बुधवार, 14 दिसंबर 2022

बापू की कहानी,पत्थरों की जुबानी..!!

आपके पास महज एक दिन का वक्त है, पता नहीं फिर ये मौका कब नसीब होगा…मेले,ठेले, शापिंग फेस्टिवल, मॉल और हाट बाजारों की रौनक तो हम अक्सर देखते हैं लेकिन यहां कुछ अलग तरह का हुनर है…यहां पत्थर बोल उठे हैं,अपने अलग अलग रंग, आकार प्रकार और पहचान के बाद भी ये एकरूप होकर दुनिया के सबसे बड़े महामानव के आम इंसान से अहिंसा के पुजारी बनने की गाथा गुनगुना रहे हैं। हम बात कर रहे हैं - भोपाल के स्वराज भवन में 14 से 16 अक्टूबर के बीच आयोजित Anita Dubey की प्रस्तर प्रदर्शनी यानि पत्थरों पर जादूगरी की।

अब तक, हम-आपने महात्मा गांधी को विविध कैनवासों और तस्वीरों में देखा है लेकिन इस प्रस्तर प्रदर्शनी में बापू अलग ही रूप में नजर आते हैं। युवा गांधी, बैरिस्टर गांधी,असहयोग करते,चरखा चलाते, बा के साथ, गोलमेज सम्मेलन में, दांडी यात्रा करते और न जाने कितने रूपों में छोटे बड़े पत्थरों के जरिए प्रतिबिंबित होते गांधी। 45 फ्रेम्स और 15 कोटेशन में अनीता दुबे ने साबरमती आश्रम से लेकर चंपारण तक और गांधी टोपी से लेकर उनके तीन बंदरों और बकरी निर्मला तक महात्मा गांधी से जुड़े हर अहम किस्से को अपने पत्थरों से साकार कर दिया है। खास बात यह है कि अनीता जी पत्थरों को बिना तरासे उनके प्राकृतिक रूप में ही इस्तेमाल करती हैं और इसके लिए वे 30 साल से साधना/तपस्या कर रही हैं । अनीता दुबे ने बताया कि गांधीजी पर केंद्रित इस प्रदर्शनी के लिए वे तीन साल से दिनरात एक किए थीं तब जाकर पत्थरों ने बोलना शुरू किया और अब तो वे पूरा गांधीवाद बयान कर रहे हैं।
गांधीजी को एक अलग नजरिए से, नए रूप में और अनूठे अंदाज में देखने का यह अवसर छोड़िए मत..जरूर देखिए क्योंकि ऐसे कलाकारों के हुनर को हमारा समर्थन बहुत जरूरी है ।

अब ये पैसे फिर चलन में आ रहे हैं

 

अब ये पैसे फिर चलन में आ रहे हैं.. चौंकिए मत.. वाकई,पंजी, दस्सी, चवन्नी और अठन्नी कहलाने वाली यह मुद्रा अब फिर से प्रचलन में है…..लेकिन आप इनसे कुछ खरीद नहीं सकते बल्कि अब इन्हें हासिल करने के लिए आपको मौजूदा दौर में चलने वाली मुद्रा खर्च करनी पड़ेगी। दरअसल,अब ये मुद्राएं 'एंटीक ज्वैलरी' में बदल रही हैं और महिलाओं के नाक, कान और गले के सौंदर्य की शोभा बढ़ाती नजर आने लगी है मतलब पहले पैसे से सौंदर्य सामग्री खरीदी जाती थी और अब पैसा खुद सौंदर्य सामग्री बन रहा है।

पंजी, दस्सी, चवन्नी और अठन्नी..हो सकता है नए दौर के बच्चों को यह रैप या रिमिक्स जैसा कोई प्रयोग लगे लेकिन हमारे दौर में इनकी अहमियत आज के पांच और दस रुपए के बराबर थी..इन्हें हम पंजी यानि पांच पैसे, दस्सी दस पैसे, चवन्नी पच्चीस पैसे और अठन्नी को पचास पैसे के तौर पर जानते थे। चवन्नी और अठन्नी तो हाल के कुछ वर्षों तक प्रचलन में थीं।
इस तस्वीर में ध्यान से देखे तो इसमें एक,दो और तीन पैसे भी नज़र आ सकते हैं। कभी एक पैसा आज के एक रुपए जैसी हैसियत रखता था। हमसे से पहले की पीढ़ी इकन्नी, दुअन्नी से भी परिचित रही है पर हमें ये कुछ अलग लगते थे। वही हाल आज की पीढ़ी का है क्योंकि उनके लिए हमारे दौर की ये अहम मुद्राएं आज महत्वहीन है और इसी क्रम में हो सकता है आज के पांच और दस रुपए भविष्य में अबूझ पहेली बन जाएं। हालांकि कागज़ के नोटों के डिजिटल मुद्रा में बदलने और तमाम पेमेंट चैनल के कारण हो सकता है कि भविष्य में हम खुद भी रुपए पैसे को उनके रंग रूप से नहीं,बल्कि बस संख्या से पहचाने।

तेरा ज़िक्र है या इत्र है...महकता हूँ,बहकता हूँ...!!

इन दिनों, रात में आप यदि भोपाल की वीआईपी रोड, मुख्यमंत्री निवास से पॉलिटेक्निक कालेज या फिर तमाम नई बनी कालोनियों के आसपास की सड़कों से गुजरें तो एक भीनी भीनी और मादक सी सुगंध बरबस ध्यान खींचती है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने सड़क पर रूम स्प्रे कर दिया है..वाकई,यह रूम स्प्रे ही है लेकिन प्रकृति का। जैसे आम की बौर या मधुमलिती की बेल आसपास के इलाके को महका देती है बिल्कुल उसी तरह इस खास पेड़ की खुशबू हवा में घुलकर मन मोह लेती है..और इन दिनों भोपाल ही नहीं,शायद देश के किसी भी व्यवस्थित शहर में यह इत्र अपनी सुगंध से लोगों का ध्यान खींच रहा होगा। शायद,शीत ऋतु के स्वागत का प्रकृति का यह अपना खास अंदाज़ है।

