शुक्रवार, 13 जून 2025

अब दो जून की नहीं, डिजिटल रोटी कहिए जनाब!!

वक्त बदल गया है और उसके साथ बदल गई है हमारी दो जून की रोटी। कभी वह गोल, मुलायम, माँ के हाथ की थी, जिसकी खुशबू से पेट के साथ-साथ तन मन भी भर जाता था। लेकिन अब तो रोटी भी स्टार्टअप हो गई है।

पहले रोटी केवल रोटी थी, अब वह ग्लूटेन-फ्री, कीटो-फ्रेंडली, ऑर्गेनिक, मल्टीग्रेन, प्रोटीन-लोडेड हो गई है। बाजार में अब एक रोटी के साथ इतने टैग लगे होते हैं कि लगता है, ये खाने की चीज कम, इंस्टाग्राम की रील ज्यादा है। पहले माँ प्यार से पुचकारती थी कि रोटी खा लो, ठंडी हो जाएगी लेकिन अब रोटी खुद बताती है कि मुझे माइक्रोवेव में गरम करो, वरना मज़ा नहीं आएगा।

और अब रोटी दो जून वाली नहीं रही बल्कि कीमती हो गई है। अब दो जून की रोटी कमाने के लिए अब चार पहर काम करना पड़ता है। पहले रोटी गेहूँ खेत से आए घर के गेहूं से बनती थी, अब रोटी सुपरमार्केट से आती है, और उसका दाम सुनकर लगता है जैसे रोटी गेहूँ की नहीं, सोने से बनी है । एक रोटी की कीमत में पहले पूरी थाली आ जाती थी मतलब दाल, चावल, सब्जी, और ऊपर से पापड़ अचार और सलाद फ्री। अब भरपेट रोटी ही मिल जाए तो बहुत है।

अब समय खाली पेट भरने का नहीं है बल्कि हेल्थ कॉन्शस भोजन का है इसलिए रोटी को अब कैलोरी काउंटर के साथ परोसा जाता है। पहले परिवार के बुजुर्ग कहते थे भरपेट रोटी खाने से ताकत मिलती है और अब नए जमाने के फिटनेस ट्रेनर कहते है कि रोटी खाओगे तो फैट बढ़ जाएगा। पहले रोटी हाजमा दुरुस्त रखती थी लेकिन अब पाचन तंत्र की दुश्मन बन गई है। बेचारी रोटी, जो कभी परिवार के प्यार का प्रतीक थी, अब विलेन बन गई। अब गेहूं की रोटी ज्वार, बाजरा, रागी के साथ नए नए अवतार ले रही है। लेकिन इसके लिए स्वाद भूलना होगा क्योंकि वो तो जैसे गेहूं की रोटी के साथ ही छुट्टी पर चला गया है।

अब रोटी भी डिजिटल हो गई है। ऑनलाइन ऑर्डर करो, मिनटों में डिलीवरी। लेकिन  8 मिनट में डिलीवरी की जल्दबाजी में रोटी गोल नहीं, त्रिकोण भी हो जाती है। कभी-कभी तो लगता है, रोटी नहीं, नक्शा डिलीवर हुआ है। और ऊपर से टैक्स अलग। जीएसटी, सर्विस चार्ज, डिलीवरी फी, प्लेटफार्म फीस, रेन चार्ज और टिप वगैरह मतलब रोटी खाने से पहले जेब खाली।

अब दो जून की रोटी सिर्फ पेट की भूख नहीं मिटाती, वो जेब, दिमाग और धैर्य की भी परीक्षा लेती है। पहले रोटी बनाना कला थी, अब रोटी खाना कमाना और खाना कला है। पता नहीं, माँ की वो गोल, गरम और मनुहार वाली स्वादिष्ट रोटी फिर कब लौट कर आएगी से लौट  कर आएगी तब तक ये नए जमाने की डिजिटल और मिलावटी रोटी हमें दो जून में नहीं महीने भर की कमाई में ही नसीब होती रहेगी।


वैसे, भारतीय संस्कृति की आत्मा और रसोई की शान हमारी प्रिय रोटी सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और मेहनत का प्रतीक है। तभी तो दो जून की रोटी जैसे लोकप्रिय मुहावरों ने जन्म लिया। बताया जाता है कि रोटी का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव सभ्यता का विकास। रोटी का इतिहास करीब 10,000 साल पुराना माना जाता है, जब मानव ने खेती शुरू की थी। सिंधु घाटी सभ्यता में भी गेहूँ और जौ की खेती के सबूत मिलते हैं। पुरातात्विक खुदाई में रोटी बनाने के लिए तवे और चूल्हे जैसे उपकरण मिले हैं। वैदिक काल में  भी रोटियों का विभिन्न नामों से जिक्र मिलता है।

मध्यकाल में बदलाव के साथ साथ रोटी भी क्षेत्रीय रंग में रंगती गई । उत्तर भारत में गेहूँ की रोटी, दक्षिण में चावल की रोटी और पश्चिम में बाजरे की भाखरी ने भारतीय खान पान में अपनी अमिट जगह बना ली थी । मुगलकाल में नान और पराठे जैसे व्यंजनों ने रोटी को शाही गरिमा प्रदान कर दी । तंदूर का आविष्कार भी इस दौर की देन माना जाता है जिसने फिर नान और तंदूरी रोटी को जन्म दिया। मसाले, घी और मेवों के साथ रूमाली, शीरमाल और कुलचा जैसे परिवर्तित रूप में रोटी सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि उत्सव का हिस्सा बनती गई।

ब्रिटिश काल में रोटी सिर्फ भोजन या पेट भरने का माध्यम नहीं, बल्कि आजादी की प्रतीक बन गई थी। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रोटी और कमल ने गांव गांव में आजादी की अलख जगाने में अहम भूमिका निभाई। यह रोटी की सामाजिक-राजनीतिक ताकत को दर्शाता है।

 अब मौजूदा दौर में रोटी ने नए-नए रूप धर लिए हैं। गेहूँ के साथ ज्वार, बाजरा, मक्का और रागी जैसी फसलों ने क्षेत्रीय स्वाद को बढ़ावा दिया। मसलन पंजाब की मक्के की रोटी, राजस्थान की बाजरे की रोटी और दक्षिण भारत की रागी रोटी ने पोषण और स्वाद का अनूठा मेल पेश किया और यह राज्यों की सीमाओं को पार कर देशव्यापी हो गईं। इसी तरह स्वतंत्र भारत में हरित क्रांति ने गेहूँ और रोटी हर घर की थाली में स्थायी जगह दे दी।

अब रोटी ने वैश्वीकरण की राह पकड़ ली है। ग्लूटेन-फ्री, कीटो और मल्टीग्रेन रोटियाँ स्वास्थ्य के प्रति जागरूक पीढ़ी की पसंद बन रही हैं लेकिन आम लोगों की हैसियत से दूर होती जा रहीं हैं। रोटी अब सिर्फ घर की रसोई तक सीमित नहीं है बल्कि यह रेस्तराँ के मेन्यू, ऑनलाइन डिलीवरी और यहाँ तक कि प्री-पैकेज्ड रूप में सुपरमार्केट में आन बान और शान से उपलब्ध है। फिर भी, माँ के हाथ की रोटी का स्वाद अब भी अतुलनीय है।

हमारे देश में रोटी सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। रोटी, कपड़ा और मकान जीवन की बुनियादी जरूरतों का पर्याय है। रोटी मेहनत, सादगी और एकजुटता का भी प्रतीक है। रोटी का इतिहास उतना ही समृद्ध और विविध है जितना भारत स्वयं। खेतों से लेकर तंदूर तक, गाँव की चूल्हों से लेकर मॉडर्न किचन तक, रोटी ने हर दौर में अपनी जगह बनाई। यह सिर्फ पेट नहीं, बल्कि दिलों को भी जोड़ती है। चाहे वह सादी चपाती हो या मसालेदार पराठा, रोटी हमारी संस्कृति की थाली में हमेशा गरम रहेगी।

