शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

आम आदमी का दर्द अभिव्यक्त करते गाने

कभी कभी कुछ गाने ऐसे बन जाते हैं जो उस दौर का प्रतिनिधित्व करने लग जाते हैं और आम जनता की आवाज़ बनकर सत्ता प्रतिष्ठान की मुखालफत का माध्यम बनकर लोगों के दिल-ओ-दिमाग में खलबली तक पैदा कर देते हैं.जल्द ही रिलीज होने वाली फिल्म ‘पीपली लाइव’ का यह गीत भी महंगाई के खिलाफ राष्ट्रीय गीत बन गया है.इस गाने के बोल-“सखी सैंया तो खूब ही कमात है,महंगाई डायन खाय जात है.”ने भी लोगों को झकझोर दिया है.आलम यह है कि इस गाने को कांग्रेस विरोध की धुरी बनाने के लिए भाजपा ने बकायदा गीत के कापीराईट हासिल करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं. यदि आप भूले न हो तो चंद साल पहले भी एक गाना जनता ही नहीं सरकार की उपलब्धियों की आवाज़ बन गया था.यह गाना था फिल्म ‘स्लमडोग मिलिनियर’ में ऑस्कर विजेता संगीतकार ए आर रहमान का स्वर और संगीतबद्ध किया गया “जय हो”.तब कांग्रेस ने बकायदा इस गीत के अधिकार लेकर इसे अपने चुनाव प्रचार का मुख्य हथियार बना लिया था.इस गीत ने आम जनता पर भी जादू किया और कांग्रेस की सत्ता में वापसी हो गई. फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ के गीत “आल इज वैल” ने स्कूल-कालेज के छात्रों को स्वर दे दिया था.
ऐसा नहीं है कि आज के दौर में गीतों की लोकप्रियता यह मुकाम हासिल कर रही है.इसके पहले भी फिल्म ‘उपकार' का मशहूर गीत “मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती” तत्कालीन दौर में किसानों के दिल की धड़कन बन गया था.यह वह समय था जब देश में जवाहरलाल नेहरु और लालबहादुर शास्त्री के नाम ईश्वर की तरह लिए जाते थे.यह हरित क्रांति का दौर था एवं हमारे देश की मिटटी वाकई में सोना उगलती थी. इसी फिल्म'पूरव और पश्चिम' का एक  गाना “भारत का रहने वाला हूँ,भारत की बात सुनाता हूँ” ने भी देश को पश्चिमी सभ्यता से हटकर पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी.इसीतरह जब देश नवनिर्माण के दौर से गुजर रहा था और आम लोग कंधे-से कंधा मिलाकर देश को बनाने में जुटे थे तब फिल्म ‘नया दौर’ का गीत “साथी हाथ बढ़ाना ,एक अकेला थक जाए तो मिलकर बोझ उठाना” देश की आवाज़ बन गया था.
            इसके अलावा फिल्म नाम के गीत “चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है”, फिल्म परदेश के गीत “ये मेरा इंडिया...”,लताजी की आवाज़ में अमर गीत “जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी” आज भी हमारी आँखों में पानी ला देते है. यदि आपकी स्मृति में भी ऐसे ही कुछ प्रतिनिधित्व गीत हैं तो उन्हें इस लड़ी में पिरोने में सहयोग कीजिये क्योंकि एक-एक मोती से ही तो सुरों की यह माला पूरी होगी और हम मिलजुलकर इस प्रतिनिधि गीतों को एक बार फिर याद कर पाएंगे....

सोमवार, 12 जुलाई 2010

रसोई और बिस्तर के अलावा भी है औरत

स्त्री पर पुरातन काल से कवियों की कूची चलती रही है.हर कवि/कवियत्री ने स्त्री को अपनी-अपनी आँखों से देखा है और बदलते काल और दौर के साथ स्त्रियों को लेकर अभिव्यक्तियाँ बदलती रही हैं.शायद इसलिए हमें विभिन्न समयों में स्त्री को विविध कोणों से समझने का अवसर मिलता है.पिछले दिनों कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति,बंगलुरु के तत्वावधान में 'समकालीन महिला लेखन' पर एक संगोष्ठी का आयोजन हुआ.इसमें कई जानी-मानी वक्ताओं ने अपने विषय केन्द्रित संबोधनों में स्त्रियों से जुडी अनेक कविताओं/क्षणिकाओं का उल्लेख किया. मैंने कुछ चुनिन्दा कविताओं को आपके लिए बटोरने का प्रयास किया है.जो बदलती स्त्री से रूबरू कराती हैं. खास बात यह है कि ये महिलाएं "अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी "वाली परिपाटी से हटकर सोचती हैं.

प्रज्ञा रावत कहती हैं-

जितना सताओगे उतना उठुगीं

जितना दबाओगे उतना उगुगीं

जितना बाँधोगे उतना बहूंगी

जितना बंद करोगे उतना गाऊँगी

जितना अपमान करोगे उतनी निडर हो जाउंगी

जितना सम्मान करोगे उतनी निखर जाउंगी

वहीँ निर्मला पुतुल पूछती हैं-

क्या तुम जानते हो

एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण ?

बता सकते हो तुम

एक स्त्री को स्त्री द्रष्टि से देखते

उसके स्त्रीत्व की परिभाषा ?

अगर नहीं

तो फिर जानते क्या हो तुम

रसोई और बिस्तर के गणित से परे

एक स्त्री के बारे में....?

उधर सविता सिंह ज़माने पर राय रखती हैं-

यह बहुत चालाक सभ्यता है

यहाँ चिड़ियाँ को दाने डाले जाते हैं

यहाँ बलात्कृत स्त्री

अदालत में पुन: एक बार कपडे उतारती है

इस सभ्यता के पास

स्त्री को कोख में ही मार देने की पूरी गारंटी है...

एक समकालीन कवियत्री का कहना है-

ओढ़ता,बिछाता,और भोगता

शरीर को जीता पुरुष

शरीर के अतिरिक्त

कुछ भी नहीं होता

उसका प्यार-दुलार,मनुहार

सभी कुछ शरीर की परिधि से

बंधा होता है...

लेकिन औरत, शरीर के बाहर भी

बहुत कुछ होती है...

वहीँ अमिता शर्मा कहती हैं-

सही है तुम्हारा लौटना

सही है मेरा लौटना

और सबसे सही है

हमारा अलग-अलग लौटना...

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

कब बदलेगा ‘पाल’ और ‘हीरामन तोते’ का फर्क


एक बार स्वामी विवेकानंद को नाराज़ करने के लिए एक विदेशी ने पूछा कि यूरोप के लोग दूध की तरह सफ़ेद हैं तो अफ्रीका के लोग कोयले की तरह काले,फिर इंडिया के लोग क्यों आधे-अधूरे रह गए हैं?इसपर विवेकानंद ने उससे पूछा कि तुमने कभी रोटी को बनते देखा है?जब रोटी सफ़ेद रह जाती है तो उसे कच्चा माना जाता है और हम उसे नहीं खाते.इसीतरह जब रोटी जलकर काली हो जाती है तो उसे भी नहीं खाया जाता लेकिन जो रोटी ठीक ठाक चिट लगी होती है तो उसको सभी चाव के साथ खाते हैं.दरअसल हम भारतीय लोग इस बीच वाली रोटी की तरह हैं बिलकुल संतुलित.....अब दुःख की बात यह है कि स्वामी विवेकानंद जैसे तमाम विद्वान चाहकर भी विदेशियों के दिमाग में हम भारतियों को लेकर बने भेदभाव को नहीं मिटा पाए.यही कारण है कि यदि यूरोप का एक ऑक्टोपस विश्व कप फुटबाल की भविष्वाणी करता है तो दुनिया भर का मीडिया और सेलिब्रिटी उसके मुरीद हो जाते हैं जबकि यही काम हमारा हीरामन तोता सदियों से कर रहा है तो उसे पोंगा-पंडित,रुढिवादिता और पोंगापंथी जैसे तमाम विशेषणों से नवाज़ा जाता है.यहाँ तक कि आज भी वे भारत को तांत्रिकों ,बाबा-बैरागियों और गंवारों का देश मानते हैं.क्या फुटबाल जैसा सूझ-बुझ और परिश्रम से भरे खेल को एक ऑक्टोपस के सहारे जीता जा सकता है?यदि नहीं तो फिर जर्मनी के लोग उस ऑक्टोपस को कच्चा खा जाने कि बात क्यों कर रहे हैं जिसने जर्मनी की हार की भविष्यवाणी कर दी थी?वहीँ स्पेन के लोग इसे अपना भगवान तक मानने लगे हैं.
विडम्बना तो यह है कि हमारे हीरामन की भविष्यवाणियों पर नाक –मुंह सिकोड़ने वाली देशी हस्तियाँ भी ऑक्टोपस के गुणगान कर रही हैं.महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर फरहा खान,अभिषेक,लारा दत्ता मंदिरा बेदी ने इसकी तारीफ के कशीदे काढ दिए हैं.तो क्या हम आज भी गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं? ....यदि ऐसा नहीं होता तो आज भी आकर्षक हीरामन तोते और आठ टांगों वाले बदसूरत ऑक्टोपस के बीच यह फर्क नहीं नज़र आता.
अनुरोध:मेरी बात का कतई यह मतलब न निकला जाए कि मैं तोते,बिल्ली या ऑक्टोपस के ज्योतिष का समर्थक हूँ.मेरा मानना है कि पशु-पक्षियों का इन फालतू के कामों में इस्तेमाल होना ही नहीं चाहिए.

