हॉस्टल ने दी जिंदगी जीने की डिग्री..!!

jugaali.blogspot.com

कुछ जगहें जिंदगी में ऐसी होती हैं, जहां हम पढ़ने जाते हैं, लेकिन लौटते समय पता चलता है कि वहां हमने विषयों से ज्यादा जिंदगी पढ़ी है। शासकीय मॉडल विज्ञान महाविद्यालय, जबलपुर (अब स्वशासी भी) के अशोक और विक्रम छात्रावास मेरे लिए ऐसी ही जगह थे। मेरे पहले के छात्र हमारे कॉलेज को रॉबर्टसन कॉलेज के नाम से जानते थे।

कॉलेज में विज्ञान की पढ़ाई तो हुई ही, लेकिन असली प्रयोगशाला शायद हॉस्टल था। यहां प्रयोग किताबों में नहीं, जिंदगी में होते थे। यहां दोस्ती का रसायन था, अनुशासन का गणित था, आत्मनिर्भरता का भौतिक विज्ञान था और भावनाओं की अपनी जीवविज्ञान।


घर से हॉस्टल आना मेरे लिए एक तरह से जिंदगी के दूसरे अध्याय में प्रवेश था। घर में मां-बाप और परिवार का सुरक्षा कवच था। यहां अपना बिस्तर भी खुद संभालना था, कपड़े भी और महीने भर के खर्च का हिसाब भी। गांव-कस्बों से आए हम जैसे कई लड़कों के लिए तो जबलपुर की दुनिया बिल्कुल नई थी। शहर की चहल-पहल, कॉलेज का माहौल, नए चेहरे और सबसे बढ़कर घर से दूर अपने दम पर जीना।


शुरुआत में हम सबके बीच झिझक थी। कौन कहां का है, किसका स्वभाव कैसा है, किससे दोस्ती होगी जैसे कई सवाल मन में थे। फिर सीनियर्स सामने आए और परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उस दौर की रैगिंग भी नए लड़कों की झिझक तोड़ने का एक अनौपचारिक तरीका थी। फिर चाहे खुले मैदान में देर रात की नागा एक्सप्रेस ट्रेन बनाना हो या टंकी में डुबकी या अपना अनूठा परिचय देना, कुछ रोचक बातें बताना, कभी अपनी प्रतिभा दिखाना.. इन सबने अनजान चेहरों को धीरे-धीरे परिचित बना दिया।


Sanjeev Sharma /hostel

और फिर शुरू हुई हॉस्टल की असल जिंदगी।


जेब में पैसे हमेशा सीमित होते थे। कहने को हम कॉलेज के छात्र थे, लेकिन महीने के आखिरी दिनों में हमारी आर्थिक स्थिति किसी छोटे-मोटे वित्त मंत्री से कम चुनौतीपूर्ण नहीं होती थी। ऐसी ही ‘कड़की’ के दिनों में सीनियर्स की ओर से सामूहिक समोसे और चाय की पार्टी झटक लेते थे तो लगता था जैसे कोई बड़ी लॉटरी लग गई हो। दो समोसे और एक कप चाय भी उस समय रईसी का ऐसा स्वाद देते थे, जिसे आज किसी महंगे रेस्तरां में बैठकर भी महसूस नहीं किया जा सकता।


लेकिन हॉस्टल का चक्र भी बड़ा दिलचस्प होता है। कल तक जो सीनियर हमें समोसे खिलाकर अपना ‘स्नेह’ दिखा रहे थे, कुछ समय बाद हम खुद सीनियर बन गए तो फिर वही परंपरा हमारे सामने थी। जेब भले कहती रही कि भाई, थोड़ा रहम करो, लेकिन हॉस्टल की परंपरा कहती थी—अब तुम्हारी बारी है! तब पता चलता था कि सीनियर होना आर्थिक दृष्टि से कितना डरावना है लेकिन तब इसकी भी अपनी शान थी क्योंकि कॉलेज के डे स्कॉलर साथियों पर रौब जो पड़ता था। इसलिए, हम भी जेब ढीली करते और जूनियर्स को चाय-समोसे खिलाते थे। शायद यही हॉस्टल की अनकही अर्थव्यवस्था थी मतलब पैसा ऊपर से नीचे नहीं, पीढ़ी दर पीढ़ी दोस्ती के साथ बहता था।


