शनिवार, 15 मार्च 2025

पंकज जी,आपसे ज्यादा ‘हिट’ हैं भोपाल के दर्शक…!!

दर्शक पल पल इंतजार कर रहे थे कि अब नाटक शुरू होगा..पंकज कपूर एक पेज,दो पेज पढ़ेंगे..शायद पांच पेज की भूमिका होगी और फिर कलाकार अपनी कला का जादू बिखेरेंगे। आमतौर पर पारंपरिक नाटक ऐसे ही तो होते हैं…लेकिन पंकज जी तो एक-एक कर पूरे 84 पन्नों का उपन्यास पढ़ गए। कुछ उतावले और उकताए दर्शकों ने उठना शुरू कर दिया..उनकी देखादेखी कुछ और भी उठे…लेकिन, फिर नाटक के संवाद,पंकज कपूर की संवादगी के उतार चढ़ाव और भाव धीरे धीरे मीठी शहद के समान कतरा-कतरा मन-मस्तिष्क में उतरने लगे…और दर्शक चुपचाप बूढ़ी अम्मा के एकाकीपन, जुम्मन की मसखरी, श्रीवास्तव साहब की संजीदगी के साथ चलने लगे। फिर क्या था..पंकज कपूर की इसएकल प्रस्तुति में कभी तालियां,कभी हंसी और कभी सन्नाटा पसरा रहा और एक घंटा 20 मिनट का ‘दोपहरी’ कब खत्म हो गया, पता ही नहीं चला।

मेरे जैसे रंगमंच के तमाम अपरिपक्व दर्शकों के लिए यह नाटक की नई शैली थी इसलिए आत्मसात करने में, उससे जुड़ने और महसूस करने में समय लगा। मैं, अभी भी यह मानता हूं कि यदि इसे नाटक की बजाए ‘कहानी पाठ’ या ‘उपन्यास पाठन’ कहकर प्रचारित किया जाता तब भी शायद इतने ही दर्शक जुटते लेकिन तब वे पारंपरिक नाटक देखने की उम्मीद लेकर नहीं आते बल्कि ‘सुनने’ आते और शायद बहुतों की उम्मीदें नहीं टूटती।

खैर, पंकज (कपूर) जी, आप तो आला दर्जे के कलाकार हैं हीं लेकिन आज भोपाल के दर्शकों ने बता दिया कि वे सुपरहिट हैं। संभवतः भोपाल में पहली बार इतनी महंगी टिकट दर पर किसी नाटक का प्रदर्शन हुआ और फिर भी सभागार खचाखच भर गया। आज के ओटीटी के दौर में जब सब कुछ घर बैठे उपलब्ध है और चाय-पकौड़ों के साथ टुकड़ों-टुकड़ों में अपनी सहूलियत से देखने की सुविधा है फिर भी, ऐसे में 70 साल के एक कलाकार के करीब डेढ़ घंटे लंबे शो को देखने के लिए सैकड़ों की संख्या में लोगों का जुटना किसी चमत्कार से कम नहीं है। 

शाम सात बजे से दर्शकों के आने का सिलसिला जो शुरू हुआ, वह शो शुरू होने के बाद तक चलता रहा। टिकट वाले तो समय पर आए ही, मुफ्त पास वाले भी समय से पीछे नहीं रहे क्योंकि उन्हें डर था कि ऐसा न हो उनकी सीट पर कोई और कब्जा कर ले। रवींद्र भवन में आए दिन होने वाले नाटकों के दौरान आमतौर पर खाली रहने वाली सीटें आज अपने होने पर रश्क कर रही थीं और बालकनी घमंड से इतरा रही थीं क्योंकि सबसे पहले वही फुल हाउस हुई क्योंकि सबसे कम 499 रुपए की टिकट बालकनी की ही थी। परिवार के परिवार रात में भी ‘दोपहरी’ का आनंद लेने टकटकी लगाए बैठे थे । कभी नाटक देखने के लिए 100 रुपए सहयोग राशि देने के नाम से भी बिदकने वाले भोपाल के लोगों के इस थियेटर प्रेम को सलाम।

अब बात नाटक ‘दोपहरी’ की…गूगल गुरु के मुताबिक नाटक पर केंद्रित यह कुल 84 पृष्ठों में लिखा गया संक्षिप्त उपन्यास उन्होंने 4 दिन की अल्पावधि में पूर्ण किया है और इस नाटक के देश दुनिया में तकरीबन 50 प्रदर्शन हो चुके हैं।

नाटक आरंभ से अंत तक रोचक है। ऐसा लगता है जैसे यह हमारे अपने जीवन और पास पड़ोस से जुड़े बुजुर्गों के एकाकीपन, किरायेदारों में परिवार तलाशने की कहानी है। पंकज कपूर ने पढ़ने के दौरान वाचन कला का भरपूर अभिनय दिखाया,मंच को अलग अलग कोण से दिखाती लाइट और बैक ग्राउंड संगीत ने वाचन को और निखार दिया। लेकिन यदि  ‘दोपहरी’ की निर्माता और पंकज की पत्नी सुप्रिया पाठक अम्मा के किरदार में और खुद पंकज जुम्मन के रूप में मंच पर उतर जाते तो शायद ‘दोपहरी’ सुबह की उजास सा, बसंत की हवाओं सा और ध्यान में रम जाने जैसा हो जाता और दर्शक सभागार से सिसकते और अपने अंदर कुछ टूटता सा महसूस करते हुए बाहर निकलते…तब, शायद विदेश जाने के सपने में उनींदे युवाओं की नींद उचटती और अरेरा कालोनी के भव्य बंगलों में  होली-दीवाली पर बच्चों का इंतजार करने वाले साहबों का दंभ भावना के सामने बिखर जाता और बच्चों के भेजे डॉलरों से पड़ोसियों पर रूतबा झाड़ने वाले मां बाप का झूठा घमंड बह जाता l खैर, हो सकता है पंकज जी की टीम तक हम दर्शकों की आवाज पहुंचे और भविष्य में  ‘दोपहरी’ कुछ ऐसे ही रंग में नज़र आए तब तक शरद जोशी और उनकी रचना ‘वर्जिनिया वुल्फ से सब डरते हैं’ को याद करके हंसते रहिए।




बागों में फूलों के खिलने का मौसम आ गया..!!

फिल्म ‘आराधना’ में गीतकार आनंद बक्शी निश्चित तौर फरवरी मार्च के इन्हीं दिनों को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए होंगे और तभी उनकी कलम से निकला होगा..’बागों में बहार है, कलियों पे निखार है..।’ आनंद बक्शी क्या, कोई भी मंत्रमुग्ध हो सकता है क्योंकि मौसम ही ऐसा है और तभी तो हर कोई कह रहा है बागों में फूलों के खिलने का मौसम आ गया। इसे फागुन कहें या फिर बसंत या फिर रूमानियत के दिन…प्रकृति खुद उत्साहित करती है और फिर हम हम आप क्या दिग्गज कवि भी प्रकृति के रंग में रंग जाते हैं। तभी तो सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को लिखना पड़ा: 

“पेड़ों के साथ-साथ 

हिलाता है सिर 

यह मौसम अब 

नहीं आएगा फिर।” 

फाल्गुन माह अपनी प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक उत्सवों का संगम है, जो इसे विशेष रूप से खुबसूरत बनाता है। फाल्गुन माह के साथ ही बागों में फूलों के खिलने का मौसम आ जाता है। जैसे ही सर्दियों की सख्त ठंड पीछे छूटती है, बसंत ऋतु अपनी रंगीन छांव लेकर हमारे आसपास फैलने लगती है। यह समय होता है जब धरती पूरी तरह से जीवित हो उठती है और प्रकृति में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। बागों में रंग-बिरंगे फूलों की खिलखिलाहट और उनकी महक वातावरण को रंगों के रोमांस से भर देती है। ऐसे में रामधारी सिंह दिनकर की कलम भी मचल उठती है और वे लिखते हैं: 

“प्रात जगाता शिशु वसंत को 

नव गुलाब दे-दे ताली; 

तितली बनी देव की कविता

 वन-वन उड़ती मतवाली। 

सुंदरता को जगी देखकर 

जी करता मैं भी कुछ गाऊँ; 

मैं भी आज प्रकृति-पूजन में 

निज कविता के दीप जलाऊँ।” 

फूलों का खिलना न केवल प्रकृति का सौंदर्य भर नहीं है, बल्कि यह जीवन में खुशी, उल्लास और शांति का प्रतीक भी है। गेंदा, गुलाब, चमेली, मोगरा, सूर्यमुखी,गुलमोहर और पलाश जैसे फूल बाग बगीचों को अपनी महक और रंग से सजा देते हैं। इन फूलों का खिलना नयी उम्मीदों को जन्म और मनभावन अवसरों का संदेश देता है। हर फूल में एक अलग खूबसूरती और खुशबू होती है, जो हमें हर पल प्राकृतिक सौंदर्य के करीब ले आती है। जब बागों में फूल खिलते हैं, तो वातावरण में एक अलग ही सुकून और शीतलता महसूस होती है। फूलों की खुशबू से वातावरण महकता है और हमारे मन को एक अद्भुत सुख मिलता है। फूलों के बीच समय बिताना न केवल शारीरिक रूप से ताजगी देता है, बल्कि मानसिक शांति भी प्रदान करता है। रंग-बिरंगे फूलों के खिलने से एक सकारात्मक ऊर्जा का अहसास होता है, जो हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। मौसम की अठखेलियों से रघुवीर सहाय की कलम भी अल्हड़ हो जाती है। वे लिखते हैं: 

“वही आदर्श मौसम 

और मन में कुछ टूटता-सा 

अनुभव से जानता हूँ कि 

यह वसंत है।” 

हमारे देश में फाल्गुन माह का एक और विशेष महत्व है क्योंकि इसी दौरान होली का त्योहार मनाया जाता है। होली, जो रंगों और फूलों से जुड़ा हुआ है, बागों में खिलने वाले फूलों की ही तरह हमारे जीवन में रंग भरने का काम करती है। लोग इस दिन एक-दूसरे पर रंग और फूल डालकर रिश्तों में मिठास और सौहार्द्र का संचार करते हैं। फूलों का खिलना और होली का त्यौहार मिलकर जीवन में रंगों और खुशियों का संगम लाते हैं। फूलों का खिलना सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन में नयी उम्मीदों, खुशियों और सौंदर्य का प्रतीक है। बागों में फूलों की बहार हमें यह सिखाती है कि जीवन के हर मौसम में कुछ खास होता है, और हमें हर पल को जीने की कला को समझना चाहिए। कवि राकेश रंजन प्रकृति की इस लीला को बखूबी आत्मसात कर लिखते हैं:

 “टूटता है मौन फूलों का 

हवाओं का सुरों का  

टूटता है मौन

 टूटती है नींद 

वृक्षों की 

समय के नए बीजों की 

सभी की टूटती है नींद।” 

यह समय प्रेम, उल्लास और खुशियों का  है, जो हमें जीवन के हर पहलू में संतुलन और शांति का अहसास कराता है। फूलों की रंग-बिरंगी चादर में बसा यह मौसम हम सभी के लिए एक अनमोल तोहफा है। प्रकृति से जुड़ने के इस अद्भुत समय में हम जीवन के तनावों और समस्याओं से मुक्त हो सकते हैं। 

फूलों के साथ समय बिताने से न केवल मन खुश रहता है, बल्कि हमें धरती के साथ अपने रिश्ते को भी समझने का मौका मिलता है इसलिए इस मौसम में प्रकृति की सुंदरता का आनंद लें और अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करें।    

अच्छे लगते हैं..।

                              अच्छे लगते हैं..।

झूमते पेड़

सुगंधित पुष्प

इठलाती बूंदें

कोलाहल करता दरिया

और मुस्कराते दोस्त


बड़े अच्छे लगते हैं..।

बीमारी के बाद

परेशानी के बाद

लंबे अंतराल के बाद

जब दोस्त मिलते हैं

तो खूब हंसते हैं।


अच्छे लगते हैं..।

दोस्त के हंसने से 

परिवार हंसता है

पत्नी हंसती है

बच्चे हंसते हैं और 

दोस्त भी हंसते हैं

और तब, सब

बड़े अच्छे लगते हैं।।


बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

कारगिल युद्ध: स्वर्णिम वीरता की रजत जयंती

आज की ही सी बात लगती है जब कैप्टन विक्रम बत्रा के शब्द ‘ये दिल मांगे मोर’ देश के हर घर का प्रिय मंत्र बन गए थे और ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे, लेफ्टिनेंट बलवान सिंह, कैप्टन एन केंगुरुसे, कैप्टन अनुज नैयर और राइफलमैन संजय कुमार जैसे तमाम बहादुरों की वीरता के किस्से घर घर में कहानियों की तरह गूंजने लगे थे। इसी तरह तोलोलिंग, टाइगर हिल, द्रास,  मरपोला, काकसर, मुस्कोह और बटालिक जैसे अनजान नाम आम लोगों की जुबां पर चढ़ गए थे। दुनिया की सबसे कठिन जंग में युवा सैनिकों के जोश, होश, जज्बे,रणनीति, साहस और चट्टान की तरह बुलंद हौसलों के कारण सुरक्षित और मजबूती से किलेबंदी कर चुकी दुश्मन की सेना को एक बार फिर करारी पराजय की धूल चाटना पड़ा था। साथ ही, दुनिया भर में किरकिरी हुई वह अलग।


भारत हमेशा ही शांति से किसी समस्या के समाधान का पक्षधर रहा है और पहले हमला नहीं करने की अपनी नीति पर देश आज भी कायम है लेकिन जब बात देश की अस्मिता, सुरक्षा और सम्प्रभुता पर आए जाए तो फिर देश के सम्मान और आन बान शान की खातिर युद्ध ही एकमात्र विकल्प शेष रह जाता है। इस साल हम भारतीय रण बांकुरों की इसी स्वर्णिम वीरता की रजत जयंती मना रहे हैं। आज से 25 वर्ष पहले भारत के चिर-परिचित दुश्मन पाकिस्तान ने हमेशा की तरह अपनी नापाक हरकतों से दोनों देशों को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया था। भारतीय सेना की ओर से प्रतिउत्तर की कवायद दो माह की लम्बी लड़ाई के बाद फतह में तब्दील हो पाई। इस युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना के खिलाफ एक लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी। भारतीय जवानों ने अपने खून से भारत माता के माथे पर शौर्य का टीका लगाकर उसके मान में श्रीवृद्धि की।  


कारगिल युद्ध के नाम से विख्यात भारतीय सैनिकों की इस वीरगाथा को ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है। 26 जुलाई 1999 को भारत ने कारगिल युद्ध में विजय हासिल की थी। इस दिन को हर वर्ष विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। करीब दो महीने तक चला कारगिल युद्ध भारतीय सेना के साहस और जाँबाजी का ऐसा उदाहरण है जिस पर हर भारतीय देशवासी को गर्व है। करीब 15 हजार से 18 हजार फीट की ऊँचाई और माइनस 10 डिग्री तापमान पर बर्फीली चोटियों पर लड़ी गई इस जंग में कारगिल वॉर मेमोरियल की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक 674 बहादुर सैनिकों ने शहादत दी। इनमें से 4 को सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र,10 को महावीर चक्र और 70 को वीर चक्र से सम्मानित किया गया। युद्ध में 1300 से ज्यादा सैनिक घायल हुए थे। वहीं, भारतीय सैनिकों ने विपरीत हालात में युद्ध करते हुए भी 2700 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया था जबकि 750 पाकिस्तानी सैनिक मैदान में पीठ दिखाकर भाग गए थे।


भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष की नींव पाकिस्तान ने ही रखी थी । पाकिस्तान की सेना ने उग्रवादियों की आड़ लेकर भारत की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की थी। पाकिस्तान ने दावा किया कि लडऩे वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद हुए दस्तावेज़ों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साबित हुआ कि पाकिस्तान की सेना प्रत्यक्ष रूप में इस युद्ध में शामिल थी। भारतीय सेना और वायुसेना ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाली जगहों पर ताबड़तोड़ हमलों और अंतर राष्ट्रीय कूटनीति से पाकिस्तान को मुंह की खाकर वापस जाने पर मजबूर कर दिया था  । यह युद्ध ऊँचाई वाले इलाके पर हुआ और भारतीय सेनाओं को लडऩे में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।  युद्ध की शुरुआत 3 मई 1999 को हो गई थी जब पाकिस्तान ने कारगिल की ऊंची पहाडिय़ों पर घुसपैठ कर कब्जा जमा लिया था। l बताया जाता है कि 8 मई 1999 को पाकिस्तान की 6 नॉर्दर्न लाइट इंफैंट्री और पाकिस्तानी स्पेशल सर्विसेस ग्रुप ने कारगिल की चोटियों पर राशन पानी और अत्याधुनिक हथियारों के साथ कब्जा जमा लिया था। बताया जाता है कि पाकिस्तानी घुसपैठियों को सेना के साथ कश्मीरी गुरिल्ला और अफगानी लड़ाकों का भी साथ मिला था. लेकिन कुछ भारतीय चरवाहों की नजर उन पर पड़ गई और उन्होंने भारतीय सेना को इसकी खबर दे दी। इस घटना और सैन्य सजगता ने पाकिस्तान के नापाक इरादों की पोल खोल दी।


बताया जाता है कि पाकिस्तान ने नेशनल हाइवे 1ए पर कब्जा कर इस पूरे इलाके को भारत से अलग करने की साजिश रची थी। इस हाइवे को श्रीनगर और लेह की लाइफलाइन माना जाता है. इस पूरे इलाके में केवल यही एक ऐसी सड़क है जो हर मौसम में उपयोगी है और सरहद पर रसद पहुंचाने का एकमात्र जरिया।पाकिस्तान ने एक तरह से सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र में भारत की सप्लाई लाइन काट कर उस पूरे इलाके पर नियंत्रण पाने की साजिश रची थी जिससे कश्मीर को हथियाने का वर्षों पुराना ख्वाब पूरा किया जा सके। 


कारगिल की लड़ाई शुरू में भारत के लिए काफी मुश्किल साबित हुई थी, लेकिन भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस,बोफोर्स तोपों और भारतीय वायुसेना की त्रिमूर्ति ने जंग की पूरी तस्वीर बदल दी। बोफोर्स तोपों के सटीक और जोरदार हमलों ने पाकिस्तानी चौकियों को पूरी तरह तबाह कर दिया । ऊंचाई पर होने के कारण मजबूत स्थिति और पूरी तैयारी के बाद भी पाकिस्तानी सैनिकों की  भारतीय सैनिकों की दिलेरी के आगे एक नहीं चल पाई और उन्हें बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी । 84 दिनों तक भारत-पाक के बीच चले इस युद्ध में थल सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ के जरिए दुश्मनों को धूल चटाई तो वायु सेना के ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ ने दुश्मन देश के हौसलों को पस्त कर दिया था। कारगिल में वायु सेना ने आक्रामक के साथ मनोवैज्ञानिक भूमिका निभाई। पहले तो बर्फीली पहाड़ियों पर लड़ाकू विमानों की धमाचौकड़ी ने पाकिस्तानी सैनिकों के दिल में खौफ पैदा कर दिया और फिर वायुसेना ने ताबड़तोड़ बम बरसाकर मजबूत दुश्मन को बर्फ में दबा दिया। भारतीय वायुसेना के मिग-27 और मिग-29 विमानों और एमआई 17 हेलीकाप्टर ने कहर बरपा दिया।  इस युद्ध में बड़ी संख्या में रॉकेट और बमों का इस्तेमाल किया गया। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक कारगिल युद्ध के दौरान कुल मिलाकर, भारतीय वायुसेना ने लगभग 5,000 स्ट्राइक मिशन, 350 टोही मिशन और लगभग 800 एस्कॉर्ट उड़ानें भरीं।  इस युद्ध में भारत ने तो कम खोया, पर पाकिस्तान बर्बाद हो गया। जंग के बाद पाकिस्तान में राजनैतिक और आर्थिक अस्थिरता बढ़ गई और नवाज शरीफ की सरकार को हटाकर परवेज मुशर्रफ सत्ता पर काबिज हो गए। वहीं, भारत में जंग ने देशप्रेम की गंगा बहा दी और अर्थव्यवस्था को भी काफी मजबूती मिली। 


कारगिल की लड़ाई से सीख लेकर भारत ने सीमा पर सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम किए। सरकार ने एक तरफ जहां रक्षा बजट को और बढ़ाया, वहीं सेना की क्षमता बढ़ाने पर भी काम शुरू हुआ।  कारगिल युद्ध इतिहास के पन्नों में पाकिस्तान की पराजय और भारत की स्वर्णिम विजय के रूप में दर्ज है।कारगिल युद्ध की इस विजय ने साबित कर दिया था कि भारत मां की रक्षा के लिए इसके वीर सपूत अपने लहू से देश की धरती को सींच सकते हैं, लेकिन देश की अखंडता और संप्रभुता पर आंच नहीं सहन कर सकते. यह युद्ध दुश्मन की कायरता और हिंदुस्तान के रणबांकुरों के शौर्य की अनूठी दास्तां है।



सेहत के साथ पॉकेट और पर्यावरण फ्रैंडली भी है साइकिल

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि बढ़िया सूट-बूट पहने कोई व्यक्ति साइकिल चला रहा हो या कोई महिला साल-दो साल के बच्चे को लेकर साइकिल पर बाज़ार करने या ऑफिस जाने को निकली हो,वो भी बेखौफ-बिंदास-बेझिझक!..हमारे देश में कोई ऐसा करेगा तो शायद दूसरे दिन अख़बारों में उसकी फोटो छप जाए लेकिन जापान में यह आम बात है। मुझे कुछ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जापान की यात्रा का अवसर मिला था। हम लोग मुख्य तौर पर ओसाका में रहे,जहाँ जी-20 देशों का शिखर सम्मेलन हुआ था। ओसाका में बड़ी संख्या में महिला/पुरुष/युवा/बच्चे सभी बड़े आराम से साइकिल पर घूमते नजर आते थे और वहां के लोगों से बातचीत में पता चला कि पूरे जापान में साइकिल के प्रति इसीतरह का प्रेम है। 

साइकिल पर बात करने का कारण यह है कि जून माह को विश्व साइकिल दिवस के लिए भी जाना जाता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हर साल 3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को साइकिल चलाने के प्रति जागरुक करना है। इतना तो हम सभी जानते हैं कि नियमित तौर पर साइकिल चलाना शरीर के लिए काफी फायदेमंद है। 

हम सभी ने भी कभी न कभी कैंची से लेकर सीट तक भरपूर साइकिल चलाई है। मोटापा घटाने से लेकर शरीर की तंदुरुस्ती के लिए नियमित साइकिल चलाना वरदान है। जानकर कहते हैं कि रोजाना आधा घंटा साइकिल चलाने से हृदय रोग, मोटापा, मानसिक बीमारी, मधुमेह, गठिया रोग जैसी कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है।   पहली बार विश्व साइकिल दिवस मनाए जाने की घोषणा 3 जून, 2018 को की गई थी । इसके बाद से हर साल 3 जून के दिन विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। 

आज के समय मोटर वाहनों को बढ़ते उपयोग के कारण वातावरण में प्रदूषण काफी बढ़ रहा है। इस कारण वातावरण को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए साइकिल का उपयोग जरूरी हो गया है।  इस साल विश्व साइकिल दिवस की थीम साइकिलिंग के माध्यम से अच्छे स्वास्थ्य, निष्पक्षता और स्थिरता को प्रोत्साहित करना थी । 

अब बात फिर जापान की…सोचिए, न गाड़ियों की कर्कश चिल्लपों, न बेतहाशा भागते लोग एवं वाहन और न ही रेड लाइट पर हमारे जैसी चीख-पुकार...सब कुछ सुकून/शांति/आराम और सम्मान से....सम्मान पैदल यात्रियों का और सम्मान साइकिल सवारों का। जापान साइकिल की सवारी के मामले में भले ही दुनिया में नीदरलैंड,डेनमार्क और जर्मनी जैसे देशों से पीछे हो लेकिन शायद हम से बहुत आगे है। हमारे देश में दुनिया भर में कुल साइकिल उत्पादन का 10 फीसदी हिस्सा बनता है लेकिन साइकिल चलाना हमें गंवारा नहीं है। 

जापान के सिर्फ ओसाका शहर में ही 10 लाख से ज्यादा साइकिल हैं जबकि आबादी हमारे देश के भोपाल, रायपुर,जोधपुर और लखनऊ जैसी ही मतलब 18-20 लाख के आसपास है। यदि हम ओसाका की तुलना इन शहरों से करें तो साइकिल को लेकर मानसिकता साफ़ जाहिर हो जाती है।  दरअसल साइकिल चलाने के लिए मानसिकता चाहिए और हमारे यहाँ तो साइकिल गरीबी की पहचान है।  

अब भले ही मोटापे से मुक्ति,तोंद से छुटकारे और डाक्टर की सलाह पर मन मारकर साइकिल चलाने लगे हैं लेकिन वे भी बस पार्क या घर के आसपास तक ही सीमित हैं तभी तो जब कोई सांसद/विधायक साइकिल पर संसद/विधानसभा पहुँच जाता है तो वह खबर बन जाता है जबकि जापान जैसे देशों में यह सामान्य बात है। जापान में हर व्यक्ति दिनभर में औसतन 15 प्रतिशत यात्राएँ साइकिल से ही करता है और यक़ीनन जापानियों की छरहरी काया का राज भी यही है। 

ओसाका में मुझे तो कोई तोंद वाला और बेढब काया वाली महिला नज़र नहीं आयी। अब आप कह सकते हैं सूमो पहलवान भी तो जापानी हैं लेकिन वह एक अलग नस्ल है और यहां हम जापान के सामान्य लोगों की बात कर रहे हैं। हाल के वर्षों में यहां 10 लाख से अधिक बाइक(साइकिल) हर साल बेची जाती हैं। जापान में मोटरसाइकिलों के विकल्प के रूप में साइकिल का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। बहुत सारे लोग ट्रेन स्टेशनों पर सवारी करने के लिए उनका उपयोग करते हैं। 

आजकल अधिक से अधिक जापानी ट्रैफिक जाम और भीड़ वाली ट्रेनों से बचने के लिए साइकिल चला रहे हैं। हर जगह साइकिल खड़ी करने के लिए बाकायदा साईकिल स्टैंड बने हुए हैं- माल में,ऑफिसों में,आम बाज़ारों में,फुटपाथ पर,बस स्टाप पर सभी जगह आधुनिक साइकिल स्टैंड हैं. लोग नियम से साइकिल पार्क करते हैं और ज़ेबरा क्रासिंग पर लोग लालबत्ती होने का इंतजार नहीं करते बल्कि साइकिल और पैदल यात्रियों को सुकून और शांति से निकलने देते हैं. वाहनों की लाइन होने के बाद भी कोई हार्न बजा-बजाकर पूरे इलाक़े को सर पर नहीं उठाता बल्कि आगे बढ़ने के लिए चुपचाप अपनी बारी का इंतज़ार करता है। यहाँ लड़कियां और महिलाएं अपने मन मुताबिक कपड़े पहनकर मन चाहे समय तक पैदल और साइकिल पर घूमती हैं लेकिन उन पर कोई फब्ती नहीं कसता,कोई आंख फाड़ फाड़कर नहीं देखता,कपड़ों की आड़ लेकर कोई बलात्कार नहीं करता और उन्हें नारीत्व को लेकर कोई शर्म का अहसास नहीं कराता...बस यहीं हम बहुत पीछे हैं और शायद कभी जापान की बराबरी भी न कर पाएंगे।  जैसा कि हम जानते हैं कि विश्व साइकिल दिवस का मतलब है कि हम सभी को यह याद दिलाना है कि साइकिल एक सुरक्षित, प्रदूषण मुक्त और स्वास्थ्यप्रद यातायात का प्रमुख साधन है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य साइकिल के उपयोग को प्रोत्साहित करना है, जो स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देता है और पर्यावरण के लिए भी अच्छा होता है।   आज के युग में जहां शहरी जीवन की गतिविधियाँ तेजी से बढ़ रही हैं, वहां साइकिल एक महत्वपूर्ण साधन बन गया है जो स्वास्थ्य, पर्यावरण, और आर्थिक दृष्टि से बहुत ही उपयुक्त है। साइकिल न केवल हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करती है, बल्कि इसका उपयोग करके हम प्रदूषण को कम करने और वातावरण को सुरक्षित रखने में भी योगदान कर सकते हैं। साइकिल का उपयोग करना स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देता है, जिससे हृदय स्वास्थ्य सुधारता है और रोगों से बचाव होता है।  इस दिवस के अवसर पर हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हम साइकिल का उपयोग अपने दैनिक यातायात में शामिल कर सकते हैं और इससे हमारे आसपास के पर्यावरण को कैसे बचा सकते हैं। इसी प्रकार, साइकिल दिवस हमें साइकिल के महत्व को समझाने और इसे एक सकारात्मक बदलाव के लिए एक माध्यम के रूप में उपयोग करने की प्रेरणा देता है। यह एक अवसर है जब हम लोग साइकिल के लाभों पर ध्यान दें और उसे एक सही और सुरक्षित यात्रा का हिस्सा बनाएं।

‘ओटीपी पापा’...पिताओं की नई जमात !!