बुधवार, 7 जुलाई 2010

धोनी के घोड़े से एक्सक्लूसिव बातचीत

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के विवाह ने मीडिया जगत में हडकंप मचा दिया है.पत्रकारों और बाईट वीरों(इलेक्ट्रानिक मीडिया) को लग रहा है कि इतना बड़ा स्कूप उनसे छूट कैसे गया?टेस्ट से लेकर वनडे और २०-२० तक में धोनी का धमाल तो समझ में आता है पर शादी में भी उनका खेल दिखाना मीडिया को हजम नहीं हो रहा है.न्यूज़ चैनलों में होड़ मची है कि कौन धोनी के बारे में अन्दर तक की खबरें निकाल पाता है.इसलिए कोई अभिनेत्री विपाशा बासु के घर शादी का जश्न मनवा रहा है तो कोई नृत्य निर्देशक फरहा खान को शादी में भेज रहा है? ये बिचारे रोज इस बात से इन्कार कर रहे है. ऐसे ही एक बाईट वीर 'एक्सक्लूसिव' के चक्कर में उस घोड़े तक पहुँच गए जिसपर बैठकर धोनी ने विवाह रचाया था(हालाँकि कई पत्रकार घोड़े को नकली बता रहे हैं उनका कहना है कि असली घोडा तो विवाह के बाद से घोडा बिरादरी को छोड़कर गायब है.) बाईटवीर ने घोड़े वाले की बजाय सीधे घोड़े से बात कर उसकी पहली प्रतिक्रिया अपने चैनल पर चलाने और उसकी फीलिंग जानने का फैसला किया.पेश हैं बाईट वीर और घोड़े के बीच सवाल-जवाब:
बाईट वीर:कैसा लग रहा है धोनी को अपने ऊपर बिठाकर?
घोडा महज सर हिला देता है...
बाईट वीर उत्साह से चिल्लाकर-देखिये घोडा कितना खुश है ...हम अपने दर्शकों को बताना चाहेंगे कि घोड़े की एक्सक्लूसिव तस्वीरें और उसकी प्रतिक्रिया केवल आप हमारे चैनल पर ही देख पा रहे हैं.
बाईट वीर:धोनी का वजन कितना था?भारी तो नहीं लगा?
घोड़े ने फिर सर हिलाया...
बाईट वीर:घोड़े के चेहरे के भाव साफ़ बता रहे हैं कि धोनी उसे भारी लगे फिर भी वह उन्हें बिठकर खुश है.आखिर ये मौका कितने घोड़ों के जीवन में आता है?
बाईट वीर:बस आखिरी सवाल! धोनी ने आपको कहाँ से पकड़ा था?
घोडा सर झुका लगा लेता है...
बाईट वीर: अच्छा सर से पकड़ा था?मैं अपने कैमरा मेन से अनुरोध करूँगा कि वह दर्शकों को घोड़े की गर्दन और सर करीब से दिखाए...देखिये सिर्फ हमारे चैनल पर कि धोनी के हाथ यहाँ थे.अभी भी उस दिन के निशान साफ़ नज़र आ रहे हैं.
बाईट वीर: अच्छा साक्षी रावत उस दिन कैसी लग रही थी? अच्छा ये बताइए आपको साक्षी कैसी लगी? उस दिन उनका मेकअप कैसा था?
घोडा फिर सर हिलाता है....
बाईट वीर:देखिये धोनी ने घोड़े तक को कुछ भी बताने से रोक रखा है इसलिए वो साक्षी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता. फिर भी हमसे इस एक्सक्लूसिव बातचीत के लिए शुक्रिया...
इसके पहले कि बाईट वीर ऐसे ही किसी अन्य को पकड़कर फिर कोई ताज़ा जानकारी देता हमारे घर कि लाईट चली गयी और पूरे परिवार ने राहत की साँस ली....

शनिवार, 3 जुलाई 2010

हमारी जान लेने के नए-नए तरीके -भाग दो

कल मैंने इसी विषय पर एक पोस्ट डाला था,लेकिन हमारे मिलावटी भाइयों की धरपकड़ और हमारे स्वास्थ्य की रक्षा के लिए काम कर रहे स्वयंसेवी संगठनों की सक्रियता के कारण मैं अपनी ही पोस्ट का भाग-दो लिखने के लिए मज़बूर हो गया. मूल उद्देश्य तो हमेशा की तरह अपने ब्लॉगर साथियों को समाज में मौजूद ख़तरों से रूबरू करना है. वैसे देश में इन दिनों 'सिक्वल' बनाने का फैशन चल रहा है. 'गोलमाल' से लेकर 'डोन' तक के दूसरे और तीसरे भाग बन चुके हैं तो फिर ब्लॉग का दूसरा भाग लिखने में क्या बुराई है. खैर अब मुद्दे की बात-दरअसल कल अपना पोस्ट लिखने के बाद जब टीवी पर न्यूज़ चैनल देखे तो पता चला कि पोस्ट में कई ताज़ा जानकारियां डालने से चूक गया इसलिए उस कमी को भाग-दो के जरिये दूर कर रहा हूँ. किसी भी सूरत में पैसा कमाने की भूख ने आदमी को इतना अँधा बना दिया है कि वह यह भी भूल गया है कि जो गड्ढा वह दूसरों के लिए खोद रहा है उसमें उसके अपने भी गिर सकते हैं! दिल्ली में पकड़ा गया नकली कोल्ड ड्रिंक्स बनाने का कारखाना हो या रासायनिक मिलावट के साथ बन रहे सस्ते जेवर,क्या इन्हें बनाने वालों के अपने लोग/परिजन/पत्नी/माँ/बहन/बच्चे नहीं पी सकते या नहीं पहन सकते? इस कारखाने में कई नामी शीतल पेय बनाने वाली कम्पनियों के नकली उत्पाद बनते थे,जिन्हें हम या हमारा परिवार इंडिया गेट पर धड़ल्ले से पीता है जबकि इनसे किडनी को नुकसान पहुँचता है,दांत में पायरिया, हड्डियाँ कमज़ोर होना,मोटापा बढ़ना और ब्लड सेल ख़त्म होने का खतरा होता है. इनमें मिलाये जा रहे गंदे पानी से पेट की बीमारियाँ हो सकती हैं.
इसीतरह माँ-बहनों की सुन्दरता में चार चाँद लगाने वाले गहने उन्हें गंभीर रूप से बीमार बना सकते हैं. "टॉक्सिक लिंक" नामक एक स्वयंसेवी संगठन के मुताबिक देश में बिकने वाली कृत्रिम ज्वेलरी में लेड जैसा घातक रसायन मिला होता है. कई आभूषणों में तो इसकी मात्रा मानक दर से हज़ार गुना तक ज्यादा पाई गई है. यदि इस ज्वेलरी को ज़रा सी देर भी मुंह में डाल लिया गया तो समझो आपकी शामत आ गई, जबकि हमारे घरों में जेवर मुंह में डालना सामान्य सी बात है.लेड इतना खतरनाक है कि दुनिया भर में इसके इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध है.खास बात यह है कि ये आभूषण दिल्ली के मशहूर बाज़ारों से लेकर ही यह जाँच की गई थी.लेड का इस्तेमाल पागल तक बना सकता है. इसके अलावा याददाश्त कम होना,पेट की बीमारियाँ,त्वचा में संक्रमण तो सामान्य बात है.इसलिए अगली बार जब भी बाज़ार जाएँ तो यह ज़रूर सुनिश्चित कर ले कि जो कोल्ड ड्रिंक्स पी रहे हैं वह नकली और सौन्दर्य बढ़ाने वाले जेवर घातक तो नहीं हैं?

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

हमारी जान लेने के नए-नए तरीके...

आप भले ही सुबह पांच बजे से उठकर पार्क के कई चक्कर लगते हों या फिर बाबा रामदेव के कहने पर सुबह से शाम तक कपालभाती और अनुलोम-विलोम करते हुए बिताते हों या फिर किसी जिम में जाकर घंटों पसीना बहाते हों लेकिन इन तमाम कोशिशों का आपको उतना फायदा नहीं मिल पायेगा जितना कि आप मानकर चल रहे हैं. मेरे कहने का कतई यह मतलब मत निकालिए कि बाबा रामदेव के योग में या आपके जिम में कोई कमी है और न ही आपका यह मेहनत करना बुरा है बल्कि यह कह सकते हैं कि योग,कसरत,सैर और ऐसे सभी प्रयासों से आप अपने आप को कुछ समय तक स्वस्थ और जिंदा रख सकते हैं क्योंकि बाज़ार में इन दिनों चल रहे कारनामों से तो यही लगता है कि हमारी जान लेने के नए-नए तरीके तलाशे जा रहे हैं. अभी आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा होगा परन्तु जैसे-जैसे आप आगे पढ़ते जायेंगे आपका इस बात पर विश्वास बढ़ता जायेगा कि हमारी जान कितनी फालतू हो गई है और मुनाफ़ा कमाना कितना ज़रुरी..?
हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि टमाटर सूप के नाम पर लोगों को ज़हर दिया जा रहा है। क़न्ज्यूमर एजूकेशन एंड रिसर्च सोसायटी ने हाल ही में छह नामी ब्रांड वाले टोमेटो सूप के 11 नमूनों की जाँच की और पाया कि एक भी ब्रांड में टमाटर जैसी कोई प्राकृतिक चीज नहीं है। जिस नमूने में सबसे अधिक टमाटर की मात्रा पाई गई, उसमें भी महज 10 फीसद टमाटर था। शेष रासायनिक मिलावट थी। अध्ययन में पाया गया कि कंपनियों ने टमाटर के स्थान पर सोडियम और शहद का इस्तेमाल किया है। इसके अलावा सूप को टमाटर की तरह लाल रंग देने के लिए लिकोपेन मिलाया जा रहा है। आप में से अधिकतर लोग जानते होंगे कि लिकोपेन एक एंटीऑक्सिडेंट है। इस अध्ययन से जुड़े लोगों के मुताबिक दिन भर में सात से आठ मिलीग्राम लिकोपेन का सेवन तक घातक हो सकता है।वहीँ ब्रिटेन की यूके फ़ूड स्टेंडर्ड एजेंसी के अनुसार किसी भी पेय पदार्थ में प्रति 100 ग्राम सोडियम की मात्रा 300 से 600 मिलीग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। लेकिन भारत में धड़ल्ले से बेचे जा रहे इन टमाटर सूप में प्रति 100 ग्राम में निर्धारित मात्र से कई गुना ज्यादा तक सोडियम पाया गया है। सोचिये जिस सूप को आप अपनी और अपने बच्चों की सेहत के लिए फायदेमंद मानकर पीते-पिलाते हैं वह कितना खतरनाक हो सकता है। बात सूप की नहीं, बल्कि विश्वास की है क्योंकि किसी भी कंपनी ने यह बताने कि जहमत नहीं उठाई कि वह टमाटर के नाम पर उसका रंग भर दे रही है और उसका सेहत से कई लेना-देना नहीं है? क्या भारत के अलावा किसी यूरोपियन देश में कोई कंपनी खुलेआम इसतरह लोगों की सेहत के साथ खेल सकती है?हमारे तो आम और यहाँ तक की कपड़ों तक को वहाँ बेचने से रोक दिया जाता है किसी अद्रश्य कीटाणु के नाम पर. खैर दूसरों को कोसने से क्या फायदा! हमारी तो रग-रग में मिलावट घुस गई है इसलिए ये सूप हमारा क्या बिगाड़ लेगा?...और सूप ही क्या अपने देश में तो घी चर्बी से,दूध यूरिया जैसे रसायनों से,पनीर सिंथेटिक सामग्री से,घर-घर में लोकप्रिय चाय लाल रंग से बन रही है और धड़ल्ले से बिक रही है. यही नहीं जानवरों का दूध बढ़ाने के काम आने वाला ओक्सिटोसिन से लौकी जैसी सेहतमंद सब्ज़ी का आकर बढाया जा रहा है. स्वास्थ्य के लिए जरुरी फल पकाने के लिए खतरनाक रसायन इस्तेमाल हो रहे हैं.अदरक और सेब को चमकाने के लिए एसिड तक का खुलेआम उपयोग आम बात है. मसालों में घोड़े की लीद,गेरू,मिट्टी और सस्ते रंग मिल रहे हैं.जब हम इन सब को सालों से खाते हुए भी सेहतमंद हैं तो फिर इस सूप की क्या औकात...?

