शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

क्यों न अब अखबारों और चैनलों पर लिखा जाए “केवल वयस्कों के लिए”


               क्यों न अब न्यूज़ चैनलों और अख़बारों की ख़बरों के साथ केवल वयस्कों के लिए जैसा कोई टैग लगाना चाहिए? हो सकता है यह सवाल सुनकर आपको आश्चर्य हो और आप प्रारंभिक तौर पर इससे सहमत भी न हो लेकिन यदि आप मेरी पूरी बात पर गंभीरता से विचार करेंगे तो शायद आपको भी इस सवाल में दम नज़र आ सकता है. देश में कई बातों को बच्चो के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता इसलिए ‘केवल वयस्कों के लिए’ नामक श्रेणी को बनाया गया. इसका उद्देश्य बच्चों या अवयस्कों को ऐसी सामग्री से दूर रखना है जो उम्र के लिहाज़ से उनके लिए उपयुक्त नहीं मानी जा सकती क्योंकि वयस्कों के लिए निर्धारित सामग्री देखने से उनके अपरिपक्व मन पर गहरा असर पड़ सकता है. यही कारण है कि हिंसात्मक दृश्यों से भरपूर फिल्मों, अश्लीलता परोसने वाले कार्यक्रमों, फूहड़ भाषा का इस्तेमाल करने वाली पत्रिकाओं और इन विषयों पर केंद्रित चित्रों का प्रकाशन-प्रसारण करने वाली सामग्री को बच्चों से दूर रखने के लिए उन पर साफ़ तौर पर इस बात का उल्लेख किया जाता है कि ‘यह सामग्री केवल वयस्कों के लिए है’. कानून व्यवस्था से जुडी एजेंसियां भी इस बात का खास ख्याल रखती हैं कि वयस्कों के लिए निर्धारित सामग्री गलती से भी बच्चों या अवयस्कों तक न पहुंचे.
  सरकार की इस नीति का कड़ाई से पालन किया जाता है तभी तो कई लोकप्रिय फ़िल्में भी वयस्कों के ‘टैग’ के कारण बच्चों की पहुँच से बाहर रहती हैं. ताजा उदाहरण ‘डर्टी पिक्चर’ का है. कमाई के लिहाज से सफल यह फिल्म देश के सभी प्रतिष्ठित फिल्म पुरस्कारों में सफलता के झंडे गाड़ रही है लेकिन इस सबके बावजूद बच्चे इसे नहीं देख सकते लेकिन इसी फिल्म से सम्बंधित विद्या बालन के श्लील-अश्लील लटके झटके जब छोटे परदे पर न्यूज़ चैनलों, मनोरंजक चैनलों और समाचार पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा प्रकाशित-प्रसारित होते हैं तो कोई भी देख सकता है.यहाँ तक कि नन्हे-मुन्ने बच्चे भी पूरे परिवार के साथ बैठकर विद्या बालन के ऊ लाला का मजा लेते हैं. तब न तो ‘केवल वयस्कों के लिए’ का टैग होता है और न ही इस कानून का पालन करने वाली सरकारी-गैर सरकारी एजेंसियों को कोई दिक्कत होती है. बात केवल फ़िल्मी दृश्यों भर की नहीं है. दरअसल हमारा यह कानून वयस्कों के लिए खींची गई इस लक्ष्मणरेखा  के जरिये बच्चों को हिंसा,बलात्कार,अनैतिक सम्बन्ध,विवाह पूर्व या विवाह पश्चात बनाये जाने वाले अनैतिक रिश्तों, खून-खराबा जैसी तमाम बातों से भी दूर रखता है लेकिन नामी अंग्रेजी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली देशी-विदेशी अभिनेत्रियों की अधनंगी तस्वीरें, लाखों में बिकने वाली समाचार पत्रिकाओं द्वारा किये जाने वाले सेक्स सर्वेक्षण,न्यूज़ चैनलों पर दिनभर चलने वाले हिंसात्मक दृश्यों वाले समाचार,सामूहिक बलात्कार की ख़बरों और अश्लीलता परोसने वाले विज्ञापनों पर कोई रोक नहीं है. घर में अकेले या परिवार के साथ बच्चे बेरोकटोक इन्हें देखते-पढते-सुनते हैं. अब वह समय भी नहीं रहा कि ऐसा कोई दृश्य आते ही माँ-बाप टीवी बंद कर दें,न्यूज़ चैनल बदल दें या फिर उस समाचार पत्र-पत्रिका को ही छिपा दे. वैसे भी अब तो ऐसी तस्वीरें छापना या सेक्स सर्वे प्रकाशित करना रोजमर्रा की सी बात हो गई है तो अभिभावक भी कब तक और कहाँ तक इस बातों से अपने बच्चों को बचा सकते हैं. अब क्या माँ-बाप बिस्तर से उठते ही अखबार के उन पन्नों को छिपाने के लिए भागे? या एक-एक पन्ना खुद देखकर और ‘सेन्सर’ कर बच्चों को पढ़ने दें?
  ऐसी स्थिति में एक ही रास्ता बचता है कि सरकार को समाचार पत्र-पत्रिकाओं की सामग्री और न्यूज़ चैनलों की विषय वस्तु के लिए भी ‘केवल वयस्कों के लिए’ जैसी कोई श्रेणी बनानी चाहिए. मजे की बात यह है कि छोटे परदे पर आने वाले ‘बिग बॉस’ जैसे कार्यक्रमों में अश्लीलता को लेकर हायतौबा मचाने वाले न्यूज़ चैनल कभी अपने गिरेबान में झाँककर नहीं देखते कि वे खुद इन कार्यक्रमों को बच्चों तक पहुँचाने में ज्यादा बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. यदि कोई कार्यक्रम अश्लीलता फैला रहा है तो समाचार के नाम पर उस कार्यक्रम के फुटेज दिखाना या उन चित्रों को अखबार में छापना भी अश्लीलता फ़ैलाने के दायरे में आएगा. कार्यक्रमों की इस फेहरिस्त में न्यूज़ चैनलों पर दिनभर प्रसारित तंत्र-मन्त्र,भूत,वारदात,सनसनी और अंधविश्वास बढ़ाने वाले कार्यक्रमों को भी शामिल कर लिया जाए तो फिर पूरे के पूरे समाचार चैनल को ही ‘केवल वयस्कों के लिए’ की श्रेणी में शामिल करने की नौबत आ सकती है. अब तो अंग्रेजी अख़बारों की नक़ल करते हुए हिंदी के कई लोकप्रिय समाचार पत्र भी साप्ताहिक परिशिष्ट के नाम पर प्रतिदिन चिकने पन्नों पर नंगी टांगे,चूमा-चाटी भरे दृश्य और अश्लील बातें छापने लगे हैं. जब सेक्स को महिमा मंडित करने वाली सड़क छाप ‘दफा तीन सौ दो’ नुमा पत्रिकाएं खुले आम नहीं बेचीं जा सकती तो फिर लगभग इसकी प्रतिकृति बनते जा रहे हिंदी-अंग्रेजी अखबार क्यों खुलेआम बिकने चाहिए? न्यूज़ चैनल भी ख़बरों को लज्ज़तदार अंदाज़ में पेश करने में पीछे नहीं है और सुबह से ही यह बताना शुरू कर देते हैं कि शाम को या रात के विशेष में क्या ‘लज़ीज़ खबर’ परोसेंगे.ऐसे में घर में एक टीवी वाले परिवारों के सामने क्या विकल्प रह जाता है? पहले अभिभावक समाचार देखने के बहाने से बच्चो को मनोरंजक चैनलों पर प्रसारित ‘व्यस्क’ जानकारियों से बचा लेते थे पर अब तो न्यूज़ चैनल ही इसतरह की सामग्री का जरिया बन गए हैं तो फिर कैसे बचा जाए. इसलिए हमें ‘हाथी के दांत खाने के कुछ और दिखने के कुछ’ की नीति को त्यागकर इस दिशा में न केवल गंभीरता से विचार करना चाहिए बल्कि समाचार माध्यमों को भी ‘केवल वयस्कों के लिए’ की श्रेणी में बांटने के लिए  मौजूदा कानून में जल्द से जल्द  उपयुक्त फेरबदल करना चाहिए. 

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

तो फिर हम में और उस कुत्ते में क्या फर्क है..?


छोटे परदे पर दिन भर चलने वाले एक विज्ञापन पर आपकी भी नज़र गयी होगी.इस विज्ञापन में भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी अपनी मोटरसाइकिल पर एक कुत्ते को पेशाब करते देखकर नाराज़ हो जाते हैं और फिर एक छोटे बच्चे को ले जाकर उस कुत्ते के घर(डॉग हाउस) पर पेशाब कराते हैं और साथ में कुत्ते को चेतावनी भी देते हैं कि वह दुबारा ऐसी जुर्रत न करे. इसीतरह सड़क पर अपनी कार या मोटरसाइकिल से गुजरते हुए आप भी पीछे आने वाले वाहन द्वारा आपसे आगे निकलने के लिए बजाए जा रहे कर्कस और अनवरत हार्न का शिकार जरुर बने होंगे.खासतौर पर दिल्ली जैसे महानगरों में तो यह आम बात है भलेहि फिर मामला स्कूल के पास का हो या अस्पताल के करीब का.यदि आपने हार्न बजा रहे पीछे वाले वाहन को देखा हो तो निश्चित तौर पर वह आपके वाहन से बड़ा या महंगा होगा.
                      इन दोनों उदाहरणों को यहाँ पेश करने का मतलब यह है कि धीरे धीरे हम अपनी सहिष्णुता,समन्वय और परस्पर सामंजस्य का भाव खोकर कभी खत्म होने वाली प्रतिस्पर्धा में रमते जा रहे हैं.यदि पहले वाले उदाहरण की बात करे तो साफ़ लगता है धोनी डॉग-हाउस पर बच्चे से पेशाब कराकर जैसे को तैसा सबक सिखाने की कोशिश कर रहे हैं.हो सकता है इस विज्ञापन में भविष्य में बच्चे के स्थान पर धोनी या कोई और वयस्क माडल कुत्ते के घर पर पेशाब करता नज़र आये?मुझे लगता है कि विज्ञापन बनाने वाली टीम का मूल आइडिया शायद यही रहा होगा लेकिन लोगों की सहनशीलता को परखने के लिए फिलहाल बच्चे का इस्तेमाल किया गया है.यदि आम लोग विज्ञापन में रचनात्मकता के नाम पर मूक पशु के साथ इस छिछोरेपन को बर्दाश्त कर लेते हैं तो फिर अगले चरण पर अमल किया जाएगा. खैर मुद्दा यह नहीं है कि विज्ञापन में कौन है बल्कि चिंताजनक बात यह है कि हम समाज को क्या सन्देश दे रहे हैं.कहीं ‘जैसे को तैसा’ की यह नीति तालिबानी रूप न ले ले क्योंकि यदि आज हम अपनी नई पीढ़ी को ‘पेशाब के बदले पेशाब’ करने के लिए उकसा रहे हैं तो कल शायद हाथ के बदले हाथ,छेड़छाड़ के बदले छेड़छाड़ और इसी तरह की अन्य बातों को भी सही साबित करने में भी नहीं हिचकेंगे.दूसरा उदाहरण भी हमारे इसी दंभ को उजागर करता है.अपने आगे किसी छोटे वाहन को चलते देख हम उसके तिरस्कार में जुट जाते हैं.सीधे सपाट शब्दों में कहें तो हम यह जताना चाहते हैं कि एक अदने से वाहन वाले की हिम्मत हमसे आगे चलने की कैसे हो गयी और फिर अपना यही दंभ/गुस्सा/भड़ास/तिरस्कार हम निरंतर हार्न बजाकर जाहिर करते हैं.बाद में विवाद बढ़ने पर यही छोटी-छोटी बातें मारपीट(रोड रेज) और हत्या तक में बदल जाती हैं.
             आखिर क्या वजह है कि हम ज़रा सी बात पर अपना आपा खो देते हैं.बसों में हाथ/बैग लग जाने भर से या मेट्रो ट्रेन में मामूली से धक्के में लोग मार-पीट पर उतारू हो जाते हैं. घर के पास गाडी खड़ी करने को लेकर होने वाले झगडे तो अब रोजमर्रा की बात हो गयी है.क्या बाज़ार का दबाव इतना ज्यादा है कि हम इंसानियत भूलकर हैवानियत की तरफ बढ़ने में भी कोई शर्म महसूस नहीं कर रहे. यह सही है बढती महंगाई,प्रतिस्पर्धा और गुजर-बसर की जद्दोजहद ने आम लोगों को परेशान कर रखा है लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि हम अपनी परेशानियों का ठीकरा किसी और के सिर पर फोडकर अपने साथ-साथ उसकी परेशानी भी बढ़ा दें.क्या मौके पर ही सबक सिखाने या जैसे को तैसा जवाब देते समय हम महज चंद मिनट शांत रहकर यह नहीं सोच सकते कि यह होड़ हमें किस ओर ले जा रही है? इसका नतीजा कितना भयावह हो सकता है?..और हम अपनी नई पीढ़ी को क्या यही संस्कार देना चाहते हैं?     