अपूर्व सुंगध के साथ अपने आकार प्रकार में भी आकर्षक इस पेड़ को सप्तपर्णी कहा जाता है। सप्तपर्णी का अर्थ है सात पत्तियों वाला..इस पेड़ की लंबी पत्तियां सात की संख्या में परस्पर साथ होती है और यही इस पेड़ की सुंदरता का सबसे बड़ा कारण है। जहां तक,विशिष्ट सुगंध की बात है तो इन दिनों मतलब अक्तूबर नवंबर से जनवरी फरवरी तक सप्तपर्णी में विशेष प्रकार के छोटे छोटे सफेद फूल आते हैं जो अपनी महक से पूरे इलाक़े को महका देते हैं। सप्तपर्णी मूल रूप से अपना पेड़ है यानि यह दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश और भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है। हालांकि इसे चीन, अफ्रीकी देशों और ऑस्ट्रेलिया में भी देखा गया है। यह पश्चिम बंगाल का राजकीय पेड़ भी है।
सप्तपर्णी को डेविल्स ट्री, स्कॉलर ट्री, डीटा बार्क, ब्लैकबोर्ड ट्री, मिल्कवुड, सप्तपर्णा, सप्तचद, छत्रपर्ण, शारद, सातवीण, छितवन और छातिम जैसे तमाम नामों से भी जाना जाता है। वैसे वैज्ञानिक तौर पर इसे 'एल्स्टोनिया स्कोलैरिस' कहा जाता है। बताया जाता है कि वनस्पति विज्ञानी प्रोफ़ेसर सी. एल्स्टन ने सबसे पहले इस पर शोध किया था और इसलिए इसका वैज्ञानिक नाम एल्स्टोनिया स्कोलैरिस पड़ गया। एक और मजेदार बात यह है कि यह पेड़ केवल खुशबू ही नहीं बिखेरता बल्कि शिक्षा का जरिया भी है। दरअसल, सप्तपर्णी की लकड़ी से स्कूल कालेज में इस्तेमाल होने वाले ब्लैकबोर्ड भी बनते हैं। बच्चों की स्लेट बनाने में भी इसका भरपूर उपयोग होता है इसलिए इसे ‘ब्लैकबोर्ड ट्री’ भी कहा जाता है ।
दिलचस्प बात यह है कि सप्तपर्णी की अनूठी खुशबू ही इसकी जान की दुश्मन बन गई है …अपनी इसी अलग और मादक सुगंध के कारण कई लोग इस पेड़ को अशुभ और शैतान का रहवास भी कहते हैं इसलिए इसे डेविल्स ट्री के नाम से भी जाना जाता है। वे इसे दमा/अस्थमा और सांस की तमाम बीमारियों की जड़ भी मानते हैं। अखबारों की खबरों के मुताबिक़ इन्हीं बातों पर विश्वास करने की वजह से कई शहरों में लोग इसे कटवाने तक लगे हैं।
वास्तव में सप्तपर्णी एक ऐसा सदाबहार वृक्ष है जिसका उपयोग आयुर्वेदिक, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा जैसी तमाम देशी उपचार पद्धतियों में दुर्बलता, पीलिया और घाव ठीक करने सहित कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है। इसीतरह दाद, खाज और खुजली जैसे चर्म रोगों और मलेरिया के उपचार तक में यह उपयोगी है। बुखार,दस्त और दांत दर्द में भी यह बहुत कारगर है।
और अंत में सबसे खास बात.... सप्तपर्णी मेरी 'बैटर हाफ' का भी सबसे पसंदीदा पेड़ है इस लिहाज से यह हमारा पारिवारिक पेड़ हुआ। अब दुनिया इसे जिस भी नज़र से देखे, अपने लिए तो यह पेड़,इसकी खुशबू और इसका सौंदर्य सबसे प्रिय है। मुझे तो लगता है संजय लीला भंसाली की फिल्म 'गुज़ारिश' में गीतकार ए.एम.तुराज़ भी शायद कभी सप्तपर्णी के इस पेड़ के आसपास से गुज़रे होंगे तभी तो उन्होंने लिखा था:
के तेरा ज़िक्र है या इत्र है
जब-जब करता हूँ
महकता हूँ, बहकता हूँ, चहकता हूँ
शोलों की तरह
खुशबुओं में दहकता हूँ
बहकता हूँ, महकता हूँ
इसलिए, सप्तपर्णी को लेकर फैली अच्छी बुरी बातों को छोड़िए,बस इसकी भीनी भीनी खुशबू में मस्त हो जाइए क्योंकि ये समय निकल गया तो फिर अगले साल ही मदहोश होने का मौका मिल पाएगा।

मंगलवार, 1 मार्च 2022

किसको फुर्सत मुड़कर देखे बौर आम पर कब आता है..


 मौसम में धीरे-धीरे गर्माहट बढ़ने लगी है और इसके साथ ही बढ़ने लगी है आम की मंजरियों की मादक खुशबू...हमारे आकाशवाणी परिसर में वर्षों से रेडियो प्रसारण के साक्षी आम के पेड़ों में इस बार भरपूर बौर/मंजरी/अमराई/मोंजर/Blossoms of Mango दिख रही है और पूरा परिसर इनकी मादक गंध से अलमस्त है....ऐसा लग रहा है  जैसे धरती और आकाश ने इन पेड़ों से हरी पत्तियां लेकर बदले में सुनहरे मोतियों से श्रृंगार किया है और फिर बरसात की बूंदों से ऐसी अनूठी खुशबू रच दी है जो हम इंसानों के वश में नहीं है। चाँदनी रात में अमराई की सुनहरी चमक और ग़मक वाक़ई अद्भुत दिखाई पड़ रही है।  अगर प्रकृति और इन्सान की मेहरबानी रही तो ये पेड़ बौर की ही तरह ही आम के हरे-पीले फलों से भी लदे नज़र आएंगे.....परन्तु आमतौर पर सार्वजनिक स्थानों पर लगे फलदार वृक्ष अपने फल नहीं बचा पाते क्योंकि फल बनने से पकने की प्रक्रिया के बीच ही वे फलविहीन कर दिए जाते हैं....खैर,प्रकृति ने भी तो आम को इतनी अलग अलग सुगंधों से सराबोर कर रखा है कि मन तो ललचाएगा ही..महसूस कीजिए कैसे स्वर्णिम मंजरी की मादकता चुलबुली ‘कैरी’ बनते ही भीनी भीनी खुशबू से मन को लुभाने लगती है और फिर आम के पकने के साथ ही उसकी मीठी-मीठी सुगंध...अहा... मधुमेह से परेशान लोगों के मुंह में भी पानी ला देती है ।

आम की मंजरियों की सुंदरता और मादकता ने हमेशा ही कवियों-लेखकों का मन मोहा है। तभी तो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है -“कालिदास ने आम्र कोरकों को बसंत काल का 'जीवितसर्वस्वक' कहा था। उन दिनों भारतीय लोगों का हृदय अधिक संवेदनशील था। वे सुंदर का सम्मान करना जानते थे। गृहदेवियाँ इस लाल हरे पीले आम्र कोरक में देखकर आनंद विह्वल हो जाती थी। वे इस 'ऋतुमंगल' पुष्प  को श्रद्धा और प्रीति की दृष्टि से देखती थीं। आज हमारा संवेदन भोथा हो गया है। पुरानी बातें पढ़ने से ऐसा मालूम होता है जैसे कोई अधभूला पुराना सपना है। रस मिलता है, पर प्रतीति नहीं होती।‘

वहीं,आम की मंजरियों की मादकता पर क़लम चलाने से जाने माने लेखक विद्यानिवास मिश्र भी खुद को नहीं रोक पाए। उनके शब्दों में - 'आम वसंत का अपना सगा है, क्योंकि उसके बौर की पराग-धूलि से वसंत की कोकिला का कविकंठ कषायित होकर और मादक हो जाता है. आम की बौर, नये पल्लव और नये कर्ले और अंखुए कामदेव के बाण बन जाते हैं।'

आम तो वैसे भी फलों का राजा माना जाता है इसलिए राजा साहब की शान में कशीदे काढ़ने से भला कौन रुक सकता है...लेकिन यदि हम 'आम राजा' की तारीफों में डूब गए तो शब्द कम पड़ जाएंगे इसलिए पीले/रसीले/मीठे आम पर बात फिर कभी..फ़िलहाल अपन तो बौर की मादक गंध में अलमस्त हैं और  अपनी बात का समापन कुमार रवींद्र की कविता की उन पंक्तियों से करते हैं, जो  इस मादकता से हमें झंझोड़ कर उठाते हुए आम और आज से जुड़ी वास्तविकता से रूबरू कराती है। वे लिखते हैं:

'अरे बावरे

गीत न बाँचो अमराई का

महानगर में

किसको फुर्सत

मुड़कर देखे

बौर आम पर कब आता है।'


#आम #अमराई #मंजरी #mango #blossom #blossombeauty  #कैरी

सोमवार, 8 नवंबर 2021

कुछ मीठा हो जाए

 



कुछ मीठा हो जाए🍬🍫.. के बाद अब कुछ धमाकेदार🗯️ मीठा हो जाए..की बारी है। दीपावली🪔 के अवसर पर बच्चों को लुभाने के लिए चॉकलेट 🍫ने अपना रूप बदल लिया है...त्योहारों पर हमारी पारंपरिक मिठाइयों का सिंहासन हिलाने में पर्याप्त कामयाबी नहीं मिलने के बाद अब चॉकलेट इंडस्ट्री रंग-रूप बदल बदलकर त्योहारों में घुसपैठ कर रही है...ताज़ा उदाहरण है ये तस्वीरें..हैं तो ये चॉकलेट, पर पटाखों/आतिशबाजी का रूप धरकर बिक रही है..उम्मीद है बच्चों के ज़रिए घर घर पहुंच जाएं..आप जरूर सावधान रहिए, कहीं ऐसा न हो चॉकलेट🍫 समझकर पटाखा🤭😱 मुंह में रख ले या फिर पटाखा समझकर मीठी चॉकलेट से हाथ धो बैठे… बहरहाल दीपावली की धमाकेदार शुभकामनाएं🥳