#roti #रोटी #HungerHasNoReligion @highlight @followers

शान और सेहत की सवारी साइकिल

आज विश्व साइकिल दिवस है। हर साल 3 जून को यह दिवस मनाया जाता है। इस दिन उद्देश्य लोगों को साइकिल चलाने के प्रति जागरुक करना है। इतना तो हम सभी जानते हैं कि नियमित तौर पर साइकिल चलाना शरीर के लिए काफी फायदेमंद है। हमने भी कैंची से लेकर सीट तक भरपूर साइकिल चलाई है। मोटापा घटाने से लेकर शरीर की तंदुरुस्ती के लिए नियमित साइकिल चलाना वरदान है। जानकर कहते हैं कि रोजाना आधा घंटा साइकिल चलाने से हृदय रोग, मोटापा, मानसिक बीमारी, मधुमेह, गठिया रोग जैसी कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है। 

 3 जून, 2018 के दिन पहली बार विश्व साइकिल दिवस मनाए जाने की घोषणा की गई। इसके बाद से हर साल 3 जून के दिन विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। आज के समय मोटर वाहनों को बढ़ते उपयोग के कारण वातावरण में प्रदूषण काफी बढ़ रहा है। इस कारण वातावरण को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए साइकिल का उपयोग जरूरी हो गया है।  इस साल विश्व साइकिल दिवस की थीम एक सतत भविष्य के लिए साइकिल चलाना है।

तो आइए, हम भी नियमित साइकिल चलाने का प्रयास करें और साइकिल न भी चला पाएं तो कम से कम कार चलाते समय साइकिल सवार लोगों का सम्मान जरूर करें।

#WorldCycleDay 

#विश्वसाइकिलदिवस

भगवान न्यूज चैनलों को सद् बुद्धि दे!!

इन दिनों यदि आप कोई भी न्यूज चैनल देख रहे हैं और उस पर प्रसारित खबरों से आपका बीपी न बढ़े, आपको गुस्सा न आए और आप झटके से टीवी बंद न करें..ऐसा हो ही नहीं सकता। इसके बाद आपका मन करता है उस चैनल के खिलाफ भड़ास निकालने का लेकिन या तो हम लिख नहीं पाते या शायद अभिव्यक्ति का मंच नहीं मिल पाता और वह गुस्सा मन ही मन में रह जाता है लेकिन यदि मौका मिला तो वह खुलकर बाहर भी आ जाता है। 

शायद, यही कारण है कि जैसे ही वरिष्ठ पत्रकार सुधीर निगम ने सोशल मीडिया मुखपोथी पर न्यूज चैनलों के मौजूदा रवैये पर प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हुए लिखा कि ‘नीचता की पराकाष्ठा क्या होती है? घटियापन की इंतहा क्या होती है। जानना चाहते हैं, तो न्यूज चैनल देखिए’…तो उस पर प्रतिक्रियाओं की लाइन लग गई।

ऐसा लगा जैसे तमाम पत्रकार, चिंतक, विचारक या न्यूज चैनलों के सतत् पराभव से चिंतित आम लोग ऐसी किसी कठोर और खरी खरी पोस्ट का इंतजार कर रहे थे। न्यूज चैनलों की हठधर्मिता, अमानवीयता और दुःख को बेचने की हरक़त के खिलाफ अधिकतर लोगों में नाराजगी नई बात नहीं है और खासतौर पर समाज का बौद्धिक तबका तो कथित मीडिया की नौटंकी और बेहूदगी से कुलबुला और खलबला रहा है। 

पहलगाम से लेकर ऑपरेशन सिन्दूर तक और अब सोनम राजा की दुखद कहानी के जरिए मीडिया का यह हिस्सा नैतिकता और सामाजिकता की तमाम सीमाओं को बेशर्मी से रौंद रहा है। 

टीआरपी और उस पर आधारित विज्ञापनों की कमाई ने उसे अंधा/बहरा बना दिया है। गूंगा इसलिए नहीं क्योंकि उसकी बकवास ही उसका यूएसपी है इसलिए उनके लिए नाग नागिन और सोनम राजा की खबर एक समान है। 

सुधीर निगम जी की पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ पत्रकार रितेंद्र माथुर ने लिखा कि  ‘टीवी चैनलों में कोई सामाजिक सरोकार नहीं है। वे कुछ भी हरकत कर रहे हैं। हमेशा से अपनी टांगें ऊंची रखने के चक्कर में ये सामाजिक मर्यादाओं का दमन करते आ रहे हैं।’ राजेश कुमरावत ने इस बात को आगे बढ़ाते हुए अत्यंत मार्मिक राय व्यक्त करते हुए लिखा कि ‘जब किसी माँ की कोख शोक से कांप रही हो और उसे ‘बहस’ के नाम पर दूसरी माँ के सामने मंच पर खड़ा कर देना — यह केवल पत्रकारिता की नालायकी नहीं, बल्कि अमानवीयता की पराकाष्ठा है।’ उन्होंने कहा कि ‘हमें फिर से एक विवेकशील, मानवीय और गरिमामय पत्रकारिता के पक्ष में खड़ा होना होगा। वरना, कल को किसी और की माँ यूं ही चैनलों की बहस में अपमानित होती रहेगी और हम दर्शक बने केवल आँखे फाड़ते रहेंगे।’ 

वरिष्ठ मीडिया विशेषज्ञ डॉ राकेश पाठक ने कहा कि ‘नीचता से भी निम्न कोई शब्द हो तो उसका प्रयोग करना चाहिए।’ तो लेखक पत्रकार रत्नाकर त्रिपाठी ने बाइट वीरों की कारगुज़ारियों की गंदगी की पराकाष्ठा से तुलना करते हुए लिखा कि ‘मैला देखिएगा तो उबकाई ही आएगी।’ वरिष्ठ पत्रकार दिनेश निगम त्यागी ने चर्चा पर सहमति जताते हुए लिखा कि ‘भगवान भी इनसे हार चुका है । इनका कुछ नहीं हो सकता। ये पतन की पराकाष्ठा पर हैं।’

दिलचस्प बात यह है कि ये सभी पत्रकारिता की नामचीन शख्सियत हैं और मीडिया की तमाम विधाओं को अपने अनुभव से संवार रहे हैं। मीडिया की मौजूदा दशा पर पत्रकारों की चिंता विचारणीय है। दूसरे व्यवसाय के लोग उंगली उठाएं तो ज्यादा चिंता की बात नहीं है लेकिन जब आपत्ति परिवार के अंदर से उठने लगे तो अपने गिरेबान में झांककर देखना जरूरी है। 

आखिर, टीआरपी के लिए ऐसी भी क्या मारामारी की आप उस पेशे के उसूल, पाबंदियां, नियम, नीतियां और नैतिकता सब भूल जाएं और देश ही नहीं दुनिया के मीडिया संस्थान आपका माखौल उड़ाएं। अमेरिका का लोकप्रिय अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारे टीआरपी उस्तादों  की बखिया उधेड़ चुका है। बीबीसी आए दिन पोल खोलता रहता है और अब तो पाकिस्तानी मीडिया भी हमारे न्यूज चैनलों की खिल्ली उड़ाता है। 

जो बात वरिष्ठ पत्रकारों, विचारकों, विदेशी एवं पड़ोसी मीडिया और आम लोगों को समझ में आ रही है वह इन मीडिया हाउस के ठेकेदार नहीं समझ पा रहे क्या? क्या, उन्हें स्व नियमन से ज्यादा सरकारी शिकंजे का इंतज़ार है? या मीडिया में उसूलों के पैरोकार प्रेस काउंसिल जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की धार बोथरी हो गई है? या फिर मीडिया शिक्षा के संस्थान विद्यार्थियों को नैतिक पत्रकारिता की पढ़ाई कराना भूल गए हैं? 