ओटीपी पापा…जी हां, क्या आप भी ओटीपी पापा हैं!! यह पढ़कर आप भी चौंक गए न। आज जब सोशल मीडिया पापा, पॉप्स, बाबूजी, दादा, अब्बा, पापाजी, बाबा और डैड जैसे-जैसे तमाम संबोधन के जरिए पिताओं के योगदान को सराह रहा है, उनका गुणगान कर रहा है और उनसे मिली शिक्षाओं का बढ़ चढ़कर बयान कर रहा है तब ‘ओटीपी पापा’ कहना चौंकाता है और चौंकना भी चाहिए क्योंकि अब तक आपने भी पिताजी के लिए यह संबोधन नहीं सुना होगा।  

 कुछ साल पहले की बात है जब दिल्ली में अक्सर ‘संडे पापा’ को लेकर चर्चा होती थी । दरअसल दिल्ली में नौकरी करने वाले बहुत सारे हमारे साथी ऐसे थे जो मेरठ, अलीगढ़ और इसी तरह दिल्ली के आसपास के शहरों से अप-डाउन करते थे । उस समय न तो आवागमन के इतने ज्यादा साधन थे और न ही आज की तरह तेज रफ्तार गाड़ियां। इसलिए, उन्हें सुबह नौ-साढ़े नौ बजे का ऑफिस मिलाने के लिए घर से बहुत जल्दी निकलना पड़ता था और तब बच्चे सोते रहते थे। इसीतरह शाम को 6 बजे तक की ड्यूटी करने के बाद दोस्तों के चाय पानी करते हुए वे देर रात की ट्रेन से घर पहुंच पाते थे । ऐसी स्थिति में उनके छोटे बच्चे सो जाते थे। ऐसी सूरत में बच्चों की संडे और छुट्टी के दिनों में ही अपने पिता से मुलाकात हो पाती थी इसलिए मजाक में ‘संडे पापा’ कहने का चलन शुरू हो गया क्योंकि पापा और बच्चों के बीच में मुलाकात संडे को ही हो पाती थी।  

 कुछ इस तरह का किस्सा ‘ओटीपी पापा’ का भी है। दरअसल आज के कैशलेस बाजार में नकद पैसे लेकर चलने का रिवाज लगभग खत्म हो गया है और पिता से लेकर बच्चों तक तमाम पेमेंट एप और ऑनलाइन भुगतान के तरीकों से खरीदारी या लेनदेन कर रहे हैं। अब बच्चों का खर्च पर काबू तो होता नहीं है इसलिए अक्सर मां-बाप या तो उनके पॉकेट मनी को सीमित कर देते हैं या फिर भुगतान के लिए उनके उनकी पेमेंट प्रक्रिया को अपने अकाउंट से जोड़ देते हैं ।

 वैसे भी , बच्चन साहब (अमिताभ बच्चन) आए दिन भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से यही ज्ञान प्रतिदिन देते हैं।   यह उचित भी है क्योंकि साइबर फ्रॉड अथवा ऑनलाइन ठगी से बचने के लिए बैंकों ने भी किसी भी लेनदेन के साथ ओटीपी अनिवार्य कर दिया है। अब, जब भी बच्चों को कुछ खरीदना या लेनदेन करना होता है तो वे अक्सर ओटीपी के लिए पापा पर आश्रित हो जाते हैं । बस, यहीं से ‘ओटीपी पापा’ की अवधारणा शुरू हुई। 

हम सब जानते हैं कि मोबाइल फोन और ईयर फोन/बड्स में रमी नई पीढ़ी के पास जब दोस्तों के साथ बैठकर बात करने का वक्त नहीं है तो वह मां-बाप के साथ कहां से समय निकाल पाएंगे इसलिए घरों में और खासतौर पर एकल परिवारों में परस्पर बातचीत का चलन कम होता जा रहा है।   बच्चे मोबाइल में मैसेजिंग के जरिए तो बहुत सारी बात कर लेते हैं, सोशल मीडिया पर वह देश ही नहीं दुनिया भर के लोगों से संवाद करते हैं और उनके दोस्तों की संख्या भी हजारों में होती है…लेकिन असल जिंदगी में साथ बैठकर गपियाने के लिए न उनके पास वक्त होता है, न दोस्त और न ही रिश्तेदार। इसलिए, जब भी उन्हें किसी चीज की जरूरत होती है तो वह ऑनलाइन ऑर्डर करते हैं और फिर मां-बाप के पास ओटीपी के लिए फोन या संदेश आ जाता है। एक तरह से अब यह ओटीपी ही उनके बीच परस्पर संवाद का कारण बन गए हैं और इसी के चलते पापा, बाबूजी, पापा जी, बाबा और अब्बा की बजाय अब पापा ‘ओटीपी पापा’ हो गए हैं।  

 तो इस फादर्स डे पर आप भी ओटीपी पापा बनकर न केवल बच्चों को खुश रखिए बल्कि अपने भी आधुनिक होने की खुशियां मनाइए। वैसे भी फादर्स डे कोई हमारा परंपरागत त्यौहार तो है नहीं बल्कि यह भारतीय संस्कृति से अलग किस्म का पर्व है। हमारी सनातन संस्कृति में तो पूरे 365 दिन माता-पिता के सम्मान को समर्पित हैं लेकिन फादर्स डे और इसी तरह के अन्य दिन हमें साल में एक दिन मां बाप के सम्मान का अवसर देते हैं ।

 बाजार ने अपने मुनाफे के लिए इन एक दिन के पर्वों को दशहरा- दीवाली और ईद से बड़ा बना दिया है ।   फ़ादर्स डे नुमा दिनों का मतलब ग्रीटिंग कार्ड खरीदना, केक कटवाना और उपहार देकर किसी महंगे होटल में जाकर खा पी लेना, हो गया है।  यदि आपके पास पैसा है तो आप कपड़े, जूते और गहने में भी खर्च कर सकते हैं। हालांकि, मेरा मानना है कि  हम उत्सव धर्मी लोग हैं इसलिए किसी भी माध्यम से सही…आनंद मनाए। फिर चाहे वह फादर्स डे  हो,मदर्स डे या फिर होली-दीवाली…तो बस, ओटीपी पापा मौज करिए।  

आर यू वेजीटेरियन? सिंपल या हिन्दू वेजीटेरियन

कैथी पेसिफिक एयरलाइन्स के विमान में खाना परोसते हुए एयर होस्टेस ने पूछा- यू आर वेजीटेरियन? मेरे हाँ कहते ही उसने तत्काल दूसरा सवाल दागा- विच टाइप आफ वेजीटेरियन....मीन्स सिंपल वेजीटेरियन या हिन्दू वेजीटेरियन? अपनी लगभग ढाई दशक की नौकरी में यह सवाल चौंकाने वाला था क्योंकि अब तक तो शाकाहारी का एक ही प्रकार अपने को ज्ञात था। अब शाकाहार भी हिन्दू-मुस्लिम टाइप होता है!! इसकी जानकारी जापान यात्रा के दौरान ही मिली। खैर मैंने बताया कि हिन्दू वेजीटेरियन तो उसने कहा कि आपको 20 मिनट इंतज़ार करना होगा क्योंकि मुझे आपके लिए खाना पकाना पड़ेगा ! अब सोचिए विदेशी विमान में कोई विदेशी व्योमबाला (एयर होस्टेस) कहे कि मैं आपके लिए खाना बनाकर लाती हूँ तो दिल में लड्डू फूटना स्वाभाविक है। लगभग 20-25 मिनट के इंतज़ार के बाद वह बटर में बघारी हुई खिचड़ी,चने की दाल और रोटी के नाम पर ब्रेड के टुकड़े लेकर हाज़िर हुई। उसने भरसक प्रयास किया था कि खाना स्वादिष्ट रहे और अपन ने भी दबाकर खा लिया ताकि उसे भी महसूस हो कि खाना स्वादिष्ट ही था।..खैर इस एक किस्से से यह तो साफ़ हो गया था कि जापान में शाकाहार के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और दूसरा यह कि यात्रा पर रवानगी से पहले इष्ट मित्रों की बात सही लग रही थी जो उन्होंने अपने और अपनों के अनुभव के आधार पर बताई थी कि जापान में तुम्हें उपवास करना पड़ सकता है। दरअसल,मुझे आकाशवाणी की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जी 20 देशों के सम्मेलन की कवरेज के लिए जापान भेजा गया था। मैं, एडवांस पार्टी का हिस्सा था मतलब ये की प्रधानमंत्री के वहां पहुंचने से पहले वहां के उत्साह,तैयारियों,भारतीय लोगों से मुलाकात और दोनों देशों के बीच संभावित समझौतों वगैरह पर समाचार भेजना था इसलिए अन्य पत्रकारों की तुलना में यहां ज्यादा रुकना और घूमना था। यही वजह है कि भोजन अपनी प्रमुख चिंता था।

अब जब मैदान में कूद पड़े तो फिर जंग से क्या डरना इसलिए जो जैसा मिलेगा-काम चला लेंगे, के अंदाज़ में मन बना लिया...अब निश्चित ही आप सभी के मन में यह सवाल उछल रहे होंगे कि फिर वहां क्या खाया तो सबसे पहले तो सुन और जान लीजिए कि हमने वहां शाही पनीर, दाल मखनी, रसगुल्ला, गुलाब जामुन, खिचड़ी, सोन-पापड़ी, आलूबंडा, पोहा,उत्पम और इडली सहित वो सब कुछ खाया जो यहाँ भारत में खाने को मिलता है और उतना ही स्वादिष्ट क्योंकि...‘मोदी है तो मुमकिन है।’

जी हाँ, इसमें जरा भी गलत नहीं है क्योंकि जापान में प्रधानमंत्री श्री मोदी के कारण ही यह मुमकिन हुआ। दरअसल हमारे प्रधानमंत्री ठहरे हम से ज्यादा शाकाहारी इसलिए जापान की जिस होटल में हम लोग ठहते थे, उसने भारत से खासतौर पर रसोइए बुलाए थे और जब रसोइए भारतीय थे तो स्वाद भी भारतीय था और अंदाज़ भी, लेकिन जापान में खाने का मामला इतना सीधा भी नहीं था क्योंकि इस कहानी का दूसरा हिस्सा भी है जिसमें ज़रूर जापान में शाकाहारी खाने के संकट का अहसास होता है। दरअसल होटल में तो भारतीय रसोइए की मेहरबानी से शाकाहारी भोजन मिल गया लेकिन अंतरराष्ट्रीय मीडिया सेंटर में तो दुनियाभर के लोगों का ध्यान रखा गया था इसलिए वहां शाकाहार और विशेष तौर पर हिन्दू शाकाहार(!) कहीं पीछे रह गया। मीडिया सेंटर में अपना खाना तो दूर अपनी देशी चाय (वही दूध-शक्कर और पत्ती की जुगलबंदी से भरपूर खौलने के बाद तैयार) के लिए भी तरसना पड़ा। वैसे तो जापान में वीआईपी मेहमानों को 24 प्रकार की चाय उपलब्ध थी जिसमें कई अबूझ नामों के बीच हमारी दार्जिलिंग चाय और आइस टी जैसे कुछ जाने माने नाम भी शामिल थे लेकिन वही अपनी असल कड़क-खौलती चाय नहीं थी। चाय के अलावा कॉफ़ी के भी दर्जन भर प्रकार थे जिनमें ओसाका के स्थानीय ब्रांड के अलावा ‘20 देशों के 20 दाने’(20 beans of 20 countries) जैसी उत्तम किस्म की कॉफ़ी भी थी लेकिन दिक्क़त यहाँ भी दूध की थी और बिना दूध के कड़वी कॉफ़ी को हलक से नीचे उतारना अपने लिए तो किसी सज़ा की तरह है। हालाँकि यहाँ कॉफ़ी के एक प्रकार कॉफ़ी लैटे ने मदद की क्योंकि इसमें पर्याप्त दूध होता है और इसतरह कुछ हद तक चाय- कॉफ़ी का संकट दूर हुआ।

रही खाने की बात तो यदि मैं आपसे कहूँ कि सुशी, साशिमी, टेम्पुरा, याकीतोरी, उडोन, सोबा, कैसेकी, सुकीआकी, सुकमोनो अचार और मिसो सूप...इन नामों को सुनकर कुछ समझ आया..तो आप भी आश्चर्य से पलकें झपकाते रह जाएंगे क्योंकि जब मुझे जापान जाने के बाद भी समझ नहीं आया तो आप खाली नाम पढ़कर कैसे समझ सकते हैं...चलिए इस पहेली को आसान बनाते हैं..दरअसल ये सभी नाम जापान के सबसे लोकप्रिय और लज़ीज़ व्यंजनों के हैं और बड़ी संख्या में तमाम देशों के लोग इनका स्वाद चखने के लिए जापान जाते हैं. जी-20 देशों के महारथियों को भी ये और इनके साथ दर्जनों अन्य व्यंजन परोसे गए थे. व्यंजन तो छोड़िये, दुनिया के इन सबसे ताकतवर मुल्कों के प्रतिनिधियों के लिए 100 से ज्यादा प्रकार के शेक,24 प्रकार की चाय, 8 प्रकार की काफ़ी, दर्जन भर से ज्यादा प्रकार की बीयर,17 प्रकार की वाइन,12 तरह के साफ्ट ड्रिंक,30 प्रकार की देशी मदिरा-शोचु परोसी गयी. शोचु गन्ना, शकरकंद, ज्वार,चावल जैसे कई अनाज और फलों से बनती है. तक़रीबन दौ सौ से ज्यादा व्यंजनों और ड्रिंक्स की सूची में मुझे बस चावल, दार्जिलिंग टी, आइस टी,काफ़ी जैसे कुछ नाम ही समझ आए.

वैसे, शायद कम ही लोग जानते होंगे कि जापानी भोजन दुनिया में काफी लोकप्रिय है और इसका कारण यह है कि पारंपरिक जापानी खाने में पाँच नियमों को ध्यान में रखकर विविधता और संतुलन पर जोर दिया जाता है। इन नियमों के अंतर्गत खाने में पांच रंगों (काला, सफेद, लाल, पीला और हरा), खाना पकाने की पांच तकनीकों (कच्चा भोजन, ग्रिलिंग, स्टीमिंग, उबालना और तलना) के साथ साथ पांच स्वाद (मीठा, मसालेदार, नमकीन, खट्टा और कड़वा) का खास ध्यान रखा जाता है। यहाँ तक कि सूप और चावल बनाते समय भी इन नियमों का पालन किया जाता है। इसके अलावा ताज़ी और उच्च गुणवत्ता वाली मौसमी कच्ची सामग्री का इस्तेमाल के साथ साथ नफ़ासत के साथ परोसने के कारण भी जापानी खान-पान के मुरीद बढ़ रहे हैं।

अब यदि आप हिन्दू वेजीटेरियन (जैसा कैथी पैसिफिक एयरलाइन्स में पूछा गया था) जैसे किसी खूंटे से नहीं बंधे हैं तो जापान में आपकी जीभ के लिए भरपूर गुंजाइश है जो मछली-मटन-चिकन से आगे बढ़कर सुअर,गाय और सी फूड में ऑक्टोपस-केंकड़े और कई प्रकार के कीड़े मकोड़े का भी स्वाद ले सकती है…तो जाइए कभी जापान और लुत्फ उठाइए यहां के स्वाद, संस्कार, संगीत, सहजता, सरलता और सबसे प्रमुख अनुशासन का।


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

"मिज़ाज का हिस्सा बनता स्वच्छता का संकल्प"

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल आज देश में स्वच्छता का एक नया अध्याय लिख रही है। एक समय था जब यह शहर भी अन्य शहरों की तरह कचरे और गंदगी से जूझता था। लेकिन आज यह शहर देश के सबसे स्वच्छ शहरों में शुमार है। कभी जर्दा, परदा के साथ अपनी गर्दा यानि धूल के लिए बदनाम भोपाल आज देश की स्वच्छतम राजधानी है। बीते स्वच्छ सर्वेक्षण में झीलों का शहर भोपाल सबसे स्वच्छ राज्य की राजधानियों में शीर्ष पर है और देश भर के शीर्ष 10 स्वच्छ शहरों में 5वें नंबर पर है।

इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं मसलन:

नागरिकों की जागरूकता: भोपाल के नागरिक अब स्वच्छता को लेकर जागरूक हो गए हैं। वे अपने घरों और आसपास के क्षेत्रों को साफ रखने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

नगर निगम के प्रयास: नगर निगम ने शहर को स्वच्छ बनाने के लिए कई पहल की हैं। इनमें कचरा निस्तारण की बेहतर व्यवस्था, सड़कों की नियमित सफाई, और नागरिकों को जागरूक करने के अभियान शामिल हैं।

स्वच्छ सर्वेक्षण: स्वच्छ सर्वेक्षण ने शहरों के बीच स्वच्छता को लेकर एक प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाया है। भोपाल ने इस प्रतिस्पर्धा में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है।

भोपाल में कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जाता है। शहर में कई कचरा निस्तारण संयंत्र हैं जो कचरे से ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। विगत वर्षों में भोपाल शहर में कचरा संग्रहण और प्रसंस्करण तंत्र बेहतर हुआ है, इस हेतु 719 वाहन शामिल हैं जिनमें 250 वाहन बायो सीएनजी आधारित हैं। इनके अलावा रोड स्वीपिंग हेतु 6 नए मेकेनिकल रोड स्वीपिंग वाहन अपने बेड़े में शामिल किए गए हैं। इसके अलावा भोपाल नगर निगम द्वारा 17 गार्बेज ट्रांसफर स्टेशन, ग्रीन वेस्ट मैनेजमेंट हेतु श्रेडर आदि कचरा प्रसंस्करण हेतु शामिल किए गए हैं। 

प्लास्टिक कचरे के शमन हेतु 5 टन प्रतिदिन का प्लास्टिक रिसायकल प्लांट तैयार किया गया है  जिसमें जिसमें मल्टीलेयर प्लास्टिक को निष्पादित किया जा रहा है , इसी प्रकार संभवतः देश का पहला थर्माकोल रिसायकल प्लांट और 3टन प्रतिदिन क्षमता का रिसायकल प्लांट नारियल अपशिष्ट के समाधान हेतु स्थापित किया गया है। शहर जी जरूरत के अनुसार 50 टन प्रतिदिन क्षमता का रेंडरींग प्लांट भी निगम द्वारा संचालित किया जा रहा है। जिसमें फिश, मीट मार्केट और स्लाटर हाउस से निकला हुआ अपशिष्ट निष्पादित किया जाता है। नगर निगम के इस प्रयास की भारत सरकार द्वारा भी सराहना की गयी है।

इन्हीं सब प्रयासों की वजह से भोपाल की सड़कें, पार्क, कॉलोनियाँ और सार्वजनिक स्थल साफ-सुथरे हैं। शहर में नियमित रूप से सफाई की जाती है और सड़कों पर कचरा फेंकने पर जुर्माना लगाया जाता है।


भोपाल की इस सफलता का राज नागरिकों और सरकार के बीच सहयोग में निहित है। नागरिकों ने स्वच्छता को अपना धर्म बना लिया है और सरकार ने उन्हें हर संभव मदद दी है। भोपाल को स्वच्छ शहर बनाने का सफर अभी भी जारी है। हमें और अधिक प्रयास करने होंगे। हमें सभी को मिलकर काम करना होगा ताकि भोपाल हमेशा स्वच्छ और सुंदर बना रहे जैसे अपने घर और आसपास के क्षेत्र को साफ रखें, कचरा हमेशा डस्टबिन में डालें, प्लास्टिक का उपयोग कम करें, पेड़ जरूर लगाएं और स्वच्छता अभियानों में भाग लें।

भोपाल ने स्वच्छता के क्षेत्र में जो उपलब्धि हासिल की है, वह अन्य शहरों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। भोपाल को स्वच्छता में मिल रही इस सफलता का बहुत श्रेय काफी हद तक भोपाल नगर निगम के प्रयासों को भी जाता है। 2022 में 6वें स्थान से आगे बढ़ते हुए, भोपाल अब 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में 5वां सबसे स्वच्छ शहर बन गया है। भोपाल को 5-स्टार गार्बेज फ्री सिटी रेटिंग भी मिली है, जिससे यह देश की सबसे स्वच्छ राज्य की राजधानी बन गई है।

हाल के वर्षों में भोपाल की उन्नति का श्रेय इसके सर्वोत्तम अभ्यासों, नवाचार और विशिष्टता को दिया जा सकता है। शहर में प्रतिदिन 850 टन कचरा निकलता है और पूरे कचरे का प्रसंस्करण प्रतिदिन किया जाता है। नगर निगम की केन्द्रीय पहल जैसे कचरे का वैज्ञानिक निपटान, कचरे से कंचन बनाने की परियोजनाएं, कचरे का पुनर्चक्रण, सीएनजी से चलने वाले कचरा संग्रह वाहन, रिड्यूस, रीयूज रीसाइकिल-3-आर पर जोर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कचरा संवेदनशील बिंदुओं को हटाकर शहर के सौंदर्य आकर्षण को बढ़ाया गया है। कचरे को अब सीएंडडी, बायो-सीएनजी और चारकोल संयंत्रों के माध्यम से कुशलतापूर्वक एकत्रित और संसाधित किया जाता है।


इस पूरी प्रक्रिया में मध्य प्रदेश के नागरिकों ने जिस उत्साह के साथ भागीदारी की है, वह देश के सामने एक उदाहरण बनकर उभरा है। प्रदेश के इंदौर शहर ने 7 वर्षों में स्वच्छ सर्वेक्षण में लगातार प्रथम स्थान प्राप्त कर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। इसी कारण इंदौर को गोल्ड सिटी क्लब में शामिल किया गया है। आज इंदौर देश का ऐसा पहला शहर है जहां लोग अपने घर के कूड़े को दो नहीं बल्कि छह भागों में अलग-अलग करते हैं जिससे इसकी निष्पादन लागत में काफी कमी आई है। उनका यह प्रयास वेस्ट टू वेल्थ की परिकल्पना को साकार करता है। इन प्रयासों के चलते ही इंदौर आज डस्ट-फ्री एवं बिन-फ्री शहर बन गया है। इन्हीं मानकों के आधार पर गारबेज फ्री सिटी रेटिंग में भी इंदौर सेवन-स्टार शहर घोषित किया गया है। इंदौर देश का पहला वाटर-प्लस शहर भी बना है। वॉटर-प्लस श्रेणी के अंतर्गत घरों से निकलने वाले गंदे पानी को नदी या तालाबों में जाने से पूर्व ट्रीट किया जाता है जिससे पानी के अन्य स्रोत जल प्रदूषण से मुक्त होते हैं। साथ ही, इस पानी का पुनः उपयोग किया जाता है। इंदौर ने जन भागीदारी के माध्यम से अपने शहर की जीवन-रेखा कही जाने वाली कान्ह और सरस्वती नदियों को नया जीवन प्रदान किया है।


दरअसल, स्वच्छ भारत मिशन शहरी सरकार का मात्र एक कार्यक्रम नहीं बल्कि एक जन आंदोलन है। स्वच्छता की दिशा में प्रदेश के नागरिक और अन्य हितधारकों के सामूहिक प्रयासों से मध्य प्रदेश स्वच्छ, स्वस्थ व समृद्ध प्रदेश के रूप में उभरा है। मध्य प्रदेश में स्वच्छता अभियान के तहत कई काम किए जा रहे हैं। स्वच्छता अभियान के कारण प्रदेश में स्वच्छता के स्तर में सुधार आया है।


आंकड़ों पर नजर दौडाएं तो प्रदेश के नगरीय क्षेत्रों में 7082 से अधिक मोटराइज्ड वाहनों से कचरा संग्रहण व्यवस्था का संचालन किया जा रहा है। इनमें सूखे, गीले, घरेलू हानिकारक और सेनेटरी अपशिष्ट को अलग-अलग रखने के लिये कम्पार्टमेंट बनाये गये हैं। जीपीएस और पीए सिस्टम से वाहनों की निगरानी और स्वच्छता विषयों का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। गीले कचरे के प्रसंस्करण और निष्पादन के लिये स्पॉट कंपोस्टिंग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रदेश में 850 से अधिक ठोस अपशिष्ट उत्पादकों द्वारा स्पॉट कंपोस्टिंग की जा रही है। 


प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर देश में शुरू हुए स्वच्छता अभियान में मध्यप्रदेश अनेक कीर्तिमान स्थापित कर चुका है। प्रधानमंत्री की मंशानुरूप प्रदेशवासियों ने पूरे उत्साह और जन-सहयोग से स्वच्छता के क्षेत्र में नये आयाम भी स्थापित किये हैं। इस वर्ष अभियान की थीम “स्वभाव स्वच्छता-संस्कार स्वच्छता’’ रखी गयी । स्वच्छता ही सेवा अभियान में अधिक से अधिक जन-भागीदारी और स्थानीय निकायों की भागीदारी पर जोर दिया गया । मध्यप्रदेश स्वच्छ भारत मिशन में कई मामलों में लगातार नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है । प्रदेश के सभी शहरों ने पिछले 10 वर्षों के दौरान अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयास किये हैं। जनता के सहयोग से स्वच्छ भारत मिशन अब यहाँ जन-आंदोलन का रूप ले चुका है।

शुक्रवार, 17 जनवरी 2025

सर्दियों की धूप...।

 सर्दियों की धूप...।

सर्दियों की धूप

होती है कुछ अलग सी

बिल्कुल मां बाप के आशीष सी

कम मांगों

तो ज्यादा मिल जाती है।


मुट्ठी भर धूप की 

तमन्ना की तो

अंजुरी भर गयी

और भरनी चाही अँजुरी

तो पूरे आँचल में समा गयी।


सर्दियों की धूप

होती है कुछ अलग सी

बिल्कुल मां बाप के आशीष सी।


गर रूठ गयी धूप 

समा गई बादलों के आगोश में

फिर तरसाती है

तड़फाती है

सर्दियों की धूप

बिल्कुल मां बाप के आशीष सी।


मां बाप रुठे

तो रूठ जाती है किस्मत

गर उठ गया आशीष का साया

तो थम सा जाता है

दुआओं का काफ़िला।


न बचता है मुट्ठी भर

न अँजुरी भर

और न ही आँचल भर

आशीष

बिल्कुल सर्दियों की धूप

की तरह


ज़रूरी है सहेजना

धूप भी, आशीष भी

ताकि 

जब न रहें दोनों

फिर भी

महसूस हो गरमाहट

धूप की, आशीष की

दिन भर-जीवन भर।।


सर्दियों की धूप...।

देशी मिठाइयों में विदेशी मेहमान


ये कुनाफा है..हमारे देशी मिठाई परिवार में विदेशी मेहमान। कुछ लोग इसे कुनाफ़े, कनाफ़े, कोनाफी, कुनाफ़्ता, कुनेफे और किनाफा जैसे तमाम नामों से जानते हैं। ये तुर्किए (पहले टर्की) से आकर हमारे मिठाई परिवार में घुसपैठ कर रहा है। खानपान की अरबी किताबों की कहानियों में बताया गया है कि उस दौर में और खासकर रमजान में बादशाह/अमीर/खलीफा नित नए मीठे की मांग करते थे और उनके खानसामा मिठाइयों में प्रयोग करते रहते थे और इसी प्रयोग में कुनाफा का जन्म हो गया। वैसे, तुर्की की मिठाई के नाम पर चौंकने वालों को शायद पता नहीं होगा कि हमारे शहर शहर मिलने वाली और घर घर में खाई जाने वाली रसीली और लज़ीज़ जलेबी भी यहीं से आई है। 

खैर, कुनाफा एक पारंपरिक अरब मिठाई है और पूरे अरब जगत में लोकप्रिय है। इसे अक्सर विशेष अवसरों और छुट्टियों में खाया और खिलाया जाता है। पिछले कुछ समय से भारत में भी कुनाफा के मुरीद तेजी से बढ़े हैं और अब दिल्ली मुंबई ही नहीं भोपाल इंदौर जैसे शहरों में भी यह उपलब्ध है। वैसे, भारत में आकर इसने भी पिज़्ज़ा की तरह रूप और स्वाद बदलकर भारतीय चोला पहन लिया है जैसे पिज़्ज़ा ने पनीर और कबाब के साथ साथ अब कुल्हड़ पिज़्ज़ा तक का अवतार ले लिया है। इसी तरह, अब कुनाफा भी चॉकलेट,कोकोनट,ब्लू बैरी से लेकर मैंगो तक के विविध स्वाद में मिलने लगा है।

कुनाफा खाते वक्त सबसे पहले आप कुरकुरी ‘कटेफी डो’ से रूबरू होते हैं, फिर क्रीम, मीठी सी चाशनी और ड्राई फ्रूट्स आपकी जीभ पर धीरे धीरे उतरकर स्वाद का रंग जमाते हैं। लेकिन यदि देशी अंदाज में समझाया जाए तो यह मलाई,चाशनी और काजू, किशमिस,पिस्ता,बादाम के साथ सिवइयों  का मिश्रण है। बस,इसे परोसने का अंदाज़ अलग है और वहीं कुनाफा से मुनाफा बनाने में सहायक है। मौका मिले, तो स्वाद ले ही लीजिए क्योंकि ज्यादा महंगा नहीं है…पॉकेट फ्रैंडली भी है कुनाफा।

रविवार, 12 जनवरी 2025

ये नहीं प्यारे कोई मामूली अंडा..!!

