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रविवार, 28 सितंबर 2025
जिंदगी के खट्टे मीठे अनुभवों का खजाना है ‘थैंक यू यारा’
सोमवार, 22 सितंबर 2025
हिमाचल में फलों का गोविंदा...!!
स्थानीय भाषा में इसे 'जापानी फल' या 'काकी' कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Diospyros kaki है और पहली बार 1940 के दशक में शिमला के नारकंडा इलाके में इसका पदार्पण माना जाता है।
वैसे, अपने जन्मस्थान जापान में इसका मूल नाम काकी है, जिसका अर्थ होता है देवताओं का फल। अंग्रेजी में इसे पर्सिमन (Persimmon) के नाम से जाना जाता है। इजराइल में इसे शैरॉन फ्रूट तो कुछ देशों एबेन फ्रूट कहा जाता है। हिमाचल में इसे लंबे समय तक खराब नहीं होने के कारण अमर फल और सेब से सस्ता और उसका विकल्प होने के कारण चीनी सेब भी कहा जाता है।
दूर से टमाटर की तरह दिखने वाला यह चमकीला नारंगी फल अपने भीतर शहद की मिठास समेटे है। यह अपने स्वाद से हिमाचल के किसानों के लिए न केवल आर्थिक वरदान साबित हो रहा है, बल्कि स्वास्थ्य के खजाने के रूप में भी उभर रहा है।
देश में हिमाचल प्रदेश को वैली ऑफ फ्रूट्स कहा जाता है क्योंकि अपने पहाड़ों, ठंडी हवाओं और उपजाऊ मिट्टी के कारण यह सदियों से फलों का स्वर्ग है। यहां सेब की लालिमा से लेकर खुबानी की सुनहरी चमक तक हर मौसम में फलों की खुशबू बिखरी रहती है ।
ऐसा माना जाता है हिमाचल में फलों के राजा सेब ने अपनी यात्रा की शुरुआत ब्रिटिश काल में शुरू की थी । मौसम में बदलाव के साथ यहां की फ्रूट बास्केट में कई फल जुड़ते जा रहे हैं। यह सेब पर निर्भरता कम करने और कमाई के नए रास्ते तलाशने की कवायद भी है। शायद, यही कारण है कि जापानी फल अब शिमला, कुल्लू, मंडी, सोलन, लाहौल-स्पीति, किन्नौर और चंबा जिलों तक में भरपूर पैदा हो रहा है ।
आंकड़ों के अनुसार, राज्य में कुल फल उत्पादन 7.53 मिलियन टन तक पहुंच गया है, जिसमें जापानी फल, कीवी और जैकफ्रूट जैसे वैकल्पिक फल भी भरपूर मात्रा में हैं। जापानी फल की खूबी यह है कि इसे सेब के साथ भी लगाया जा सकता है, जिससे मिश्रित खेती संभव हो जाती है। सरकार भी इसे बढ़ावा दे रही है ताकि छोटे किसान परिवारों की आय दोगुनी हो सके। हिमाचल में इसकी फ़ुयू और हेचिया जैसी प्रजातियाँ बाजार में लोकप्रिय हैं।
जापानी फल स्वाद के साथ साथ स्वास्थ्य का खजाना भी है। इसमें आंखों के लिए विटामिन ए, नींबू से दोगुना विटामिन सी और पाचन के लिए भरपूर फाइबर है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे टैनिन, कैटेचिन और गैलिक एसिड कैंसर, डायबिटीज और हृदय रोगों से लड़ने में मदद करते हैं। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि यह सूजन कम करता है, कोलेस्ट्रॉल घटाता है और हड्डियों को मजबूत बनाता है।
पारंपरिक चिकित्सा में, इसके पत्तों की चाय पेट दर्द और दस्त ठीक करती है, जबकि फल रक्तचाप नियंत्रित रखता है। डायबिटीज वाले मरीजों के लिए यह आदर्श है, क्योंकि यह ब्लड शुगर स्थिर रखता है। जापानी फल पोटेशियम और फॉस्फोरस का भी एक अच्छा स्रोत है।
कुल मिलाकर यह किसी 'सुपरफूड' से कम नहीं है। लेकिन ज्यादा खाने से इसमें मौजूद टैनिन के कारण पेट में गांठ बनने का खतरा भी रहता है।
संक्षेप में कहें तो जापानी फल हिमाचल में एक फल भर नहीं है, बल्कि आशा का प्रतीक बन रहा है। यह न केवल किसानों को सेब की एकतरफा निर्भरता से मुक्त कर रहा है बल्कि पर्यटकों को नई स्वाद यात्रा पर भी ले जाने के साथ साथ स्वास्थ्य का अनमोल उपहार भी दे रहा है। इसलिए अगली बार जब आप हिमाचल की सड़कों पर चहलकदमी कर रहे हों तो प्रकृति की इस नारंगी स्वादिष्ट और सेहतमंद नेमत को नजरअंदाज न करें ।
शुक्रवार, 19 सितंबर 2025
ये Gen Z- जेन जी क्या है..ये जेन जी?
सामान्य रूप से समझे तो नेपो किड्स (Nepo Kids) शब्द नेपोटिज्म (Nepotism) से लिया गया है, जिसका सामान्य अर्थ है भाई-भतीजावाद। यह तमगा उन युवाओं के लिए इस्तेमाल होता है जो अपने परिवार के प्रभाव के कारण राजनीति,मनोरंजन, फिल्म, खेल, व्यवसाय जैसे विभिन्न क्षेत्रों में आसानी से अवसर प्राप्त कर लेते हैं। इन पर यह आरोप लगता है कि वे प्रतिभा या मेहनत के बजाय अपने परिवार के नाम पर सफलता हासिल कर रहे हैं। हालांकि कई मामलों में यह बात सही नहीं है क्योंकि नेपो किड्स में कई युवा वाकई प्रतिभाशाली होते हैं और वे अपनी लगन, मेहनत और कौशल से लंबी रेस का घोड़ा साबित होते हैं।
जहां तक मौजूदा वक्त के सबसे चर्चित शब्द ‘Gen Z’ या जेनरेशन Z की बात है तो यह शब्द आमतौर पर उन युवाओं के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। जैसे भारतीय संदर्भ में परदादा, दादा, पिता और बेटे के जरिए पीढ़ियों को समझा जाता है उसी तरह पश्चिमी संदर्भ में पीढ़ियों को अलग अलग नाम से वर्गीकृत किया गया है। फिलहाल जेन जी सबसे युवा पीढ़ी है जो डिजिटल युग में पग कर एवं रच बसकर तैयार हुई है ।
यह पीढ़ी इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के साथ बड़ी हुई है इसलिए कुछ लोग इन्हें डिजिटल नेटिव्स भी कहते हैं। Gen Z को तकनीकी दक्षता, सामाजिक जागरूकता और वैश्विक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता के लिए भी जाना जाता है।
ऐसा भी नहीं है कि पीढ़ियों का नामकरण कोई पहली बार हो रहा है। दशकों से पश्चिमी समाज में बदलती पीढ़ियों को उनके दौर और तात्कालिक घटनाओं के मुताबिक अलग अलग दिलचस्प नामों से संबोधित किया जाता रहा है। मसलन नामकरण की इस श्रृंखला की सबसे पहली एवं 1883–1900 के बीच जन्मी पीढ़ी को ‘लॉस्ट जेनरेशन’ कहा जाता है ।
यह पीढ़ी प्रथम विश्व युद्ध के समय की थी। इस समूह ने युद्ध और सामाजिक उथल-पुथल का सामना किया। इसके बाद की पीढ़ी को नाम मिला ‘ग्रेटेस्ट जेनरेशन’ । इसमें 1901–1927 के बीच जन्में लोगों को शामिल किया गया । देशभक्ति, कठिन परिश्रम और सामूहिक बलिदान से अपनी पहचान बनाने वाली इस पीढ़ी ने प्रथम विश्व युद्ध का प्रत्यक्ष अनुभव किया था।
इसके बाद नंबर आता है ‘साइलेंट जेनरेशन’ का । हालांकि इस नाम का इनके चुप/मौन रहने से कोई मतलब नहीं है बल्कि मौन रहकर परिश्रम करने से है। इस पीढ़ी में 1928–1945 के बीच जन्में लोग शामिल किए गए । इस पीढ़ी ने युद्ध के बाद पुनर्निर्माण का दौर देखा है और अपनी मेहनत से अपना संसार रचा था ।
साइलेंट जनरेशन के बाद आई पीढ़ी के नामकरण की वजह भी बहुत ही दिलचस्प है। इन्हे ‘बेबी बूमर्स’ कहा जाता है और इसमें 1946–1964 के बीच जन्में लोग शामिल हैं। दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जन्म दर में एकाएक हुई वृद्धि के कारण इस पीढ़ी को यह नाम मिला।