हॉस्टल ने दिखाई सामूहिकता की ताकत 


किसी एक साथी का किसी बाहर वाले से या डे स्कॉलर से झगड़ा हो जाए तो मामला केवल उस लड़के का नहीं रहता था। कुछ ही देर में रॉड की आवाज से यह खबर पूरे हॉस्टल में फैल जाती थी और फिर पता नहीं कितने लड़के किसी जवान सेना की तरह उसके साथ खड़े हो जाते। कई बार तो स्थिति यह होती कि हमें यह भी नहीं मालूम होता था कि झगड़ा शुरू किस बात पर हुआ, किसके साथ हुआ और कहां तक जाना है लेकिन इतना जरूर पता होता था कि ‘अपना हॉस्टलर’ अकेला नहीं जाएगा।


Hostel life

आज के नजरिए से उन घटनाओं को देखता हूं तो लगता है कि उनमें उतावलापन भी था और उम्र की नादानी भी, लेकिन उसके पीछे एक भावना बेहद मजबूत थी—अपने साथी को अकेला नहीं छोड़ना। बाद में जिंदगी ने सिखाया कि हर लड़ाई में कूद पड़ना समझदारी नहीं होती, लेकिन उस उम्र में साथी के लिए खड़े होने का जो जज्बा था, उसने हमें एकता का अर्थ जरूर समझाया। यही जज़्बा किसी का दूध,किसी की चीनी, किसी की चायपत्ती, किसी का हीटर और सबके अपने अपने कप के साथ फाइव स्टार चाय का मज़ा भी देता था।


हॉस्टल केवल लड़ने-भिड़ने और मौज-मस्ती की जगह भी नहीं था। पढ़ाई के समय वही लड़के एक-दूसरे के सबसे अच्छे शिक्षक बन जाते थे। किसी को कोई विषय समझ नहीं आया तो कमरे में बैठकर चर्चा शुरू हो जाती। एक के पास किताब थी, दूसरे के पास नोट्स और तीसरे को उस विषय की अच्छी समझ। सामूहिक अध्ययन में एक अजीब-सी ऊर्जा होती थी। जो बात अकेले पढ़ते हुए कठिन लगती, वह दोस्त के समझाने से अचानक आसान हो जाती।


Jugaali.blogspot.com

और जब हॉस्टल सांस्कृतिक केंद्र में बदल जाता था


गणेश जी की मूर्ति की स्थापना उन्हीं यादों में से एक है। चंदा जुटाना, मूर्ति लाना, सजावट करना, पूजा की तैयारी, प्रसाद और फिर सबका मिलकर कार्यक्रम करना। इन सबने हमें आयोजन करना सिखाया। कोई सजावट में माहिर था, कोई व्यवस्था में, कोई चंदा जुटाने में और कोई केवल उत्साह बढ़ाने में। लेकिन अंत में गणेश जी सबके थे और आयोजन भी सबका। ऐसे अवसरों पर हॉस्टल का टीवी हाल, बरामदा और आसपास का पूरा माहौल अचानक घर जैसा लगने लगता था।


मनोरंजन के सीमित साधन थे। आज की तरह हर जेब में मोबाइल और हर कमरे में इंटरनेट नहीं था। इसलिए गणेश स्थापना के ग्यारह दिनों में VCR का खास तौर पर किराए से इंतजाम किया जाता तो वह अपने आप में सबसे बड़ा आयोजन होता था। अच्छी और अन सेंसर्ड फिल्में देर रात तक देखने का अपना ही आनंद था। टीवी के सामने भीड़ लगती, जगह के लिए खींचतान होती, कोई फर्श पर बैठता, कोई कुर्सी और सोफे पर और कोई दरवाजे के पास खड़ा होकर भी फिल्म देखने को तैयार रहता।


