रविवार, 19 अक्टूबर 2025

क्या है शिमला का इटली से प्राकृतिक कनेक्शन..!!

क्वीन ऑफ हिल्स शिमला के बारे में यह तो सभी को पता है कि अंग्रेजों ने अपने आराम के लिए इस स्थान को सजाया संवारा था लेकिन यहां इटेलियन कनेक्शन भी है। अंग्रेजों ने भले ही इसे सत्ता प्रतिष्ठान का केंद्र बनाया था और यहां की वादियों से देश दुनिया को रूबरू कराया लेकिन अन्य देशों के लोग भी शिमला के कैनवास को अपने रंगों से रंगने में पीछे नहीं रहे हैं। इसी शृंखला में एक बेहतरीन स्थान है - क्रेग्नानो नेचर पार्क। 

क्रेग्नानो नेचर पार्क प्रकृति के चितेरो के लिए एक ऐसा कैनवास है जिसपर वे अपनी कलात्मकता से नए नए रंग भर सकते हैं, मनमाफिक पटकथा लिख सकते हैं और सुकून और सेहत के खुशनुमा पल गुजार सकते हैं। देवदार, चीड़ और चिनार के पत्तों के बीच से झांकती सूरज की नटखट किरणें हो या खूबसूरत फूलों पर अठखेलियां करती रंग बिरंगी तितलियां या पक्षियों के कलरव से उपजा दिलकश संगीत..या फिर अनोखी दिल को छू लेने वाली शांति। यहां आकर आपको प्रकृति से निकटता का अनूठा अनुभव होता है।  


शिमला से मशोबरा की ओर तथा लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित इस क्रैग्नानो नेचर पार्क तक महज 40 मिनट की हरीभरी और ऊंचे देवदार की छत्रछाया में ड्राइव आपको इस मामूली सी दूरी का भी अहसास नहीं होने देती।   मशोबरा में 7,700 फीट की ऊँचाई पर करीब 9.6 हेक्टेयर में फैला यह क्रैग्नानो  पार्क हरी-भरी वादियों में बसा एक ऐसा स्वर्ग है, जहाँ पहाड़ों की ठंडी हवा, घने जंगलों की सिहरन और इतालवी शैली का ऐतिहासिक आकर्षण एक साथ मिल जाते हैं।


 यहां से हिमालय की चोटियाँ बादलों को छूती नजर आती हैं। यह जगह मूल रूप से 19 वीं सदी में इतालवी व्यवसाई और फोटोग्राफर चेवालियर फ्रेडरिको पेलिटी द्वारा बनाई गई थी, जिन्होंने इसे अपने जन्मस्थान क्रैग्नानो (इटली) के नाम पर बसाया था। इस पार्क की खूबसूरती इतनी विविध और मोहक है कि हर मौसम में यह नया रंग-रूप धारण कर लेता है। वसंत और ग्रीष्म में पार्क रंग-बिरंगे फूलों से सजा होता है एवं लाल, पीले और गुलाबी फूलों की चादर यहां बिछी रहती है तो शरद ऋतु में पेड़ सोने-चाँदी के रंगों से जगमगा उठते हैं, जबकि सर्दियों में बर्फ की सफेद चादर इस जगह को एक परी लोक जैसा बना देती है। 

यहाँ देवदार, ओक और पाइन के घने जंगल हैं, जिनके बीच से बहती ठंडी ताजी हवा जीवन को नए अहसास और मन को शांति से भर देती है। यहाँ तीन ट्रेल्स (रास्ते) हैं – पाइन ट्रेल, ओक ट्रेल और एकेडमी ट्रेल – जो पैदल चलने वालों के लिए अनूठा अनुभव देते हैं। इन रास्तों पर चलते हुए आप तितलियों के झुंड, रंगीन फूलों और शांत वादियों का भरपूर आनंद ले सकते हैं। यहाँ बने ट्री हाउस में पहुँचकर आप शहर की भागदौड़ भूलकर प्रकृति की गोद में सुकून से आराम कर सकते हैं। 

इस बार जलाएं एक दिया उम्मीदों का..!!

फोन में घुसकर ऑनलाइन लाइटिंग,सजावट का सामान और कपड़े तलाशने में समय बर्बाद करने की बजाए एक बार सपरिवार घर से बाहर निकलिए और सड़क पर दिए बेचती बूढ़ी अम्मा की आंखों में पलती उम्मीदों की रोशनी देखिए या फिर रंगोली के रंग फैलाए उस नहीं सी बालिका के चेहरे पर चढ़ते उतरते रंग महसूस कीजिए..क्या आप हम इस बार ऐसे ही किसी व्यक्ति/परिवार के घर में उम्मीदों का दिया नहीं जला सकते?  हमें करना ही क्या है…बस,इस बार स्थानीय और खासतौर पर पटरी पर बाज़ार सजाने वालों से खरीददारी करनी है और अपने बच्चों में भी यही आदत डालनी है। 

जाहिर सी बात है रोशनी, खुशहाली, समृद्धि और सामूहिकता का पर्व दीपावली क़रीब है। घर घर में सफाई,रंगाई पुताई और दीप पर्व से जुड़ी तैयारियों का दौर जारी है इसलिए सामान खरीदने का दौर भी शुरू हो गया है।  दीप पर्व केवल रोशनी और खुशियों का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकजुटता और आर्थिक सहयोग का भी अवसर है। इसलिए,इस दीवाली जब हम बाजारों में रंग-बिरंगे दीयों, मिठाइयों, और सजावटी सामानों की खरीदारी के लिए निकलें, तो अपनी आदत में क्यों न एक छोटा सा बदलाव लाएं ? 

इस बार, बिना मोलभाव के लोकल और पटरी विक्रेताओं से खरीदारी करें और त्योहार के असली मायने को और गहरा करें।   बिना मोलभाव के खरीदारी करना न केवल आपके त्योहार को खास बनाएगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगा। पटरी बाजार के लिए हर बिक्री न केवल आजीविका का साधन है, बल्कि परिवार के पोषण, बच्चों की पढ़ाई, और त्योहार की तैयारी का आधार भी है। एक छोटे विक्रेता के लिए, 10-20 रुपये की कीमत कम करना भी उनके दिन के कुल मुनाफे को प्रभावित कर सकता है। 

दीवाली जैसे व्यस्त मौसम में, जब उनकी बिक्री साल भर की कमाई का बड़ा हिस्सा होती है, मोलभाव उनके लिए बोझ बन सकता है। बिना मोलभाव के खरीदारी करके आप उनकी मेहनत का सम्मान करते हैं और उन्हें त्योहार की असली खुशी देते हैं। हम सात सौ रुपए का पिज़्ज़ा, दो सौ का बर्गर और तीन सौ रुपए की कॉफी बिना मोलभाव के खा पी लेते हैं लेकिन साल में एक बार मिट्टी के दर्जन भर दिए खरीदने के लिए मोलभाव में कोई कसर नहीं छोड़ते। हम मल्टीप्लेक्स में चार सौ रुपए का पॉपकॉर्न चुपचाप ले लेते हैं लेकिन कागज़ की झालर,तोरण और बिजली का लड़ी खरीदते समय इतना भाव ताव करते हैं जैसे अमेरिका चीन से कोई व्यापारिक समझौता कर रहे हों। 

हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि देश में बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी  स्थानीय बाजारों मसलन किराना दुकानें, पटरी विक्रेता और छोटे रिटेलर पर गहरा प्रभाव डाल रही है। 2025 तक, ई-कॉमर्स बाजार का मूल्य लगभग 10 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुका है, जो 2024 की तुलना में 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। एक अध्ययन के मुताबिक भारत का कुल रिटेल बाजार 2024 में लगभग 1.4 ट्रिलियन डॉलर का है, जिसमें ई-कॉमर्स का योगदान 8 फीसदी है और  2028 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 14 फीसदी हो जाएगी, जिससे ऑफलाइन रिटेल का शेयर 92 प्रतिशत से घटकर 86 फीसदी रह जाएगा।   

हमारे मोबाइल में घुसकर खरीददारी करने और बढ़ती ऑनलाइन खरीदारी के कारण छोटे रिटेलरों की बिक्री में 15-20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है । एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022-2024 के बीच 1-2 लाख छोटे स्टोर्स बंद हो चुके हैं या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में बदल गए हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रिटेल सेक्टर भारत में 4 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है। ई-कॉमर्स की वृद्धि से 5-7 लाख नौकरियां प्रभावित हुई हैं। इनमें मुख्य रूप से पटरी विक्रेताओं और छोटे दुकानदारों से जुड़ी नौकरी शामिल हैं ।   

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करते रहे हैं और इसे वे आत्मनिर्भरता का जरिया मानते थे। वैसे भी, लोकल और पटरी विक्रेता भारतीय बाजारों की रीढ़ हैं। ये वे लोग हैं जो सुबह जल्दी उठकर अपने स्टॉल सजाते हैं, मिट्टी के दीये बनाते हैं, हस्तनिर्मित सजावटी सामान तैयार करते हैं, और स्थानीय स्वाद वाली मिठाइयां बेचते हैं। इनके उत्पाद न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, बल्कि ये हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखते हैं। इन विक्रेताओं से खरीदारी करके आप हम न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि बड़े कॉरपोरेट्स पर निर्भरता को भी कम करते हैं।  

आइए,इस दीवाली रोशनी के साथ-साथ अपने करीबी बाजार को भी रोशन करें। बिना मोलभाव के खरीदारी करें एवं त्योहार की असली खुशियों को फैलाकर सभी के लिए दीवाली शुभ बनाए और घर घर में जलाएं एक दिया उम्मीदों का।

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

‘मन की बात’ कैसे बनी जन जन की बात..!!

रविवार को सुबह 11 बजे आकाशवाणी और दूरदर्शन से लेकर विभिन्न संचार माध्यमों पर गूंजने वाली आवाज ‘मेरे प्यारे देशवासियों’ अब न केवल मासिक मंत्र बन गई है बल्कि जन संवाद की पहचान भी है। इसे हम सभी मन की बात कार्यक्रम के नाम से जानते हैं जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों के साथ अराजनीतिक और प्रेरक संवाद करते हैं। 3 अक्टूबर को इस कार्यक्रम की 11वीं वर्षगांठ है। दरअसल श्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के करीब 5 महीने बाद बुराई पर अच्छाई की जीत के पर्व विजयादशमी के दिन 3 अक्टूबर 2014 को अपने इस सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मन की बात’ की शुरुआत की थी। आज यह कार्यक्रम महीने के आखिरी रविवार की पहचान और एक अनिवार्य जरूरत बन गया है।

इस कार्यक्रम को रेडियो माध्यम को नया जन्म देने की दिशा में मील का पत्थर माना जाता है। खास तौर पर जब दुनिया संचार के नए युग के विभिन्न प्लेटफॉर्म के पीछे भाग रही हो तब किसी राष्ट्र प्रमुख द्वारा पारंपरिक और केवल आवाज़ पर केंद्रित माध्यम पर विश्वास जताना वाकई प्रशंसनीय एवं अचरज भरा प्रयास था लेकिन आज मन की बात कार्यक्रम के सवा सौ एपिसोड पूरे हो जाने के बाद हम कह सकते हैं कि श्री मोदी ने रेडियो का चयन कर जमीनी स्तर तक संवाद कायम करने की जो शुरुआत की थी वह आज सफलता का नया इतिहास रच रही है।

मन की बात कार्यक्रम के जरिए प्रधानमंत्री ने आम जनता के साथ सहज तरीके से सरल भाषा में संवाद कायम किया है। आसान शब्दों में कहें तो अब यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री और आम नागरिकों के बीच सीधे संवाद का एक मजबूत सेतु बन चुका है।  मन की बात कार्यक्रम ने 30 अप्रैल 2023 को 100 एपिसोड का सफर पूरा कर लिया था और अब यह सवा सौ एपिसोड का आंकड़ा पार कर चुका है। बीते रविवार को मन की बात के 126 वे अंक का प्रसारण हुआ। हालांकि, देश में आम चुनाव के मद्देनजर चुनावी आचार संहिता के कारण 2019 में मार्च, अप्रैल और मई माह में यह कार्यक्रम प्रसारित नहीं हुआ था।

मन की बात कार्यक्रम से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह है कि इसके पहले एपिसोड का प्रसारण शुक्रवार के दिन हुआ था तब से लेकर मार्च 2015 तक इसका प्रसारण हर महीने शुक्रवार को ही होता था लेकिन अप्रैल 2015 से इसके प्रसारण का दिन बदल दिया गया और फिर यह हर महीने के आखिरी रविवार को प्रसारित होने लगा। एक अन्य मजेदार बात यह है कि पहला एपिसोड करीब 14 मिनट का था जबकि नवंबर 2014 में प्रसारित दूसरा एपिसोड 19 मिनट का और तीसरा एपिसोड 26 मिनट अवधि का था। हालांकि चौथे एपिसोड से इसकी अवधि 30 मिनट तय कर दी गई और तब से अब तक यह प्रतिमाह 30 मिनट की अवधि में ही प्रसारित होता है। आकाशवाणी पर यह कार्यक्रम 22 भारतीय भाषाओं, 29 बोलियों और 11 विदेशी भाषा में प्रसारित होता है। इसके अलावा दूरदर्शन तथा अन्य निजी समाचार चैनलों, यूट्यूब और कई सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी इस कार्यक्रम का प्रसारण किया जाता है।

 मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक करीब 1000 प्रतिष्ठित व्यक्तियों, प्रेरित करने वाली शख्सियतों और संगठनों का उल्लेख कर चुके हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के समुचित प्रतिनिधित्व के कारण मन की बात कार्यक्रम अब सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात नहीं रह गया है बल्कि यह करोड़ों भारतीय लोगों के मन की बात बन चुका है ।

मन की बात के सौवें एपिसोड के पहले भारतीय प्रबंध संस्थान, रोहतक द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक मन की बात के बारे में लगभग 96 प्रतिशत लोग जानते हैं और यह कार्यक्रम 100 करोड़ लोगों तक पहुँच चुका है। इतना ही नहीं, 23 करोड़ लोग नियमित रूप से यह कार्यक्रम देखते/सुनते हैं, जबकि अन्य 41 करोड़ लोग कभी कभी इस कार्यक्रम से जुड़ते हैं। इस कार्यक्रम ने अब तक करीब 35 करोड़ रुपए का राजस्व भी अर्जित किया है। अब सवा सौ एपिसोड का सफर तय कर यह कार्यक्रम सफलता की नई ऊंचाइयां छू रहा है।