बुधवार, 25 जनवरी 2012

नवजात बच्चे भी दे सकेंगे वोट..!


दुनिया भर में चल रही मुहिम ने असर दिखाया तो आने वाले समय में नवजात शिशुओं को भी मतदान का अधिकार मिल सकता है.यदि ऐसा हुआ तो माँ-बाप की गोद में चढ़ने वाले बच्चे भी अपने अभिभावकों की तरह सज-धजकर वोट डालते नज़र आयेंगे.वैसे भारत में भी नवजात तो नहीं परन्तु 16 साल के किशोरों को मतदान का अधिकार मिल सकता है.
दरअसल खुद निर्वाचन आयोग भी 16 साल तक के किशोरों को मतदान का अधिकार दिलाने के पक्ष में हैं, उधर नवजात शिशुओं को वोटिंग अधिकार दिए जाने के समर्थकों का कहना है कि यदि बच्चों को भी वोट डालने दिया जाए तो उनकी ओर से उनके अभिभावक फैसला ले सकते हैं कि वे किसे वोट दें.वैसे भी बच्चों के मामले में उनके अभिभावक पढाई-लिखाई,कैरियर से लेकर शादी तक के फैसले लेते ही हैं इसलिए यदि वे मतदान के फैसले में भी मददगार बनते हैं तो क्या बुराई है.इस मुहिम को दुनिया भर में अच्छा समर्थन मिल रहा है.इस बात की जानकारी भी कम ही लोगों को होगी कि ‘राइट टू वोट’ यानि मतदान का अधिकार मानवाधिकारों के अन्तरराष्ट्रीय घोषणा पत्र 1948 के प्रावधानों के तहत ‘मानवाधिकारों’ में शामिल है.
            यदि वोटिंग के लिए आयु सीमा के मुद्दे पर बात की जाए तो विश्व के कई देशों में मतदाताओं के लिए निर्धारित आयु सीमा अलग-अलग है.स्वयंसेवी संगठन ‘मास फार अवेयरनेस’ द्वारा देश में मतदाताओं को जागरूक करने के लिए चलाये जा रहे अपने देशव्यापी अभियान ‘वोट फार इंडिया’ के तहत जुटाई गई जानकारी के मुताबिक आस्ट्रिया,ब्राजील,निकारागुआ,क्यूबा,बोस्निया,सर्बिया इंडोनेशिया,उत्तरी कोरिया, पूर्वी तीमोर, सूडान,सेशेल्स सहित दर्जनभर से ज्यादा देशों में मतदाताओं के लिए न्यूनतम आयु सीमा 16 साल है.एक रोचक तथ्य यह भी है कि अधिकतर देशों में 1970 के पहले तक यह न्यूनतम आयुसीमा 21 साल थी लेकिन बदलते वक्त और जागरूकता के फलस्वरूप तमाम देशों ने आयु की इस लक्ष्मणरेखा को घटाना शुरू कर दिया और अब यह 16 साल तक आ गई है.
                 भारत भी इस मामले में पीछे नहीं रहा और यहाँ भी 28 मार्च 1989 को 21 के स्थान पर 18 साल के युवाओं को मतदान का अधिकार दे दिया गया.मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाय कुरैशी तो इसे और भी कम कर 16 साल तक लाना चाहते हैं.उनका मानना है कि आज समाचार चैनलों और इंटरनेट के चलते किशोरों में भी वयस्कों की तरह जागरूकता आ गई है और वे देश के साथ-साथ अपना भला-बुरा समझते हुए सही मतदान करने में सक्षम हैं, इसलिए किशोरों को मतदान का अधिकार देने में कोई बुराई नहीं है.



बुधवार, 7 दिसंबर 2011

फेसबुक ने किया भारतीय सुरक्षा से खिलवाड़

सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक भारतीय नेताओं की छवि के साथ खिलवाड़ तो कर ही रही है अब उसने देश की सुरक्षा व्यवस्था को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाने की कवायद शुरू की है। फेसबुक के एक एप्लीकेशन की मदद से कोई भी व्यक्ति भारत सरकार के आधिकारिक कार्ड की तरह दिखने वाला पहचान पत्र बना सकता है।
खास बात यह है कि फेसबुक द्वारा दिए जा रहे इस कार्ड में भारत सरकार का राष्ट्रीय चिन्ह अशोक चक्र भी है। इसके ऊपर रिपब्लिक ऑफ इंडिया लिखा है, साथ में तिरंगा भी बनाया गया है। कार्ड को और वास्तविक रूप प्रदान करने के लिए फेसबुक ने इस पर बारकोड तथा सुरक्षा चिप की प्रतिकृति (नकल) भी लगाई है।
 फेसबुक पर 'एपीपीएस डॉट फेसबुक डॉट कॉम' पर जाकर कोई भी व्यक्ति यह इंडिया कार्ड बना सकता है। इसके अलावा इस एप्लीकेशन के जरिए वोटर आइडी कार्ड भी बनाया जा सकता है। वोटर आइडी पर साफ-साफ इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया लिखा गया है। इस पर भी बारकोड सहित तमाम सरकारी औपचारिकताएं पूरी की गई हैं। फेसबुक द्वारा भारतीय सुरक्षा व्यवस्था को पहुंचाई जा रही तीसरी चोट फैमिली कार्ड के रूप में है। यह देश के राशन कार्ड की तरह है। इस तरह से कोई भी व्यक्ति चाहे फिर वह किसी आतंकवादी संगठन से जुडा व्यक्ति ही क्यों न हो, फेसबुक का सदस्य बनकर इंडिया कार्ड हासिल कर सकता है। हैरानी की बात यह है कि इंडिया कार्ड को इतनी सफाई से डिजाइन किया गया है कि वह किसी सरकारी संस्थान या भारत सरकार द्वारा जारी पहचान पत्र की तरह लगता है। इसका फायदा उठाकर कोई भी व्यक्ति न केवल देश की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले पुलिसकर्मियों को बरगला सकता है बल्कि देश की सुरक्षा के लिए वाकई खतरा भी बन सकता है। जानकारों ने इस इंडिया कार्ड में अशोक चक्र के इस्तेमाल को फेसबुक के लिए गंभीर चूक करार दिया है। उनका कहना है कि फेसबुक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

गौरतलब है कि सरकार पहले ही फेसबुक जैसी वेबसाइटों को भारतीय नेताओं खासतौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की छवि से खिलवाड के लिए चेतावनी दे चुकी है। फेसबुक पर इन नेताओं के सैकडों ऐसे चित्र मौजूद हैं जिनमें हास्यास्पद और अश्लील तरीके से इनका मजाक बनाया गया है। दरअसल पश्चिमी देशों से संचालित इन वेबसाइटों के लिए भारत और भारतीय संस्कृति से खिलवाड की कोई नई बात नहीं है। पहले भी कुछ वेबसाइटें भारतीय देवी-देवताओं का मजाक बना चुकी हैं।कभी वे जूते पर तो कभी खाने की प्लेटों पर भगवान गणेश,शंकर और देवी दुर्गा की तस्वीरें लगाती रहती हैं. ब्लेकबेरी नामक मोबाइल सर्विस प्रदान करने वाली कंपनी को तो सरकार को प्रतिबंध लगाने की चेतावनी देनी पडी थी क्योंकि इस साइट से भेजे जाने वाले एसएमएस सरकारी सुरक्षा एजेंसियां नहीं पढ सकती थी।



शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

डॉक्टर क्यों बन रहें हैं रक्षक से भक्षक......!