#dewali2021 #depavali #दीवाली

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

रूप से ज्यादा गुणों की खान हैं ये विलायती मेमसाहब



यह विलायती जलेबी है..जो पेड़ पर पायी जाती है। आप इन दिनों हर बाग़ बगीचे में इन लाल-गुलाबी जलेबियों से लदे पेड़ देख सकते हैं बिल्कुल गली मोहल्लों में जलेबी की दुकानों की तरह । जलेबी नाम से ही ज़ाहिर है कि यह हमारी चाशनी में तर मीठी और पढ़ते (लिखते हुए भी) हुए भी मुंह में पानी ला देने वाली रसीली जलेबी के खानदान से है । अब यह उसकी बड़ी बहन है या छोटी..यह अनुसंधान का विषय है। वैसे उम्र के लिहाज़ से देखें तो विलायती जलेबी को प्राकृतिक पैदाइश की वजह से बड़ी बहन माना जा सकता है लेकिन जलेबी सरनेम के मामले में जरूर हलवाइयों के कारखानों में बनी जलेबी का पलड़ा भारी लगता है।..शायद, दोनों के आकार-प्रकार,रूप-रंग में समानता के कारण विलायती के साथ जलेबी बाद में जोड़ा गया होगा। इसे विलायती इमली, गंगा जलेबी, मीठी इमली,दक्कन इमली,मनीला टेमरिंड,मद्रास थोर्न जैसे नामों से भी जाना जाता है।

मज़े की बात यह भी है कि जन्म से दोनों ही विदेशी हैं- चाशनी में तर जलेबी ईरान के रास्ते भारत तशरीफ़ लायी है तो उसकी विलायती बहन मैक्सिको से आकर हमारे देश के जंगलों में रम गयीं और दोनों ही अब इतनी भारतीय हो गईं है कि अपनेपन के साथ हर शहर-गांव-गली मोहल्लों में ही रच बस गयीं हैं।

आज बात बस विलायती दीदी की... विज्ञान ने इन्हेँ वानस्पतिक नाम-Pithecellobium Dulce दिया है और इनका रिश्ता नाम की बजाए अपने गठीलेपन के कारण मटर से जोड़ दिया है इसलिए इसे मटर प्रजाति का माना जाता है। इसका फल सफ़ेद और पक जाने पर लाल हो जाता है और स्वाद तो नाम के अनुरूप जलेबी की तरह मीठा होगा ही । 

मैक्सिको से भारत तक के सफ़र के दौरान विलायती जलेबी को दक्षिण पूर्व एशिया खूब पसंद आया इसलिए यहां के तमाम देशों में इसके वंशज फल-फूल रहे हैं। फिलिपीन्स जैसे कई देशों में तो न केवल इसे कच्चा खाया जाता है बल्कि यह कई प्रकार के व्यंजन बनाने में भी उपयोगी है। इसे जबरदस्त इम्युनिटी बूस्टर भी कहा जाता है और इस कोरोना महामारी के दौर में हमें सबसे ज्यादा इम्युनिटी बढ़ाने की ही ज़रूरत है। जानकार तो इसे कैंसर की रोकथाम में भी कारगर बताते हैं।

ख़ास बात यह है कि यह आकार-प्रकार, नाम और कुछ हद तक स्वाद में भले ही जलेबी जैसी है लेकिन गुणों में चाशनी में डूबी जलेबी से बिल्कुल उलट है।  मैदे की जलेबी में शुगर के अलावा, न फाइबर होता है और न ही कोई और उपयोगी तत्व जबकि ये विलायती महोदया तो गुणों की खान हैं। इस फल में विटामिन सी, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, थायमिन, राइबोफ्लेविन जैसे तमाम तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसकी छाल के काढ़े से पेचिश तक ठीक हो जाती है। त्वचा रोगों और आँखों की जलन में भी इसे उपयोगी माना गया है। बताते हैं कि इस पेड़ की पत्तियों का रस दर्द निवारक का काम करता है….सबसे महत्वपूर्ण फर्क यह है कि चाशनी वाली जलेबी मधुमेह/डायबिटीज की वजह बन सकती है, वहीं विलायती जलेबी मधुमेह का इलाज है। कहा जाता है कि यदि महीने भर तक नियमित रूप से जंगल जलेबी खाई जाए तो शुगर नियंत्रित हो जाती है… तो फिर  इंतज़ार किस बात है,अभी ये विलायती मोहतरमा अपने परवान पर है..भरपूर फल लगे हैं...जाइए-खाइए और अपनों को भी खिलाइए।


# आप जंगल जलेबी खाकर उसके बीज यहां वहां थूंक रहे हैं तो जान लीजिए इसके 15 बीज का एक पैकेट फ्लिपकार्ट पर क़रीब 300 रुपए में बिक रहा है और Exotic Flora नाम की एक वेबसाइट प्रति पौधा 600 से 700 रुपए मांग रही है तो है न इन विलायती मोहतरमा में 'आम के आम, गुठलियों के भी दाम' वाली बात।

#विलायतीजलेबी  #जंगलजलेबी #विलायतीइमली  #गंगाजलेबी #Manilatamarind #madrasthron  #diabities  #cancer

मंगलवार, 5 नवंबर 2019

हम बड़ी ई वाले हैं...वाकई ई तो बड़ी ही है

हम बड़ी ई वाले हैं' व्यंग्य संग्रह पर विस्तार से चर्चा के पहले यह जानना जरूरी है कि इसे आप कैसे और कहां से खरीद सकते हैं क्योंकि पढ़ेंगे तो तभी न,जब खरीदेंगे... इसके प्रकाशक पल पल इंडिया हैं, कीमत किताब की गुणवत्ता और सामग्री के अनुसार मात्र 100 रुपये है, जो आज के संदर्भों में बहुत कम है। अमेजॉन पर उपलब्ध है, जिसका लिंक नीचे दिया गया है:
https://www.amazon.in/…/…/ref=cm_sw_r_wa_apa_i_d80mDbX3X8KST
अब आप ये सोच रहे होंगे कि पुस्तक समीक्षा का ये कौन सा तरीका है...सीधे खरीदने की बात,तो पुस्तकों और खासकर हिंदी पुस्तकों के सामने सबसे बड़ा संकट खरीददारों की कमी और मुफ़्तखोर पाठकों का है इसलिए अच्छी किताबे असमय दम तोड़ देती हैं इसलिए 'हम बड़ी ई वाले हैं' तत्काल खरीदिए-पढ़िए-पढ़ाइए ताकि लेखक का हौंसला बढ़े और प्रकाशकों का भी।
अब बात इस व्यंग्य संग्रह की...
किसी भी विधा का लेखन तभी सार्थक माना जा सकता है, जब वह अर्थवान हो. ऐसे में जब व्यंग्य लेखन की चर्चा में किसी संग्रह की चर्चा की जाए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है. हर युवा में जो बदलाव की चाहत होती है और जयप्रकाश नारायण की तरह वे क्रांति का बिगुल फूंकना चाहते हैं लेकिन समस्या होती है कि क्रांति करेंगे समाज में तो घर में दाल-रोटी के लिए जो क्रांति होगी, उसका समापन सुखद तो कतई नहीं होगा. मन में सुलगते सवाल और संकटों से घिरी जिंदगी के बीच विकास संचार के अध्येता युवा संजीव परसाई ने व्यंग्य लेखन को इन दो संकटों के बीच एक पाट के रूप में स्थापित कर लिया. जीवन का संकट और मन में बदलाव की चाहत के इस झंझावत में अपने आसपास घटती घटनाओं पर वे कलम से क्रांति करते दिखते हैं. नेताजी के ढोंग हो या तथाकथित सन्यासियों की रासलीला, खुद के प्रचार में रत लोगों की कहानी हो या उन सरकारी दफ्तरों की खाल उतारते हैं संजीव अपने हर एक व्यंग्य में. कोई ऐसा विषय नहीं छोड़ा है. वे मीडिया की नब्ज पर हाथ धरते हैं तो बाबूजी के जरिए उस पत्रकारिता पर भी टिप्पणी करने से गुरेज नहीं करते हैं जो स्वयं कई बार जिया है.
एक व्यंग्यकार की कामयाबी इसी बात को लेकर होती है कि वह स्वयं पर कितना हंस सकता है और संजीव के व्यंग्य का पाठ करते हुए हम पाते हैं कि वे दूसरों पर कम, स्वयं पर ज्यादा चुटकी लेते हैं. यह आसान नहीं है लेकिन जिसने व्यंग्य लेखन की इस बुनियाद को पकड़ लिया, उसकी लेखनी में वह तंज होता है जो भीतर तक जख्मी कर जाए. शायद इसलिए ही कहा गया है कि तीर-तलवार से ज्यादा गहरा घाव कलम करती है. संजीव का यह पहला व्यंग्य संग्रह ‘ई’ बड़ी वाले’ है. चूंकि वे किताब छपाने के लिए व्यंग्य नहीं लिखते हैं इसलिए लेखन का सिलसिला निरंतर जारी है. वे उन लोगों में भी नहीं हैं कि चलो, एक किताब आ जाए और संतुष्ट होकर घर बैठ जाएं. उनका लेखन, सिर्फ लेखन नहीं बल्कि उनके भीतर की पीड़ा है और वे समाज को अपनी पीड़ा से रूबरू कराना चाहते हैं. हमारी कामना होगी कि लेखन और धारदार व्यंग्य लेखन का यह सिलसिला बना रहे. ‘ई’ बड़ी वाले’ का हर पन्ना अर्थवान है और इस अर्थ को समझने के लिए दिमाग से नहीं दिल से पढ़ें।