यह पीढ़ी आर्थिक समृद्धि, सामाजिक परिवर्तन और उपभोक्तावाद के लिए भी जानी जाती है। मौजूदा वक्त में अपनी कलम, लेखन, परिश्रम, विचारों और आविष्कारों से दुनिया को समृद्ध करने वाली और अब अधेड़ हो चली पीढ़ी को ‘जेनरेशन X’ कहा जाता है। इसमें 1965–1980 के बीच जन्में हम जैसे तमाम लोग शामिल हैं।
हमारी यह पीढ़ी इस मामले में सबसे खास है कि इसने परंपराओं और तकनीकी बदलावों को साथ-साथ जिया है। जेन एक्स ने लैंडलाइन फोन से लेकर पेजर एवं मोबाइल फोन के विकास तक और कैसेट से फ्लॉपी,सीडी, डीवीडी, पेन ड्राइव और अब क्लाउड स्टोरेज तक का लंबा परन्तु तेजी से बदलता सफर तय किया है।
इसके बाद आती है ‘जेनरेशन Y’ अर्थात् वो लोग जिन्होंने 1981–1996 के बीच जन्म लिया है। हम कह सकते हैं कि इसमें हमारे परिवार के बड़े बच्चे शामिल हैं। यह पीढ़ी डिजिटल क्रांति के शुरुआती दौर में जवान हुई है और तकनीक समझ के साथ इसके अनुभवों से भी सराबोर है। अब आती है बारी बहुचर्चित ‘जेनरेशन Z’ या जेन जी की। यह हमारी युवा पीढ़ी है क्योंकि इन्होंने 1997–2012 के बीच जन्म लिया है। मोबाइल, गेमिंग, सोशल मीडिया में डूबती उतराती इस पीढ़ी के सदस्य अधिकतम 25 से 28 साल के युवा हैं और इन्हें पढ़ाई, नौकरी, बढ़िया लाइफ और व्यक्तिगत हितों की सबसे ज्यादा फिक्र है। इसलिए यह पीढ़ी दुनिया भर में धमा चौकड़ी मचाए हुए है।
ऐसा नहीं है कि पीढ़ियों का यह वर्गीकरण जेन जी पर आकर रुक गया है बल्कि इनके पीछे पीछे एक नई पीढ़ी तैयार हो गई है जिसे ‘जेनरेशन अल्फा’ नाम मिला है। इसमें 2013 से लेकर मौजूदा साल यानि 2025 तक पैदा हुए बच्चे शामिल हैं। यह मानव सभ्यता की सबसे नवीनतम पीढ़ी है, जो पूरी तरह से 21वीं सदी में जन्मी है।
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि पीढ़ियों का यह वर्गीकरण मोटे तौर पर जन्म वर्ष, सामाजिक-आर्थिक घटनाओं, और सांस्कृतिक बदलावों के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक पीढ़ी को उस समय की प्रमुख घटनाओं और मूल्यों के आधार पर परिभाषित किया जाता है और उसी के मुताबिक उनका नामकरण किया जाता है। बस, सोचने वाली बात यह है कि जब जेन जी दुनिया भर में ऐसा जबरदस्त हड़कंप मचाए हुए है तो जनरेशन अल्फा क्या और कितना कमाल नहीं करेगी।
और हमने नलिनी के ‘गुलाब जामुन’ खा ही लिए..!!
गुलाब जामुन का ज़िक्र हो और मुंह में पानी न आए,ऐसा संभव ही नहीं है। यह छोटा-सा सुनहरा गोला अपने अंदर स्वाद और नफासत का पूरा रुतबा समेटे है। यह न केवल स्वाद की दुनिया का कोहिनूर है, बल्कि भारतीय पर्वों, घरेलू आयोजनों और शादी ब्याह जैसे आयोजनों का अनिवार्य हिस्सा भी है इसलिए, सोशल मीडिया के इन्फ्लुएंसर्स की मीठे से परहेज करने की तमाम चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए हम नलिनी तक पहुंच ही गए।
माना जाता है कि गुलाब जामुन की जड़ें भारतीय उपमहाद्वीप में खोया और चाशनी की परंपरा में पगी और बढ़ी हैं। हालांकि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यह मिठाई मध्यकालीन भारत में फारस से आई थी और मुगल काल में गुलाब जल और केसर के उपयोग ने इसे और लज़ीज़ बना दिया।
खैर, अपने को इतिहास से ज्यादा इसके स्वाद से सरोकार था इसलिए इतिहास में ज्यादा सिर नहीं खपाया लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि नरम,मुलायम और मुंह में घुल जाने वाला गुलाब जामुन बनाना वाकई एक कला है, जिसमें मीठे से धैर्य और खोया जैसे मुलायम प्यार के बीच संतुलन की जरूरत होती है। इनके बीच सौ फीसद तालमेल से ही बनता है अतुलनीय स्वाद से भरा गुलाब जामुन..एकदम नरम, रसीला और हर टुकड़े में मिठास एवं स्वाद का संसार समेटे हुए ।
स्वाद के ऐसे ही सपने संजोए हम भी पहुंच गए शिमला में मॉल रोड स्थित नलिनी के पास। यदि आप रिज से लिफ्ट की ओर जाएंगे तो आपके बाएं हाथ पर और लिफ्ट से चर्च की ओर आयेंगे तो दाहिने हाथ पर खुशबू बिखेरती यह दुकान मिल जाएगी। वैसे, हमारे यहां गुलाब जामुन को रंग रूप एवं आकार प्रकार के कारण काला जामुन, लाल मोहन, मावा बाटी, बंगाली में पंतुआ, कहीं खीर मोहन तो कहीं रसगुल्ला जैसे कई नामों से जाना जाता है। दरअसल उत्तर भारत में आम बोलचाल में गुलाब जामुन अपने ठंडे और श्वेत वर्णी बिरादर रसगुल्ला के नाम से मशहूर हैं… आखिर है तो यह भी रस का गोला, भले ही सांवला सलोना है।
अब गुलाब जामुन सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। दीवाली हो, राखी हो, जन्मदिन या शादी का भोज, खाने पीने की सूची में गुलाब जामुन का स्थान अडिग है। जब इसे गर्म परोसा जाता है तो यह जीभ पर मिठास बिखेरता हुआ होले से पिघल सा जाता है और ठंडा खाएं तो चाशनी की मिठास तालू पर रच-बस जाती है। आजकल पार्टियों में इनकी जोड़ी वनीला आइसक्रीम के साथ भी खूब जम रही है जो ठंडे और गर्म के सम्मिश्रण से अलग स्वाद रचता है।
नलिनी पर गुलाब जामुन का स्वाद और आकार तो बेजोड़ है ही, मूल्य की भी अलग कहानी है। यदि आप नलिनी के काउंटर पर ही खड़े होकर गुलाब जामुन खाते हैं तो यह 50 रुपए में मिल जाता है लेकिन यदि आप इनके रेस्तरां में बैठकर सुकून से कतरा कतरा इसका स्वाद लेना चाहते हैं तो आपको 80 रुपए चुकाने पड़ते हैं। हालांकि हमें तो काउंटर पर खाना ज्यादा अच्छा लगा क्योंकि आप मॉल रोड की ठंडी बयार के बीच गरमागरम गुलाब जामुन का आनंद ज्यादा बेहतर ढंग से महसूस कर सकते हैं। इस रसीले जादूगर का जादू अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा है बल्कि यह अब वैश्विक मंच पर भी पहचान बना रहा है। अमेरिका से लेकर आस्ट्रेलिया तक और ब्रिटेन से लेकर कनाडा तक यह भारतीय रेस्तरां से लेकर मिठाई की दुकानों तक, लोकप्रियता का नया मुकाम बना रहा है।
कुल मिलाकर गुलाब जामुन सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि खुशियों का प्रतीक है। शायद, सबसे तेजी से डोपामिन भी यही बढ़ाता होगा। इसका हर टुकड़ा आपको प्यार भरे स्वाद, मिठास की परंपरा और उत्सव की याद दिलाता है। चाहे आप इसे नलिनी जैसी आपके शहर की किसी भी मशहूर मिठाई की दुकान से खरीदें या घर पर बनाएं, इसका स्वाद हमेशा मन को मिठास से भर देता है।
तो अगली बार जब आप कहीं भी गुलाब जामुन के स्वाद का आनंद लें और वह आपको अच्छा लगे तो इसके पीछे की कहानी और कारीगरी को भी जानने का प्रयास करिए ताकि गुलाब जामुन की मिठास की स्मृतियां जीभ भर के लिए नहीं, दिल और दिमाग के लिए भी अमिट हो जाएं ।
सोमवार, 8 सितंबर 2025
देवभूमि में क्यों बेखौफ नाच रहीं हैं डायन…!!
