, वे बिना अर्थ जाने भाव का अनर्थ करते रहते हैं।

इमोजी ने सबसे गहरा असर बच्चों की शब्द-सम्पदा पर डाला है। अब जब हर भावना के लिए उनके पास चित्र मौजूद हैं तो उन्हें नए शब्द सीखने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती है।आश्चर्यचकित/ विस्मित/आह्लादित/व्यथित/आक्रोशित जैसे सुंदर एवं अर्थपूर्ण शब्द धीरे-धीरे चंद चेहरे के पीछे छिपते जा रहे हैं। 

हम सभी जानते हैं भाषा में हर शब्द का उपयोग के मुताबिक अर्थ होता है, उनमें अर्थ के साथ गूढ़ अर्थ भी छिपा होता है जिसे अंग्रेजी में बिटवीन द लाइन कहते हैं लेकिन इमोजी की बस एक भाषा/अर्थ होता है। विकास का एक पहलू यह भी है कि भाषा जितनी समृद्ध होती है, सोच भी उतनी ही गहरी होती है। शब्द घटते हैं तो विचार भी घटने लगते हैं।

लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि इमोजी बुरे हैं और उनको व्यवहार से निकाल फेंकना चाहिए। इमोजी उपयोगी हैं और कई बार संवाद को सहज, तेज़ और कई बार अधिक आत्मीय बनाते हैं। इसलिए समस्या उनका इस्तेमाल नहीं बल्कि उन्हें भाषा की तरह उपयोग करना है क्योंकि वे भाषा के सहायक बन सकते हैं लेकिन भाषा के विकल्प नहीं बन सकते और इसे किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।

इसलिए, इस तरह के स्वघोषित दिवसों पर हमें अपने आप से एक सवाल जरूर करना चाहिए कि क्या हम या हमारे बाद की पीढ़ियों में भाषा का स्थान इमोजी को सहजता से सौंपना उचित है और इससे भाषा का भविष्य कहां पहुंचेगा?

एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि जिस दिन हमारी पूरी बातचीत केवल 😊😂❤️👍 तक सीमित रह जाएगी, उस दिन शब्द भी मौन हो जाएँगे क्योंकि इमोजी चेहरे दिखाते हैं, लेकिन शब्द मन की पूरी तस्वीर बनाते हैं।

#Emoji #Language #Bhasha #इमोजी #भाषा

सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...