डॉक्टर द्वारा मरीज के साथ छेड़छाड़, युवती ने डॉक्टर पर लगाया बलात्कार का आरोप,डॉक्टर की लापरवाही से बच्चे की मौत,अस्पताल के बाहर महिला ने बच्चा जन्मा,पैसे नहीं देने पर अस्पताल ने मरीज को बंधक बनाया,मरीज के परिजनों द्वारा डॉक्टर की पिटाई,डॉक्टरों और मरीजों के रिश्तेदारों में मारपीट,डॉक्टर हड़ताल पर जैसी ख़बरें आये दिन समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों की सुर्खियाँ बन रही हैं.एकाएक ऐसा क्या हो गया कि जीवन देने वाले डॉक्टरों पर जीवन लेने के आरोप लगने लगे?
                   समाज में डॉक्टर और मरीज का रिश्ता सबसे पवित्र माना जाता रहा है.मरीज अपने डॉक्टर की सलाह पर आँख मूंदकर भरोसा करता है और डॉक्टर भी पेशागत ईमानदारी के साथ-साथ मरीज के विश्वास की कसौटी पर खरा उतरने में कोई कसर नहीं छोड़ता. वैसे भी डॉक्टर और मरीज के बीच का रिश्ता ही कुछ ऐसा होता है कि दोनों एक दूसरे से कुछ नहीं छिपा सकते.एक-दूसरे को सब कुछ खुलकर बताने के ये सम्बन्ध ही परस्पर विश्वास की डोर को दिन-प्रतिदिन मज़बूत बनाते हैं.मरीज को अपने डॉक्टर के सामने बीमारी के साथ-साथ उस बीमारी के आगे-पीछे की कहानी भी खुलकर बतानी होती है तभी डॉक्टर इलाज या यों कहें कि उपचार का सही रास्ता निकाल पाता है.कहने का आशय यह है कि डॉक्टर और मरीज के ताल्लुकात पति और पत्नी के रिश्ते की तरह खुले होते हैं जहाँ व्यक्तिगत स्तर पर गोपनीयता की कोई गुंजाइश नहीं होती.यदि किसी भी पक्ष ने कोई भी बात छिपाने का प्रयास किया तो संबंधों की नैया डगमगाने लगती है.पति-पत्नी के मामले में जहाँ सम्बन्ध टूटने का ख़तरा होता है तो डॉक्टर मरीज के मामले में गलत इलाज होने का.
                          एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि डॉक्टर और मरीज के रिश्तों में भावनात्मक से ज्यादा शारीरिक निकटता जुड़ी होती है मसलन डॉक्टर को यदि बुखार भी नापना है तो उसे या तो मरीज का हाथ पकड़ना होगा,पीठ-पेट को छूकर देखना होगा या फिर आला(स्टेथोस्कोप) को मरीज के सीने से लगाकर देखना होगा.यह तो हुई महज बुखार की बात लेकिन अन्य गंभीर बीमारियों अथवा किसी अंग विशेष से जुड़ी बीमारी के दौरान तो यह निकटता और भी बढ़ जाती है.यहाँ तक की दांत निकलने के लिए भी डॉक्टर को मरीज के बिलकुल करीब जाना पड़ता है.आज के आधुनिक दौर में ब्रेस्ट इम्प्लांट,हायमेनोप्लास्टी,लिपोसक्शन जैसे उपचार आम बात हैं.शरीर के गोपनीय अंगों से जुड़े इन उपचारों को कराते समय यह नहीं देखा जाता कि डॉक्टर पुरुष है या महिला.इसीतरह डॉक्टर की दिलचस्पी मरीज की बीमारी ठीक करने में होती है न कि यह देखने में कि मरीज महिला है या पुरुष.दरअसल परस्पर विश्वास और पेशेगत शिष्टता की सबसे ज्यादा ज़रूरत इसी दौरान होती है.वैसे भी डॉक्टर एवं मरीज के बीच पूरे खुलेपन के बाद भी शिष्टता की एक अनिवार्य लक्ष्मण रेखा होती है.मरीज को भी स्पर्श से पता चल जाता है कि यह डॉक्टर का स्पर्श है या किसी कामुक व्यक्ति का.ठीक इसके उलट डॉक्टर भी मरीज को छूते समय इस बात के प्रति सावधान रहता है कि गलती से भी उस लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन न हो जाये जिसका पालन करने की शपथ उसने ली है.
                        लेकिन मुनाफ़ाखोरी की बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने समाज के तमाम मूल्यों,संस्कारों,निष्ठाओं और सरोकारों की जड़ को खोखला बनाना शुरू कर दिया है.जब पैसा ही समाज में पेशा और मुनाफ़ा संस्कार बन जाए तो किसी भी व्यवसाय का पतन सुनिश्चित है. समाज में आ रहे इन सामाजिक-आर्थिक बदलावों,टीवी-फिल्मों और घर-घर में मौजूद इंटरनेट से मिले खुलेपन,समाज में बढ़ते आपसी अविश्वास,धार्मिक-जातिगत खाइयों के चौड़े होने तथा मानसिक-सांस्कृतिक पतन के कारण संबंधों की पतली परन्तु मज़बूत डोर भी तार-तार हो रही है.जब भाई-बहन,माँ-बेटे और पिता-पुत्री जैसे सबसे विश्वसनीय,प्रगाड़ और सम्मानजनक रिश्तों पर अंगुलियां उठने लगी हैं तो डॉक्टर एवं मरीज का रिश्ता कैसे इस अविश्वास से बच सकता है. मेरे कहने का आशय यह कतई नहीं है मरीज जान-बूझकर डाक्टरों को निशाना बना रहे हैं या फिर डॉक्टर अपनी सीमा लाँघ रहे हैं.हो सकता है चंद कुत्सित इरादों वाले लोग ऐसा सोच-समझकर करते भी हो परन्तु एक-दो लोगों की गलती के आधार पर पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं ठहराया जा सकता.हाँ अब बदलते परिवेश और सोच के इस वातावरण में डॉक्टरों को भी अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरुरत है वरना वह दिन दूर नहीं जब कोई महिला मरीज या तो किसी पुरुष डॉक्टर के पास इलाज के नहीं जायेगी और जाना भी पड़ा तो वह डॉक्टर के केबिन में अपने साथ किसी रिश्तेदार को लेकर जायेगी. हो सकता है भविष्य में ऐसी उपचार विधि या मशीन बनानी पड़े जिससे डॉक्टर अपने मरीज को छुए बिना ही इलाज कर सकें.

रविवार, 21 अगस्त 2011

तो क्या अब इंसान बनाएगा ‘रेडीमेड’ और ‘डिजाइनर’ बच्चे...!

भविष्य में इंसान यदि अपने आपको भगवान घोषित कर दे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि उसने अपनी नई और अनूठी खोजों से भगवान की सत्ता को ही सीधी चुनौती दे दी है.किराए की कोख और परखनली शिशु(टेस्ट ट्यूब बेबी) के बाद अब तो वैज्ञानिकों ने बच्चे के आकार-प्रकार में भी परिवर्तन करना शुरू कर दिया है.इसका मतलब है कि अब हर बैठे डिजाइनर और रेडीमेड बच्चे पैदा किया सकेंगे.इसीतरह अपने परिवार के किसी खास सदस्य को भी फिर से बच्चे के रूप में पैदा किया जा सकेगा.यही नहीं इस दौरान उस व्यक्ति की कमियों को दूर कर उसे पहले से बेहतर बनाकर जन्म दिया जा सकेगा.यदि इसमें कापीराइट या पेटेन्ट जैसी कोई बाधा नहीं आई तो घर-घर में आइंस्टीन,महात्मा गाँधी,हिटलर,विवेकानंद,नेल्सन मंडेला,अमिताभ बच्चन,मर्लिन मुनरो,दाउद इब्राहिम या इसीतरह के अन्य नामी-बदनाम व्यक्तियों को बच्चे के रूप में पाया जा सकेगा.
                    अब तक तो हमने देश-विदेश में राजाओं के नामों में दुहराव के बारे में खूब सुना है जैसे हमारे देश में बाजीराव प्रथम,बाजीराव द्वितीय या इंग्लैंड में विलियम वन,विलियम टू,हेनरी प्रथम,द्वितीय एवं तृतीय.लेकिन सोचिये यदि इनके नाम ही नहीं बल्कि रंग-रूप,चरित्र और चेहरा-मोहरा भी एक समान हो जाए तो क्या होगा? देश में सैकड़ों साल तक एक ही बाजीराव या विलियम या हेनरी का शासन बना रहेगा.कांग्रेस में इंदिरा युग,भाजपा में वाजपेयी-आडवानी या लालूप्रसाद,मुलायन,पासवान जैसे नेता अनंत काल तक बने रहेंगे.सरकारों को भी किसी जेपी,अन्ना हजारे या स्वामी रामदेव के आमरण अनशन से डरने की जरुरत नहीं होगी क्योंकि एक अन्ना के बाद दूसरा अन्ना और एक रामदेव के बाद दूसरा रामदेव तैयार किया जा सकेगा.
                                  दरअसल यह संभव हो रहा है वैज्ञानिकों द्वारा डीएनए में किये गए बदलाव से और यह बदलाव भी ऐसा कि कुदरत के करिश्मे को ही पीछे छोड़ दिया गया है.हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक जीवशास्त्री ने चूजे के डीएनए में परिवर्तन कर उसकी चोंच को घड़ियालों में पाए जाने वाले थूथन का सा बना दिया है.सामान्य भाषा में इसे घड़ियाल के मुंह वाला चूजा कहा जा सकता है.इसके लिए मुर्गी के अण्डों में एक छेद कर भ्रूण विकसित होने से पहले जिलेटिन जैसे प्रोटीन का एक छोटा सा दाना डाल दिया गया और चूजा घड़ियाल के मुंह वाला हो गया. अब वैज्ञानिकों का दावा है कि डीएनए परिवर्तन में मिली इस सफलता के जरिये मानव शिशुओं में भी जन्म से पहले बदलाव लाये जा सकते हैं.इस उपलब्धि का एक अच्छा पहलू तो यह है कि इससे शिशुओं की जन्मजात विकृतियों को गर्भ में ही ठीक किया जा सकेगा और कोई भी शिशु मानसिक या शारीरिक विकृति के साथ जन्म नहीं लेगा.
                               इस उपलब्धि के सदुपयोग से ज्यादा दुरूपयोग की आशंका है.इसी मामले में देखे तो घड़ियाल के मुंह वाला चूजा अब दाना चुगने तक को तरस जायेगा. यदि मानव के साथ ऐसा हुआ तो सोचिये मानव संरचना के साथ क्या-क्या और किस हद तक खिलवाड नहीं हो सकता है.कुदरत द्वारा वर्षों के परिश्रम के बाद तैयार संतुलित मानव शरीर को पैसे,शक्ति और शोध के दम पर कोई भी व्यक्ति मनचाहा रूप दे सकेगा.यह बात भले ही अभी दूर की कौड़ी लगे लेकिन हो सकता है भविष्य में फिर कोई हिटलर,सद्दाम या इन्हीं की तरह का तानाशाह रोबोट की तरह काम करने वाले मानवों की फौज तैयार कर ले या दुनिया पर हुकूमत का सपना देख रहा कोई सिरफिरा कुदरत पर इस जीत को मानव सभ्यता के लिए अभिशाप में बदल दे.

रविवार, 14 अगस्त 2011

आज़ादी का जश्न या डरपोक-भयभीत लोगों का एक दिन....!


जगह-जगह ए के-४७ जैसी घातक बंदूकों के साथ रास्ता रोककर तलाशी लेते दिल्ली पुलिस के सिपाही, सड़कों पर दिन-रात गश्त लगाते कमांडो, रात भर कानफोडू आवाज़ के साथ सड़कों पर दौड़ती पुलिस की गाडियां, फौजी वर्दी में पहरा देते अर्ध-सैनिक बलों के पहरेदार, होटलों और गेस्ट-हाउसों में घुसकर चलता तलाशी अभियान और पखवाड़े भर पहले से अख़बारों-न्यूज़ चैनलों और दीवारों पर चिपके पोस्टरों के माध्यम से आतंकवादी हमले की चेतावनी देती सरकार.....ऐसा नहीं लग रहा जैसे देश पर किसी दुश्मन राष्ट्र की नापाक निगाहें पड गई हों लेकिन घबराइए मत क्योंकि न तो दुश्मन ने हमला किया है और न ही देश किसी मुसीबत में है बल्कि यह तो हमारे राष्ट्रीय पर्व स्वतन्त्रता दिवस पर की जा रही तैयारियां हैं.
   किसी भी मुल्क के लिए शायद इससे बड़ा दिन और कोई हो ही नहीं सकता क्योंकि गुलामी की जंजीरों को तोड़कर,लाखों-करोड़ों कुर्बानियों और कई पीढ़ियों के सतत संघर्ष के बाद हासिल स्वतन्त्रता की सालगिरह के जश्न से बढ़कर और क्या हो सकता है?लेकिन क्या छह दशक के बाद हम अपने आपको आज़ाद कह सकते हैं?क्या आसमान में उड़ते परिंदे,कलकल बहती नदियों और तन-मन को छूकर गुजरती सरसराती हवा के मानिंद आज़ाद हैं हम?बचपन में अलसुबह खुशी-खुशी नारे लगाती प्रभात फेरी वालों की टोली अब कहीं नज़र आती है और क्या हम अपने परिजनों को निडरता से लाल किले पर होने वाले समारोह में जाने दे सकते हैं?या किसी भी महानगर खासतौर पर दिल्ली में स्वतन्त्रता दिवस से डरावना दिन और कोई होता है क्योंकि इस दिन के पखवाड़े भर पहले से कई दिन बाद तक आतंकी हमलों का भय बना रहता है.   
     लोकतंत्र यानी जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा....इसीतरह स्वतंत्रता दिवस अर्थात जनता का राष्ट्रीय पर्व पर क्या आम जनता अपने इस राष्ट्रीय त्यौहार को उतने ही उत्साह के साथ मना पाती है जितने उत्साह से देश में होली,दिवाली,क्रिसमस और ईद जैसे धार्मिक-सामाजिक पर्व मनाये जाते हैं? राष्ट्रीय पर्व को उत्साह से मनाना तो दूर उलटे जनता से अपेक्षा की जाती है कि वह इस दिन आपने घर से ही न निकले और यदि देश भर से कुछ हज़ार लोग इस राष्ट्रीय पर्व का आनंद उठाने के लिए सड़कों पर निकलते हैं तो उन्हें बंद रास्तों, छावनी बनी दिल्ली और दिल तोड़ देने वाली पुलिसिया तलाशी से इतना परेशान होना पड़ता है कि भविष्य में वे भी तौबा करना ही उचित समझते हैं. असलियत में देखा जाये तो धार्मिक-सामाजिक उत्सवों की हमारे देश में कोई कमी नहीं है जबकि राष्ट्रीय पर्व महज गिनती के हैं.वैसे भी स्वतन्त्रता दिवस का अपना अलग ही महत्त्व है. करोड़ो रुपये में होने वाले आज़ादी के इस जलसे का उत्साह मीडिया में तो खूब नज़र आता है क्योंकि विज्ञापनों से पन्ने भरे रहते हैं, स्वतन्त्रता दिवस की तैयारियों की खबरों से पन्ने रंग जाते हैं परन्तु आम जनता जिसके लिए यह सारा ताम-झाम होता है वह इससे महरूम ही रह जाती है. बस उसे अखबार पढ़कर और न्यूज़ चैनलों के चीखते-चिल्लाते और डराने का प्रयास करते एंकरों के जरिये इस आयोजन में भागीदारी निभानी पड़ती है. अब तो टीवी पर बढ़ती चैनलों की भीड़ ने लोगों को घर पर भी आज़ादी के जश्न का मज़ा लेने की बजाये इस दिन आने वाले मनोरंजक कार्यक्रमों और छोटे परदे पर बड़ी फिल्मों को देखने का लालच देना शुरू कर दिया है इसलिए घर बैठकर राष्ट्रीय पर्व मनाने की परंपरा दम तोड़ने लगी है.ऐसा न हो कि इस लापरवाही के चलते हमारा यह सबसे पावन पर्व अपनी गरिमा खोकर सरकारी औपचारिकता बनकर रह जाए और भविष्य की पीढ़ी को इस आयोजन के लिए वीडियो देखकर ही काम चलाना पड़े...? तो आइये आपने इस महान पर्व को बचाएं और इस बार खुलकर स्वतन्त्रता दिवस मनाये और घर घर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहराएँ ताकि इस आयोजन को बर्बाद करने के मंसूबे पाल रहे लोगों के मुंह पर भी हमेशा के लिए ताला लगाया जा सके...

