मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

मंदिर नहीं आस्था की यशगान…!!

नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं।

नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं॥

भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते।


गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असिचर्म सक्ति बिराजते॥


आकाश में नगाड़े बज रहे हैं। गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं। अप्सराएं नाच रही हैं। देवता और मुनि परमानंद प्राप्त कर रहे हैं। भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न, विभीषण, अंगद, हनुमान्‌ और सुग्रीव आदि सहित छत्र, चँवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिए हुए सुशोभित हैं।


भगवान श्रीराम अपने नए महल में विराजमान हो गए हैं। महल यानि श्रीराम का नया मंदिर धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, बुनियादी ढांचे और वास्तुकला के लिहाज से दुनिया में अनूठा और अपनी तरह का इकलौता मंदिर है। आखिर जनमानस की 500 साल की पीड़ा,वेदना, अवहेलना और आस्था को पहुंची चोट के बाद मिले अधिकार को बहुसंख्यक वर्ग ने पूरे आनंद के साथ दूर किया है। खुशी, न्याय और अधिकार जितनी देर से मिलता है उसका आनंद भी उतना ही बढ़ जाता है और यही इन दिनों में अयोध्या में, उप्र में और पूरे देश के साथ दुनिया भर में नजर आ रहा है। लोग उमंग में हैं,उत्साहित हैं,उल्लासित हैं और मुदित भी।


उत्तर प्रदेश सरकार से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार भगवान राम का मंदिर 57,400 वर्ग फीट क्षेत्र में निर्मित किया जा रहा है। यह मंदिर 360 फीट लंबा 235 फीट चौड़ा और 161 फीट ऊंचा है। मंदिर में कुल तीन तल बनाए गए हैं और प्रत्येक तल 20 फीट ऊंचा है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर में शिखर को मिलाकर कुल पांच मंडप नजर आएंगे ।


अयोध्या में मुख्य मंदिर का एरिया करीब पौने तीन एकड़ यानि 2.77 एकड़ के फैला है । मंदिर को भव्य और आकर्षक साज सज्जा वाले स्तंभों से सजाया गया है जो मंदिर की सुंदरता बढ़ाने के साथ साथ इसकी मजबूती में भी सहभागी है। मंदिर में पहली मंजिल पर 131 और दूसरी मंजिल पर 74 स्तंभ बनाए गए हैं, जबकि सबसे नीचे की मंजिल पर 160 खंबे होंगे। संक्षेप में समझे तो मंदिर निर्माण के लिए नींव का काम 2021 में पूरा हुआ था जबकि 2022 में पत्थर लगाने का काम पूरा हुआ और  मंदिर निर्माण समिति ने 2023 में ग्राउंड फ्लोर का काम पूरा कर लिया गया। अब रामलला 22 जनवरी को अपने नए मंदिर में विराजमान हो गए हैं।


 बताया जाता है कि मंदिर में गर्भ गृह की लंबाई और चौड़ाई 20-20 फीट है । यहां एक साथ 1000 श्रद्धालु खड़े हो सकेंगे। मंदिर में अंदर जाने के लिए दो स्वर्ण जड़ित द्वार हैं । मंदिर के आसपास के 3 किलोमीटर के इलाके को सुरक्षा की दृष्टि से रेड जोन नाम दिया गया है। नवनिर्मित अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी करीब डेढ़ किलोमीटर है जबकि महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से मंदिर तक पहुंचने के लिए 10 किलोमीटर का फासला तय करना पड़ेगा।


जैसा कि हम सब जानते हैं कि अयोध्या का विवाद करीब 500 साल पहले शुरू हुआ था और 40 दिन तक लगातार सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय के पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने 9 नवम्बर 2019 को 1045 पृष्ठों में मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया था। वही, मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ जमीन अलग से दी गई है। कहा जाता है न कि देर आए दुरुस्त आए…अयोध्या को देर से ही सही उसका हक मिल गया है और अब दुनिया आने वाले हजार सालों और उसके बाद तक पुण्यभूमि अयोध्या का सांस्कृतिक वैभव,आध्यात्मिक उत्थान और इतिहास से वर्तमान तक की समृद्धि का विस्तार और विकास देखेगी।


श्रीराम के विश्वकर्मा

सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार।

जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार॥ 


भावार्थ-दशरथ के महल की शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है, जहाँ समस्त देवताओं के शिरोमणि राम ने अवतार लिया है॥ 



क्या आप कल्पना भी कर सकते हैं कि अयोध्या के जिस भव्य और दिव्य भारतीय नागर शैली के मंदिर को देखने के लिए दुनिया भर के करोड़ों लोगों की निगाहें तड़प रही हैं और हजारों लोग दर्शन के पहुंच रहें हैं उसे शुरुआती तौर पर उच्च तकनीक, एआई और अन्य आधुनिकतम संसाधनों से नहीं बल्कि एक अनुभवी व्यक्ति ने तीन दशक पहले 1987-88 में पैरों से जमीन नापकर नक्शा तैयार कर दिया था। एक बार जमीन की पैमाइश होने के बाद उन्होंने अपने हुनर,अनुभव और कुशलता का ऐसा समां बांधा कि आज दुनिया चकित होकर देख रही है। मंदिर प्रबंधन समिति द्वारा निर्धारित समय सीमा पर जब मंदिर और इसका पूरा परिसर सज धज कर पूरी तरह से तैयार हो जाएगा तो देखने वालों के सिर सम्पूर्ण श्रद्धा से झुक जाएंगे।


हम सभी की आस्था के केंद्र भगवान श्रीराम के इस नए घर (राम मंदिर) को इतने आकर्षक और भव्यतम ढंग से डिजाइन करने का दायित्व और सौभाग्य मशहूर वास्तुकार और गुजरात के अहमदाबाद के रहने वाले चंद्रकांत सोमपुरा को मिला है। सबसे अनूठी बात यह है कि चंद्रकांत सोमपुरा के पास वास्तुकला की न तो कोई डिग्री है और न ही उन्होंने अपने इस पेशे के लिए किसी संस्थान से प्रशिक्षण हासिल किया है।


ज़ाहिर सी बात है इस बात को सुनकर कोई भी चौंक सकता है लेकिन जिस शख्स ने देश और दुनिया के सबसे शानदार करीब 130 मंदिरों को तैयार किया हो,उसे किसी डिग्री या संस्थान से औपचारिक प्रशिक्षण की भला क्या आवश्यकता होगी। श्री सोमपुरा स्वयं एक स्कूल हैं,संस्थान हैं और वास्तुकला के सबसे बड़े आचार्य हैं। उन्होंने अक्षरधाम और बिड़ला मंदिर जैसे सर्वोत्कृष्ट मंदिरों को डिजाइन किया है। चंद्रकांत सोमपुरा के दादाजी ने सोमनाथ मंदिर का नक्शा तैयार किया था जो नागर शैली का सर्वोत्तम उदाहरण है। उनका परिवार पीढ़ियों से यह काम कर रहा है इसलिए राम मंदिर के इस सबसे बड़े और सबसे सम्मानित उत्तरदायित्व में उनके दोनों बेटे निखिल सोमपुरा और आशीष सोमपुरा उनका साथ दे रहे हैं। पिता पुत्र की इस तीन सदस्यीय टीम ने ऐसी बेजोड़ रचना रची है जिसका फिलहाल तो कोई सानी नहीं है क्योंकि करीब 100 से 120 एकड़ भूमि पर पांच गुंबदों वाला तीन मंजिला मंदिर दुनिया में कहीं नहीं है। वहीं, सोमपुरा परिवार के इस उत्कृष्ट डिजाइन को अमली जामा पहनाने का जिम्मा लार्सन एंड टूब्रो ने लिया है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त को जब अयोध्या में मौजूदा राम मंदिर का भूमि पूजन किया था तब भी मंदिर का मूल नक्शा बनकर तैयार था और मामूली सुधारों के साथ उसी नक्शे की बुनियाद पर यह मंदिर बना है। हालांकि, राम मंदिर का शिलान्यास लगभग तीस साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की अनुमति से 9 नवंबर 1989 को किया गया था और तब शिलान्यास की पहली ईंट दलित समुदाय से आने वाले कामेश्वर चौपाल ने रखी थी।


चंद्रकांत सोमपुरा को यह महती ज़िम्मेदारी विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने सौंपी थी। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए नक्शा बनाने का काम वाकई चुनौती भरा था। एक तो उस दौरान निर्माण स्थल पर बाबरी मस्जिद का मलवा पड़ा था इसलिए उन्होंने पूरी भूमि को अपने पैरों से मापकर सटीक अनुमान लगाया। इसी अनुमान के आधार पर चंद्रकांत सोमपुरा के बने नक्शा को देख सभी दंग रह गए थे। श्री सोमपुरा ने तीन डिजाइन तैयार किए थे जिसमें से एक को सर्व सम्मति से स्वीकार कर लिया गया। फिर इस डिजाइन के आधार पर लकड़ी के मंदिर का मॉडल तैयार किया गया । 