दरअसल,हिमाचल प्रदेश की धरती अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ साथ समृद्ध लोक संस्कृति के लिए भी जानी जाती है। यहां के पर्व, मेलों और परंपराओं में पहाड़ के लोगों की आस्था, डर, विश्वास और सामूहिक जीवन की झलक मिलती है। इन्हीं लोकपर्वों में से एक है डगैली पर्व, जो इन दिनों मनाया जाता है। इसे डगयाली, दगाली, अघोरा चतुर्दर्शी, कुशाग्रहणी अमावस्या और डायनों का पर्व जैसे कई अन्य नामों से जाना जाता है।
हम इसे हिमाचल का हैलोवीन भी कह सकते हैं। मेक्सिको का डिया डे लॉस मुर्टोस भी कुछ इसी तरह का पर्व है। हम यह पर्व सीधे-सीधे उन कथाओं और मान्यताओं से जुड़ा है जिनमें डायन का जिक्र आता है। लोकमान्यता के अनुसार डायन बुरी शक्तियों का प्रतीक होती है, और डगैली पर्व उसी नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति पाने का सामूहिक प्रयास है।
डगैली पर्व की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसका कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन स्थानीय लोककथाओं के अनुसार यह पर्व सदियों पुराना है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में लोग बीमारी, अकाल या किसी अनहोनी को डायन की करतूत मानते थे। इससे बचाव के लिए गांव के लोग मिलकर रात को अनुष्ठान करते और ढोल-नगाड़ों के साथ ऐसा माहौल बनाते कि बुरी आत्माएं डरकर भाग जाएं।
धीरे-धीरे यह प्रथा लोकनृत्य और उत्सव का रूप लेने लगी, जिसे आज डगैली पर्व कहा जाता है। जानकारों के अनुसार डगैली शब्द का संबंध डग यानी चलने या घूमने से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि इस पर्व की रात डायनें गांव में डग भरती हैं और लोग सामूहिक नृत्य-गीतों के जरिए उन्हें भगाते हैं।
डगैली पर्व में डायन का रूप धारण करने के लिए चेहरे पर कालिख लगाई जाती है और डरावने मुखौटे पहने जाते हैं। कांगड़ा और मंडी क्षेत्र में इसे मुखौटों के साथ तो कुल्लू और चंबा में यह लोकगीत और घर-घर टोली जाने की परंपरा के साथ मनाया जाता है।
यह पर्व शिमला, सिरमौर और सोलन जैसे शहरी जिलों में भी मनाया जाता है। लद्दाख़, नेपाल और सिक्किम में भी इसतरह के आयोजन होते हैं। आजकल कुछ जगहों पर प्रतीकात्मक रूप से डायन का पुतला भी जलाया जाता है।
डगैली पर्व में गाए जाने वाले गीतों में अक्सर डायन के स्वभाव, उसकी शरारतों और उससे मुक्ति पाने के उपायों का जिक्र होता है। यह कुछ कुछ मैदानी इलाकों में दीपावली के बाद भाईदूज के दिन बुराई के प्रतीक चुगलखोर की पिटाई जैसा पर्व है। यहां भी डायन या बुराई से बचने के लिए दरवाजों पर कांटे लगाए जाते हैं,हाथ में मंत्र शक्ति वाले कलावे या रक्षा सूत्र बांधे जाते हैं।
डगैली पर्व का असली महत्व इसकी सामूहिकता है। पूरा गांव एक साथ मिलकर नृत्य करता है, गीत गाता है और भोज का आनंद उठाता है। इससे लोगों में आपसी भाईचारा और सहयोग की भावना मजबूत होती है। वहीं,धार्मिक दृष्टि से देखें तो डगैली पर्व गांव को बुरी शक्तियों से बचाने का सामूहिक प्रयास है।
सौम्य सूरज का मतवाला अंदाज़
जब देशभर में सूरज ढल रहा हो तब पहाड़ों की रानी के माथे पर सूरज निकलना प्रकृति का जादू ही है। बादलों और बूंदों में जकड़े पहाड़ भी सूरज की शह पाकर जकड़न को तोड़कर चमक उठे।
सूरज की किरणें अपनी सुनहरी तूलिका से पाइन और देवदार के पेड़ों के साथ साथ लाल हरी छतों पर हल्के-हल्के रंग बिखेर रहीं हैं। गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू हवा में तैर रही है, और कोहरे की पतली चादर धीरे-धीरे हट रही है, मानो सूरज के स्वागत में रास्ता दे रही हो।
कई दिन बाद सूरज भी पूरी सौम्यता से बादल और बूंदों के रथ पर सवार मतवाला होकर अपने प्रिय पहाड़ों से मिलने आ गया है।
पेड़ों की पत्तियों पर कब्जा जमाए बूंदों की लड़ियां भी चमकने लगी हैं जैसे सूरज के स्वागत में वंदनवार सज गए हो । रिज (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर खड़े होकर देखो, तो लगता है सूरज ने बादलों के साथ लुकाछिपी का खेल खत्म कर दिया है।
कल तक बारिश की मोटी और ढीठ बूंदे में छिपी दूर हिमालय की चोटियाँ अब सुनहरे और गुलाबी रंग में नहाई दिखती हैं। सूरज के करीब कुछ चोटियों ने तो स्वर्ण मुकुट धारण कर लिया है जैसे अब सूरज के साथ उनकी सत्ता लौट आई है।
चाय की दुकानों से उठती अदरक इलायची की भाप के बीच चुस्कियां लेते हुए स्थानीय लोग मुस्कुराते हुए कहते हैं- "सूरज निकला, अब शिमला की रौनक लौट आएगी!"
यह नजारा सिर्फ़ आँखों का सुख नहीं, बल्कि आत्मा को ताज़गी देने वाला अनुभव है—जैसे शिमला ने बारिश की थकान उतारकर सूरज को गर्मजोशी से गले लगा लिया हो।
सोमवार, 18 अगस्त 2025
हंगामा है क्यों बरपा..शादी ही तो की है!!