सोमवार, 28 जून 2010

क्या अमीर दाल-रोटी नहीं खाते..?

एक पुरानी नैतिक कथा है-एक राजा धन का बहुत लालची था(हालाकि अब यह कोई असामान्य बात नहीं है).उसका खजाना सम्पदा से भरा था,फिर भी वह और धन इकट्ठा करना चाहता था.उसने जमकर तपस्या भी की.तपस्या से खुश होकर भगवान प्रकट हुए और उन्होंने पूछा -बोलो क्या वरदान चाहिए? राजा ने कहा -मैं जिस भी चीज़ को हाथ से स्पर्श करूँ वह सोने में बदल जाये. भगवान ने कहा-तथास्तु . बस फिर क्या था राजा की मौज हो गयी. उसने हाथ लगाने मात्र से अपना महल-पलंग,पेड़ -पौधे सभी सोने के बना लिए. मुश्किल तब शुरू हुई जब राजा भोजन करने बैठा. भोजन की थाली में हाथ लगाते ही थाली के साथ-साथ व्यंजन भी सोने के बन गए! पानी का गिलास उठाया तो वह भी सोने का हो गया. राजा घबराकर रानी के पास पहुंचा और उसे छुआ तो रानी भी सोने की हो गयी. इसीतरह राजकुमार को भूलवश गोद में उठा लिया तो वह भी सोने में बदल गया. अब राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने पश्चाताप में स्वयं को ही हाथ लगाकर सोने की मूर्ति में बदल लिया. कहानी का सार यह है कि लालच हमेशा ही घातक होता है और संतोषी व्यक्ति सदैव सुखी रहता है.
लेकिन हाल ही में दो अलग-अलग अध्ययन सामने आये हैं जो "संतोषी सदा सुखी" की चिरकालीन भावना को गलत ठहराते से लगते हैं.एक अध्ययन में बताया गया है कि संपन्न व्यक्ति दाल-रोटी जैसा मूलभूत भोजन नहीं करते इसलिए यदि देश में महंगाई को कम करना है तो सम्पन्नता बढ़ानी होगी क्योंकि जैसे-जैसे अमीरी बढ़ेगी लोग दाल-रोटी-सब्जी खाना कम करते जायेंगे और जब इनकी मांग घट जाएगी तो इनकी कीमतें भी अपने आप कम हो जाएँगी! इस अध्ययन के मुताबिक देश की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार जितनी तेज़ होगी अनाज की खपत उतनी ही कम होगी। सुनने में यह अटपटा लगता है लेकिन रिपोर्ट कहती है कि लोगों की मासिक आमदनी जितनी ज्यादा होगी अर्थात उनकी जेब में जितना ज्यादा पैसा होगा वे उतना ही पारंपरिक दाल -रोटी के बजाए फल, मांस जैसे अधिक प्रोटीन वाले दूसरे व्यंजन खाएंगे और उससे खाद्यान्न मांग घटेगी। नेशनल काउंसिल आफ एप्लायड इकोनामिक रिसर्च (एनसीएईआर) के इस शोध मे कहा गया है, आर्थिक वृद्धि दर यदि नौ फीसद सालाना रहती है तो खाद्यान की सकल मांग जो कि 2008-09 में 20.7 करोड़ टन पर थी 2012 तक 21.6 करोड़ टन और 2020 तक 24.1 करोड़ टन तक होगी। यदि आर्थिक वृद्धि 12 फीसद तक पहुंच जाती है तो अनाज की खपत 2020 तक कम होकर 23 करोड़ टन से भी कम रह जाएगी। अगर आर्थिक वृद्धि घटकर 6 फीसद रह जाती है तो 2012 तक खाद्यान्न मांग बढ़कर 22 करोड़ टन और 2020 तक 25 करोड़ टन हो जाएगी। मूल बात यह है कि खाद्यान्न की मांग-आपूर्ति के बीच संतुलन अनुमान से संबंधित इस रिपोर्ट को कृषि मंत्रालय के उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग ने तैयार करवाया है।
दूसरी रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में करोड़पतियों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. इस अध्ययन के मुताबिक अब देश में सवा लाख से ज्यादा करोड़पति हो गए हैं. यह बात अलग है कि संपन्न लोगों की संख्या बढ़ने के बाद भी महंगाई तो जस की तस बनी हुई है-उल्टा दाम घटने की बजाय बढ़ने की ही ख़बरें ज्यादा आ रही हैं. रही दाल-रोटी खाने की बात तो अभी तक मैंने तो अमीरों मसलन अंबानी,टाटा,मित्तल या फिर फ़िल्मी दुनिया के बड़े सितारों (जिनकी फीस ही प्रति फिल्म करोड़ों में है)जैसे शाहरुख़ खान,आमिर खान,अमिताभ बच्चन,एश्वर्या राय,काजोल इत्यादि के जितने भी साक्षात्कार(interview)पढ़े हैं उनमें इन सभी ने अपनी दैनिक खुराक में दाल-रोटी का जिक्र अवश्य किया है.फ़िल्मी दुनिया में सबसे कमनीय काया की मालकिन शिल्पा शेट्टी भी भोजन में दाल-रोटी के महत्त्व को खुलकर स्वीकार करती हैं अपनी आय बढ़ाना तो अच्छी बात है लेकिन यह बात कहाँ से आ गयी कि अमीर लोग दाल-रोटी नहीं खाते या सम्पन्नता बढ़ने से दाल-रोटी की मांग घट जाएगी? यहाँ तक कि डॉक्टर भी अपने अमीर-गरीब मरीजों को दाल-रोटी,दलिया या खिचड़ी खाने की सलाह देते हैं.इस तरह के सर्वे की मंशा कहीं आम लोगों को उनके पारंपरिक भोजन से दूर करने की तो नहीं है? या यह महंगाई घटाने का कोई नया नुस्खा है? आप क्या सोचते हैं..?

सोमवार, 21 जून 2010

बच्चे ही रहें बाप के 'बाप' तो न बने..

शुरुआत हमेशा की तरह किसी पुरानी कहानी से:एक किसान का संपन्न और खुशहाल परिवार था.चार बेटे थे ,पिता के रहते उन्हें धन-दौलत और घर परिवार की कोई फ़िक्र नहीं थी. जब किसान बूढ़ा और बीमार हुआ तो उसने बेटों को बुलाकर कहा कि अब सारी ज़िम्मेदारी तुम लोग संभालो और मुझे आराम करने दो. मरते वक्त किसान ने बेटों को दो सलाह दी कि -खेतों में छाँव -छाँव जाना और छाँव-छाँव ही लौटना.इसीतरह अपने खेत सोना उगलते हैं इसलिए उनका ध्यान रखना. बेटों ने पिता की राय गांठ बांध ली. उन्होंने खेत तक छाँव में जाने के लिए घर से लेकर खेत तक पूरे रास्ते में शामियाना लगवा दिया. वहीँ खेतों में चारों और दीवार खड़ी करवा कर सुरक्षा कर्मी तैनात करवा दिए ताकि खेतों को कोई नुकसान न पहुंचा सके.यही नहीं खेतों में फसल उगाना भी बंद कर दिया जिससे खेतों का सोना कोई निकाल ले. इतने खर्च के बाद वे चैन से जमा-पूंजी खाने लगे. कुछ दिन में सारा पैसा ख़त्म हो गया तो उन्होंने खेतों से सोना निकलने की योजना बनाई परन्तु पूरे खेत खोदने पर भी सोना नहीं निकला.बेटों को लगा कि पिता ने उनसे झूठ बोला था. परेशान होकर वे पिता की शिकायत करने किसान(पिता) के एक बुजुर्ग मित्र के पास पहुंचे. सारी बात सुनकर बुजुर्ग ने कहा तुम सब मूर्ख हो? पिता की बातों का शाब्दिक अर्थ भर निकाल पाए पर उनमें छिपा निहितार्थ नहीं समझ पाए. छाँव-छाँव जाने से तुम्हारे पिता का आशय सूर्योदय के पहले जाने और सूर्यास्त के बाद लौटने से था.इसीतरह खेत सोना उगलते हैं इसका मतलब भरपूर फसल देते हैं और उनका ख्याल रखने का मतलब नियमित खाद-पानी देने एवं समय पर फसल लेने से था.तब जाकर बेटों को अपनी गलती का अहसास हुआ. इस कहानी का आशय यह है कि पिता बातों-बातों में जीवन का रहस्य समझा देते हैं बस हममें उसे समझ पाने की समझ होनी चाहिए.
लेकिन आज का दौर तो बेटों के "बाप" बनने का दौर है. उनके लिए पिता की सीख का मतलब गुजरे ज़माने की बातें और बे-फिजूल का भाषण भर हैं. वे यह नहीं समझ पाते कि पिता की नसीहत उनके जीवन भर के अनुभवों का निचोड़ हैं.पिता ने ज़माना देखा है,उम्र के कई दशकों के सफ़र में अच्छाइयों और बुराइयों को परखा है तब जाकर अनुभव की यह थाती मिली है. सभी पिताओं का यह प्रयास रहता है कि जो कठिनाइयाँ उन्होंने झेली हैं या जिन परिस्थितियों का सामना उन्हें करना पड़ा है उनके बच्चों को उन सब से बचा लें. माँ तो खुलकर अपनी भावनाओं का इज़हार कर देती है-हंसकर और कई बार रोकर बच्चे को अपने प्यार से रूबरू करा देती है लेकिन पिताजी ऐसा नहीं कर पाते. उन्हें तो हमेशा अनुशासन और मर्यादा के दायरे में रहना पड़ता है तभी तो बच्चे प्यार व डांट के मिले-जुले भावों के बीच बड़े होते हैं लेकिन बच्चे समझते हैं पिताजी हमेशा डांटते भर हैं और अपनी मनमानी करते हैं इसलिए ज़रा से बड़े होते ही बच्चे अपनी मनमानी पर उतर आते हैं. उन्हें पिता की अवहेलना करना सुकून देता है पर पिता को तकलीफ! बच्चे अपने पिता के व्यवहार की हकीक़त तब समझ पाते हैं जब वे स्वयं पिता बनकर अपने पिता की उम्र तक पहुँचते हैं लेकिन तब तक पिता ही जिंदा नहीं होते इसलिए उन्हें अपनी गलती मानने का मौका ही नहीं मिल पाता. बस इसीतरह पिता-पुत्र(बच्चों) का यह चक्र चलता रहता है और वे एक-दूसरे को अपनी भावनाएं समझाए बिना इस दुनिया से रुखसत होते रहते हैं!
वह तो भला हो फादर्स डे जैसे सालाना आयोजनों और इस दिन का व्यापारीकरण करने वालों का क्योंकि उनकी बदौलत कम से कम एक दिन ही सही हमें अपनी भावनाओं को इज़हार करने का मौका मिलने लगा है. ग्रीटिंग कार्ड बनाने वाली कम्पनियां बढ़िया और अर्थपूर्ण संदेशों के द्वारा मन की बात बताने की आज़ादी देने लगी हैं वरना पिता-पुत्र के संबंधों का सूखापन यूँही जारी रहता. बच्चे अपने पिता को नहीं समझ पाने के कारण उनके बाप बनते रहते और बाप अपनी बात नहीं समझा पाने के कारण उम्र के आखिरी पड़ाव में भी अपमान का घूँट पीते रहते. अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है? यदि आपके सर पर पिता का साया है तो समझिये आप दुनिया के सबसे बेफिक्र आदमी हैं...बस पिता को पिता समझकर सम्मान देते रहिये और मौज करिए क्योंकि जब तक पिताजी साथ हैं दुनिया की कोई ताक़त आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती .दरअसल जो भी परेशानी आएगी उसे आपके पिताजी हँसते-हँसते झेल जायेंगे और आपको पता भी नहीं चलेगा. तो आइये पिताजी/पापा/डैडी/बाबूजी/बाबा/अब्बा/फादर ...(या जिस भी संबोधन से आप उन्हें पुकारते हों) को दिल से भरपूर सम्मान दें ताकि हमें बाद में पछतावा न हो!