 मंदिर के निर्माण में एक अन्य चुनौती वे लाखों करोड़ों ईंटें भी थी जो पूरे देश से आस्था का सैलाब बनकर अयोध्या में घर घर से पहुंची थी। श्री सोमपुरा की डिजाइन में इनका बखूबी इस्तेमाल किया गया है।



आराध्य की आराधना


रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्य पराक्रमः।

राजा सर्वस्य लोकस्य देवानाम् इव वासवः॥


भगवान श्रीराम धर्म के मूर्त स्वरूप हैं। वे बड़े साधु और सत्य पराक्रमी हैं। जिस प्रकार इंद्र देवताओं के नायक हैं, उसी प्रकार भगवान राम हम सभी के नायक हैं।


अयोध्या में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा की गाथा घर घर पहुंच गई है। एक तरह से सनातन ही नहीं अन्य धर्मों के लोग भी वैदिक पूजा पद्धति और प्रतिमा की स्थापना तक की तमाम विधियों को जानने समझने लगे हैं। प्राण प्रतिष्ठा समारोह के साथ ही कई जैसे नए और अनूठे शब्द सामने आए हैं जो धार्मिक रीति रिवाजों से जुड़े विद्वानों को छोड़कर जनमानस को विस्मित करने वाले हैं। इसलिए, हम अध्याय में इन शब्दों की गुत्थी को सुलझाने और उसे सहज बनाने का प्रयास करते हैं। 


जैसा की हम आमतौर पर जानते हैं कि प्रतिष्ठा का अर्थ है स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा का शाब्दिक अर्थ हुआ -जीवन शक्ति की स्थापना करना या देवता को जीवन में लाना। सनातन धर्म में प्राण प्रतिष्ठा से पहले किसी भी मूर्ति पूजा के योग्य नहीं मानी जाती है बल्कि उसे निर्जीव मूर्ति माना जाता है। प्राण प्रतिष्ठा के जरिए उनमें प्राण शक्ति का संचार करके उन्हें पूजनीय बनाया जाता है. इसके बाद ही वह प्रतिमा पूजा और भक्ति के योग्य बन जाती है.


रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान प्रायश्चित पूजा,कर्म कुटी पूजन,जलाधिवास,गंधाधिवास, घृताधिवास, फलाधिवास, मध्याधिवास और शय्याधिवास जैसे कई नए पूजा संस्कार आम लोगों ने सुने हैं। वैदिक परंपरा के मुताबिक प्रायश्चित और कर्म कुटी पूजन किसी मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की शुरुआत में किया जाने वाला सबसे पहला पूजन है. यह पूजा, जाने-अनजाने में जीवन के किसी भी क्षण में होने वाली प्रत्येक गलतियों या पाप का प्रायश्चित है. इस पूजा में शारीरिक, आंतरिक, मानसिक और वाह्य तरीकों से प्रायश्चित किया जाता है। कई बार हम जाने अनजाने में कई प्रकार की ऐसी गलतियां कर लेते हैं, जिसका हमें तनिक भी आभास नहीं हो पाता है इसलिए ऐसे में शुद्धिकरण होना बेहद जरूरी होता है।


 यही वजह है कि प्राण प्रतिष्ठा से पहले प्रायश्चित पूजा की जाती है.  अयोध्या में इस पूजा के ज़रिए रामलला से और पूजन शुरू करने के पहले सभी गलतियों के लिए माफी मांगी गयी। राम लला से इसलिए क्योंकि यह माना गया कि रामलला की प्रतिमा बनाने में छेनी और हथौड़े के इस्तेमाल के चलते उन्हें चोट पहुंची होगी. वहीँ, कर्म कुटी पूजा का मतलब होता है यज्ञशाला पूजन। यज्ञशाला शुरू होने से पहले हवन कुंड अथवा वेदी का पूजन करते हैं। इस पूजा में जगत के पालनहार भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। ऐसा करने से भगवान विष्णु मंदिर में जाने का आदेश करते हैं। इसके बाद ही प्राण प्रतिष्ठा के लिए मंदिर में प्रवेश किया जाता है।


इसके बाद, भगवान राम की प्रतिमा को वैदिक मंत्रोचार के बीच गर्भ गृह में रखा गया. इस दौरान ‘प्रधान संकल्प’, ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा ने लिया। ‘प्रधान संकल्प' की भावना यह है कि भगवान राम की 'प्रतिष्ठा' सभी के कल्याण के लिए, राष्ट्र के कल्याण के लिए, मानवता के कल्याण के लिए और उन लोगों के लिए भी की जा रही है जिन्होंने इस कार्य में अपना योगदान दिया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने भी आधिकारिक तौर पर बताया कि अयोध्या में जन्म भूमि स्थित राम- मन्दिर में 18 जनवरी को दिन में 12:30 बजे के बाद भगवान राम की मूर्ति का प्रवेश हुआ. दोपहर 1:20 बजे यजमान द्वारा ‘प्रधान संकल्प’ लिया गया। मूर्ति के जलाधिवास तक के विधान इसी दिन संपन्न हुए। 19 जनवरी शुक्रवार को प्रातः नौ बजे अरणी मन्थन से अग्नि प्रकट की गई। उसके पूर्व गणपति सहित अन्य देवताओं का पूजन हुआ।


अब कई पाठक सोच रहे होंगे कि अरणी मंथन क्या पहेली है। दरअसल, यज्ञ में आहुति के लिए या यज्ञ के निमित्त वैदिक पद्धति से अग्नि प्रकट करने की विधि को अरणी मंथन कहते हैं। इसमें शमी या खेजड़ी और पीपल की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। शमी को शास्त्रों में अग्नि का स्वरूप कहा गया है जबकि पीपल को भगवान का स्वरूप माना गया।  इसीलिए इस वृक्ष से अरणी मंथन काष्ठ बनाया जाता है। फिर अग्रि मंत्र का उच्चारण करते हुए अग्रि प्रज्वलित की जाती है। अग्नि प्रकट करने के लिए शमी की लकड़ी से बने छेद युक्त तख्ते को लकड़ी की ही छड़ी से मथा जाता है। इस प्रक्रिया में मथनी को इतनी तेजी से चलाया जाता है कि उससे चिंगारी उत्पन्न होने लगती है, जिसे नीचे रखी घास और रूई में लेकर यज्ञ में उपयोग किया जाता है। अरणी में छड़ी के टुकड़े को उत्तरा और तख्ते को अधरा कहते हैं।


राम लला की प्राण प्रतिष्ठा से पहले उन्हें जलाधिवास कराया गया। इस विधि के तहत राम लला की मूर्ति को जल से भरे हुए विशाल पात्र में शयन कराया गया । इसी तरह, गंधाधिवास विधि के अंतर्गत मूर्ति पर सुगंधित द्रव्यों का लेप लगाया गया। औषधाधिवास की प्रक्रिया में मूर्ति को औषधि में रखा गया और फिर क्रमशः केसराधिवास में मूर्ति को केसर में, घृताधिवास में मूर्ति को घी में और धान्याधिवास में मूर्ति को कई तरह के धान्यों यानी अनाजों में रखा गया। 20 जनवरी की सुबह शर्कराधिवास और फलाधिवास संस्कार हुए । इनमें राम लला को शक्कर और फलों के बीच रखा गया. इसके बाद इसी दिन शाम को पुष्पाधिवास में मूर्ति को रंग बिरंगे और सुगंधित फूलों के साथ रखा गया।


प्राण प्रतिष्ठा के एक दिन पहले 21 जनवरी को मध्याधिवास और शय्याधिवास नामक अनुष्ठान हुए।  मध्याधिवास मूर्ति को शहद के साथ रखा गया जबकि शय्याधिवास में मूर्ति को शय्या पर लिटाया गया। सामान्य भाषा में समझे तो तमाम द्रव्यों,औषध,सुगंध,पुष्प,शहद जैसी सामग्री से स्नान और शुद्धिकरण के बाद भगवान को आराम कराया गया जिससे वे भक्तों को पूरी आभा, दिव्यता और भव्यता के साथ दर्शन देने के लिए तैयार हो सकें। जैसा की हम सभी जानते हैं कि राम लला की मूर्ति का वजन करीब 150 किलो और कमल के पुष्प सहित ऊंचाई काफी ज्यादा हो गई है इसलिए इन तमाम वैदिक परंपराओं के पालन के लिए भगवान राम की रजत प्रतिमा का उपयोग किया गया। इन सभी संस्कारों,विधियों और पद्धतियों के बाद भगवान अपने आसन पर विधि विधान के साथ प्रतिष्ठित हुए।


 







एक भारत श्रेष्ठ भारत

राम राज बैठें त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका॥बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई॥

 रामचंद्रजी के राज्य पर प्रतिष्ठित होने पर तीनों लोक हर्षित हो गए, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसी से वैर नहीं करता। श्री रामचंद्रजी के प्रताप से सबकी विषमता यानि आंतरिक भेदभाव मिट गया ॥