दरअसल,हिमाचल प्रदेश में हाटी समुदाय के दो भाइयों द्वारा एक ही लड़की के साथ विवाह करने के मामले ने ऐसा तूल पकड़ा कि देश तो देश, विदेशी मीडिया हाउस भी इसमें दिलचस्पी दिखाने लगे। सामान्य रूप से सामाजिक परंपराओं के लिहाज से यह विवाह अलग और अनूठा भी है लेकिन उस क्षेत्र और समुदाय के लिए सामान्य बात है।
यही वजह है कि जब मीडिया ने उस गांव या समुदाय के लोगों से इस विवाह पर प्रतिक्रिया मांगी तो अधिकतर का यही उत्तर था कि इसमें नई बात क्या है? इनका कहना गलत भी नहीं है क्योंकि उस समुदाय और उस क्षेत्र के लिए यह वर्षों पुरानी सामान्य परंपरा है। वैसे तो यह वाकया हिमाचल प्रदेश में सिरमौर जिले के शिलाई इलाके का था लेकिन सिरमौर क्या, किन्नौर और लाहौल-स्पीति सहित कई जिलों में विभिन्न समुदायों में बहुपति या बहु पत्नी जैसी प्रथाएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं।
यदि हम देश के तमाम राज्यों में खासतौर पर आदिवासी और पारंपरिक संस्कारों के पोषक समाज में प्रचलित संस्कृतियों को देखें तो आज उन्हें जानकार हमें अचरज ही होगा मसलन मध्यप्रदेश में भील आदिवासियों में दूल्हे को ससुराल में रखने वाली घर जंवाई प्रथा, अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने की नाता प्रथा, विवाह पूर्व यौन संबंध वाली लामसेना प्रथा जैसी तमाम परंपराएं प्रचलित हैं।
वहीं, इसी प्रदेश के झाबुआ जिले का भगोरिया मेला युवक युवतियों के जीवन साथी चुनने की आजादी के लिए विख्यात है। मणिपुर में मैतेई समाज में लुंहोंगबा प्रथा आज भी चलन में है इसमें लड़का अपनी पसंद की लड़की को समाज और परिवार की स्वीकृति से भगाकर ले जाता है और फिर उनकी सहमति के आधार पर परिवार उनकी शादी कर देता है। वहीं,ढूकु विवाह प्रथा में लड़का लड़की आज के लिव इन की तरह साथ रहने लगते हैं, बाद में समाज कुछ जुर्माना लगाकर उनके विवाह को स्वीकृति देता है।
जहां तक बहुपति (Polyandry) प्रथा का प्रश्न है तो विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि उत्तराखंड के कुछ समुदायों, दक्षिण भारत के नीलगिरी के टोडा आदिवादियों और त्रावनकोर के नांजनाद समाज में,केरल के नायर और थियास समाज में यह परंपरा प्रचलित रही है। मुस्लिम समाज में बहु पत्नी (polygamy) प्रथा तो सामान्य बात है।
अब बात हिमाचल प्रदेश के उस बहुचर्चित विवाह और वहां की परंपराओं की, तो बहुपति प्रथा यहां सिरमौर, किन्नौर और लाहौल-स्पीति में सामान्य बात है। ताजा मामला सिरमौर जिले के हाटी समुदाय का है। हाटी समुदाय अपनी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है।
हम सभी जानते हैं कि बहुपति प्रथा का सबसे उल्लेखनीय प्रसंग महाभारत में है जिसमें द्रौपदी का विवाह पांच पांडव भाइयों से हुआ था। हाटी समुदाय में भी बहु पति प्रथा को जोड़ीदारां या द्रौपदी प्रथा जैसे विभिन्न नामों से नाम से जाना जाता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह प्रथा पांडवों की परंपरा से ही प्रेरित है। उल्लेखनीय बात यह है कि हाटी समुदाय में बहुपति प्रथा मुख्य रूप से भाइयों के बीच सामूहिक विवाह की प्रणाली है, जहां एक महिला कई भाइयों (आमतौर पर सगे भाइयों) की साझा पत्नी होती है।
हाटी समुदाय में बहुपति प्रथा के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारक हैं मसलन पहाड़ी भूभाग और सीमित उपजाऊ भूमि के कारण परिवारों के लिए संपत्ति का बंटवारा चुनौतीपूर्ण है। बहुपति प्रथा के माध्यम से, परिवार की संपत्ति और भूमि एक इकाई के रूप में बनी रहती है, जिससे आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।
इसी तरह, इस प्रथा से भाइयों के बीच एकता और सहयोग बना रहता है। परिवार के सभी पुरुष सदस्य एक साथ मिलकर खेती, पशुपालन, और अन्य आर्थिक गतिविधियों में योगदान देते हैं। हाटी समुदाय के लोगों का कहना है कि यह प्रथा परिवार और समुदाय की संरचना को मजबूत करती है।
हिमाचल के वरिष्ठ पत्रकार और हाटी समुदाय के प्रवक्ता रमेश सिंगटा बताते हैं कि हमारे समुदाय में बहुपति प्रथा में एक महिला का विवाह एक परिवार के सभी भाइयों से होता है, चाहे उनकी संख्या दो हो या अधिक। विवाह के बाद, पत्नी परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है। बच्चों को सभी भाइयों की साझा संतान माना जाता है, और सबसे बड़े भाई को सामान्यतः पिता के रूप में स्वीकार किया जाता है।
इस प्रथा में पत्नी को परिवार में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता है, और वह घरेलू निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रथा में कुछ नियम और परंपराएं भी हैं, जैसे कि भाइयों के बीच समय का बंटवारा और पारस्परिक सहमति। जो यह सुनिश्चित करता है कि परिवार में सामंजस्य बना रहे।
हाटी समुदाय की अनुमानित जनसंख्या लगभग 2 लाख है जो हिमाचल के सैकड़ों गांवों और करीब डेढ़ सौ से ज्यादा पंचायतों में फैली है। यहां तकरीबन हर गांव और परिवार में बहुपति प्रथा के तहत विवाह हुआ है और वे पीढ़ियों से मिल जुलकर सहज भाव से रह रहे हैं। हाल में सिरमौर जिले में दो भाइयों प्रदीप और कपिल नेगी द्वारा सुनीता नामक युवती से धूमधाम से किए गए विवाह ने भले ही बहुपति प्रथा को पुनः चर्चा में ला दिया है लेकिन इससे उलट हकीकत यह है कि आधुनिकता, शिक्षा, और शहरीकरण के प्रभाव से हाटी समुदाय में भी बहुपति प्रथा धीरे-धीरे कम हो रही है।
युवा पीढ़ी, विशेष रूप से शिक्षित युवा, इस प्रथा को अपनाने में कम रुचि दिखा रहे हैं। इसका कारण व्यक्तिगत स्वतंत्रता और एकल विवाह की अवधारणा के साथ साथ नई पीढ़ी की खेती के अलावा अन्य पेशों में रुचि बढ़ना भी है। इससे संपत्ति के बंटवारे की आवश्यकता भी कम हो रही है।
हाटी समुदाय की बहुपति प्रथा हालांकि सामुदायिक एकता और संसाधनों के संरक्षण पर आधारित है लेकिन यह प्रथा आधुनिक समाज में कई सामाजिक और कानूनी सवाल भी उठाती है, विशेष रूप से लैंगिक समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में। कुछ आलोचकों का मानना है कि यह प्रथा महिलाओं की स्वायत्तता को सीमित करती है, जबकि समुदाय के भीतर इसे एक सहमति-आधारित व्यवस्था के रूप में देखा जाता है।
वैसे इस प्रथा को समझने के लिए हमें इसे केवल आधुनिक और कानूनी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में भी देखना होगा तभी हम इसके सभी पहलुओं को समझ सकते हैं।
फिल्म शोले में गीत-संगीत: कालजयी विरासत
शोले का संगीत, जिसे संगीतकार आर.डी. बर्मन और पंचम दा के नाम से लोकप्रिय राहुल देव बर्मन ने तैयार किया, और जिसके बोल आनंद बख्शी ने लिखे, आज भी उतना ही ताज़ा और प्रासंगिक है, जितना वह अपने समय में था। शोले का संगीत अपने आप में एक अनूठा मिश्रण है, जिसमें भारतीय और पश्चिमी संगीत का सामंजस्य देखने को मिलता है।