 

‘आओ सिखाऊँ तुम्हें, अंडे का फंडा इसमें छिपा है जीवन का फलसफ़ा अंडे में अंडा,फंडे में फंडा…।’ फिल्म ‘जोड़ी नंबर-एक’ का यह गाना भले ही मनोरंजन के लिए हो लेकिन अंडों में वाकई जीवन का फलसफा छिपा होता है और यदि वह अंडा ‘संडे हो या मंडे, रोज खाएं अंडे’ विज्ञापन वाला या हमारे राज्य की शान ‘कड़कनाथ’ का न होकर दुनिया के सबसे बड़े और शायद सबसे खतरनाक डायनासोर का हो तो सारा स्वाद धरा रह जाएगा।  डायनासोर तो अब इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनके अंडे जरूर इतिहास से वर्तमान को जोड़ने की अहम कड़ी हैं। अब करोड़ों साल पहले पाए जाने वाले डायनासोर के अंडे कोई समोसा या ब्रेड पकौड़ा तो हैं नहीं कि कहीं भी मिल जाएंगे। सबसे पहले तो इन अंडों का मिलना और फिर इतने साल बाद देखने का अवसर मिलना वाकई प्रकृति और विज्ञान के समन्वय के चमत्कार से कम नहीं है। वैसे, व्यंग्यात्मक अंदाज में  कहें तो असल डायनासोर भले ही नहीं बचे लेकिन इंसानों के भेष में डायनासोर लगातार बढ़ रहे हैं। इनमें से कोई अरबों रुपए खा जाता है तो कोई सोना निगलने-उगलने लगता है। खैर, मूल विषय पर लौटते हैं…हाल ही भोपाल में अंतरराष्ट्रीय वन मेले में विज्ञान ने प्रकृति की गोद में बैठकर इन अंडों का फंडा दिखा दिया। यहां डायनासोर की एक प्रजाति टाइटेनोसोर के ऐसे अंडे प्रदर्शित किए गए थे जो 650 लाख वर्ष पुराने हैं और अब अनमोल हैं। हम सभी जानते हैं कि डायनासोर, पृथ्वी पर लाखों साल पहले राज करने वाले विशालकाय जीव थे और आज तक हमेशा से वैज्ञानिकों और आम लोगों की जिज्ञासा का विषय हैं। जुरासिक पार्क, द लैंड ऑफ द लॉस्ट, डायनासोर आइसलैंड, गॉडजिला, वॉकिंग विद डायनासोर, द वैली ऑफ ग्वांगी, गोर्गो, थिओडोर रेक्स, टैमी और टी-रेक्स जैसी फिल्मों ने इन शक्तिशाली जीवों के बारे में जिज्ञासा और खौफ दोनों बढ़ाने का काम किया है।  यही वजह है कि इनके बारे में जानने के लिए वैज्ञानिक लगातार नए-नए तरीके खोज रहे हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण तरीका है डायनासोर के अंडों का अध्ययन। वैज्ञानिकों का कहना है कि डायनासोर के अंडे हमें इन प्राचीन जीवों के जीवन के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। इनसे हमें डायनासोर के आकार, आहार, प्रजनन और विकास के बारे में पता चलता है। डायनासोर के अंडे अब आमतौर पर जीवाश्म के रूप में पाए जाते हैं। जीवाश्म वे अवशेष होते हैं जो लाखों साल पहले जीवों के मरने के बाद बनते हैं। डायनासोर के अंडे के जीवाश्म आमतौर पर चट्टानों में दबे हुए पाए जाते हैं। डायनासोर के अंडे हमें डायनासोर के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। इनसे हमें डायनासोर के विकास और विलुप्त होने के कारणों के बारे में समझने में मदद मिलती है। इसके अलावा, डायनासोर के अंडे हमें पृथ्वी के इतिहास के बारे में भी बताते हैं। बताया जाता है कि दुनिया का सबसे बड़ा डायनासोर का अंडा चीन में मिला था। हमारे लिए सबसे बड़ी बात यह है कि मध्य प्रदेश भारत का एक ऐसा राज्य है जहां बड़ी संख्या में डायनासोर के अंडे मिले हैं। प्रदेश में इन अंडों की खोज वैज्ञानिकों के लिए बेहद रोमांचक है क्योंकि ये अंडे हमें डायनासोर के जीवन और मध्य प्रदेश में उनके अस्तित्व के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि मध्य प्रदेश की भौगोलिक संरचना और जलवायु लाखों साल पहले डायनासोर के रहने के लिए अनुकूल थी। इसी कारण यहां डायनासोर के अंडे, जीवाश्म और अन्य अवशेष बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।  मध्य प्रदेश के कई जिलों में डायनासोर के अंडे मिले हैं, जिनमें धार, झाबुआ और रतलाम प्रमुख हैं। एक और मजेदार तथ्य यह भी है कि मध्य प्रदेश के कुछ गांवों में तो लोग डायनासोर के अंडों को देवता मानकर पूजा करते थे। जब वैज्ञानिकों ने इन अंडों की जांच की तो पता चला कि ये वास्तव में डायनासोर के अंडे हैं।  वैज्ञानिकों का मानना है कि मध्य प्रदेश में अभी भी बड़ी मात्रा में डायनासोर के अंडे और जीवाश्म मिल सकते हैं और इनसे हमें डायनासोरों के बारे में और अधिक जानकारी मिल सकती है। आप भी देखिए, कहीं आपके आसपास भी तो कहीं डायनासोर का कोई अंडा भगवान बनकर पूजा तो नहीं जा रहा..!! 

चालीस साल का कलंक है, मिटने में समय तो लगेगा

जैसे-जैसे कंटेनरों का काफिला धीरे-धीरे भोपाल की सरहद को पार करते हुए आगे बढ़ रहा था वैसे-वैसे भोपाल के लोगों की जान में जान आ रही थी। आखिर, दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंककर पीता है और जब बात हजारों-लाखों परिवारों की तबाही के दर्द की हो तो अतिरिक्त सावधानी तो बनती ही है। इसलिए प्रशासन ने भी सुरक्षा,सतर्कता,सजगता, सावधानी और समझाइश में अधिकतम मानकों का पालन कर अपनी ओर से कोई कमी नहीं रहने दी।  हम बात कर रहे हैं, भोपाल में दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना की जन्मदाता यूनियन कार्बाइड फैक्टरी में जमा अवशिष्ट या सरल भाषा में कहें तो जहरीले कचरे को यहां से हटाने की । हो सकता है कि दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में कचरे के पहाड़ों के साए में रह रहे लोगों के लिए यह सामान्य कचरा प्रबंधन की कवायद हो या फिर देशव्यापी स्वच्छता मुहिम का एक हिस्सा, लेकिन भोपाल के लोगों के लिए यह 40 साल के डर के बाद चिर परिचित दुश्मन से मिली मुक्ति है, आसन्न मंडराते खौफ से छुटकारा है, नासूर बन गए घाव की मरहम पट्टी है और देश की स्वच्छतम राजधानी के माथे पर लगा कलंक कुछ कम करने जैसी उपलब्धि है।  यूनियन कार्बाइड से निकले 12 कंटेनर जब 37 किमी प्रति घंटे की धीमी रफ्तार से 250 किमी का मामूली सा फासला घंटों में तय कर रहे थे तब वे बदलाव के साथ साथ दशकों के संघर्ष, हजारों लोगों की मौत के ग़म,लाखों लोगों की बीमार जिंदगी और तिल-तिलकर मरते लोगों को भविष्य की किसी आशंका से मुक्ति के रास्ते को पाट रहे थे। हजारों लोगों की जिंदगियां लीलने वाला यह कारखाना 1984 से ही अपने इस जहरीले कचरे के कारण पूरे शहर को सदमे में रखे था। यूनियन कार्बाइड परिसर में कभी कभार दुर्घटनावश लगी मामूली सी आग भी लोगों में सिहरन और घातक दिसंबर की भयावह यादें ताजा कर देती थी।  और, ऐसा भी नहीं है कि भोपाल को अपने इस कलंक से आसानी से छुटकारा मिल गया है। यह करीब 40 साल चली लंबी लड़ाई का नतीजा है। यह आम लोगों की पीढ़ियों का संघर्ष,अदालत का दखल, सरकारों का समन्वय और विशेषज्ञों की सक्रियता के बाद नसीब हुआ है। अगस्त 2004 में आलोक प्रताप सिंह की मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में लगाई गई याचिका ने उम्मीदों को पंख लगाए थे और फिर यह पंख व्यक्तिगत गुहार से आगे बढ़कर सामूहिक अपील के जरिए मजबूत होते गए । हालांकि,अलग अलग स्तर पर समितियां बनती बिगड़ती रहीं, स्थानीय लोगों के विरोध के कारण कचरा नष्ट करने के स्थान बदलते रहे, प्रायोगिक निपटान पर केंद्रित शोध अनुसंधान के पन्ने पर पन्ने जमा होते रहे और अंततः जब सत्ता,व्यवस्था और न्यायपालिका का संगम हुआ तो इसकी अंतिम तिथि भी मुकर्रर हो गई।  आंकड़ों के लिहाज़ से भले ही 12 कंटेनर कम लगते हों लेकिन इसके पीछे लगे मानसिक और शारीरिक श्रम,मशीनरी और संसाधनों के विश्लेषण से ही असल में पता चलता है कि यह कितना ‘हरक्यूलियन टास्क’ था। सबसे पहले तो इसे भोपाल से इंदौर के पास पीथमपुर तक ले जाने के लिए करीब 250 किमी का सुरक्षित रास्ता बनाना कम आसान नहीं था। इस ‘ग्रीन कोरिडोर’ के लिए पूरे रास्ते पर चाक चौबंद व्यवस्था करनी पड़ी। किसी वीवीआईपी जैसी हैसियत रखने वाले इन 12 कंटेनरों के आगे पीछे पुलिस की गाड़ियां चली। इसके अलावा, गैस राहत विभाग,एंबुलेंस,फायर ब्रिगेड,प्रदूषण महकमे को मिलाकर 25 वाहनों का काफिला तैयार हुआ । कंटेनर की नान स्टॉप यात्रा के लिए तमाम सुरक्षा इंतजाम के साथ साथ दो दो ड्राइवर तैनात किए गए जबकि आम तौर पर इतना सफर एक ड्राइवर एक दिन में दो बार तक कर लेता है। गैस त्रासदी के कारण काले धब्बे की तरह दर्ज 2 (तब दिसंबर 1984) तारीख को शायद खासतौर पर इस काम के लिए चुना गया था और रात 9 बजे यह दुनिया का सबसे संवेदनशील काफिला अपनी मुहिम पर रवाना हुआ। इस कचरे को पैक करने में 150 से ज्यादा मजदूरों ने तीन दिन लगातार 15 शिफ्ट में काम किया।   प्रशासन इस मामले में इतना संवेदनशील था कि इस काम की निगरानी के लिए तमाम सरकारी-गैर सरकारी महकमों के करीब एक हजार छोटे-बड़े नुमाइंदे मौजूद थे और इनमें सौ से ज़्यादा तो विशेषज्ञ थे। इस नासूर से छुटकारे के लिए सरकार ने करीब सवा सौ करोड़ रुपए नियत किए हैं लेकिन जानकारों के अनुसार यह कचरा पूरी तरह से जलने में दस से बारह महीने लग जाएंगे। इसके पहले,इसे किस्तों में जलाया जाएगा और बार बार हवा,पानी,जमीन और वातावरण का परीक्षण किया जाएगा ताकि लेश मात्र भी शंका न रहे। इतना ही नहीं, यहां से निकलने वाली राख तक की कई बार जांच की जाएगी और तमाम चिंताओं/शंकाओं/आशंकाओं को निर्मूल साबित कर जहरीले कचरे का नाम-ओ-निशान मिटाया जाएगा और तब जाकर भोपाल,इंदौर या पीथमपुर ही नहीं प्रदेश के लोगों को सम्पूर्ण चैन मिल पाएगा। 

एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग..!!

हम इंसान भी विचित्र होते हैं। एक चेहरे में कई चेहरे छुपाकर रखते हैं। नए साल में नए विचार और नए संकल्प लेना भी कुछ इसी तरह का मामला होता है । हाल ही में इंदौर के एक नव निर्मित मॉल के प्ले जोन में बने ऐसे कक्ष में जाने का मौका मिला जिसमें मिरर के जरिए एक ही तस्वीर की कई इमेज रची जा रही थीं,तभी यह ख्याल आया कि वास्तविक जीवन में भी हमें कितनी भूमिकाओं का निर्वाह करना पड़ता है और इसके लिए हमें एक चेहरे में कितने चेहरे लगाने पड़ते हैं। फिल्म दाग़ में साहिर लुधियानवी भी कुछ इसी तरह की बात कह चुके हैं। उन्होंने लिखा है:

‘एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग,

जब चाहें बना ले अपना किसी को,

जब चाहें अपनों को भी, 

बेगाना बना देते हैं लोग।’

जैसा कि हम जानते हैं कि एक चेहरे में कई चेहरे छुपे होते हैं…का मतलब है कि एक व्यक्ति का बाहरी रूप या व्यक्तित्व उसके अंदर छिपे कई पहलुओं को पूरी तरह से नहीं दर्शाता। हर इंसान के अंदर एक से अधिक रूप, विचार, भावनाएँ और अनुभव होते हैं, जो समय, स्थिति और परिवेश के साथ बदलते रहते हैं। इसका मतलब यह है कि एक व्यक्ति केवल अपनी बाहरी पहचान के आधार पर नहीं पहचाना जा सकता, बल्कि उसके अंदर कई तरह की छुपी हुई सच्चाइयां और पहलू हो सकते हैं। मसलन, इंसान का व्यक्तित्व केवल एक ही रूप में नहीं होता। उसकी सोच, आदतें, भावना और प्रतिक्रियाएँ विभिन्न परिस्थितियों में बदल सकती हैं। एक व्यक्ति अपने परिवार के सामने एक अलग रूप दिखा सकता है, जबकि कार्यस्थल पर या समाज में वह कुछ और हो सकता है। इस तरह, एक चेहरे में कई चेहरे का मतलब है कि हर व्यक्ति के भीतर कई परतें होती हैं, जो समय और संदर्भ के अनुसार प्रकट होती हैं।

व्यक्ति के भीतर खुशियाँ, दुख, क्रोध, घृणा, प्रेम, और अन्य भावनाएँ एक साथ हो सकती हैं। किसी के एक ही चेहरे पर ये सभी भावनाएँ परिलक्षित हो सकती हैं, जो स्थिति के आधार पर बदलती रहती हैं। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति अपनी बाहरी मुस्कान के साथ भी अंदर से दुखी हो सकता है।

एक व्यक्ति के अनेक चेहरे होने का मतलब है कि हम सभी अलग-अलग स्थितियों और लोगों के साथ अलग-अलग तरह से व्यवहार करते हैं। ये हमारे अनुभवों, भावनाओं और सोचने के तरीके पर निर्भर करता है। जैसे घर पर हम अपने परिवार के साथ आरामदायक और सहज होते हैं लेकिन काम पर हम अधिक पेशेवर और गंभीर हो जाते हैं। वहीं,दोस्तों के साथ हम मज़ाकिया और हल्के-फुल्के होते हैं। तो अजनबियों के साथ हम थोड़े संकोची या सावधान रहते हैं।

कई बार सामाजिक अपेक्षाएं हमें व्यवहार बदलने के लिए मजबूर कर देती हैं।  समाज हमसे क्या उम्मीद करता है, इस आधार पर अपना व्यवहार बदलते हैं। कई बार अलग-अलग परिस्थितियों में हम अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया करते हैं।

कई बार, व्यक्ति समाज की अपेक्षाओं और स्वार्थ के कारण अपने असली व्यक्तित्व को छुपाता है। ऐसे में उसका मुखौटा उसकी वास्तविक पहचान से अलग होता है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को अपने सामाजिक रुतबे या प्रतिष्ठा के कारण एक आदर्श और संतुलित व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करना पड़ता है, जबकि वह असल में जटिल और भीतर से अलग विचारों से भरा हो सकता है।

एक व्यक्ति के रिश्ते भी उसके चेहरे के विभिन्न रूपों को दर्शाते हैं। किसी के साथ दोस्ती में एक रूप होता है, तो माता-पिता या ससुराल के साथ दूसरा रूप। किसी के साथ प्रेम संबंध में एक रूप दिख सकता है, जबकि प्रोफेशनल लाइफ में वह व्यक्ति कुछ और तरीके से व्यवहार करता है।

कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि इंसान को केवल उसकी बाहरी पहचान से नहीं आंकना चाहिए। हर व्यक्ति के अंदर अनेक पहलू होते हैं, और उसका असली रूप उसकी परिस्थितियों, विचारों और अनुभवों के आधार पर बदल सकता है। इसलिए, किसी व्यक्ति को समझने के लिए उसके भीतर के कई चेहरों को देखना और समझना जरूरी है।







चलो राम के धाम अयोध्या, राम बुलाते है..!!