कश्मीर में बर्फ से ढकी ऊंची चोटियों से लेकर कन्याकुमारी में धूप से सराबोर समुद्र तटों तक,राम नाम की गूंज ने पूरे भारत में भक्ति का माहौल बना दिया है। अब यह भक्ति अयोध्या में ऐतिहासिक राम मंदिर के रूप में मूर्त रूप ले रही है। यह गौरवमय मंदिर भारत की एकता और भक्ति के प्रतीक के रूप में खड़ा है, न केवल भव्यता में, बल्कि देश-विदेश से मिले योगदान के रूप में भी यह मंदिर अद्वितीय है। 'एक भारत श्रेष्ठ भारत 'पहल इस मंदिर के साथ गहराई से जुड़ी दिखती है। यह मंदिर उस अटूट विश्वास और उदारता का प्रमाण है जो किसी सीमा से परे किसी मंदिर के तीर्थाटन के लिए पूरे देश को जोड़ती है।

मंदिर का मुख्य भाग राजसी ठाठ-बाट लिए हुए है। यह राजस्थान के मकराना संगमरमर की प्राचीन श्वेत शोभा से सुसज्जित है। पीआईबी के एक लेख के मुताबिक इस मंदिर में देवताओं की उत्कृष्ट नक्काशी कर्नाटक के चर्मोथी बलुआ पत्थर पर की गई है। जबकि, प्रवेश द्वार की भव्य आकृतियों में राजस्थान के बंसी पहाड़पुर के गुलाबी बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है। गर्भ गृह को मजबूती देने का काम मध्य प्रदेश के छतरपुर और रीवा के पत्थरों ने किया है। भगवान राम की मूर्ति बनाने में इस्तेमाल किया गया काला पत्थर कर्नाटक से आया है। हिमालय की तलहटी से अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा ने जटिल नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजे और हस्तनिर्मित संरचना पेश किए हैं,जो दिव्य क्षेत्र के प्रवेश द्वार के रूप में खड़े हैं।

इस भव्य और दिव्य मंदिर के लिए योगदान की सूची यहीं ख़त्म नहीं होती। पीतल के बर्तन उत्तर प्रदेश से तो पॉलिश की हुई सागौन की लकड़ी महाराष्ट्र से आई है। इस राम मंदिर की कहानी सिर्फ सामग्री और उसकी भौगोलिक उत्पत्ति के बारे में नहीं है। यह उन अनगिनत हजारों प्रतिभाशाली शिल्पकारों और कारीगरों की कहानी है जिन्होंने मंदिर निर्माण के इस पवित्र प्रयास में अपना दिल, आत्मा और कौशल डाला है।

राम मंदिर अयोध्या में सिर्फ एक स्मारक नहीं है; यह विश्वास की एकजुट शक्ति का जीवंत प्रमाण है। हर पत्थर,हर नक्काशी और हर संरचना 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की कहानी कहती है। यह भौगोलिक सीमाओं से परे सामूहिक आध्यात्मिक यात्रा में दिलों को जोड़ता है।


अंग्रेज़ी चोला उतारकर 'भारतीय' हो रही है हमारी वायुसेना

आज़ादी के अमृतकाल में भारतीय वायुसेना अंग्रेज़ी चोला उतारकर पूरी तरह से भारतीयता में ढल रही है। अक्तूबर माह की 8 तारीख को जब भारतीय वायुसेना ने अपना 91वा स्थापना दिवस मनाया तो वह अपने नए ध्वज के साथ सामने आई जो संपूर्ण रूप से भारतीय रंग में रंगा था। इस वायुसेना दिवस पर हमारी इस हवाई ताकत ने करीब सात दशक से जारी गुलामी के प्रतीकों से पूरी तरह से छुटकारा पा लिया गया है। अब वायुसेना ध्वज में हमारी आन बान शान और भारतीय गौरव तथा आत्मसम्मान का प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा, अशोक चिन्ह के साथ चमकने  लगा है। देश के मंत्र 'सत्यमेव जयते' और वायुसेना के मंत्र 'नभ: स्पृशं दीप्तम्'  को एक ध्वज पर लाकर भारतीय वायुसेना ने नई आभा हासिल की है। इसका लोकार्पण वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल वी आर चौधरी ने प्रयागराज में आयोजित वायुसेना दिवस पर किया।


भारतीय वायुसेना ने केवल ध्वज ही नहीं बदला है बल्कि बहुत कुछ पहली बार किया है। देश के लोगों में अपनत्व का भाव जगाने के लिए वायुसेना ने दिल्ली की सरहद पार कर देश के दिल तक पहुंचने की कवायद शुरू की है इसलिए इस बार वायुसेना दिवस का आयोजन दिल्ली से बाहर प्रयागराज में हुआ। बीते साल यह आयोजन चंडीगढ़ में हुआ था। इस साल वायुसेना दिवस की थीम “IAF – Airpower Beyond Boundaries” अर्थात् सीमाओं से परे हवाई ताकत' थी। इसे हमारी हवाई ताकत ने कई बार साबित भी किया है।


वायुसेना दिवस को दिल्ली से बाहर मनाने का यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा बल्कि भविष्य में और भी कई शहरों को वायुसेना दिवस की मेजबानी का अवसर मिल सकता है। भारतीयकरण के साथ साथ वायुसेना जनभागीदारी और जन सहयोग के भाव को भी चरितार्थ कर रही है इसलिए वायुसेना दिवस के पहले भोपाल सहित कई शहरों में फ्लाईपास्ट का आयोजन हुआ ताकि आम लोग भी वायुसेना की इलीट क्लास वाली छवि के स्थान पर इसके वास्तविक रूप से रूबरू हो सके।

वायुसेना में चाहे पूरी तरह से भारतीय तेजस लड़ाकू विमान को शामिल करना हो या फिर ध्रुव हेलीकाप्टर या फिर स्वदेशी ब्रम्होस मिसाइल को या फिर अग्निवीरों को, इस तरह के हर फैसले से यह साफ जाहिर होता है कि भारतीय वायुसेना अब भारतीय संस्कृति,सपने और सरोकारों को साकार करने में जुटी है। वायुसेना में महिलाओं की बढ़ती भूमिका भी इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है। महिलाओं ने भी वायुसेना के विश्वास को कभी कम नहीं होने दिया है।नर्सिंग से लेकर लड़ाकू विमान तक वे पुरुष सह कर्मियों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर कदमताल कर रही हैं।


अगर हम भारतीय वायुसेना के इतिहास पर नजर डाले तो इसका गठन 8 अक्तूबर 1932 को ब्रिटिश सरकार द्वारा 'रॉयल इंडियन एयरफोर्स' के रुप में किया गया था । इसलिये 8 अक्तूबर को प्रतिवर्ष 'भारतीय वायुसेना दिवस' मनाया जाता है। इस दिन न सिर्फ भारतीय वायुसेना के गौरवमयी इतिहास को याद किया जाता है बल्कि इसके सुनहरे भविष्य के लिए रणनीतियों पर भी विचार किया जाता है। 


 भारतीय वायुसेना का द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर आज तक वीरता,बलिदान और जांबाजी का स्वर्णिम इतिहास है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और चीन के खिलाफ लड़े गए विभिन्न  युद्धों  और 1999 में कारगिल युद्ध तक में शानदार प्रदर्शन करते हुए न केवल दुश्मन को धूल चटाई है बल्कि अपने बलिदान और शौर्य से नया इतिहास भी रचा है।


कभी भारतीय वायुसेना के मुखिया रहे और अदम्य साहस के धनी एयर चीफ मार्शल अर्जन सिंह को असाधारण नेतृत्व क्षमता के लिए फाइव स्टार जनरल का ओहदा दिया गया। वे भारतीय वायुसेना के इकलौते अफसर थे जिनको फील्ड मार्शल के बराबर फाइव स्टार रैंक मिली थी। 

 

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि वायुसेना दिवस पर भारतीय वायुसेना अपने पराक्रम, सैन्य क्षमता, आधुनिक अस्त्र शस्त्रों का प्रदर्शन तो करती ही है,साथ ही इस अवसर पर वायुसेना में योगदान देने वाले हर व्यक्ति की सराहना की जाती है। सफल मिशनों को पूरा करने और मध्य वायु कमान को उच्च स्तर की परिचालन तैयारियों को प्रदर्शित करने में सक्षम बनाने के लिए उनकी प्रशंसा की जाती है। पिछले साल की उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए वायु योद्धाओं को विभिन्न पुरस्कार और सम्मान पदक प्रदान किए जाते हैं।


वायुसेना अपने स्थापना दिवस पर देश वासियों को यह विश्वास भी दिलाती है कि वे पूरी तरह सुरक्षित हैं और वायुसेना के अत्याधुनिक विमान दुश्मन की आंख में आंख डालकर उसे नेस्तनाबूद करने का माद्दा रखते हैं। वायुसेना का आश्वासन ही हमें आर्थिक मोर्चे से लेकर हर क्षेत्र में विकास का हौंसला दे रहा है। हमें अपनी वायुसेना पर नाज है।


 


कण कण में राम,जन जन में राम


बंदउँ अवध पुरी अति पावनि,

रजू सरि कलि कलुष नसावनि।प्र

नवउँ पुर नर नारि बहोरी,

ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी।।


भावार्थ- मैं अति पवित्र श्री अयोध्यापुरी और कलियुग के पापों का नाश करने वाली श्री सरयू नदी की वन्दना करता हूँ। फिर अवधपुरी के उन नर-नारियों को प्रणाम करता हूँ, जिन पर प्रभु श्री रामचन्द्रजी की बहुत ममता है।