पिता के बारे में किसी ने ठीक ही लिखा है-
"एक मिटटी की इमारत,एक मिटटी का मकाँ
खून का गारा बना और ईंट जिसमे हड्डियाँ
दिक्कतों की पुरजोर आंधी जब इससे टकराएगी
देख लेना यह इमारत तब भी बुलंद नज़र आएगी"
(कविता में छेड़छाड़ के लिए मूल कवि से क्षमा याचना सहित)

गुरुवार, 17 जून 2010

हमारी बेटिओं को ‘सेनेटरी नेपकिन’ नहीं, स्कूल-अस्पताल चाहिए

एक मशहूर चुटकुला है:एक बार एक व्यक्ति कपड़े की दुकान पर पहुंचा और बढ़िया सी टाई दिखाने को कहा.दुकानदार ने कई टाईयां दिखाई.ग्राहक को एक टाई पसंद आ गई.कीमत पूछने पर दुकानदार ने कहा-५४० रूपए,तो वह व्यक्ति बोला क्या बात करते हो इतने में तो बढ़िया जूते आ जाते हैं?तो दुकानदार बोला-पर आप जूते तो गले में नहीं लटका सकते न! इस चुटकुले का सार यही है कि जिस चीज़ की ज़रूरत हो उसको खरीदना चाहिए न हर-कुछ. अब हमारी सरकार को ही देख लीजिए उसे आज़ादी के ६० साल बाद भी नहीं पता कि आम जनता को किस चीज़ की दरकार है इसलिए वह ऊल-ज़लूल योजनाए बनाकर करदाताओं के गाढ़े पसीने की कमी को फ़िजूल में उड़ाती रहती है.सरकार की नासमझी का नया उदाहारण देश के गाँवों की बेटियों को सेनेटरी नेपकिन बाँटना है. सरकार ने किशोर लड़कियों में मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य को बढावा देने के लिए 150 करोड़ रुपए की योजना को मंजूरी दी है ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में किशोर लड़कियों के लिए उच्च स्तर के सेनेटरी नेपकिनों की उपलब्धता आसान की जा सके. योजना के अनुसार छ: सेनेटरी नेपकिनों का एक पैकेट गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की लड़कियों को एक रुपया प्रति पैकेट मिलेगा. गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) वर्ग की लड़कियों को सेनेटरी नेपकिन पांच रुपया प्रति पैकेट के हिसाब से मिलेंगे। यह योजना विभिन्न चरणों में चलाई जाएगी। पहले चरण में देश के 150 जिलों या 1500 विकास खंडों को लिया जाएगा और ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। प्रस्ताव में 10-19 वर्ष की आयु समूह की 1.5 करोड़ लड़कियों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। इन 1.5 करोड़ लड़कियों में से गरीबी रेखा से ऊपर की लड़कियां लगभग 70 प्रतिशत और बीपीएल समूह की लड़कियां 30 प्रतिशत होंगी.इस योजना का उद्देश्य किशोरियों में मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य के बारे में जानकारी बढ़ाना है। योजना का एक पहलू यह भी है कि ये नेपकिन गांव में रविवार को बकायदा बैठक बुलाकर बांटे जायेंगे.
योजना के बारे में जानकर तो यही लगता है कि दिल्ली में बैठे सरकारी अफ़सर टीवी चैनलों पर इन दिनों धुँआधार तरीके से आ रहे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सेनेटरी नेपकिन के विज्ञापनों के प्रभाव में हैं या किसी कंपनी ने अपना उत्पाद खपाने के लिए यह आइडिया दिया होगा वरना जिस देश में आम जनता महंगाई से जूझ रही है,लोगों को खाने के लाले पड़ रहे हैं, अस्पतालों से ज्यादा बीमार हैं और बच्चों की संख्या से बहुत कम स्कूल....लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट है,नक्सलवाद और आतंकवाद सिरदर्द बने है,बेरोज़गारी बढती जा रही है.गांव में बच्चे कुपोषित है,बेटियां कोख में ही दम तोड़ देती हैं वहाँ की सरकार की प्राथमिकता कभी भी सेनेटरी नेपकिन नहीं हो सकती! भोपाल के गैस पीड़ित २५ साल बाद भी पैसे के अभाव में तिल-तिलकर मर रहे हैं,बुन्देलखंड पानी की बूंद-बूंद को तरस रहा है,विदर्भ में किसानों की आत्महत्या की आग देश भर में फ़ैल रही है और सरकार को बेटियों की माहवारी की चिंता है. दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों को छोड़ दें तो देश के अधिकतर राज्यों में मासिक धर्म को एक अपराध की तरह समझा जाता है और वहाँ ये तीन से पांच दिन महिलाओं के लिए किसी सज़ा से कम नहीं होते.इस दौरान महिलाओं को अपवित्र तक समझा जाता है,क्या ऐसे वातावरण में गांव की बेटियां सार्वजनिक बैठक में सेनेटरी पैड ले सकती हैं? क्या उनके घरवाले ऐसी बैठक में जाने देंगे? क्या मासिक धर्म सार्वजनिक जानकारी का विषय बनाना महिलाओं का अपमान नहीं है?
अच्छा तो यह होता कि सरकार पैड की बजाय बेटियों को शिक्षित बनाने के लिए बजट और बढ़ा देती क्योंकि बच्चियां पढ़-लिख जाएँगी तो अपने स्वास्थ्य का ध्यान वे खुद ही बेहतर ढंग से रख पाएंगी और अशिक्षित रहेंगी तो पैड मिलने के बाद भी उसका उपयोग नहीं कर पाएंगी. क्या आप मेरी बात से सहमत हैं तो कलम(अब कम्पूटर पर उँगलियाँ)चलाइए....?

बुधवार, 16 जून 2010

आपका बच्चा रोज स्कूल जाता है या जेल?