वजह जो भी हो..इस पर संवाद जरूरी है ताकि कम से कम पत्रकारों की नई जमात इन बातों/प्रतिक्रियाओं से कुछ सीख ले सके वरना वे भी इसी राह पर चल पड़े तो भगवान ही मालिक है।

मुझे लगता राष्ट्रीय स्तर पर संभव न हो तब भी स्थानीय, जिला, तहसील, संभाग, नगर, सामाजिक ग्रुप, पत्रकार फोरम, कॉफी हाउस, मीडिया संगठनों, मीडिया संस्थानों और ऐसे ही अन्य मंच जहां चार छह साथी मिलते जुलते हैं..पर चर्चा शुरू करनी चाहिए क्योंकि स्थानीय प्रतिक्रिया ही व्यापक बदलाव का मार्ग प्रशस्त करेगी और धीरे धीरे ही सही इन ‘मीडिया मुगल’ को अपनी बिरादरी की और आम लोगों की बात सुननी ही पड़ेगी अन्यथा टीआरपी की यह अंधी  दौड़ और भी गर्त में ले जा सकती है। 

फिलहाल तो यही होता दिख रहा है। तभी शायद सुधीर भाई को अपनी पोस्ट के अंत में भगवान से प्रार्थना करते हुए लिखना पड़ा कि ‘भगवान इन कमीनों को सद्बुद्धि दे, जिसकी उम्मीद कम है!!’

#मीडिया #media  #news #NewsUpdate  @Eveeyone @followers @highlight


किन्नर समुदाय का रचनात्मक इंद्रधनुष है पुस्तक ‘पूर्ण इदम’ !!

‘पूर्ण इदम’ का अर्थ है संसार की तमाम संरचनाओं की तरह यह भी पूर्ण है। ‘पूर्ण इदम: सकारात्मक किन्नर विमर्श का संचय’ नामक किताब किन्नर समुदाय पर एक अनूठा और विचारोत्तेजक संकलन है जो समुदाय की जटिल जिंदगियों, उनकी आंतरिक और बाहरी यात्रा,उनके सुख-दुख और भारतीय समाज में उनकी स्थिति को गहनता से प्रस्तुत करता है। किताब का शीर्षक उपनिषदों के दर्शन से प्रेरित है, जो किन्नर समुदाय की संपूर्णता और मानवीय गरिमा को रेखांकित करता है। 

किताब में लेखों, कविताओं,नाटक, संस्मरण,कहानियों, लघुकथाएं और साक्षात्कारों का मिश्रण न केवल किन्नर समुदाय के अनुभवों को उजागर करता है, बल्कि पाठकों को उनके प्रति सहानुभूति और समझ विकसित करने के लिए प्रेरित करता है।

वैसे,यदि हम किन्नर समुदाय पर उपलब्ध कुछ चर्चित पुस्तकों का उल्लेख करें तो इनमें राहुल सांकृत्यायन की ‘किन्नर देश में’, डॉ बंशीराम शर्मा की ‘किन्नर साहित्य’, प्रदीप सौरभ की ‘तीसरी ताली’ और  महेंद्र भीष्म की ‘मैं पायल हूं’ प्रमुख हैं। इसके अलावा, डॉ मधु शर्मा की ‘किन्नर की कन्या’, ए रेवंती की ‘द ट्रुथ अबाउट मी: ए हिजड़ा लाइफ स्टोरी’ और सुप्रसिद्ध लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की पुस्तक ‘मी हिजड़ा, मी लक्ष्मी’ भी काफी चर्चा में रही हैं। लेकिन ये सभी किताबें किसी एक विधा या शैली में हैं जबकि ‘पूर्ण इदम’  किन्नर समुदाय के मनोभाव को साहित्य की तमाम विधाओं में अभिव्यक्त करती है और यही इस पुस्तक की विशिष्टता है।

‘पूर्ण इदम’ किताब का पहला खंड साक्षात्कार पर केंद्रित है। दूसरा भाग आलेखों और तीसरा नाटक,चौथा संस्मरण, पांचवा कहानी, छठवां लघुकथा और सातवां कविताओं पर केंद्रित है, जिसमें सामाजिक विशेषज्ञों, कार्यकर्ताओं और अन्य विद्वान सदस्यों द्वारा लिखी गई रचनाएं शामिल हैं। ये रचनाएं किन्नर समुदाय के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य को कवर करते हैं। 

अंतिम परिशिष्ट में किन्नर समुदाय के उन विशिष्ट दिग्गजों का उल्लेख है जिन्होंने समाज की तमाम बाधाओं को पार कर अपने लिए सम्मानजनक स्थान बनाया है।

साक्षात्कार खंड किताब का सबसे जीवंत और व्यक्तिगत जानकारियों से भरा हिस्सा है। इसमें किन्नर समुदाय की सबसे महत्वपूर्व शख्सियतों के साथ आत्मीय बातचीत शामिल है। पहले साक्षात्कार में, किन्नर महामंडलेश्वर संजना सखी से बातचीत पाठकों को किन्नर समुदाय की आंतरिक गतिशीलता की गहरी समझ देता है। इसमें उनके संघर्ष,सफलता और सहजता का जीवंत चित्रण पढ़ने को मिलता है। संजना सखी ने अपने परिश्रम से निर्वाचन आयोग की स्टेट आइकन सहित शीर्ष उपलब्धियां हासिल की हैं। वहीं,एक अन्य साक्षात्कार में, किन्नरों की सबसे चर्चित हस्ती,उनकी सबसे प्रमुख पैरोकार और किन्नर अखाड़े की महामंडेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी से मुलाकात को रोचक और बहुत ही दिलचस्प ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

‘पूर्ण इदम’ का काव्य खंड इस संकलन का भावनात्मक और कलात्मक हिस्सा है। इस खंड की करीब 24 कविताएँ किन्नर समुदाय की आत्म-पहचान, सामाजिक संघर्ष, और आध्यात्मिक खोज को सहजता से अभिव्यक्त करती हैं। साक्षात्कार,लेखों,कहानियों और कविताओं की भाषा संतुलित और तथ्यात्मक है, जो पाठकों को बौद्धिक रूप से आकर्षित करती है।

‘पूर्ण इदम’ की सबसे बड़ी ताकत इसकी समावेशिता और संवेदनशीलता है। यह किन्नर समुदाय को केवल पीड़ित के रूप में नहीं, बल्कि सशक्त, रचनात्मक, और समाज का अभिन्न हिस्सा दिखाती है। लेख, कविताएँ, लघुकथा, कहानियां और साक्षात्कार का मिश्रण एक समग्र अनुभव प्रदान करता है, जो बौद्धिक, भावनात्मक, और सामाजिक स्तर पर प्रभाव छोड़ता है। 

किताब का दार्शनिक शीर्षक ‘पूर्ण इदम’ किन्नर समुदाय की संपूर्णता को स्वीकार करने का संदेश देता है, जो सामाजिक जागरूकता और समावेशिता को बढ़ावा देता है। किताब का आकर्षक कवर और साफ सुथरी छपाई भी इसका आकर्षण बढ़ाती है। बस, यदि किताब के फ़ॉन्ट, प्वाइंट साइज और डिजाइन को और बेहतर किया जाता तो इसमें वाकई चार चांद लग जाते। हो सकता है समय सीमा ने हाथ बांध दिए हों।

‘पूर्ण इदम’ एक ऐसी किताब है जो किन्नर समुदाय के प्रति समाज की धारणाओं को चुनौती देती है और उनकी मानवीय गरिमा, रचनात्मकता और सशक्तिकरण को उजागर करती है। 188 पृष्ठों में और 60 अलग अलग खुशबू के फूलों से बनी यह माला साहित्य प्रेमियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और उन सभी के लिए एक अनमोल सौगात है जो लैंगिक विविधता और सामाजिक समावेशिता को समझना चाहते हैं। यह किताब न केवल जागरूकता बढ़ाती है, बल्कि पाठकों को किन्नर समुदाय के प्रति सहानुभूति और सम्मान विकसित करने के लिए प्रेरित भी करती है।

