बुधवार, 1 जुलाई 2026

भोपाल की जामुन,शिमला की जामुन..कुछ स्वाद खरीदे नहीं जाते!!


बरसात का अपना एक संस्कार होता है..इस दौरान केवल बादल आकर बरसते भर नहीं हैं बल्कि वे प्रकृति की पूरी रंगत बदल देते हैं, मिट्टी की मनमोहक सुगंध वातावरण में बिखर जाती है और मन के भीतर बारिश से जुड़ी सालों पुरानी यादें दस्तक देने लगती हैं। बारिश में किसी की यादों में चटपटे पकौड़े उभरते होंगे तो किसी के लिए भुट्टे परंतु मेरी यादों में अब सबसे ज्यादा जामुन का पेड़ शामिल हैं।

इन्हीं दिनों जब जब बाज़ार में जामुन दिखाई देती है, मन अनायास ही भोपाल की ओर लौट जाता है—आकाशवाणी कॉलोनी के उस सरकारी आवास की ओर, जहाँ एक जामुन का पेड़ हमारे जीवन का मौन लेकिन सबसे लोकप्रिय सदस्य हुआ करता था।

वह पेड़ पता नहीं किसने रोपा था या अपने आप पल बढ़ गया था क्योंकि हमारे इससे रिश्ते तब बने जब हम दोनों उम्र की परिपक्व दहलीज पर खड़े थे। फिर क्या था यह साल दर साल हमारे जीवन की मीठी स्मृतियों का हिस्सा बनता गया और कई अनजान परिवारों से मधुर संबंधों का आधार भी। वह हमारे हर अच्छे बुरे दिनों का साथी था, मौसमों का कथाकार और उदारता का जीवंत पाठ ।

बरसात शुरू होते ही उसकी शाखाएँ फलों से लद जाती थीं। पहले फूल आते,फिर नन्हें फल ,फिर युवा होते फलों की हरियाली गहराती, फिर गहरे बैंगनी रंग के छोटे-छोटे फल हवा के साथ झूमते और धीरे धीरे पूरा वृक्ष जामुनी हो जाता। हवा चलती तो मीठे मीठे फल स्वयं धरती पर बिखर जाते और उनकी खुशबू से पूरी कालोनी महकने लगती। उन दिनों, सुबह उठते ही यहाँ वहां बिखरे जामुन चुनना मेरी और खासतौर पर मनीषा जी की दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा होता था। अच्छे फल चुनना,फिर उन्हें नजाकत से कई बार धोना और आखिर में सहेजकर फ़्रिज में रखना।

हमारी सुबह भी जामुन खाने से ही होती। जामुन हमारे लिए बेड टी/ ब्रेकफास्ट बन जाती। हम दोनों खाली पेट किलो किलो तक जामुन खा जाते। सच में, किलो किलो..अब यह उस पेड़ का प्यार था या हमारे पाचन क्षमता बेहतर थी लेकिन न तो पेटदर्द होता,न अपच..बस, जीवन का स्वाद एवं जीभ पर जामुन का रंग जरूर भरपूर उतर आता था। यह पेड़ इतनी ज्यादा जामुन देता था कि फ्रिज भर जाता..हम खाते, दोस्त खाते,रिश्तेदार खाते,पूरी कालोनी खाती,हमारे न्यूजरुम की टीम खाती और फिर भी इतनी बच जाती कि दूरदराज के लोगों तक भी पहुंच जाती। हाल ही हमारी गैट टूगैदर में भी सभी ने सबसे ज्यादा चर्चा जामुन की ही हुई। असल बात यह है कि उस समय जामुन का स्वाद था, मूल्य नहीं।

घर आने वाला कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं लौटता था। पड़ोसी अपने हिस्से की खुशी लेकर जाते । किसी ने कभी नहीं पूछा—एक किलो कितने की है? क्योंकि वहाँ जामुन मूल्यवान नहीं, साझा आनंद थी।

