रविवार, 18 जनवरी 2026

देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क पर सफ़र !!


बर्फ के बीच हाड़ कंपाती ठंड, मूसलाधार बारिश, आए दिन हो रहे भूस्खलन, पहाड़ से गिरते पत्थरों के बीच न डायनामाइट, न जेसीबी, न कोई ड्रिल मशीन..बस छैनी- हथौड़ी…और इंसानी हौंसला। मौत के साए में दिन रात बिना रुके काम करते हुए 18 हज़ार मज़दूरों ने मौसम की बेदर्दी और पहाड़ की कठोरता पर जीत हासिल कर दिखाई और बना दी देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क। इसी सड़क पर हमें एनाकोंडा के चट्टानी रूप से भी रूबरू होने का मौका मिलता है।

हम बात कर रहे हैं राष्ट्रीय राजमार्ग-5 की। यह केवल एक सड़क भर नहीं, बल्कि इतिहास, साहस और रोमांच की जीवित धरोहर  है। यह इंसानी जिद का प्रमाण है। जिसमें महज हाथों ने असंभव को संभव बनाते हुए न केवल मजबूत पहाड़ों को काट डाला बल्कि झुकने पर भी मजबूर कर दिया। कभी हिंदुस्तान-तिब्बत रोड कहलाने वाली यह सड़क कालका से शुरू होकर शिमला, रामपुर, किन्नौर और शिपकिला दर्रे तक जाती है। लगभग 450 किलोमीटर लंबी यह पहाड़ी राह सतलुज नदी के साथ-साथ चलती हुई हिमालय के सबसे दुर्गम और सुंदर इलाकों से गुजरती है।

यह एक ऐसी सड़क है, जो हमें प्रकृति की विराटता, मानव साहस और इतिहास की गहराइयों से जोड़ देती है। सड़क कभी इतनी संकरी हो जाती कि लगता—अब आगे कुछ नहीं है। एक के बाद एक खतरनाक अंधे मोड़, सीधी खड़ी चट्टानों, सैकड़ों फीट नीचे पूरे वेग से बहती सतलुज नदी और सामने से एकाएक आ जाने वाले वाहनों के कारण हाथ अनायास ही स्टीयरिंग पर कस जाते हैं और सांसें खुद-ब-खुद धीमी हो जाती हैं।

हिमाचल प्रदेश की इस अनूठी सड़क की कहानी शुरू होती है 1850 में जब भारत पर अपने शासन प्रशासन की पकड़ मजबूत करने के बाद अंग्रेज सरकार ने व्यापार व्यवसाय पर अपना ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। तब तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने भारत को तिब्बत से जोड़ने के लिए इस महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना को हाथ में लिया। ब्रिटिश हुकूमत का प्राथमिक उद्देश्य भारतीय वस्तुओं को तिब्बत के रास्ते आगे तक बेचना और वहां से जरूरी सामान की भारत तक आवाजाही सुनिश्चित करना था। कहा तो यह जाता है कि खुद लॉर्ड डलहौजी ने इस भारत तिब्बत सड़क की शुरुआती रूपरेखा (डीपीआर) तैयार की और फिर इस सड़क का ब्लूप्रिंट ब्रिटिश आर्मी के कमांडर इन चीफ सर चार्ल्स नेपियर को सौंपा। इसमें मेजर ब्रिग्स की भी अहम भूमिका थी।

इस परियोजना पर अमल आसान नहीं था क्योंकि 1850 में जब इस सड़क का निर्माण शुरू हुआ था तब न तो आज की तरह पहाड़ों का सीना चीर देने वाली मशीन थीं और न ही ब्लास्टिंग तकनीक। तब केवल हाथों में छैनी और हथौड़ी लिए

आत्मविश्वास से भरपूर इंसान थे। अंग्रेजों ने सड़क निर्माण में 18 हजार भारतीय मजदूरों को अनजान से पहाड़ के सामने खड़ा कर दिया। जान की परवाह किए बिना इन मजदूरों ने अपने हाथों से विशाल पहाड़ काट दिया। उन्होंने न तो कड़कड़ाती ठंड की परवाह की,न बर्फबारी उनका हाथ रोक पाई और न ही भूस्खलन और मूसलाधार बारिश से उनके हौसलों पर कोई फर्क पड़ा। इस दुर्गम लक्ष्य को हासिल करने के दौरान कई श्रमिकों को अपना बलिदान देना पड़ा। कभी पहाड़ से गिरते भारी भरकम पत्थरों के नीचे दबकर, तो कभी प्राकृतिक आपदाओं का शिकार बनकर 122 मजदूरों को जान गंवानी पड़ी। इनकी स्मृति में जेओरी में एक गुमनाम सा स्मारक भी है।


वैसे तो यह पूरी सड़क अपने आप में मानवीय कुशलता,इंजीनियरिंग और श्रम का उत्कृष्ट नमूना है लेकिन इसमें भी सबसे खास है तरंडा ढांक क्योंकि किन्नौर जिले के इस इलाके में करीब ढाई किलोमीटर पहाड़ को बीच से काटकर सड़क बनाई गई है और पहाड़ का यह टुकड़ा विशाल एनाकोंडा के सिर की तरह नज़र आता है। यहां पहाड़ ही सड़क है और पहाड़ ही आपकी छत। इसके बीच से निकलती गाड़ियां ऐसी लगती हैं जैसे पहाड़ ने अपना जबड़ा खोलकर उन्हें रास्ता दिया हो। सड़क के इस अविश्वसनीय भाग के निर्माण का श्रेय एक भारतीय इंजीनियर राजबहादुर सिंह को दिया जाता है। हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग में कार्यरत राजबहादुर सिंह ने हिमाचल के कई दुर्गम क्षेत्रों में सड़कों का जाल फैलाया।

इस सड़क के निर्माण में एक स्थानीय व्यक्ति बाबा भलकू का भी अतुलनीय योगदान बताया जाता है। बाबा भलकू को पहाड़ों की बनावट और भूगोल ज्ञान का गहरा अनुभव था। उन्होंने हिंदुस्तान-तिब्बत रोड के सर्वेक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वजह है कि मशोबरा के ऊपर एक सड़क का नाम भी उनके सम्मान में भलकू रोड रखा गया है।

सड़क को बनने में भले ही कई साल में लग गए लेकिन तब से अब तक यह सड़क हिमाचल को सालाना लाखों करोड़ों रुपए का व्यापार देती आ रही है।  हम इसे हिमाचल की आर्थिक जीवन रेखा या इकोनॉमिक लाइफलाइन ऑफ हिमाचल भी कह सकते हैं। इस सड़क ने न केवल हिमाचल प्रदेश को व्यापार से जोड़ा बल्कि पूरे उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयां प्रदान की।  


दरअसल,उस समय ब्रिटिश हुकूमत का मकसद तिब्बत तक अपने व्यापार और प्रभाव को बढ़ाना था। तिब्बत के व्यापारी उस समय रेशम, ऊन, नक्काशीदार वस्तुएं,चमड़े का सामान,नमक और बेशकीमती मखमल लाते थे जबकि भारत के व्यापारी चावल,तेल,फल,सूखे मेवे और  किन्नौरी राजमा सहित तमाम चीजें वहां भेजते थे । शिमला जिले के रामपुर में अभी भी लगने वाला पारंपरिक लवी मेला इस व्यापार का गढ़ होता था। लवी मेला आज भी हिमाचल प्रदेश के सबसे पुराने मेलों में शामिल है। इस सड़क ने परस्पर व्यापार को नई ऊंचाइयां प्रदान की और इसी वजह से तब इसे लोगों ने सिल्क रुट ऑफ़ द हिमालय कहना भी शुरू कर दिया था।

इस सड़क की असली उपयोगिता 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान साबित हुई। बताया जाता है कि उस समय भारतीय सेना के पास सीमावर्ती इलाकों तक पहुंचने का यही एकमात्र रास्ता था और गोला बारूद से लेकर जवानों एवं राशन भेजने के लिए भी इसी रास्ते का इस्तेमाल हुआ। तब यह सड़क देश के लिए रणनीतिक जीवन रेखा बन गई थी। 


युद्ध के दौरान इस सड़क के महत्व को देखते हुए इसके रखरखाव की जिम्मेदारी सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को सौंप दी गई । वैसे इस सड़क की मजबूती और शानदार रखरखाव के महत्व का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सन 2000 में किन्नौर में सतलुज नदी में आई भयंकर बाढ़ के दौरान तमाम सड़कें टूट गई लेकिन यह सड़क लोगों की उम्मीद और राहत का जरिया बनी रही।

यह सड़क अब किन्नौर के सबसे मीठे, क्रिस्पी और लज़ीज़ सेब और मटर का मीठा स्वाद देश के अन्य इलाकों तक पहुंचाने का माध्यम है। यह हमें देश के सबसे अच्छे राजमा और चिलगोजा उपलब्ध कराती है। आर्थिक एवं रणनीतिक महत्व के कारण यह सड़क देश की किसी भी आधुनिक सड़क से पीछे नहीं है। अब जब भी आप इस सड़क से गुजरे तो हजारों श्रमिकों के परिश्रम और अनुकरणीय इंजीनियरिंग को याद करना नहीं भूलें। हिंदुस्तान-तिब्बत रोड पर चलना सिर्फ ड्राइव नहीं है—यह हिमालय से आमने-सामने संवाद है। अगर आप रोमांच चाहते हैं, डर से दोस्ती करना चाहते हैं और इतिहास को महसूस करना चाहते हैं तो इस सड़क पर एक बार ज़रूर चलिए।

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व पर सनातन का जयघोष

सनातन संस्कृति का जयघोष करती अरब सागर की लहरें, हवा में 'हर-हर महादेव' के जयकारों के बीच आस्था का सैलाब लेकर आराधना में जुटे हजारों श्रद्धालु, डमरूओं की मधुर ध्वनि के साथ 'ओम नमः शिवाय' के जाप से सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर पूरा परिसर, महादेव के स्वर्ण कलश की आभा को सौ गुना बढ़ाती दिलकश साज सज्जा एवं इन सभी के बीच खड़ा एक ऐसा अनूठा, दिव्य,भव्य और प्रतिष्ठित मंदिर… जो समय की हर चुनौती को गरिमा के साथ पार करता आ रहा है।

