रविवार, 27 अप्रैल 2025

बिटिया की कविता मम्मी पापा के नाम..!!

अब इसे मम्मी-पापा से एक हजार किमी से ज्यादा की दूरी कहें या फिर पत्रकार पिता और लेखक मां के संस्कार का असर...बिटिया,पहले ब्लॉगर बनी और अब उसने लिखी पहली कविता (काव्य अभिव्यक्ति  या आधुनिक कविता कहना ज्यादा उचित है)...हो सकता है कविता की कसौटी पर यह कच्ची हो लेकिन भावनाओं के लिहाज से पूरी पक्की है । कविता के शब्द जहां आत्मविश्वास का अहसास कराते हैं, वहीं दिल से आंखों की दूरी को पलभर में पाट देते हैं। हम इसे "बिटिया की कविता मम्मी-पापा के नाम" जैसा अच्छा सा शीर्षक भी दे सकते हैं...पढ़िए, तकनीकी से ज्यादा भाव से,शब्द नहीं मनोभाव से और  कुल मिलाकर ♥️ से।

'अब मैं जीना सीख गई हूं'

मम्मी-पापा,

आपकी ये नन्हीं सी जान

अब सचमुच बड़ी हो गई है।

अब जिंदगी जीना

 सीख गई हूं मैं।


 दुनिया न

 बहुत बुरी है..!

 बचपन से

 यही बताते थे न...?

सच कहते हो आप

 ये दुनिया

 सच में बहुत बुरी है,

 पर मैंने भी न,

 दुनिया से डील करना

 सीख ही लिया है।


 अब न ,अँधेरे से

 डर नहीं लगता

 रात को अचानक

 नींद खुलने पर अब

 सहम नहीं

 जाती हूं मैं।

 मैं सीख गई हूं,

 हर वो तौर-तरीका

 जो आप सिखाते थे 

 

पर,पता है क्या आपको...?

शहर चाहे कितना भी बड़ा 

या छोटा क्यों ना हो....!

अपने घर आंगन की खुशबू 

नहीं मिलती उसमें🥺


अपने पसंद की चीज़

खुद से खरीद लेती हूं मैं...

पर पापा का लाड़

नहीं मिलता इसमें।


 माँ, अब तो खाना बनाना 

भी आ गया

पर आपके हाथ का प्यार

नहीं होता इसमें।


 नाम-रुतबा 

 सब बनाने के पीछे

 निकल गयी हूँ मै

 पर बचपन जैसा

 आप दोनों का हाथ

 थाम के चलने का

 वो सुकून🥰

 नहीं मिलता ।।

(बिटिया आद्या द्वारा शिमला में ताज होटल में ड्यूटी के बाद व्यक्त एक शाम के भाव)


बोझ से कराहते पहाड़ों को चाहिए राहत का मलहम !!

बढ़ती भीड़ से पहाड़ कराह रहे हैं और वाहनों की बेतहाशा संख्या उनका कलेजा छलनी कर रही है। फिर भी पर्यटक बेफिक्र हैं और पहाड़ों के पहरेदार यानि प्रशासन निश्चिंत । पहाड़ लगातार इशारा कर रहे हैं, खुलेआम संकेत दे रहे हैं और कई बार सीधी चेतावनी भी, फिर भी वीकेंड पर शिमला से लेकर मसूरी तक और मनाली से लेकर नैनीताल तक पर्यटकों और उनके वाहनों का जाम लगा है। एक घंटे का सफर 6 से 8 घंटों में हो रहा है। इसके बाद भी, पहाड़ों पर जाने वालों की संख्या घटने की बजाए लगातार बढ़ ही रही है।

यह स्थिति किसी एक पहाड़ी शहर या राज्य की नहीं है बल्कि देश के तमाम पर्वतीय राज्य लोगों और वाहनों की बेलगाम भीड़ से घायल हो रहे हैं। धूल, धुआं,कचरा,शोर और भीड़ का दबाव पहाड़ों का सीना घायल कर रहे हैं। वैसे, तो कमोवेश सभी पर्वतीय इलाकों का एक जैसा हाल है लेकिन शिमला जैसे शहर तो बर्बादी की कगार पर हैं। शिमला के हिमाचल प्रदेश की राजधानी और एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल होने के कारण, पिछले कुछ दशकों में वाहनों की संख्या में तेजी से वृद्धि देखी गई है। इससे न केवल पर्यावरणीय संतुलन पर असर पड़ रहा है, बल्कि पहाड़ों की भौगोलिक संरचना और पारिस्थितिकी पर भी दबाव बढ़ रहा है। 

शिमला हिमालय की दक्षिण-पश्चिमी श्रृंखलाओं में 2 हजार 206 मीटर अर्थात् 7 हजार 238 फीट की औसत ऊँचाई पर स्थित है। यह शहर सात पहाड़ियों पर बसा है और जाखू हिल यहां की सबसे ऊंची चोटी है। शिमला मूल रूप से ब्रिटिश काल में महज 25 हजार लोगों के लिए बनाया गया था, लेकिन आज यहाँ लगभग ढाई लाख लोग रहते हैं। इसके फलस्वरूप मानवीय उपस्थिति के साथ तमाम संसाधनों की मात्रा तेजी से बढ़ रही है।