देश की नई देश की आध्यात्मिक और धार्मिक राजधानी अयोध्या भगवान श्री राम की जन्म भूमि के लिए दुनिया भर में मशहूर है। जाहिर सी बात है जहां साक्षात रामलला का जन्म हुआ हो उसे स्थान से बढ़कर और क्या हो सकता है। लेकिन सजती संवरती और नई अयोध्या को देखने के लिए यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अयोध्या में रामलला विराजमान या श्री राम जन्मभूमि के अलावा और भी बहुत कुछ देखने को मिलेगा । 

अयोध्या प्राचीन काल से ही साधु संतों और मठ मंदिरों की नगरी रही है। यहां करीब 6000 से ज्यादा मंदिरों की मौजूदगी मानी जाती है। स्कंद पुराण में भी इस बात का उल्लेख है और कई ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी अपने लेखन में अयोध्या में इतनी बड़ी संख्या में मंदिरों की मौजूदगी का उल्लेख किया है । अयोध्या विकास प्राधिकरण के अनुसार अयोध्या में आज भी 5000 से ज्यादा साधु संत रहते हैं और उतनी ही संख्या में मठ मंदिर भी मौजूद हैं। अयोध्या के बढ़ते धार्मिक प्रभाव के कारण मठों और साधु संतों की संख्या लगातार बढ़ भी रही है । पहले से मौजूद मठ मंदिरों के अलावा यहां देश के साथ-साथ दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधि केंद्र बनाने की तैयारी भी शुरू हो गई है। इन केंद्रों के निर्माण से वहां से भी बड़ी संख्या में धार्मिक और भगवान राम में आस्था रखने वाले अनुयायी यहां आएंगे। 

दुनिया के सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक अयोध्या में पर्यटन विभाग ने फिलहाल 60 मंदिरों का चयन किया है। इन मठ मंदिरों को नए सिरे से सजाया संवारा जा रहा है। इसके अलावा, यहां मौजूद अखाड़ों की रंगत भी निखारी जा रही है । यदि हम अयोध्या के कुछ प्रमुख पर्यटन स्थलों और धार्मिक स्थलों की चर्चा करें तो यहां राम जन्मभूमि के अलावा कनक मंदिर, हनुमान गढ़ी, नागेश्वर नाथ मंदिर, कालेश्वर मंदिर, मणि पर्वत गुलाब बाड़ी, दशरथ महल, सीता रसोई, राम कथा पार्क और तुलसी स्मारक संग्रहालय जैसे दर्शनीय स्थल हैं।  हनुमान गढ़ी के बारे में तो यह कहा जाता है कि साक्षात हनुमान जी यहां रहते हैं। वहीं, कनक भवन मंदिर अपनी सुंदरता और दशरथ महल अपनी भव्यता के कारण बहुत लोकप्रिय है । अयोध्या में बहु बेगम का मकबरा भी हमेशा से ही पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है।  खास बात यह है कि कनक भवन, हनुमानगढ़ी और दशरथ महल की दूरी श्री राम जन्मभूमि से ज्यादा नहीं है और श्रद्धालु कुछ ही समय में इन सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों के दर्शन कर सकते हैं। 

अयोध्या से जुड़े कुछ तथ्यों पर गौर करें तो यहां करीब साढ़े 12 सौ गांव है और आबादी कुल मिलाकर 24 लाख से ज्यादा है। यहां विधानसभा की पांच और लोकसभा की एक सीट है। अयोध्या की मुख्य भाषा अवधी मिश्रित हिंदी है । अयोध्या की एक अन्य पहचान पवित्र और पूजनीय सरयू नदी भी है।  भगवान राम का बचपन इसी सरयू नदी के किनारे बीता है इसलिए आज भी सरयू नदी को देश की पवित्रम नदियों में से एक माना जाता है । सरकार सरयू नदी की भी नए सिरे से साज संवार कर रही है । यहां घाट के किनारे रिवर फ्रंट तैयार किया जा रहा है ताकि श्रद्धालु इस महान जीवनदायिनी नदी की महिमा से रूबरू हो सकें। सरयू नदी पर बने अयोध्या के प्रमुख घाटों की बात करें तो श्रद्धालु यहां राम की पौड़ी, रामघाट, गोलाघाट, जानकी घाट, लक्ष्मण घाट जैसे विभिन्न स्थानों के जरिए सरयू नदी की भव्यता,विशालता और पवित्रता के दर्शन कर सकते हैं।

‘सजन रेडियो बजईओ-बजईओ जरा..’

हाल ही के वर्षों में रेडियो पर केंद्रित दो गाने खूब बजे। इनमें से एक शायद 2009 में आया था जिसमें मन का रेडियो बजाने की बात थी:

‘मन का रेडियो बजने दे ज़रा

गम को भूल कर जी ले तू ज़रा

स्टेशन कोई नया ट्यून कर ले ज़रा

फुल्टू ऐटिटूड दे दे तू ज़रा..’


इसके बाद 2017 में सलमान खान की फिल्म ट्यूबलाइट में सजन रेडियो ने धूम मचाई:

‘सजन रेडियो बजईओ बजईओ

बजईके सभी को नचईओ जरा..’ 


कहा जाता है फिल्में समाज का आइना होती हैं।समाज में जो चल/दौड़ रहा होता है वह फिल्मों में भी दिखने लगता है। इसका मतलब रेडियो चल रहा है…दौड़ रहा है, तभी तो फिल्मों में रेडियो पर गाने लिखे जा रहे हैं। वाकई, रेडियो फिर अपनी पूरी रफ्तार से चल पड़ा है। बीच में कुछ वक्त ऐसा था जब बुद्धू बक्से की आंधी में रेडियो को रफ्तार धीमी पड़ गई थी लेकिन लोगों को जल्दी ही समझ आ गया कि टीवी/छोटे परदे का जन्म उनको बुद्धू बनाने के लिए हुआ है। इसलिए, गलती समझ आते ही लोग वापस रेडियो की राह पर लौटने लगे।इस दौरान, रेडियो ने भी रंग रूप बदले और अपने आपको मोबाइल में समेट लिया। रेडियो कभी ट्रांजिस्टर बना तो कभी कारवां में बदला…कभी पॉडकास्ट बनकर छाया तो कभी कम्युनिटी रेडियो में,कभी मोबाइल में ऐप बनकर समाया, कभी कार में गूंजा तो कभी सुबह की सैर करने वालों की जेब में। रंग,रूप,आवाज और अंदाज बदलते हुए रेडियो एक बार फिर हमारे आसपास सुरीली तान छेड़ने लगा है ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब देशवासियों से अपने मन की बात कहने सुनने का विचार किया तो उन्होंने रेडियो को ही चुना और हर माह के अंतिम रविवार को प्रसारित होने वाला यह कार्यक्रम सौ एपिसोड को भी पार कर गया है और इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। रेडियो और प्रधानमंत्री के गठजोड़ ने रेडियो का तो पुनर्जन्म किया ही,खादी से लेकर स्थानीय उत्पादों तक की काया पलट कर रख दी…ये रेडियो की लोकप्रियता का ही कमाल थे। प्रधानमंत्री की राह पर चलते हुए कुछ और प्रयोग हुए जैसे मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिल से कार्यक्रम के जरिए रेडियो से राज्य के लोगों से संवाद किया। वहीं, अभी केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी नई सोच नई कहानी कार्यक्रम के माध्यम से इस सिलसिले को आगे बढ़ा रही हैं।

रेडियो की साख और हैसियत को इस बात से भी समझा जा सकता है कि कई बड़े मीडिया समूह एफएम और पॉडकास्ट के जरिए रेडियो की दुनिया में कूद रहे हैं। रेडियो का पर्याय आकाशवाणी तो है ही हरफनमौला जो हर दौर में पूरी मुस्तैदी से डटा हुआ है और गीत,संगीत,समाचार,विचार जैसे विविध कार्यक्रमों के साथ सूचना,शिक्षा और मनोरंजन प्रदान करते हुए बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की कसौटी पर खरा उतर रहा है। विश्व रेडियो दिवस एक बार फिर रेडियो को एक सशक्त माध्यम के रूप में अपनाने की याद दिलाता है। इस बार विश्व रेडियो दिवस की थीम ‘रेडियो: सूचना देने, मनोरंजन करने और शिक्षित करने वाली एक सदी’ है। आपदा से लेकर अवसर उपलब्ध कराने में रेडियो लगातार यह भूमिका निभाते आ रहा है। कोरोना संक्रमण के भयंकर दौर में हमने भी आपदा को अवसर में बदलकर रेडियो समाचारों को घर से प्रसारित कर और अच्छी खबर जैसी शुरुआत की थीं जिनको खूब सराहना मिली। ऐसे ही छोटे छोटे प्रयासों से रेडियो हमसे,समाज से संवाद करता है इसलिए फिलहाल तो मन का रेडियो बजाने का दौर है इसलिए वेलेंटाइन सप्ताह में बह रही प्रेम की हवा में आप भी सनम के साथ रेडियो पर प्यार लुटाइए और हमारे साथ गुनगुनाइए..‘सजन रेडियो बजईओ बजईओ