एक पुरानी कहानी है:एक बार एक पंडितजी(ब्राम्हण नहीं) को दूसरे गाँव जाना था.शाम घिर आई थी इसलिए उन्होंने नाव से जाना ठीक समझा. नाव की सवारी करते हुए पंडितजी ने मल्लाह से पूछा कि तुम कहाँ तक पढ़े हो तो मल्लाह ने कहा कि मैं तो अंगूठा छाप हूँ. यह सुनकर पंडितजी बोले तब तो तुम्हारा आधा जीवन बेकार हो गया! फिर पूछा कि वेद-पुराण के बारे मे क्या जानते हो? तो मल्लाह बोला कुछ भी नहीं. पंडितजी ने कहा कि तुम्हारा ७५ फ़ीसद जीवन बेकार हो गया. इसीबीच बारिश होने लगी और नाव हिचकोले खाने लगी तो मल्लाह ने पूछा कि पंडितजी आपको तैरना आता है? पंडितजी ने उत्तर दिया-नहीं,तो मल्लाह बोला तब तो आपका पूरा जीवन ही बेकार हो जायेगा. इस कहानी का आशय यह है कि केवल किताबी पढाई ही काफी नहीं है बल्कि व्यावहारिक शिक्षा और दुनियादारी का ज्ञान होना भी ज़रूरी है.यह सब जानते हुए भी हमारे स्कूल इन दिनों बच्चों को केवल किताबी कीड़ा बना रहे हैं और आगे चलकर 'बाबू' बनने का कौशल सिखा रहे हैं.जब ये बच्चे स्कूल में टॉप कर बाहर निकलते हैं तो तांगे के उस घोड़े कि तरह होते हैं जिसे सामने की सड़क के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता .हमारे बच्चे भी रचनात्मकता और सृजनशीलता के अभाव में सिर्फ बढ़िया सी नौकरी,फिर एशो-आराम और अपनी बेहतरी की कल्पना ही करते हैं. उनके लिए देश, समाज, परिवार के सरोकार कुछ नहीं होते या अपने बाद नज़र आते हैं. यदि वे समय पर नौकरी नहीं तलाश पाते हैं तो तनाव में आ जाते हैं और इसके बाद बीमारियों की गिरफ्त में!          इसमें बच्चों से ज्यादा कुसूर हमारा, स्कूलों का और शिक्षा प्रणाली का है? दरअसल स्कूल खुद ही बच्चों को नोट छपने की मशीन समझते हैं और उन्हें मशीन के रूप में ही तैयार करते हैं. आज के निजी और पब्लिक स्कूल बच्चों को अनुशासन की चेन में बांधकर कैदियों सा बना देते हैं. कभी कहा जाता था कि 'एक स्कूल बनेगा तो सौ जेलें बंद होंगी ' पर अब तो उल्टी गंगा बह रही है क्योंकि हमारे स्कूल ही जेल में तब्दील हो गए हैं. बच्चे उनीदें से अपने वजन से ज्यादा भार का स्कूली बैग लेकर बस में सवार होकर स्कूल चले जाते हैं..वहां मशीन की तरह व्यवहार करते हैं और दोपहर में होम वर्क से लादे-फदे घर वापस आ जाते हैं. घर में भी गृहकार्य करते हुए पूरा वक्त निकल जाता है और शाम को हंसी के नाम पर मारपीट एवं हिंसा सिखाते कार्टून देखकर सो जाते है और दूसरे दिन सुबह से फिर वही कहानी... आखिर ऐसी व्यवस्था का क्या फायदा है जो इंसान को मशीन बनाये और बच्चों को भविष्य में पैसे छापने की टकसाल? जब वे ऐसा नहीं कर पाते तो स्कूल में शिक्षकों के हाथ से मार खाते हैं और घर में माँ-बाप की दमित इच्छाओं को पूरा करने के नाम पर कुंठित होते रहते हैं. ऐसे में ही वे कोलकाता के उस बच्चे की तरह मौत को गले लगा लेते हैं जिसने शिक्षक की मार के बाद मरना ज्यादा आसान समझा? वैसे अब तो हर साल ही दसवीं-बारहवीं के परिणाम आते ही देश भर में आत्महत्याओं का दौर सा शुरू हो जाता है और फिर बच्चे पर "कलेक्टर-एसपी" बनने के लिए दबाव बनाने वाले अभिभावक हाथ मलते-पछताते रह जाते हैं? क्या फिल्म "थ्री इडियट्स "में बताई गई हकीक़तों को हम फ़िल्मी ही समझ बैठे हैं या असल जीवन में इस फिल्म से कुछ प्रेरणा भी ले सकते हैं? कब हम बच्चे की पीठ का दर्द ,घुटन और कुंठा को देख पाएंगे? या उसे ऐसे ही अपने सपनों के लिए कुर्बान करते रहेंगे? सोचिये जरा सोचिये... आप भी किसी बच्चे के बाप हैं....?

सोमवार, 14 जून 2010

गायें खा रही हैं "गौमांस" और इंसान.....


फिल्म गोपी का एक गीत "रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा,हंस चुनेगा दाना और कौवा मोती खायेगा..." आज भी लोकप्रिय है और मौजूदा परिस्थितियों पर बिलकुल सटीक लगता है क्योंकि जब गाय ही घास की जगह मांस और कई जगह तो गोमांस(beef) खाने लगे तो इस गाने में की गई भविष्यवाणी सही लगने लगती है. चौंक गए न आप भी यह सुनकर? मेरा हाल भी यही हुआ था. दरअसल जुगाली करना हमेशा ही फायदेमंद होता है. अब यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि जुगाली का मतलब बौद्धिक वार्तालाप होता है. आज हम कुछ मित्र ऐसे ही भोजनावकास में जुगाली कर रहे थे तो हाल ही में खाड़ी देशों की यात्रा से लौटे एक मित्र ने चर्चा के दौरान बताया कि अधिकतर खाड़ी देशों में गायें मांस युक्त चारा(fodder) खा रही हैं. उनका कहना था कि वहां हरी घास तो है नहीं और न ही हमारी तरह भरपूर मात्र में भूसा उपलब्ध है इसलिए गायों को मांस आधारित चारे से गुजारा करना पड़ता है. कई देशों में तो गायों को गाय के मांस वाला चारा ही खिलाया जाता है. यह जानकारी मेरे लिए तो चौकाने वाली थी शायद आप में से भी कई ही लोग यह बात जानते होंगे? इसी बातचीत के दौरान दिल्ली में काफी समय से रह रहे एक मित्र ने बताया कि दिल्ली के सफदरजंग इन्क्लेव में कमल सिनेमा के पास एक मांस की दुकान है जहाँ अक्सर गाय घूमती रहती हैं और वे खुलेआम पड़े मांस के टुकड़ों को खाती रहती हैं.मित्र ने मजाक में कहा कि यदि आप एक 'लेग- पीस' वहां फेंको तो कई गाय भागती हुई आ जाएँगी. बातचीत के दौरान मुझे भी अपने बचपन में आँखों देखा एक किस्सा याद आ गया. हम लोग मध्यप्रदेश के करेली कस्बेमें रहते थे.वहां एक कंजड मोहल्ला काफी बदनाम था, दरअसल यहाँ महुए को सड़ाकर देशी शराब बनायीं जाती थी और बाद में सड़े-गले महुए को यूँ ही सड़क पर फेंक दिया जाता था.इसके चलते उस इलाके कि ज़्यादातर गायें सडा महुआ खाने की आदी हो गयी थी. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि जिस दिन उन्हें पर्याप्त मात्रा में महुआ नहीं मिलता वे दूध नहीं देती या सामान्य दिनों की तुलना में काफी कम मात्रा में दूध देती थी.एक तरह से उस इलाके की गायें महुआ के नशे की आदी हो गयी थी. सोचिये क्या समय आ गया है जब गायों को देशी शराब और मांस खाना पड़ रहा है? क्या हम इस लायक भी नहीं रहे कि धार्मिक रूप से माता मानी जाने वाली गाय को भरपेट चारा तक उपलब्ध नहीं करा सकते? कहाँ हैं हमारे तथाकथित 'धर्मरक्षक',जो किसी गैर हिन्दू के फिजूल के बयाँ पर इतनी हाय-तौबा मचाते हैं कि देश में दंगे की स्थिति बन जाती है या वे हिन्दू वीर ,जो ज़रा-ज़रा सी बात पर कत्ले-आम पर उतारू हो जाते हैं? यहाँ इस जानकारी का उल्लेख करने का उद्देश्य किसी की भावनाओं या रीति-रिवाजों का मजाक उड़ना नहीं है बल्कि इंसानों के तानाशाही पूर्ण रवैये और मनमानी हरकतों से प्रकृति के साथ हो रहे खिलवाड़ को उजागर करना भर है. यदि अभी भी हमने पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ बंद नहीं की तो आज हमारे पालतू पशुओं का यह हाल है कल हमारा हाल इससे भी बदतर हो जायेगा?

जुगाली की उपलब्धियों को पंख लगे...


जुगाली के ज़रिये मैंने सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दों पर जागरूकता  जगाने का एक छोटा सा प्रयास किया था .आपके सहयोग से यह प्रयास रंग ला गया और आज जुगाली का कारवां भारत के बाहर अमेरिका,ब्रिटेन सहित दर्जन भर देशों तक फ़ैल गया है. आपकी प्रतिक्रियाएं तथा सुझाव जुगाली को रास्ता दिखने में मददगार बन रहे हैं. उम्मीद है कि भविष्य में भी जुगाली पर मेल-मिलाप इसीतरह चलता रहेगा और आप अपनी बेशकीमती प्रतिक्रियाएं हर पोस्ट पर देते रहेंगे. हम सभी के लिए ख़ुशी की बात यह है कि अब जुगाली को देश के प्रमुख समाचार पत्रों में भी स्थान मिलने लगा है.हिंदी के प्रतिष्ठित अखबारों "जनसत्ता" और "दैनिक जागरण " में बहुमूल्य स्थान मिलना निश्चित ही सम्मान की बात है और इस पोस्ट का उद्देश्य हमेशा की तरह अपनी ख़ुशी को आप सभी के साथ बांटना है.आशा है आप सब के सहयोग से इसी तरह उपलब्धियों को पंख लगते रहेंगे.....




शनिवार, 12 जून 2010

चंद बूंदे ज़िन्दगी की.....

एक चीनी कहावत है-यदि आपको एक दिन की खुशी चाहिए तो एक घंटा ज्यादा सोएं. यदि एक हफ्ते की खुशी चाहिए तो एक दिन पिकनिक पर अवश्य जाएँ.यदि एक माह की खुशी चाहिए तो अपने लोगों से मिलें.यदि एक साल के लिए खुशियाँ चाहिए तो शादी कर लें और जिंदगी भर की खुशियां चाहिए तो किसी अनजान व्यक्ति की सहायता करें.....मेरे मुताबिक किसी अनजान व्यक्ति की सहायता करने का सबसे अच्छा तरीका है –रक्तदान.
वैसे भी “रक्तदान को महादान” माना जाता है और आपके खून की चंद बूंदे किसी व्यक्ति को नया जीवन दे सकती हैं, उसके परिवार को आसरा तथा आपको जीवन भर के लिए दुआएं मिल सकती हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हमारे देश में हर साल एक करोड़ यूनिट खून की जरुरत है पर तमाम प्रयासों के बाद भी मात्र ७५ लाख यूनिट रक्त ही जमा हो पा रहा है. खून की इसी कमी के कारण भारत में हर साल १५,००,००० लोग जिंदगी से हाथ धो बैठते हैं. हमारे देश में हर तीन सेकेण्ड में किसी न किसी को रक्त चाहिए पर हमारे मन में बसे डर के कारण हम रक्तदान से पीछे हट जाते हैं और कई लोग हमारे इस बे-फ़िजूल के डर के कारण जान गवां देते हैं. रक्तदान नहीं करने के पीछे डर भी कैसे कैसे हैं-कोई कहता है शरीर में कमजोरी आ जाती है जो फिर कभी नहीं मिट पाती, तो किसी को डॉक्टर की मंशा पर शक रहता है कि पता नहीं कितना खून निकाल ले? कोई सोचता है कि रक्तदान में घंटों समय जाया करना पड़ेगा तो किसी को लगता है कि दान किया गया रक्त उसके काम तो पड़ेगा नहीं इसलिए दान करने से क्या फायदा. इन धारणाओं के विपरीत डॉक्टरों का कहना है कि रक्तदान करना दान तो है ही खुद के शरीर के लिए भी अत्यधिक ज़रुरी है. मसलन रक्तदान करने से कम-से-कम छः माह तक ह्रदयाघात का खतरा टल जाता है.इसीतरह नियमित रक्तदान से शरीर की प्राकृतिक रूप से सफाई होती रहती है जिससे कई तरह के संक्रामक रोगों से बचा जा सकता है. रही शारीरिक कमजोरी की बात तो वह भी बमुश्किल घंटे भर की ही होती है और फिर शरीर नया खून बना लेता है इसलिए कोई कमी भी नहीं रह पाती. एक स्वस्थ व्यक्ति में उसके शरीर के कुल वजन के १/७ हिस्से के बराबर खून रहता है...अब ज़रा सोचिये इतने खून में से यदि ४५० मिलीलीटर रक्त निकल गया(कभी भी एक बार में इससे ज्यादा खून नहीं निकाला जाता) तो उसका क्या बिगड़ेगा. यदि मामूली खून निकलने से कुछ हो रहा होता तो ज़रा महिलाओं के बारे में सोचिये जिन्हें हर माह मासिकधर्म के ज़रिये इस दौर से गुज़ारना पड़ता है पर न तो वे कमज़ोर होती हैं और न बीमार, तो फिर पुरुष होकर हम रक्तदान के नाम पर फालतू के बहाने क्यों बनाने लगते हैं?
इसलिए आइये, बहाने और बे-मतलब के डर छोड़कर किसी अनजान व्यक्ति को नया जीवन देने का सार्थक काम करें. बाबा-बैरागियों को दान देकर पुण्य कमाने के लिए हम अपना हाथ खोल देते हैं और जिससे वास्तव में पुण्य मिल सकता है उस रक्तदान से बचने के लिए बहाने बनाते हैं. रक्तदान के प्रचार-प्रसार और जागरूकता के कारण अब असमय मौत का शिकार बनने वाले २५ फीसद लोगों का जीवन बचाया जा सकता है. यदि हम बढ़-चढ़कर एवं उत्साह के साथ रक्तदान करने लगें तो न केवल कई अनजान लोगों का जीवन बचा सकेंगे बल्कि वक्त पर अपने लिए भी खून की कमी से नहीं जूझना पड़ेगा और पुण्य कमायंगे सो अलग. तो चलिए दान करते हैं चंद बूंदे ज़िन्दगी की....