जापान में लियोनार्डो दा विंची से मुलाकात....!!!!

जापान जैसा मैंने जाना-समापन क़िस्त
लगभग एक माह से आपके सहयोग और उत्साहवर्धन के फलस्वरूप मैं अपनी जी-20 शिखर सम्मेलन के कवरेज के लिए हुई जापान यात्रा को एक श्रृंखला में पिरो पाया।आपने भी हर पोस्ट में अपनी प्रतिक्रियाओं से आगे लिखने का हौंसला दिया। अब तक की सात पोस्ट में हमने जापान के खानपान, संस्कृति,सफाई और प्रबंधन सहित तमाम मसलों पर चर्चा की। इस समापन पोस्ट को शब्दों की जुगलबंदी की बजाए कुछ आकर्षक तस्वीरों के जरिए सजाने के प्रयास कर रहा हूँ। दरअसल जापान सरकार ने इस शिखर सम्मेलन में आये विदेशी मेहमानों के लिए एक अनूठी प्रदर्शनी लगायी थी जिसमें यहां की सांस्कृतिक विरासत से लेकर तकनीकी विकास तक को समाहित किया था। इसमें आप मोनालिजा सहित अनेक कालजयी कृतियों के लिए मशहूर चित्रकार लियोनार्डो दा विंची के सजीव स्टेच्यू से भी रूबरू हो रहे हैं।जापान श्रृंखला फिलहाल समाप्त,अगली यात्रा पर फिर कुछ नई जानकारियों के साथ बातचीत होगी। आइए, नज़र डालते हैं इन रोचक तस्वीरों पर….
#Japan #G20 #Osaka #PrimeMinister #LeonardoDaVinchi #Monalisa

ओसाका कैसल: जापानी वास्तुकला का एक सुंदर वसीयतनामा

जापान जैसा मैंने जाना-7

ओसाका कैसल या ओसाका महल निश्चित रूप से जापान में सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है। यह जापान के तीन सबसे प्रमुख महलों में से एक है। ओसाका कैसल के बारे में भले ही आपको मेरी जापान यात्रा की आखिरी कड़ियों में पढ़ने को मिल रहा हो लेकिन हक़ीक़त यह है कि मैंने ओसाका में सबसे पहले ओसाका कैसल ही देखा था। दरअसल जापान में हवाई अड्डे से हमारी सहयोगी (गाइड-दुभाषिया) ने इस महल की इतनी तारीफ़ कर दी थी कि हमने होटल जाने के बजाए पहले इस महल को देखने का फ़ैसला किया और अब मैं दावे से कह सकता हूँ कि हमने सबसे पहले ओसाका कैसल जाकर कोई गलती नहीं की।
लगभग 450 साल पुराना यह पाँच मंजिला महल देश के सबसे अधिक और सबसे प्राचीन दर्शनीय रचनाओं में शामिल है। ओसाका कैसल को हम पारंपरिक जापानी वास्तुकला का एक सुंदर वसीयतनामा कह सकते है। महल के अंदर प्रत्येक मंजिल पर ओसाका के व्यापक इतिहास को कलाकृतियों के माध्यम से प्रतिबिंबित किया गया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक सदियों से यह महल कई उल्लेखनीय ऐतिहासिक घटनाओं का मंच रहा है। ओसाका कैसल अपनी विशाल आकार वाली पत्थर की दीवार के लिए भी प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि इसके निर्माण में लाखों की संख्या में बड़े पत्थरों का उपयोग किया गया है।
यहाँ के इतिहास पर नज़र डाले तो ओसाका कैसल का निर्माण 1583 में जापान में तमाम कबीलों की एकता के पुरोधा टॉयोटोमी हिदेयोशी (Toyotomi Hideyoshi-1536 - 1598) ने किया था लेकिन 1615 के गृह युद्ध के दौरान यह जल गया। इसे तब टोकुगावा बाकुफ़ु (Tokugawa Bakufu-1603 - 1867) के शासनकाल के दौरान फिर से बनाया गया । इस महल और आग के बीच कुछ अज़ीब सा रिश्ता है तभी तो यह महल बार-बार आग का शिकार बनता रहा और फ़ीनिक्स पक्षी की तरह पुनः नवनिर्मित होता रहा है। बताया जाता है कि 1665 में बिजली गिरने के कारण इस महल को फिर काफी नुकसान पहुंचा। इतना ही नहीं, एक बार फिर बने इस महल में 1868 में फिर आग गई। बार बार आग लगने की घटनाओं के कारण इसके फिर से निर्माण का इरादा त्याग दिया गया लेकिन ओसाका के लोगों की प्रबल इच्छाओं के कारण, 1931 में इसे फिर से सजाया-संवारा गया । तब से यह महल बिना किसी क्षति के ओसाका का गौरव गान बन गया है और बार-बार जलने/नष्ट होने के बाद भी यह भव्य महल आज भी अपनी वैभवशाली विरासत को समझाने और दिखाने में कामयाब है। कहा तो यह भी जाता है कि प्रारंभिक काल में लकड़ी से बने इस महल की आंतरिक साज सज्जा सोने की थी।
ओसाका कैसल की सुन्दरता में चार चाँद इसके आसपास बना पार्क लगा देता है । लगभग 10 लाख वर्गमीटर में फैला ओसाका कैसल पार्क भी 1931 में बनाया गया था और यह पार्क चेरी ब्लॉसम फूलने के दौरान दुनियाभर के पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। ओसाका कैसल का एक अन्य आकर्षण,इसके आसपास बनी गहरी खाई है। इसमें चलने वाली रंग-बिरंगी नावों के जरिये भी यहाँ के प्राकृतिक वैभव से रूबरू हुआ जा सकता है। ओसाका कैसल परिसर में नौका विहार के दौरान दिल्ली के पुराने किले ने बोटिंग करने जैसा लगता है,हालाँकि यहाँ वाहनों का शोरगुल नहीं है जो दिल्ली में किसी भी पर्यटन स्थल का सबसे कड़वा सच है।
#Osaka #Japan #G20 #OsakaCastle #ओसाकामहल #फीनिक्स पक्षी #प्रधानमंत्री #PrimeMinister

ऑलंपिक खेलों की मशाल हाथ में.... एक सपना सच हो गया...!!