मन की बात परस्पर संवाद का मंच इसलिए भी बन गया है क्योंकि आम लोग इस कार्यक्रम के संबंध में न केवल प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं बल्कि अपने रिकॉर्ड किए गए संदेश भी भेजते हैं इसलिए यह दो तरफा संवाद सकारात्मक पहलुओं को सामने लाने और समाज में बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण जरिया बन गया है। यह एक ऐसा कार्यक्रम है जिसमें अरुणाचल प्रदेश से लेकर नागालैंड तक और पंजाब से लेकर लक्षद्वीप तक से जुड़े मुद्दों को उठाया जाता है,वहां की समस्याओं पर बातचीत होती है और जनसहयोग से उनके समाधान पर भी बात होती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण स्वच्छता अभियान है । प्रधानमंत्री ने मन की बात के पहले एपिसोड में ही स्वच्छता को जन आंदोलन बनाने की अपील की थी और अब करीब 10 साल बाद देश स्वच्छता में किन बुलंदियों पर है, यह किसी से छिपा नहीं है। 

इसी तरह, प्रधानमंत्री ने जुलाई 2022 में घरेलू खिलौना उद्योग को बढ़ावा देने की अपील की थी और कभी आयात पर निर्भर मृतप्राय भारतीय खिलौना उद्योग अब लगभग 3000 करोड रुपए के निर्यात का आंकड़ा हासिल कर रहा है। प्रधानमंत्री ने खादी के वस्त्र खरीदने और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने जैसी कई मुहिम इस कार्यक्रम के जरिए शुरू की और आज ये सभी क्षेत्र विकास की रफ़्तार पर सवार हैं ।

विशेषज्ञों का मानना है कि मन की बात कार्यक्रम के लोकप्रिय होने की वजह इसका पारिवारिक शैली में संवाद है और यह बचपन में दादी नानी से सुनी गई कहानियों की याद दिलाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरल, सहज और व्यक्तिगत संवाद शैली लोगों को जोड़ती है। वे आम लोगों की भाषा में बात करते हैं, जिससे श्रोता अपनेपन का अनुभव करते हैं। इतना ही नहीं,पत्रों या MyGov प्लेटफॉर्म के माध्यम से आम लोगों की कहानियों और सुझावों को शामिल करना इसे जन-आधारित बनाता है। यह कार्यक्रम हमें अपने त्योहार, संस्कृति, परंपराओं, समुदाय और परिवेश से जोड़ने में भी मदद करता है। 

मन की बात एआई और मशीन लर्निंग के दौर में पारंपरिक संचार माध्यम के इस्तेमाल का बेहतरीन उदाहरण है जो चुपचाप सामाजिक क्रांति का जरिया भी बन गया है। सेल्फी विद डॉटर, देश के गुमनाम नायकों का गौरवपूर्ण स्मरण, पर्यावरण संरक्षण, वोकल फॉर लोकल,एक पेड़ मां के नाम, कुपोषण से मुक्ति और जल शक्ति अभियान जैसे कई उदाहरण है जिन्हें इस कार्यक्रम के जरिए न केवल राष्ट्रव्यापी सफलता मिली है बल्कि उन्होंने देश की सूरत और सीरत बदलने का काम किया है।


कुल मिलाकर यह कार्यक्रम प्रेरणादायक और सकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है और लोगों को अच्छा करने के लिए प्रेरित एवं उत्साहित करता है। यही वजह है कि मन की बात भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी लोकप्रिय हो रहा है। यह हमारा भी कर्तव्य है कि हम इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री द्वारा की गई अपील का सामूहिक रूप से पालन करें और देश को विकास,बदलाव और सकारात्मक सोच के साथ प्रगति के पथ पर अग्रसर रखने में कोई कसर नहीं छोड़े।

#Mannkibaat #NarendraModi #Radio #Akashvani

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

शिव और प्रकृति का मेल है डमरू घाटी

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के  गाडरवारा शहर के करीब स्थित डमरू घाटी एक ऐसा धार्मिक स्थल है, जो प्रकृति की गोद में बसा होने के कारण भक्तों के मन को मोह लेता है। यह घाटी शक्कर नदी के तट पर स्थित है, जो नर्मदा की सहायक नदियों में से एक है। 

घाटी का आकार भगवान शिव के डमरू के समान होने के कारण इसका नाम 'डमरू घाटी' पड़ा है। यहाँ की शांत वादियाँ और हरे-भरे पेड़ प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करते हैं। गाडरवारा पहले से ही आचार्य रजनीश (ओशो) के लिए प्रसिद्ध है।

मंदिर का उद्घाटन 1980 के दशक में हुआ, और तब से यह शिवभक्तों का प्रमुख केंद्र बन गया है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है इसका विशाल शिवलिंग, जो मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है। यह शिवलिंग लगभग 20-21 फुट ऊँचा है। 

डमरू घाटी का वातावरण इतना शांतिपूर्ण है कि आने वाला हर यात्री मन की शांति का अनुभव करता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशाल मेला लगता है, जिसमें विभिन्न भागों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। 

डमरू घाटी न केवल एक मंदिर है, बल्कि भक्ति, प्रकृति और स्थानीय संस्कृति का जीवंत चित्रण है। यदि आप मध्य प्रदेश की यात्रा पर हैं, तो यहाँ शिव के दर्शन अवश्य करें । यह जबलपुर-भोपाल मार्ग पर कुछ वक्त गुजारने के लिए बेहतरीन स्थान है।


केवल गंभीर नहीं, विनोदप्रिय भी थे बापू

आज 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्मदिन है। आज अगर बापू हमारे बीच होते तो वे 156 साल के होते लेकिन कहते हैं न कि उम्र बड़ी नहीं होनी चाहिए बल्कि जीवन में किए गए कार्य बड़े होने चाहिए और यह बात मोहनदास करमचंद गांधी पर सौ फीसदी लागू होती है। महात्मा गांधी अपने कार्यों, आदर्शों, विचारों, सिद्धांतों और जीवन के उदाहरणों से इतना ऊंचा दर्जा रखते हैं कि देश क्या, दुनिया में उनकी बराबरी का कोई और शख्स नहीं दिखता। आमतौर पर गांधीजी जी की छवि को गंभीर, अत्यधिक अनुशासित और नीरस आंका जाता है लेकिन असलियत यह है कि गांधीजी विनोदप्रियता और हंसी मजाक में किसी से कम नहीं थे लेकिन गांधीजी की विनोदप्रियता में सबसे बड़ा अंतर यह था कि महात्मा गांधी का हास्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं था, बल्कि उसमें हमेशा गहरा संदेश छिपा होता था।

हम यह कह सकते हैं कि महात्मा गांधी का व्यक्तित्व जितना गंभीर, त्यागपूर्ण और आदर्शवादी था, उतना ही सहज और विनोदी भी था। उनका हास्य-बोध भी उनके अन्य कार्यों की तरह असाधारण था। अपनी विनोदप्रियता के कारण ही वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सहज भाव बनाए रखते थे । 