पंचम दा ने इस फिल्म के लिए संगीत रचते समय न केवल कहानी की गहराई को समझा, बल्कि किरदारों की भावनाओं और परिस्थितियों को भी संगीत के माध्यम से जीवंत किया। फिल्म के गीत विविधता से भरे हैं—कभी रोमांटिक, कभी हास्यपूर्ण, कभी भावनात्मक, और कभी उत्साहवर्धक।
फिल्म का सबसे मशहूर गीत "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" दोस्ती की भावना को इस तरह व्यक्त करता है कि यह आज भी दोस्ती का प्रतीक बन चुका है। इस गीत में किशोर कुमार और मन्ना डे की जुगलबंदी, आर.डी. बर्मन के संगीत और आनंद बख्शी के सरल लेकिन प्रभावशाली बोलों ने इसे एक कालजयी रचना बना दिया। गीत का संगीत संयोजन, जिसमें गिटार, ड्रम और भारतीय वाद्य यंत्रों का मिश्रण है, इसे एक अनूठा अंदाज़ देता है। यह गीत न केवल जय और वीरू की दोस्ती को दर्शाता है, बल्कि भारतीय संस्कृति में दोस्ती के मूल्यों को भी रेखांकित करता है।
शोले के गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे कहानी के साथ पूरी तरह से एकीकृत हैं। प्रत्येक गीत फिल्म के कथानक को आगे बढ़ाता है और किरदारों की भावनाओं को गहराई देता है। उदाहरण के लिए, "होली के दिन दिल ख़िल जाते हैं" एक उत्सव गीत है, जो होली के रंगों और ग्रामीण परिवेश की मस्ती को दर्शाता है। इस गीत में किशोर कुमार और लता मंगेशकर की आवाज़ें, साथ ही आर.डी. बर्मन का जीवंत संगीत, दर्शकों को रामगढ़ के उत्सव में शामिल कर लेता है। इस गीत का चित्रण भी उतना ही प्रभावशाली है, जिसमें रंगों और नृत्य का समन्वय कहानी को हल्का-फुल्का और आनंदमय बनाता है।
वहीं, "महबूबा महबूबा" एक ऐसा गीत है, जो अपने बोल्ड और कामुक अंदाज़ के लिए जाना जाता है। हेलेन का नृत्य और आर.डी. बर्मन की आवाज़ इस गीत को एक अलग ही स्तर पर ले जाती है। यह गीत गब्बर के डाकुओं के अड्डे की माहौल को दर्शाता है और फिल्म के खलनायक की क्रूरता और रहस्यमयी व्यक्तित्व को उजागर करता है। इस गीत में पश्चिमी जैज़ और भारतीय लोक संगीत का मिश्रण इसे एक अनोखा स्वाद देता है।
"जब तक है जान" गीत बसंती के किरदार को और गहराई देता है। इस गीत में लता मंगेशकर की आवाज़ बसंती की मजबूती और जीवटता को दर्शाती है। यह गीत न केवल बसंती के नृत्य कौशल को प्रदर्शित करता है, बल्कि उसकी भावनाओं और उसके प्रेम को भी सामने लाता है।
शोले का बैकग्राउंड म्यूजिक भी उतना ही प्रभावशाली है, जितने इसके गीत। आर.डी. बर्मन ने फिल्म के हर दृश्य के लिए ऐसा संगीत रचा, जो दर्शकों को कहानी के मूड में डुबो देता है। गब्बर सिंह के प्रवेश दृश्य में भारी और रहस्यमयी संगीत, जय और वीरू की मस्ती भरे दृश्यों में हल्का और चुलबुला संगीत, और ठाकुर के दुखद अतीत को दर्शाने वाले दृश्यों में भावनात्मक संगीत, जया और अमिताभ का आमना सामना होने पर संगीत—हर नोट कहानी को और गहरा बनाता है।
गब्बर के डायलॉग "कितने आदमी थे?" के साथ बजने वाला संगीत आज भी दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देता है। शोले के गीत-संगीत का प्रभाव केवल सिनेमा तक सीमित नहीं रहा; इसने भारतीय समाज और संस्कृति पर भी गहरा असर डाला। "ये दोस्ती" गीत आज भी दोस्ती के अवसरों पर गाया जाता है, और "महबूबा महबूबा" का रीमिक्स आज भी डांस नंबर्स में लोकप्रिय है।
इन गीतों ने न केवल उस दौर के दर्शकों को प्रभावित किया, बल्कि नई पीढ़ी के बीच भी उतनी ही लोकप्रियता बरकरार रखी। आर.डी. बर्मन का संगीत और आनंद बख्शी के बोलों ने शोले को एक ऐसी फिल्म बनाया, जिसके गीत हर उम्र और वर्ग के लोगों को पसंद आए। इन गीतों की सादगी और गहराई ने इसे हर भारतीय के दिल तक पहुंचाया।
शोले के संगीत में आर.डी. बर्मन की तकनीकी प्रतिभा साफ झलकती है। उन्होंने विभिन्न वाद्य यंत्रों और ध्वनियों का उपयोग कर एक ऐसा अनुभव रचा, जो दर्शकों को बांधे रखता है। उदाहरण के लिए, "महबूबा महबूबा" में ड्रम और सितार का मिश्रण एक अनोखा प्रभाव पैदा करता है। इसी तरह, पृष्ठभूमि संगीत में उन्होंने सस्पेंस और ड्रामा पैदा करने के लिए न्यूनतम लेकिन प्रभावी ध्वनियों का उपयोग किया।
शोले का गीत-संगीत भारतीय सिनेमा की एक ऐसी धरोहर है, जो समय की कसौटी पर खरी उतरी है। आर.डी. बर्मन और आनंद बख्शी की जोड़ी ने इस फिल्म के लिए ऐसी रचनाएँ दीं, जो न केवल कहानी को समृद्ध करती हैं, बल्कि दर्शकों के दिलों में गहरी पैठ बनाती हैं। चाहे "ये दोस्ती" की मस्ती हो, "महबूबा" का जादू, या "जब तक है जान" की भावना—हर गीत अपने आप में एक कहानी कहता है।
शोले का संगीत न केवल एक फिल्म का हिस्सा है, बल्कि यह भारतीय सिनेमा और संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन चुका है। यह संगीत आज भी हमें उस दौर में ले जाता है, जब सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा थी। हालांकि,
कुछ फिल्म आलोचकों का यह भी मानना है कि शोले के गीत-संगीत में कुछ सीमाएँ और कमियाँ भी देखी जा सकती हैं, जिन्हें अक्सर इसकी लोकप्रियता के चलते अनदेखा कर दिया जाता है। उनके मुताबिक सबसे पहली कमी यह रही कि फिल्म की गंभीर और एक्शन प्रधान कथा में गीतों की उपस्थिति कुछ स्थानों पर असंगत प्रतीत होती है। उदाहरण के लिए, "मेहबूबा मेहबूबा" गीत कथा की प्रवाहशीलता को थोड़ी देर के लिए रोक देता है और फिल्म की मूल भावनात्मक लय से थोड़ा हटकर लगता है। यह गीत अधिक प्रदर्शनकारी और शैलीपरक है, जो मुख्य कहानी के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता। इसके अलावा, फिल्म की प्रमुख महिला पात्रों – बसंती और राधा – को लेकर कोई गंभीर या भावनात्मक गीत नहीं रचा गया, जिससे उनके किरदारों की गहराई संगीत के माध्यम से व्यक्त नहीं हो सकी।
हालाँकि आर. डी. बर्मन ने तकनीकी दृष्टि से उत्कृष्ट संगीत दिया, पर कुछ गीत फिल्म की कथा से अधिक स्वतंत्र लगते हैं, जिससे संपूर्ण संगीत अनुभव कुछ हद तक असंतुलित हो जाता है। इस दृष्टि से शोले का संगीत कलात्मक रूप से प्रभावशाली होते हुए भी पूरी तरह निष्कलंक नहीं कहा जा सकता।
समीक्षकों की राय जुदा हो सकती है लेकिन यदि आम दर्शक के लिहाज से देखें तो हिंदी सिनेमा की इस कालजयी फिल्म शोले का संगीत न केवल फिल्म की आत्मा बन गया, बल्कि भारतीय सिनेमा के संगीत इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर भी साबित हुआ। फिल्म के गीतों में विविधता है—दोस्ती, प्रेम, उत्सव और ताजगी—हर भाव को संगीतमय अभिव्यक्ति मिली है। गीतो की मेलोडी, शब्दों और गायन में जो अपनापन है, वह आज भी दिलों को छू जाता है।