पुस्तक: पूर्ण इदम: सकारात्मक किन्नर विमर्श का संचय 

सम्पादक: डॉ मीनू पाण्डेय ‘नयन’

प्रकाशक: भव्या पब्लिकेशन

पेज:188

मूल्य: 250 रुपए 

शुक्रवार, 30 मई 2025

हिंदी पत्रकारिता दिवस: गौरवशाली अतीत का गुणगान

आज 30 मई को  ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ है..हमारे गौरव और गर्व का दिन। यह ‘उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड’ से हिंदी पत्रकारिता का परचम लहराने वाले पंडित युगल किशोर शुक्ल जैसे महारथियों और उनके बाद इस गौरवशाली विरासत और परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजने/संवारने और विकसित करने वाले तमाम दिग्गज संपादकों और पत्रकारों का पुण्य स्मरण करने का दिन है। इस पवित्र पेशे की गुणवत्ता को कायम रखने वाले ‘नींव के पत्थरों’ से मौजूदा पीढ़ी को बताने का दिन है। 

इसके पहले कि आप में से कोई यह टिप्पणी करें कि ‘उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड’ के ध्वजवाहक का नाम युगल किशोर शुक्ल नहीं बल्कि जुगल किशोर शुक्ल था तो आपकी जानकारी के लिए मैं यहां पद्मश्री से सम्मानित और अपनी तरह के इकलौते माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान, भोपाल के संस्थापक और वरिष्ठ पत्रकार विजय दत्त श्रीधर का स्पष्टीकरण उद्धृत करना चाहूंगा। उन्होंने अपनी एक पोस्ट में बताया है कि “बांग्‍ला में ‘य’ का उच्‍चारण ‘ज’ होता है। इसलिए उन्‍हें पं. जुगल किशोर शुक्‍ल भी कहा जाता है।” मुझे भी इस अनूठे संस्थान के परामर्श मंडल का सदस्य होने का गौरव हासिल है।

शायद, कम लोग जानते होंगे कि हमारी हिंदी पत्रकारिता अब 200 साल की मजबूत बुनियाद पर डटी है। 30 मई, 1826 को कोलकाता से शुरू हुई इस पावन यात्रा ने आज 199 साल पूरे कर लिए हैं और अब द्वि शताब्‍दी वर्ष का आग़ाज़ हो गया है। दो सौ सालों का सफर कोई छोटी बात नहीं है। कितनी पीढ़ियों के परिश्रम से यह वट वृक्ष अपनी विशालता एवं हरियाली के साथ करोड़ों पाठकों का सूचना और सुरक्षा कवच बना है।  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक और चैट जीपीटी से लेकर ग्रोक तक कितने भी झंझावात आते रहे हों लेकिन हिंदी की प्रिंट पत्रकारिता मजबूती से डटी हुई है और इस स्वर्णिम विरासत का मस्तूल आज भी कई दिग्गज पूरे भरोसे से थामकर आगे बढ़ रहे हैं।

अपने लिए तो हिंदी,पत्रकारिता और हिंदी पत्रकारिता…ये नाम नहीं, रोजी रोटी का जरिया है इसलिए ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ अपने लिए मई दिवस भी है और दीपावली भी और होली भी…सभी संगी साथियों को असंख्य बधाइयां। यदि हिंदी भाषा और पत्रकारिता की पढ़ाई, पेशा और फिर उसके माध्यम से कुछ और सीढियां चढ़ते को नहीं मिलती तो न यह पहचान मिलती और न ही सम्मान और न ही वर्तमान की पहचान परवान चढ़ पाती।


‘ये चमक,ये दमक

फुलवन मा महक

सब कुछ सरकार तुम्हई से है।’


‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ की बधाई


मंगलवार, 27 मई 2025

तो हो जाए…एक कप अदरक इलायची वाली चाय!!

चाय केवल पेय नहीं, बल्कि संस्कृति एवं परंपरा है!!
चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि एक भावना है, संस्कृति है, इतिहास है, अर्थव्यवस्था है और सबसे बढ़कर मेलजोल का पुल है। यह वह पुल है जो हमारी सामाजिकता को बरकरार रखता है। जब हम सुबह की ताजगी के लिए चाय का एक घूंट लेते हैं, या शाम की थकान को दोस्तों के साथ चाय की चुस्कियों में भूल जाते हैं। 

यह एक ऐसा पेय है जो मौसमीय बदलावों से परे है। ठंड में गर्म चाय का प्याला तन मन को ऊर्जा एवं गर्माहट से भर देता है तो गर्मी में वही गर्म प्याला ‘लोहा लोहे को काटता है’ वाले अंदाज में गर्माहट को कम कर देता है और बारिश में पकौड़ों के साथ अदरक वाली चाय के तो क्या कहने। चाय सुबह, दोपहर, शाम, रात, खाने के पहले,भोजन के बाद, सोने से पहले,उठने के बाद...कभी भी, कहीं भी पी जा सकती है। 


ताज जैसी फाइव स्टार होटल में एक प्याला चाय किसी मिडिल क्लास रेस्त्रां के लंच के बराबर कीमत की पड़ती है तो टपरी की चाय के स्वाद का अलग ही आनंद है। कई शहरों में लोकप्रिय कट चाय किफायती भी है और दोस्तों की कंपनी देने वाली भी। यह रंग रूप भी बदलती है, स्वाद भी,अंदाज भी और सेहत से जुड़े फायदे भी इसलिए दूध वाली सफेद, काली, लाल, हरी चाय, सुलेमानी, मलाई मार के जैसी परंपरागत चाय के साथ अब तो तमाम नई किस्में उपलब्ध हैं और उतने ही ज्यादा स्वाद भी।

इसलिए, सबसे पहले गरमागरम चाय की चुस्की के साथ अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस की शुभकामनाएँ। हर साल आज के दिन यानि 21 मई को अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस (International Tea Day) मनाया जाता है, जो न केवल इस पेय की महिमा का उत्सव है, बल्कि इसके पीछे छिपी सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक कहानियों का भी सम्मान करता है।  


चाय, जिसे भारत में ‘चाय’ और दुनिया के कई हिस्सों में ‘टी’ के नाम से जाना जाता है, सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि एक जीवनशैली, परंपरा और आत्मीयता का प्रतीक है। वैसे तो, चाय की कहानी हजारों साल पुरानी है, जो चीन से शुरू होकर विश्व के कोने-कोने तक फैली लेकिन भारत में चाय ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान लोकप्रिय हुई और आज यह देश की आत्मा का हिस्सा है। असम, हिमाचल प्रदेश, दार्जिलिंग और नीलगिरी जैसे विविध इलाकों की चाय ने विश्व स्तर पर अपनी सुगंध और स्वाद से अलग पहचान एवं प्रतिष्ठा बनाई है। 

चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि संस्कृतियों को जोड़ने का माध्यम है। भारत में सुबह की चाय परिवार के साथ बातचीत का बहाना है, तो दोस्तों के साथ चाय पर चर्चा विचारों का आदान-प्रदान। चाय गप्प मारने का जरिया है तो कभी खुद को रिचार्ज करने वाला ईंधन। 

चाय उद्योग लाखों लोगों के लिए आजीविका का स्रोत है। भारत, चीन, श्रीलंका, और केन्या जैसे देशों में चाय की खेती और उत्पादन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। विशेष रूप से भारत में, असम और दार्जिलिंग के चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की मेहनत इस उद्योग को जीवंत रखती है।  यह तो हम सभी जानते ही हैं कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है। 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में चाय का उत्पादन 13 लाख टन के आसपास पहुंच चुका है।