गांधीजी अक्सर अपने बारे में ही मजाक करते थे, जो उनकी विनम्रता को दर्शाता है । एक बार, जब किसी ने उनकी पतली काया का मजाक उड़ाया तो गांधीजी ने मुस्कुराते हुए कहा कि मेरे शरीर में हड्डियाँ ही हड्डियाँ हैं, लेकिन मेरी आत्मा में ताकत है। एक अन्य मौके पर, जब किसी ने उनकी सख्त दिनचर्या और कम खाने की आदत पर टिप्पणी की, तो उन्होंने मजाक में कहा कि मैं अपने पेट को ज्यादा काम नहीं देता, ताकि मेरा दिमाग ज्यादा काम कर सके।

इसी तरह, एक बार किसी विदेशी पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप इतने बड़े देश का प्रतिनिधित्व करते हुए भी केवल एक धोती क्यों पहनते हैं? तो गांधीजी ने मुस्कराकर उत्तर दिया कि मेरे देश के करोड़ों लोग पूरे कपड़े नहीं पहन पाते। जब वे सब पहनने लगेंगे, तब मैं भी पहन लूंगा। यह उत्तर व्यंग्य के साथ  करुणा भी जगाता है ।

बताया जाता है कि सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जब बापू जेल में थे, तो एक जेलर ने उनसे मजाक में कहा कि गांधीजी, आप बार-बार जेल क्यों आ जाते हैं? इस पर गांधीजी ने हँसते हुए जवाब दिया कि यहाँ का खाना मुझे घर से बेहतर लगता है। यह जवाब न केवल हास्यपूर्ण था, बल्कि उनकी निर्भीकता को भी दर्शाता है।

गांधीजी बच्चों के साथ विशेष रूप से विनोदप्रिय हो जाते थे। वे बच्चों के साथ मजाक करते, कहानियाँ सुनाते और उनके सवालों का जवाब हल्के-फुल्के अंदाज में देते थे। एक बार, एक बच्चे ने उनसे पूछा कि बापू, आप इतने पतले क्यों हैं? तो गांधीजी ने हँसते हुए कहा कि मैं अपनी सारी ताकत तुम जैसे बच्चों को देने के लिए बचाता हूँ।

इसी प्रकार, एक बार, जब एक ब्रिटिश पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप इतने कम कपड़ों में लंदन की सर्दी में क्या करेंगे? तो गांधीजी ने हँसते हुए जवाब दिया कि मेरे पास तो मेरे देशवासियों से ज्यादा कपड़े हैं, वे तो और भी कम पहनते हैं। यह जवाब न केवल विनोदी था, बल्कि भारत की गरीबी और ब्रिटिश शोषण की ओर भी इशारा करता था।

एक अन्य उदाहरण ऐसा भी है जिसमें भूख से भी उन्होंने हास्य पैदा कर दिया था। एक बार अनशन के दौरान किसी ने  उनसे पूछा कि बापू भूख तो नहीं लग रही? तो उन्होंने हँसकर कहा कि भूख तो लगती है, पर सोच रहा हूँ कि भूख भी कितनी सहनशील है। 

सबसे खास बात यह है कि गांधीजी की विनोदप्रियता कभी किसी को चोट पहुँचाने के लिए नहीं होती थी। वह हास्य में व्यंग्य का सहारा लेते थे, लेकिन उसमें करुणा और आत्मीयता झलकती थी। यही कारण है कि उनका विनोद प्रेरक बन जाता था। महात्मा गांधी की विनोदप्रियता उनकी विनम्रता, बुद्धिमत्ता, और मानवता का प्रतीक थी। उनका हास्य न तो आक्रामक था और न ही अपमानजनक, बल्कि यह विचारशील, प्रेरणादायक और सकारात्मक था। यह उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पहलू था, जो उन्हें न केवल एक महान नेता, बल्कि एक सहज और प्रिय इंसान बनाता था। महात्मा गांधी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि गंभीरता और विनोद साथ-साथ चल सकते हैं और समाज को नई दिशा दे सकते हैं।


रविवार, 28 सितंबर 2025

जिंदगी के खट्टे मीठे अनुभवों का खजाना है ‘थैंक यू यारा’

‘थैंक यू यार’ एक ऐसा कहानी संग्रह है, जिसमें दस भावनात्मक और संवेदनशील कहानियाँ शामिल हैं, जो हमारे आसपास की रोज़मर्रा की जिंदगी, मानवीय रिश्तों और सामाजिक परिस्थितियों को गहराई से उकेरती हैं। यह संग्रह पाठकों को भावनाओं के एक गहरे समुद्र में ले जाता है, जहाँ प्रेम, दुख, संघर्ष, और उम्मीद की बारीकियां हर कहानी में स्पष्ट रूप से झलकती हैं।

#थैंकयूयारा की कहानियाँ सामान्य लोगों के जीवन, उनके छोटे-छोटे सपनों, और रोज़मर्रा के संघर्षों को केंद्र में रखती हैं। ये कहानियाँ न केवल भावनात्मक गहराई लिए हुए हैं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परतों को भी उजागर करती हैं। ‘कटघरे’ से लेकर ‘यूं भी होता है’ तक संग्रह की हर कहानी एक अलग रंग और स्वाद लिए हुए है, फिर भी सभी में एक सामान्य सूत्र है—मानवीय संवेदनाओं का चित्रण और जीवन की साधारण परिस्थितियों में छिपी असाधारणता ।

‘थैंक यू यारा’ संग्रह की तमाम कहानियाँ सीधे हमारे दिल को छूती हैं। चाहे वह ‘कटघरे’ कहानी में एक शिक्षक शबनम में अपने छात्र विजय भूषण के प्रति अपने बच्चे जैसी तड़प हो, ‘दूर्वा’ में शिक्षक और छात्रा रुचिरा के बीच मार्गदर्शन की गर्माहट हो या  ‘सुर्ख गुलाब’ में युवावस्था की दहलीज पर खड़ी तीन सहेलियों के भीतर प्रेम की अनकही पीड़ा...हर कहानी में भावनाएँ जीवंत रूप में उभरती हैं। 

दस कहानियों का यह संग्रह विभिन्न विषयों को छूता है—प्रेम, दोस्ती, परिवार और सामाजिकता। प्रत्येक कहानी अपने आप में पूर्ण है, फिर भी संग्रह के रूप में ये एक-दूसरे की पूरक बनकर मोतियों की माला सी बन जाती हैं।
‘थैंक यू यारा’ की कहानियाँ रिश्तों की विभिन्न छवियों को भी सामने लाती हैं जैसे ‘प्रार्थना’ कहानी में माँ का अपनी बेटी के लिए प्रेम है, तो ‘मावठा’ में दोस्तों के बीच अनकहा विश्वास। 

इस संग्रह की कहानियाँ आधुनिक जीवन की जटिलताओं और उससे उत्पन्न होने वाली भावनात्मक दूरी को भी दर्शाती हैं। जैसे ‘परिक्रमा’ कहानी में कला की कद्र हमें स्कूल के दिनों में पढ़ी महान कहानीकार फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘ठेस’ और उसके कलाकार सिरचन का स्मरण करा देती है जबकि ‘गोल्डन कर्ल’ कहानी बच्चों की मासूमियत से रूबरू कराती है। पुस्तक का शीर्षक बनी कहानी ‘थैंक यू यारा’ लेखक के मन की उथल पुथल को आत्म संवाद शैली की कहानी में पेश करती है।