बजईके सभी को नचईओ जरा..।’

बहुजन हिताय बहुजन सुखाय

रेडियो अपनी स्थापना के बाद से ही सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम रहा है। समय के साथ रेडियो ने भले ही अपने रूप, आकार,प्रकार और नाम बदले हो लेकिन उसके मूल में हमेशा ही यह तीन सिद्धांत कायम रहे हैं । फिर चाहे 8 फुट के एंटीना से चलने वाला रेडियो हो या फिर जेब में मौजूद मोबाइल के जरिए हर व्यक्ति तक पहुंच रहा रेडियो। आकाशवाणी हो या ऑल इंडिया रेडियो या कोई और चैनल, रेडियो ने हमेशा ही बहुजन हिताय बहुजन सुखाय

की नीति पर चलते हुए सूचना और शिक्षा के साथ मनोरंजन का बीड़ा उठाया है। जब हम बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की बात करते हैं तो इसमें बच्चों से लेकर परिवार के सबसे बड़े बुजुर्ग सदस्य तक शामिल होते हैं। यही कारण है कि रेडियो या यूं कहें कि आकाशवाणी ने हमेशा ही अपने विविधता भरे कार्यक्रमों और तथ्य परक समाचारों के जरिए सही सूचना और मनोरंजन पहुंचाने का दायित्व निभाया है।  दशकों से लेकर हाल में हुई कुछ घटनाओ के संदर्भ में देखें तो रेडियो हमेशा ही जनमानस का सबसे बड़ा साथी बनकर उभरा है। चाहे असम सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में आने वाली बाढ़ हो या फिर देश भर को सदमे में डालने वाली बीमारी कोविड 19 आकाशवाणी ने आगे बढ़कर लोगों को सही सूचनाये देने में सबसे अहम भूमिका निभाई है। भोपाल में गैस त्रासदी के दौरान तो आकाशवाणी की टीम  ने संजीवनी बनकर लोगों का जीवन बचाने के लिए स्वयं की परवाह भी नहीं की थी। इसी तरह कोरोना संक्रमण के दौर में भी, जब लोग घरों में कैद  थे तब भी आकाशवाणी ने हर घंटे प्रसारित समाचारों,  सटीक जानकारी,  सूचना परक कार्यक्रमों और पूरे परिवार के मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराकर लोगों को न केवल घरों में बांधे रखा बल्कि उन्हें किसी भी अफवाह से बचा कर भी रखा। कुल मिलाकर देखें तो आकाशवाणी ने हमेशा ही राष्ट्रीय प्रसारक की अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। आप हम भोपाल में यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं और दिल्ली सहित देशभर में मौजूद हमारे साथी  अपने अपने क्षेत्रों में कुछ इसी तरह की भूमिका रहे हैं। एक बार फिर आप सभी को विश्व रेडियो दिवस की अनेक शुभकामनाएं..सुनते रहिए रेडियो,सुनते रहिए आकाशवाणी।

गीता के मानस, मानस के श्रीराम

 सठ सुधरहिं सत्संगति पाई। पारस परस कुघात सुहाई।। 

अर्थ: जिस प्रकार पारस के स्पर्श पाकर लोहा भी सोना बन जाता है, ठीक उसी प्रकार संत की संगति पाकर अपने अंदर की कुबुद्धि भाग जाती, जिससे जीवन अनमोल बन जाता है।


वैसे तो भगवान श्रीराम की लीलाओं का बखान करने वाले ढेरों धार्मिक ग्रंथ मौजूद हैं पर जब भी राम लला की स्तुति होती है रामायण और रामचरित मानस के उल्लेख के बिना आराधना पूरी नहीं हो सकती। संस्कृत निष्ठ और विद्वानों परिवारों में जहां महर्षि बाल्मिकी रचित रामायण को  पूजा जाता है तो आम भारतीय परिवारों में यह गौरव रामचरित मानस को प्राप्त है। देश में देवाधिदेव भगवान राम की महिमाओं की चर्चा हो और रामचरितमानस का उल्लेख न हो यह संभव ही नहीं है। 

सही मायनों में रामचरितमानस ही वह पवित्र और लोकप्रिय ग्रंथ है जिसने भगवान राम की लीलाओं को घर-घर और जन-जन तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण काम किया है। किसी भी सनातनी परिवार में रामचरितमानस ग्रंथ की पूजा घर में मौजूदगी एक अनिवार्य संस्कार है । शायद, यह दुनिया की इकलौती धार्मिक पुस्तक है जो आराध्य राम की तरह ही पवित्र मानी जाती है और घर घर में पूजी जाती है। यह ग्रंथ हर उम्र के लोगों को जीवन संस्कार, परंपरा, गौरव और उत्तम जीवन की सीख देने वाला है।  रामचरित मानस भगवान राम की तरह हमारे जीवन का अटूट हिस्सा है । आमतौर पर भारतीय घरों में प्रतिदिन इस ग्रंथ का पाठ होना सामान्य बात है। इसी तरह, साप्ताहिक तौर पर और कई जगह नियमित आधार पर होने वाला सुंदरकांड  का पाठ भी दिनचर्या का अटूट हिस्सा है। रामचरित मानस की बात करें तो इस महान ग्रंथ में भगवान श्रीराम शब्द 1 हजार 443 बार और सीता शब्द 147 बार आता है। इस ग्रंथ में चौपाई की संख्या 4 हजार 608, दोहों की संख्या 1 हजार 74, सोरठों की संख्या 207 तथा श्लोकों की संख्या 86 है। ऐसा माना जाता है कि रामचरितमानस के पाठ से से सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

 ऐसा नहीं है कि रामचरितमानस एक दिन में हम सबके घर-घर तक पहुंच गई । इस पवित्र पुस्तक को हर घर और हर व्यक्ति तक पहुंचने में गोरखपुर की गीता प्रेस की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। गीता प्रेस ने इस महान पुस्तक को महज ₹70 से लेकर₹1600 तक की सर्व सुलभ कीमत में उपलब्ध कराकर जन-जन तक पहुंचा दिया है। कीमत के साथ साथ गीता प्रेस ने भाषा की सरलता, भावार्थ, मुद्रण की शुद्धता,स्वच्छ मुद्रण और कागज की गुणवत्ता का विशेष रूप से ध्यान रखकर रामचरित मानस को लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया है। 

वैसे गीता प्रेस की ओर से केवल रामचरित मानस भर का प्रकाशन नहीं किया जाता बल्कि यह संस्थान सैकड़ों शास्त्र प्रमाणित धार्मिक पुस्तकों के प्रकाशन के लिए देश ही नहीं दुनिया भर में मशहूर है। करीब 100 साल पहले 1923 में स्थापित गीता प्रेस ने अब तक 95 करोड़ से ज्यादा धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन किया है और जिस गति से रामचरितमानस सहित भगवान राम के जीवन से जुड़ी उनकी लीलाओं को बताने वाली और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में उन्हें जन-जन में स्थापित करने वाली अयोध्या दर्शन, रामांक और अयोध्या महात्म्य जैसी पुस्तकों की मांग बढ़ रही है, उसे देखकर लगता है कि गीता प्रेस से प्रकाशित धार्मिक पुस्तकों का आंकड़ा जल्दी ही 100 करोड़ पुस्तकों की विशिष्ट उपलब्धि को हासिल कर लेगा। यह उपलब्धि किसी भी संस्थान के लिए गौरव का विषय है। दरअसल, गीता प्रेस में पुस्तकों का प्रकाशन शुद्धता, सत्यता, पवित्रता का ध्यान रखते हुए और लाभ कमाने की लालसा के बिना किया जाता है । यही कारण है कि गीता प्रेस से छपने वाली पुस्तक शास्त्र प्रमाणित होती हैं और उनके वर्णन पर आंख बंद करके भरोसा किया जा सकता है। गीता प्रेस से करीब 15 भाषाओं में 1800 पुस्तकों का प्रकाशन होता है।  यह प्रेस अपने सबसे लोकप्रिय ग्रंथ श्री रामचरित मानस की अब तक पौने चार करोड़ से ज्यादा प्रतियां प्रकाशित कर चुका है। अयोध्या में राम लाल की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही रामचरितमानस की मांग और बढ़ गई है इसलिए अब गीता प्रेस को प्रति माह रामचरितमानस की 75  हजार से लेकर 1 लाख प्रतियों  तक का प्रकाशन करना पड़ रहा है। उल्लेखनीय बात यह है कि अन्य प्रकाशनों और संसाधनों की कमी के कारण गीता प्रेस रामचरित मानस की इससे ज्यादा  प्रतियां चाहकर भी प्रकाशित नहीं कर  सकता। गीता प्रेस के देश भर में ढाई हजार से ज्यादा विक्रेता है। इसके अलावा कई व्यक्तिगत विक्रेता भी है जो अपने स्तर पर इन किताबों को खरीद कर ट्रेन, बस, साप्ताहिक बाजारों और अन्य माध्यमों से उनकी बिक्री करते हैं।