शुक्रवार, 11 जून 2010

हम भारतीयों कि टांगें इतनी कमज़ोर क्यों हैं?

स्वामी विवेकानंद ने सलाह दी थी कि हमारी युवा पीढ़ी को गीता पढ़ने की बजाय फुटबाल खेलना चाहिए.उनका कहना था कि देश के युवा वर्ग को सबल बनना होगा,धर्म की बारी तो इसके बाद आती है. उन्होंने कहा था कि यह मेरी सलाह है कि “ फुटबाल खेलकर आप ईश्वर के अधिक निकट हो सकते हो”. उन्होंने आगे कहा था कि “यह बात आपको भले ही अजीब लग रही हो पर मुझे कहनी पड रही है क्योंकि मैं आप लोगों से प्यार करता हूँ.मुझे इस बात का अनुभव है कि यदि आपके हाथ की हड्डियां और मांसपेशियां अधिक मजबूत होंगी तो आप गीता को बेहतर तरीके से समझ सकोगे”. लेकिन हम भारतीयों की तो आदत है कि हम अपने बाप की नहीं मानते तो विवेकानंद की सीख कैसे मान सकते हैं. हमें उनका कहना नहीं मानना था और हमने नहीं माना! यही कारण है कि विश्व के फुटबाल मानचित्र पर भारत की स्थिति १३३ वीं है और दिल्ली-मुंबई तो दूर मेरठ-भोपाल जैसे छोटे शहरों से भी छोटे देश फुटबाल खेलने वालों देशों की सूची में शान से इठला रहे हैं.
दक्षिण अफ्रीका में शुरू हुए फुटबाल महाकुम्भ( world cup football) में दुनिया भर के चुनिन्दा ३२ देशों की टीमों के १६०० खिलाडी आठ समूहों में बंटकर ६४ मैचों के दौरान अपनी दमदार टांगों का ज़लवा दिखाएंगे और हम भारतीय अपनी पतली-कमज़ोर टांगों और मोटी तोंद के साथ कई लीटर कोला डकारकर किसी विदेशी टीम के नाम पर अपनी नींद खराब करते रहेंगे. वैसे विश्व कप फुटबाल को भारत के आईपीएल( IPL) का बाप कहा जाये तो अतिस्योंक्ति नहीं होगी क्योंकि इन मैचों को ३७६ टीवी चैनलों के ज़रिये २१४ देशों के लगभग ७२ करोड़ लोग देख रहे हैं.सिर्फ टीवी प्रसारण के अधिकार ही ३४ अरब डॉलर में बिके हैं.खेलों की विशालता और महत्त्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ सुरक्षा पर ही ९० करोड़ रूपए खर्च हो रहे हैं. अब तक मैचों के ३४ लाख टिकिट लोगों ने ख़रीदे हैं और मैचों के जुनून के साथ-साथ यह संख्या भी बढती जायगी.
सोचिए, यदि हमने विवेकानंद की सलाह मानकर सही ढंग से फुटबाल खेलना शुरू कर दिया होता तो आज हमारी टीम भी तिरंगे के साथ अपनी जर्सी का ज़लवा दिखा रही होती. वैसे भारत में फुटबाल की दशा शुरू से इतनी खराब नहीं रही. १९५० से लेकर १९६४ तक भारतीय फुटबाल ने भी स्वर्णिम दिन देखे हैं. इस दौरान हमने ऑलिम्पिक से लेकर एशियाई खेलों तक में अपनी टांगों का ज़बरदस्त हुनर दिखाया है. एशियाई खेलों में तो हमने स्वर्ण पदक तक जीता है लेकिन कमज़ोर टांगों और बेतहाशा पैसे वाले क्रिकेट ने फुटबाल के साथ-साथ सभी ऊर्जा-स्फूर्ति-जोश और उत्साह से भरपूर खेलों का बंटाधार कर दिया. तभी तो सबसे ज्यादा पैसे पीटने वाले २०-२२ साल के युवा क्रिकेटर अपने ४२ साल के कोच के साथ पूरीतरह से दौड़ भी नहीं पाते क्योंकि दौड़ने के लिए भी तो टांगो में दम चाहिए? हाँ विज्ञापनों से कमी के मामलें में वे कोच तो क्या कारपोरेट घरानों के प्रमुखों से भी आगे हैं. तो चलिए भारतीय फुटबाल कि दशा पर मातम मनाने की बजाय हमारी नई पीढ़ी को स्वामी विवेकानंद की शिक्षा देने का प्रयास करें ताकि भविष्य की पौध मजबूत टांगों वाली हो और फिर हमें फुटबाल तो क्या किसी भी खेल को खेलने वाले देशों की सूची में भारत का नाम नीचे से नहीं ढूँढना पड़े......आमीन!

बुधवार, 9 जून 2010

दिल तो बच्चा है जी....


महानायक अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘लावारिस’ का एक गाना “मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है” अस्सी के दशक में काफी लोकप्रिय हुआ था. इस गाने की लाइन कुछ इस तरह थी कि ‘जिसकी बीबी छोटी उसका भी बड़ा नाम है,गोद में उठा लो, बच्चे का क्या काम है..’इस गाने ने उस दौरान छोटे कद की महिलाओं के साथ-साथ उनके पतियों को भी हँसी का पात्र बना दिया था चूँकि इस गाने में सभी कद-रंग-लम्बाई-चौड़ाई के लोगों का मजाक उड़ाया गया था इसलिए कोई किसी को दोष नहीं दे पाया और यह गाना बुराई की बजाय हंसने-हँसाने का जरिया बन कर रह गया, लेकिन अब नाटे कद के लोगों पर हुए एक शोध में हुए खुलासे ने इसी गाने को कुछ इसतरह कर दिया है कि “जिसकी बीबी छोटी उसका तो बुरा हाल है” क्योंकि शोध से पता चला है कि छोटे कद के लोगों में दिल की बीमारी होने और इस बीमारी से मरने का खतरा ज्यादा रहता है.
वैसे दिल की बीमारी के कद से संबंध पर शोध की शुरुआत 1951 में हुए थी. तब से अब तक इस विषय पर 52 अध्ययन व लगभग दो हज़ार शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. फिनलैड की यूनिवर्सिटी ऑफ तामपेरे के फॉरेंसिक मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने इन्ही शोधों के निष्कर्ष के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की है। शोधकर्ताओं ने 30,12,747 लोगों पर हुए शोध का परिणाम निकालने के लिए लोगों को दो श्रेणियों में बांटा. इसके तहत छोटे कद की श्रेणी में 165.4 सेंटीमीटर से छोटे पुरुषों और 153 सेमी से छोटी महिलाओं को रखा गया.इसीतरह 177.5 सेमी से लंबे पुरुष और 166.4 सेमी से ऊँची महिलाओं को दूसरी श्रेणी में रखा गया। दोनों के तुलनात्मक अध्ययन में छोटे कद वाले समूह में दिल संबंधी बीमारियां 1.5 गुना ज्यादा पाई गई। छोटे कद वाले पुरुषों में दिल की बीमारियों से मरने का खतरा लंबे कद के पुरुषों के मुकाबले 37 फीसद ज्यादा पाया गया.जबकि छोटे कद की महिलाओं में यह खतरा ऊँची महिलाओं के मुकाबले 55 फीसदी अधिक पाया गया।
वैसे अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि छोटे कद या सामान्य बोलचाल की भाषा में कहें तो नाटे लोग मानसिक रूप से हीन भावना का शिकार होते हैं. मनोवैज्ञानिक भी तमाम शोधों के जरिये इस बात को समझाते रहे हैं कि व्यक्तित्व की कमियां इंसान को कमजोर बना देती हैं लेकिन यह बात भी उतनी ही सत्य है कि यदि व्यक्ति ठान ले तो शरीर की कोई भी कमजोरी उसके विकास में बाधा नहीं बन सकती.किसी शायर ने ठीक ही फ़रमाया है कि-

“ मैं तो छोटा हूँ झुका लूँगा सर को अपने

पहले सब बड़े तय कर लें, बड़ा कौन है”