सोमवार, 8 अगस्त 2011

यहाँ पुरुष ,महिला है और बूढ़ा, सजीला जवान

इंटरनेट के आभाषी(वर्चुअल) गुण के कारण तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट हमें एक आभाषी दुनिया का हिस्सा तो बना रही है परन्तु वास्तविक दुनिया से दूर भी कर रही हैं. यहाँ सब-कुछ नकली है,लोगों के नाम,उम्र,पता,फोटो और खासतौर पर लिंग सब झूठे होते हैं.यहाँ पुरुष सामान्तया महिला बनकर और महिलाएं पुरुष बनकर मिलती हैं.पचास साल का व्यक्ति या तो स्वयं को नौजवान दिखायेगा या फिर आयु छिपाने के लिए अपने जन्म का साल ही नहीं लिखेगा.इस सबसे बढ़कर बात यह है कि यहाँ मौजूद लोग अपनी जवानी के दिनों की फोटो लगाए नज़र आते हैं और यदि बदकिस्मती से जवानी में भी खुदा ने नूर नहीं बख्शा था तो फिर किसी फिल्मी सितारे का मुखौटा लगाना तो सबसे आसान है.यदि आपके पास एक अदद सुन्दर-जवान चेहरा और महिला का अच्छा सा नाम है तो फिर आपके पास सोशल नेटवर्किंग साइट पर दोस्तों की लाइन लग जायेगी.महिला द्वारा लिखे गए “उफ़ आज सोमवार है”जैसे फालतू ‘स्टेटस’ पर भी टिपण्णी करने वालों की लाइन लग जायेगी और “लाइक’ करने वाले तो सैकड़ों में होंगे लेकिन यदि आप जवानी तथा खूबसूरत महिला होने जैसी खूबियों से लबरेज नहीं हैं तो विद्वान होने के बाद भी शायद आपकी तथ्यपरक बातों को प्रशंसा हासिल करने के यहाँ तरशना पड सकता है क्योंकि यहाँ नकली,बनावटीपन और झूठ भरपूर बिकता है.आखिर बिके भी क्यों नहीं जब यह दुनिया ही नकली है.
                  इस दुनिया के नकलीपन की असलियत यह है कि यहाँ “मेरे पिताजी का निधन हो गया है” जैसी असली खबर को लोग ‘लाइक’ कर लेते हैं और दिखावा इतना कि लंच में दफ़्तर में बैठा एक व्यक्ति इंटरनेट पर अपने ही दफ़्तर के दूसरे या फिर एक साथ कई सहकर्मियों के साथ बिना बोलेइं वेबसाइटों के जरिये बतियाना ज्यादा पसंद करता है,पति अपनी ही पत्नी(वैसे दूसरों की पत्नियों से ज्यादा) से और माँ अपने बच्चों से नेट पर गपिया रही है,दोस्तों का तो पूछिए ही मत वे तो आमने सामने बैठकर भी लैपटाप या मोबाइल पर नेट के जरिये चेटिंग करते दिखाई देंगे और प्रेमी जोड़ों के लिए तो यह भगवान का वरदान है.दरअसल में यह इंटरनेट की दुनिया है तो असली रिश्तों को बनावटीपन का नया आयाम दे रही है.
                               इस बनावटी दुनिया के नशे का यह आलम है कि सुबह से शाम तक कम्प्यूटर पर आँखे गडाये, बिजली गुल हो जाने पर मोबाइल फोन के नेट पर टूट पड़ने वाले, अपने आप में हँसते-परेशान होते और फिर सभी को अपने प्रशंसकों की संख्या एवं टिप्पणियों से अवगत करते लोगों को आप अपने घर,पड़ोस या फिर आस-पास कभी भी कही भी देख सकते हैं.ऐसे लोग बिलकुल अलग नज़र आते हैं जो आमतौर पर खुद में खोये लगेंगे और घर,दफ्तर,बस,मेट्रो जैसी तमाम निजी और सार्वजनिक जगहों पर भरपूर मात्रा में मिलेंगे.
                               दरअसल,इन्टरनेट इन दिनों सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्ध निभाने,अपना सुख-दुःख बाँटने और एक –दूसरे की विद्वता के कसीदे काढ़ने का सबसे बड़ा अड्डा बन गया है. सबसे उम्दा सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट कहलाने वाली फेसबुक और ट्विटर,हाई फाइव,आरकुट,लिंक्डइन,माय स्पेस,माय इयरबुक,मीटअप,निंग,टेग्ड,माय लाइफ ,फ्रेंडस्टर जैसे विविध नाम वाली उसकी संगी-साथी वेबसाइटों ने एक ऐसी दुनिया बना दी है जिसमें समाहित होने को लोग बेताब हैं.लेकिन ये दुनिया कितनी झूठी,खोखली और बनावटी है इसका आभाष इस दुनिया का हिस्सा बनकर ही पता चलता है. वास्तविकता यह है कि सामाजिक रिश्ते-नाते बढ़ाने का दावा करने वाली ये तमाम वेबसाइट लोगों को समाज से ही दूर कर रही हैं और हम सब नकली आवरण ओढे तथा आकर्षक मुखौटे लगाकर इस दुनिया में अपनी असलियत खोने को बेताब हैं.

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

बिग बी का बच्चा.....!


'पूत के पाँव पालने में' और 'वो तो मुँह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुआ है' जैसे कुछ  बड़े ही प्रचलित मुहावरें हैं जो बच्चों के भविष्य की ओर इशारा करते हैं.बिग बी यानि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के घर भी नया मेहमान आने वाला है.वैसे किसी महिला का गर्भवती होना या किसी घर में नया मेहमान आना निश्चित ही पूरे परिवार के लिए खुशी और उल्लास का अनूठा अवसर होता है....आखिर इससे एक नई पीढ़ी का सृजन होता है और सृष्टि की अबूझ पहेलियों को साकार होते देखने का अवसर मिलता है लेकिन जब बात बिग बी के परिवार के बच्चे की हो तो इन चीज़ों को देखने के मायने ही बदल जाते हैं.जब से बिग बी ने एश्वर्या राय बच्चन के गर्भवती होने की खबर दी है तब से मीडिया से लेकर विज्ञापन जगत में यह खबर सरगर्मी से छाई हुई है.बाज़ार की भाषा में कहा जाए तो हर कोई इसको भुनाने में जुटा है.इस मामले में न तो खुद बिग बी पीछे हैं,न इस होने वाले बच्चे के पिता अभिषेक बच्चन और न ही खबरची.अब तो सट्टा कारोबारियों की नज़र-ए-इनायत भी इस बच्चे पर हो गई है.कहा जा रहा है इस नन्ही सी अजन्मी जान के लिंग (लड़का होगा या लड़की) पर ही अब तक करोड़ों रुपये का सट्टा लग चुका है.अगर यही हाल रहा तो उसके जन्म लेने तक उसके रंग,चेहरा-मोहरा किसके जैसा होगा,आँखे एश्वर्या जैसी होंगी या नहीं,आवाज़ और कद बिग बी पर जायेंगे या नहीं, वह अपने दादा और माँ की तरह सफल होगा या फिर अपने पिता की तरह फ्लॉप जैसी तमाम बातों पर सट्टा और मीडिया बाज़ार सक्रिय हो जायेगा.हो सकता है किसी न्यूज़ चैनल के प्राइम टाइम में बैठे कोई ज्योतिषी महोदय एश्वर्या के लक्षणों और बिग बी की गृह दशा के आधार पर इस बच्चे के भूत-वर्तमान और भविष्य का पिटारा खोल दें.
        वैसे जो भी हो,बिग बी का यह बच्चा अभी से कमाई करने लगा है.इन दिनों छोटे परदे पर एक मोबाइल कंपनी की थ्री-जी सेवा का विज्ञापन करते हुए खुद अभिषेक बच्चन अपने बच्चे का ज़िक्र करते नज़र आते हैं.इसके पहले भी एक साबुन के विज्ञापन में अभिषेक -ऐश्वर्या इशारों ही इशारों में बच्चा होने की 'गुड न्यूज़' बताते दिखे थे.सट्टा बाज़ार तो दांव लगा ही रहा है,बिग बी के ट्विट पढ़ने वाले भी बढ़ गए हैं क्योंकि अब सभी ये जानना चाहते हैं कि 'बिग डी अर्थात भविष्य के दादा' अपने पोते को लेकर क्या नई-नई जानकारियां देते हैं.हो सकता है कि वे कभी लिखे कि 'आज बच्चे ने अपनी माँ के पेट में लात मारी या उन्होंने उसे हनुमान चालीसा पढ़कर सुनाई या 'ऐश' इन दिनों मेरी सुपरहिट फ़िल्में देख रही हैं ताकि यह बच्चा अपने पा(अभिषेक) की लगातार फ्लॉप फिल्मों से शुरुआत न करे....इत्यादि इत्यादि.भविष्य में जो भी हो फिलहाल तो इस "जूनियरमोस्ट बिग बी" ने विवादों को गले लगाना शुरू कर दिया है तभी तो मधुर भंडारकर जैसा दिग्गज और समझदार  निर्देशक भी अपनी फिल्म "हीरोइन" के नहीं बन पाने वजह इसी बच्चे को मान रहा है और सरेआम किसी भी अभिनेत्री से मातृत्व का अधिकार छीनने के लिए मायानगरी में पैसा लगाने वालों को लामबंद कर रहा है.शायद इसी को कहते हैं पूत के पाँव पालने में.....!         