बचपन और प्रकृति दोनों की यही विशेषता होती है—वे हिसाब नहीं रखते लेकिन जीवन का एक स्वभाव है कि वह स्थिर नहीं रहता। समय ने करवट ली। तबादला हुआ और सात साल में जामुन का जीवनभर का कोटा पूरा कर हम शिमला आ गए। शहर बदला तो केवल दृश्य नहीं बदले, वस्तुओं के अर्थ भी बदलने लगे। शिमला से बीच-बीच में गृह नगर करेली और भोपाल आना जाना चलता रहा। बाजारों में जामुन दिखी और मन भी मचला इसलिए पहली बार पेड़ ने नहीं, दुकानदार ने जामुन के मूल्य से परिचित कराया। तब पता चला कि जामुन की कीमत भी होती है और वह भी 50 से 100 रुपये किलो।


जामुन तो खानी ही थी इसलिए खरीदनी पड़ी । उस दिन अनुभव हुआ कि जो कभी बिना माँगे मिलता था, उसे खरीदने में एक हल्की-सी झिझक होती है। स्वाद वही था। जीभ फिर जामुनी हुई.. लेकिन अनुभव वैसा नहीं था क्योंकि स्वाद केवल फल में नहीं होता, उसके संदर्भ में भी होता है।

और फिर शिमला में उसी जामुन को 300 रुपये किलो बिकते देखा। बिना दाम चुकाए सहजता से भरपूर मात्रा में मिलने वाले जामुन को इतना बेशकीमती देखकर मन भी ठिठका और जेब में रखे पैसे भी। पर, सात साल से चढ़ा स्वादिष्ट जामुन के स्वाद का नशा कैसे उतरता इसलिए खरीदनी पड़ी। न जामुन बदली,न स्वाद पर मूल्य जरूर बदल गया। तब, प्रकृति ने दूसरा सबक सिखाया कि वस्तु वही रहती है, पर दूरी उसका मूल्य बदल देती है। यह केवल बाजार का सिद्धांत नहीं, जीवन का दर्शन भी है।

घर के पिछवाड़े का पेड़, रोज़ मिलने वाले लोग, माता-पिता की उपस्थिति, अपने शहर की सहजता—जब तक पास रहते हैं, सामान्य लगते हैं लेकिन जैसे ही दूरी आती है, उनका महत्व बढ़ जाता है। तात्पर्य यह है कि हमारी दुनिया में कई चीज़ों का मूल्य उनकी गुणवत्ता नहीं, उनकी उपलब्धता तय करती है। शायद इसी कारण बचपन हमें सबसे सुंदर लगता है क्योंकि उस समय बहुत कुछ बिना मूल्य मिला होता है।

आज भी जब शिमला में जामुन खरीदी तो मन के भीतर यह तुलना लगातार चलती रही कि एक तरफ बाजार का तराजू और दूसरी तरफ भोपाल के उस सरकारी क्वार्टर का पेड़। एक तरफ रुपये हैं, दूसरी तरफ स्मृतियाँ और हर बार स्मृतियाँ भारी पड़ जाती हैं। धीरे-धीरे समझ आया कि जीवन का सबसे बड़ा वैभव वह नहीं होता जिसे हम खरीद सकते हैं; वह होता है जिसे हमने कभी सहज रूप से जिया हो। 

जामुन अब भी जीभ पर रंग छोड़ती है लेकिन अब वह रंग केवल बैंगनी नहीं होता। उसमें थोड़ा-सा भोपाल होता है, थोड़ा-सा शिमला, थोड़ा-सा समय और बहुत सारे जीवन मूल्य। शायद जामुन के उस पेड़ ने भी हमें जीवन के सबसे बड़े सत्य से रूबरू करा दिया कि जो चीज़ें हमारे पास सहज रूप से उपलब्ध हैं, वे साधारण नहीं होतीं; हम केवल उनके साथ इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उनका मूल्य देर से समझते हैं इसलिए जो भी सहजता से उपलब्ध है उसका भरपूर सम्मान कीजिए चाहे वे माता पिता हों, भाई बहन,दोस्त या संबंधी..या फिर प्रकृति में निःशुल्क उपलब्ध हवा,धूप,पानी,पेड़,फल एवं फूल... क्योंकि ऐसा न हो कि समय का अंतराल उन्हें आपसे दूर ले जाए और वे इतने बेशकीमती हो जाएं कि आप उन्हें बस याद ही करते रह जाएं।

#जामुन #Jamun #BlackPlum 

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