शिमला जिले की आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार, करीब 8 लाख 14 हजार थी, और 2025 तक इसके 9 लाख के करीब होने का अनुमान है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में 2019 में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार शिमला शहर में रोजाना चलने वाले वाहनों की संख्या 2005 में 66 हजार 617 से बढ़कर 2019 तक 1 लाख 65 हजार से ज्यादा हो गई थी। यह वृद्धि लगभग 2.5 गुना है। यदि इस बढ़ोत्तरी के हिसाब से अनुमान लगाया जाए और स्थानीय लोगों की जानकारी पर भरोसा किया जाए तो इस साल तक शिमला शहर में पंजीकृत वाहनों की संख्या करीब एक लाख और पूरे जिले में पंजीकृत वाहनों की संख्या करीब ढाई लाख तक हो सकती है। नियमित तौर पर आने वाले पर्यटक वाहनों को मिलाकर यह आंकड़ा 3 लाख तक जा सकता है।

आंकड़ों के अनुसार शिमला जिले में सालाना करीब 2 करोड़ पर्यटक आते हैं और इनमें से कई अपने वाहन लेकर आते हैं। एक अन्य अनुमान के अनुसार पर्यटन सीजन के दौरान महज 10 दिनों में 55,000-60,000 वाहन शिमला आ जाते हैं तो साल भर में यह संख्या लाखों में हो सकती है। हालांकि, ये वाहन स्थायी रूप से पंजीकृत नहीं हैं, लेकिन सड़कों पर बोझ बढ़ाते हैं। 

हाल ही में अपनी शिमला यात्रा के दौरान मैंने खुद यह महसूस किया कि वाहनों के दबाव बढ़ने के कारणों में एक प्रमुख कारण शिमला का पहाड़ी क्षेत्र होना भी है इसलिए यहाँ की सड़कें तीखी चढ़ाई वाली हैं। शिमला की सड़कें, विशेष रूप से शहरी और उपनगरीय क्षेत्रों में, कई जगहों पर 15% से 30% तक की चढ़ाई हैं। कुछ खास सड़कें, जैसे कि मॉल रोड से जाखू मंदिर या अन्य ऊँचे इलाकों तक जाने वाली सड़कें, काफी खड़ी हैं। सड़कों के संदर्भ में, यह वाहनों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण है, खासकर भारी वाहनों या कम शक्तिशाली इंजन वाले वाहनों के लिए तो यह वाकई पहाड़ चढ़ना ही होता है।

इतना ही नहीं, शिमला जिला भूकंपीय जोन IV में आता है, जो उच्च जोखिम वाला क्षेत्र है। वाहनों की लगातार आवाजाही से होने वाले वाइब्रेशंस से पहाड़ों की पहले से कमजोर भूगर्भीय संरचना और अस्थिर हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क यातायात के कारण होने वाला कंपन भूस्खलन के खतरे को बढ़ाता है। 2023  में शिमला में हुए भूस्खलन जैसे मामले बताते हैं कि अत्यधिक वर्षा के साथ-साथ मानवीय गतिविधियाँ, जैसे सड़क निर्माण और यातायात इस खतरे को बढ़ा रहे हैं।

अध्ययनों से यह भी पता चला हैं कि वाहनों से निकलने वाला धुआँ और कार्बन उत्सर्जन हवा की गुणवत्ता को खराब कर रहा है। हिमाचल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, पर्यटन सीजन में शिमला में हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है। उत्सर्जन से निकलने वाली ब्लैक कार्बन बर्फ और ग्लेशियरों की सतह को काला कर देती है, जिससे सूरज की गर्मी अधिक अवशोषित होती है और बर्फ तेजी से पिघलती है। यह हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए खतरा है।

बढ़ते वाहनों को संभालने के लिए सड़कों का चौड़ीकरण और नई सड़कें बनाई जा रही हैं, जैसे शिमला-चंडीगढ़ एक्सप्रेसवे। इसके लिए पहाड़ों को काटा जा रहा है और जंगल साफ किए जा रहे हैं, जिससे मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है और पहाड़ कमजोर हो रहे हैं। भारी यातायात और सड़क निर्माण से प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था बाधित हो रही है। पानी पहाड़ों में रिसता है, जिससे उनकी स्थिरता कम होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अनियोजित निर्माण और ट्रैफिक इसका कारण है। 

हालांकि,पहाड़ों पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए सरकार ने सरकारी वाहनों को इलेक्ट्रिक करने की योजना बनाई है। इसी तरह शिमला में मल्टी-स्टोरी पार्किंग बनाई गई है। अब जरूरत इस बात की है कि इसे और इसकी तरह की अन्य पार्किंग के अधिकतम उपयोग को प्रोत्साहित किया जाए। बेहतर बस सेवाएँ भी निजी कारों का संख्या को कम कर सकती हैं। इसके अलावा, सरकार रिज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को नो-व्हीकल जोन बनाकर मुसीबत को कम कर सकती है।