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

कमज़ोर ‘पेट’ वाले इसे जरुर पढ़ लें...वरना पछताएंगे

मामू आमिर खान और भांजे इमरान खान द्वारा रचा “डेली वेली” नामक तमाशा देखा.यह गालियों,फूहड़ता,अश्लीलता और छिछोरेपन के मिश्रण से रची एक चुस्त, तेज-तर्रार और सटीक रूप से सम्पादित रियल लाइफ से जुडी कामेडी फिल्म है. जिन लोगों ने छोटे परदे पर फूहडता के प्रतीक ‘एम टीवी’ पर शुरूआती दौर में साइरस ब्रोचा द्वारा बनाये गए विज्ञापन और कार्यक्रम देखे हैं तो उन्हें यह फिल्म उसी का विस्तार लगेगी और शुचितावादियों को हमारी संस्कृति के मुंह पर करारा तमाचा. यदि उदाहरण के ज़रिये बात की जाए तो हाजमा दुरुस्त रखने के लिए हाजमोला की एक-दो गोली खाना तो ठीक है लेकिन यदि पूरा डिब्बा ही दिन भर में उड़ा दिया जाए तो फिर हाजमे और पेट का भगवान ही मालिक है.मामा-भांजे की जोड़ी ने इस फिल्म के जरिये यही किया है.अब यदि आप का पेट पूरा डिब्बा हाजमोला बर्दाश्त कर सकता है तो जरुर देखिये काफी मनोरंजक लगेगी और यदि कमज़ोर पेट के मालिक हैं तो डेली वेली को देखने की बजाये समीक्षाओं से ही काम चला ले. हाँ, जैसे भी-जहाँ भी देखे कम से कम परिवार(माँ,बहन,बेटी-बेटा,पिता,भाई और पत्नी भी) को साथ न ले जाएँ वरना साथ बैठकर न तो वे फिल्म का आनंद उठा पाएंगे और न ही आप....यह फिल्म अकेले-अकेले देखने(दोस्त शामिल) और अलग-अलग पूरा मज़ा लेने की है....तो आपका क्या इरादा है?
यदि आप भूले नहीं हो तो मामा-भांजे की यही जोड़ी कुछ दिन पहले शराबखोरी के समर्थन में जहाँ-तहां बयानबाज़ी करती फिर रही थी.मसला यह था कि महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में शराब पीने की सरकारी उम्र अठारह साल से बढ़ाकर इक्कीस बरस कर दी थी.अब इनकी आपत्ति यह थी कि युवाओं से शराब पीने का अधिकार क्यों छीना जा रहा है.खान द्वय का तर्क यह है कि जब युवा अठारह साल की उम्र में मतदान कर सकते हैं तो शराब क्यों नहीं पी सकते? यह तर्क तो लाज़वाब है पर क्या शराब पीना मतदान करने जैसा काम है?शराब इतनी जरुरी चीज है कि उससे देश के युवा महज तीन साल की जुदाई भी सहन नहीं कर सकते?क्या शराबखोरी इतना फायदेमंद है कि देश के सबसे संवेदनशील कलाकारों में गिने जाने वाले आमिर खान तक उसके पक्ष में कूद पड़े? कहीं यह ‘डेली वेली’ फिल्म के प्रचार के लिए तो नहीं था?आमतौर पर फिल्मों के प्रचार के लिए ये हथकंडे अपनाए जाते हैं.कहीं ऐसा तो नहीं कि आज केवल शराब की बात हो रही है पर कल शादी की उम्र पर भी इसीतरह की आपत्ति होने लगे कि युवा जब अठारह साल में वोट डाल सकते हैं तो शादी क्यों नहीं कर सकते? वैसे आमिर ने अपनी फिल्म के द्वारा यही सब दिखाने/सिखाने का प्रयास किया है. अब फैसला युवाओं को ही करना है कि उनको ‘डेली वेली’ के रास्ते पर चलना है या इस रास्ते के खिलाफ कदम उठाना है....!

सोमवार, 4 जुलाई 2011

अन्ना हजारे और हमारे चरित्र का दोगलापन!


शुरुआत एक किस्से से-एक सेठ प्रतिदिन दुकान बंदकर एक संत के प्रवचन सुनने जाते थे और सभी के सामने उस संत का गुणगान कुछ इसतरह करते थे कि मानो उनके समान कोई और संत है ही नहीं और सेठ जी के समान संत का कोई अनुयायी. सेठ जी प्रवचन स्थल पर संत की हर बात का आँख मूंदकर पालन करते थे. संत अपने प्रवचनों में आमतौर पर प्रत्येक जीव से प्रेम करने की बात कहते और मूक जीव-जंतुओं के साथ मारपीट नहीं करने की सीख देते थे. एक दिन सेठ जी प्रवचन में अपने बेटे को भी लेकर गये.बेटे ने श्रद्धापूर्वक संत की बातें सुनी और उन पर अमल की बात मन में गाँठ बाँध ली. कुछ दिन बाद सेठ जी दुकान बेटे के भरोसे छोड खुद प्रवचन सुनने जाने लगे. एक दिन दुकान में एक गाय घुस गयी और दुकान में रखा सामान खाने लगी। यह देखकर सेठ जी का बेटा गाय के पास बैठ गया और उसे सहलाने लगा। थोडी देर बाद जब सेठजी दुकान पहुंचे तो यह दृश्य देखकर आग बबूला हो गए और बेटे को भला-बुरा कहने लगे. इस पर बेटे ने संत के प्रवचनों का उल्लेख करते हुए कहा कि गाय को कैसे हटाता, वह तो अपना पेट भर रही थी और उसे मारने पर जीवों पर हिंसा होती. इस पर सेठ ने कहा ‘बेटा प्रवचन सिर्फ वहीँ सुनने के लिए होते हैं बाहर आकर जीवन में अपनाने के लिए नहीं.’ कुछ यही स्थिति हमारे समाज की है.इसका नवीनतम उदाहरण अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान उमडा जनसमूह और उसकी कथनी और करनी में अन्तर है.
                अन्ना हजारे सार्वजनिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए ‘लोकपाल’ के गठन के लिए संघर्ष कर रहे हैं और आश्चर्य की बात यह है कि अपने कार्य व्यवहार में भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चुका मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग ही उनका सबसे बड़ा समर्थक बनकर उभरा है.सरकारी दफ्तरों में खुलेआम रिश्वत लेने वाले बाबू जंतर-मंतर से लेकर आज तक अन्ना के सबसे बड़े पैरोकार हैं.कार्यालीन समय में काम की बजाये बाहर खड़े होकर चाय-पकोड़ी खाते हुए सरकारी कर्मचारी अन्ना के जरिये व्यवथा परिवर्तन का स्वप्न देख रहे हैं और दफ्तर के अंदर जाते ही फिर कामचोरी/रिश्वत/चुगली या फिर भ्रष्टाचार के नए-नए तरीके खोजने में जुट जाते हैं.दफ्तर में बैठकर वे तमाम तरह के कर बचाने और दूसरों को कर चोरी करने के गुर सिखाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. यही वर्ग बेटे की शादी में पैसे के फूहड़ प्रदर्शन करने,मनमाना दहेज लेने, दहेज की कमी पर बहू के साथ मारपीट, संतान के रूप में सिर्फ पुत्र की कामना करने और बेटे के लिए कई अजन्मी बेटियों को कोख में ही मार डालने,बाल विवाह का समर्थन करने और व्यवस्था बदलने का वक्त आने पर मतदान के दिन छुट्टी मनाने के लिए बखूबी जाना जाता है .
                    इसीतरह किसी भी प्रदर्शन-आंदोलन में सबसे आगे झंडा लेकर चलने वाला युवा वर्ग परीक्षा में नक़ल करने,पढ़ाई से बंक मारकर सिनेमा देखने,पैसे देकर प्रश्नपत्र खरीदने,लड़कियों के साथ छेड़खानी,लाइन तोड़कर फीस भरने,फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिये स्कूल-कालेज में एडमिशन लेने,रिश्वत देकर नौकरी का जुगाड़ करने जैसे उन तमाम कामों में जुट जाते हैं जिनका वे अन्ना के साथ मिलकर विरोध करते रहे हैं.
                         अन्ना या उनकी तरह के आंदोलनों में आर्थिक रूप से सहभागी बनने वाला उच्च वर्ग और कारपोरेट जगत तो देश की साफ़-सुथरी व्यवस्था को पदभ्रष्ट करने और रिश्वत की संस्कृति के संरक्षक के रूप में जाना जाता है.कारपोरेट जगत पर काला धन जमा करने,कर चोरी,सहकारी और स्थानीय तौर पर ग्रामीण उत्पादों के प्रचार-प्रसार में जुटी संस्थाओं को खत्म कर बहुराष्ट्रीय उत्पादों को स्थापित करने,अपने कर्मचारियों का शोषण कर अधिकतम मुनाफा कमाने जैसे आरोप सामान्य रूप से लगते रहते हैं.
          जरा सोचिये हमारी कथनी और करनी में कितना अंतर है?हम जिन बातों के खिलाफ झंडाबरदार बन रहे हैं निजी जीवन में उन्ही बातों पर अमल करने में सबसे पीछे हैं.क्या अन्ना हजारे,स्वामी रामदेव या किसी अन्य के नेतृत्व में नारे लगाने भर से देश में भ्रष्टाचार मिट जायेगा?जब हमारे आचार-व्यवहार में इतना फर्क है तो क्या एक लोकपाल भर बन जाने से सब कुछ ठीक हो जायेगा?अगर हम व्यक्तिगत स्तर पर अपनी इस कथनी और करनी को दुरुस्त कर लें तो फिर न तो किसी लोकपाल की जरुरत होगी और न ही सरकारी डंडे की. ज़रा सोचिये.....?



शनिवार, 4 जून 2011

क्या सलमान-शाहरूख तय करेंगे सत्याग्रह का भविष्य!