अयोध्या में भगवान राम के भव्य और दिव्य मंदिर के लोकार्पण का 1 साल पूरा होने को है। बीते साल 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मंदिर का लोकार्पण किया था और सैकड़ो साल बाद रामलला अपने घर में ससम्मान प्रतिष्ठित हुए थे। हालांकि, मंदिर का निर्माण अभी पूरा नहीं हो पाया है और कई काम अभी बाकी है लेकिन प्राथमिक तौर पर जो मंदिर की जो भव्यता, वास्तुशिल्प और सुंदरता दिखाई पड़ रही है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब यह मंदिर पूरी तरह से निर्मित हो जाएगा तो शायद इसकी गिनती दुनिया के गिने-चुने मंदिरों में होगी। यहां रामलला के साथ उनके परम भक्त पवन पुत्र हनुमान और सप्त ऋषियों सहित भारतीय पुरातन संस्कृति की पहचान रहे विभिन्न प्रतीकों को कलात्मक रूप में देखने का अवसर मिलेगा। टेंट में मौजूद रहे रामलला और अब मंदिर में विराजमान भगवान श्री राम के इस बदलाव के बीच अयोध्या पूरी तरह से बदल गई है और लगातार संवर रही है। अब अयोध्या अविकसित सा ग्रामीण अंचल न रहकर भगवान राम की भव्यतम राजधानी में बदल रही है। इस लेख के लेखक को पहले और बाद की दोनों ही अयोध्या को करीब से देखने का सौभाग्य मिला है। यही नहीं, मंदिर के लोकार्पण पर संभवतः देश की पहली किताब ‘अयोध्या 22 जनवरी’ का लेखन भी किया है ।


सरहद पर लगी ककंटीले तारों की घनी बाड़, जगह जगह तलाशी लेते चाक चौबंद सुरक्षाकर्मी और कई किलोमीटर तक पैदल चलने के बाद नसीब होने वाले राम लला के दर्शन का दौर जिन लोगों ने देखा है, उन्हें अब शायद अयोध्या पहचान में न आए। आपको याद होगा तब इतनी परेशानी उठाने के बाद रामलला के दर्शन के लिए एक छोटी सी खिड़की से झांकना पड़ता था। तब रामलला एक मामूली से चबूतरे पर टेंट के नीचे विराजमान थे और इतने कष्ट के बाद भगवान के ये दर्शन मन को द्रवित कर देते थे।  अब स्थिति बदल गई है। अयोध्या में  राजा राम विराजमान और वे पूरे सम्मान के साथ अपनी वैभवशाली राजधानी में श्रद्धालुओं को दर्शन रहे हैं। अयोध्या में प्रवेश करते ही आपको इस बदलाव का एहसास होने लगता है। अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन पर बना गिलहरी का स्मारक आपका स्वागत करता है। वहीं, स्टेशन पर बना हवाई अड्डे जैसा विशाल कॉनकोर्स, कई तरह के खाने-पीने के लजीज अड्डे, रुकने की तमाम व्यवस्थाएं और मंदिर की शक्ल में तैयार हुआ अयोध्या धाम स्टेशन आपका पलक पांवड़े बिछाकर आपका स्वागत करता है। कुछ यही स्थिति यहां के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की है। स्टेशन से रामपथ होते हुए जैसे ही हम भगवान श्रीराम के नवीनतम मंदिर की ओर बढ़ते हैं तो सड़क के दोनों और एक ही आकार प्रकार की नेम प्लेट, मकान के एक समान रंग और हर मकान के सामने मंदिर की तरह बनी डिजाइन बरबस ही अपनी ओर आपका ध्यान खींचते है । दरअसल, दुनिया भर से आने वाले भक्तों के मन में श्रद्धा का भाव जगाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने रामपथ को खास तौर पर तैयार किया है। यहां आते ही आपको राम मंदिर की दिव्यता और भव्यता का एहसास होने लगता है। रामपथ ही क्यों मंदिर को जोड़ने वाले तमाम पथ, इसी अंदाज में सजाए और संवारे जा रहे हैं । मसलन,एयरपोर्ट से धर्मपथ के जरिए रामपथ तक पहुंचते हुए भी आपको इसी तरह का एहसास होता है। धर्मपथ पर लगे सूर्य स्तंभ सूर्यवंशी शासकों की इस नगरी की पहचान से आपको रूबरू कराते हैं। वही धर्मपथ और रामपथ के बीचो-बीच तैयार लता मंगेशकर चौक अपने सौंदर्य से आपका ध्यान आकर्षित करता है। यहां स्थापित आकर्षक वीणा सभी का मन मोह लेती है।  खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां फोटो लेने से अपने आप को नहीं रोक पाए थे । इसी चौराहे से जब आप पवित्र सरयू नदी की ओर बढ़ते हैं तो सरयू के शानदार नवनिर्मित घाट पर आप स्नान करने और दीपदान करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। मां सरयू की आरती के बाद कल कल बहता सरयू नदी का पवित्र, स्वच्छ और पारदर्शी जल का आचमन लेकर आप प्रभु श्री राम के दर्शन के लिए आगे बढ़ सकते हैं।

प्रभु श्री राम के मंदिर के पास पहुंचते ही आपको अपने आप ही आत्मिक शांति का अनुभव होने लगता है। यहां जगह-जगह खड़े कार्यकर्ता राम राम कहकर आपका स्वागत करते हैं और पूरा परिवेश एक खास तरह की सुगंध से आपके मन को सराबोर कर देता है। पूरे मंदिर परिसर में सुबह की आरती से लेकर शाम को शयन आरती तक महकाने वाली ये खुशबू खास प्रकार की अगरबत्तियों की है। जिन्हें यहां प्रतिदिन लगाया जाता है। करीब साढे 5 फीट ऊंची यह अगरबत्तियां दिनभर मंदिर को अपनी दिव्य सुगंध से महकाती रहती है। सुव्यवस्थित लाइन से होते हुए आप पहले अपने जूते उतारते हैं और फिर मोबाइल या इसी तरह की अन्य सामग्री जमा करते हैं और उसके बाद आप रामलला के दर्शन करने के लिए मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। यदि आप अयोध्या जा रहे हैं तो इस बात का खास ध्यान रखें कि मंदिर में किसी भी तरह की सामग्री ले जाना माना है। यहां तक की प्रसाद, फूलमाला,मोबाइल, डिजिटल घड़ी, पुस्तक या और भी कोई सामग्री पूरी तरह प्रतिबंधित है। आप यदि मंदिर में कुछ दान करना चाहते हैं तो मुख्य द्वार पर बने संस्थान के कार्यालय में जाकर जमा कर सकते हैं और वह सामग्री रामलला के चरणों तक पहुंच जाती है । इसके लिए बाकायदा आपको रसीद भी दी जाती है इसलिए भगवान के दर्शन करने के लिए खाली हाथ ही जाए। मंदिर में सबसे अच्छा इंतजाम बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए है। यहां मंदिर प्रबंधन की ओर से व्हीलचेयर उपलब्ध कराई गई है जो पूरी तरह से निशुल्क है। हां, यदि आप किसी सहयोगी को साथ ले जाना चाहते हैं तो व्हीलचेयर चलाने के एवज में उसे ₹150 का भुगतान करना पड़ता है। यह एक तरह से बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने का तरीका है। फिलहाल मंदिर प्रबंधन ने 100 व्हीलचेयर और इतने ही वॉलिंटियर तैनात किए हैं जो बुजुर्गों को आराम और सुविधा के साथ रामलला के दर्शन करा कर मंदिर प्रबंधन के कार्यालय तक वापस छोड़ देते हैं। इसी तरह पूरी अयोध्या नगरी में जगह-जगह तैनात युवक व्हीलचेयर के साथ युवक बुजुर्गों और असहाय लोगों को इस पवित्र नगरी के आसानी से दर्शन करने में सहायक बनते हैं वे मामूली सा शुल्क लेकर हनुमानगढ़ से लेकर जानकी महल तक और दशरथ महल से लेकर आपके ठहरने के स्थान तक पहुंचने का दायित्व निभाते हैं ।


जैसे ही आप नागर शैली में बना रहे रामलला के भव्य मंदिर में प्रवेश करते हैं आप अचंभित हो जाते हैं । यहां एक-एक स्तंभ पर की गई बारीक कारीगरी, आकर्षक गुंबद और पूरे मंदिर परिसर में उकेरी गई कलाकृतियां एक अलग ही एहसास कराती है। रामलला की बाल रूप वाली प्रतिमा ऐसी मनमोहक है जैसे आपसे संवाद कर रही है और अपनी मन मोहिनी मुस्कुराहट से आपके जीवन के कष्ट हर रही है। मंदिर में दर्शन के बाद हर श्रद्धालु को निशुल्क प्रसाद भी दिया जाता है । रामलला के दर्शन के बाद आप अयोध्या में हनुमान गढ़ी और जानकी महल सहित अन्य धार्मिक स्थलों का भ्रमण कर सकते हैं। हालांकि ज्यादातर स्थान जन्मभूमि मंदिर के आसपास ही है इसलिए इन स्थानों तक जाने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती।


 अयोध्या में रुकने के लिए भी अब पहले से बहुत बेहतर व्यवस्थाएं हैं। नए-नए होटल और धर्मशालाएं पहले ही श्रद्धालुओं की मदद के लिए तत्पर है, वही घर-घर में बना रहे होम स्टे भी अब आगंतुकों का खास ख्याल रख रहे हैं। आप अपने बजट में यहां सुविधाजनक रुकने का ठिकाना तलाश सकते हैं । मंदिर के बिल्कुल सामने बनी बिडला धर्मशाला भी किसी मायने में कम नहीं है। अयोध्या में रुकने के साथ-साथ खाने पीने के सस्ते और अच्छे ठिकानों की भी कमी नहीं है । खास तौर पर रामपथ के दोनों और बड़ी संख्या में छोटे-बड़े रेस्टोरेंट है जो अपने देसी स्वाद के साथ श्रद्धालुओं की पेट पूजा करते हैं। 


कुल मिलाकर अयोध्या अब वाकई में भगवान राम का धाम बन गई है। आने वाले कुछ समय में जब मंदिर का निर्माण पूरा हो जाएगा और यह अपने पूरे भव्य और दिव्य आकार में दिखने लगेगा तब यहां की छटा और आभा अलग ही होगी ।  जन्मभूमि मंदिर परिसर में सप्त ऋषियों की प्रतिमाओं को भी स्थापित किया जा रहा है । इसके अलावा उपवन और छोटे तालाब भी बनाए जा रहे हैं। तो देर किस बात की है उठाइए अपना बैग और निकल पड़िए भगवान राम के दर्शन के लिए। एक लोकप्रिय भजन में कहा भी गया है:

चलो राम के धाम अयोध्या

राम बुलाते है,

सज गई नगरी राघव की

हम खबर सुनाते हैं।

अरे चलो राम के धाम अयोध्या

राम बुलाते है।।

 


मंगलवार, 10 दिसंबर 2024

लू से भी बचिए और लू उतारने से भी..!!


आमतौर पर परस्पर बोलचाल में लू या लपट से जुड़े एक मुहावरे का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है। यह मुहावरा है ‘लू उतारना’। कहीं भी, विवाद बढ़ने पर यह कहा जाता है कि हम ‘दो मिनट में तुम्हारी लू उतार’ देंगे। इस मुहावरे में लू से आशय निश्चित तौर पर घमंड उतारने या बेइज्जती करने से है, लेकिन तकनीकी तौर पर देखें तो यह मुहावरा भी लू से जुड़ी गर्मी की वजह से ही रचा गया होगा । दिमाग पर गर्मी चढ़ना भी एक तरह से लू लगने जैसा ही  है । हम सब जानते हैं कि गर्मी के दिनों में लू किस हद तक खतरनाक होती है। अब आपके दिमाग में यह सवाल जरूर आ सकता है कि विदा लेते मानसून और ठंडक के आगमन के बीच लू का क्या काम? लू, बेमौसम बरसात की तरह अभी कैसे टपक पड़ी तो इसकी जरूरत इसलिए पड़ी है क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार ने हाल ही में लू को लेकर एक बड़ा फैसला किया है।  इस फैसले में लू को प्राकृतिक आपदा में शामिल कर लिया गया है । यह कदम उठाने वाला मप्र देश का संभवतः तीसरा या चौथा राज्य है।  अब तक केरल या दक्षिण के गंभीर लू ग्रस्त राज्यों ने ही इस दिशा में पहल की है। इस फैसले का फायदा यह होगा कि अब लू से होने वाली मृत्यु के दौरान मप्र में भी मृतक के परिजनों को उसी तरह से आर्थिक सहायता मिल सकेगी जिस तरह अन्य प्राकृतिक आपदाओं में मिलती है। हमारे प्रदेश में सामान्य तौर पर प्राकृतिक आपदाओं में मृत्यु पर 4 लाख रुपए की मुआवजा राशि या आर्थिक सहायता सरकार की ओर से दी जाती है। अब यह सहायता लू से प्रभावित परिवारों को भी मिल सकेगी। एयर कंडीशंड घरों और एसी कारों में जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए शायद लू किसी चिंता का विषय न हो लेकिन हाड़-तोड़ मेहनत कर जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए लू हर साल किसी संकट से काम नहीं है। खास तौर पर अप्रैल,मई और जून के महीने उनके लिए किसी आपदा से काम नहीं होते। आए दिन लू लगने और लू से मृत्यु की खबरें अखबार के पन्नों को रंगती रहती है लेकिन यह शायद कम लोग ही जानते होंगे की लू से होने वाली मौतें कई बीमारियों से होने वाली मौतों को भी पीछे छोड़ देती हैं। एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में हर साल लू के कारण डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु होती है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि दुनिया भर में हर साल लू से होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा सबसे ज़्यादा है। भारत के बाद चीन और रूस का नंबर आता है। आस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी में किए गए अध्ययन के मुताबिक, लू से होने वाली मौतें गर्मी से जुड़ी सभी मौतों का करीब एक तिहाई होती हैं। इसी अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों का 1 फ़ीसदी हिस्सा लू से होने वाली मौतें होती हैं। लू से हर गर्मियों में होने वाली कुल 1.53 लाख मौतों में से करीब आधी मौतें एशिया में और 30 फ़ीसदी से ज़्यादा मौतें यूरोप में होती हैं। इस रिसर्च के नतीजों के अनुसार, दुनिया भर में 30 वर्षों के बीच लू की वजह से करीब 45 लाख 92 हजार  से ज्यादा लोगों की जान गई है। अपने देश की बात करें तो यहां हर साल लू से औसतन 31 हजार 748 मौतें हुई हैं। लू से दुनिया भर में और भारत में मरने वाले लोगों के आंकड़ों की तुलना करें तो लू के कारण विश्व में होने वाली कुल मौतों में से हर 5वीं मौत भारत में हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इंसानी शरीर इस तरह से बना है कि वह एक हद तक ही गर्मी और सर्दी को झेल सकता है। अगर गर्मी के दिनों में पारा 42 डिग्री सेल्सियस से ऊपर है और लू चल रही हैं तो हम सभी को सावधानी बरतते हुए घर के अंदर ही रहना चाहिए। दरअसल गर्म हवाओं और सूरज की तीखी किरणों के कारण शरीर का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है और खून के गर्म होने पर पहले सांस लेने में दिक्कत आती है और फिर ब्लड प्रेशर कम होने लगता है । इसके बाद धीरे-धीरे शरीर के अंग काम करना बंद कर देते  हैं और कुछ देर में प्रभावित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है इसीलिए लू के दौरान घर के बाहर के सारे काम सुबह 10 बजे से पहले या शाम को 6 बजे के बाद करने की सलाह दी जाती है। सरकार द्वारा लू को प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में शामिल करने से प्रभावित परिवारों की मुश्किलें अवश्य ही कम होंगी और खासतौर पर उन परिवारों को लाभ होगा जिनके परिवार के कमाऊ सदस्य की लू के कारण मृत्यु हो जाती है। हालांकि सबसे अच्छा तरीका तो यही है कि लू से बचा जाए और तमाम सावधानियां बरती जाएं। वैसे, गुस्से में आपा खो देने वाले लोगों को भी ‘दो मिनट में लू उतार देंगे’ जैसे मुहावरे का इस्तेमाल करते समय सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि यदि सामने वाला भारी पड़ गया तो आपकी लू उतरते देर नहीं लगेगी। वक्त का तकाज़ा यही है कि लू से भी बचे और लू उतारने से भी…।

मीठा राजमार्ग…जहां बन रहे है मदहोश करने वाले फूल !!