आर. डी. बर्मन ने पारंपरिक और आधुनिक ध्वनियों का अद्भुत संगम कर फिल्म को संगीतमय ऊँचाई दी। शोले के गीत फिल्म की कथा में सहज रूप से घुलते हैं और हर दृश्य को भावनात्मक गहराई प्रदान करते हैं। यही कारण है कि शोले का संगीत आज भी उतना ही ताजा और प्रभावशाली लगता है।
'वर्क फ्रॉम होम' से रचा इतिहास और लिख दी भरोसे की नई इबारत
वैसे तो किसी भी कार्यालय और कर्मचारियों के लिए बिन मांगे एक पखवाड़े की छुट्टी मिलना लाटरी निकलने जैसा था लेकिन हुआ उल्टा....हमारे न्यूज़ रूम में मुर्दैनी सी छा गयी,सभी के चेहरे लटक गए और मुझे लगा कि ज्यादा बात की तो दिन रात धुंआधार समाचार बनाने-टाइप करने-पढने वाली हमारी टीम के कई सदस्य रो पड़ेंगे...।
आखिर जब प्रदेश के लोगों को सबसे ज्यादा हमारी और आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले विश्वसनीय समाचारों की जरूरत थी तब यदि हम चुपचाप घर बैठ जाएँ तो ये हमारे काम और सबसे ज्यादा हमारे साथ सालों से जुड़े श्रोताओं के साथ नाइंसाफी होगी और एक तरह का धोखा होगा। मैंने जून 2018 में भोपाल में राज्य संवाददाता के साथ साथ एकांश प्रमुख का कार्यभार संभाला था जबकि डीजी के आदेश वाली यह बात है साल 2000 में मार्च के आखिरी हफ्ते की, तब कोविड-19 महज एक बीमारी नहीं बल्कि खौफ़ था, साक्षात् यमराज से साक्षात्कार के समान था और एक ऐसा डर था जिसने आम लोगों, समाज, प्रदेश और देश को हिलाकर रख दिया था।
भय तो आज भी है लेकिन अब हम इस बीमारी से निपटने में सक्षम हैं और हमारे पास बेहतरीन चिकित्सा सुविधाओं के साथ साथ कोविड वैक्सीन भी हैं। अब भारत ही नहीं दुनिया भर में कोरोना संक्रमण से निपटने के तमाम तरीके तैयार कर लिए गए हैं लेकिन तब बस लॉक डाउन ही एक सहारा था और आज की नवजवान पीढ़ी के साथ पहले की कई पीढ़ियों को भी महीनों के ऐतिहासिक लॉक डाउन से रूबरू होना पड़ा था।
याद कीजिये, किसी शहर-कालोनी में एक भी कोरोना संक्रमित मिल जाता था तो पूरा इलाक़ा सील कर पुलिस का सघन पहरा बिठा दिया जाता था और जानकारी के अभाव में लोग उस इलाके के आसपास से निकलने से भी डरते थे क्योंकि तब संक्रमण को खतरनाक और छूत की बीमारी जैसा समझा जाता था। ये वो दौर था, जब सैनेटाइजर किसी चमत्कारी जड़ी-बूटी और मास्क हमारी कारों में लगे एयर बैग से ज्यादा सुरक्षा देने वाले कवच बन रहे थे और अफवाहों, भ्रम फैलाने वाली ख़बरों और अनजाने डर से भयभीत आम लोगों को सत्य, बिना मिलावट के और सौ टका विश्वसनीय समाचारों की सबसे ज्यादा जरुरत थी तब आकाशवाणी के नियमित समाचार बुलेटिन को बंद करना मतलब अफवाहों और सोशल मीडिया पर फ़ैल रही भ्रामक जानकारियों को बढ़ावा देने जैसा था। इसलिए, ऊपर से मिले आदेश के बाद भी हम समाचार बुलेटिन बंद कर आराम से घर बैठ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।
वैसे भी बतौर स्टेट कॉरेस्पॉन्डेंट मेरी यह अनिवार्य ड्यूटी थी कि रेडियो के श्रोताओं तक सही जानकारी पहुंचाकर उनका भ्रम और डर दोनों दूर करूं। वैसे, दुनिया की इस सबसे बड़ी आपदा के समय भी नियमित समाचारों का प्रसारण बंद कर घर बैठ जाने की इस हिदायत के पीछे भी एक रोचक (तब डरावनी) कहानी है। एक ऐसी गाथा जिसने आकाशवाणी ही नहीं बल्कि भोपाल-प्रदेश और देश के तमाम समाचार पत्र समूहों और न्यूज़ चैनलों को हिला डाला था।
दरअसल मध्यप्रदेश में तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के मुखिया कमलनाथ ने बहुमत खो देने के कारण अपनी 15 माह पुरानी सरकार के इस्तीफे की जानकारी देने के लिए मुख्यमंत्री निवास पर पत्रकारों को आमंत्रित किया था। इस सबसे बड़ी और राज्य की राजनीति में बदलाव लाने वाली खबर की पल पल की जानकारी हासिल करने के लिए प्रदेश और देश के मीडिया समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले 200 से ज्यादा पत्रकार मुख्यमंत्री निवास में जुटे थे।
खबर मिलने, छपने और सरकार बदलने तक तो सब ठीक था लेकिन उसके दो-तीन दिन बाद आई जानकारी ने मीडिया जगत में भूचाल ला दिया और दूसरों की नींद उड़ाने वाले पत्रकारों की भी कई दिनों तक नींद उड़ी रही। हुआ यह कि पत्रकार वार्ता के बाद पता चला कि वहां मौजूद एक पत्रकार साथी में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई है। जैसा मैंने ऊपर लिखा है कि तब कोरोना किसी भूत या काल जैसा था। ये पत्रकार साथी भोपाल के उन शुरूआती लोगों में शामिल थे जो इस संक्रमण का शिकार बने।
....बस फिर क्या था आनन फानन में पत्रकार होम क्वारंटाइन होने लगे और जांच कराने लगे। यह खबर टेलीविजन चैनलों और हवा के घोड़े पर सवार सोशल मीडिया के जरिये हमारे दिल्ली स्थित मुख्यालय तक भी पहुँच गयी और हमें यह बताना पड़ा कि मुख्यमंत्री निवास की उस पत्रकार वार्ता में हमारे एक समाचार सहयोगी भी थे। हालाँकि कोरोना संक्रमण की यह जानकारी सामने आने के बाद बाकी पत्रकारों की तरह वे भी होम क्वारंटाइन में चले गए थे, लेकिन लगभग हफ्ते भर तक हमारे समाचार विभाग की पूरी टीम और लगभग पूरा स्टाफ उनके संपर्क में रहा इसलिए प्रशासन के नियमों, सलाह और मुख्यालय के निर्देश पर सभी को 14 दिन के लिए घरों में अलग थलग कैद होना अनिवार्य था ।
ऐसी सूरत में एक ही रास्ता था कि भोपाल से समाचारों का प्रसारण 14 दिन के लिए बंद कर दिया जाए और यही हम सभी नहीं चाहते थे। ऐसे में रास्ता क्या था और इतना समय भी नहीं था कि सोच विचारकर फैसला लिया जाए क्योंकि आकाशवाणी के प्राइमरी चैनल के साथ साथ विविध भारती जैसे लोकप्रिय चैनल पर दिन में तीन बार समाचारों का लाइव प्रसारण और एफएम चैनल पर घंटे भर के अन्तराल में हेडलाइन्स का प्रसारण तो करना ही था। कुछ देर की ‘ब्रेन स्टार्मिंग’, अपनी जिम्मेदारी का अहसास और आकाशवाणी भोपाल के उस समय के प्रमुख धर्मेन्द्र कुमार श्रीवास्तव के आगे बढ़कर दिए गए तकनीकी सहयोग ने हमें ‘आपदा में अवसर’ तलाशने और ‘संकट में समाधान’ ढूंढने का हौंसला दिया और फिर हमने उस शुरुआत को अंजाम दिया जो बाद में ‘वर्क फ्राम होम’ के नाम से हर ऑफिस और हर कंपनी का मंत्र बन गया।
खास बात यह है कि आकाशवाणी भोपाल ही नहीं बल्कि पूरे आकाशवाणी नेटवर्क के लिए यह पहली, अनूठी,अभिनव और नई शुरुआत थी.. मतलब हम लोगों के पास एक तरह से सरकारी क्षेत्र में नयी शुरुआत का, इतिहास रचने का अवसर था और हमने यह कर भी दिखाया। कारपोरेट सेक्टर में तो वर्क फ्राम होम आसान है लेकिन आकाशवाणी में लाइव समाचार प्रसारण में इसे आजमाना न केवल जोखिम भरा था बल्कि ‘बूमरैंग’ का ख़तरा भी था और इससे आपदा में अवसर के स्थान पर आपदा में हादसे में बदलने की आशंका भी थी ।
आकाशवाणी भोपाल से समाचारों के प्रसारण में 'वर्क फ्रॉम होम' का मतलब था कि संपादक अपने घर में रहकर बुलेटिन बनाएं, समाचार वाचक अपने घर में रहकर उस तैयार बुलेटिन को लाइव पढ़े और श्यामला हिल्स स्थित आकाशवाणी भोपाल के स्टूडियो से उसका लाइव प्रसारण किया जाए। समाचार बुलेटिन के लिए खबरों का चयन, संपादन, टाइपिंग, संयोजन, हेडलाइन का चयन जैसे कामों के लिए हमने कार्यालय के अल्पविकसित लैपटाप और रेंगते इंटरनेट के साथ काम शुरू किया।