देश की कुल चाय उत्पादन में असम और पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी भारी है, लेकिन हर चाय प्रेमी जानता है कि भारतीय चाय की विविधता ही उसकी खासियत है मसलन असम की बड़े बागानों वाली, दार्जिलिंग की फूलों-सी महक वाली, नीलगिरी की ताज़गी भरी और... हिमाचल की अनोखी कांगड़ा चाय। हिमाचल की चाय में पहाड़ों की खुशबू है तो बादलों का प्यार भी क्योंकि यहां बादल चाय की पत्तियों से बातें करते हैं। खासतौर पर कांगड़ा की चाय तो दुनिया भर में अपने अनूठे स्वाद के जादू के लिए मशहूर है। 1849 में डॉ. जेम्सन ने यहां चाय की खेती की शुरुआत की थी। 

आज कांगड़ा चाय को GI टैग हासिल है। एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर यह चाय हिमाचल में करीब ढाई हजार हेक्टेयर क्षेत्र  उगाई जाती है और  सालाना उत्पादन 8-10 लाख किलो तक पहुंच गया है।कांगड़ा की चाय की लोकप्रियता का कारण यहां की आवोहवा है।पहाड़ी मिट्टी, ऊंचाई पर मौजूद चाय बागान, ठंडी हवाएं और शुद्ध पानी मिलकर कांगड़ा चाय को अनोखा स्वाद देते हैं।

चाय न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक भी है। ग्रीन टी, ब्लैक टी, और हर्बल टी में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो तनाव कम करने, हृदय स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करते हैं। आयुर्वेद में भी चाय को विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर उपयोग किया जाता है। हालांकि, चाय का सेवन संतुलित मात्रा में जरूरी है, क्योंकि अधिक चाय पीने से इसमें मौजूद कैफीन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। 

अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस हमें इस साधारण पेय के पीछे की असाधारण कहानियों को याद करने का अवसर देता है। यह हमें उन मेहनती हाथों का सम्मान करने का मौका देता है जो चाय की पत्तियों को हमारे कप तक पहुंचाते हैं। यही वह दिन है जब पूरी दुनिया खासतौर पर एक कप चाय के इर्द-गिर्द इकट्ठा होती है। न सिर्फ चुस्की लेने के लिए, बल्कि उन लाखों हाथों को सलाम करने के लिए जिन्होंने इस जादुई पत्ती को उगाया, तोड़ा और हमारी प्याली तक पहुंचाया। 

अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस टिकाऊ खेती, उचित मजदूरी और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों को भी प्रोत्साहित करता है। आइए, इस अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस पर एक कप चाय के साथ नई शुरुआत करें। यह कप न केवल स्वाद से भरा हो, बल्कि परस्पर प्रेम, एकता,सहयोग और सतत संवाद के संदेश से भी भरा हो। तो, उठाइए अपनी पसंदीदा चाय का कप..चियर्स!!

सौ रुपए में मूक संवाद..!!

सरहद पर स्थित एक कस्बे में एक व्यक्ति रोज अपने शहर के एटीएम में जाता और  मात्र ₹100 निकालकर वापस लौट आता। उसका यह सिलसिला लगभग रोज चलता रहा । उस एटीएम में तैनात गार्ड को भी आश्चर्य होता कि यह व्यक्ति रोज केवल ₹100 निकालने आता है जबकि वह चाहे तो सामान्य लोगों की तरह एक बार में अपनी जरूरत की राशि निकाल सकता है और बार-बार एटीएम आने से भी बच सकता है, लेकिन अपनी नौकरी की सीमाओं के कारण वह चुपचाप देखता रहता है और कुछ नहीं पूछता। 

उस व्यक्ति के रोज आने की वजह से स्वाभाविक तौर पर उनमें नमस्कार जैसा शुरुआती संवाद भी होने लगा । जब उस व्यक्ति के एटीएम आने का यह सिलसिला एक पखवाड़े से भी ऊपर तक चलता रहता है तो गार्ड का धैर्य जवाब दे गया और उसकी जिज्ञासा हिलोरे मारने लगी । अंततः गार्ड ने एक दिन उस व्यक्ति को रोककर पूछ ही लिया  कि साहब,मैं, कई दिन से देख रहा हूं कि आप प्रतिदिन एटीएम आते हैं और केवल ₹100 निकाल कर चले जाते हैं जबकि आप चाहे तो एक ही बार में आपकी जरूरत का पैसा निकाल सकते हैं।

 गार्ड के सवाल पर उस व्यक्ति ने मुस्करा कर जो जवाब दिया उससे गार्ड की आँखें भी नम हो गईं। उस व्यक्ति ने बताया कि मैं फौजी हूं और अभी इस इलाके में सीमा की पहरेदारी करने आया हूं। जहां तैनात हूं वहां से फोन करना सुरक्षित नहीं है और फोन के सिग्नल मिलना और भी मुश्किल।  परंतु इस बैंक खाते से जुड़ा मोबाइल मेरी पत्नी के पास है और मेरे ₹100 निकालने के साथ ही प्रतिदिन बैंक के मैसेज से पत्नी को यह सूचना मिल जाती है कि मैं सुरक्षित हूं और जीवित भी । 

सोचिए, संवाद का यह कितना अद्भुत तरीका है। बिना कुछ कहे और बिना कुछ सुने अपने लोगों को खुद के सुरक्षित होने की जानकारी दे देना ।  कुछ समय पहले, ऐसी ही एक कहानी और पढ़ने को मिली थी जिसमें मैसेज से जीवन के होने या न होने का सार छिपा था । दरअसल, एक बड़े शहर की एक संभ्रांत कॉलोनी में एकाएक एक बुजुर्ग महिला की मृत्यु हो जाती है और तुरंत ही उस कॉलोनी के लोग विदेश में बसे उसके बेटे को खबर भेज देते हैं । अंतिम संस्कार की तमाम औपचारिकताओं के बाद बेटा उस कॉलोनी के लोगों से पूछता है कि मैं भी मां के नियमित संपर्क में रहता हूं लेकिन आपको इतनी जल्दी कैसे पता चल गया कि मेरी मां अब इस दुनिया में नहीं रहीं। तो इसके उत्तर में कॉलोनी के लोगों ने जो बात बताई वह आज नहीं तो कल हम सबके जीवन में लागू होने लायक है। 

उन्होंने कहा कि हमने अपनी कॉलोनी के सभी बुजुर्गों का एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया हुआ है। इस ग्रुप का सबसे सख्त, कठोर या कहें कि अनिवार्य नियम यह है कि आप कितने भी व्यस्त हों लेकिन आपको हर घंटे में ग्रुप में एक मैसेज अवश्य करना है। जरूरी नहीं है कि वह मैसेज कोई ज्ञान, फोटो, विचार या कुछ और हो । आप केवल हेलो लिखकर, हाय लिखकर या फिर कोई इमोजी डालकर भी मैसेज भेज सकते हैं । यदि उस घंटे में किसी बुजुर्ग का मैसेज नहीं आता है तो तत्काल हमारे साथी उनके घर जाकर उनका हाल-चाल पूछते हैं। इससे फायदा यह है कि हम हर घंटे एक दूसरे की सेहत की निगरानी करते रहते हैं। यदि कोई बीमार है तो उसे तत्काल अस्पताल पहुंचा दिया जाता है। बस, इसी नियमित मैसेजिंग प्रक्रिया के कारण आपकी मां की मृत्यु का समाचार हम तत्काल आप तक पहुंचा पाए।  

 हो सकता है किसी को सुनने में यह बेफिजूल की कहानी लगें लेकिन असल जिंदगी में ये उदाहरण बहुत मायने रखते हैं।  महज एक मैसेज के जरिए आप किसी की जिंदगी में अपनी मौजूदगी दर्ज कर सकते हैं या उसकी जिंदगी बचा भी सकते हैं । इसलिए यदि कोई आपको सुबह गुड मॉर्निंग जैसा कोई फॉरवर्ड मैसेज भी भेजता है तो उसे डाटा या समय की बर्बादी समझकर उस पर अपनी खीज निकालने की बजाए यह सोचिए कि उस व्यक्ति के लिए आपकी कितनी अहमियत है। तभी तो वह सबसे पहले अपने दिन की शुरुआत आपको शुभकामना संदेश भेजकर कर रहा है।