हम बात कर रहे हैं देवों के देव महादेव के सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ की और यहां आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व की। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर न सिर्फ भारतीय सांस्कृतिक विरासत में अहम धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक है। यह मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि विनाश और पुनर्निर्माण की, आस्था और संघर्ष की एक जीवंत कहानी है ।   सोमनाथ मंदिर की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे सीधे पौराणिक काल से जुड़ी हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक चंद्रमा ने खुद इस मंदिर की स्थापना की थी, ताकि शिव की कृपा पाकर श्राप से मुक्ति पा सकें। यह क्षेत्र आस्था के लिहाज से इतना अहम है कि भगवान कृष्ण ने भी यहीं से लीला समाप्त कर स्वर्गारोहण किया था ।

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में कहा गया है कि,  ‘सौराष्ट्रे सोमनाथं च, श्री शैले मल्लिकार्जुनम्, उज्जयिन्यां महाकालम् ॐ कारम अमलेश्वरम्।’ अर्थात् जब भारत के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों का वर्णन होता है, तब सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। यह भारत की संस्कृति में सोमनाथ के अग्रिम स्थान तथा उसके अविनाशी, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व को दर्शाता है। 

सोमनाथ मंदिर की अपार संपदा, श्रद्धालुओं की इस मंदिर पर आस्था, अरब सागर के किनारे देश के रक्षा द्वार के रूप में इसकी सशक्त मौजूदगी और सनातन की मजबूत पहचान विदेशी आक्रमणकारियों की आंखों में हमेशा गड़ती रही । वे बार बार हमले कर भारतीय संस्कृति को नेस्तानाबूद करने का दुष्प्रयास करते रहे । सबसे पहले 1026 में आज से एक हजार साल पहले अफगानिस्तान महमूद गजनवी ने लूट-पाट के लिए मंदिर पर बर्बर हमला किया और लाखों करोड़ों का सोना, चांदी, हीरे जवाहरात लूट लिए। 

यह एक ऐसा वर्ष था जो इतिहास की किताबों में काले अक्षरों से दर्ज है एवं इसी ने मौजूदा स्वाभिमान पर्व की नींव रखी। लेकिन गजनवी का वहशीपन न सोमनाथ मंदिर का कुछ बिगाड़ पाया और न ही भारतीय समाज की आस्था को डिगा पाया। मात्र कुछ दशकों में, गुजरात के राजा भीमदेव सोलंकी ने इसे फिर से वैभवशाली स्वरूप प्रदान कर दिया ।

मंदिर में फिर लूट का सिलसिला चल पड़ा। करीब दर्जन भर से ज्यादा बार मंदिर पर हमले हुए। कभी अलाउद्दीन खिलजी, दिल्ली सल्तनत के प्रतिनिधि जफर खान, गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा,  कभी औरंगजेब, तो कभी कोई हमले करते रहे, मंदिर की संपदा लूटते रहे और भारत की सनातन परंपरा को रौंदने का कुत्सित प्रयास करते रहे। लेकिन हर बार स्थानीय राजाओं और आम लोगों ने तन मन धन से मंदिर का पुनर्निर्माण कर यहां की गौरवशाली परंपरा को जीवित रखा। 

815 ईस्वी में प्रतिहार सम्राट नागभट्ट द्वितीय ने, 1026-42 में चालुक्य राजवंश के भीमदेव सोलंकी ने, 1169 में राजा कुमारपाल ने, 1308 में सौराष्ट्र के राजा महिपाल प्रथम तो 1783 में अहिल्याबाई होलकर ने मंदिर के निर्माण में बढ़ चढ़कर भूमिका निभाई। फिर 1951 में सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रयासों से सोमनाथ मंदिर को वर्तमान स्वरूप मिला। खास बात यह है कि मौजूदा स्वरूप के भी अब 75 वर्ष पूरे हो गए हैं।


इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि उन दिनों लुटेरों की तलवारें जितनी घृणा से चमकतीं, भक्तों की प्रार्थनाएँ और मजबूत हो जातीं। सोमनाथ मंदिर की  गौरवशाली विरासत इस बात का प्रतीक है कि सच्ची शक्ति सोने-चांदी में नहीं, बल्कि लोगों की एकता में है। यही कारण है कि जनवरी 2026 में 1000 साल पहले के उस हमले को याद करते हुए ' सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' मनाया गया। यह एक ऐसा उत्सव है जो हार नहीं, बल्कि पुनरुत्थान की,आत्मसम्मान बनाए रखने और हमलावरों के सामने डटकर खड़े रहने की कहानी सुनाता है।

गुजरात में 8 जनवरी से 11 जनवरी (बाद में बढ़ाकर 15 जनवरी) तक आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के दौरान दिनभर मंदिर परिसर हर हर महादेव के जयघोष से गूंजता रहा तो शाम को तीन हजार ड्रोन ने आकाश में शिवलिंग, त्रिशूल, भगवान शिव का तांडव, वीर हमीरजी गोहिल की छवि, अहिल्याबाई होलकर का सम्मान और सरदार पटेल की पुनर्निर्माण पहल जैसी स्वर्णिम विरासत से आसमान को रंग दिया । वहीं, शानदार आतिशबाजी ने समुद्र तट को रंग-बिरंगी रोशनी से भरने के साथ साथ आम लोगों को यह विश्वास दिलाया कि सोमनाथ की आभा को कोई कम नहीं कर सकता । 

11 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं 'शौर्य यात्रा' का नेतृत्व किया। 108 घोड़ों के साथ निकली यह शोभायात्रा वीर हमीरजी गोहिल और वेगड़ाजी भील जैसे उन अनगिनत वीरों को समर्पित थी, जिन्होंने मंदिर की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया था । बाद में, प्रधानमंत्री ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह पर्व विनाश का नहीं, बल्कि हजार वर्षों की उस यात्रा का है जहां सोमनाथ बार-बार उठ खड़ा हुआ। गजनवी चला गया, लेकिन सोमनाथ आज भी अडिग खड़ा है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ विकास और विरासत का आदर्श उदाहरण है। आज का सोमनाथ सिर्फ मंदिर नहीं, एक संपूर्ण तीर्थक्षेत्र है। 

 शिखर पर 1,666 स्वर्ण कलशों तथा 14,200 ध्वजाओं के साथ सोमनाथ मंदिर तीन पीढ़ियों की अडिग श्रद्धा, दृढ़ता तथा कलात्मकता के प्रतिबिंब के रूप में खड़ा है। हर वर्ष लाखों लोग इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए आते हैं। वर्ष 2020 से 2024 तक वार्षिक अनुमानित 97 लाख श्रद्धालु सोमनाथ के दर्शन के लिए आए हैं।  पिछले 2 वर्ष में श्रद्धालुओं की संख्या 13.77 लाख दर्ज हुई थी, जिसमें पिछले साल महाशिवरात्रि के दौरान ही 3.56 लाख श्रद्धालु आए थे। इतना ही नहीं, गूगल पर भारतीयों द्वारा सर्वाधिक सर्च किए गए शीर्षस्थ 10 स्थानों में सोमनाथ शामिल है।

सोमनाथ मंदिर की यात्रा हमें सिखाती है कि विनाश कितना भी बड़ा हो, पुनर्निर्माण की शक्ति उससे कहीं अधिक है। यह भारत की आत्मा का दर्पण है – जहाँ विरासत जीवित रहती है और विकास नई ऊंचाइयों को छूता है। अगर आप कभी गुजरात जाएं, तो इस मंदिर के द्वार पर खड़े होकर महसूस कीजिए उस अमर ऊर्जा को क्योंकि सोमनाथ सिर्फ एक जगह नहीं, एक भावना है – स्वाभिमान की, आस्था की। 

(मैं सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के दौरान वहां मौजूद था।)

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मंगलवार, 13 जनवरी 2026

जब हेडलाइट हार गई लेकिन हौसला जीत गया..!!

रात के करीब 11.30 बजे..विमान की खिड़की से बाहर कुछ नजर नहीं आ रहा। आमतौर पर इतनी ऊंचाई से चंडीगढ़ शहर की लाइट दिखने लगती हैं। लगा, शायद कोहरा होगा। कई मिनटों की मशक्कत के बाद विमान उतरा लेकिन असली चिंता यहीं से शुरू हुई क्योंकि कोहरा इतना घना था कि तमाम प्रबंध के बाद भी पायलट विमान को सही जगह पर नहीं उतार पाया था।

ग्राउंड स्टाफ ने किसी तरह जहाज को सीधा कराकर सुरक्षित जगह तक पहुंचाया लेकिन विजिबिलिटी ज़ीरो थी यानि कुछ भी नहीं दिख रहा था। शून्य दर्शनीयता की समस्या इतनी विकराल थी कि कड़ाके की ठंड में यात्रियों को हवाई अड्डे तक पहुंचाने के लिए एयर ब्रिज बनाना तक मुश्किल था। इसलिए यात्रियों को जहाज में ही आधे घंटे से अधिक समय तक कैद रहना पड़ा। फिर, लंबे विचार विमर्श के बाद बसों का इंतजाम किया गया..वे भी किसी तरह सरकते हुए विमान तक आई, यात्री ठिठुरते हुए और अंधेरे में किसी तरह बस तक पहुंचे और बसें आहिस्ता आहिस्ता हवाई अड्डे तक।   

पायलट ने तो हिम्मत दिखाकर हमें हवाई अड्डे तक लाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली लेकिन समस्या अब शुरू हुई। हवाई अड्डे से चंडीगढ़ में होटल तक पहुंचना वर्ल्ड कप जीतने जैसा मामला था क्योंकि हवाई अड्डे के बाहर सड़क तो दूर गेट भी नहीं दिख रहा था। आधी रात, घनघोर कोहरा, ठिठुरन बढ़ाती सर्दी और बाहर भटक जाने का डर..टैक्सी कहां मिलती। 