रामचरित मानस के महत्व और गीता प्रेस की उपयोगिता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्राण प्रतिष्ठा समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से वीवीआईपी अतिथियों को 300 चित्रों वाली रामचरितमानस पुस्तक उपहार के रूप में भेंट की गई । इसके अलावा, करीब 10 हजार आमंत्रित अतिथियों को प्रसाद के साथ अयोध्या दर्शन पुस्तक प्रदान की गई है । वहीं कुछ अन्य खास मेहमानों के लिए गीता प्रेस की चार पुस्तकों अयोध्या दर्शन, रामांक, अयोध्या महात्म्य और गीता दैनंदिनी के 51 सेट भेंट किए गए हैं।


देश और दुनिया में रामचरितbमानस की बढ़ती लोकप्रियता और मांग को देखते हुए गीता प्रेस ने कुछ समय के लिए इस पवित्र ग्रंथ को ऑनलाइन उपलब्ध कराने का निर्णय भी लिया जिससे प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान आम लोग सहजता से इस पवित्र ग्रंथ का पाठ कर सकें।

रामलला को समर्पित सबसे अलग-सबसे अनूठा

रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ। अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ।।

 भावार्थ:स्वयं लक्ष्मीपति भगवान्‌ जहाँ राजा हों, उस नगर का कहीं वर्णन किया जा सकता है? अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ और समस्त सुख-संपत्तियाँ अयोध्या में छा रही हैं

अयोध्या में रामलला के नए भव्य और दिव्य मंदिर में विराजमान होने के बाद दुनिया भर में उत्साह का माहौल है। लोगों की खुशियों का पारावार नहीं है और वे रामलला पर सर्वत्र न्यौछावर करने को तत्पर हैं। हर आम ओ खास इतना उल्लासित है कि वह अपने आराध्य को अपनी ओर से कुछ अलग,कुछ अनूठा और कुछ नया समर्पित करने के प्रयास में जुटा है। हर व्यक्ति अपनी हैसियत के मुताबिक अपने प्रभु और आराध्य को तन मन धन और अंतर आत्मा की गहराइयों से अपना अगाध प्रेम,श्रद्धा एवं समर्पण को भाव रूप में अर्पित करने के लिए आतुर है। कुछ लोग अपना भक्तिभाव समर्पित कर चुके हैं, कुछ कर रहे हैं और कुछ लोग तैयारियों में जुटे हैं। आम लोगों ने श्रद्धा पूर्वक दिए गए चंदे से पहले ही मंदिर ट्रस्ट का खज़ाना लबालब भर दिया है इसलिए अब कुछ अलग और कुछ अनूठा समर्पित करने की बारी है इसलिए दुनिया भर के सनातनी अपने आराध्य को एक से बढ़कर एक अनूठे और अचंभित करने वाले उपहार भेंट कर रहे हैं।

अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले राम मंदिर के लिए भेजे गये विशेष उपहारों में गुजरात के बड़ोदरा से समर्पित की गई 108 फुट लंबी अगरबत्ती, उत्तरप्रदेश के जलेसर से आया 21 सौ किलो का घंटा, गुजरात से आया पंचधातु का बना 11 सौ किलो का भारी भरकम विशाल दीपक, हैदराबाद से चल्ला श्रीनिवास शास्त्री के साथ आए सवा किलो सोने चांदी के बने खड़ाऊं, चेन्नई से बनकर आया ढाई किलो सोने चांदी से बना धनुष, अलीगढ़ से भेंट किया गया खास प्रकार का 10 फुट का ताला चाबी, अहमदाबाद में बना 500 किलो का नगाड़ा, मध्य प्रदेश में उज्जैन के महाकाल मंदिर और तिरुपति से विशेष रूप से प्रसाद के लिए आए लाखों लड्डू और एक साथ आधा दर्जन देशों का समय एक साथ बताने वाली घड़ी प्रमुख हैं. श्रीराम को समर्पित उपहारों की श्रृंखला इतनी लंबी है कि गिनाते गिनाते कई पन्ने भर जाएंगे और सूची पूरी हो पाएगी। इसके अलावा, नेपाल से आए आभूषण और विशेष वस्त्र सहित विभिन्न वस्तुएं भी हैं।

उपहारों की सूची में सबसे प्रमुख श्रीलंका स्थित अशोक वाटिका से लाई गई विशेष शिला हैं। रामचरित मानस के अनुसार रामायण के अनुसार रावण ने माता सीता का अपहरण करने के बाद उन्हें अशोक वाटिका में ही रखा था और ऐसी मान्यता है कि सीता जी इसी शिला पर बैठती थी।

आइए, अब एक नजर कुछ खास उपहारों और उनके जन आकर्षण बनने की वजह पर डालते हैं। सबसे ज्यादा चर्चा में रही 108 फुट लंबी अगरबत्ती को तैयार करने में करीब छह माह का समय लगा है। अगरबत्ती का वजन लगभग 36 सौ किलो और चौड़ाई 3.5 फीट है. अगरबत्ती तैयार करने वाले वडोदरा निवासी विहा भरवाड का कहना है कि यह अगरबत्ती पर्यावरण के अनुकूल है और लगभग डेढ़ महीने तक जलेगी और कई किलोमीटर तक अपनी सुंगध फैलाएगी. इस अगरबत्ती को बनाने में तकरीबन 376 किलोग्राम गूगल, लगभग इतनी ही मात्रा में नारियल गोला, 190 किलो घी, 14 सौ किलो गाय का गोबर, 420 किलो जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया गया है. 

दुनिया भर में तालों के मशहूर अलीगढ़ से भेजा गया ताला दुनिया का सबसे बड़ा ताला है। ताला बनाने वाले सत्य प्रकाश शर्मा का कहना है कि 10 फीट ऊंचा, 4.6 फीट चौड़ा और 9.5 इंच मोटा यह ताला और चाबी 400 किलो का  है। अष्टधातु से बना 21 सौ किलो वजन का घंटा भी दो साल में बनकर तैयार हुआ है।

भारत के साथ साथ जापान, रूस,यूएई, चीन, सिंगापुर, मेक्सिको, अमेरिका का समय बताने वाली अनूठी देशी घड़ी भी अब भगवान राम के खजाने का हिस्सा है। इसी तरह, सूरत से भेजा गया अमेरिकी हीरे और चांदी से बना राम मंदिर की थीम हार भी खास है। इसे बनाने में चालीस कारीगर और  लगभग एक महीने का समय लगा है। वडोदरा से आया 11 सौ किलो का दीपक भी अनूठा है। यहां के किसान अरविंदभाई मंगलभाई पटेल ने पंच धातु सोना, चांदी, तांबा, जस्ता और लोहे से यह दीपक बनवाया है। 





84 सेकेंड की माया

 जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।

चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥

भावार्थ:योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि सभी अनुकूल हो गए। जड़ और चेतन सब हर्ष से भर गए। (क्योंकि) श्री राम का जन्म सुख का मूल है॥


अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही देश में उल्लास और उत्सव का वातावरण है लेकिन भगवान श्रीराम की प्रतिमा की स्थापना के पहले से ही कई लोगों के मन में यह सवाल कौंध रहा है कि आखिर राम लला की प्राण प्रतिष्ठा के लिए 22 जनवरी की ही तारीख क्यों तय की गई? भारतीय सामाजिक-सांकृतिक परंपराओं और पौराणिक ग्रंथों में शुभ मुहूर्त का खास महत्व है। वैसे भी सनातन धर्म में कोई भी शुभ कार्य पंचांग के अनुसार, शुभ मुहूर्त देखकर ही किया जाता है। यही वजह है कि राम लला को विराजमान करने के लिए तिथि तय करते समय काफी विचार विमर्श किया गया और देश के तमाम प्रमुख पंडितों,ज्योतिषियों और सनातन धर्म के विद्वानों ने भारतीय पंचाग और प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन के बाद यह तिथि तय की ।

आइए, अब जानते हैं कि 22 जनवरी को ऐसा क्या खास है जिस वजह से यह तारीख भारतीय सनातन संस्कृति के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गई है। दरअसल, 22 जनवरी को तीन शुभ योगों का अद्भुत संयोग था. 22 जनवरी को पौष शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि और मृगशिरा नक्षत्र था. इसके अलावा, सोने पर सुहागा यह था कि सूर्योदय से लेकर पूरे दिन सवार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग भी था। वहीं,दिन खत्म होने के साथ ही रवि योग भी लग गया था. इन सब योगों में अभिजीत मुहूर्त के अंतर्गत उन सबसे खास 84 सेकेंड में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का कार्य संपन्न किया गया. इस दिन चंद्रमा भी अपनी उच्च राशि वृषभ में रहा.

जनवरी की 22 तारीख को अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 17 मिनट से शुरू होकर 12 बजकर 59 मिनट तक रहा. उसमें से भी अति शुभ या सर्वोत्तम मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 29 मिनट 8 सेकंड से 12 बजकर 30 मिनट 32 सेकंड का था. सनातन धर्म में शुभ कार्य के लिए अभिजीत मुहूर्त सबसे उत्तम माना जाता है.