 इस छोटे से मैसेज के जरिए वह न केवल आपके सेहतमंद होने की कामना कर रहा है बल्कि अपने खुद के सेहतमंद होने की जानकारी भी दे रहा है। अब जबकि, हम सब अपने अपने दायरे में इतने सिमट गए हैं कि जन्मदिन और त्यौहारों जैसे जीवन के तमाम शुभ अवसरों पर परस्पर एक दूसरे के घर जाने की बजाय या फोन पर बात करने के स्थान पर रेडीमेड मैसेज का सहारा लेने लगे हैं तो ऐसी सूरत में यदि वाकई कोई आपकी चिंता कर रहा है तो आपको उसकी सराहना तो करनी ही चाहिए बल्कि कुछ इसी तरह की सार्थक पहल को आगे बढ़ाना भी चाहिए ताकि छोटे-छोटे समूह में ही सही हम एक दूसरे से या एक दूसरे के हालात से अनजान न रहे। 

कहीं, ऐसा न हो कि किसी के चले जाने के बाद आपको पता चले और फिर आप ताउम्र यह अफसोस मनाते रहे कि काश,समय से पता चल जाता तो हम कुछ कर पाते…संवाद करिए,जुड़िए,जोड़िए क्योंकि बचपन से पढ़ाया जा रहा है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए समाज में रहिए और सामाजिक बनिए भी। 

रविवार, 18 मई 2025

क्या है मध्यप्रदेश की पहचान…पोहा जलेबी या कुछ और !!

लिट्टी चोखा कहते ही हमारे सामने बिहार की छवि उभर आती है। वही, बड़ापाव बोलते ही महाराष्ट्र याद आने लगता है। इडली-बड़ा या डोसा सुनते ही तमिलनाडु से लेकर आंध्र प्रदेश तक तस्वीर सामने आ जाती है और मोमोज सुनते ही पूर्वोत्तर की झलक मिल जाती है… लेकिन, क्या हमारे अपने प्रदेश मध्य प्रदेश का ऐसा कोई खानपान है जिसका नाम लेते ही पूरे प्रदेश की तस्वीर उभर कर सामने आ जाती हो? दरअसल, यह प्रश्न हाल ही में सामने आया जब हमारे प्रदेश की यात्रा पर आए एक परिचित ने पूछा कि जिसतरह हर राज्य के कुछ खान-पान,कपड़े, हस्तशिल्प या अन्य सामग्री वहां की पहचान है तो मध्य प्रदेश की पहचान क्या है? सवाल जरूरी भी है और मौजू भी। 

आखिर, हर राज्य की अपनी एक पहचान होती है और होनी भी चाहिए।  यह पहचान उस राज्य की संस्कृति, परंपरा और मोटे तौर पर वहां के उत्पादों की झलक पेश करती है । अब कुछ लोग कह सकते हैं कि हम भी ‘दाल बाफले’ को अपने प्रदेश की पहचान के तौर पर प्रस्तुत कर सकते हैं। निश्चित तौर पर, दाल बाफले लोकप्रिय व्यंजन है लेकिन इसकी लोकप्रियता मालवा क्षेत्र में ज्यादा है जबकि बुंदेलखंड, बघेल या अन्य क्षेत्र में लोग दाल बाफले को लेकर उतने लालायित नहीं दिखते। यहां बाफले की जगह दाल के साथ बाटी ज्यादा पसंद की जाती है। 

कुछ लोगों ने पोहा को मध्य प्रदेश की पहचान बताई। हालांकि, यह बात सौ फीसदी सच है कि पोहा मध्य प्रदेश में जबरदस्त लोकप्रिय है लेकिन तकनीकी रूप से यह मध्य प्रदेश की बजाय महाराष्ट्र की पहचान है। यह मूल रूप से महाराष्ट्र से चलकर हमारे प्रदेश में आया है। यह बात जरूर है कि हमने पोहा के साथ जलेबी की जोड़ी बनाकर ‘पोहा-जलेबी’ को अपनी पहचान बना लिया है। यही कारण है कि प्रदेश के लगभग हर शहर की नींद सुबह पोहा जलेबी के साथ ही खुलती है। भले ही पोहे का रूप इंदौर से लेकर जबलपुर तक बदलता रहता हो। जलेबी के साथ भजिया (पकौड़े) भी पोहे के बाद लोकप्रियता में दूसरे स्थान पर हैं। आलूबड़ा/ आलूगोंडा पहले ही पाव के घर बसाकर महाराष्ट्र का हो चुका है और अब तो बड़ा पाव, भाजीबड़ा, मिसल पाव जैसे कई स्वादों में राज्यव्यापी है। 

उधर, समोसा तो राज्यों की सीमा को पार कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रुतबा हासिल कर चुका है। अब तो यह आलू जैसे अपने स्थायी साथी के अलावा चाइनीज, मिठाई, मीट,मैगी के साथ जोड़ी बनाकर बहुरूपिया हो गया है।बुरहानपुर की मशहूर जलेबी, मालपुआ, या इंदौर के रतलामी सेव भी मध्यप्रदेश की एक स्वादिष्ट पहचान के विकल्प हो सकते है लेकिन ये भी राज्यव्यापी न  होकर क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व ज्यादा करते हैं।  

कुछ लोगों ने कहा कि गोंड, भील और सहारिया जैसे आदिवासी हमारी मूल पहचान है इसलिए इनके खानपान को मध्य प्रदेश की मूल पहचान बनाया जा सकता है। यह सुझाव अच्छा है लेकिन अब तो आदिवासी समाज भी आधुनिकता के रंग में रंगने लगा है और उनका खानपान बस मेलों-ठेलों की रौनक बनकर रह गया है। इसके अलावा, आदिवासी भोजन के ऑथेंटिक रेस्त्रां की कमी, सभी जगह सहज उपलब्धता जैसे तमाम कारण हैं जिनकी वजह से यह पूरे राज्य का प्रतिनिधि भोजन नहीं बन पा रहे हैं।

तो, सोचिए..आप भी दिमाग दौड़ाइए और बताइए कि क्या हो हमारे प्रदेश की पहचान…जो स्वादिष्ट भी हो,विशिष्ट भी,लोकप्रिय भी और लिट्टी या इडली की तरह सर्वसुलभ और सबसे जरूरी पॉकेट फ्रैंडली भी!! एक खास बात और, आपकी सोच का दायरा बस स्नैक्स/नाश्ते तक सीमित मत रखिए बल्कि सम्पूर्ण भोजन तक विस्तारित कीजिए😋😋


बुधवार, 14 मई 2025

अपनों और अपनेपन का अहसास कराती है ‘आरसी अक्षरों की’

कविता महज कुछ शब्दों को लिपिबद्ध करना या मन में आए विचारों को लयात्मक रूप देना भर नहीं है बल्कि यह समाज के प्रति जिम्मेदारी है। कविता के जरिए या कहें की साहित्य की किसी भी विद्या के जरिए रचनाकार समाज से रूबरू होने और समाज को आइना दिखाने जैसे दोनों ही काम करते हैं । कभी वह अपने लेखन से समाज को उसकी असलियत से वाकिफ  कराता है तो कभी समाज में व्याप्त रूढ़ियों को सामने लाकर बदलाव का वाहक बनने का प्रयास करता है।


सत्तर के दशक में जन्मी हमारी पीढ़ी इस मामले में सौभाग्यशाली है कि उसने सामाजिक परंपराओं को भी जिया है तो सतत बदलाव की प्रक्रिया की साक्षी भी रही है। इस पीढ़ी को कंडे और चूल्हे का भान भी है तो गैस से लेकर इंडक्शन और उसके बाद तक के आविष्कारों के उपयोग का तरीका भी आता है। यही कारण है कि पेशे से हिंदी की सम्मानित शिक्षिका और कवियत्री डॉ मोना परसाई का कविता संग्रह ‘आरसी अक्षरों की’ हमें अपने और अपनेपन के इन्हीं अहसासों से जोड़ती है । यह हमें गांव, घर, चौपाल से लेकर महानगरों तक की प्रवाहमान यात्रा कराता है।