जापान जैसा मैंने जाना-6

अपन के हाथ में ऑलंपिक मशाल.. टोक्यो में 2020 में होने वाले ऑलंपिक खेलों की मशाल...वह भी वास्तविक,बिना किसी मिलावट के।इन तस्वीरों के गलियारे में थोड़ा और आगे बढ़ेंगे तो इन खेलों के शुभंकर ‘मिराइतोवा’ को भी आप मेरे साथ देख पाएंगे...लगता है मुझे यहाँ के हैप्पीनेस शुभंकर ‘बिलिकेन’की दुआएं मिल गयी हैं तभी तो सालभर पहले और यहाँ तक कि ऑलंपिक खेलों की आधिकारिक तौर पर मशाल यात्रा शुरू होने के पहले ही मशाल को हाथ में लेने का अवसर मिल गया. बिलिकेन को आप भूले तो नहीं न क्योंकि पिछली एफिल टावर वाली कड़ी में ही तो हमने उनकी चर्चा की थी.
बहरहाल,अब से ठीक साल भर बाद दुनिया भर के दिग्गज खिलाड़ी टोक्यो में 2020 में होने वाले ऑलंपिक खेलों में एक-एक पदक के लिए अपनी पूरी ताक़त दांव पर लगा रहे होंगे।...आखिर खेलों के इस महाकुम्भ में अपना जलवा दिखाने और अपने देश के राष्ट्रध्वज-राष्ट्रगान के साथ गर्व से सीना चौड़ा कर, सैकड़ों कैमरों की चकाचौंध का सामना करने के लिए ही तो वे सालों-साल अपनी यह ऊर्जा संजो कर रखते हैं। वहीँ, खिलाडियों ही नहीं,खेलों से दूर रहने वालों के लिए भी ऑलंपिक खेलों की मशाल थामना गौरव की बात होती है। मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे मशाल थामने के साथ साथ ऑलंपिक शुभंकरों के साथ तस्वीर लेने का मौका भी मिल गया। दरअसल, जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान जापान ने यहाँ आने वाले विदेशी मेहमानों के लिए एक विशाल प्रदर्शनी भी लगायी थी। इस प्रदर्शनी में ऑलंपिक मशाल,शुभंकर और खेलों के आयोजन में सहभागी बनने वाले रोबोट सहित तमाम चीजें उनके वास्तविक रूप-रंग-आकार और प्रकार में प्रदर्शित की गयी थीं ।
जापान की राजधानी टोक्यो में 24 जुलाई से 9 अगस्त 2020 तक ऑलंपिक खेल होंगे और इसके ठीक बाद 25 अगस्त से 6 सितम्बर के बीच पैरा ऑलिम्पक खेलों का आयोजन होगा। एकतरह से इन खेलों का काउंट डाउन शुरू हो गया है। आपको जानकर हैरानी होगी कि टोक्यो दो बार ऑलंपिक खेलों की मेजबानी करने वाला एशिया का पहला शहर है। वहीँ, जापान में चौथी बार ऑलंपिक खेलों का आयोजन हो रहा है ।
तस्वीरों में दिख रही इस गुलाबी-सुनहरे रंग की ओलंपिक मशाल को जापान के मशहूर डिजाइनर तोकुजिन योशीओका ने डिजाइन किया है। मशाल की डिजाइन यहाँ बहुतायत में मिलने वाले चेरी फूल से प्रेरित है। चेरी, अब हमारे देश में शिलांग सहित पूर्वोत्तर के कई शहरों में फूलने लगी है। हालाँकि जापान जैसी विविधता अभी हमारे देश में तो नहीं मिलती लेकिन इसके रंग यहाँ जरुर बिखरने लगे हैं और मेघालय की राजधानी शिलांग में तो जापान की तर्ज पर अब बाकायदा ‘चेरी ब्लोसम’ जैसे आयोजन भी होने लगे हैं।
यह मशाल जापान में अगले साल 26 मार्च से अपनी यात्रा शुरू कर 121 दिनों में पूरे देश का चक्कर लगाकर टोक्यो पहुंचेगी। खास बात यह है कि टोक्यो ओलंपिक खेलों की मशाल सिर्फ धावकों के लिए नहीं है, बल्कि हम-आप जैसे लोगों के लिए भी है । मशाल को लेकर दौड़ने के लिए 10 हजार लोगों का चयन किया जा रहा है और इसके लिए जापान ही नहीं दुनिया भर से लोग आवेदन कर रहे हैं। आप भी चाहे तो इसका हिस्सा बन सकते हैं।
इन ऑलंपिक खेलों का आधिकारिक शुभंकर मिराइतोवा है। जापानी कलाकार रियो तानिगुची द्वारा निर्मित इस शुभंकर को दो हजार से ज्यादा शुभंकरों के बीच से एक प्रतियोगिता के माध्यम से चुना गया है । मिराइतोवा का नाम जापानी शब्दों ‘मिराई’ और ‘तोवा’ को मिलाकर रखा गया है जिसका अर्थ ‘उम्मीदों भरा भविष्य’, वहीँ पैरा ऑलंपिक खेलों के शुभंकर का नाम सोमिटी है जिसका अर्थ है ‘शक्तिशाली’।
इन ऑलंपिक खेलों की एक अन्य खूबी यहाँ खेलों में हाथ बंटाने वाले रोबोट होंगे। ये भविष्य केन्द्रित(फ्यूचरिस्टिक) रोबोट न केवल खेलों में एथलीटों और दर्शकों का स्वागत करेंगे बल्कि खेलों के आयोजन स्थलों तक पहुँचने में भी सहायक बनेंगे। जापान इन खेलों के दौरान चार प्रकार के रोबोट की सहायता ले रहा है...तो तैयार हो जाइये, आधुनिकता और तकनीक के मिश्रण के साथ दुनिया के प्राचीनतम और सबसे प्रतिष्ठित खेल आयोजन का साक्षी बनने के लिए।
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जापान में एफिल टावर और पेरिस..!!!

जापान जैसा मैंने जाना-5

जापान में एफिल टॉवर या पेरिस और न्यूयार्क का सा नज़ारा... सुनकर आश्चर्य होता है न,मुझे भी हुआ जब बताया गया कि ओसाका, जहां जी- 20 शिखर सम्मेलन हुआ था, में एफ़िल टॉवर है!! बस फिर क्या था हमने ओसाका पहुंचकर सबसे पहला काम एफ़िल टॉवर देखने का किया। जब वहां पहुंचे तो एफ़िल टावर तो नहीं उसकी प्रतिकृति जरूर मिली लेकिन आकर्षण और लोकप्रियता के मामले में उससे एक कदम भी पीछे नहीं। दरअसल,ओसाका का सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ के शिनसेकाई (Shinsekai) इलाक़े में स्थित यह सुटेनक्कु टॉवर (Tsutenkaku Tower) है। इसे ओसाका का एफिल टावर कहा जाता है और हम समझने के लिए इसे दिल्ली के इण्डिया गेट और जनपथ मार्केट का मिला जुला रूप कह सकते हैं। जापानी शब्द सुटेनक्कु का मतलब स्काई रूट टॉवर है और यहाँ सुबह से लेकर रात तक स्थानीय और हम जैसे विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है। इसका कारण इस इलाक़े की रौनक, सुन्दर-रंग बिरंगी बनावट,सस्ता सामान मिलना और जापान से जुड़े स्मृति चिन्ह मिलने का सर्वप्रमुख स्थान होना है।
जब इस टावर के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि मूल टावर का निर्माण 1912 में हुआ था। मूल टॉवर के शीर्ष को पेरिस के एफिल टॉवर के समान ही बनाया गया था। 64 मीटर ऊंचा यह टावर उस समय एशिया की दूसरी सबसे बड़ी संरचना थी । 1943 में आग लगने से यह बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया इसलिए इसे यहाँ से हटा दिया गया था । बाद में, स्थानीय लोगों ने इसी स्थान पर नए टॉवर के निर्माण के लिए अभियान चलाया और तब जाकर 1956 में मौजूदा टावर अस्तित्व में आया। अब 103 मीटर ऊँचें, इस स्मारक को आर्किटेक्ट ताचू नितो ने बनाया था, जिन्होंने टोक्यो टॉवर भी डिजाइन किया था।
टॉवर की 4 और 5 वीं मंजिल तक जाकर पर्यटक ओसाका शहर की स्काई लाइन और पूरे शहर के विहंगम दृश्य का आनंद ले सकते हैं। इसके लिए 500 येन या तक़रीबन 400 रुपए टिकट लगती है। टॉवर में एक संग्रहालय भी है जहाँ ओसाका,इस इलाक़े और जापान की कला संस्कृति पर केन्द्रित भरपूर भंडार है। टॉवर को जब रात में रोशन किया गया है तो यहाँ पूरा इलाक़ा रंगबिरंगी रोशनी से सराबोर हो जाता है। यहाँ लोग बताते हैं कि टावर की रोशनी मौसम के साथ रंग भी बदलती है,साथ ही टॉवर पर लगी घड़ी जापान में सबसे बड़ी है।
शिनसेकाई (Shinsekai) इलाके की भी अपनी एक अलग कहानी है। बताया जाता है कि इसे ओसाका प्रीफेक्चर अर्थात ओसाका संभाग में एक मनोरंजन शहर के रूप में डिजाइन किया गया था, और मूल रूप से इसे न्यूयॉर्क और पेरिस शहरों की रंगीनियत और रूमानियत देने का प्रयास किया गया है। शिनसेकाई का शाब्दिक अर्थ भी है- नई दुनिया और अपनी आधुनिक छवि के कारण यह क्षेत्र वाकई ओसाका के लोकप्रिय स्थानों में से एक है।
शिनसेकाई क्षेत्र के चारों ओर आपको स्थानीय शुभंकर बिलिकेन (Billiken)की मूर्तियाँ और चित्र लगे दिखेंगे और बड़ी संख्या में लोग इन्हें खरीदते भी हैं । बिलिकेन को जापान में गुड लक का प्रतीक या अच्छी किस्मत देने वाला देवता माना जाता है इसलिए कहा जाता है कि बिलिकेन की मूर्ति के पैर छूने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। हमने भी छुए। बहरहाल सच्चाई जो भी हो लेकिन मेरे लिए तो ओसाका जाकर जी-20 जैसे बड़े कार्यक्रम को कवर करना ही किसी गुडलक से कम नहीं था इसलिए बिलिकेन से जुड़ी कहानी पर भरोसा करने में कोई बुराई नहीं है।