ओला उबर वाले किराया तो मनचाहा दिखा रहे थे लेकिन आने का नाम नहीं ले रहे थे। मौके का फायदा उठाकर गिने चुने टैक्सी वाले पांच गुना किराया मांग रहे थे।   किसी तरह, मन मारकर एवं पॉकेट से समझौता कर टैक्सी की और हवाई अड्डे से चल पड़े। हवाई अड्डे से हमारे रुकने के ठिकाने तक करीब 18 किमी की दूरी असल नाइटमेयर साबित हुई क्योंकि न सड़क दिख रही थी, न चौराहे, न मोड़ और न ही दिल की धड़कन बढ़ाने वाले ऑटो, ट्रैक्टर जैसे वाहन। 

हमारी कार की हेडलाइट तो जल रही थी, पर रोशनी जमीन से दो-तीन फीट आगे नहीं जा पा रही। सामने सिर्फ़ सफ़ेदी थी.. यानि घना, दूधिया, ठंडा कोहरा। ऐसा कोहरा जो न सिर्फ़ आँखों को अंधा करता है, बल्कि मन को भी भयभीत कर देता है।  जीरो विजिबिलिटी में भी जिंदगी रुकती नहीं, बस बहुत धीमी और बहुत खतरनाक हो जाती है।

 हर कुछ सेकंड में ब्रेक और एक्सीलरेटर के बीच का फैसला जिंदगी-मौत का फैसला बन जाता है क्योंकि क्या वो सामने आती धुंधली रोशनी ट्रक है? ट्रैक्टर है? या सिर्फ़ किसी ने गाड़ी पार्क करके लाइट जला दी है? इसतरह, क्या वो सड़क का किनारा है या नाली है? इन सारे सवालों के बीच सबसे डरावनी चिंता होती है कि "अगर मैं रुक गया तो पीछे से कोई टकरा तो नहीं जाएगा? बस, हर आहट पर हॉर्न बजाना ही एक सुरक्षित विकल्प लगता है।

 इंडिकेटर अपना वजूद खो देते हैं। इस दौरान बस एक ही चीज़ काम आती है – इंसान की पूरी ताकत से केंद्रित ध्यान। एक सेकंड की लापरवाही या एक पल की जल्दबाजी – सब कुछ खत्म करने के लिए काफी है। हम भी चलते रहे क्योंकि मजबूरी थी..एयरपोर्ट पर रात भर तो बैठ नहीं सकते और अगले दिन कामकाज की जिम्मेदारियां थी ।  अगले दिन "अरे भाई, कोहरे में भी आ गए? वाह!" ये तारीफ़ सुनकर अच्छा लगता है, पर वो तारीफ़ करने वाला शायद नहीं जानता कि यह वाह सुनने के लिए कितनी बार दिल धक-धक किया था। आप भी जानते हैं और मानते भी होंगे कि कल भी कोहरा होगा तब भी हमें जाना ही पड़ेगा..वही मजबूरी क्योंकि जिंदगी कोहरे से नहीं पूछती कि आज विजिबिलिटी कितनी है। वो बस कहती है – चलते रहो, चलना ही जिंदगी है। बाकी ऊपरवाला सब संभाल लेगा ।

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

पाकिस्तान के जनरल जिया-उल-हक, कांग्रेस के संस्थापक ए ओ ह्यूम और अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई के बीच क्या है कनेक्शन..!!

भारत के प्रथम चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत, पाकिस्तान के तख्ता पलट जनरल जिया-उल-हक,कांग्रेस के संस्थापक ए ओ ह्यूम,म्यांमार की लोकतांत्रिक नेता आंग सान सू की और अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई के बीच भारत के संबंध में क्या कॉमन है?

इसी तरह, फिल्म अभिनेता अनुपम खेर, बलराज साहनी, प्राण, प्रिटी जिंटा, उस्ताद विलायत खां, राजिंदर कृष्ण और के एल सहगल में फिल्म के अलावा क्या कॉमन कनेक्शन है?

चलिए, एक और पहेली.. गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर, अमृता शेरगिल, निर्मल वर्मा, रुडयार्ड किपलिंग और रस्किन बांड में लेखन के अलावा और क्या कॉमन है?

नहीं पता..चलिए हम बताते हैं। इन सभी में शिमला कनेक्शन है। शिमला कनेक्शन मतलब या तो ये शिमला में पले बढ़े हैं या शिक्षित हुए हैं और यहीं से उनके व्यक्तित्व का विकास हुआ है। शिमला शहर वर्षों से नामचीन हस्तियों की जन्मभूमि/कर्मभूमि रहा है। मसलन म्यांमार की दिग्गज नेता आंग सान सू की का शिमला से गहरा संबंध है क्योंकि उन्होंने 1987 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्ट्डीज में फेलोशिप के दौरान अपने पति और बच्चों के साथ शिमला में काफी समय बिताया था। 

इसी तरह, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने तो शिमला के बालूगंज इलाके के बुड फील्ड हाउस में रहकर कई महत्वपूर्ण कविताएँ लिखीं, जो उनके 'सोनारतारी' संग्रह का हिस्सा बनीं और आज भी यह स्थान उनकी रचनात्मक यात्रा का गवाह है। अमृता शेरगिल का परिवार 1921 में हंगरी से भारत आकर शिमला के समर हिल में बस गया था। उन्होंने यहीं अपनी प्रारंभिक कला शिक्षा ली। अफगानी राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने 1980 के दशक की शुरुआत में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में मास्टर्स डिग्री प्राप्त की थी। उन्होंने शिमला को अपनी यादों और व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है। 

पाकिस्तान के तानाशाह और पूर्व राष्ट्रपति जिया-उल-हक ने भी अपनी प्रारंभिक शिक्षा शिमला के एक स्कूल में पूरी की थी। उनका परिवार विभाजन से पहले यहाँ रहता था इसलिए शिमला उनके बचपन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। जाने माने लेखक रस्किन बॉन्ड ने शिमला के मशहूर बिशप कॉटन स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने अपनी कई कहानियों में शिमला के औपनिवेशिक आकर्षण और पहाड़ियों का वर्णन किया। उद्योगपति रतन टाटा ने भी अपनी शुरुआती पढ़ाई बिशप कॉटन स्कूल, शिमला से की थी। टाटा समूह का हिमाचल के ठियोग में ताज होटल भी है जो उनके इस शहर के प्रति योगदान को दर्शाता है।

देश के फाइव स्टार जनरल बिपिन रावत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा शिमला के प्रतिष्ठित सेंट एडवर्ड स्कूल से पूरी की थी और वे 1972-73 बैच के छात्र थे। उनके पिता लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर शिमला में तैनात रहे हैं । बाद में , जनरल रावत एक पूर्व छात्र के तौर पर स्कूल का दौरा करने भी आए थे। इसके अलावा, जाने माने अभिनेता अनुपम खेर का तो जन्म और पालन पोषण शिमला में ही हुआ है। उनके पिता वन विभाग में क्लर्क थे। उन्होंने शिमला के डीएवी स्कूल और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है। लोकप्रिय अभिनेत्री प्रिटी जिंटा का जन्म और बचपन शिमला में ही बीता है। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी और सेंट बेड्स कॉलेज से की है। वह खुद को 'गर्वित हिमाचली' बताती हैं। अभिनेता प्रेम चोपड़ा का बचपन और शुरुआती पढ़ाई-लिखाई भी शिमला में ही हुई थी। भारत के विभाजन के बाद उनका परिवार लाहौर से शिमला आकर बस गया था। उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई और थिएटर भी यहीं किया और यहीं से उनके अभिनय करियर की नींव पड़ी। बाद में, वे मुंबई गए। 

कांग्रेस पार्टी के संस्थापक ए ओ ह्यूम 1871-72 में शिमला आए और यहीं रोथनी कैसल नामक आवास में रहे। यहां उन्होंने अपना प्रसिद्ध प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय और लाइब्रेरी बनाई और यहीं पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का विचार प्रस्तुत किया था । जबकि राजकुमारी अमृत कौर शिमला की एक महत्वपूर्ण हस्ती थीं, जिन्होंने अपनी संपत्ति और यादों से इस शहर को हमेशा के लिए जोड़ दिया । इसी तरह महान सितार वादक उस्ताद विलायत खां का भी शिमला से गहरा रिश्ता था। वे यहाँ कई साल रहे और अपने बच्चों को भी यहीं शिक्षा दिलाई। इनके अलावा भी, सैकड़ों ऐसी हस्तियां हैं जिनकी यादों में शिमला महकता है। किसी को यह रचनात्मक सृजन के अनुकूल लगा तो किसी को कला को संवारने का मंच और किसी ने खुद को यहां के पर्वतीय सौंदर्य पर न्यौछावर कर दिया।

जहां तक शिमला नगर के इतिहास की बात है तो आधिकारिक जानकारी के मुताबिक शिमला नगर 1815-16 ई. में गोरखा युद्ध के पश्चात् अस्तित्व में आया। बताया जाता है कि इस युद्ध में विजयी ब्रिटिश सरकार ने इस इलाके के कुछ भागों को सैनिक प्रयोग के लिये अपने अधिकार में रखा। तब तक यह एक अपरिचित सा ग्राम था और इसके कई नाम थे जैसे शिमलु, सैमला, शुमला और रोमला से यह नगर अपने प्राकृतिक सौंदर्य, ऊंचे ऊंचे पर्वतों, ठंडे मौसम और बर्फीली वादियों के कारण बिटिश भारत की गीष्म-कालीन राजधानी बन गया। कहा तो यह भी जाता है कि शिमला नगर का नाम श्यामला शब्द से बना है। हम सभी जानते हैं कि श्यामला देवी काली को कहते हैं। खास बात यह भी है कि मां काली के विविध रूप हिमाचल प्रदेश में सर्वाधिक पूजनीय है।