                                अपनी ऊल-जलूल हरकतों और गैर क़ानूनी आचरण के लिए चर्चित सलमान खान इन दिनों टीवी चैनलों पर बता रहे है कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए स्वामी रामदेव को धरना/अनशन/सत्याग्रह जैसा कदम नहीं उठाना चाहिए? वही अपने सिद्धांतों से ज्यादा पैसे को तरजीह देने वाले एक और कलाकार या मीडिया और चापलूसों के ‘किंग खान’ शाहरूख भी देश में भ्रष्टाचार की रोकथाम और काले धन को वापस लाने के लिए स्वामी रामदेव द्वारा शुरू किये गए सत्याग्रह की मुखालफत कर रहे हैं.वैसे इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि शाहरूख और सलमान उम्दा कलाकार हैं.उनकी फिल्में जनमानस को गहरे तक प्रभावित करती हैं.इन फिल्मों से समाज में कोई बदलाव भले ही नहीं हो पर इनमे मनोरंजन का तत्व तो होता ही है.चंद घंटों के “अभिनय” के लिए करोड़ों रुपये कमाने वाले ये दोनों कलाकार फिल्मी दुनिया के सैकड़ों लोगों का पेट भरने का माध्यम तो हैं ही.समाज के प्रति उनके इस योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वे समाज और देश की बेहतरी के लिए किये जा रहे प्रयासों का विरोध करें या इसपर अपना ज्ञान प्रदर्शित करें.
                                   “कलाकार”जैसे सम्मानित पेशे को अंगूठा दिखाकर पैसे कमाने के लिए शादियों/बारात/और जन्मदिन तक में नाचने वाले शाहरूख खान स्वामी रामदेव को सलाह दे रहे हैं कि जिसका जो काम है उसे वही करना चाहिए.मतलब स्वामी रामदेव का काम योग सिखाना है तो उन्हें बस योग ही सिखाना चाहिए और देश की दुर्दशा पर शाहरूख की तरह चुप रहना चाहिए क्योंकि अपना (शाहरूख) जीवन तो अय्याशी से कट रहा है फिर देश भाड़ में जाता है तो जाता रहे अपने को क्या? वैसे प्रतिदिन अखबार पढ़ने वाले और हिन्दी-अंग्रेजी के न्यूज़ चैनलों में सर खपाने वाले जानते हैं कि इन्हीं शाहरूख खान के परम मित्र,व्यावसायिक भागीदार और पल पल के राजदार करीम मोरानी को कामनवेल्थ खेलों के दौरान 200 करोड़ रुपये की रिश्वत के लेन-देन आरोप में पकड़ा गया है और यही किंग खान कसम खा-खाकर मोरानी की बेगुनाही का दावा कर रहे थे.इसके पहले आईपीएल में शाहरूख की टीम पर सट्टेबाजी,टैक्स चोरी,नियमों से खिलवाड़ के आरोप लगते रहे हैं. अब रही बार सलमान खान की तो शायद उन्हें लगता है कि ‘बीइंग हयूमन’ की टीशर्ट पहनकर वे मानवता के प्रवक्ता बन गए हैं.अवैध शिकार के मामले में जेल की हवा खा चुके सलमान स्वामी रामदेव तक को नहीं जानते?इससे उनके दीन-दुनिया के प्रति सरोकारों को जाना जा सकता है. फिटनेस के गुरु माने जाने वाले सलमान यदि योग गुरु को नहीं पहचानते तो इसे उनकी नासमझी कहा जाए या स्टारडम का गुरुर!
                 मीडिया की ख़बरों और वित्तीय क्षेत्र के जानकारों की बातों पर गौर किया जाए तो फिल्मी दुनिया को काले धन का गढ़ माना जाता है.यहाँ प्रति फिल्म खर्च होने वाले करोड़ों रुपये अंडरवर्ल्ड के जरिए काले धन के रूप में आते हैं.यहाँ तक कि अनेक नामी सितारे टैक्स बचाने के लिए अपना भुगतान भी चैक या सफ़ेद धन की बजाए काले धन के रूप में लेना पसंद करते हैं.अब जब भ्रष्टाचार और काले धन पर रोक लगाने की बात चलेगी तो सबसे ज्यादा असर फिल्मी दुनिया के कामकाज पर ही पड़ेगा और शाहरूख-सलमान जैसे तमाम सितारों को होने वाली अनाप-सनाप कमाई भी कम हो जायेगी इसलिए इनका तिलमिलाना स्वाभाविक है. अगर शाहरूख–सलमान अपने दायित्वों को लेकर इतने ही जागरूक हैं तो उन्हें अपनी ओर से पहल करते हुए काले धन से बनी फिल्मों में न काम करना चाहिए और अपना मेहनताना भी चैक से लेना चाहिए.यदि ये दोनों साहस दिखायेंगे तो अन्य सितारों को भी मन मारकर नई व्यवस्था से तालमेल बिठाना पड़ जायेगा. यदि उनमें ऐसा करने की हिम्मत नहीं है तो उन्हें ‘व्यवस्था परिवर्तन’ की मुहिम में रोड़ा नहीं बनना चाहिए अन्यथा जो आम जनता(प्रशंसक) उन्हें अभी सर आँखों पर बिठा रही है वह उन्हें जमीन दिखाने में भी देर नहीं लगायेगी.

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

छी,हम इंसान हैं या हाड़-मांस से बनी मशीनें


हम कैसे समाज में जी रहे हैं?यह इन्सानों की बस्ती है या फिर हाड़-मांस की बनी मशीनों का संसार! यदि समाज में मानवीय सरोकार न हों,मतलबपरस्ती बैखोफ पसरी हो और एक-दूसरे के प्रति संवेदनाएं दम तोड़ चुकी हों तो फिर उसे मानवीय समाज कैसे माना जा सकता है.इंसान तो इंसान जानवर भी किसी अपने की आवाज़ सुनकर उसमें सुर मिलाने लगते हैं,कुत्ते एक दूसरे की रक्षा में दौड़ने लगते हैं और कम ताक़तवर परिंदे भी अपने साथी पर ख़तरा भांपते ही चीत्कार करने लगते हैं और हम महानगरीय सांचे में सर्व-संसाधन प्राप्त लोग अपने से इतर सोचने की कल्पना भी नहीं करते.तभी तो दिल्ली जैसे जीवंत और मीडिया की चौकस नज़रों से घिरे महानगर में दो जीती-जागती,नौकरीपेशा और पारिवारिक युवतियां हड्डियों के ढांचे में तब्दील हो जाती हैं और हमारे कानों पर जूं भी नहीं रेंगती.वे छह माह तक अपने घर में कैदियों की रहती हैं पर पड़ोसियों को तनिक भी चिंता नहीं होती, उनका अपना सगा भाई उन बहनों की सुध लेना भी गंवारा नहीं समझता जिन्होंने उसको अपने पैरों पर खडा करने के लिए खुद का जीवन होम कर दिया.
                        समाज में आ रही जड़ता की यही एक बानगी भर नहीं है.आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आ रही है जिनसे पता लगता है कि हम कितने असंवेदनशील होते जा रहे हैं. इंसानी जमीर मर जाने का इससे बदतर उदाहरण क्या होगा कि एक युवती के साथ पिता समान पुरुष बलात्कार का प्रयास करता है और जब वह अपनी इज्ज़त बचाने और मदद के लिए भागती है तो लोग रक्षक बनने की बजाए खुद ही भक्षक बनकर बलात्कार करने लगते हैं.तो क्या अब इंसानियत खत्म हो गयी है?हमारे लिए अपने-पराये का अंतर पुरुष-महिला जिस्म बनकर रह गया है?बहन,बेटी,माँ-बाप,भाई,नाते-रिश्तेदार और पड़ोस जैसे तमाम सम्बन्ध भावनाओं को भूलकर शरीर बन गए हैं और हर व्यक्ति को बस शिकार की तलाश है फिर चाहे वह शिकार कोई अपना हो या पराया!
                              हमारा मिज़ाज कितना मशीनी हो गया है इसका एक और उदाहरण पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में देखने को मिला. संवेदनाहीन नियम-कानूनों का मारा एक परिवार सिर्फ इसलिए सामूहिक रूप से ज़हर खाकर आत्महत्या कर लेता है कि हमारा ‘सिस्टम’ उन्हें चंद दिन गुजारने के लिए एक अदद छत तक मुहैया नहीं करा सका.ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने चोरी-छिपे यह दुस्साहसिक कदम उठाया हो,लेकिन यांत्रिक सोच के कारण कोई उनका दर्द समझ ही नहीं सका और सार्वजनिक ऐलान के बाद भी न तो सरकार ने और न ही सामाजिक संगठनों ने उस परिवार को बचाने का कोई प्रयास किया.हाँ सामूहिक मौत के बाद अब ज़रूर अखबार संवेदनाओं से रंग गए हैं और सरकार घड़ियाली पश्चाताप से.कुछ यही हाल लुटेरों का शिकार होकर अपना एक पैर गंवाने वाली राष्ट्रीय खिलाड़ी अरुणिमा सोनू सिन्हा के मामले में देखने को मिला.न तो ठसाठस भरी ट्रेन में कोई उसकी मदद के लिए आया और न ही पटरी पर मरणासन्न पड़ी सोनू को अस्पताल ले जाने की जहमत किसी ने उठाई. क्या ये चंद मामले पूरी मानवता को कलंकित नहीं करते?मानव के मशीन में बदलने,हमारी बेखबरी,घर की चारदीवारी तक सिमट गयी चिंताओं,मरती संवेदनाओं और दरकते रिश्तों की घोषणा नहीं करते? दुनिया भर में अपने संस्कारों,सार्थक चिंतन और गहरे तक पैठी मानवीय परम्पराओं के लिए सराहा जाने वाला भारतीय समाज अब नोट छापने और दूसरे की छाती पर पैर रखकर सफलता हासिल करने की भेड़ चाल में लगा है जहाँ “पैसा संस्कार है,सुविधाएँ नाते-रिश्ते और सफलता जीवन”, फिर इसके लिए अपनों को ही कुर्बान क्यों न करना पड़े.











गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

समाज में फैले इन ‘सुपरबगों’ से कैसे बचेंगे...!


                     इन दिनों सुपरबग ने अखबारी चर्चा में समाजसेवी अन्ना हजारे और घोटालेबाज़ राजा तक को पीछे छोड़ दिया है.सब लोग ‘ईलू-ईलू क्या है...’ की तर्ज़ पर पूछ रहे हैं ‘ये सुपरबग-सुपरबग क्या है?...और यह सुपरबग भी अपनी कथित पापुलर्टी पर ऐसे इठला रहा है जैसे सुपरफ्लाप ‘गुज़ारिश’ हिट हो गयी हो या सरकार ने सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न से भी आगे बढ़कर ‘दुनिया रत्न’ से सम्मानित कर दिया हो.वैसे भारत के स्वास्थ्य पर्यटन या हेल्थ टूरिज्म से जलने वाले देश सुपरबग के डर को फैलाकर वैसे ही आनंदित हो रहे हैं जैसे किसान अपने लहलहाते खेत देखकर,नेता अपना वोट बैंक देखकर और व्यवसायी काले धन का भण्डार देखकर खुश होता है.इस (दुष्)प्रचार से एक बात तो साफ़ हो गयी है कि किसी भी शब्द के आगे ‘सुपर’ लगा दिया जाए तो वह हिट हो जाता है जैसे सुपरस्टार,सुपरहिट,सुपरकंप्यूटर,सुपरफास्ट,सुपरनेचुरल और सुपरबग इत्यादि. मुझे तो लगता है कि विदेशियों ने जान-बूझकर इसका नाम सुपरबग रखा है ताकि यह कुछ इम्प्रेसिव सा लगे.आखिर सुपरबग कहने/सुनने में जो मजा है वह केवल ‘बग’ में कहाँ!ऐसे समय हमें एक बार फिर अपने एक पूर्व प्रधानमंत्री याद आने लगे हैं जो हर मामले में विदेशी हाथ होने की बात करते थे.यदि वे आज होते तो दम के साथ कह पाते कि सुपरबग मामले में विदेशी हाथ है और यह बात उतनी ही सही है जितना कि काले धन के खिलाफ बाबा रामदेव का अभियान और माडल मोनिका पांडे का ‘न्यूड’ होने का एलान.
                            एक बात मेरी समझ के परे है कि इस सुपरबग को लेकर इतनी घबराहट क्यों?अरे हमारे देश के पानी का स्वाद ऐसे कई बग बरसों से बढ़ा रहे हैं...और फिर पानी तो क्या हमारी तो आवोहवा में ऐसे बगों की भरमार है.इनसे भी बच गए तो भ्रष्टाचार के सुपरबग से कैसे बचेंगे? यह सुपरबग तो देश के हर कार्यालय,मंत्रालय,सचिवालय और तमाम प्रकार के ‘लयों’ में मज़बूती से जड़े जमाये बैठा है और हर आमो-खास के भीतर घुसपैठ करता जा रहा है.इस से किसी तरह बच भी गए तो काले धन के सुपरबग से कैसे बचेंगे.यह तो दिन-प्रतिदिन अपना भार और संख्या बढ़ा रहा है.अब तो यह दूसरे मुल्कों में भी तेज़ी से ‘जमा’ होने लगा है.दशकों के परिश्रम के बाद भी हम महंगाई के सुपरबग का इलाज नहीं तलाश पायें हैं.अब तो यह गरीबों के साथ-साथ अन्य वर्गों का भी खून चूसने लगा है.इस सुपरबग की एक विशेषता यह है कि यह अपनी खुराक सरकारी बयानों से हासिल करता है.जब-जब भी हमारे नेता/मंत्री/सन्तरी और प्रधानमंत्री इस पर काबू पा लेने का बयान देते हैं महंगाई नामक यह सुपरबग और भी सेहतमंद हो जाता है.कई बार तो यह नमक,प्याज,टमाटर और दाल जैसी रोजमर्रा में भरपूर मात्रा में उपलब्ध वस्तुओं को संक्रमित कर उन्हें भी आम आदमी की पहुँच से बाहर कर देता है.कन्या भ्रूण ह्त्या और बेटियों को पैदा नहीं होने देने वाला सुपरबग तो भविष्य में महिला-पुरुष का अंतर ही बिगाड़ने पर तुला है और देश के कुंवारों को शायद विवाह-सुख से ही वंचित कर देगा.इस सुपरबग को निरक्षरता,अन्धविश्वास,कुरीतियों और रुढियों के सुपरबगों ने इतना शक्तिशाली बना दिया है कि हम चाहकर भी इसका समूल नाश नहीं कर पा रहे हैं.इसके अलावा जातिवाद,साम्प्रदायिकता,ऊंच-नीच,भेदभाव,बाल विवाह,अशिक्षा,बेरोज़गारी,प्रतिभाओं का पलायन,गरीबी,छुआछूत जैसे अनेक सुपरबग वर्षों से हमारी जड़ों को खोखला बना रहे हैं और हम पानी में मौजूद एक अदने से सुपरबग से घबरा रहे हैं.अरे जब हमारी रग-रग में व्याप्त ये घातक सुपरबग हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाए तो इस नए नवेले एवं अनजान से सुपरबग की क्या बिसात...!