इस सोच के साथ कैसे करेंगे हम जापान की बराबरी..!!

जापान जैसा मैंने जाना-4

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि बढ़िया सूट-बूट पहने कोई व्यक्ति साइकिल चला रहा हो या कोई महिला साल-दो साल के बच्चे को लेकर साइकिल पर बाज़ार करने या ऑफिस जाने को निकली हो,वो भी बेखौफ-बिंदास-बेझिझक!..हमारे देश में कोई ऐसा करेगा तो शायद दूसरे दिन अख़बारों में उसकी फोटो छप जाए लेकिन जापान में यह आम बात है. ओसाका,जहाँ जी-20 देशों का शिखर सम्मेलन हुआ था,वहां बड़ी संख्या में महिला/पुरुष/युवा/बच्चे सभी बड़े आराम से साइकिल पर घूमते नजर आते थे और वहां के लोगों से बातचीत में पता चला कि पूरे जापान में साइकिल के प्रति इसीतरह का प्रेम है.
न गाड़ियों की कर्कश चिल्लपों, न बेतहाशा भागते लोग एवं वाहन और न ही रेड लाइट पर हमारे जैसी चीख-पुकार...सब कुछ सुकून/शांति/आराम और सम्मान से....सम्मान पैदल यात्रियों का और सम्मान साइकिल सवारों का. जापान साइकिल की सवारी के मामले में भले ही दुनिया मे नीदरलैंड,डेनमार्क और जर्मनी जैसे देशों से पीछे हो लेकिन शायद हम से बहुत आगे है. हमारे देश में दुनिया भर में कुल साइकिल उत्पादन का 10 फीसदी हिस्सा बनता है लेकिन साइकिल चलाना हमें गंवारा नहीं है. जापान के सिर्फ ओसाका शहर में ही 10 लाख से ज्यादा साइकिल हैं जबकि आबादी हमारे भोपाल जैसी ही मतलब 18-20 लाख के आसपास है. यदि हम ओसाका की तुलना भोपाल से करें तो साइकिल को लेकर मानसिकता साफ़ जाहिर हो जाती है. भोपाल में साइकिल चलाने के लिए आम लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए स्मार्ट साइकिल सर्विस शुरू की गयी थी. अब तक इसके लिए महज 65 हजार लोगों ने ही रजिस्ट्रेशन कराया है और प्रतिदिन औसतन 1200 लोग ही साइकिल चलाते हैं. वैसे इसमें निजी तौर पर साइकिल चलाने वालों की संख्या शामिल नहीं है लेकिन वो भी कितनी होगी? दरअसल साईकिल चलाने के लिए मानसिकता चाहिए और हमारे यहाँ तो साइकिल गरीबी की पहचान है. अब भले ही मोटापे से मुक्ति,तोंद से छुटकारे और डाक्टर की सलाह पर मन मारकर साइकिल चलाने लगे हैं लेकिन वे भी बस पार्क या घर के आसपास तक ही सीमित हैं तभी तो जब कोई सांसद/विधायक साइकिल पर संसद/विधानसभा पहुँच जाता है तो वह खबर बन जाता है जबकि जापान जैसे देशों में यह सामान्य बात है.
जापान में हर व्यक्ति दिनभर में औसतन 15 प्रतिशत यात्राएँ साइकिल से ही करता है और यक़ीनन जापानियों की छरहरी काया का राज भी यही है। ओसाका में मुझे तो कोई तोंद वाला और बेढब काया वाली महिला नज़र नहीं आयी। अब आप कह सकते हैं सूमो पहलवान भी तो जापानी हैं लेकिन वह एक अलग नस्ल है और यहां हम जापान के सामान्य लोगों की बात कर रहे हैं। हाल के वर्षों में यहां 10 लाख से अधिक बाइक(साइकिल) हर साल बेची जाती हैं। जापान में मोटरसाइकिलों के विकल्प के रूप में साइकिल का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। बहुत सारे लोग ट्रेन स्टेशनों पर सवारी करने के लिए उनका उपयोग करते हैं। आजकल अधिक से अधिक जापानी ट्रैफिक जाम और भीड़ वाली ट्रेनों से बचने के लिए साइकिल चला रहे हैं। हर जगह साइकिल खड़ी करने के लिए बाकायदा साईकिल स्टैंड बने हुए हैं- माल में,ऑफिसों में,आम बाज़ारों में,फुटपाथ पर,बस स्टाप पर सभी जगह आधुनिक साइकिल स्टैंड हैं. लोग नियम से साइकिल पार्क करते हैं और ज़ेबरा क्रासिंग पर लोग लालबत्ती होने का इंतजार नहीं करते बल्कि साइकिल और पैदल यात्रियों को सुकून और शांति से निकलने देते हैं. वाहनों की लाइन होने के बाद भी कोई हार्न बजा-बजाकर पूरे इलाक़े को सर पर नहीं उठाता बल्कि आगे बढ़ने के लिए चुपचाप अपनी बारी का इंतज़ार करता है।
...और अंत में सबसे सुखद अहसास..यहाँ लड़कियां और महिलाएं अपने मन मुताबिक कपड़े पहनकर मन चाहे समय तक पैदल और साइकिल पर घूमती हैं लेकिन उन पर कोई फब्ती नहीं कसता,कोई आंख फाड़ फाड़कर नहीं देखता,कपड़ों की आड़ लेकर कोई बलात्कार नहीं करता और उन्हें नारीत्व को लेकर कोई शर्म का अहसास नहीं कराता...बस यहीं हम बहुत पीछे हैं और शायद कभी जापान की बराबरी भी न कर पाएंगे।
#Japan #G20 #Osaka #Bicycle #Car #Cycle

जब पनीर समझकर सुअर सेंडविच खा गए एक बाईट-वीर...!!!