‘आरसी अक्षरों की’ सही मायने में भूत\भविष्य\वर्तमान के बीच का सेतु है। खुद लेखिका ने ‘अपनी बात’ में लिखा है कि हो सकता है कि यह कविता संग्रह दुनिया को देखने का केवल मेरा ही नजरिया भर हो या भड़ास निकालने का तरीका लेकिन समाज में आ रहे बदलाव की संवेदना तंतुओं को उभारने की एक कोशिश जरूर है। 


‘आरसी अक्षरों की’ कविता संग्रह में हम जगह-जगह डॉ मोना परसाई की इन्हीं संवेदनाओं से रूबरू होते हैं। कुल 41 कविताओं का यह गुलदस्ता अपने अंदर समाज के विभिन्न रंग और खुशबू समेटे है। यहां प्यार भी है, इंतजार भी है, बच्चे भी हैं, खुशबू  भी है, रिश्ते भी हैं, प्रेम भी है, युद्ध और यादें भी। हर कविता अपने आप में एक संपूर्ण अध्याय है जो अपनी चंद पंक्तियों में गागर में सागर की तरह बहुत कुछ कह जाती है। यदि आप लेखन में ‘बिटवीन द लाइन’ को समझने की महारत रखते हैं तो कविताएं आपके लिए 41 अध्याय से काम नहीं है। 


डॉ मोना परसाई ने अपने आसपास बिखरे आंचलिक और देशज शब्दों के जरिए कविताओं में देसीपन का छौंक लगाकर अपनापन सा ला दिया है। मसलन ‘चलो कहीं ठहरें’ कविता में वे लिखती है:  


मिट्टी के घरौंदों में

आशियाना सजाते 

चलो कहीं ठहरे 

अंतर की सीपी में 

सुख के मोती टटोले 

कई रातें गयी सोते हुए

भी जागते सपनों की धुंध में 

अनजाने अक्स तलाशते

चलो कहीं ठहरे। 


वैसे तो संग्रह की सभी कविताएं चमकते मोती की माला की तरह है लेकिन कई कविताएं ऐसी है जो हमें अंदर तक झकझोर देती हैं और सोचने पर मजबूर करती है। ‘लड़की नदी है’, कविता में वे लिखती हैं: 


बहना जानती है, बहना चाहती है 

बंधन उसका स्वभाव कभी नहीं रहा 

फिर भी बांधा है तुमने उसे

कभी नैतिकता के पहाड़ों के घेरे में

कभी उसकी अपनी 

नाजुक अनुभूतियों के पास में 

परंपराओं के ऊंचे-ऊंचे बांध बनाकर


यह कविता हमें बेटियों को बराबरी का दर्जा देने उन्हें पंख लगाकर उड़ने और खुले आसमान में अपनी मंजिल चुनने का संदेश देती है। कविता के अंत में वह समाज को चुनौती देते हुए स्पष्ट संदेश  देती हैं:


लड़की चिड़िया या तितली नहीं है।

नदी है,

वेग से भरी हुई नदी।। 


ऐसी ही एक और भावनात्मक कविता ‘इंतजार’ में भी गौरैया के बहाने वे बच्चों के इंतजार में अकेलापन काट रहे मां-बाप की भावनाओं को उजागर करते हुए लिखती हैं:


गौरैया जानती है 

उड़ना सीखने पर परिंदे 

नहीं लौटा करते घोंसलों की ओर 

पर बूढ़ी आंखें समझते हुए भी 

नहीं छोड़ती हरकारे का इंतजार 


भावनाओं के दरिया में बहाते हुए ‘यादें’ कविता में वे लिखती हैं:


बस यादें होती हैं, 

चिताओं की तपिश भी,

उन्हें नहीं जला पाती,

बल्कि वे और भी चमक उठती हैं।


डॉ मोना परसाई की भाषा में नमक भी है, गमक भी है, माटी की सोंधी खुशबू भी है और महानगरों के मॉल में व्याप्त नए दौर की सुगंध भी.. जो हमें, हमारे परिवार से भी जोड़ती है और समाज से भी। पुस्तक का सुंदर कवर और सुस्पष्ट छपाई भी प्रशंसनीय है। कुल मिलाकर यह एक पठनीय, संग्रहणीय और पहली पुस्तक होने के नाते सराहनीय भी है। यदि आप कविताओं के मुरीद हैं तो आरसी शब्दों की जरूर पढ़िए… यह आपको निश्चित ही अपनेपन का एहसास कराएगी।


पुस्तक: आरसी अक्षरों की

विधा: कविता संग्रह

रचनाकार: डॉ मोना परसाई 

पृष्ठ: 81

मूल्य: 200 रुपए

प्रकाशक: लोक प्रकाशन, भोपाल


#किताबीकीड़ा  #आरसीअक्षरोंकी 


रविवार, 27 अप्रैल 2025

बिटिया की कविता मम्मी पापा के नाम..!!

अब इसे मम्मी-पापा से एक हजार किमी से ज्यादा की दूरी कहें या फिर पत्रकार पिता और लेखक मां के संस्कार का असर...बिटिया,पहले ब्लॉगर बनी और अब उसने लिखी पहली कविता (काव्य अभिव्यक्ति  या आधुनिक कविता कहना ज्यादा उचित है)...हो सकता है कविता की कसौटी पर यह कच्ची हो लेकिन भावनाओं के लिहाज से पूरी पक्की है । कविता के शब्द जहां आत्मविश्वास का अहसास कराते हैं, वहीं दिल से आंखों की दूरी को पलभर में पाट देते हैं। हम इसे "बिटिया की कविता मम्मी-पापा के नाम" जैसा अच्छा सा शीर्षक भी दे सकते हैं...पढ़िए, तकनीकी से ज्यादा भाव से,शब्द नहीं मनोभाव से और  कुल मिलाकर ♥️ से।

'अब मैं जीना सीख गई हूं'

मम्मी-पापा,

आपकी ये नन्हीं सी जान

अब सचमुच बड़ी हो गई है।

अब जिंदगी जीना

 सीख गई हूं मैं।


 दुनिया न

 बहुत बुरी है..!

 बचपन से

 यही बताते थे न...?

सच कहते हो आप

 ये दुनिया

 सच में बहुत बुरी है,

 पर मैंने भी न,

 दुनिया से डील करना

 सीख ही लिया है।


 अब न ,अँधेरे से

 डर नहीं लगता

 रात को अचानक

 नींद खुलने पर अब

 सहम नहीं

 जाती हूं मैं।

 मैं सीख गई हूं,

 हर वो तौर-तरीका

 जो आप सिखाते थे 

 

पर,पता है क्या आपको...?

शहर चाहे कितना भी बड़ा 

या छोटा क्यों ना हो....!

अपने घर आंगन की खुशबू 

नहीं मिलती उसमें🥺


अपने पसंद की चीज़

खुद से खरीद लेती हूं मैं...

पर पापा का लाड़

नहीं मिलता इसमें।


 माँ, अब तो खाना बनाना 

भी आ गया

पर आपके हाथ का प्यार

नहीं होता इसमें।


 नाम-रुतबा 

 सब बनाने के पीछे

 निकल गयी हूँ मै

 पर बचपन जैसा

 आप दोनों का हाथ

 थाम के चलने का

 वो सुकून🥰

 नहीं मिलता ।।

(बिटिया आद्या द्वारा शिमला में ताज होटल में ड्यूटी के बाद व्यक्त एक शाम के भाव)


बोझ से कराहते पहाड़ों को चाहिए राहत का मलहम !!