आकाशवाणी भोपाल  की लोकप्रिय एनाउंसर Amita Trivedi जी ने संवेदनाओं को इतनी बारीकी से बुना है कि हम स्वतः ही किरदारों के साथ जुड़ते जाते हैं ।  ‘थैंक यू यारा’ की कहानियाँ हमारे आसपास की परिस्थितियों को दर्शाती हैं—चाहे वह मध्यमवर्गीय परिवारों का मानसिक संघर्ष हो, रिश्तों में विश्वास की कमी हो या समाज की छोटी-छोटी रूढ़ियों से जूझते लोग हों । ये कहानियाँ सामाजिक यथार्थ को न केवल उजागर करती हैं, बल्कि उन पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करती हैं।

अमिता जी की भाषा सरल, सहज, और प्रवाहमयी है। यह संग्रह आम पाठक से लेकर साहित्य प्रेमी तक सभी को आकर्षित करेगा । संवाद और वर्णन में एक आत्मीयता है, जो कहानियों को और भी प्रभावी बनाते हुए सीधे दिल से जोड़ देती हैं ।

अमिता त्रिवेदी ने कहानियों को इस तरह बुना है कि वे न केवल मनोरंजक हैं, बल्कि विचारोत्तेजक भी हैं। किरदारों का चित्रण इतना जीवंत है कि वे हमारे सामने साकार हो उठते हैं। संग्रह की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी और सच्चाई है—यह न तो अतिशयोक्ति में बहता है और न ही बनावटीपन में। हर कहानी में एक ऐसी सच्चाई है, जो हमें अपने आसपास के लोगों और परिस्थितियों से जोड़ती है।

कुल मिलाकर ‘थैंक यू यारा’ एक ऐसा कहानी संग्रह है, जो न केवल पढ़ने में आनंद देता है, बल्कि जीवन के छोटे-छोटे पलों की गहराई को समझने का अवसर भी प्रदान करता है। यह उन पाठकों के लिए आदर्श है, जो साहित्य में भावनात्मक गहराई और सामाजिक यथार्थ की तलाश करते हैं। अमिता जी का यह पहला ही कहानी संग्रह हमें याद दिलाता है कि हमारे आसपास की साधारण सी दिखने वाली जिंदगियों में भी असाधारण कहानियाँ छिपी हुई हैं बस, उन्हें देखने और शब्दों में उकेरने की दृष्टि चाहिए । किताब अमेजन पर भी उपलब्ध है  

पुस्तक: थैंक यू यारा (कहानी संग्रह)
लेखक: अमिता त्रिवेदी 
पृष्ठ: 94  मूल्य: 200 रुपए 
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर

सोमवार, 22 सितंबर 2025

हिमाचल में फलों का गोविंदा...!!

न न, यह टमाटर नहीं है और न ही तेंदू है। रंग भले ही नारंगी है परन्तु संतरा भी नहीं है। यह है हिमाचल का अमर फल या चीनी सेब…जो स्वाद और सेहत का खजाना है। फिल्मों में जैसे पहले मिथुन चक्रवर्ती और बाद में गोविंदा को गरीबों का अमिताभ बच्चन कहा जाता था इसी तरह इस फल को भी पहले गरीबों का सेब कहा जाता था लेकिन धीरे धीरे इसने अपने स्वाद,कीमत और सेहत से भरपूर गुणों के कारण अलग पहचान कायम कर ली है..और अब यह सेब का विकल्प बन रहा है।

स्थानीय भाषा में इसे 'जापानी फल' या 'काकी' कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Diospyros kaki है और पहली बार 1940 के दशक में शिमला के नारकंडा इलाके में इसका पदार्पण माना जाता है। 

वैसे, अपने जन्मस्थान जापान में इसका मूल नाम काकी है, जिसका अर्थ होता है देवताओं का फल। अंग्रेजी में इसे पर्सिमन (Persimmon) के नाम से जाना जाता है। इजराइल में इसे शैरॉन फ्रूट तो कुछ देशों एबेन फ्रूट कहा जाता है। हिमाचल में इसे लंबे समय तक खराब नहीं होने के कारण अमर फल और सेब से सस्ता और उसका विकल्प होने के कारण चीनी सेब भी कहा जाता है।

दूर से टमाटर की तरह दिखने वाला यह चमकीला नारंगी फल अपने भीतर शहद की मिठास समेटे है। यह अपने स्वाद से हिमाचल के किसानों के लिए न केवल आर्थिक वरदान साबित हो रहा है, बल्कि स्वास्थ्य के खजाने के रूप में भी उभर रहा है। 

देश में हिमाचल प्रदेश को वैली ऑफ फ्रूट्स कहा जाता है क्योंकि अपने पहाड़ों, ठंडी हवाओं और उपजाऊ मिट्टी के कारण यह सदियों से फलों का स्वर्ग है। यहां सेब की लालिमा से लेकर खुबानी की सुनहरी चमक तक हर मौसम में फलों की खुशबू बिखरी रहती है ।

ऐसा माना जाता है हिमाचल में फलों के राजा सेब ने अपनी यात्रा की शुरुआत ब्रिटिश काल में शुरू की थी । मौसम में बदलाव के साथ यहां की फ्रूट बास्केट में कई फल जुड़ते जा रहे हैं। यह सेब पर निर्भरता कम करने और कमाई के नए रास्ते तलाशने की कवायद भी है। शायद, यही कारण है कि जापानी फल अब शिमला, कुल्लू, मंडी, सोलन, लाहौल-स्पीति, किन्नौर और चंबा जिलों तक में भरपूर पैदा हो रहा है । 

आंकड़ों के अनुसार, राज्य में कुल फल उत्पादन 7.53 मिलियन टन तक पहुंच गया है, जिसमें जापानी फल, कीवी और जैकफ्रूट जैसे वैकल्पिक फल भी भरपूर मात्रा में हैं।  जापानी फल की खूबी यह है कि इसे सेब के साथ भी लगाया जा सकता है, जिससे मिश्रित खेती संभव हो जाती है।  सरकार भी इसे बढ़ावा दे रही है ताकि छोटे किसान परिवारों की आय दोगुनी हो सके। हिमाचल में इसकी फ़ुयू और हेचिया जैसी प्रजातियाँ बाजार में लोकप्रिय हैं। 

 जापानी फल स्वाद के साथ साथ स्वास्थ्य का खजाना भी है। इसमें आंखों के लिए विटामिन ए, नींबू से दोगुना विटामिन सी और पाचन के लिए भरपूर फाइबर है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे टैनिन, कैटेचिन और गैलिक एसिड कैंसर, डायबिटीज और हृदय रोगों से लड़ने में मदद करते हैं। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि यह सूजन कम करता है, कोलेस्ट्रॉल घटाता है और हड्डियों को मजबूत बनाता है। 

पारंपरिक चिकित्सा में, इसके पत्तों की चाय पेट दर्द और दस्त ठीक करती है, जबकि फल रक्तचाप नियंत्रित रखता है। डायबिटीज वाले मरीजों के लिए यह आदर्श है, क्योंकि यह ब्लड शुगर स्थिर रखता है। जापानी फल पोटेशियम और फॉस्फोरस का भी एक अच्छा स्रोत है। 

कुल मिलाकर यह किसी 'सुपरफूड' से कम नहीं है। लेकिन ज्यादा खाने से इसमें मौजूद टैनिन के कारण पेट में गांठ बनने का खतरा भी रहता है। 


संक्षेप में कहें तो जापानी फल हिमाचल में एक फल भर नहीं है, बल्कि आशा का प्रतीक बन रहा है। यह न केवल किसानों को सेब की एकतरफा निर्भरता से मुक्त कर रहा है बल्कि पर्यटकों को नई स्वाद यात्रा पर भी ले जाने के साथ साथ स्वास्थ्य का अनमोल उपहार भी दे रहा है। इसलिए अगली बार जब आप हिमाचल की सड़कों पर चहलकदमी कर रहे हों तो प्रकृति की इस नारंगी स्वादिष्ट और सेहतमंद नेमत को नजरअंदाज न करें ।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

ये Gen Z- जेन जी क्या है..ये जेन जी?