समयाभाव में यह भी संभव नहीं था कि मेरी संपादित खबरों को कोई और देख ले या मैं ही किसी और की खबरों को मुख्य संपादक या समाचार प्रमुख के नाते प्रसारण के पहले उन समाचारों की समीक्षा और संशोधन कर सकूं। इसके अलावा, राज्य संवाददाता के तौर पर दिल्ली के समाचारों के लिए दिन भर खुराक उपलब्ध कराना तो अनिवार्य था ही क्योंकि कोरोना संक्रमण ने उनके न्यूज़ स्त्रोत भी सुखा दिए थे । वैसे घर से समाचारों के लाइव प्रसारण का यह काम इतना आसान नहीं था जितना अब पढ़ने में लग रहा है क्योंकि आकाशवाणी में समय की पाबंदी और विश्वसनीयता दो अनिवार्य पाबंदियां हैं और जरा सी चूक किए कराए पर पानी फेर सकती थी।
समाचार वाचक के लिए घर बैठकर समय की पाबंदी का ख्याल रखना आसान नहीं था और मेरे लिए संवाददाता-सह समाचार संपादक-सह आरएनयू हेड की तिहरी जिम्मेदारी के साथ यह समन्वय और भी दुष्कर क्योंकि दिल्ली स्थित आकाशवाणी के नेशनल न्यूज़ रुम के पास भी खबरों का संकट था और हम संवाददाता उनके एकमात्र संकट मोचक थे।
वैसे भी, मध्यप्रदेश न केवल बड़ा राज्य है बल्कि खबरों का गढ़ भी है इसलिए बतौर मध्यप्रदेश संवाददाता दायित्व और भी बढ़ गया था। पहले इंदौर में आरएनयू और अलग संवाददाता होने के कारण जिम्मेदारी आधी हो जाती थी लेकिन इंदौर ऑफिस बंद होने के बाद तो यह जिम्मेदारी और खासकर कोविड काल में काम तो कई गुना बढ़ गया था।
खैर, हमने अपने पूरे अनुभव, साख और टीम भावना का इस्तेमाल कर घर से समाचारों का प्रसारण शुरू किया और पहली ही बुलेटिन की फूल प्रूफ सफलता ने कमाल कर दिया। फिर क्या था हमारी समाचार वाचक संयुक्ता बैनर्जी और दीपा सिंह ने अपनी सधी आवाज,स्पष्ट उच्चारण और कल कल बहते झरने जैसे अंदाज में वर्क फ्राम होम को ऐसा अपनाया कि श्रोताओं तो क्या आकाशवाणी के अन्य सहयोगियों को भी पता नहीं चल पाया कि समाचारों का प्रसारण कहां से हो रहा है।
जब हमने समाचार प्रेषण, संपादन, प्रस्तुतीकरण का यह नया अंदाज पेश किया तो जमकर सराहना भी मिली। प्रदेश के मीडिया ने जमकर आशीष लुटाया तो आकाशवाणी मुख्यालय ने भी इसे हाथों हाथ लिया। आरएनयू भोपाल के इन प्रयासों की समाचार सेवा प्रभाग की तत्कालीन प्रमुख महानिदेशक और प्रसार भारती के सीईओ ने भी जमकर सराहना की है। उन्होंने ट्वीट के जरिये इसे देश भर में न केवल प्रचारित किया बल्कि प्रसार भारती ने इस पर बाकायदा एक वीडियो बनवाकर भोपाल के प्रयासों को सोशल मीडिया में साझा करते हुए इसे समाचार प्रसारण का ‘भोपाल मॉडल’ नाम दे दिया।
यह नाम और काम इतना चर्चित हुआ कि अनेक आरएनयू के साथियों ने मदद मांगी और तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने तो मंत्रालय की मीडिया इकाइयों से संवाद के दौरान सबसे पहले यही पूछा कि भोपाल वाले यहां हैं न? मुझे 2014 से लेकर 2025 तक करीब 11 साल तक लगातार संवाददाता और राज्य संवाददाता का दायित्व संभालने का मौका मिला। इसमें लगभग चार साल असम के सिलचर की दुर्गम परिस्थितियों में और सात साल देश के हृदय स्थल मध्यप्रदेश में। असम में स्थानीय भाषा की अज्ञानता और दुष्कर परिस्थितियों ने रास्ता मुश्किल बनाया तो मैंने स्थानीय पत्रकारों से मित्रता कर इसे सहज कर लिया।
रिपोर्टिंग के इन ग्यारह सालों में से भी करीब सात साल संवाददाता के साथ साथ समाचार एकांश के प्रमुख की जिम्मेदारी भी शामिल रही। असम में कार्यकाल के दौरान बंगलादेश से लगी सीमा पर स्थित बराक घाटी से बेहतर समाचार प्रेषण और प्रबंधन के लिए हमें ‘देश के सर्वश्रेष्ठ समाचार एकांश’ का सम्मान भी मिला और तत्कालीन उप राष्ट्रपति डॉ हामिद अंसारी के साथ ईस्ट अफ्रीकी देशों की यात्रा के कवरेज का स्वर्णिम अवसर भी। इस यात्रा के खट्टे मीठे और अनूठे अनुभवों पर मैने ‘चार देश चालीस कहानियां’ नामक पुस्तक भी लिखी है और उसे पाठकों के साथ साथ वरिष्ठ अधिकारियों की सराहना भी मिली। इस पुस्तक में अनजान देशों में सांस्कृतिक संघर्ष, विकास की पहल, स्वच्छता के प्रयास और खाने पीने के अनुभवों पर कई दिलचस्प किस्से हैं।
इसी तरह, भोपाल में बेहतर रिपोर्टिंग के कारण मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जापान में जी 20 देशों के सम्मेलन को कवर करने का अवसर मिला। भोपाल से दिल्ली, फिर हांगकांग और ओसाका तक की अविस्मरणीय यात्रा और कवरेज का अनुभव वाकई परिपक्व बनाने वाला रहा। फिर तो देश के तकरीबन हर राज्य में चुनाव कवरेज,संसदीय एवं विधानसभा रिपोर्टिंग और भारत में हुए जी 20 सम्मेलन के कवरेज की टीम का मैं अनिवार्य हिस्सा बन गया..और राज्य संवाददाता का दर्जा एक तरह से राष्ट्रीय संवाददाता का हो गया। इस दौरान यह भी पता चला कि आकाशवाणी को भले ही एक तबका ‘डाइंग मीडियम’ कह रहा हो लेकिन समाचारों का प्रभाव इतना ज्यादा है कि हमारी अच्छी रिपोर्ट पर आज भी देश भर से फोन आ जाते हैं और किसी त्रुटि पर शिकायतों का अंबार लग जाता है।
एक रिपोर्ट में गणेश चतुर्थी पर ऐच्छिक अवकाश को गलती से अवकाश कह देने पर उसकी पुष्टि के लिए इतने फोन आ गए थे कि कान दर्द करने लगा और फोन करने/ करवाने वालों में कलेक्टर, प्राचार्य और कई उच्च पदस्थ लोग थे। इसी तरह जब मैने आकाशवाणी भोपाल के समाचारों में हर रविवार को सकारात्मक समाचारों पर केंद्रित ‘अच्छी खबर’ नामक नया प्रयोग किया तो खूब वाहवाही मिली और प्रसार भारती से अनेक पुरस्कार भी। संवाददाता के रूप में मेरे एक अन्य प्रयास ‘मध्यप्रदेश में महात्मा’ को तो देश भर में आकाशवाणी में हुईं अभिनव पहल में सबसे पहला स्थान मिला। इसमें महात्मा गांधी की मध्यप्रदेश की यात्राओं की रोचक अंदाज में रिपोर्टिंग की गई थी । फिर तो समान नागरिक संहिता पर ‘जानना जरूरी है’, देश एवं प्रदेश के चुनावों पर ‘आपका वोट आपका फैसला’ और समसामयिक कार्यक्रम ‘सुखियों में’ जैसे समाचार कवरेज आधारित सेगमेंट ने हमारी लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
कुल मिलाकर आकाशवाणी के साथ एक दशक से ज्यादा का यह सफर उपलब्धियों, नई शुरुआत और सराहना से सराबोर रहा। इस दौरान इतना कुछ देखने, सीखने, लिखने के साथ साथ कवरेज के अवसर मिले कि उन पर कई किताबें लिखी जा सकती हैं। मैं, अपने अनुभव के आधार पर दावे से यह बात कह सकता हूं कि यदि आप सूचना और प्रसारण मंत्रालय की सूचना सेवा के अधिकारी हैं और आपने यदि आकाशवाणी में संवाददाता का दायित्व नहीं निभाया तो समझिए आपने इस सरकारी सेवा का एक स्वर्णिम अवसर खो दिया।
जब सैनिकों के सम्मान में बाहर ही उतार दी चप्पल…!!