बढ़ती भीड़ से पहाड़ कराह रहे हैं और वाहनों की बेतहाशा संख्या उनका कलेजा छलनी कर रही है। फिर भी पर्यटक बेफिक्र हैं और पहाड़ों के पहरेदार यानि प्रशासन निश्चिंत । पहाड़ लगातार इशारा कर रहे हैं, खुलेआम संकेत दे रहे हैं और कई बार सीधी चेतावनी भी, फिर भी वीकेंड पर शिमला से लेकर मसूरी तक और मनाली से लेकर नैनीताल तक पर्यटकों और उनके वाहनों का जाम लगा है। एक घंटे का सफर 6 से 8 घंटों में हो रहा है। इसके बाद भी, पहाड़ों पर जाने वालों की संख्या घटने की बजाए लगातार बढ़ ही रही है।

यह स्थिति किसी एक पहाड़ी शहर या राज्य की नहीं है बल्कि देश के तमाम पर्वतीय राज्य लोगों और वाहनों की बेलगाम भीड़ से घायल हो रहे हैं। धूल, धुआं,कचरा,शोर और भीड़ का दबाव पहाड़ों का सीना घायल कर रहे हैं। वैसे, तो कमोवेश सभी पर्वतीय इलाकों का एक जैसा हाल है लेकिन शिमला जैसे शहर तो बर्बादी की कगार पर हैं। शिमला के हिमाचल प्रदेश की राजधानी और एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल होने के कारण, पिछले कुछ दशकों में वाहनों की संख्या में तेजी से वृद्धि देखी गई है। इससे न केवल पर्यावरणीय संतुलन पर असर पड़ रहा है, बल्कि पहाड़ों की भौगोलिक संरचना और पारिस्थितिकी पर भी दबाव बढ़ रहा है। 

शिमला हिमालय की दक्षिण-पश्चिमी श्रृंखलाओं में 2 हजार 206 मीटर अर्थात् 7 हजार 238 फीट की औसत ऊँचाई पर स्थित है। यह शहर सात पहाड़ियों पर बसा है और जाखू हिल यहां की सबसे ऊंची चोटी है। शिमला मूल रूप से ब्रिटिश काल में महज 25 हजार लोगों के लिए बनाया गया था, लेकिन आज यहाँ लगभग ढाई लाख लोग रहते हैं। इसके फलस्वरूप मानवीय उपस्थिति के साथ तमाम संसाधनों की मात्रा तेजी से बढ़ रही है।

शिमला जिले की आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार, करीब 8 लाख 14 हजार थी, और 2025 तक इसके 9 लाख के करीब होने का अनुमान है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में 2019 में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार शिमला शहर में रोजाना चलने वाले वाहनों की संख्या 2005 में 66 हजार 617 से बढ़कर 2019 तक 1 लाख 65 हजार से ज्यादा हो गई थी। यह वृद्धि लगभग 2.5 गुना है। यदि इस बढ़ोत्तरी के हिसाब से अनुमान लगाया जाए और स्थानीय लोगों की जानकारी पर भरोसा किया जाए तो इस साल तक शिमला शहर में पंजीकृत वाहनों की संख्या करीब एक लाख और पूरे जिले में पंजीकृत वाहनों की संख्या करीब ढाई लाख तक हो सकती है। नियमित तौर पर आने वाले पर्यटक वाहनों को मिलाकर यह आंकड़ा 3 लाख तक जा सकता है।

आंकड़ों के अनुसार शिमला जिले में सालाना करीब 2 करोड़ पर्यटक आते हैं और इनमें से कई अपने वाहन लेकर आते हैं। एक अन्य अनुमान के अनुसार पर्यटन सीजन के दौरान महज 10 दिनों में 55,000-60,000 वाहन शिमला आ जाते हैं तो साल भर में यह संख्या लाखों में हो सकती है। हालांकि, ये वाहन स्थायी रूप से पंजीकृत नहीं हैं, लेकिन सड़कों पर बोझ बढ़ाते हैं। 

हाल ही में अपनी शिमला यात्रा के दौरान मैंने खुद यह महसूस किया कि वाहनों के दबाव बढ़ने के कारणों में एक प्रमुख कारण शिमला का पहाड़ी क्षेत्र होना भी है इसलिए यहाँ की सड़कें तीखी चढ़ाई वाली हैं। शिमला की सड़कें, विशेष रूप से शहरी और उपनगरीय क्षेत्रों में, कई जगहों पर 15% से 30% तक की चढ़ाई हैं। कुछ खास सड़कें, जैसे कि मॉल रोड से जाखू मंदिर या अन्य ऊँचे इलाकों तक जाने वाली सड़कें, काफी खड़ी हैं। सड़कों के संदर्भ में, यह वाहनों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण है, खासकर भारी वाहनों या कम शक्तिशाली इंजन वाले वाहनों के लिए तो यह वाकई पहाड़ चढ़ना ही होता है।

इतना ही नहीं, शिमला जिला भूकंपीय जोन IV में आता है, जो उच्च जोखिम वाला क्षेत्र है। वाहनों की लगातार आवाजाही से होने वाले वाइब्रेशंस से पहाड़ों की पहले से कमजोर भूगर्भीय संरचना और अस्थिर हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क यातायात के कारण होने वाला कंपन भूस्खलन के खतरे को बढ़ाता है। 2023  में शिमला में हुए भूस्खलन जैसे मामले बताते हैं कि अत्यधिक वर्षा के साथ-साथ मानवीय गतिविधियाँ, जैसे सड़क निर्माण और यातायात इस खतरे को बढ़ा रहे हैं।

अध्ययनों से यह भी पता चला हैं कि वाहनों से निकलने वाला धुआँ और कार्बन उत्सर्जन हवा की गुणवत्ता को खराब कर रहा है। हिमाचल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, पर्यटन सीजन में शिमला में हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है। उत्सर्जन से निकलने वाली ब्लैक कार्बन बर्फ और ग्लेशियरों की सतह को काला कर देती है, जिससे सूरज की गर्मी अधिक अवशोषित होती है और बर्फ तेजी से पिघलती है। यह हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए खतरा है।

बढ़ते वाहनों को संभालने के लिए सड़कों का चौड़ीकरण और नई सड़कें बनाई जा रही हैं, जैसे शिमला-चंडीगढ़ एक्सप्रेसवे। इसके लिए पहाड़ों को काटा जा रहा है और जंगल साफ किए जा रहे हैं, जिससे मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है और पहाड़ कमजोर हो रहे हैं। भारी यातायात और सड़क निर्माण से प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था बाधित हो रही है। पानी पहाड़ों में रिसता है, जिससे उनकी स्थिरता कम होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अनियोजित निर्माण और ट्रैफिक इसका कारण है। 

हालांकि,पहाड़ों पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए सरकार ने सरकारी वाहनों को इलेक्ट्रिक करने की योजना बनाई है। इसी तरह शिमला में मल्टी-स्टोरी पार्किंग बनाई गई है। अब जरूरत इस बात की है कि इसे और इसकी तरह की अन्य पार्किंग के अधिकतम उपयोग को प्रोत्साहित किया जाए। बेहतर बस सेवाएँ भी निजी कारों का संख्या को कम कर सकती हैं। इसके अलावा, सरकार रिज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को नो-व्हीकल जोन बनाकर मुसीबत को कम कर सकती है।

कुल मिलाकर शिमला में वाहनों की बढ़ती संख्या और जनसंख्या को तत्काल रोकना जरूरी है अन्यथा पहाड़ों पर दबाव बढ़ता जाएगा । यह भूस्खलन, प्रदूषण, वन कटाई और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को और तीव्र कर रहा है। अगर इसे नियंत्रित न किया गया, तो शिमला की प्राकृतिक सुंदरता और स्थिरता खतरे में पड़ जाएगी ।  (यह आलेख राग दिल्ली में भी प्रकाशित हुआ है।)





सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...