बुधवार, 6 अप्रैल 2011

आज ‘भारत रत्न’ तो कल शायद ‘परमवीर चक्र’ भी!



              सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न क्यों? उनसे पहले प्रख्यात समाजसेवी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने वाले अन्ना हजारे को क्यों नहीं? देश में चुनाव सुधारों की नीव रखने वाले टी एन शेषन,योग के जरिए देश-विदेश में भारत का डंका पीटने वाले स्वामी रामदेव, बांसुरी की सुरीली तान से मन मोह लेने वाले पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, अभिनय और फिल्मों से भारतीय सिनेमा की दशा और दिशा तय करने वाले मशहूर अभिनेता राज कपूर-गुरुदत्त, अपनी लेखनी से प्रेम और आग एकसाथ बरसाने वाले गीतकार गुलज़ार,आईटी के क्षेत्र में क्रांति लाकर लाखों नौजवानों को सम्मानजनक दर्ज़ा दिलाने वाले उद्योगपति नारायण मूर्ति-अज़ीम एच प्रेमजी, देश के लिए सर्वत्र न्योछावर कर देने वाले शहीद भगत सिंह-चंद्रशेखर आज़ाद, दुनिया भर में ज्ञान और चेतना का पर्याय स्वामी विवेकानंद,पुलिस से लेकर समाजसेवा तक में सबसे आगे किरण बेदी, विविध स्वरों की सम्राज्ञी आशा भोंसले जैसे तमाम ऐसे नाम हैं जो न केवल इस सम्मान के हक़दार हैं बल्कि इस सम्मान को और भी गौरवान्वित करने का माद्दा रखते हैं.लेकिन इन तमाम नामों के लिए कोई विधानसभा या कोई संगठन प्रस्ताव पारित नहीं कर रहा.
                         दरअसल मीडिया की ‘हल्ला ब्रिगेड’ को दिन भर न्यूज़ चैनलों पर बौद्धिक जुगाली करने के लिए कोई न कोई विषय या विवाद चाहिए.विश्व कप क्रिकेट के बाद बेस्वाद लग रहे न्यूज़ चैनलों पर टीआरपी की आग तापने के लिए उन्हें सचिन को भारत रत्न के रूप में एक नया मुद्दा हाथ लग गया है.आज वे भारत रत्न के नाम पर हो-हल्ला मचा रहे हैं.यदि सरकार दवाब में आ गयी(जिसकी संभावना लग रही है) तो कल शायद किसी क्रिकेटर को ‘परमवीर चक्र’ देने की मांग करने लगे? सचिन तेंदुलकर के नाम पर अपनी दुकान जमाने में लगे इन बाइट-वीरों और मौकापरस्त नेताओं को शायद यह भी नहीं पाता होगा कि भारत रत्न हमारे देश का वह सर्वोच्च नागरिक सम्मान है जो कला,विज्ञान और साहित्य के क्षेत्रों में असाधारण उपलब्धियों और सर्वोत्कृष्ट लोकसेवा के लिए दिया जाता है.इसकी शुरुआत २ जनवरी १९५४ से हुई और अब तक ४१ अतिविशिष्ट हस्तियों को यह सम्मान दिया जा चुका है उनमें से कोई भी खिलाड़ी नहीं है.
                               सर्वप्रथम तो खिलाड़ी इस सम्मान के दायरे में ही नहीं आते. हर क्षेत्र के लिए सरकार अलग-अलग सम्मान देती है मसलन खेलों के लिए राजीव गाँधी खेल रत्न है तो सर्वोच्च वीरता के लिए परमवीर चक्र.वैसे भी खेलों केनाम पर पहले ही अनेक पुरूस्कार है.आज यदि सचिन को भारत रत्न दिया गया तो कल कोई परमवीर चक्र भी मांग सकता है या कोई सैनिक भारत रत्न या खेल रत्न की मांग कर सकता है. फिर भी यदि सभी नियम-कानूनों को ताक पर रखकर यदि किसी खिलाड़ी को यह सम्मान दिया जाता है तो उड़न सिख मिल्खा सिंह ,पी टी ऊषा,पहली बार विश्व कप जीतने वाले कपिल देव,हाकी के जादूगर मेजर ध्यान चंद,टेनिस की सनसनी लिएंडर पेस,बैडमिंटन की दिग्गज सायना नेहवाल या इसीतरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले किसी और खिलाडी से शुरुआत क्यों न की जाए? उसके बाद सचिन का भी नंबर आये. इसमें कोई शक नहीं है कि सचिन बेमिसाल हैं लेकिन देश ने भी उनके लिए पलक-पांवड़े बिछाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.वैसे भी सचिन हो या सहवाग या कोई और क्रिकेटर,उनके प्रदर्शन पर हम सरकारी खज़ाना खोल देते हैं.अभी विश्व कप जीतते ही उन पर नोटों,सुविधाओं और उपहारों की बरसात हो रही है.अब तक हर क्रिकेटर को करोड़ों रूपए अलग-अलग सरकारें बाँट चुकी हैं और जो पीछे छूट गई हैं वे भी आम जनता के खून-पसीने की कमाई को अपनी बपौती समझकर इन पर न्योछावर करने के बहाने तलाश रही हैं.मुद्दे की बात यह है कि हमारे क्रिकेटरों को क्रिकेट खेलने के लिए पहले ही अनुबंध के नाम पर अतुलनीय पैसा मिल रहा है और वे विज्ञापनों,आईपीएल के जरिए भी बेशुमार पैसा कूट रहे हैं सो अलग.
                          दरअसल खामी सचिन में नहीं बल्कि क्रिकेट में है.दर्जन भर से भी कम देशों का यह समय खपाऊ और कामचोरी को बढ़ावा देने वाला खेल अपने पैसों के बल पर दूसरे खेलों को बर्बाद कर रहा है.अब देश की नई पीढ़ी कबड्डी,कुश्ती,मुक्केबाज़ी,बास्केटबाल और फ़ुटबाल जैसे वैश्विक खेलों को छोड़कर क्रिकेट की तरफ भागने लगी है.यदि हम क्रिकेटरों को इसीतरह बढ़-चढ़कर महिमामंडित करते रहे तो ओलिंपिक और एशियाई खेलों के लिए हमें ढंग के खिलाड़ी तक नहीं मिलेंगे और १६१ करोड़ की आबादी में से आधे से ज्यादा लोग टीवी-रेडियो से चिपककर अपना और देश का कीमती समय इसीतरह व्यर्थ लुटाते नज़र आयेंगे.





मंगलवार, 29 मार्च 2011

क्रिकेट को लेकर यह युद्धोन्माद किसलिए?


पाकिस्तान को पीट दो,आतंक का बदला क्रिकेट से,पाकिस्तान को धूल चटा दो,मौका मत चूको,पुरानी हार का बदला लो,अभी नहीं तो कभी नहीं,महारथियों की महा टक्कर,प्रतिद्वंद्वियों में घमासान,क्रिकेट का महाभारत....ये महज चंद उदाहरण है जो इन दिनों न्यूज़ चैनलों और समाचार पत्रों में छाये हुए हैं.मामला केवल इतना सा है कि विश्व कप क्रिकेट के सेमीफाइनल में भारत और पाकिस्तान की टीमें आमने-सामने हैं.लेकिन मीडिया की खबरों,चित्रों,रिपोर्टिंग,संवाददाताओं की टिप्पणियों और दर्शकों की प्रतिक्रियाओं से ऐसा लग रहा है मानो इन दोनों देशों के बीच क्रिकेट का मैच नहीं बल्कि युद्ध होने जा रहा है.हर दिन उत्तेजना का नया वातावरण बनाया जा रहा है,एक दूसरे के खिलाफ तलवार खीचनें के लिए उकसाया जा रहा है और महज एक स्टेडियम में दो टीमों के बीच होने वाले मुकाबले को दो देशों की जंग में बदल दिया गया है.रही सही कसर सरकार और राजनीतिकों ने पूरी कर दी है. “क्रिकेट डिप्लोमेसी” जैसे नए-नए शब्द हमारे बोलचाल का हिस्सा बन रहे हैं.राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक और मुख्यमंत्री से लेकर बाबूओं तक पर क्रिकेट का जादू सर चढकर बोल रहा है.
                 यह क्रिकेट के प्रति दीवानगी है या जंग जैसे माहौल का असर कि अब हर नेता,अभिनेता,व्यवसायी और रसूखदार व्यक्ति इस मैच को देखना चाहता है भले ही उसे क्रिकेट की ‘ए बी सी डी..’ भी नहीं आती हो. देश और जनकल्याण के कामों के लिए चंद मिनट नहीं निकाल सकने वाले लोग इस मैच के लिए पूरा दिन बर्बाद करने को तत्पर हैं.देश की समस्याओं के प्रति उदासीन रहने वाले आम लोग,साधू-संत,छुटभैये नेता और जेल में बंद क़ैदी तक मीडिया की सुर्खियाँ बटोरने के लिए हवन-पूजन का दिखावा कर रहे हैं.कोई अज़ीबोगरीब ढंग से बाल कटा रहा है तो कोई अधनंगी पीठ पर देश का नक्शा बनवा रहा है.मध्यप्रदेश में तो विधानसभा में कामकाज बंद कर मैच देखने की छुट्टी दे दी गयी है.पहले से ही काम नहीं करने के लिए बदनाम सरकारी दफ्तरों को भी काम से पल्ला झाड़ने के लिए क्रिकेट का बहाना मिल गया है.इस दौरान कई सवाल भी उठ रहे हैं जैसे मैच को युद्ध में बदलने से और वीवीआईपी के जमघट पर होने वाले करोड़ों रूपए के सुरक्षा तामझाम का खर्च कौन उठाएगा?अपने आप को देश के नियम-क़ानूनों से परे मानने वाले बीसीसीआई के खजाने के भरने से देश को क्या लाभ होगा?क्रिकेट हमारा राष्ट्रीय खेल नहीं है और इसपर देश के अन्य खेलों का काम-तमाम करने का आरोप तक लग रहा है उसे इतना प्रोत्साहन क्यों?लाखों-करोड़ों रूपए रोज कमाने वाले क्रिकेटरों के सरकारी महिमामंडन से बाक़ी खेलों के लिए जवानी दांव पर लगा रहे खिलाडियों की मानसिकता क्या होगी?
                          इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत सहित दुनिया के कई मुल्कों में क्रिकेट अत्यधिक लोकप्रिय खेल है और क्रिकेटरों को भगवान का दर्ज़ा तक हासिल है.इस खेल के मनोरंजक तत्वों को भी झुठलाया नहीं जा सकता परन्तु खेल को खेल की ही तरह खेलने देने में क्या बुराई है?खेल के नाम पर यह तनाव और युद्ध जैसा वातावरण बनाने का क्या औचित्य है?खिलाडियों के बीच मैच के दौरान स्वावाभिक रूप से रहने वाले तनाव को हमने देश भर में फैला दिया है और इससे बढ़ने वाली धार्मिक और सामुदायिक वैमनस्यता के परिणाम आने वाले समय में भी भुगतने पड़ सकते हैं.सरकार या नेताओं का तो समझ में आता है कि वे आम लोगों का ध्यान देश की मूलभूत समस्याओं से हटाने के लिए कोई न कोई बहाना तलाशते रहते हैं.अब इस मैच को जंग में बदलवाकर उन्होंने देश का ध्यान टू-जी स्पेक्ट्रम,कामनवेल्थ,विकिलीक्स,महंगाई जैसे तमाम तात्कालिक मुद्दों से हटा दिया है परन्तु देश के ज़िम्मेदार मीडिया का भी पथभ्रष्ट होना समझ से परे है.....