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मंगलवार, 8 जून 2010

आप भी दे सकते हैं कसाब को फांसी

पढकर आश्चर्य में न पड़े ...यह बिलकुल सच बात है कि आप भी मुंबई (Mumbai )को घंटों तक बंधक बनाने वाले और अनेक निर्दोष लोगों के हत्यारे आतंकवादी कसाब(kasab) को फांसी दे सकते हैं और वह भी मनचाही बार, मतलब एक-दो नहीं बल्कि दसियों बार आप कसाब को फांसी पर लटकते हुए देख सकते हैं. कसाब को सार्वजनिक रूप से फांसी की सजा पाते देखना हर भारतीय की ख्वाहिश है. कसाब ही क्या, संसद पर हमले के मामले में जेल में बंद अफज़ल गुरु सहित उन तमाम देशद्रोहियों और नापाक इरादे रखने वाले आतंकवादियों को उनके गुनाहों की सजा हर हाल में और जल्द से जल्द मिलनी ही चाहिए इस बात पर दो राय हो ही नहीं सकती.
पर समस्या यह है कि सरकार भी क्या इन दोषियों को हमारी ही तरह फटाफट सजा देने की इच्छुक है? अभी तक की कवायद और प्रतिक्रिया से तो यह नहीं लगता कि हम भारतीयों की यह तमन्ना आसानी से पूरी हो पायेगी. सरकार भी बेचारी क्या करे? न तो उसके पास पूर्ण बहुमत है और न ऐसा कर पाने की इच्छाशक्ति. उसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों के साथ-साथ देश के घरेलू हालातों (सरल शब्दों में वोट बैंक) का ध्यान भी रखना पड़ेगा.आखिर फिर से चुनाव जो लड़ना है. तो क्या हम इसी तरह हाथ पर हाथ रखकर बस इंतज़ार करते रहेंगे....नहीं अब ऐसा करने की कोई ज़रूरत नहीं है और न ही अपने मंसूबों को दबाने की क्योंकि हम-आप सब कसाब को फांसी दे सकते हैं और वह भी अपने समय,जगह और इच्छा के मुताबिक. तो चलो अब इस सस्पेंस को ख़त्म किया जाये दरअसल ऑनलाइन बाज़ार में इन दिनों "हेंग कसाब" नामक एक खेल धूम मचा रहा है इसमें खेलने वालों को निर्धारित अवधि में कसाब को मनमानी बार फांसी की सजा देने का अवसर मिलता है.
इस खेल की नींव भी गुस्से के इज़हार को लेकर ही पड़ी है, जब एक कम्पनी ने सुना कि कसाब को फांसी देने के लिए ज़ल्लाद नहीं मिल रहा है और भारत के लोग उसे जल्द से जल्द सजा पाते देखना चाहते हैं तो उसने इस खेल का इज़ाद कर दिया ताकि आम लोग कसाब को मारकर अपने गुस्से को निकाल सकें और अपनी ऊर्जा को देश के रचनात्मक कामों में लगा सके. तो चलिए सरकार भलेहि डिप्लोमेसी में उलझी रहे हम तो कसाब को बार-बार फांसी पर लटकाकर अपने कलेजे को ठंडा कर ही लें....

सोमवार, 7 जून 2010

चीअर्स...दिल्ली के बिअर बाजो...चीअर्स

मशहूर और कालजयी फिल्म 'शोले' में याद है अभिनेता धर्मेन्द्र पानी की टंकी पर चढ़कर सुसाइड-सुसाइड चिल्लाते हैं और अरे रामगढ वालों जैसा चर्चित डायलोग बोलते हैं.वैसे इस पोस्ट का शोले से कोई सम्बन्ध नहीं है बस शीर्षक को शोले के डायलोग जैसा बनाने की कोशिश की है.हाँ एक समानता ज़रूर है कि धर्मेन्द्र ने शराब पीकर वह सीन किया था और हमारे दिल्ली वाले बिअर पीकर रिकॉर्ड बना रहे हैं.हालाँकि दिल्ली वाले अपने कारनामो के चलते दुनिया और खासतौर पर देश में खूब नाम कमाते रहते हैं. कभी संसद पर हमले के कारण तो कभी बीएमडव्लू जैसी कारों को आम आदमी पर चढ़ाकर और कभी मतदान के दौरान वोट न डालकर.इसके बाद भी बढ़-चढ़कर बोलने में किसी से पीछे नहीं रहते.
अब दिल्ली वालों ने बिअर पीने का नया रिकॉर्ड बनाया है. वे मात्र एक माह में १५ लाख क्रेट से ज्यादा बिअर डकार गए.सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मई के महीने में दिल्ली के लोगों ने १५,२२,८२९ क्रेट बिअर पी.अब माय के शौकीनों को यह बताने कि ज़रूरत नहीं है कि एक क्रेट में १२ बोतलें आती हैं.तो ज़रा ऊपर कि संख्या को १२ से गुणा करके देखिये की बिअर पीने में हम राजधानी वालों ने पानी पीने वालों को भी पीछे छोड़ दिया है. वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है जब दिल्ली के बिअरबाजो ने एसा रिकॉर्ड बनाया है.इसके पहले अप्रैल के महीने में भी वे १४.८ लाख क्रेट बिअर पी गए थे. यह बात अलग है कि मई में उन्होंने अप्रैल से ३० गुणा ज्यादा बिअर पी हैऔर यह अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है.वैसे बिअर पीने के लिए दिल्ली वालों को दोषी ठहराना उचित नहीं है क्यूंकि जब पारा हमेशा ४६ डिग्री के पार रहेगा और बिजली ज़्यादातर गुल रहेगी तो आदमी बिअर न पिए तो क्या करे!
वैसे कई बिअर बाजों का कहना है कि वे नशे के लिए नहीं बल्कि बिअर को दवाई के तौर पर पीते हैं. उनका कहना है कि बिअर पीने से किडनी का स्टोन(पथरी) ठीक हो जाती है.बिअरबाजों का दावा है कि बिअर से पथरी घुल जाती है. यह बात अलग है कि डॉक्टर इस बात को गलत बताते हैं.डॉक्टरों का तो यहाँ तक कहना है कि बिअर ज्यादा पीने से स्टोन की सम्भावना और भी ज्यादा बढ़ जाती है.अब हुम क्या कहे क्यूंकि पीने वालों को तो पीने का बहाना चाहिए.....

शनिवार, 5 जून 2010

जय हो भारतीयों की जय हो ...

फिल्म ‘स्लमडोग मिलिनिअर’ में ऑस्कर विजेता संगीतकार ए आर रहमान का मशहूर गीत ‘जय हो’ भारत और भारतीयों पर बिलकुल उपयुक्त बैठता है.दरअसल हमने कारनामा ही ऐसा कर दिखाया है कि सारी दुनिया सम्मान की नज़रों से हमारी ओर देख रही है और हम भी गर्व के साथ सर ऊंचा करके खड़े हैं.आखिर किसी मामले में तो दुनिया ने हमारा लोहा माना. अब आप सोच रहे होंगे कि हम भारतीयों ने ऐसा क्या चमत्कार कर दिया जिसकी इतनी वाहवाही हो रही है तो जान लीजिए इस तारीफ का कारण यह है कि पर्यावरण संरक्षण और धरती को हरा-भरा बनाने में हम हिन्दुस्तानी सबसे आगे हैं.
नेशनल जिओग्राफिक –ग्लोबस्कैन नामक संगठन द्वारा किये गए एक सर्वे के मुताबिक दुनिया भर में पर्यावरण को बचाने और सुरक्षित जीवन शैली अपनाने के मामले में भारतीय लोग अव्बल नम्बर पर हैं. सर्वे में लगभग दर्जन भर देशों के तक़रीबन बीस हज़ार लोगों को शामिल किया गया था.खास बात यह है कि हमने पिछले साल की तुलना में अपने हरित सूचकांक में उल्लेखनीय रूप से २.१ अंकों की बढ़ोतरी भी की है.इस सर्वे के अनुसार अभी भी ८१ फीसदी भारतीय आवागमन के लिए सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे हैं.यही कारण है कि हमारे देश में दूसरे देशों की तुलना में कम प्रदूषण है.इस सर्वेक्षण में सम्बंधित देश के लोगों की उपभोग आदतों,वस्तुओं,खाद्य पदार्थों और यातायात की आदतों को शामिल किया गया था.भारत के बाद ब्राजील,चीन,मैक्सिको ,अर्जेंटीना,रूस,हंगरी तथा दक्षिण कोरिया का नम्बर है. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे दुनिया के तथाकथित ‘दादा’ इस सूची में दूर-दूर तक स्थान नहीं बना पाए.यह बात अलग है कि वे अभी भी पर्यावरण के सबसे बड़े शुभचिंतक बनकर बाकी देशों की खाट खड़ी करते रहेंगे और दुनिया को दिन-प्रतिदिन पहले से ज्यादा गन्दा बनाने में कई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे. तो है न बात अपनी जय-जय करने वाली.
अब एक बुरी खबर....यह भी पर्यावरण से ही सम्बंधित है. बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करने में हम भारतीय लोग कथित विकसित देशों को टक्कर दे रहे हैं.अब यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि पानी बेचने में इस्तेमाल हो रहीं बोतलें धरती के लिए सबसे घातक साबित हो रही हैं.इन बोतलों को बनाने में दुनिया भर में १५,००,००० टन प्लास्टिक का उपयोग हो रहा है और इस प्लास्टिक से पर्यावरण एवं मानव दोनों को ही नुकसान पहुँच रहा है. यही नहीं बोतल भरने के लिए धरती का सीना चीरकर पानी निकाला जा रहा है. जानकारी के मुताबिक बोतलबंद पानी का ७५ फीसदी हिस्सा भू-जल से ही प्राप्त किया जा रहा है.एशिया में १९९७ से २००४ के बीच बोतलबंद पानी का इस्तेमाल दोगुने से ज्यादा बढ़ गया है जबकि आस्ट्रेलिया जैसे देश इस पानी पर रोक लगा रहे हैं. यदि हम अपनी इस आदत को भी छोड़ दें तो सोचिये धरती माँ कितना आशीष देगी और भविष्य में ‘जल-युद्ध’ की संभावनाएं भी कम हो जाएँगी. तो चलिए आज से ही शुरुआत करते हैं और पानी की बोतल पर १५-२५ रूपए कर्च करने की बजाय घर से ही ठंडा और मीठा पानी लेकर चलने कि आदत डालते हैं.वैसे ये कोई मुश्किल काम भी नहीं है तो हो जाये एक बार फिर भारत कि ‘जय-जय...’