जब से नेपाल में आंदोलन और सत्ता में बदलाव की खबरें मीडिया में दौड़ रही हैं तब से ‘जेन जी’ और ‘नेपो किड्स’ जैसे शब्द घर-घर में सुनाई देने लगे हैं। हालांकि नेपो किड्स हमारे देश में नया शब्द नहीं है क्योंकि मनोरंजन जगत और खासतौर पर बॉलीवुड, खेल, व्यवसाय एवं राजनीति जैसे तमाम क्षेत्रों में इसका भरपूर इस्तेमाल होता आ रहा है।  

सामान्य रूप से समझे तो नेपो किड्स  (Nepo Kids) शब्द नेपोटिज्म (Nepotism) से लिया गया है, जिसका सामान्य अर्थ है भाई-भतीजावाद। यह तमगा उन युवाओं के लिए इस्तेमाल होता है जो अपने परिवार के प्रभाव के कारण राजनीति,मनोरंजन, फिल्म, खेल, व्यवसाय जैसे विभिन्न क्षेत्रों में आसानी से अवसर प्राप्त कर लेते हैं। इन पर यह आरोप लगता है कि वे प्रतिभा या मेहनत के बजाय अपने परिवार के नाम पर सफलता हासिल कर रहे हैं। हालांकि कई मामलों में यह बात सही नहीं है क्योंकि नेपो किड्स में कई युवा वाकई प्रतिभाशाली होते हैं और वे अपनी लगन, मेहनत और कौशल से लंबी रेस का घोड़ा साबित होते हैं। 

 जहां तक मौजूदा वक्त के सबसे चर्चित शब्द ‘Gen Z’ या जेनरेशन Z की बात है तो यह शब्द आमतौर पर उन युवाओं के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। जैसे भारतीय संदर्भ में परदादा, दादा, पिता और बेटे के जरिए पीढ़ियों को समझा जाता है उसी तरह पश्चिमी संदर्भ में पीढ़ियों को अलग अलग नाम से वर्गीकृत किया गया है। फिलहाल जेन जी सबसे युवा पीढ़ी है जो डिजिटल युग में पग कर एवं रच बसकर तैयार हुई है । 

यह पीढ़ी इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के साथ बड़ी हुई है इसलिए कुछ लोग इन्हें डिजिटल नेटिव्स भी कहते हैं।  Gen Z को तकनीकी दक्षता, सामाजिक जागरूकता और वैश्विक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता के लिए भी जाना जाता है।  

ऐसा भी नहीं है कि पीढ़ियों का नामकरण कोई पहली बार हो रहा है। दशकों से पश्चिमी समाज में बदलती पीढ़ियों को उनके दौर और तात्कालिक घटनाओं के मुताबिक अलग अलग दिलचस्प नामों से संबोधित किया जाता रहा है। मसलन नामकरण की इस श्रृंखला की सबसे पहली एवं 1883–1900 के बीच जन्मी पीढ़ी को ‘लॉस्ट जेनरेशन’ कहा जाता है । 

यह पीढ़ी प्रथम विश्व युद्ध के समय की थी। इस समूह ने युद्ध और सामाजिक उथल-पुथल का सामना किया।  इसके बाद की पीढ़ी को नाम मिला ‘ग्रेटेस्ट जेनरेशन’ । इसमें 1901–1927 के बीच जन्में लोगों को शामिल किया गया ।  देशभक्ति, कठिन परिश्रम और सामूहिक बलिदान से अपनी पहचान बनाने वाली इस पीढ़ी ने प्रथम विश्व युद्ध का प्रत्यक्ष अनुभव किया था।     

 इसके बाद नंबर आता है ‘साइलेंट जेनरेशन’ का । हालांकि इस नाम का इनके चुप/मौन रहने से कोई मतलब नहीं है बल्कि मौन रहकर परिश्रम करने से है। इस पीढ़ी में 1928–1945 के बीच जन्में लोग शामिल किए गए । इस पीढ़ी ने युद्ध के बाद पुनर्निर्माण का दौर देखा है और अपनी मेहनत से अपना संसार रचा था । 

साइलेंट जनरेशन के बाद आई पीढ़ी के नामकरण की वजह भी बहुत ही दिलचस्प है। इन्हे ‘बेबी बूमर्स’  कहा जाता है और इसमें 1946–1964 के बीच जन्में लोग शामिल हैं। दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जन्म दर में एकाएक हुई वृद्धि के कारण इस पीढ़ी को यह नाम मिला।  

यह पीढ़ी आर्थिक समृद्धि, सामाजिक परिवर्तन और उपभोक्तावाद के लिए भी जानी जाती है।  मौजूदा वक्त में अपनी कलम, लेखन, परिश्रम, विचारों और आविष्कारों से दुनिया को समृद्ध करने वाली और अब अधेड़ हो चली पीढ़ी को ‘जेनरेशन X’ कहा जाता है। इसमें 1965–1980 के बीच जन्में हम जैसे तमाम लोग शामिल हैं। 

हमारी यह पीढ़ी इस मामले में सबसे खास है कि इसने परंपराओं और तकनीकी बदलावों को साथ-साथ जिया है। जेन एक्स ने लैंडलाइन फोन से लेकर पेजर एवं मोबाइल फोन के विकास तक और कैसेट से फ्लॉपी,सीडी, डीवीडी, पेन ड्राइव और अब क्लाउड स्टोरेज तक का लंबा परन्तु तेजी से बदलता सफर तय किया है।   

इसके बाद आती है ‘जेनरेशन Y’ अर्थात् वो लोग जिन्होंने 1981–1996 के बीच जन्म लिया है। हम कह सकते हैं कि इसमें हमारे परिवार के बड़े बच्चे शामिल हैं। यह पीढ़ी डिजिटल क्रांति के शुरुआती दौर में जवान हुई है और तकनीक समझ के साथ इसके अनुभवों से भी सराबोर है।  अब आती है बारी बहुचर्चित ‘जेनरेशन Z’ या जेन जी की। यह हमारी युवा पीढ़ी है क्योंकि इन्होंने 1997–2012 के बीच जन्म लिया है।  मोबाइल, गेमिंग, सोशल मीडिया में डूबती उतराती इस पीढ़ी के सदस्य अधिकतम 25 से 28 साल के युवा हैं और इन्हें पढ़ाई, नौकरी, बढ़िया लाइफ और व्यक्तिगत हितों की सबसे ज्यादा फिक्र है। इसलिए यह पीढ़ी दुनिया भर में धमा चौकड़ी मचाए हुए है।  