मीठा राजमार्ग, पढ़कर अचंभा सा लगता है न क्योंकि अब तक मीठी गली, ठंडी सड़क जैसे नाम तो अमूमन सुनने को मिलते रहे हैं लेकिन ‘मीठा राजमार्ग’ कुछ अलग है। तो, आइए चलते हैं प्रदेश के एक ऐसे मीठे राजमार्ग के सफ़र पर, जहां यदि आप कुछ देर ठहर गए तो यहां बन रहे फूल की खुशबू से शर्तिया मदहोश होकर ही आगे बढ़ पाएंगे। 

तो यह है मप्र का राजमार्ग क्रमांक 45 । इन दिनों, जैसे ही आप भोपाल से बरेली होते हुए नरसिंहपुर जिले की ओर बढ़ते हैं तो आप को एक मीठी, मादक सी और जानी पहचानी सी खुशबू अपनी ओर खींचने लगती है। जैसे जैसे आप नरसिंहपुर के क़रीब पहुंचने लगते हैं राजमार्ग पर मिठास और बढ़ जाती है तथा आपको रुककर इसे महसूस करने के लिए खींचती है। यदि रुक गए तो तय है कि जुबान पर फूल की मिठास लिए बिना आगे नहीं बढ़ सकते और नहीं रुके तब भी दिल ओ दिमाग पर छा गई इस मीठी सी मदहोश कर देने वाली खुशबू से पीछा नहीं छुड़ा सकते।

 राजमार्ग क्रमांक 45 पर हर साल इन दिनों में यह मिठास और मदहोशी छाई रहती है और अब तो यह मीठापन यहां के लोगों के स्वभाव और तासीर का हिस्सा बन गया है। तभी तो ओशो यानि आचार्य रजनीश की वाणी और आज के दौर के नामी अभिनेता आशुतोष राणा की आवाज़ में तमाम मंत्र और स्त्रोत कानों में मिश्री सी घोल देते हैं।  

खास बात यह है कि साल दर साल इस राजमार्ग पर मिठास का कारोबार फैलता जा रहा है। दरअसल, यह मिठास गन्ने से बन रहे गुड़ की है। मोटे तौर पर बरेली से जबलपुर तक और खासतौर पर नरसिंहपुर जिला गन्ने की खेती के लिए प्रदेश भर में मशहूर है। यहां के गुड़ का तो यह हाल है कि नरसिंहपुर की करेली तहसील का गुड़ ‘करेली के गुड़’ के नाम से प्रदेश तो क्या देश में भी हाथों हाथ लिया जाता है। 

इन दिनों इस राजमार्ग के दोनों ओर गुड़ बनाने का काम चरम पर है और मद्धम आंच पर पकते गन्ने के रस की खुशबू इस सड़क को मीठा राजमार्ग बना रही है । थोड़ी-थोड़ी दूरी पर भट्ठियों में उबलता गन्ने का रस, कढ़ाईयों में ऊपर तैरता फूल और फिर गरमागरम खोए जैसे गुड़ से अलग अलग मात्रा और आकार प्रकार में बनती परिया। 

गुड़ को एक रेडीमेड उत्पाद समझने वाले दोस्तों को फूल और परिया जैसे शब्द अबूझ लग सकते हैं लेकिन छोता, नोरपा, जरी और मरी सुनकर और यह जानकर कि इनमें नाम के विपरीत मरी सबसे कीमती है,वे चकरा भी सकते हैं। वैसे, नोरपा पहले साल की गन्ने की फसल को कहते हैं, जरी दूसरे साल और मरी तीसरे साल की फसल है। छोता रस निकलने के बाद गन्ने के सूखे छिलके हैं और फूल रस और गुड़ के बीच की अवस्था जो सबसे स्वादिष्ट होती है।  

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक नरसिंहपुर ज़िले में करीब 65 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन पर गन्ने की खेती हो रही है।  ज़िले में अब बड़ी मात्रा में जैविक पद्धति से गन्ना उगाने और जैविक गुड़ बनाने का काम भी होने लगा है। एक अनुमान के मुताबिक यहां मौजूद कई शुगर मिल के बाद भी  3000 से ज्यादा स्थानों पर गुड़ बनता है। 

 नरसिंहपुर में गन्ने की फसल के इतिहास की बात करें तो पुराने संदर्भों से पता चलता है कि 1822 में विलियम हेनरी स्लीमन नामक गोरे अधिकारी ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से एक्साइज ऑफिसर बनकर यहां तैनात हुए और उन्होंने गन्ना की फसल लगाने का श्रीगणेश किया। पहले यहां से मजदूरों को विदेश ले जाकर गन्ने की खेती कराते थे लेकिन, फिर अंग्रेजों ने सोचा कि मजदूरों को वहां न ले जाकर यहीं अच्छी गुणवत्ता का गन्ना लाकर खेती की जाए और फिर उससे बने उत्पाद वहां ले जाएं। 

इस तरह, गन्ने का जादू यहां के लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा और अब तो गन्ना और गुड़ यहां की पहचान बन गए हैं। आंकड़ों पर नज़र दौड़ाएं तो यहां क़रीब 800 करोड़ रुपए का गुड़ उत्पादन एवं लगभग 650 करोड़ का चीनी और खांडसारी का उत्पादन हो रहा है। 

 दरअसल, इस क्षेत्र का गुड़ अपनी गुणवत्ता के लिए खासतौर पर जाना जाता है। यहां का गुड़ बहुत मीठा रहता है। अब तो अदरक और इलायची जैसे तमाम फ्लेवर के साथ जोड़ी बनाकर यह और भी स्वादिष्ट होता जा रहा है।   लैपटॉप और ईयर बड्स वाली नई हाईटेक पीढ़ी की जानकारी के लिए बताते चले कि गुड़ बनाने के लिए गन्ने का पहले रस निकाला जाता है।

 हां, बिल्कुल वही रस जो बाजार में हम अदरक,पुदीना,धनिया और नींबू के साथ मिलाकर पीते हैं। इस रस को फिर कढ़ाई में ओटाते हैं बिल्कुल दूध से खोया बनाने जैसे। कई घंटे तक उबलने के बाद यह गाढ़ा होकर गुड़ बन जाता है और सांचों में ढल कर अलग अलग आकार प्रकार ले लेता है। हालांकि, समय के साथ लाभ कमाने की चाह बढ़ती जा रही है और एक कड़ाही में पकाकर बनने वाला शुद्ध, सेहतमंद और स्वादिष्ट देशी गुड़ अब मिलावट के कारण संख्या में तो बढ़ रहा है लेकिन गुणवत्ता लगातार घट रही है। 

गन्ने की एक ओर विशेषता यह है कि इसका कोई भी हिस्सा बेकार नहीं जाता। यहां तक कि रस निकालने के बाद बचा अवशेष छोता भी  ईधन के रूप में काम आ जाता है।  

…तो इस गन्ना कथा का वास्तविक आनंद उठाने के लिए निकलिए मीठे राजमार्ग पर और मदहोशी तक डूबकर आइए मीठी खुशबू,नींबू वाले गन्ने के रस ,स्वादिष्ट फूल ,गरम गुड़ में और सहेज लाइए सालभर का कोटा क्योंकि यह मौका फिर अगले साल ही मिल पाएगा।

कब तक हमसे बचोगे धुस्का..!!

इतनी शिद्दत से यदि भगवान को भी याद किया होता तो शायद वे भी पसीज जाते लेकिन ‘धुस्का’ को मुझ पर कोई दया नहीं आई। 

धुस्का की तलाश में हमने रांची के वे सभी इलाके छान मारे, जहां आमतौर पर धुस्का की मौजूदगी पाई जाती है लेकिन तलाश पूरी नहीं हो पाई। धुस्का और इसकी उपलब्धता के इलाकों के जानकार साथियों की सहायता भी ली लेकिन उनमें से अधिकतर ने हाथ खड़े कर दिए। यहां तक कि वापिसी में एयरपोर्ट के रास्ते में हमने सभी संभावित ठिकानों पर छापेमारी की लेकिन जैसे ईडी, सीबीआई या पुलिस के डर से अपराधी छिप जाते हैं,इसी तरह धुस्का भी जैसे गायब हो गया था। 

आखिर,हमने ही हार मान ली और दिल पक्का कर अगली बार धुस्का के लिए ही झारखंड की यात्रा करने की प्रतिज्ञा के साथ वापसी की उड़ान पकड़ ली।  झारखंड-बिहार से बाहर के मित्रों के लिए धुस्का कुछ उसी तरह की अबूझ पहेली है जैसे महानगरों के लोगों और शायद नई पीढ़ी के लिए टपका। 

धुस्का और टपका वैसे तो अलग अलग विषय हैं और इनमें कोई समानता भी नहीं है।  लेकिन,हमने फिर भी एक समानता तलाश ही नहीं…पानी। टपका आमतौर पर बारिश में पैदा होता है और घर के कोने कोने में प्रकट होकर रहवासियों का जीना दूभर कर देता है। नई पीढ़ी की जानकारी के लिए टपका घर की छत से टपकते पानी को कहते हैं। पक्की छत पर तो वाटर प्रूफिंग जैसे उपायों से इसे रोक सकते हैं लेकिन कच्चे घरों में यह नींद हराम कर देता है। वहीं,धुस्का मुंह में पानी ला देता है और न मिल पाए तो मन में बैचेनी।  

खैर, ज्यादा पहेलियां न बुझाते हुए साफ कर दूं कि ‘धुस्का’ दरअसल झारखंड का एक पारंपरिक व्यंजन है जिसे सामान्य रूप से नाश्ते में खाया जाता है। शहरी अंदाज में इसे देशी स्नैक्स कह सकते हैं। आंचलिक बोलियों में इसे ढुस्का, दुष्का, दुस्का और ढूस्का जैसे तमाम नामों से जाना जाता है। बोलचाल की भाषा में और गैर झारखंडी लोगों के समझने और बनाने के तरीके के कारण हम इसे मालपुआ का गरीब भाई कह सकते और इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री के लिहाज़ से यह इडली डोसा खानदान का लगता है। यह चावल की बहुतायत वाले क्षेत्रों के अनुरूप व्यंजन है लेकिन स्वाद और ऊर्जा से भरपूर।    

धुस्का, सामान्यतः चावल,चने और उड़द की दाल को निर्धारित मात्रा में मिलाकर बनाया जाता है। थोड़ी बहुत कोशिश के बाद गूगल गुरु इसको बनाने की चुनिंदा विधियां भी पेश कर देते हैं।धुस्का बनाने के लिए चावल और दालों को रात भर पानी में फुलाने के बाद इन्हें मिक्सी में पीस लेते हैं। फिर अदरक, मिर्ची और मनचाहे मसालों के साथ थोड़ा सा ईनो मिला कर धुस्का बनाने का पहला चरण पूरा हो जाता है। फिर इस बेसन के पकौड़े जैसे घोल/बैटर को बड़े चम्मच से तेल में डालकर सुनहरा होने तक तलते हैं। 

धुस्का को आमतौर पर आलू या छोले की सब्जी के साथ खाया जाता है।  धुस्का से हमारी मुलाकात भलेहि इस दफे टल गई लेकिन उसने एक फ़िक्र भी बढ़ा दी। 


दरअसल, चिंता की बात यह है कि, झारखंड क्या सभी राज्यों से उनके मूल या पारंपरिक व्यंजन लुफ्त होते जा रहे हैं और उनका स्थान मोमो, पिज्जा, बर्गर, चाउमीन जैसे व्यंजन तेजी से ले रहे हैं। झारखंड में भी अब सार्वजनिक आयोजनों, शादी विवाह और अन्य पार्टियों में चाइनीज तो दिखता है लेकिन धुस्का गायब होता जा रहा है। अभी लिट्टी चोखा जरूर बिहार के साथ साथ यहां भी अपनी बादशाहत बनाए हुए है लेकिन यही हाल रहा तो लिट्टी भी धुस्का, छिलका रोटी या माडूआ रोटी की तरह स्थानीय खानपान का हिस्सा नहीं रह जाएगी।

यह ठेठ मालवी अंदाज़ बनाए रखिए मुख्यमंत्री जी!!