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार त्रेता युग में प्रभु श्री राम का जन्म भी अभिजीत मुहूर्त में हुआ था. पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान राम का जन्म अभिजीत मुहूर्त, मृगशीर्ष नक्षत्र, अमृत सिद्धि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग के संगम पर हुआ था. ये सारे शुभ योग 22 जनवरी 2024 को पुनः एक साथ थे इसलिए यह अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के लिए सबसे आदर्श दिन बन गया। यह  भी कहा जा रहा है कि इस शुभ मुहूर्त में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो जाने से प्रभु श्री राम सदैव मूर्ति में विराजमान रहेंगे.


एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, यह तब है जब भगवान शिव ने राक्षस त्रिपुरासुर का वध किया था। इस प्रकार यह मुहूर्त किसी के जीवन से किसी भी नकारात्मक ऊर्जा को हटाने से जुड़ा है।

 ज्योतिषियों के अनुसार 22 जनवरी को कर्म द्वादशी थी। यह द्वादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने कछुए का अवतार लेकर समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान श्री राम वास्तव में भगवान विष्णु के ही अवतार हैं, इसलिए इस दिन को राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के लिए बेहद शुभ माना गया।

 ज्योतिषियों के मुताबिक अभिजीत मुहूर्त, सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और रवि योग किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए बहुत शुभ हैं । इन योगों में कोई भी कार्य करने से व्यक्ति को सभी प्रकार के कार्यों में सफलता मिलती है। इन सभी तथ्यों,तर्कों और अध्ययन मनन के बाद यह तिथि चुनी गई।

शनिवार, 6 जनवरी 2024

जब गांधी जी ने पहनी ब्रिटिश सेना की वर्दी…!!

 ‘यह आश्चर्यजनक लग सकता है लेकिन सच है कि वर्ष 1899 में महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सैन्य वर्दी पहनी थी।’ रक्षा मंत्रालय की सौ साल से प्रकाशित हो रही आधिकारिक पत्रिका ‘सैनिक समाचार’  के मुताबिक गांधी जी ने बोएर युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना की वर्दी पहनी थी। पत्रिका के हिंदी संस्करण में ‘जब गांधी ने सैनिक की वर्दी पहनी’ शीर्षक वाला यह लेख 9 अक्टूबर, 1977 को प्रकाशित हुआ था और जे पी चतुर्वेदी के इस लेख को सैनिक समाचार के प्रकाशन के सौ साल पूरे होने पर 2 जनवरी 2009 को प्रकाशित शताब्दी अंक और कॉफी-टेबल बुक में पुनः स्थान दिया गया था । रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रकाशित की जा रही यह पत्रिका फिलहाल हिंदी और अंग्रेजी सहित तेरह भाषाओँ में नयी दिल्ली से प्रकाशित हो रही है। इस पत्रिका के पाठकों में सभी सैन्य मुख्यालय, अधिकारी, पूर्व सैनिक और दूतावास सहित तमाम अहम् संसथान शामिल हैं.


    वैसे, जनवरी माह का गाँधी जी और सैनिक समाचार दोनों के साथ करीबी रिश्ता है. इस पत्रिका का प्रकाशन देश को मिली स्वतंत्रता से काफी पहले 2 जनवरी 1909 को शुरू हुआ था. तब इसकी कमान ब्रिटिश हाथों में थी और इसका उद्देश्य अंग्रेजी साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले भारत सहित विभिन्न मोर्चो की सैन्य गतिविधियों को साझा करना था. उस दौर में भी पत्रिका को भरपूर पाठक मिलते थे और सम्पादकीय कुशलता का यह आलम था कि विश्व युद्ध के दौरान सैनिक समाचार (तब फौजी अखबार) की टीम ने ‘जवान’ और ‘सैनिक’ के नाम से विशेष परिशिष्ट भी निकले थे. पत्रिका के बारे में विस्तार से जानना इसलिए जरुरी है क्योंकि गांधीजी से सम्बंधित किसी भी बात के उल्लेख से पहले उस बात के सोर्स का पुष्ट होना जरुरी है.

          खैर, यह तो हुई सैनिक समाचार की बात, अब आते हैं मूल विषय पर. सैनिक समाचार के ‘जब गांधी ने सैनिक की वर्दी पहनी’ शीर्षक वाले लेख में यह दावा किया गया है कि महात्मा गांधी ने दूसरे बोएर युद्ध (1899-1902) के दौरान ब्रिटिश सैन्य वर्दी पहनी थी। गांधी जी को ब्रिटिश फौज में क्यों शामिल होना पड़ा और इसके पीछे उनका क्या उद्देश्य था, इस बारे में ‘सैनिक समाचार’ में कहा गया है कि बोएर के दो गणराज्यों में ब्रिटिश सत्ता से आजादी के लिए जब जंग छिड़ी तो वहां अंग्रेज कमजोर स्थिति में थे और अफ्रीकी बोएर की करीब 48 हजार की फौज के सामने उनके पास महज 27 हजार सैनिक ही थे। ऐसे में ब्रिटिश सरकार को अपने सर्वश्रेष्ठ जनरलों को लड़ाई में उतारना पड़ा। इसी दौरान गांधी जी ने एम्बुलेंस यूनिट के गठन की बात सोची । उस समय भारतीय लोगों और ब्रिटिश सैनिकों के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। गांधी जी की मानवीय मदद की पेशकश को स्वीकार कर लिया गया और इस यूनिट का गठन हो गया। 


         इस एम्बुलेंस यूनिट में  गांधी जी सहित 11सौ भारतीय थे जिनमें 800 गिरमिटिया मजदूर थे। इस यूनिट ने बेहद बहादुरी से काम किया था और ब्रिटेन की सेना के कमांडर इन चीफ ने भी इस यूनिट के शौर्य की गाथाएं दर्ज की थीं। अंग्रेज-बोएर जंग की समाप्ति पर  गांधी जी की यूनिट को उत्कृष्ट सेवाओं के लिए पदक से भी सम्मानित किया गया था। लेख में कहा गया है कि गांधीजी ने बोअर युद्ध को अंग्रेजों की मदद करके भारत के लिए आजादी हासिल करने के सुनहरे अवसर के रूप में देखा था। 


       खास बात यह है मुझे भी इस पत्रिका के संपादन का अवसर मिला था और शताब्दी अंक के लिए बनी संपादकीय टीम में भी शामिल होने का गौरव हासिल हुआ था। जब हम लोग शताब्दी अंक तैयार करने के लिए रिसर्च कर रहे थे तब सैनिक समाचार के तमाम पुराने अंकों को खंगालते हुए यह लेख हमारे हाथ लगा। लेख हमारे लिए भी चौंकाने वाला था लेकिन यह गांधी जी की मानवीय संवेदनाओं को उजागर करने वाला था क्योंकि जब गांधी जी महात्मा नहीं बने थे। एक तरह से हम कह सकते हैं कि यह लेख गांधी जी के व्यक्तित्व के उन पहलुओं को हमारे सामने लाता है जिनसे यह पता चलता है कि मोहन दास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी और राष्ट्रपिता तक का सम्मान हासिल करने के लिए गांधीजी को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और कैसे उनके व्यक्तित्व में मानव से महामानव की आभा जुड़ती गई। सैनिक समाचार से इतर भी जब मैंने इस विषय पर अपना शोध जारी रखा तो कुछ और पहलू भी सामने आए। गांधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ के पृष्ठ 273 पर जुलू विद्रोह नामक चैप्टर में खुद गांधी जी ने लिखा है कि ‘मैंने ही नेटाल के गवर्नर को पत्र लिखकर कहा था कि यदि आवश्यकता हो तो घायलों की सेवा करने वाले हिंदुस्तानियों की एक टुकड़ी लेकर सेवा के लिए जाने को तैयार हूं। तुरंत ही गर्वनर की स्वीकृति सूचक उत्तर मिला।’ गांधी जी ने आगे लिखा है कि ‘स्वाभिमान की रक्षा के लिए और अधिक सुविधा के साथ काम कर सकने के लिए तथा वैसी प्रथा होने के कारण चिकित्सा विभाग के मुख्य पदाधिकारी ने मुझे  सार्जेंट मेजर का मुद्दती पद दिया और मेरी पसंद के तीन साथियों को सार्जेंट का तथा एक साथी को कॉर्पोरल का पद दिया। वर्दी भी सरकार की ओर से मिली और इस टुकड़ी ने छह सप्ताह तक सतत सेवा की।’ गांधी जी ने लिखा है कि ‘स्वयं मुझे गोरे सिपाहियों के लिए भी दवा लाने और उन्हें दवा देने का काम सौंपा गया था।’  इस सेवा के एवज में एंबुलेंस कोर को पदक भी दिए गए थे।


        एक मजेदार तथ्य यह भी है कि जब हमने शताब्दी अंक में यह गांधीजी के सैन्य वर्दी पहनने वाला लेख शामिल किया तो कुछ अखबारों ने इसे हाथों हाथ ले लिया और उन्होंने इस पर इतिहासकारों से बातचीत भी की । तब जाने-माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने सैनिक समाचार के इस दावे को खारिज कर दिया था कि गांधी जी एक ब्रिटिश सैनिक थे। उन्होंने कहा कि गाँधी जी को कभी भी ब्रिटिश सेना द्वारा नियुक्त नहीं किया गया था। उन्होंने केवल ब्रिटिश सैनिकों को चिकित्सा सहायता प्रदान करने के लिए एक स्वैच्छिक एम्बुलेंस कोर का गठन किया था जिसमें पूरी तरह से गैर-लड़ाके शामिल थे। यह कहना गलत है कि उन्होंने ब्रिटिश सेना की सेवा की। एक अन्य इतिहासकार  प्रोफेसर बिपिन चंद्र का भी यही मानना था कि गांधी कभी भी ब्रिटिश सेना का हिस्सा नहीं थे और उन्होंने केवल एक स्वैच्छिक एम्बुलेंस कोर का गठन किया था।  कुल मिलाकर जितना यह लेख आश्चर्यजनक है उतनी ही इस पर मिली प्रतिक्रियाएं। वैसे भी गांधी जी का व्यक्तित्व  न तो आज किसी सुबूत या क्रिया प्रतिक्रिया का मोहताज है और न ही उस समय था। गांधी जी महान थे,हैं और रहेंगे।



गुरुवार, 4 जनवरी 2024

ये मौसम का जादू है मितवा...