फिल्म से ज्यादा मजा शायद उस सामूहिक माहौल में आता था। बीच-बीच में किसी की टिप्पणी पर ठहाका लग जाता और फिर कोई सीनियर चुप रहने का इशारा करते हुए अंग्रेजी संवाद समझने का पुरजोर प्रयास करता। आज के डिजिटल दौर में यह सब बहुत साधारण लग सकता है, लेकिन हमारे लिए वह सामूहिक मनोरंजन था। एक स्क्रीन और दर्जनों चेहरे,लेकिन खुशी सबकी साझा।


घर से दूर एक घर


हॉस्टल की जिंदगी ने हमें यह भी सिखाया कि घर से दूर रहकर भी परिवार बनाया जा सकता है। किसी के घर से अचार आया तो वह केवल उसी लड़के का नहीं रहा। किसी के घर से देशी घी के लड्डू,कहीं से गुझिया तो कभी खुरमा बतिया आती और चट से खत्म भी हो जाती क्योंकि खाने वाले भी दर्जनों थे। किसी को घर से चिट्ठी आई तो कई साथी उसके आसपास बैठकर उसके चेहरे का भाव पढ़ते थे। त्योहारों पर घर की याद आती थी, लेकिन उसी समय दोस्तों का साथ उस खालीपन को कुछ कम कर देता था। धीरे-धीरे हम हमउम्र लड़कों का एक ऐसा परिवार बन गए थे, जिसमें रिश्तों की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई थी, लेकिन रिश्ते बनते चले गए।


हॉस्टल ने हमें वित्तीय अनुशासन भी सिखाया। महीने की शुरुआत में जेब में पैसा देखकर लगता था कि खूब खर्च करेंगे। महीने का मध्य आते-आते गणित बदल जाता और आखिरी सप्ताह में चाय भी सोच-समझकर पीनी पड़ती। तब समझ में आया कि सीमित साधनों में प्राथमिकताएं तय करना क्या होता है। शायद इसी कारण बाद में सीनियर बनकर जब जूनियर्स को समोसे-चाय खिलाने के लिए जेब ढीली करनी पड़ती थी, तब हमें अपने पुराने सीनियर्स याद आते थे। समझ आता था कि उन्होंने सिर्फ समोसे नहीं खिलाए थे, एक परंपरा सौंपी थी।


Hostel life

हॉस्टल एक और बड़ी चीज देता है हिम्मत


घर से पहली बार दूर निकलना, अनजान लोगों के बीच रहना, अपनी बात रखना, जरूरत पड़ने पर किसी शिक्षक या अधिकारी से बात करना, अपने खर्च का हिसाब रखना, बीमारी या परेशानी में खुद निर्णय लेना जैसी छोटी-छोटी घटनाएं मिलकर व्यक्तित्व बनाती थीं। मुसीबत की घड़ी में कभी सीनियर्स हमारे लोकल गार्जियन बन जाते कभी हम किसी जूनियर के अभिभावक।


हॉस्टल ने हमें रहन-सहन का सलीका भी सिखाया। कमरे में दूसरे लोग हैं तो अपनी सुविधा के साथ उनकी सुविधा का भी ख्याल रखना है। देर रात लौटे हैं तो सो रहे साथी की नींद का सम्मान करना है। किसी से मदद ली है तो मौका आने पर उसकी मदद करनी है। वरिष्ठ हैं तो कनिष्ठ को दबाना नहीं, उसे संभालना है। इन सबके बीच अनुशासन भी था और शरारत भी। पढ़ाई भी थी और मस्ती भी। बहस भी थी और दोस्ती भी। कभी रूठना था, कभी मनाना था। कभी जेब खाली थी तो कभी किसी दोस्त की वजह से चाय मुफ्त हो जाती थी।