जापान जैसा मैंने जाना-3

जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन को कवर करने जापान पहुंचे दुनियाभर के पत्रकारों के लिए ओसाका में बने इंटर-नेशनल मीडिया सेंटर में एप्पल सेंडविच और पाइन-एप्पल पेटिस पर हाथ साफ़ करते हुए हमारे एक पत्रकार साथी ने पनीर-क्रीम सेंडविच का बड़ा सा पीस मुंह में ठूंसते हुए कहा-बहुत ही जोरदार है,आप भी लीजिए! अपन ठहरे लकीर के फ़क़ीर...हर डिश को समझकर-पढ़कर खाने वाले,इसलिए उनकी सलाह पर अमल से पहले एक चक्कर लगाकर उस सेंडविच का नाम तलाशा तो उस पर जो लिखा था उसका मतलब पूछने पर पता चला कि वह सेंडविच सुअर के मांस की है!! अब उन पत्रकार मित्र का हाल मत पूछिये क्योंकि तब तक वे आधी से ज्यादा सेंडविच हलक से नीचे उतार चुके थे और अब न उगलते बन रहा था और न ही निगलते.
हालाँकि, इसमें उस बेचारे की भी कोई गलती नहीं थी क्योंकि यदि मैं आपसे कहूँ कि सुशी, साशिमी, टेम्पुरा,याकीतोरी,उडोन,सोबा,कैसेकी,सुकीआकी, सुकमोनो अचार और मिसो सूप...इन नामों को सुनकर कुछ समझ आया..तो आप भी आश्चर्य से पलकें झपकाते रह जाएंगे क्योंकि जब मुझे जापान जाने के बाद भी समझ नहीं आया तो आप खाली नाम पढ़कर कैसे समझ सकते हैं...चलिए इस पहेली को आसान बनाते हैं..दरअसल ये सभी नाम जापान के सबसे लोकप्रिय और लज़ीज़ व्यंजनों के हैं और बड़ी संख्या में तमाम देशों के लोग इनका स्वाद चखने के लिए जापान जाते हैं. जी-20 देशों के महारथियों को भी ये और इनके साथ दर्जनों अन्य व्यंजन परोसे गए थे. व्यंजन तो छोड़िये, दुनिया के इन सबसे ताकतवर मुल्कों के प्रतिनिधियों के लिए 100 से ज्यादा प्रकार के शेक,24 प्रकार की चाय, 8 प्रकार की काफ़ी, दर्जन भर से ज्यादा प्रकार की बीयर,17 प्रकार की वाइन,12 तरह के साफ्ट ड्रिंक,30 प्रकार की देशी मदिरा-शोचु परोसी गयी. शोचु गन्ना, शकरकंद, ज्वार,चावल जैसे कई अनाज और फलों से बनती है. तक़रीबन दौ सौ से ज्यादा व्यंजनों और ड्रिंक्स की सूची में मुझे बस चावल, दार्जिलिंग टी, आइस टी,काफ़ी जैसे कुछ नाम ही समझ आए.
वैसे, शायद कम ही लोग जानते होंगे कि जापानी भोजन दुनिया में काफी लोकप्रिय है और इसका कारण यह है कि पारंपरिक जापानी खाने में पाँच नियमों को ध्यान में रखकर विविधता और संतुलन पर जोर दिया जाता है। इन नियमों के अंतर्गत खाने में पांच रंगों (काला, सफेद, लाल, पीला और हरा), खाना पकाने की पांच तकनीकों (कच्चा भोजन, ग्रिलिंग, स्टीमिंग, उबालना और तलना) के साथ साथ पांच स्वाद (मीठा, मसालेदार, नमकीन, खट्टा और कड़वा) का खास ध्यान रखा जाता है। यहाँ तक कि सूप और चावल बनाते समय भी इन नियमों का पालन किया जाता है। इसके अलावा ताज़ी और उच्च गुणवत्ता वाली मौसमी कच्ची सामग्री का इस्तेमाल के साथ साथ नफ़ासत के साथ परोसने के कारण भी जापानी खान-पान के मुरीद बढ़ रहे हैं।
अब यदि आप हिन्दू वेजीटेरियन (जैसा कैथी पैसिफिक एयरलाइन्स में पूछा गया था) जैसे किसी खूंटे से नहीं बंधे हैं तो जापान में आपकी जीभ के लिए भरपूर गुंजाइश है जो मछली-मटन-चिकन से आगे बढ़कर सुअर,गाय और सी फूड में ऑक्टोपस-केंकड़े और कई प्रकार के कीड़े मकोड़े का भी स्वाद ले सकती है. ऐसा भी नहीं है कि शाकाहारियों के लिए जापान में भूखे मरने की नौबत आ सकती है क्योंकि ब्रेड-बटर तो सामान्य रूप से हर जगह उपलब्ध है. फिर तमाम नुडल्स,जूस,फल का आनंद भी लिया जा सकता है. अब तो अनेक भारतीय रेस्तरां यहाँ खुल गए हैं जो आपको भारतीय स्वाद में भारतीय खाना परोस रहे हैं और कई जापानी भी इस खाने के दीवाने हैं. यहाँ तक कि कुछ होटलों में पहले से बता दिया जाए तो जैन भोजन भी मिल जाता है इसलिए यदि जापान जाने का मन बना लिया है तो बेख़ौफ़ और बेझिझक जाइए क्योंकि दाल-चावल-रोटी तो घर में मिल ही जाती है लेकिन जब देश से बाहर आये हैं तो सुशी, साशिमी, टेम्पुरा,याकीतोरी का भी लुत्फ़ उठाया जाए क्योंकि ये सब थोड़ी हमारे देश में आसानी से मिलेंगे.
#G20 #Japan #FoodofJapan #Osaka #Sushi #Sashimi #Rice #DalChawal

आर यू सिंपल वेजीटेरियन या हिन्दू वेजीटेरियन?