ये कौन जादूगर आ गया..जिसने हमारे शहर के सबसे बेशकीमती नगीने को गायब कर दिया…साल के दूसरे दिन ही उस जादूगर ने ऐसी करामात दिखाई कि न तो ‘तालों में ताल’ भोपाल का बड़ा तालाब बचा और न ही शान-ए-शहर वीआईपी रोड….राजा भोज भी उसके आगोश में समा गए। जादूगर ने अपनी धूसर-सफेद आभा में हमारा बोट क्लब भी समाहित कर लिया तो वन विहार के जानवरों को भी संभलने का मौका तक नहीं दिया। जादूगर के जलवे से बड़े तालाब की एक अन्य पहचान जीवन वाटिका मंदिर और पवनपुत्र भी नहीं बचे।…बस, वहां से हनुमान चालीसा पढ़ने की आवाज़ तो आती रही लेकिन लोग गायब रहे और ‘मेरी आवाज ही पहचान है..’ की तर्ज पर हम यह कोशिश करते रहे कि मंदिर में कौन कौन स्वर मिला रहा है। 


ये प्रकृति का जादू है…मौसम की माया है। आखिर,प्रकृति से बड़ा जादूगर कौन हो सकता है जिसने हमें हजारों रंग के फूलों, खुशबू,पक्षियों और अनुभूतियों से भर दिया है उसके लिए क्या बड़ा तालाब और क्या वीआईपी लोग। हम बात कर रहे हैं भोपाल में आज छाए घने कोहरे की…इतने घने कि सुबह के कुछ घंटों में मानो सब कुछ गुम हो गया…वीआईपी रोड की घमंड से ऊंची होती इमारतें, अदालती फैसले से वजूद के संकट से जूझ रहा एकमात्र क्रूज, मछलियों सी लहराती छोटी बड़ी नाव, पानी पर दिनभर अठखेलियां करने वाले वॉटर स्पोर्ट्स के खिलाड़ी, अपने श्वेत रंग से भी तालाब को रंगीन बनाती बतख,कलरव से सुकून का संगीत रचते देशी विदेशी पंछी, समोसे,जलेबी और बिस्किट के स्वाद के आदी हो रहे मोर,बंदर…सब नतमस्तक हो कर प्रकृति की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। 


इस पर हवा के साथ आलिंगन करती पानी की अदृश्य सी नन्हीं बूंदे जब हमारे चेहरे को चूमते हुए गुजर रही थी तो लग रहा था कि हम शायद शिमला,मनाली या नैनीताल आ गए हैं…अगर आप पर्यटकों की भीड़ के कारण या फिर किसी वजह से शिमला,मनाली या नैनीताल नहीं जा पाए हैं तो दुःखी मत रहिए…आप गांठ से एक दमड़ी खर्च किए बिना भी इन हिल स्टेशनों का आनंद उठा सकते हैं और ये सरकार की कोई लोकलुभावन योजना भी नहीं है। बस, इसके लिए सुबह करीब साढ़े छह बजे से साढ़े आठ नौ बजे के दरम्यान आपको रजाई/कंबल का मोह त्यागने का दुस्साहस कर भोपाल के बड़े तालाब तक पहुंचना होगा।


कोहरे से ढके इस इलाक़े में मौसम की मेहरबानी से सहजता से हिल स्टेशन का मजा मिल रहा है। हवा में उड़कर सिहरन पैदा करता कोहरा आपको न केवल अपनी बाहों में जकड़ लेता है बल्कि कान-नाक के जरिए शरीर में अंदर तक उतर जाता है। हाथ तो इतने ठंडे हो जाते हैं कि मोबाइल भी पकड़ से छूटने लगता है और सायं सायं चलती शीतलहर इसे 'परफेक्ट कोल्ड डे' बनाने में पूरा सहयोग करती है। आखिर,पहाड़ों पर भी तो यही देखने और महसूस करने हम जाते हैं। वहां की झुरझुरी पैदा करती हवा,झील,पहाड़ और पेड़ों की स्मृतियों को संजोकर हम अपने शहर लौट आते हैं लेकिन ध्यान से देखे तो अपने शहर में ही मौसम के मुताबिक ये सब उपलब्ध हैं। यही मौसम का मज़ा है,यही भोपाल का आनंद और यही प्रकृति का हमारे शहर को मिला वरदान…तभी तो हम ठंड,गर्मी और बरसात जैसे हर मौसम को उसकी पूरी सच्चाई के साथ जी पाते हैं और भीग पाते हैं कभी कोहरे में,कभी बारिश में और कभी पसीने में…बचाकर रखिए शहर को मिली प्रकृति की इस नेमत को और फिलहाल आनंद लीजिए ठंड का,कोहरे का और कभी कभी सिहरन का भी।






सोमवार, 1 जनवरी 2024

जी हां,ये गन्ने के फूल हैं...??

 


गन्ने के फूल (Sugarcane flowers)..जी हां,ये गन्ने के फूल हैं । मेरी तरह गन्ने को केवल गुड़ और ‘गन्ने के रस’ के लिए जानने वालों के लिए यह जानकारी नई हो सकती है। कस्बाई पृष्ठभूमि में बचपन गुजारने के दौरान गन्ना,रस और गरमा गरम लिक्विड गुड़ से लेकर हमारे आपके घर तक पहुंचने वाले गुड़ की समूची प्रक्रिया से कई बार रूबरू होने का मौका मिला है और दोस्तों के सहयोग से खेत पर धनिया, पुदीना और नीबू के साथ ताज़ा गन्ने का रसपान भी सालों साल किया है लेकिन गन्ने का फूल देखने या इसके बारे में जानने का कभी मौका ही नहीं मिला। सोशल मीडिया पर फोटो डालने पर कई मित्रों ने इसे कांस बताया तो कुछ ने ज्वार और बाजरा।

आमतौर पर, किसी भी पेड़ पौधे के लिए फूल सबसे ज़रूरी और कीमती अवस्था होती है जिससे फल और उस पौधे की अगली पीढ़ी के सृजन का मार्ग प्रशस्त होता है लेकिन गन्ने (स्थानीय बोलचाल में सांटे) के फूल के साथ ऐसा नहीं है। बताया जाता है कि गन्ने पर फूल आना सौभाग्य नहीं बल्कि दुर्भाग्य माना जाता है। प्रगतिशील युवा और कृषि में गहरी रुचि रखने वाले एवं मेरे भांजे अंकुर ने इस जिज्ञासा का बहुत विस्तार से समाधान किया। अंकुर ने बताया कि गन्ने में फूल आने का मतलब है कि गन्ने के उस बीज की आयु पूरी हो गई है और वह परिपक्वता की अवस्था में है।
सीधे शब्दों में कहें तो ये तीसरे साल का गन्ना है जिसमें फूल आ गया है और गन्ने में फूल आना इस बात का संकेत है कि इस गन्ने की अब उम्र पूरी हो गई है। आमतौर पर गन्ने के एक बीज/ गांठ की उम्र या परिपक्वता तीन साल ही होती है। इसके बाद उस बीज से गन्ने की पैदावार नहीं होती या फिर मरियल सी,रसहीन और कुपोषित फसल होगी। इसलिए, किसान इसकी कलम नहीं करते इसे काटकर नया गन्ना ही लगाया जाता है । स्थानीय भाषा में इस फूल आए गन्ने को त्रिजड़ी कहा जाता है। कहीं-कहीं अच्छे पोषण और रोगमुक्त स्वस्थ वैरायटी की वजह से फूल चौथे साल में आता है तब उस गन्ने को 'मड़ी' बोलते हैं। ऐसे बीज चार साल तक उपयोगी रहते हैं।
तो यह थी गन्ने के फूल की गाथा…। (29 Dec 2023)

कुत्ते की राखी…कीमत सुनकर आप चौंक जाएंगे!

हाल ही में कृति सेनन से जुड़े एक राखी विज्ञापन को लेकर खूब विवाद हुआ। विज्ञापन में कृति के कपड़ों से लेकर उसके कथित सांस्कृतिक संदेश तक पर ब...