आप जानकार हैरान रह जाएंगे कि शिमला के पहले भवन का इतिहास भी यहां पन्नों में दर्ज है। यहां का पहला भवन कैनेडी हाऊस था  जो 1822 में बनाया गया था। इसका नाम भी पर्वतीय रियासतों के राज्य अधिकारी चार्ल्स प्रैट कैनेडी के नाम पर पड़ा क्योंकि यह उनका आधिकारिक निवास स्थान था । 1827 में भारत के ब्रिटिश गवर्नर एमहर्स्ट शिमला आये और 1828 में कमांडर -इन-चीफ लार्ड कॉम्बर मीयर यहां तशरीफ लाये। बस इनके आगमन के पश्चात् शिमला नगर की ख्याति में वृद्धि होती चली गई। गवर्नर जनरल लार्ड बैन्टिक ने 1830 में शिमला के अहम स्थलों को पटियाला और कैन्थल राजाओं से वापस ले लिया । इन राजाओं को यह स्थान गोरखा युद्ध में सहायता करने के लिए इनाम के रूप में मिले थे।

शिमला का रुतबा और गौरव 1864 में बढ़ा जब वायसराय जॉन लॉरेंस के कार्यकाल में शिमला को ब्रिटिश राज्य की गीष्म-कालीन राजधानी घोषित किया गया। स्वाधीनता प्राप्ति तक शिमला की यह पदवी कायम रही। रोचक तथ्य तो यह है कि तत्कालीन सरकार उस समय इस छोटे से नगर में वास्तविक राजधानियों, पहले कोलकाता (तब कलकता) और बाद में दिल्ली की अपेक्षा अधिक समय बिताने लगी थी । इसके तहत अप्रैल के आरम्भ में सरकारी अमले का पहाड़ों की ओर प्रस्थान होता था और अक्तूबर की समाप्ति पर अथवा नवम्बर के शुरू में मैदानों की ओर वापसी होती थी। 1871 से गर्मियों में पंजाब सरकार भी लाहौर से यहां आने लगी थी ।

एक और मजेदार बात यह है कि शिमला सात पहाड़ियों पर बसा है। बाहर से आने वालों को यह एक शहर ही लगे लेकिन वास्तव में यह खूबसूरत हिल स्टेशन सात अलग-अलग पहाड़ियों पर बना है, जिनके नाम हैं इन्वरर्म हिल, बैंटनी हिल, एलिसियू ऑब्ज़र्वेटरी हिल्स, प्रॉस्पेक्ट हिल, समर हिल और जाखूहिल। जाखू हिल शिमला की सबसे ऊँची जगह है। ग्रीष्म-कालीन राजधानी होने के कारण अत्यधिक सुन्दर ब्रिटिश वास्तुकला के अनुरूप शिमला की सातों पहाड़ियों पर भव्य भवनों का निर्माण हुआ। 1851 में यहां  म्यूनिसिपल शासन की व्यवस्था हुई। इस शहर की उपलब्धियों में यह बात भी दर्ज है कि दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र के बाद भी 1880 में यहां पाइप द्वारा पानी भेजा जाने लगा था और 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में पन- विद्युत उपलब्ध हो गई थी।  अपने समय का इन्जीनियरिंग चमत्कार कालका-शिमला रेलवे लाइन का निर्माण 1903 में पूरा हुआ और 1922 में विश्व के प्रारम्भिक टेलीफोन एक्सचेंज की सुविधा भी शिमला के ही हिस्से में आई।

 स्वाधीनता संग्राम के प्रसिद्ध नेता मसलन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, मौलाना आजाद, पंडित मदन मोहन मालवीय और सी. राजगोपालाचारी नियमित रूप से यहाँ आते रहे हैं । हमारे जीवन एवं देश को प्रभावित करने वाले कई महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय भी यहीं लिए गए। यहां तक की 1947 में भारत का विभाजन और पाकिस्तान का गठन यहीं से घोषित हुआ । स्वाधीनता के पश्चात् 3 जुलाई 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए गए । आजादी के बाद, 1947 से 1956 तक तकरीबन दस साल शिमला, पंजाब की राजधानी रही । 1966 में शिमला को हिमाचल प्रदेश को सौंप दिया गया, तब से क्वीन ऑफ हिल्स शिमला हिमाचल प्रदेश की राजधानी है।

मौजूदा वक्त की बात करें तो भारत के सबसे प्रसिद्ध हिल स्टेशनों में से एक शिमला आज भी अपनी औपनिवेशिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन की चमक से जगमगाता शहर है। समुद्र तल से लगभग 2200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह शहर  देवदार, ओक और पाइन के घने जंगलों से घिरा हुआ है। जब पूरा उत्तर भारत सर्दी की चपेट में रहता है, तब भी शिमला अपनी सुंदरता और व्यस्त पर्यटन सीजन के साथ एक अनोखा मिश्रण प्रस्तुत करता है।

शिमला हमेशा की तरह आज भी एक जीवंत शहर है। यहां लगभग 1.7 लाख की आबादी  है। मॉल रोड और रिज क्षेत्र को शहर का दिल कह सकते हैं । यहां प्राचीन दुकानें, अंग्रेजों के समय के कैफे, चर्च और गैटी जैसे अनूठे थिएटर पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। हालांकि, तेज विकास ने चुनौतियां भी पैदा की हैं। ओवर टूरिज्म से ट्रैफिक जाम यहां अब आम बात है और बुनियादी ढांचे पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा है। अब दिसंबर  में भी कई बार असामान्य रूप से रातें गर्म होने लगी हैं और न्यूनतम तापमान 12°C तक दर्ज  किया गया है। चार साल से दिसंबर में बर्फबारी रुक सी गई है।जलवायु में यह परिवर्तन सेब उत्पादकों व पर्यटन पर गंभीर असर डाल रहा है। 

कुल मिलाकर मानव सृजित समस्याओं के बाद भी, शिमला आज भी ब्रिटिश काल की रोमांटिक छवि और आधुनिक भारतीय शहर की व्यस्तता का सुंदर संतुलन बनाए हुए है। जलवायु परिवर्तन और सतत विकास की चुनौतियों के बावजूद, पहाड़ों की रानी शिमला अपनी आकर्षक मुस्कान से दुनिया को लुभाती आ रही है ।






 





शनिवार, 27 दिसंबर 2025

जाड़ों की ‘ठंडी’ धूप में,आँगन में लेट कर..

फिल्म ‘आंधी’ का मशहूर गीत ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन…’, जरूर गुलज़ार साहब ने शिमला या इस जैसे किसी पहाड़ पर ठंड के दिनों में बैठकर लिखा होगा क्योंकि तभी वे लिख पाए कि ‘..जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट कर...’ या फिर ‘..बर्फ़ीली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर वादी में गूँजती हुई खामोशियाँ सुने..।’ दरअसल, ऐसी कल्पना वही कर सकता है जिसने पहाड़ों पर मौसम का अतरंगी मिजाज जिया हो और खासतौर पर जाड़ों की ठंडी धूप को महसूस किया हो। वैसे, गुलज़ार साहब ने काव्यात्मक रूप देने के लिए शायद नर्म धूप लिख दिया है लेकिन इसे नर्म नहीं बल्कि ठंडी धूप कहना ज्यादा बेहतर होगा। 

इसकी वजह यह है कि शिमला जैसे पहाड़ी इलाकों में सर्दियों की जो धूप होती है, वह नर्म या गर्म नहीं बल्कि ठंडी होती है। यह धूप शरीर को उतना गर्म नहीं करती,जितना दिल को गुदगुदाती है। इसे हम ठंडी धूप कह सकते हैं…और यह बात भी उतनी ही सच है कि पहाड़ों के बाहर शायद ही कोई इसे समझ पाए। तमाम भूमंडलीय बदलावों, कम होते पेड़, जनसंख्या एवं वाहनों के बढ़ते बोझ तथा पर्यटकों की बेतहाशा भीड़ के बाद भी सर्दियों में शिमला जैसे पहाड़ी इलाके किसी खूबसूरत तस्वीर की तरह हो जाते हैं…धीमे-धीमे पहाड़ों पर उतरती धुंध, पेड़ों पर जमी ओस से बनती बर्फ की सफ़ेद परत, पर्वतों पर पसरी छाया और इनके बीच ठंडी धूप..जो पूरे शहर को अपने हल्के, सुनहरे आंचल में ढँक कर गुदगुदाती है। 

ठंडी धूप तपती नहीं है बस अपने होने का अहसास कराती है। ऐसा लगता है जैसे पहाड़ों ने इसे अपने सबसे ऊंचाई पर रखे फ्रिज में रखकर ठंडा करके नीचे भेजा हो। इस ठंडी धूप में एक ख़ामोशी होती है, नर्माहट होती है और थोड़ी सुरसुरी भी जबकि शहर की धूप जलाती सी, शोर मचाती और भागती हुई सी लगती है। शिमला की ठंडी धूप किसी मन को छू लेने वाले संगीत की तरह है। यह शरीर को नहीं, बल्कि मन को गर्म करती है । यह धूप माँ के हाथों के स्पर्श जैसी कोमल गर्माहट लिए होती है। देवदार की लम्बी कतारों के पीछे मचलती यह धूप किसी पुरानी फिल्म सी लगती है।

शिमला जैसे पहाड़ों पर धूप सेंकना सिर्फ ठंड से बचने का तरीका नहीं है बल्कि जीवन का खूबसूरत समारोह है। धूप के कोनों में सजी महिलाओं की महफिल, दुकानों के बाहर बैंच पर जमे बुज़ुर्ग, मॉल रोड पर खेलते बच्चे… हर कोई धूप में अपना छोटा-सा कोना खोज लेता है। लोग रिज और मॉल रोड पर बैठकर दिन भर गपियाते हुए धूप तापते हैं। आसपास की दुकानों से उठती चाय की खुशबू और सूरज की ठंडी धूप मिलकर ऐसा खुशनुमा माहौल रचते हैं मानो समय जैसे कुछ देर के लिए ठहर गया हो। यहां धूप के लिए वाकई वक्त ठहर जाता है और लोग समय की परवाह किए बिना बस ज्यादा से ज्यादा वक्त धूप में गुजारते हैं। 