 ऐसा नहीं है कि पीढ़ियों का यह वर्गीकरण जेन जी पर आकर रुक गया है बल्कि इनके पीछे पीछे एक नई पीढ़ी तैयार हो गई है जिसे ‘जेनरेशन अल्फा’ नाम मिला है। इसमें 2013 से लेकर मौजूदा साल यानि 2025 तक पैदा हुए बच्चे  शामिल हैं। यह मानव सभ्यता की सबसे नवीनतम पीढ़ी है, जो पूरी तरह से 21वीं सदी में जन्मी है।       

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि पीढ़ियों का यह वर्गीकरण मोटे तौर पर जन्म वर्ष, सामाजिक-आर्थिक घटनाओं, और सांस्कृतिक बदलावों के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक पीढ़ी को उस समय की प्रमुख घटनाओं और मूल्यों के आधार पर परिभाषित किया जाता है और उसी के मुताबिक उनका नामकरण किया जाता है। बस, सोचने वाली बात यह है कि जब जेन जी दुनिया भर में ऐसा जबरदस्त हड़कंप मचाए हुए है तो जनरेशन अल्फा क्या और कितना कमाल नहीं करेगी।

और हमने नलिनी के ‘गुलाब जामुन’ खा ही लिए..!!

हिल क्वीन शिमला में आमद दर्ज कराने के बाद से ही दोस्तों/परिचितों और शुभ चिंतकों ने सुझाव देना शुरू कर दिया था कि शिमला में क्या करना है और क्या नहीं, कहां घूमना है और पता नहीं क्या क्या। खाने पीने को लेकर भी आमतौर पर सुझाव मिलते रहते हैं। सेव और ताजे पहाड़ी फलों का स्वाद लेने के साथ एक सुझाव दो तीन जगह से आया कि  शिमला में नलिनी के गुलाब जामुन जरूर खाना। अब तक तो हम नलिनी को साड़ी के मशहूर ब्रांड के तौर पर जानते थे, लेकिन गुलाब जामुन का ब्रांड..!!


 गुलाब जामुन का ज़िक्र हो और मुंह में पानी न आए,ऐसा संभव ही नहीं है। यह छोटा-सा सुनहरा गोला अपने अंदर स्वाद और नफासत का पूरा रुतबा समेटे है। यह न केवल स्वाद की दुनिया का कोहिनूर है, बल्कि भारतीय पर्वों, घरेलू आयोजनों और शादी ब्याह जैसे आयोजनों का अनिवार्य हिस्सा भी है इसलिए, सोशल मीडिया के इन्फ्लुएंसर्स की मीठे से परहेज करने की तमाम चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए हम नलिनी तक पहुंच ही गए।

 

माना जाता है कि गुलाब जामुन की जड़ें भारतीय उपमहाद्वीप में खोया और चाशनी की परंपरा में पगी और बढ़ी हैं। हालांकि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यह मिठाई मध्यकालीन भारत में फारस से आई थी और मुगल काल में गुलाब जल और केसर के उपयोग ने इसे और लज़ीज़ बना दिया। 


खैर, अपने को इतिहास से ज्यादा इसके स्वाद से सरोकार था इसलिए इतिहास में ज्यादा सिर नहीं खपाया लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि नरम,मुलायम और मुंह में घुल जाने वाला गुलाब जामुन बनाना वाकई एक कला है, जिसमें मीठे से धैर्य और खोया जैसे मुलायम प्यार के बीच संतुलन की जरूरत होती है। इनके बीच सौ फीसद तालमेल से ही बनता है अतुलनीय स्वाद से भरा गुलाब जामुन..एकदम नरम, रसीला और हर टुकड़े में मिठास एवं स्वाद का संसार समेटे हुए ।


स्वाद के ऐसे ही सपने संजोए हम भी पहुंच गए शिमला में मॉल रोड स्थित नलिनी के पास। यदि आप रिज से लिफ्ट की ओर जाएंगे तो आपके बाएं हाथ पर और लिफ्ट से चर्च की ओर आयेंगे तो दाहिने हाथ पर खुशबू बिखेरती यह दुकान मिल जाएगी। वैसे, हमारे यहां गुलाब जामुन को रंग रूप एवं आकार प्रकार के कारण काला जामुन, लाल मोहन, मावा बाटी, बंगाली में पंतुआ, कहीं खीर मोहन तो कहीं रसगुल्ला जैसे कई नामों से जाना जाता है। दरअसल उत्तर भारत में आम बोलचाल में गुलाब जामुन अपने ठंडे और श्वेत वर्णी बिरादर रसगुल्ला के नाम से मशहूर हैं… आखिर है तो यह भी रस का गोला, भले ही सांवला सलोना है।


अब गुलाब जामुन सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। दीवाली हो, राखी हो, जन्मदिन या शादी का भोज, खाने पीने की सूची में गुलाब जामुन का स्थान अडिग है। जब इसे गर्म परोसा जाता है तो यह जीभ पर मिठास बिखेरता हुआ होले से पिघल सा जाता है और ठंडा खाएं तो चाशनी की मिठास तालू पर रच-बस जाती है। आजकल पार्टियों में इनकी जोड़ी वनीला आइसक्रीम के साथ भी खूब जम रही है जो ठंडे और गर्म के सम्मिश्रण से अलग स्वाद रचता है।


नलिनी पर गुलाब जामुन का स्वाद और आकार तो बेजोड़ है ही, मूल्य की भी अलग कहानी है। यदि आप नलिनी के काउंटर पर ही खड़े होकर गुलाब जामुन खाते हैं तो यह 50 रुपए में मिल जाता है लेकिन यदि आप इनके रेस्तरां में बैठकर सुकून से कतरा कतरा इसका स्वाद लेना चाहते हैं तो आपको 80 रुपए चुकाने पड़ते हैं। हालांकि हमें तो काउंटर पर खाना ज्यादा अच्छा लगा क्योंकि आप मॉल रोड की ठंडी बयार के बीच गरमागरम गुलाब जामुन का आनंद ज्यादा बेहतर ढंग से महसूस कर सकते हैं। इस रसीले जादूगर का जादू अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा है बल्कि यह अब वैश्विक मंच पर भी पहचान बना रहा है। अमेरिका से लेकर आस्ट्रेलिया तक और ब्रिटेन से लेकर कनाडा तक यह भारतीय रेस्तरां से लेकर मिठाई की दुकानों तक, लोकप्रियता का नया मुकाम बना रहा है। 


कुल मिलाकर गुलाब जामुन सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि खुशियों का प्रतीक है। शायद, सबसे तेजी से डोपामिन भी यही बढ़ाता होगा। इसका हर टुकड़ा आपको प्यार भरे स्वाद, मिठास की परंपरा और उत्सव की याद दिलाता है। चाहे आप इसे नलिनी जैसी आपके शहर की किसी भी मशहूर मिठाई की दुकान से खरीदें या घर पर बनाएं, इसका स्वाद हमेशा मन को मिठास से भर देता है। 


तो अगली बार जब आप कहीं भी गुलाब जामुन के स्वाद का आनंद लें और वह आपको अच्छा लगे तो इसके पीछे की कहानी और कारीगरी को भी जानने का प्रयास करिए ताकि गुलाब जामुन की मिठास की स्मृतियां जीभ भर के लिए नहीं, दिल और दिमाग के लिए भी अमिट हो जाएं ।


सोमवार, 8 सितंबर 2025

देवभूमि में क्यों बेखौफ नाच रहीं हैं डायन…!!