शुक्रवार, 4 जून 2010

चींटी ने खोली ज़माने की पोल

 कई बार पुरानी दन्त कथाएं और मुहावरे बहुत कुछ कह जाते हैं.कुछ तो इतने सटीक होते हैं कि मौजूदा समय के बिलकुल अनुरूप लगते हैं और गागर में सागर की तरह साफगोई के साथ हकीकत को बयान कर देते हैं.कुछ ऐसी ही एक कथा मेरे एक मित्र ने मेल पर भेजी है. मुझे लगता है कि यह कथा आप सब को भी उतना ही आंदोलित करेगी जितना मुझे किया है.तो जानिये एक चींटी(Ants) के जरिये आज की हकीकत......

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एक छोटी सी चींटी हर दिन दफ्तर में समय से

पहले पहुंच जाती और तुरंत काम शुरू कर देती

थी। अपने काम से वह खुद काफी खुश थी। उसका

आउटपुट काफी ज्यादा था। उसका सर्वोच्च बॉस

, जो एक शेर था, इस बात से चकित रहता था कि

चींटी बिना किसी पर्यवेक्षक के इतना काम

कैसे कर लेती है।

एक दिन उसने सोचा कि चींटी अगर बगैर किसी

पर्यवेक्षक के इतना काम कर रही है तो उसके

ऊपर एक सुपरवाइजर रख दिया जाए तो वह और

ज्यादा काम करेगी। सुपरवाइजर बता सकेगा कि

चींटी का श्रम कहां व्यर्थ जाता है, वह

अपना परफर्मेस और कैसे सुधार सकती है। किस

तरह उसके पोटेंशियल का और बेहतर इस्तेमाल

हो सकता है। इसलिए शेर ने एक तिलचट्टे को

उसका सुपरवाइजर बना दिया।

तिलचट्टे को सुपरवाइजर के काम का काफी

अनुभव था। वह अच्छी रिपोर्ट लिखने और अपने

मातहतों को प्रोत्साहित करने के लिए मशहूर

था। जब उसने जॉइन किया तो पहला निर्णय यह

लिया कि दफ्तर में घड़ी लगाई जाए। समयबद्ध

तरीके से काम करने से आउटपुट बढ़ता है।

अनुशासन किसी भी व्यवस्था की रीढ़ होता

है।

लेकिन यह सब करने और रिपोर्ट तैयार करने के

लिए उसे एक सेक्रेट्री की जरूरत महसूस

हुई। उसने इस काम के लिए एक मकड़े को

नियुक्त कर लिया। वह उसकी क्लिपिंग और

पुरानी फाइलों आदि का हिसाब रखता था और फोन

कॉल (उस समय मोबाइल नहीं थे) आदि देखता था।

तिलचट्टे की रिपोर्ट से शेर बहुत खुश हुआ

और उत्पादन दर बताने के लिए ग्राफ बनाने और

विकास की प्रवृत्तियों के झुकावों आदि का

विश्लेषण करने के लिए कहा ताकि वह खुद भी

बोर्ड मीटिंग में उन आंकड़ों का उपयोग कर

सके। इसके लिए तिलचट्टे को कंप्यूटर और

प्रिंटर की जरूरत हुई। इन सबकी देखभाल

करने के लिए उसने एक मक्खी की नियुक्ति कर

ली।

दूसरी ओर, एक समय खूब काम करने वाली चींटी

इन तमाम नई व्यवस्थाओं से और अक्सर होने

वाली मीटिंगों से परेशान रहने लगी। उसका

ज्यादातर समय इन्हीं सब बातों में गुजर

जाता था। उसे प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार

करने और अपनी उपलब्धियों का ब्यौरा देने

की आदत नहीं थी। उसका आउटपुट घटने लगा।

इन सारी स्थितियों को देखकर शेर इस

निष्कर्ष पर पहुंचा कि चींटी के काम करने

वाले विभाग के लिए एक इंचार्ज बनाए जाने का

समय आ गया है। यह पद एक खरगोश को दे दिया

गया। अब उसे भी कंप्यूटर और सहायक की जरूरत

थी। इन्हें वह अपनी पिछली कंपनी से ले आया।

खरगोश ने काम संभालते ही पहला काम यह किया

कि दफ्तर के लिए एक बढ़िया कालीन और एक

आरामदेह कुर्सी खरीदी। इन पर बैठकर वह काम

और बजट नियंत्रण की अनुकूल रणनीतिक

योजनाएं बनाने लगा।

इन सारी बातों - कवायदों का नतीजा यह हुआ कि

चींटी के विभाग में अब चींटी समेत सभी काम

करने वाले लोग दुखी रहने लगे। लोगों के

चेहरे से हंसी गायब हो गई। हर कोई परेशान

रहने लगा , इस पर खरगोश ने शेर को यह

विश्वास दिलाया कि दफ्तर के माहौल का

अध्ययन कराना बेहद जरूरी है। चींटी के

विभाग को चलाने में होने वाले खर्च पर

विचार करने - कराने के बाद शेर ने पाया कि

काम तो पहले के मुकाबले काफी कम हो गया है।

सारे मामले की तह में जाने और समाधान

सुझाने के लिए शेर ने एक प्रतिष्ठित और

जाने - माने सलाहकार काक को नियुक्त किया।

वह अपनी बात बहुत ही प्रभावी ढंग से रखता

था। काक ने रिपोर्ट तैयार करने में तीन

महीने लगाए और एक भारी भरकम रिपोर्ट तैयार

करके दी। यह रिपोर्ट कई खंडों में थी। इसका

निष्कर्ष था कि विभाग में कर्मचारियों की

संख्या बहुत ज्यादा है।

शेर बेचारा किसे हटाता , बेशक चींटी को ही ,

क्योंकि उसमें काम के प्रति लगन का अभाव

दिख रहा था। और उसकी सोच भी नकारात्मक हो

गई थी।

बुधवार, 2 जून 2010

क्या हम " सामूहिक आत्महत्या " की ओर बढ रहे हैं?

एक पुरानी कहानी है कि एक राजा ने अपने राज्य में संगमरमर का तालाब बनवाया और उस तालाब को दूध से भरने का फैसला किया. चूँकि इतना दूध इकठ्ठा करना आसान नहीं था इसलिए राजा ने घोषणा कर दी कि रात में सभी प्रजाजन एक-एक लोटा दूध तालाब में डालेंगे इससे तालाब भी दूध से भर जायेगा और किसी एक व्यक्ति पर बोझ भी नहीं पड़ेगा. राजा की घोषणा के बाद एक व्यक्ति ने सोचा की प्रजा की संख्या १० लाख से ज्यादा है. यदि में दूध के स्थान पर एक लोटा पानी डाल दू तो किसी को पता भी नहीं चलेगा. ऐसा ही विचार अन्य लोगों के मन में आया और भीड़ के मनोविज्ञान के मुताबिक सभी लोगों ने ऐसा ही सोचा और सुबह पूरा तालाब दूध के स्थान पर पानी से भरा नज़र आया. इस कहानी का सार यह है कि हम सब अपने स्वार्थ और फायदे के बारे में तो सोचते हैं पर देश-दुनिया पर उसके परिणाम की चिंता नहीं करते. पर्यावरण(environmnt) और ग्लोबल वार्मिंग (global varming)पर भी हमारा व्यवहार कुछ ऐसा ही है.
हम अपनी सुविधा के लिए कार पर कार खरीदते जा रहे हैं पर उसके नुकसान की चिंता नहीं कर रहे. सिर्फ दिल्ली में ही पचास लाख से ज्यादा निजी वाहन हैं और वे रोज सड़को पर आग बरसा रहे हैं. बढती कारों से तपन बढ रही है फिर भी हम अपने परिवार के हर सदस्य के लिए नई कार खरीदने में पीछे नहीं हैं. यही हाल एसी ,फ्रिज और विलासिता के अन्य सामानों का है.एसी पर्यावरण के लिए कितना हानिकारक है यह किसी से छिपा नहीं है फिर भी एसी बेरोकटोक बिक रहे हैं. यह सामूहिक आत्महत्या नहीं तो क्या है कि हम अपनी ही बर्बादी का इंतजाम ख़ुशी-ख़ुशी कर रहे हैं. हमारी इन आदतों के कारण सूर्य की घातक किरणों से हमारी सुरक्षा करने वाली ओजोन परत में बना छेद २००७ में बढकर २५.०२ मिलियन वर्ग किलोमीटर तक पहुँच गया है जो १९८० में मात्र ३.२७ मिलियन वर्ग मीटर था. जानकारों का मानना है कि यदि ओजोन परत इसीतरह नष्ट होती रही तो २०५४ तक पृथ्वी के आस-पास से ओजोन का कवच ही ख़त्म हो जायेगा और हमे सीधे सूर्य की परावैगनी किरणों का सामना करना पड़ेगा.जिससे जीवन दूभर हो जायेगा. वहीँ केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि भारत के शहरों से प्रतिदिन ३.८० अरब लीटर मैला पानी निकल रहा है इसमें से अधिकतर गन्दिगी गंगा,यमुना और नर्मदा जैसी पवित्र नदियों में मिल रही है.दस -बीस साल बाद कि स्थिति सोचकर ही डर लगता है.
शहरीकरण के चलते देश के गाँव ख़त्म हो रहे हैं और शहर तथा शहरों की गन्दिगी उतनी ही तेज़ी से बढ रही है.१९०१ से २००१ के दौरान शहरों कि संख्या १८२७ से बढकर ५१६१ हो गयी है जबकि गाँव घटकर ६८५६६५ की तुलना में २००१ में ५९३७३१ रह गए हैं. खुद ही सोचिये कहाँ जा रहे हम? अंधाधुंध विकास के कारण आज भी ढाई करोड़ लोगों के पास घर नहीं हैं और हर साल १०० अरब क्यूबिक लीटर पानी की कमी हो रही है. चालीस फीसदी लोगों के पास शौचालय तक नहीं हैं,न सड़क है और न बिजली. यह स्थिति तो आज की है पर भविष्य कितना भयावह होगा इसकी कल्पना से ही डर लगने लगता है. अभी भी वक्त है बिगड़ी हालत को सुधारने का वरना इन सुविधाओं को पाने के लिए हम एक दूसरे को ही मरने-मारने पर उतारू हो जायेंगे और फिर देश का क्या होगा सोचिये.......ज़रा सोचिये.

एक राज्य…जहां हर बच्चे के पास है अपना जंगल !!

क्या आपको पता है कि हमारे देश में एक प्रदेश ऐसा भी है जहां का हर बच्चा मोगली है..वही, जंगल बुक वाला मोगली। अब मोगली तो रुडयार्ड किपलिंग की क...