आमतौर पर राजनीतिक पत्रकार वार्ताएं नीरस होती हैं क्योंकि नेता या तो पत्रकार वार्ता के पहले ही सब बता चुके होते हैं या फिर कुछ बताना नहीं चाहते। ऐसे में यदि पत्रकार वार्ता निवेश और आर्थिक विषय पर हो तो उसके और भी बोझिल होने के खतरे रहते हैं क्योंकि हजारों लाखों करोड़ रुपए के आंकड़े और उनका घिसा पिटा सा प्रस्तुतीकरण खबर के केंद्र होता है जो रुचिकर तो नहीं हो सकता । इसलिए जब यूनाइटेड किंगडम (यूके) और जर्मनी की यात्रा से लौटने के बाद मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की पत्रकार वार्ता की सूचना मिली तो यही उम्मीद थी कि रोज छप रहे निवेश प्रस्तावों और आंकड़ों के अलावा कुछ नहीं होगा। वैसे भी पत्रकार वार्ता का विषय भी इन देशों की यात्रा से जुटाए गए निवेश की जानकारी देना था इसलिए बिना कोई उम्मीदें पाले अपन भी मुख्यमंत्री निवास पहुंच गए।

 मुख्यमंत्री निवास का सभागार ठसाठस भरा था। दर्जनों कैमरे मशीनगन की तर्ज पर सीधे उस स्थान पर निशाना साधे थे जहां मुख्यमंत्री को बैठना था। वहीं, रिवॉल्वर और बंदूकों जैसे छोटे मोटे हथियारों की तरह यूट्यूबर्स और पोर्टल वीरों के कैमरे सभागार में यत्र तत्र सर्वत्र बिखरे पड़े थे। बेचारे स्टिल कैमरे वाले अपने लिए ढंग की फोटो लेने लायक जगह जुगाड़ रहे थे। मुख्यमंत्री के हवाई अड्डे से यहां तक आने में कुछ देर हुई तो मीडिया के साथियों के लिए चाय और स्वल्पाहार के द्वार खोल दिए गए परंतु आलम यह था कि अग्रिम पंक्ति की कुर्सियां छिन जाने के डर से हम जैसे कई साथियों ने खानपान का बलिदान दे दिया और जो यह मोह नहीं छोड़ पाए उन्हें पहली से आखिरी पंक्ति में बैठना पड़ गया।

खैर, अपने चिरपरिचित अंदाज़ में मुस्कराते हुए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव हम से रूबरू हुए। कुछ देर की औपचारिक जानकारी के बाद वे अपने रंग में आ गए और ठेठ मालवी अंदाज़ में उन्होंने अपने अनुभव बांटने शुरू किए। फिर क्या था बोरिंग सी पत्रकार वार्ता में आंकड़ों के साथ हंसी और ठहाकों के रंग घुल गए। मुख्यमंत्री ने अपने निजी अनुभव से कई दिलचस्प बातें साझा की मसलन कारों की स्पीड पर उन्होंने ठेठ मालवी अंदाज़ में कहा कि कार में दो ढाई सौ की स्पीड में ऐसा लग रहा था जैसे हवा में उड़ रहे हैं और डर भी लग रहा था कि कहीं उड़ा ही न दे। एक और किस्सा बताते हुए उन्होंने कहा कि विदेशी राजनयिकों से चर्चा के दौरान जब वहां की एक महिला अधिकारी ने भारत और मध्य प्रदेश की तारीफ में कसीदे पढ़ने शुरू किए तो हमने ही इशारे से रोक दिया क्योंकि बहनजी नौकरी तो वहीं की कर रही थीं और भारत प्रेम कहीं उनकी नौकरी न ले बैठे।

जैसे जैसे बात आगे बढ़ी मुख्यमंत्री का अंदाज बिल्कुल परिवार के मुखिया या उस वरिष्ठ सदस्य की तरह होता गया जो कौतूहल के साथ अपने परिजनों को यात्रा के किस्से सुनाता है। डॉ यादव भी किस्सागो बन गए फिर चाहे वह डायनासोर को कीचड़ में फंसा कर शिकार करने की बात हो या दुनिया के इस विशालतम प्राणी को कैंसर होने की, ब्रिटेन की संसद के भीतर चर्च खोजकर उनकी धर्मनिरपेक्षता पर कटाक्ष हो या वहां राज्यसभा में मिलने वाली जीवनभर की सदस्यता…मुख्यमंत्री ने खूब चुटकियां ली। उन्होंने कहा कि वहां आप एक बार सदस्य बने तो बस फिर फोटो टंगने तक बने रहते हैं और हमारे यहां छह साल भी लोगों को भारी लगने लगते हैं। स्वामीनारायण मंदिर के निर्माण की कहानी सुना कर न केवल उन्होंने बातों ही बातों में भारतीय मंदिर निर्माण की उच्च शैली,स्थापत्य कला और एकजुटता की महत्ता साबित कर दी। 

वहीं, ब्रिटेन में डॉ भीमराव आंबेडकर के पंचतीर्थ की स्थापना के प्रति गोरों की शुरुआती प्रतिक्रिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों का उल्लेख करते हुए उन्होंने यह समझाने की कोशिश। की कि यदि सरकार मजबूत और दृढ़ इच्छा शक्ति वाली हो तो किसी भी बाधा को दूर किया जा सकता है। निवेश के आंकड़ों पर कुरेद रहे एक साथी को उन्होंने यह कहकर लाजवाब कर दिया कि 78 हजार करोड़ रुपए के निवेश प्रस्तावों का उल्लेख करने बैठूंगा तो बहुत समय लग जाएगा इसलिए आज नकारात्मकता छोड़िए,आंकड़े आप तक पहुंच जाएंगे।

कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि यदि आप पद की गरिमा के साथ अपनी सहजता,सरलता,जड़ों से जुड़ाव और अपनेपन को कायम रखते हैं तो नीरस विषय पर भी सकारात्मक और उल्लासपूर्ण बातचीत हो सकती है। यह सहजता आजकल कम देखने को मिलती है क्योंकि जैसे ही व्यक्ति उच्च पद पर पहुंचता है,वह अपनी जड़ों से दूर होने लगता है और सहज हास्य उसे अपने कद के प्रतिकूल लगने लगता है। लेकिन, डॉ मोहन यादव ने उच्च पद के बाद भी अपने मूल स्वभाव,सहजता,सरलता और खांटी मालवी शैली को नहीं छोड़ा है…अपने इस अंदाज़ को,सरलता को और ठेठ देसीपन को बनाए रखिए मुख्यमंत्री जी।


रविवार, 20 अक्टूबर 2024

मैंने नहीं कहा रेस्ट इन पीस..!!

मैंने नहीं कहा RIP या भगवान तुम्हारी आत्मा को शांति दे या न ही मैंने दी विनम्र श्रद्धांजलि..क्यों दे, श्रद्धांजलि या क्यों करें तुम्हारी आत्मा की शांति की प्रार्थना…तुमने ऐसा कौन सा तीर मार दिया जो शांति की कामना करें। अरे, कोई ऐसे अपने परिवार को बीच मँझधार में छोड़कर जाता है क्या? 

मासूम से प्रांजल का दिल कब तुम्हारी सेवा करते करते कड़ा हो गया,तुम्हें तो ढंग से पता भी नहीं है...भाभी महीनों से कैसे तुमसे अपने आंसू छिपाकर तुम्हें हौंसला देती थी और तुमने एक बार में ही उनके विश्वास को, उनकी तपस्या को तार तार कर दिया। बिटिया प्रियम तो अब तक ठीक से समझ भी नहीं पाई कि तुमने उसके सर से अपने स्नेह की छाया दूर कर दी है । वह आज भी तुम्हारे सभी दोस्तों से वैसे ही आगे बढ़कर मिल रही थी जैसे तुम्हारे सामने मिलती थी।

जब तुम एंबुलेंस में अपने पैतृक निवास ललितपुर की यात्रा के लिए लेटे थे और भाभी का करुण क्रंदन बाहर तक द्रवित कर रहा था लेकिन तुम मजबूत कलेजा किए लेटे रहे!! उस चीत्कार पर तुम्हें उठ बैठना था,दिलासा देना था भाभी को,प्रांजल को..लेकिन तुम अपनी ही दुनिया में मगन थे तो हम क्यों तुम्हारी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें।

तुम्हें, अशांत ही रहना होगा मित्र…ताकि आसपास रहकर प्रांजल के सपने पूरे होते देखो,प्रियम का सहारा बने रहो और भाभी का हौंसला बढ़ाते हुए उनकी ढाल बने रहो..यूं, साथ छोड़ना जब हम मित्रों को गवारा नहीं है तो फिर परिवार को कैसे मंजूर होगा।

तुम्हें, अभी यहीं रहना है और जब तक परिवार सम्भल नहीं जाता,आत्मनिर्भर नहीं हो जाता और तुम्हारे बिना जीने की आदत नहीं डाल लेता तब तक तुम्हें उनके आसपास ही रहना होगा भले ही किसी भी रूप में रहो…तब तक हम भी नहीं कहेंगे विनम्र श्रद्धांजलि या रेस्ट इन पीस!!

तुम बहुत याद आओगे दोस्त… जितेंद्र


उन लोगों के लिए जिन्हें जानकारी नहीं है:

वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र मोहन रिछारिया का आज 55 साल की आयु में निधन हो गया। नईदुनिया जबलपुर के संपादक पद पर रहने के दौरान उन्हें ब्रेन ट्यूमर का पता चला और फिर निरंतर उपचार के कारण उन्होंने सक्रिय पत्रकारिता से अवकाश ले लिया था।

एक अप्रैल 1969 को जन्मे जितेंद्र मोहन रिछारिया ललितपुर के मूल निवासी थे। उनका अंतिम् संस्कार कल उनके पैतृक निवास ललितपुर में ही होगा। उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी है। 

उन्होंने भोपाल के माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पहले बैच में स्नातक और फिर स्नातकोत्तर की पढ़ाई की थी। उन्होंने भोपाल के दैनिक नईदुनिया, दैनिक जागरण, सहारा टीवी, पीपुल्स समाचार, पत्रिका और नईदुनिया इंदौर सहित विभिन्न समाचार पत्रों में तीन दशक से ज्यादा समय तक अपनी सेवाएं दी।

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

रावण के बहाने समाज की बात…!!

समाज में एक बार फिर रावण ‘आकार’ लेने लगा है। हर साल इन्हीं दिनों में देश के तमाम शहरों में रावण जन्म लेने लगता है और धीरे-धीरे उसका आकार विशाल और रूप भयंकर होता जाता है। आमतौर पर मानव जीवन में बच्चों के जन्म में 9 महीने का समय लगता है लेकिन रावण तो रावण है इसलिए वह 9 महीने का सफर महज 9 दिन में पूरा कर लेता है। वैसे भी बुरी प्रवृत्तियों के विस्तार में समय कहां लगता है। अच्छाइयों को जरूर आदत बनने में कई कसौटियों से गुजरना पड़ता है।  

फिलहाल, रावण का धड़ बन गया है। इसमें अहम तथ्य यह है कि जन्म के साथ ही रावण फूलना शुरू कर देता है। यह फुलाव घमंड का हो सकता है,असीमित शक्ति का और शायद संपन्नता का भी। जैसे-जैसे रावण दहन का समय नजदीक आता जाएगा रावण का शरीर और सिर घमंड से बढ़ते जाएंगे। एक सिर वाला रावण दस सिर का हो जाएगा।…और फिर जैसा कि कहावतों/मुहावरों में कहा जाता है कि ‘पाप का घड़ा भर गया है’,’बुराई का अंत निकट है’ या फिर ‘बुराई का अंत अच्छाई से होता है,’ वाले अंदाज में तमाम बड़े आकार प्रकार के बाद भी रावण को अंततः जलना पड़ता है।  

 वैसे, इन दिनों समाज में समय के साथ-साथ रावण का कद और संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। कभी 20-21 फीट का रावण आज 100 फीट को भी पार कर गया है । इसके बाद भी न तो रावण जलाने वालों की भूख शांत हुई है और न ही रावण का घमंड कम हुआ है इसलिए मृत्यु के बाद भी रावण हर नए साल में नए रंग-रूप और आकार-प्रकार के साथ फिर जन्म ले लेता है । 

समय के साथ रावणों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। पहले किसी शहर में एक या दो जगह ही रावण दहन होता था लेकिन अब रावण जलाने वाले भी बढ़ गए हैं और रावण भी। महानगरों क्या, अब तो छोटे छोटे शहरों में भी हर गली-मोहल्ले में रावण अपने बंधु-बांधवों के साथ बच्चों के खेलने के मैदान पर कई दिन पहले से कब्ज़ा करने लगा है। 

उधर, बच्चे भी दशहरे की छुट्टियों के बाद भी मैदान में दिखने की बजाए मोबाइल में तोप तमंचे चलाने वाले खेलों में आंखें गड़ाए रहते हैं। इससे बच्चे भी खुश हैं,उनके अभिभावक भी और रावण भी फूल कर कुप्पा है।   रावण का अंत भले ही देशभर में एक साथ एक जैसा होता है लेकिन अपने जन्म से लेकर जलने तक के नौ दिनों के दौरान वह मीडिया की सुर्खियां जरूर बटोरता रहता है। कभी शहर के किसी खास क्षेत्र को ही रावण गली कहा जाता था क्योंकि रावण के सबसे ज्यादा पुतले वही बनते थे लेकिन समय के साथ रावण के जन्म स्थान का भी जमकर विस्तार हुआ है। 

अब शहर के कई इलाकों में छोटे बड़े आकार के सैंकड़ों रावण नजर आने लगे हैं।   एक बार रावण कुनबे का आकार प्रकार तय हो जाने के बाद उनके जन्मदाता उनके अंदर आतिशबाजी लगाने का काम करते हैं क्योंकि रावण के जलने में असल मजा तो बम पटाखों का ही है। जब वह अपनी भयंकर कानफोडू आवाज और आंखों को चुंधिया देने वाली रोशनी यहां वहां बिखेरता है तो दर्शक उल्लासित होकर तालियां बजाने लगते हैं। एक तरह से इस आतिशबाजी, बम की आवाज और रंग-बिरंगी रोशनी के जरिए रावण अपनी ताकत का अहसास कराता है।

   आम लोग भी वहीं सबसे ज्यादा जुटते हैं जहां का रावण सबसे ज्यादा धूम धड़ाका करता है। यह दिखावा आम जिंदगी का फलसफा भी बनता जा रहा है मतलब जो जितना ज्यादा दिखावा कर सकता है उसकी उतनी ही ज्यादा पूछ होती है। फिर भले ही वह बुराइयों का पुतला ही क्यों न हो। शायद, यही वजह है कि इन दिनों किसी अपराध में पकड़े जाने पर भी नामी लोग शर्म से चेहरा छुपाने की बजाय ‘विक्ट्री साइन’ बनाते हुए जेल जाते हैं और मात्र जमानत मिलने पर उसके समर्थक ऐसा जलसा करते हैं जैसे वह जेल से नहीं बल्कि सरहद पर दुश्मन को धूल चटाकर लौट रहे हैं।  

 समाज में बढ़ती दिखावे की यह प्रवृत्ति उच्च वर्ग से मध्यम वर्ग तक बिल्कुल वैसे ही यत्र-तत्र-सर्वत्र फैलती जा रही है जैसे दशहरे पर रावण के पुतलों की संख्या। शायद समाज को अब अपने बीच बुरी प्रवृत्ति वाले लोगों की मौजूदगी खटकती नहीं है। यदि ऐसा होता तो हर चुनाव में दागी प्रत्याशियों की संख्या नहीं बढ़ती? बुराइयों के प्रति हमारी सहनशीलता इस हद तक बढ़ गई है कि नवरात्रि के दौरान हम कन्या को देवी मानकर पूजते हैं और बिना किसी तीखे विरोध के उनके साथ बलात्कार जैसी घिनौनी घटनाओं के साक्षी भी बनते हैं। 

  यदि हमें बेहतर समाज का निर्माण करना है तो बुराइयों को विस्तार देने की बजाय इस प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। इसकी शुरुआत प्रतीकात्मक ही सही, रावण के पुतलों से की जा सकती है क्योंकि दशानन को हम जितना मजबूत और लोकप्रिय बनाकर समाज में उसकी स्वीकार्यता बढ़ाते जाएंगे उससे जुड़ी बुराइयां भी समाज में उतनी ही गहराई से जड़ जमाती जाएंगी।


 *(लेखक आकाशवाणी भोपाल में समाचार संपादक हैं और ‘चार देश चालीस कहानियां’ एवं ‘अयोध्या 22 जनवरी’ जैसी लोकप्रिय किताब लिख चुके हैं।)

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