शिमला में आमतौर पर कोहरा इतना घना होता है कि मॉल रोड भी धुंध में गुम हो जाती है। फिर अचानक बादल छटते हैं और सूरज निकलता है लेकिन यह दिल्ली या भोपाल वाला सूरज नहीं होता जो आते ही पसीना निकाल दे। यहाँ सूरज भी कम्बल ओढ़कर आता है। उसकी किरणें हम तक आती तो हैं लेकिन ठंड से कांप रही हवा को आसानी से गर्म नहीं कर पाती। इस ठंडी धूप का अंतराल भी बहुत छोटा होता है..दिन में महज दो-तीन घंटे। उसके बाद फिर बादल आ जाते हैं या सूरज ढल जाता है।

यहां की धूप अजीब है और बेवफा भी क्योंकि यह गर्माहट का वादा तो करती है, पर पूरा नहीं करती। बस इतना मिलती है कि आप में जीने का हौसला आ जाए । यही वजह है कि पहाड़ों में लोग धूप को संजोकर रखते हैं। घरों में खिड़कियाँ बड़ी-बड़ी बनाते हैं और घर इस तरह बनाते हैं कि कम से कम एक कमरे में तो पर्याप्त धूप रहे। पहाड़ों के पारंपरिक लकड़ी से बने घरों में इसे धूप-कक्ष कहते हैं..मतलब एक ऐसा कमरा जिसमें बैठकर सर्दियों में पूरा परिवार चाय पीता, किताबें पढ़ता और धूप को अंदर तक सोखता रहता है । मजेदार बात यह भी है कि यहां कई इलाकों के नाम धूप की उपलब्धता पर भी हैं जैसे लॉन्गवुड इलाके का ‘ऑलसनी’ मतलब यहां पूरे दिन भरपूर धूप मिलती है और ठंडी सड़क भी, जहां से धूप को परहेज है ।

धूप यहां मेल मुलाकात का और साझा जीवन शैली का जरिया भी है। अब भले ही इलेक्ट्रिक हीटर जैसे तमाम साधन उपलब्ध हैं वरना पहले तो घरों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक में लकड़ी और पत्थर के कोयले की अंगीठी जलती थी। इसे स्थानीय तौर पर बखारी/बुखारी भी कहते हैं। सुबह होते ही धुएं की उठती गहरी लकीर पास पड़ोस तक को अंगीठी सुलगने का अहसास करा देती थी। तब दफ्तरों में बाकायदा एक व्यक्ति को ये जिम्मेदारी दी जाती थी कि वह सुबह से अंगीठी सुलगा कर कमरे गर्म रखे ताकि ऑफिस खुलने के बाद तमाम अधिकारी कर्मचारी बढ़िया ढंग से काम कर सकें।

पहाड़ों की ठंडी धूप का एक और रंग है, उसकी चमक। बर्फ पड़ने के बाद जब धूप इन बर्फीली चोटियों पर पड़ती है तो पूरा परिदृश्य चमकने लगता है।  देवदार के पेड़ों पर जमी बर्फ सूरज की किरणों से हौंसला पाकर चाँदी जैसी चमकने लगती है। शाम ढलते-ढलते धूप पीली हो जाती है और बर्फ़ का रंग सुनहला। ठंड और तेज़ हो जाती है इसलिए लोग धीरे-धीरे घरों में दुबकने लगते हैं। इस दौरान रजाई कंबल में घुसकर भी लगता है कि शरीर में ठंडक बाकी है।  इन क्षणों में लगता है जैसे पहाड़ हमें अपनी बाँहों में भरकर कुछ पल के लिए अपनी दुनिया में समाहित कर लेते हैं। शिमला की ठंडी धूप किसी पुराने ख़त की तरह है जिसे बार-बार पढ़कर भी सुकून नहीं मिलता और हर रोज उस समय का इंतजार रहता है जब धूप ठंडी ही सही पर फिर से आकर तन मन को भिगो देगी। 

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गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

बर्फ के बिना भी बर्फीला जश्न..!!

क्वीन ऑफ हिल्स शिमला,हमेशा से सर्दियों की परी कथा सी लगती है और इस दौरान बर्फ़ से ढके पहाड़ों के बीच होने वाला विंटर कार्निवल यहां की जान है, लेकिन इस बार का विंटर कार्निवल कुछ खास है – प्रकृति ने बर्फ नहीं बरसाई, फिर भी शहर ने खुद को कृत्रिम बर्फ, चमकती लाइटों और रंग-बिरंगी झंडियों की सजावट से ऐसा सजाया कि लगता है पूरा शिमला बर्फ की चादर ओढ़े नाच रहा हो। कल 24 दिसंबर शुरू होकर 1 जनवरी तक चलने वाला यह विंटर कार्निवल नौ दिन का उत्सव भर नहीं, बल्कि हिमाचली संस्कृति, संगीत और जीवंतता का जीता-जागता प्रमाण है। आज क्रिसमस पर अलग ही रौनक है और दुनिया भर में मशहूर यहां का चर्च रंगों से नहाकर प्रार्थनाओं में डूबा है।

विंटर कार्निवल के दौरान रिज मैदान (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर शाम ढलते ही हजारों लोग इकट्ठा होते हैं। इनमें स्थानीय लोगों से ज्यादा पर्यटक हैं। हवा में ठंडक है, लेकिन दिलों में गर्माहट। उत्सवी माहौल का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू खुद महानाटी में थिरकते दिखे। ढोल-नगाड़ों की थाप पर पूरा रिज मैदान एक साथ नाच उठता है।  यहां नाटी सिर्फ नृत्य नहीं, हिमाचल की आत्मा है – एकता, खुशी और पहाड़ों की मजबूती का प्रतीक।

इस बार कार्निवल की थीम 'ड्रग-फ्री हिमाचल' भी है, जो जश्न के बीच युवाओं को नशे से दूर रहकर संस्कृति को जीवित रखने का गंभीर संदेश देता है । कार्निवल की शुरुआत में सभी जिलों के लोक कलाकारों ने अपनी-अपनी परंपराओं की झलक दिखाई। मॉल रोड पर स्ट्रीट परफॉर्मर्स, जादूगर और मिमिक्री आर्टिस्ट घूम रहे हैं, जबकि फूड स्टॉल्स से सिद्दू, मद्रा, मोमोज और गर्मागर्म चाय की खुशबू फैल रही है। सेल्फी पॉइंट्स पर क्रिसमस ट्री, आई लव शिमला और विंटर थीम वाली डेकोरेशन हर किसी को सोशल मीडिया स्टार बना रही है। 

संगीत तो हिमाचल के साथ साथ इस विंटर कार्निवल की जान है। पहले दिन पंजाबी सिंगर रोहनप्रीत सिंह और पायल ठाकुर ने धमाल मचाया। आगे के दिनों में हेमा सरदेसाई, अरुण जस्टा, राजीव शर्मा जैसे कलाकार मंच संभालेंगे। लोक गायकों की आवाजें पहाड़ों से टकराकर गूंजेगी और साल के समापन पर मिडनाइट फायरवर्क्स आसमान को रंगों से भर देंगे। यह कार्निवल बताता है कि सच्चा जश्न बर्फ पर नहीं, दिलों में बसता है। 

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रविवार, 21 दिसंबर 2025

अरे बाप रे…40 हजार रुपए में एक किलो सब्जी !!

यह हिमालय की राजकुमारी है.. नाज़ुक, दुर्लभतम एवं इतनी शर्मीली की लाख तलाशने पर भी नज़र नहीं आती..और कीमती इतनी की इसके सामने सोना चांदी भी शरमा जाएं। यह कोई धातु नहीं है फिर भी इसे पहाड़ों का सोना कहा जाता है..इंसान नहीं है फिर भी राजकुमारी है और दवा नहीं है फिर भी दुनिया के किसी भी बेशकीमती नुस्खे से कम नहीं है। बर्फीली चोटियों पर पूरी शान-ओ-शौकत से रहने वाली यह नाजुक सी राजकुमारी दरअसल सब्जियों की दुनिया की ‘रॉयल प्रिंसेस’ है और इसका नाम भी कुछ अलग सा है - गुच्छी। 

मधुमक्खी के छत्ते (honeycomb) सा स्पंजी क्राउन पहने यह प्रिंसेस आमतौर पर जंगलों में छिपकर रहती है। जैसे ही हिमालय की बर्फ पिघलती है तो यह हौले से लजाते हुए बाहर झांकती है, जैसे शाही परिवार का कोई चश्म-ओ-चिराग अपने महल से निकल रहा हो। लेकिन राजकुमारी गुच्छी इतनी नखरेबाज है कि आसानी से नहीं मिलती बल्कि जंगलों में घंटों भटककर एवं जोखिम उठाकर ही इसे मनाना और लाना पड़ता है। अब रही कीमत की बात तो यह सब्जियों की सरताज है क्योंकि एक किलो सूखी गुच्छी की कीमत 30,000 से 40,000 रुपये है। इतनी कीमती कि, फाइव स्टार होटल में इसे डिश में डालते वक्त शेफ भी सोचते हैं कि गलती से ज्यादा न डल जाए..आखिर यह सोने से कम कीमती थोड़ी है। वैसे भी, सोना तो दुनिया भर में दाम चुकाकर मनचाही मात्रा में ले सकते हैं लेकिन हमारी गुच्छी प्रकृति में अवतरित ही इतनी कम मात्रा में होती हैं कि आप पैसा देकर भी ज्यादा नहीं खरीद सकते।

स्वाद में जादू, सेहत का खजाना, और रुतबे में सब्जियों की क्वीन— गुच्छी वास्तव में हिमाचल प्रदेश में पैदा होने वाल एक खास किस्म का मशरूम है। यह हिमाचल की बर्फीली ऊंचाइयों में छिपा एक ऐसा खजाना है जो प्रकृति का दुर्लभ उपहार है। हिमाचल प्रदेश के साथ साथ इसने धरती पर जन्नत यानि कश्मीर और उत्तराखंड में भी अपना घर बनाया है। हिमाचल प्रदेश में मुख्य रूप से कुल्लू, शिमला, मंडी और चंबा जैसे जिलों के घने जंगलों में बर्फ पिघलने के बाद यह मशरूम रहस्यमयी तरीके से उगता है। इसकी स्पंज जैसी आकृति, मिट्टी का स्वाद और औषधीय गुण इसे राजसी व्यंजनों का सरताज बनाते हैं। 