आज इतने वर्षों बाद जब उन दिनों को याद करता हूं तो लगता है कि अशोक और विक्रम जैसे छात्रावास वास्तव में हमारे जीवन की अनौपचारिक पाठशाला थे। वहां किसी ने ब्लैकबोर्ड पर लिखकर नहीं बताया कि एकता क्या होती है। हमने उसे दोस्तों के साथ खड़े होकर महसूस किया। किसी किताब ने वित्तीय अनुशासन का अध्याय नहीं पढ़ाया। हमने महीने के आखिरी पांच दिनों में खाली जेब से सीखा। आत्मनिर्भरता का कोई व्याख्यान नहीं हुआ। घर से दूर रहकर हमने उसे रोज जिया। भाईचारे की परिभाषा नहीं पढ़ी। किसी एक साथी के साथ खड़े होकर समझी। 


इसी तरह, बड़ों का सम्मान किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं था। सीनियर्स के व्यवहार और परंपराओं से सीखा। सामूहिक अध्ययन की उपयोगिता किसी शिक्षक ने बताई होगी, लेकिन उसे हमने रात-दर-रात साथ बैठकर अनुभव किया। और परिवार से दूर रहकर परिवार बनाने की कला—वह शायद हॉस्टल का सबसे बड़ा उपहार था।


आज मेरे या हम सभी दोस्तों के जीवन में कई उपलब्धियां हैं, कई अनुभव हैं, कई शहर हैं और कई रिश्ते हैं लेकिन जब कभी मन अतीत की ओर लौटता है तो जबलपुर का हॉस्टल, साथी, हमारे वे कमरे, वे चेहरे, चाय-समोसे की छोटी-छोटी पार्टियां, जूनियर्स की खातिर ढीली होती जेब, गणेश जी की स्थापना, VCR के सामने देर रात तक बैठी भीड़ और किसी साथी के लिए एकजुट होकर खड़ा पूरा हॉस्टल..सब एक साथ आंखों के सामने आ जाते हैं।


तब लगता है कि हम वहां केवल पढ़ने नहीं गए थे। हम वहां बड़े होने गए थे। कॉलेज ने शायद हमें डिग्री दी, लेकिन हॉस्टल ने जिंदगी जीने की डिग्री दी। और उस डिग्री की सबसे खूबसूरत बात यह है कि उसका प्रमाणपत्र आज भी मेरे भीतर सुरक्षित है—कुछ दोस्तों की यादों में, कुछ शरारतों में, कुछ संस्कारों में और उस विश्वास में कि जिंदगी चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए, अपने लोगों के साथ मिलकर जी जाए तो हर मुश्किल थोड़ी आसान हो जाती है और यही हमारे हॉस्टल परिवार की सबसे बड़ी सीख है।


#Hostel #Hostellife #ScienceCollege #Robertsoncollege #RDVV


टिप्पणियाँ

  1. बहुत सटीक विश्लेषण शर्मा जी मजा आगया मै इस छात्रावास का हिस्सा था

    जवाब देंहटाएं

  2. आभार श्रीमान जी पुरानी यादें ताजा करने के लिए।

    जवाब देंहटाएं
  3. RAमजी पटेल 6262593286

    अति सुंदर हास्टल के दिनों की याद तरोताजा हो गई।

    जवाब देंहटाएं
  4. छात्रावास जीवन का पूरा विश्लेषण बहुत पसंद आया।संजीव भाई

    जवाब देंहटाएं
  5. शानदार जीवंत अभिव्यक्ति। यकीनन ये सारे विषय हम सबके दिलो दिमाग में आते तो थे पर इन्हें व्यक्त करने की क्षमता, सामर्थ्य एवं विवेक केवल और केवल संजीव भाई के पास है। यकीनन इस पोस्ट से एक बार फिर संजीव आपने हम लोगों को 35-38 वर्ष पीछे की यादों को ताजा कर दिया है। आपकी कलम ऐसे ही चलती रहे.... शुभकामनाएं 👍👍🙏

    जवाब देंहटाएं
  6. संजीव बहुत ही बारीकी से कम शब्दों मे तुम्हारी लेखनी ने कमाल का बयान दर्ज कराया है। बधाई 💐

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हर बेटी के नाम... एक पिता का पत्र!!

आज ‘भारत रत्न’ तो कल शायद ‘परमवीर चक्र’ भी!

कुछ तो अलग था हमारे वेद में .....!