रविवार, 27 मार्च 2011

सेक्स-रिलेक्स और सक्सेस के बीच मस्ती


हरे,पीले,नीले लाल,गुलाबी रंग,भांग का नशा,ढोल की मदमस्त थाप,रंग भरे पानी से भरे हौज,बदन से चिपके वस्त्रों में मादकता बिखेरती महिला पात्र और छेड़खानी करते पुरुष....इसे हमारी हिंदी फिल्मों का ‘डेडली कम्बीनेशन’ कहा जा सकता है क्योंकि इसमें ‘सेक्स-रिलेक्स-सक्सेस’ का फार्मूला है और उस पर “होली खेले रघुबीरा बिरज में होली खेले रघुबीरा....” या फिर “रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे..” जैसे गाने....... हमें अहसास होने लगता है कि होली का त्यौहार आ गया है और जब मनोरंजक चैनलों के साथ-साथ न्यूज़ चैनलों पर भी “रंग दे गुलाल मोहे आई होली आई रे..” गूंजने लगता है तो फिर कोई शक ही नहीं रह जाता.आखिर किसी भी त्यौहार को जन-जन में लोकप्रिय बनाने में फिल्मों और फ़िल्मी संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका से कौन इनकार कर सकता है.
रक्षाबंधन,दीपावली,ईद,स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस जैसे पर्वों पर फिल्मी गानों की गूंज ही हमें समय से पहले उत्साह,उमंग और जोश से शराबोर कर देती है.फिल्मों का ही प्रभाव है कि करवा चौथ एवं वेलेन्टाइन डे जैसे आयोजन भी राष्ट्रीय पर्व का रूप लेते जा रहे हैं. ‘जय संतोषी माँ’ फिल्म से मिले प्रचार के बाद घर-घर में शुक्रवार की पूजा का मुख्य आधार बन गए इस व्रत का आज भी महत्त्व बरक़रार है.कहने का आशय यही है कि सिनेमा समाज का आईना है और अब तो यह आईना हमारे उस तक चेहरा ले जाने के पहले ही हमें समाज का रूप दिखाने लगता है.
                  एक बार बात फिर होली की.दरअसल होली तो है ही मौज-मस्ती का पर्व इसलिए इस त्यौहार को मनाने में हमारी फिल्मों ने भी जमकर उत्साह दिखाया है.अधिकतर लोकप्रिय फ़िल्में होली के रंग में रंगी होती हैं.आलम यह है कि कई बड़ी फ़िल्में कमाई के लिहाज़ से तो फ्लॉप मानी गयीं पर उनके होली गीत आज भी दिलों-दिमाग पर छाये हुए हैं और हर साल इस त्यौहार को नई गरिमा देने का आधार बनते हैं.क्या आप फिल्म कोहिनूर के मशहूर गीत “तन रंग लो जी आज मन रंग लो..” या फिर कटी पतंग के गीत “आज न छोड़ेंगे हमजोली खेलेंगे हम होली..”जैसे गानों के बिना होली मना सकते हैं.इसीतरह मदर इंडिया के “होली आई रे कन्हाई...”,फिल्म डर के “अंग से अंग लगाना सजन मोहे ऐसे रंग लगाना..”,शोले के “होली के दिन दिल मिल जाते हैं..”,बागवान के “होली खेले रघुबीरा...”,सिलसिला के “रंग बरसे भीगे चुनर वाली...”,फागुन के लोकप्रिय गीत “फागुन आयो रे...”,मशाल के गीत “होली आई होली आई देखो...” और आखिर क्यों के “सात रंग में खेल रही है दिलवालों की...” को क्या भुला सकते हैं.ऐसे ही सुमधुर,कर्णप्रिय,सुरीले और मस्ती भरे गीत नवरंग,कामचोर,ज्वार भाटा,मंगल पांडे,मोहब्बतें, दामिनी,वक्त,ज़ख्मी,धनवान और मुंबई से आया मेरा दोस्त जैसी तमाम फिल्मों में थे.यदि मैं यह कहूँ कि होली के गीतों के बिना मुम्बईया फिल्मों की और इस फिल्मों के गानों के बिना हमारी देशी होली अधूरी है तो कोई अतिसंयोक्ति नहीं होगी. वैसे भी जब तक फिल्म की हीरोइन रंग और पानी में भीगकर मादकता का अहसास न कराये तो फिर हिंदी फिल्म किस काम की.यह काम या तो अभिनेत्री को नहलाकर किया जा सकता है या फिर होली के बहाने गीला कर.नहलाने पर तो सेंसर बोर्ड को आपत्ति हो सकती है परन्तु होली पर कोई अंगुली नहीं उठा सकता इसलिए हर नई फिल्म में हीरोइन को रंग में भीगने दीजिए तभी तो हमें होली मनाने के लिए नए-नए गीत मिलेंगे.
नोट:(दरअसल यह लेख जागरण ब्लाग पर चल रहे होली कांटेस्ट के लिए लिखा गया है परन्तु मैं इसे अपने ब्लाग पर पोस्ट करने का मोह नहीं त्याग पाया इसलिए कुछ पाठकों को यह विलम्ब से लिखा हुआ लग सकता है.)

शनिवार, 19 मार्च 2011

आप हुरियारे हैं या हत्यारे!


आप होली की अलमस्ती में डूबने वाले हुरियारे हैं या फिर हत्यारे,यह सवाल सुनकर चौंक गए न?दरअसल सवाल भी आपको चौकाने या कहिये आपकी गलतियों का अहसास दिलाने के लिए ही किया गया है.त्योहारों के नाम पर हम बहुत कुछ ऐसा करते हैं जो नहीं करना चाहिए और फिर होली तो है ही आज़ादी,स्वछंदता और उपद्रव को परंपरा के नाम पर अंजाम देने का पर्व.होली पर मस्ती में डूबे लोग बस “बुरा न मानो होली है” कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं पर वे ये नहीं सोचते कि उनका त्यौहार का यह उत्साह देश,समाज और प्रकृति पर कितना भारी पड़ रहा है.साल–दर-साल हम बेखौफ़,बिना किसी शर्मिन्दिगी और गैर जिम्मेदाराना रवैये के साथ यही करते आ रहे हैं.हमें अहसास भी नहीं है कि हम अपनी मस्ती और परम्पराओं को गलत परिभाषित करने के नाम पर कितना कुछ गवां चुके हैं?..अगर अभी भी नहीं सुधरे तो शायद कुछ खोने लायक भी नहीं बचेंगे.
अब बात अपनी गलतियों या सीधे शब्दों में कहा जाए तो अपराधों की-हम हर साल होलिका दहन करते हैं और फिर उत्साह से होली की परिक्रमा,नया अनाज डालना,उपले डालने जैसी तमाम परम्पराओं का पालन करते हैं पर शायद ही कभी हम में से किसी ने भी यह सोचा होगा कि इस परंपरा के नाम पर कितने पेड़ों की बलि चढा दी जाती है.पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अमूमन एक होली जलाने में डेढ़ से दो वृक्षों की जरुरत होती है तो सोचिये देश भर में होने वाले करोड़ों होलिका दहन में हम कितनी भारी तादाद में पेड़ों को जला देते हैं.यहाँ बात सिर्फ पेड़ जलाने भर की नहीं है बल्कि उस एक पेड़ के साथ हम जन्म-जन्मांतर तक मिलने वाली शुद्ध वायु,आक्सीजन,फूल,फल,बीज,जड़ी बूटियाँ,नए पेड़ों के जन्म सहित कई जाने-अनजाने फायदों को नष्ट जला देते हैं.इसके अलावा उस पेड़ के जलने से वातावरण में कार्बन डाईआक्साइड जैसी विषैली गैसों की मात्रा बढ़ा लेते हैं.होली जलने से दिल्ली सहित देश के सभी नगरों-महानगरों का पहले से ही प्रदूषित वातावरण और भी ज़हरीला हो जाता है.इससे सांस एवं त्वचा की बीमारियों सहित कई रोग होने लगते हैं.
यह तो महज प्राकृतिक नुकसान है आम लोगों को होने वाला शारीरिक और भावनात्मक नुकसान तो और भी ज्यादा होता है.सरकारी तौर पर प्रतिबन्ध के बाद भी हम राह चलते लोगों पर रंग भरे गुब्बारे(बैलून) फेंकते हैं और ऐसा करने में अपने बच्चों का उत्साह भी बढ़ाते हैं.यहाँ तक की गुब्बारे भी हम ही तो लाकर देते हैं.इन गुब्बारों से कई बार वाहन चलाते लोग गिर कर जान गवां देते हैं,आँख पर बैलून लगने से देखने की क्षमता,कान पर लगने से बहरापन और अनेक बार सदमे में हृदयाघात तक हो जाता है.होली पर रासायनिक रंगों के इस्तेमाल से त्वचा पर संक्रमण,जलन,घाव हो जाना तो आम बात है.इसके अलावा इन रंगों के उपयोग से वर्षों पुराने सम्बन्ध तक खराब हो जाते हैं और रंग छुड़ाने में हर साल देश का लाखों लीटर पानी बर्बाद होता है सो अलग.बूंद-बूंद पानी को तरस रहे लोगों-खेतों के लिए यह पानी अमृत के समान है जिसे हम अपने एक दिन के आनंद के लिए फिजूल बहा देते हैं.यह प्राकृतिक संसाधनों की हत्या नहीं तो क्या है?
होली पर शराब का सेवन अब फैशन बन चुका है.होली ही क्या अब तो लोग दिवाली जैसे त्योहारों पर भी शराब को सबसे महत्पूर्ण मानने लगे हैं.होली पर शराब पीकर हम अपनी जान तो ज़ोखिम में डालते ही हैं सड़क पर चलने वाले अन्य लोगों की जान के लिए भी ख़तरा बने रहते हैं.नशे में की गई कई गलतियाँ जीवन भर का दर्द बन जाती हैं.इससे रिश्तों पर असर पड़ता है और सार्वजानिक रूप से हमारी और हमारे परिवार की छवि भी बिगड़ती है.अब सोचिये महज एक दिन के आनंद के लिए मानव और प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहचाना,अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर लगाना और अपनी एवं अपने करीबी लोगों की जान गंवाना कहाँ तक उचित है?अब आप ही तय कीजिये कि आप हुरियारे हैं या हत्यारे?

कुत्ते की राखी…कीमत सुनकर आप चौंक जाएंगे!

हाल ही में कृति सेनन से जुड़े एक राखी विज्ञापन को लेकर खूब विवाद हुआ। विज्ञापन में कृति के कपड़ों से लेकर उसके कथित सांस्कृतिक संदेश तक पर ब...