दरअसल, कारगिल युद्ध की वर्षगांठ और इस दौरान हुए आपरेशन विजय में हिस्सा लेने वाले पूर्व सैनिकों के सम्मान में हिमाचल प्रदेश में सैन्य प्रशिक्षण कमान, शिमला ने मशहूर रिज (मॉल रोड) पर कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस कार्यक्रम में एक महिला के चप्पल बाहर उतारकर आने ने सभी का ध्यान खींच लिया। सभागार की व्यवस्था सम्भाल रहे सैनिकों ने उनसे चप्पल पहने रहने का आग्रह किया लेकिन वे तैयार नहीं हुई। दो से तीन बार अनुरोध के बाद ही उस महिला ने चप्पल पहनी।
यह महज एक वाकया नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश में सैनिकों के प्रति आदर भाव का उदाहरण है। और इतना आदर दिया भी क्यों न जाए…हिमाचल प्रदेश को भले ही आमतौर पर देवभूमि कहा जाता है लेकिन इसे ‘वीर भूमि’ कहना भी उतना ही सार्थक है। सोचिए, जिस राज्य ने अब तक चार परमवीर चक्र और दस महावीर चक्र विजेता जांबाज दिए हों, वह वीरभूमि ही तो होगी। देश का ‘पहला’ सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र भी हिमाचल प्रदेश के हिस्से ही आया था।
मेजर सोमनाथ शर्मा देश के पहले परमवीर चक्र विजेता हैं और इसी प्रदेश के शूरवीर थे। इसके अलावा, इस राज्य से अब तक मेजर धन सिंह थापा, कैप्टन विक्रम बत्रा और राइफलमैन संजय कुमार भी इस सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं। इतना ही नहीं, तीन अशोक चक्र और 18 कीर्ति चक्र विजेता भी यहीं से हैं। यह बताने की जरूरत नहीं है कि अशोक चक्र शांतिकाल में परमवीर चक्र जैसा ही सम्मान माना जाता है। इसके अलावा, वीर चक्र और सेना मैडल की तो गिनती ही नहीं की जा सकती।
इस राज्य की माटी में घुली वीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कारगिल युद्ध में शहीद हुए कुल 527 सैनिकों में से 52 हिमाचल प्रदेश के थे। करीब 69 लाख की आबादी वाले इस राज्य से हर साल लगभग 5,000 सैनिकों का चयन किया जाता है । सेना में शामिल होने के इच्छुक युवाओं की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। राज्य में लगभग तीन लाख सेवारत या सेवानिवृत्त सैनिक और उनकी विधवाएँ हैं। अगर उनके परिवारों को भी शामिल कर लिया जाए, तो हिमाचल प्रदेश में रक्षा क्षेत्र से जुड़े लगभग आठ लाख लोग निवास करते हैं।
यहां गांव गांव में वीरता की कहानियां बिखरी हैं और नौजवान सेना में जाना नौकरी से ज्यादा अपना कर्तव्य समझते हैं। शायद राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी ने हिमाचल जैसे किसी राज्य की वीरता से प्रभावित होकर ही ‘पुष्प की अभिलाषा’ नामक कालजयी कविता लिखी थी क्योंकि यहां का युवा भी कहता है:
चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ।
चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ।
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ॥
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ में देना तुम फेंक॥
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने।
जिस पथ जावें वीर अनेक॥
इसलिए, सैनिकों के सम्मान में किसी महिला का चप्पल उतारकर आना यहां के लोगों के लिए खबर नहीं है..कोई और राज्य होता तो अब तक वह महिला मीडिया की सनसनी बन चुकी होती।
केसरिया बालम, आओ नी..पधारो म्हारे देश..!!
ऐसा लगता है जैसे ‘सूरज हुआ मद्धम, चांद जलने लगा..’, ‘केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश..’, ‘आ के तेरी बाहों में हर शाम लगे सिंदूरी, मेरे मन को महकाए तेरे मन की कस्तूरी..’, ‘सुरमई शाम इस तरह आए सांस लेते हैं जिसतरह साए..’, ‘वो शाम कुछ अजीब थी..’, ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए, सांझ की दुल्हन बदन चुराए..’ जैसे पुराने लोकप्रिय गीतों से लेकर नए दौर का ‘शाम गुलाबी, सहर गुलाबी पहर गुलाबी है, गुलाबी ये शहर..’ जैसे तमाम गाने गीतकारों ने किसी पहाड़ी शहर में बैठकर ही लिखे होंगे क्योंकि ऐसे अद्भुत दृश्य देखकर कलम अपने आप मचलने लगती है।
वैसे तो, पहाड़ों की एक दूसरे से ऊंचाई में प्रतिस्पर्धा करती चोटियां दिन भर सूरज की किरणों से चमकती रहती हैं लेकिन शाम ढलते ही वे एक सुखमयी शांति में डूब जाती हैं मानो दिनभर की थकान उतारने के लिए वे ‘मेडिटेशन’ कर रही हों। हवा में हल्की ठंडक महसूस होने लगती है और पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट और उन पर जमे पक्षियों का कलरव सूरज के लिए विदाई गीत सा प्रतीत होने लगता है।
यही वह समय होता है जब प्रकृति किसी बहरूपिए की तरह पल-पल में रंग बदलने लगती है जैसे कोई चित्रकार अपनी तूलिका से नए-नए रंग बिखेर रहा हो। पहले हल्का पीला, फिर सुनहरा, और फिर धीरे-धीरे गहरा सिंदूरी। यह रंग जब पेड़ों,पहाड़ों और घाटियों पर उतरते हैं तो ऐसा लगता है जैसे आसमान ने अपने प्रिय चांद के स्वागत के लिए दिन भर का सबसे सुंदर रूप सजा दिया है। आसमान की सुंदरता में चार चांद लगाते बादल भी दिन भर सफेद पहनावे के बाद शाम को सुनहरे रंग में रंग जाते हैं..और फिर जैसे ही शहर रात के आगोश में समाता है,पहाड़ों पर घरों की रोशनी सितारों सी दमकने लगती है।
पहाड़ों पर पर्यटकों को भी शायद इसी समय का इंतजार रहता है और वे इस नजारे को अपने कैमरे और दिल में कैद करने की पुरजोर कोशिश करते हैं। यही वह पल है जब लगता है समय ठहर-सा गया है और जीवन की आपा धापी को भूलकर हर कोई प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य में खो गया है।
सिंदूरी आसमान सिर्फ रंगों का खेल नहीं बल्कि एक अनुभूति है। यह क्षण हमें स्मरण कराता है कि जीवन में कितनी ही भागदौड़ क्यों न हो, कुछ पल ऐसे भी होते हैं, जो हमें रुककर शांति और सुकून से जीने का सबक देते हैं। खास बात यह है कि पहाड़ों की सांझ का यह नजारा हर बार नया सा लगता है।
तो अगली बार जब आप किसी पहाड़ी स्थल पर जाएं और सूरज ढलने लगे तो रुकिए जरूर और महसूस कीजिए उस सिंदूरी छटा को और आनंद लीजिए प्रकृति की उस दिन की कहानी का… और हां, अपने दिल में प्रकृति के इस जादू को पूरीतरह भर भी लीजिए ताकि यह नजारा, यह अनुभव, यह सुकून, यह शांति, रंगों की यह जादूगरी और प्रकृति की चित्रकारी हमेशा आपके साथ रहे ।
सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!
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