यही वजह है कि पुलाव से लेकर ग्रेवी तक, हर डिश में यह जादू बिखेरता है लेकिन इसकी यह कीमत सिर्फ स्वाद के कारण नहीं है बल्कि इसलिए भी है क्योंकि इसे खेती करके सामान्य रूप से खेत में नहीं उगाया जा सकता। यह मशरूम मनमर्जी का मालिक है और इसे जंगलों में खोजना पड़ता है। इतना ही नहीं, कभी-कभी तो जान जोखिम में डालकर भी यह पकड़ में नहीं आता। यही वजह है कि गुच्छी को ‘पहाड़ों का सोना’ कहा जाता है।

गुच्छी बाहर से रफ-टफ, अंदर से रसीली और स्वाद में इतनी लज़ीज़ है कि एक बार चखो तो पुलाव, बिरयानी या ग्रेवी इसके बिना अधूरी लगने लगते हैं। खास बात यह है कि ये सिर्फ स्वाद नहीं, सेहत का खजाना भी है। गुच्छी एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर और गठिया,एनीमिया और ट्यूमर से लड़ने वाला सुपरफूड है।  ये पोटेशियम, कॉपर, फास्फोरस, कैल्शियम,जिंक, कई विटामिन और आयरन से समृद्ध हैं। कई बी-विटामिनों के अलावा विटामिन डी का बड़ा स्रोत है जो शरीर को कई बीमारियों से बचा सकता है। यह हृदय रोगों और मधुमेह के उपचार में उपयोगी है। यह मूड स्विंग्स और क्रेविंग को भी नियंत्रित कर सकता है।

हिमाचल प्रदेश की ऊंची पहाड़ियों और घने जंगलों में पाया जाने वाला गुच्छी मशरूम का वैज्ञानिक नाम Morchella esculenta (मोर्चेला एस्कुलेंटा) है, जिसे आमतौर पर मोरल मशरूम के नाम से भी जाना जाता है और यह एस्कोमाइकोटा (Ascomycota) परिवार से संबंधित है। यह देवदार, सेब के बागों और पाइन के जंगलों के नीचे प्राकृतिक रूप से विकसित होता है। आयुर्वेदिक ग्रंथ चरकसंहिता में इसे सर्पच्छत्रक कहा गया है। हालांकि, अब जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप के कारण इसकी पैदावार में लगातार गिरावट आ रही है। दरअसल, बर्फ पिघलने के बाद  ही मिट्टी में नमी और उचित तापमान उपलब्ध होता है इसलिए गुच्छी पहले जनवरी से अप्रैल तक उपलब्ध होती थी, लेकिन हाल के वर्षों में मौसम में बदलाव और घटती बर्फबारी के कारण इसकी पैदावार खिसककर जून तक पहुंच गई है।

हिमाचल प्रदेश में गुच्छी की पैदावार मुख्य रूप से जंगली है, और इसका कोई आधिकारिक उत्पादन रिकॉर्ड नहीं मिलता लेकिन विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्ट में उपलब्ध आंकड़े भी इसकी गिरावट को दर्शाते हैं। मसलन शिमला जिले में 2008-2010 तक प्रति सीजन एक समूह 8 किलोग्राम तक गुच्छी मशरूम इकट्ठा कर लेता था, लेकिन अब बताते हैं कि बमुश्किल आधा किलो ही मिल पाता है। 

वैसे, उत्पादन में गिरावट के बाद भी वैश्विक स्तर पर, भारत गुच्छी का प्रमुख उत्पादक है। हमारा देश हर साल तकरीबन 50 टन सूखी गुच्छी का निर्यात करता है। जानकारों के मुताबिक गुच्छी को सुखाकर रखने से इसकी सेल्फ लाइफ़ काफी बढ़ जाती है। गुच्छी की पैदावार में गिरावट का मुख्य कारण पहाड़ों पर बढ़ते तापमान और कम वर्षा से मिट्टी की नमी प्रभावित होना है। इसके अलावा, वनों की कटाई, सेब के पुराने बागों का हटना और लालच में इसका अत्यधिक संग्रहण भी अहम कारण हैं। ज्यादा मशरूम हासिल करने के लिए कई बार इसे तोड़ने के बजाए जड़ से उखाड़ लिया जाता है । इससे न केवल इसके फैलाव पर असर पड़ा है बल्कि कई इलाकों में अब यह पैदा ही नहीं हो पा रहा।

हालांकि, ‘जहां चाह वहां राह’ की तर्ज पर गुच्छी की कृत्रिम खेती में काफी प्रगति देखने को मिल रही है। शिमला के पास स्थित सोलन में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मशरूम अनुसंधान निदेशालय ने भारत में गुच्छी की सफलतापूर्वक खेती की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है लेकिन इसके मुरीदों की नजर में यह वैसा ही है जैसे प्राकृतिक सोना और प्रयोगशाला में बना सोना। फिर भी, यह मशरूम चूंकि हिमाचल प्रदेश में न केवल स्थानीय संस्कृति का हिस्सा है, साथ ही एक अहम आर्थिक स्त्रोत भी है इसलिए, उम्मीद यही है कि सरकार और वैज्ञानिकों के प्रयास रंग लायेंगे और 'पहाड़ों का सोना' अपनी चमक बरकरार रख सकेगा। हम जैसे लोग भले ही इसे खरीदकर न खा पाएं लेकिन यह सोचकर गर्व तो कर ही सकते हैं कि दुनिया की सबसे महंगी यह सब्जी हमारे देश में पैदा होती है।


शनिवार, 13 दिसंबर 2025

मीठे राजमार्ग के माथे पर क्यों लगी हैं लाल बिंदी…!!


इन दिनों यदि आप ‘मीठे राजमार्ग’ से गुजर रहे होंगे तो आपको ताजे गुड़ की मदहोश करने वाली मिठास के साथ सड़क पर कुछ अनूठा..कुछ अलग भी नजर आएगा। ऐसा लगता है जैसे किसी ने राजमार्ग के माथे पर सुंदर सी लाल बिंदी लगा दी है। यह अनूठापन आकर्षक भी है और आपकी सुरक्षा का पहरेदार भी। मीठे राजमार्ग के बारे में और विस्तार से जानना हो तो आप इस लिंक के जरिए पढ़ सकते हैं।

मीठा राजमार्ग: जहां बन रहे मदहोश करने…

https://jugaali.blogspot.com/2024/12/blog-post_59.html

बहरहाल, अभी बात मीठे राजमार्ग के अनूठेपन की। दरअसल भोपाल से जबलपुर तक बिना किसी रुकावट के जाने के लिए बनाया गया नेशनल हाइवे क्रमांक 45 इन दिनों अपने रेड कार्पेट के कारण देश भर में चर्चा में है। ये टेबिल टॉप शैली में बने रेड कार्पेट पूरी सड़क की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे हैं। ये ऐसे लगते हैं जैसे महिलाएं माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी लगाती हैं। जैसे बिंदी सुहाग की सुरक्षा का प्रतीक मानी जाती है,इसी तरह यह रेड कार्पेट भी वाहन चालकों की सुरक्षा का प्रतीक है।

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एन एच ए आई) ने देश में संभवतः पहली बार यह अनूठा प्रयोग करते हुए नरसिंहपुर-जबलपुर के बीच पड़ने वाली सड़क पर 5 मिलीमीटर की मोटी लाल रंग की परत बिछाई गई है, इसे तकनीकी भाषा में टेबल टॉप मार्किंग नाम दिया गया है। इस लाल मोटी परत के ऊपर से गुजरते समय अंधाधुंध रफ्तार से चले आ रहे वाहन चालकों को हल्के झटके महसूस होते हैं जिससे वे सतर्क होकर अपनी स्पीड कम कर लेते हैं। वैसे भी, लाल रंग खतरे का प्रतीक है इसलिए दूर से ही इसे देखकर वाहन चालकों की रफ्तार मनोवैज्ञानिक तौर कम हो ही जाती है।

इसके अलावा, राजमार्ग पर रात में नींद या झपकी लग जाने के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए भी यहां सड़क के दोनों किनारों पर 5 मिलीमीटर मोटी सफेद पैवर शोल्डर लाइन भी बनाई  है। इसका फायदा यह है कि यदि ड्राइवर को एकाएक नींद आ जाती है और कार लहराकर सड़क के किनारे की ओर बढ़ने लगती है तो इस मोटी लाइन से टकराकर कार को झटके लगेंगे और वाहन चालक तत्काल सतर्क हो जाएगा जिससे दुर्घटना और जानमाल की क्षति भी कम होगी।

दरअसल, राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 45 का यह हिस्सा वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व और नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य की सीमा से गुजरता है। रात के समय  वन्य जीवों का सड़क पर आ जाना सामान्य बात है। इस रेड कार्पेट से वाहनों की रफ्तार तो कम हो ही जाएगी, साथ ही सड़क के बीचों बीच लाल निशान देखकर वे सतर्क भी हो जाएंगे। इसके फलस्वरूप वन्य प्राणियों की मौत और वाहनों की दुर्घटनाओं को रोकने में मदद मिलेगी। फिलहाल यह प्रयोग करीब दो किलोमीटर के इलाके में किया गया है। इस अभिनव प्रयास की सफलता का अध्ययन कर इसका भविष्य में और विस्तार किया जाएगा।

इस परियोजना की सबसे अहम खासियत यह है कि इसमें पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसमें 25 अंडरपास बनाए गए हैं ताकि अभ्यारण्य से गुजरने वाले वन्य जीव दिन या रात में कभी भी आसानी से आवाजाही कर सकें । यह राजमार्ग करीब 122 करोड़ रुपए में बनकर तैयार हुआ है। राजमार्ग के चौड़ीकरण की इस परियोजना में पहले से मौजूद डबल लेन को अब 4 लेन में बदला गया है। रेड कार्पेट, व्हाइट मार्किंग और अंडरपास सहित इन सभी प्रयासों का उद्देश्य जनहानि, दुर्घटनाओं को रोकना तथा वन्य प्राणियों की सुरक्षित आवाजाही सुरक्षित करना है और सबसे अहम बात यह है कि किसी भी प्रकार के ब्लैक स्पॉट की तत्काल पहचान कर उसे सभी के लिए सुरक्षित बनाना है।





गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

25 वें जन्मदिन पर पिता का पत्र बेटी के नाम

 🌹जन्मदिन मुबारक प्रिंसेस..🌹


हमारी नन्ही सी परी…देखते ही देखते सजीली राजकुमारी बन गई है। आज जब घड़ी ने बारह बजाए और हमने आँखें बंद कीं तो पूरे 25 साल का गुजरा समय किसी मनभावन फिल्म की भांति आंखों के सामने आ गया…11 दिसंबर, 2000 को सोमवार का दिन था और उस दिन पूर्णिमा थी। पूरी  दुनिया को दूधिया रोशनी से जगमगाते हुए तुमने रात करीब 10 बजे हमारे जीवन में हौले से कदम रखा और फिर क्या था..हमारी दुनिया भी रोशन होती चली गई।

तुमको शायद न पता हो कि 11 दिसम्बर का दिन पर्वतीय पर्यावरण के महत्व के लिए मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस के रूप में भी जाना जाता है और जन्म के बाद आज तुम्हारे 25वें जन्मदिन का जश्न भी हिमालय की गोद में पहाड़ों की रानी शिमला की बाहों में मनाने का अवसर मिला है।

जब तुमने अपने नन्हे हाथ को मेरे हाथ में रखा था तो लगा कि चांद हथेली पर उतर आया हो। जब पहली बार तुमने मेरी अंगुली पकड़ी थी तो इतना जोर लगाया था कि आज तक उसकी गर्माहट महसूस होती है और लगा जैसे तुम कह रही हो, कि पापा इसी तरह अंगुली थामे रहना। उस पल से लेकर आज तक, सच में हम लोग बस तुम्हारे लिए, तुम्हारे सपनों और तुम्हारी खुशियों के साथ साथ आगे बढ़ रहे हैं। 

इन पच्चीस साल सालों में हमने हर साल साथ साथ केक काटा है, साथ साथ खाया है और कभी रात को तो कभी दिन के उजाले में जश्न मनाया है..याद है बेटा तुमको, तुम बचपन से कैसे गपागप केक खाती आ रही हो..कई बार तो हमारे लिए भी बमुश्किल बचा था और हमने तुम्हारे केक पर लट्टू हो जाने को कितनी बार कैमरे में कैद किया है, पर तुम बिंदास..इस सबसे परे… केक का आनंद उठाती रहती हो..यह बचपना ही तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त है, इसे सम्भाल कर रखना।

मम्मी पापा के लिए तुम कितनी खास हो…याद है, जब तुमने ताइक्वांडो सीखना शुरू किया और फ़िफ्थ क्लास में ही बढ़िया करते हुए जिला स्तरीय फाइनल तक पहुंची थीं लेकिन तुम्हारे मुकाबले तुमसे दोगुनी उम्र,कद काठी की लड़की को देखकर मैंने उसे वॉक ओवर दिला दिया था जबकि हमें पता था कि तुम उसे भी जबरदस्त चुनौती देती…लेकिन मम्मी पापा का दिल तो कोमल है। हमारी फूल सी राजनंदिनी को महज एक पदक के लिए हम मारपीट करते कैसे देख सकते थे..फिर हमने तुम्हारे रजत पदक का गोल्डन जश्न दिल्ली के अंतरिक्ष रेस्त्रां में मनाया था..वही जो देश का पहला घूमता हुआ होटल था और शायद वहां फिल्म नसीब की शूटिंग भी हुई थी।

तुमने शुरू से ही कैप्टन और एक सुलझे हुए एडमिनिस्ट्रेटर के गुण दिखाएं हैं जो आज तक कायम हैं। जब दिल्ली के मयूर पब्लिक स्कूल में शायद थर्ड क्लास में ही तुमने एनुअल डे सेलिब्रेशन की जबरदस्त एंकरिंग कर जमकर तालियां और टीचर्स की सराहना बटोरी थी तो हमारी आंखों में आंसू आ गए थे..खुशी के आंसू। शायद, तुम्हारी मम्मी तुम्हें यूं ही रेडियो/आकाशवाणी नहीं कहती ..तुम्हारी दिन भर की चटर पटर ने ही तुम्हें बड़े स्टेज पर बेझिझक संचालन का हौंसला दिया। और ये भी क्या सुखद संयोग है कि आकाशवाणी नाम तुम्हारा पड़ा और बाद में काम मुझे करना पड़ा। वैसे, बुआ लोगों ने भी बुलबुल नाम सोच समझकर ही रखा होगा।

तुम हमारी हिम्मत और हौंसला हो। याद है, जब दिल्ली से असम के अंजान और दूरदराज़ के क्षेत्र सिलचर में मेरा ट्रांसफर हुआ तो मुझे सबसे बड़ी चिंता यही थी कि अब हमारी बुलबुल के दोस्त छूट जाएंगे और उसका बचपना कुम्हला न जाए परन्तु तुमने कहा कि पापा, चिंता मत करो, मैं एक हफ्ते में दोस्त बना लूंगी और तुम्हारे इस एक वाक्य ने इतनी हिम्मत दी कि हम करीब पांच साल वहां रह गए और वहां से कई परिवार, दोस्तों और शुभचिंतकों का पूरा काफिला लेकर लौटे।

एक सच्ची बात बताएं बेटा..हम लाख हिम्मत, दिलेरी और मजबूती दिखाएं लेकिन सच यह है कि जब भी तुम घर से/हमसे दूर जाती हो तो कलेजे में हूक सी उठती है,दिल बैठ जाता है और मन उदास..पर,हम तुम्हारी उड़ान नहीं रोकना चाहते इसलिए तुम्हारे पंख लगातार मजबूत करते जाते हैं..फिर चाहे तुम्हारा भोपाल से बाहर पिकनिक पर जाना हो, दिल्ली की मशहूर ताजमहल होटल में प्रोफेशनल ट्रेनिंग हो या बीकानेरवाला में कैंपस सिलेक्शन हो या फिर ताज ग्रुप ज्वाइन करना हो..कुछ मन में अटकता तो जरूर है।

अब तुम पच्चीस की हो गई हो तो कुछ बातें भी नियत हैं कि तुम्हें एक दिन तो किसी दूसरे परिवार की पूनम बनना है इसलिए हमें यह डर तो लगता है कि हमारी नासमझ सी, भोली सी और भावुक सी बिटिया एक दिन दूर चली जाएगी और कैसे संभालेगी सब कुछ..फिर तुम्हारी मम्मी आश्वस्त होकर कहती हैं कि वो सब सम्भाल लेगी जैसे नौकरी में इंडिपेंडेंट है बिल्कुल वैसे ही हर दायित्व बेहतरीन तरीके से पूरा करेगी। मम्मी का भरोसा मुझे भी हौंसला देता है।

बहुत सारे किस्से हैं, बातें हैं, यादें हैं..तुम्हारा पहली बार स्कूल जाना,बीमार पड़ी तो अस्पताल में हमारा रात गुजारना, तुम्हारा क्लास में नाम बहुत पीछे आने के कारण संस्कृति से बदलकर आद्या करना,पहली बार खाना बनाना, वो हरी मिर्च की सब्जी, पनीर की खीर, बिना बेसन की कढ़ी, हमारी एनिवर्सरी पर खाना बनाते हुए तुम्हारा जल जाना और फिर भी अपना दर्द भूलकर बिना रुके पूरा खाना बनाकर सेलीब्रेट करना, तुम्हारे साथ ताजमहल जैसे होटल की पहली बार यात्रा, बारहवीं की परीक्षा शानदार अंकों के साथ पास करने के बाद नेशनल फुट वेयर डिजाइन इंस्टीट्यूट से लेकर सिंबायोसिस और आईएचएम जैसे नेशनल एक्जाम एक ही बार में निकालकर सभी जगह एडमिशन के झंडे गाड़ना…लिस्ट लंबी है।

आज तुम पच्चीस की हो गई हो और खूब समझदार भी । अब तुम अच्छे से जानती हो कि ज़िंदगी कितनी सहज एवं निष्ठुर हो सकती है। कौन तुम्हारा भला चाहता है और कौन बुरा..समाज में कैसे लोगों का बहुमत है। तुमने लड़ना भी सीख लिया है और जीतना भी । तुमने खोया भी, और फिर उससे ज्यादा पाया भी है। पर एक बात नहीं बदली और न कभी बदलेगी—जब भी तुम मुश्किल में होती हो या उपलब्धियों के साथ, तुम्हारी आँखें हमें ही ढूँढती हैं। बस हमारे लिए यही काफी है, तुम्हारा यह लगाव पूरी दुनिया जीत लेने की ताकत बन जाता है। अब तुम्हें कुछ सिखाने की जरूरत नहीं है बल्कि अब तो तुमसे सीखना है ।

फिर भी, हम इतना कहना चाहते हैं—जब भी थकोगी, तो हमारे कंधे तुम्हारे लिए उतने ही मज़बूत बने रहेंगे जैसे बचपन में तुम्हें कंधों पर बिठाकर घुमाया करते थे। जब भी रोना चाहोगी (आंसू खुशी में भी आते हैं), तो मेरी शर्ट और मम्मी का आंचल अभी भी उतनी ही मुलायम है। जब भी डर लगेगा, हम मजबूती से तुम्हारे पीछे खड़े हैं.. और जब भी खुश होना चाहोगी, हमारी हँसी तुम्हारी खिलखिलाहट को और बढ़ा देगी।  हमारी प्रिय बिटिया रानी, तुम हमारे लिए वो कीमती किताब हो जिसे हम बार-बार पढ़ना तथा सहेजना चाहते हैं । तुम हमारा वो प्रिय गीत हो जिसे हम सदैव गुनगुनाना चाहते हैं । तुम हमारी लिए वो दुआ हो जिसे  हम हर प्रार्थना, हर पूजा, हर साँस में माँगते हैं ।