जापान जैसा मैंने जाना-2

कैथी पैसिफिक एयरलाइन्स के विमान में खाना परोसते हुए एयर होस्टेस ने पूछा- यू आर वेजीटेरियन? मेरे हाँ कहते ही उसने तत्काल दूसरा सवाल दागा- विच टाइप आफ वेजीटेरियन....मीन्स सिंपल वेजीटेरियन या हिन्दू वेजीटेरियन? अपनी लगभग ढाई दशक की नौकरी में यह सवाल चौंकाने वाला था क्योंकि अब तक तो शाकाहारी का एक ही प्रकार अपने को ज्ञात था। अब शाकाहार भी हिन्दू-मुस्लिम टाइप होता है इसकी जानकारी जापान यात्रा के दौरान ही मिली। खैर मैंने बताया कि हिन्दू वेजीटेरियन तो उसने कहा कि आपको 20 मिनट इंतज़ार करना होगा क्योंकि मुझे आपके लिए खाना पकाना पड़ेगा ! अब सोचिए विदेशी विमान में कोई विदेशी व्योमबाला (एयर होस्टेस) कहे कि मैं आपके लिए खाना बनाकर लाती हूँ तो दिल में लड्डू फूटना स्वाभाविक है। लगभग 20-25 मिनट के इंतज़ार के बाद वह बटर में बघारी हुई खिचड़ी,चने की दाल और रोटी के नाम पर ब्रेड के टुकड़े लेकर हाज़िर हुई। उसने भरसक प्रयास किया था कि खाना स्वादिष्ट रहे और अपन ने भी दबाकर खा लिया ताकि उसे भी महसूस हो कि खाना स्वादिष्ट ही था।..खैर इस एक किस्से से यह तो साफ़ हो गया था कि जापान में शाकाहार के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और दूसरा यह कि यात्रा पर रवानगी से पहले इष्ट मित्रों की बात सही लग रही थी जो उन्होंने अपने और अपनों के अनुभव के आधार पर बताई थी कि जापान में तुम्हें उपवास करना पड़ सकता है।
अब जब मैदान में कूद पड़े तो फिर जंग से क्या डरना इसलिए जो जैसा मिलेगा-काम चला लेंगे, के अंदाज़ में मन बना लिया...अब निश्चित ही आप सभी के मन में यह सवाल उछल रहे होंगे कि फिर वहां क्या खाया तो सबसे पहले तो सुन और जान लीजिए कि हमने वहां शाही पनीर, दाल मखनी, रसगुल्ला, गुलाब जामुन, खिचड़ी, सोन-पापड़ी, आलूबंडा, पोहा,उत्पम और इडली सहित वो सब कुछ खाया जो यहाँ भारत में खाने को मिलता है और उतना ही स्वादिष्ट क्योंकि...‘मोदी है तो मुमकिन है।’
जी हाँ,इसमें जरा भी गलत नहीं है क्योंकि जापान में प्रधानमंत्री श्री मोदी के कारण ही यह मुमकिन हुआ। दरअसल हमारे प्रधानमंत्री ठहरे हम से ज्यादा शाकाहारी इसलिए जापान की जिस होटल में हम लोग ठहते थे, उसने भारत से खासतौर पर रसोइए बुलाए थे और जब रसोइए भारतीय थे तो स्वाद भी भारतीय था और अंदाज़ भी, लेकिन जापान में खाने का मामला इतना सीधा भी नहीं था क्योंकि इस कहानी का दूसरा हिस्सा भी है जिसमें ज़रूर जापान में शाकाहारी खाने के संकट का अहसास होता है। दरअसल होटल में तो भारतीय रसोइए की मेहरबानी से शाकाहारी भोजन मिल गया लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया सेंटर में तो दुनियाभर के लोगों का ध्यान रखा गया था इसलिए वहां शाकाहार और विशेष तौर पर हिन्दू शाकाहार(!) कहीं पीछे रह गया। मीडिया सेंटर में अपना खाना तो दूर अपनी चाय (वही दूध-शक्कर और पत्ती की जुगलबंदी से भरपूर खौलने के बाद तैयार) के लिए भी तरसना पड़ा। वैसे तो जापान में वीआईपी मेहमानों को 24 प्रकार की चाय उपलब्ध थी जिसमें कई अबूझ नामों के बीच हमारी दार्जिलिंग चाय और आइस टी जैसे कुछ जाने माने नाम भी शामिल थे लेकिन वही अपनी असल कड़क-खौलती चाय नहीं थी। चाय के अलावा कॉफ़ी के भी दर्जन भर प्रकार थे जिनमें ओसाका के स्थानीय ब्रांड के अलावा ‘20 देशों के 20 दाने’(20 beans of 20 countries) जैसी उत्तम किस्म की कॉफ़ी भी थी लेकिन दिक्क़त यहाँ भी दूध की थी और बिना दूध के कड़वी कॉफ़ी को हलक से नीचे उतारना अपने लिए तो किसी सज़ा की तरह है। हालाँकि यहाँ कॉफ़ी के एक प्रकार कॉफ़ी लैटे ने मदद की क्योंकि इसमें पर्याप्त दूध होता है और इसतरह कुछ हद तक चाय- कॉफ़ी का संकट दूर हुआ।
अगली कड़ी में बात जापान के खान-पान की।

अपना सा ही लगता है जापान

जापान जैसा मैंने जाना -1
भोपाल के श्यामला और अरेरा हिल्स और दिल्ली में रायसीना हिल्स की तरह के पहाड़ी इलाक़े,सफाई में हमारे इंदौर से भी आगे और परिवहन व्यवस्था में मुंबई से कई गुना बेहतर व्यवस्थित मेट्रो-बस-टैक्सियां, सड़कों पर सुकून से साइकिल चलाते महिला-पुरुष और हर अजनबी का हल्की मुस्कराहट से स्वागत करते लोग...ये ओसाका है-जापान का दूसरा सबसे बड़ा शहर और 28-29 जून को हुए दुनिया की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के समूह जी- 20 शिखर सम्मेलन का मेजबान शहर।
ओसाका (Osaka) का अर्थ ही है ‘बड़ी सी पहाड़ी और ढलान’। जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है कि अपने इन्हीं उतार चढाव के कारण ओसाका हमें भोपाल और दिल्ली का सा आभाष देता है।
अपनी जापान यात्रा पर कुछ लिखने की शुरुआत किसी शहर के परिचयात्मक उल्लेख से ? यह बात कई लोगों को शायद रास न आए लेकिन ऐसा करने का उद्देश्य यह है कि कम से कम वे लोग भी जापान के ओसाका शहर को और इसके महत्व को समझ सकें जिनके लिए जापान का मतलब बस टोकियो है और वह भी हमारी ‘लव इन टोकियो’ मार्का फिल्मों के जरिये मिले ज्ञान से या फिर हिरोशिमा-नागासाकी बमबारी की घटना के सन्दर्भ में…. जापान को पहचानते हैं।
खुद सोचिए, जापान जैसा तकनीकी संपन्न और विकसित देश यदि दुनिया की 20 महाशक्तियों की मेजबानी का गौरव टोकियो से इतर अपने किसी शहर को देता है तो ज़ाहिर सी बात है कि वह शहर अपने आप में खास होगा और जब बात ओसाका शहर की हो तो मामला खासमखास हो जाता है।
ओसाका वास्तव में जापान का एक बड़ा बंदरगाह शहर और वाणिज्यिक केंद्र है। जब हम जापान के कंसाई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से बाहर निकले तो एक ओर जापानियों के स्वभाव की तरह शांत और विशाल समुद्र था तो दूसरी ओर घर और कल- कारखाने। हवाई अड्डे की लंबाई चौड़ाई का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ एक गेट से दूसरे गेट तक जाने के लिए भी ट्रेन का सहारा लेना पड़ता है। एक और खास बात यह है कि हवाई अड्डे से ओसाका शहर तक का लगभग पूरा सफर समुद्र के ऊपर बने फ्लाईओवर पर ही करना पड़ता है। इसे मानव निर्मित सबसे बड़ा द्वीप भी कहते हैं क्योंकि इसके जरिये यहाँ समुद्र का बेहतर उपयोग भी हो रहा है।
यह अपनी आधुनिक वास्तुकला, नाइट-लाइफ़, ऊँची-ऊँची इमारतों,रौशनी से नहाई सड़कों और लज़ीज़ स्ट्रीट फूड के लिए भी जाना जाता है। ओसाका दुनिया के अग्रणी शहरों में शामिल है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैसे तो ओसाका जापान के केंद्र में स्थित है और यहाँ के अहम महानगरों और जिलों में से एक है। लेकिन यह अपने आप में एक प्रान्त है जो लगभग 33 शहरों तथा 9 क़स्बों में विभाजित है। ओसाका प्रान्त की आबादी लगभग 80 लाख है और यहाँ तक़रीबन 2 लाख विदेशी नागरिक है जिनमें लगभग 3 हजार भारतीय हैं। वैसे ओसाका शहर की आबादी भी तक़रीबन 18 लाख है।
हम यहाँ जून माह के आखिरी दिनों में थे और तब भी यहाँ के लोग गर्मीं से बचने के लिए हाथ में बैटरी से चलने वाला छोटा सा पंखा लेकर घर से निकलने लगे थे। हालाँकि तापमान 26 से 27 डिग्री के बीच था और जापानियों के हिसाब से गर्मी शुरू हो रही थी । उन्हें क्या पता कि हम 45 डिग्री तापमान में भी घर से बाहर रहने वाले देश से आये हैं और 27-28 डिग्री तापमान तो हमारे लिए ठण्ड में रहता है। वैसे यहाँ लोग बताते हैं कि ओसाका में ठंड आम तौर पर कम पड़ती है और जनवरी के सबसे ठंडे महीने में भी तापमान 9.3 डिग्री सेल्सियस रहता है। बारिश का मौसम जून से जुलाई तक और गर्मियों में अधिकतम तापमान 33 डिग्री सेल्सियस तक जाता है। कुल मिलाकर ओसाका के जरिये हम जापान की जीवनशैली,आधुनिकता,विकास और विरासत को काफी हद तक समझ सकते हैं।
अगली किस्तों में बात करेंगे जापान की कुछ और जानी-अनजानी खूबियों की।
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कुत्ते की राखी…कीमत सुनकर आप चौंक जाएंगे!

हाल ही में कृति सेनन से जुड़े एक राखी विज्ञापन को लेकर खूब विवाद हुआ। विज्ञापन में कृति के कपड़ों से लेकर उसके कथित सांस्कृतिक संदेश तक पर ब...