देवभूमि में डायनों का क्या काम? तो फिर हिमाचल में इन दिनों डायन या चुड़ैल क्यों नाच रही हैं ? और ऐसा क्या है कि आम लोग भी उनका रंग रूप धरकर नाचने गाने में मशगूल है? क्यों महिलाएं घर में बैठकर कभी डायन की नाक तो कभी हाथ पैर काट रही है ? और डायनों के इतने खुले प्रदर्शन के बाद भी देवता क्यों चुप है? आप भी यह सब सवाल पढ़कर चौंक रहे होंगे और अचरज में पड़ना लाजमी भी है क्योंकि देवभूमि हिमाचल प्रदेश में जहां पग पग पर देवताओं का वास है ऐसे में किसी भी बुरी आत्मा की मौजूदगी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। लेकिन भाद्रपद मास की अमावस्या पर करीब दो दिन तक राज्य के कई इलाकों में कथित तौर पर डायनों का बोलबाला रहता है।कहीं यह स्थिति जन्माष्टमी के हफ्ते भर बाद बनती है तो कहीं रक्षाबंधन के पखवाड़े भर बाद।  

दरअसल,हिमाचल प्रदेश की धरती अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ साथ समृद्ध लोक संस्कृति के लिए भी जानी जाती है। यहां के पर्व, मेलों और परंपराओं में पहाड़ के लोगों की आस्था, डर, विश्वास और सामूहिक जीवन की झलक मिलती है। इन्हीं लोकपर्वों में से एक है डगैली पर्व, जो इन दिनों मनाया जाता है। इसे डगयाली, दगाली, अघोरा चतुर्दर्शी, कुशाग्रहणी अमावस्या और डायनों का पर्व जैसे कई अन्य नामों से जाना जाता है। 

हम इसे हिमाचल का हैलोवीन भी कह सकते हैं। मेक्सिको का डिया डे लॉस मुर्टोस भी कुछ इसी तरह का पर्व है।  हम यह पर्व सीधे-सीधे उन कथाओं और मान्यताओं से जुड़ा है जिनमें डायन का जिक्र आता है। लोकमान्यता के अनुसार डायन बुरी शक्तियों का प्रतीक होती है, और डगैली पर्व उसी नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति पाने का सामूहिक प्रयास है। 

 डगैली पर्व की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसका कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन स्थानीय लोककथाओं के अनुसार यह पर्व सदियों पुराना है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में लोग बीमारी, अकाल या किसी अनहोनी को डायन की करतूत मानते थे। इससे बचाव के लिए गांव के लोग मिलकर रात को अनुष्ठान करते और ढोल-नगाड़ों के साथ ऐसा माहौल बनाते कि बुरी आत्माएं डरकर भाग जाएं। 

धीरे-धीरे यह प्रथा लोकनृत्य और उत्सव का रूप लेने लगी, जिसे आज डगैली पर्व कहा जाता है।  जानकारों के अनुसार डगैली शब्द का संबंध डग यानी चलने या घूमने से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि इस पर्व की रात डायनें गांव में डग भरती हैं और लोग सामूहिक नृत्य-गीतों के जरिए उन्हें भगाते हैं। 

डगैली पर्व में डायन का रूप धारण करने के लिए चेहरे पर कालिख लगाई जाती है और डरावने मुखौटे पहने जाते हैं। कांगड़ा और मंडी क्षेत्र में इसे मुखौटों के साथ तो कुल्लू और चंबा में यह लोकगीत और घर-घर टोली जाने की परंपरा के साथ मनाया जाता है। 

यह पर्व शिमला, सिरमौर और सोलन जैसे शहरी जिलों में भी मनाया जाता है। लद्दाख़, नेपाल और सिक्किम में भी इसतरह के आयोजन होते हैं।   आजकल कुछ जगहों पर प्रतीकात्मक रूप से डायन का पुतला भी जलाया जाता है। 

डगैली पर्व में गाए जाने वाले गीतों में अक्सर डायन के स्वभाव, उसकी शरारतों और उससे मुक्ति पाने के उपायों का जिक्र होता है। यह कुछ कुछ मैदानी इलाकों में दीपावली के बाद भाईदूज के दिन बुराई के प्रतीक चुगलखोर की पिटाई जैसा पर्व है। यहां भी डायन या बुराई से बचने के लिए दरवाजों पर कांटे लगाए जाते हैं,हाथ में मंत्र शक्ति वाले कलावे या रक्षा सूत्र बांधे जाते हैं।  

डगैली पर्व का असली महत्व इसकी सामूहिकता है। पूरा गांव एक साथ मिलकर नृत्य करता है, गीत गाता है और भोज का आनंद उठाता है। इससे लोगों में आपसी भाईचारा और सहयोग की भावना मजबूत होती है। वहीं,धार्मिक दृष्टि से देखें तो डगैली पर्व गांव को बुरी शक्तियों से बचाने का सामूहिक प्रयास है। 

सौम्य सूरज का मतवाला अंदाज़

लगातार कई दिन की घनघोर और तबाही भरी बारिश के बाद शिमला में आज शाम को सूरज ने बादलों का सीना चीरकर अपनी आमद दर्ज करा ही दी। 

जब देशभर में सूरज ढल रहा हो तब पहाड़ों की रानी के माथे पर सूरज निकलना प्रकृति का जादू ही है।  बादलों और बूंदों में जकड़े पहाड़ भी सूरज की शह पाकर जकड़न को तोड़कर चमक उठे। 

सूरज की किरणें अपनी सुनहरी तूलिका से पाइन और देवदार के पेड़ों के साथ साथ लाल हरी छतों पर हल्के-हल्के रंग बिखेर रहीं हैं। गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू हवा में तैर रही है, और कोहरे की पतली चादर धीरे-धीरे हट रही है, मानो सूरज के स्वागत में रास्ता दे रही हो।

 कई दिन बाद सूरज भी पूरी सौम्यता से बादल और बूंदों के रथ पर सवार मतवाला होकर अपने प्रिय पहाड़ों से मिलने आ गया है।

पेड़ों की पत्तियों पर कब्जा जमाए बूंदों की लड़ियां भी चमकने लगी हैं जैसे सूरज के स्वागत में वंदनवार सज गए हो । रिज (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर खड़े होकर देखो, तो लगता है सूरज ने बादलों के साथ लुकाछिपी का खेल खत्म कर दिया है। 

कल तक बारिश की मोटी और ढीठ बूंदे में छिपी दूर हिमालय की चोटियाँ अब सुनहरे और गुलाबी रंग में नहाई दिखती हैं। सूरज के करीब कुछ चोटियों ने तो स्वर्ण मुकुट धारण कर लिया है जैसे अब सूरज के साथ उनकी सत्ता लौट आई है। 

चाय की दुकानों से उठती अदरक इलायची की भाप के बीच चुस्कियां लेते हुए स्थानीय लोग मुस्कुराते हुए कहते हैं- "सूरज निकला, अब शिमला की रौनक लौट आएगी!"

यह नजारा सिर्फ़ आँखों का सुख नहीं, बल्कि आत्मा को ताज़गी देने वाला अनुभव है—जैसे शिमला ने बारिश की थकान उतारकर सूरज को गर्मजोशी से गले लगा लिया हो।


सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...