❤️ पच्चीसवाँ जन्मदिन मुबारक हो, 

हमारी राजदुलारी..लवली प्रिंसेस ❤️

सदैव तुम्हारे पीछे मौजूद

मम्मी पापा

रविवार, 7 दिसंबर 2025

व्यंग्य: गो मूत्र से वोट कहते हैं


आवश्यकता आविष्कार की जननी है और भारत आविष्कारों (पढ़िये चमत्कारों) का देश है। आविष्कार (चमत्कार) भी ऐसे-ऐसे कि अमेरिका-जापान जैसे 'आविष्कार केंद्रित' देश और नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक भी दांतों तले अंगुली दबा लें। हमें स्कूल के दिनों से रटाया जाता है कि शून्य का आविष्कार भारत ने ही किया था। इस खोज का कितना लाभ हम उठा पाए यह तो वैदिक, ज्योतिष एवं कर्मकांडों को स्कूल-कालेजों में अनिवार्य विषय बनवाने वाले 'शिक्षा शंकराचार्य' जाने, पर इस शून्य को एक से लेकर नौ अंकों के साथ मनचाही बार प्रयुक्त कर 'रिश्वत' का आविष्कार जरूर हमने कर दिखाया है क्योंकि 'रिश्वत हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, इसे हम लेकर रहेंगे' की तर्ज पर 'रिश्वोत्री' (रिश्वत की गंगोत्री) को पूरे देश में समान गति से बहते देखकर इस आविष्कार की सार्थकता एवं कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है जैसी 'राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण' होता है। 'राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण' वाक्य का इस्तेमाल करने के लिए मैं हमारे हिन्दू मठाधीशों से माफी मांगता हूं। दरअसल इसका तो उन्हें पेटेंट करा लेना चाहिए क्योंकि बार-बार उन्हें ही इसकी जरूरत पड़ती है।  

बहरहाल, हम आविष्कारों की बात कर रहे है तो पत्तियों पर नाग-नागिन और गणेशजी के दूध पीने के कारनामे क्या और कोई देश तथा वैज्ञानिक दिखा सकता है। हो सकता है अपनी 'लेब' में 'सुपर कम्प्यूटर' का इस्तेमाल कर कोई सिरफिरा वैज्ञानिक एकाध बार ऐसा कर दिखाए, पर पूरे देश में लाखों-करोड़ों लोगों को एकजुट कर यह चमत्कार हमारे यहां ही संभव है। और हो भी क्यों न हम उस देश के वासी हैं जहां गंगा बहती है, पर अब इस गाने में 'गंगा बहती है' के स्थान पर 'गाय रहती है' कहना चाहिए क्योंकि वर्षों से 'पाप घोते-घोते' गंगा के चमत्कार तो चुक गए। अब गाय यानि गोमाता की बारी है। 

गोमाता अपने दूध, गोबर, गोमूत्र जैसे पंचद्रव्यों के माध्यम पहले ही चमत्कार दिखाती रही है। पर इस बार चमत्कार गोमाता ने नहीं, हमारे नेताओं ने दिखाया है। वे ऐसा आविष्कार करने में जुटे हैं, जो यदि सफल हो गया तो भूमंडलीकरण और मंडल कमंडल में व्यस्त देश की दिशा ही बदल जाएगी तथा धार्मिक रूप से प्रतिष्ठित गाय न केवल राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हो जाएगी साथ ही 'गो-रत्न, गो-श्री, गो-विभूषण जैसे पुरस्कारों की जन्मदात्री भी। यह आविष्कार है गोमूत्र से वोट बनाने का। अरे, वही जो हमारे लोकतंत्र का भूत-भविष्य-वर्तमान हैं, जो किसी को धरती से आसमान एवं आकाश से धरती पर ला सकता है। यह इतना शक्तिशाली है कि इसकी मार परमाणु या हाइड्रोजन बम पर भी भारी है। इसका समर्थन रंक से राजा बना सकता है।  

 गोमूत्र से वोट बनाने का फार्मूला हिंदी पट्टी की राजनीति की उपज है। एक नेता ने घोषणा कर दी कि गोमूत्र, अमृत के समान है। बस फिर क्या था, सभी राजनीतिक दलों में गोमूत्र से वोट बनाने की होड़ लग गयी। हर कोई अपने को गाय का प्रवक्ता बताना चाहता है। गोशालाएं सुधरने-संवरने लगी है। वर्षों से भूखी-मरियल गाय भरपेट, वह भी दिन में कई बार खाकर आशीष लुटाने लगी है। शहर-शहर में गाय पुज रही है, सज रही है मानो गाय न होकर सौन्दर्य स्पर्धा की तैयारी में जुटी सुन्दरी हो। 

 राजनीति के वैज्ञानिकों का कहना है गाय को जितनी सेवा कर खुश रखोगे, उतनी ही अच्छी वोटों की फसल होगी। गाय के नए झंडाबरदार तैयार होते देख राजनीति के मठाधीशों की भी नींद उड़ गयी है। अब गाय के असली उत्तराधिकारी को लेकर जंग छिड़ी है, असली-नकली बताने के पोस्टर छप रहे हैं और राजनीतिकों में एकाएक पनपें 'गो प्रेम' से हैरान गाय माता कातर निगाहों से देख रही है। 

बचपन में ऐसा ही गो-प्रेम दिखाकर परीक्षा में बिना कुछ लिखे अंक हासिल करने के लिए हमारे एक सहपाठी ने उत्तर पुस्तिका में लिख दिया था- 'गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है,' पर अंक देना तो दूर परीक्षक ने जवाब लिख भेजा-'बैल तुम्हारा बाप है, नम्बर देना पाप है।' अब देखना यह है कि चुनावी परीक्षा का परीक्षक यानि मतदाता क्या फैसला देता है, तब तक तो गायों की मौज हैं।

वर्षा विगत चुनाव ऋतु आई...

वर्षा विगत चुनाव ऋतु आई...... पढ़ कर इस गुस्ताख़ी के लिए संत तुलसीदास जी माफ़ करें क्योंकि उन्होंने तो वर्षा विगत शरद ऋतु आई... लिखा है। मौसम विभाग के बाबू भी नाराज़ न हों क्योंकि मौसम परिवर्तन की सूचना देना तो उनकी बपौती है। फिर चाहे वे गर्मी में पानी गिरने की और वर्षा में तीखी गर्मी की भविष्यवाणी क्यों न करते हों और उनके पूर्वानुमानों पर आस लगाकर कितने ही किसान हर साल बर्बाद होते हों। खैर, मौसम विभाग के किस्से तो कहानी घर घर की तरह देशभर में समान रुप से चर्चित हैं। यहाँ पेश है संत तुलसीदास की इन प्रसिद्ध पंक्तियों पर रामायण काल और आधुनिक काल की दो सखियों की बात-चीत:  

सखी (एक): हे सखी, देख वर्षा ऋतु बीतने को है। शरद ऋतु के स्वागत की तैयारियों में धरती हरियाली और रंग-बिरंगे फूलों से सज गयी है।  

सखी (दो): तुम गलत समझ रही हो सहेली, यह सजावट शरद ऋतु के स्वागत की नहीं, बल्कि चुनाव की तैयारियाँ हैं। जिसे तुम हरियाली और रंग-बिरंगे फूल समझ रही हो वे राजनीतिक पार्टियों के झंडे, बैनर, पोस्टर है। पगली ये चुनाव ऋतु है।  

सखी (एक): पर देख, फूले काँस सकल महि छाये वर्षा बूढ़ी हो रही हो? इस सफेदी से लग रहा है मानो..वर्षा विदाई की ओर है?  

सखी (दो): तुम्हे कैसे समझाऊ, यह सफेदी काँस के फूलों की नहीं, बल्कि राजनीतिक पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के नए-नए कुर्ते-पायजामों की है। चुनाव की बेला में सेठ- साहूकार- कलाकार-दलाल, सभी यह वेशभूषा धारण कर लेते हैं। तभी वे जनप्रतिनिधि कहलाने के हकदार बनते हैं।  

सखी (एक): लेकिन, दादुरों (मेंढक) के समूह कोरस में वर्षा की विदाई को अभिव्यक्त कर रहे है?  

सखी(दो): तुम निरी मूर्ख ठहरी, रीतिकाल से बाहर आओ। यह चुनाव काल है। यह मेंढक की नहीं नेताओं की आवाज़ है। पूरे पाँच साल बाद वे कोरस में अपनी उपस्थिति और जनता से किए गए वादो को दुहरा रहे हैं। 

सखी(एक): देख-देख, शरद के स्वागत में लोग अन्न-वस्त्र दान कर रहे हैं, अमृत पान करा रहे हैं।  

सखी(दो): पगली,यह शरद का स्वागत नहीं, चुनाव के दौरान वोट बटोरने का आजमाया हुआ फार्मूला है। ये लोग मतदाता हैं और वे नेता। जिसे तुम अमृत-पान समझ रही हो वह मदिरा है जिसके नशे में चूर मतदाता आँख बंद कर वोट डाल आते हैं और ज्यादातर का वोट बिना जाए ही डल जाता है।  

सखी(एक): लेकिन यह तो देख कि शरद के आगमन के साथ ही धरती रोशनी से नहा गयी है।  

सखी(दो): तुम तो कुछ समझ ही नहीं रही हो, यहाँ तीन-तीन दिन लाइट नहीं रहती, पर चुनाव आते ही घर तो घर सड़कों पर भी दिन भर लाइट रहने लगी है ताकि हम बिजली संकट भुलाकर फिर इन नेताओं झोली वोट से भर दें।  

सखी(एक): अरे अरे देखो, लगता है महाराज नगर भ्रमण पर निकले है, चलो राजमार्ग पर चल कर उनके दर्शन करें।  

सखी(दो): ये महाराज नहीं टिकट राज है और इनके दर्शन के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं क्योंकि मतदान तक ये खुद हर घर, गली, मुहल्ले में घूम घूम कर हमारे हाथ-पैर जोड़ेंगे। हाँ, चुनाव जीतते ही फिर पाँच साल तक हम इन्हें ढूंढते रह जायेंगें.. यही राजनीति है।  

सखी(एक): यह नीति है या अनीति, चल बहना, इससे तो हम रामायण काल में ही भले थे.....।

सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...