कुल मिलाकर शिमला में वाहनों की बढ़ती संख्या और जनसंख्या को तत्काल रोकना जरूरी है अन्यथा पहाड़ों पर दबाव बढ़ता जाएगा । यह भूस्खलन, प्रदूषण, वन कटाई और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को और तीव्र कर रहा है। अगर इसे नियंत्रित न किया गया, तो शिमला की प्राकृतिक सुंदरता और स्थिरता खतरे में पड़ जाएगी ।  (यह आलेख राग दिल्ली में भी प्रकाशित हुआ है।)





गुरुवार, 24 अप्रैल 2025

‘अब मैं बोलूंगी’... एक पठनीय हकीकत!!

जब किसी पुस्तक के पहले ही पेज पर लिखा हो कि ‘पत्रकारिता में मिले सभी दोस्तों और दुश्मनों को प्यार के साथ समर्पित..’, तो हम उस किताब के तेवरों का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं और जब किताब डायरी की शक्ल में हो और डायरी भी किसी खाँटी पत्रकार की हो तो सोने पर सुहागा ही समझो।

  ‘खत का मजमून भांप लेते हैं लिफाफा देख कर’..मार्का शैली में हमने यह तो समझ ही लिया था कि जानी मानी पत्रकार स्मृति आदित्य ने यदि अपनी डायरी को ‘अब मैं बोलूंगी’ शीर्षक के साथ सार्वजनिक कर दिया है तो जाहिर है कई लोगों की, उनकी डायरी में शामिल किरदारों की और दोस्तों-दुश्मनों की खैर नहीं।   

 होना तो यही चाहिए था, लेकिन सुसंकृत,संस्कारी और सुलझे हुए व्यक्तित्व के कारण स्मृति बखिया तो उधेड़ती हैं लेकिन संकेतों में। किसी का नाम लेकर उसकी भद नहीं पीटती बल्कि इशारों में अंदर तक भेद देती हैं। अब जो किरदार हैं वे तो पन्ना-दर-पन्ना समझ जाते हैं कि स्मृति की बेधड़क डायरी क्या कह रही है और यही इस किताब ‘अब मैं बोलूंगी’ की सबसे अच्छी बात है कि यह पूरे सम्मान के साथ कलई खोलती है।   

यह पुस्तक पत्रकारिता ही नहीं, तमाम पेशों के उन सभी लोगों की किताब है जो पूरी मेहनत, लगन, समर्पण और संजीदगी के साथ अपना काम करते हैं लेकिन जब श्रेय मिलने की बारी आती है तो कोई ‘कथित सीनियर’ अकेले ही पूरी वाहवाही ले उड़ता है और आप मन मसोसकर फिर अगले लक्ष्य की तैयारी में जुट जाते हैं। 

मेरे साथ भी कई बार ऐसा हुआ है और ज्यादातर लोग इस कड़वे अनुभव का घूंट पी चुके होंगे।  …बस, हम सब यह दर्द पीकर रह जाते हैं लेकिन स्मृति आदित्य ने दर्द को पन्नों पर उकेर दिया है। यह पुस्तक गागर में सागर की तरह है जो हाथों में आते ही आपको बांध सा लेती है और एक बैठक में ही आप स्मृति के बोलने को बस सुनते जाते हैं।  

चाहे ‘अथ अवार्ड कथा’ हो या फिर पत्रकारिता की डिग्री उच्चतम अंकों के साथ हासिल करने के बाद भी वरिष्ठ साथियों का व्यवहार…संघर्ष हर पल साफ नज़र आता है। स्मृति खुद लिखती हैं कि- ‘मैं अपने संघर्ष नहीं गिना रही, मुझे पता है हर एक को इन शब्दों से गुजरना पड़ा होगा। उनकी अपनी कठिन कहानी है और होगी। मैं, पत्रकार होने की नाते सिर्फ इसलिए लिख रही हूं कि जब भी कहीं कोई अपने अधीनस्थ को जहर बुझे तीर छोड़े तब एक बार जरूर सोचे कि पता नहीं सामने वाला कब, कहां और कैसी स्थिति का सामना कर रहा है? उसके भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक तनाव क्या है? मानवीयता का यह धरातल आपके इंसान बने रहने में मददगार होगा।’  

ऐसा नहीं है कि स्मृति की यह डायरी केवल पक्षपाती या वरिष्ठों के दोगलेपन को ही उजागर करती है बल्कि इंसानियत को सलाम भी करती है और अच्छे एवं सच्चे लोगों की तस्वीर भी सामने लाती है। कुल मिलाकर ‘अब मैं बोलूंगी’ हमें अखबारी पन्नों, टीवी और पोर्टल के रुपहले पर्दे के पीछे की असलियत से अवगत कराती है, हमारी अपनी भाषा में हमारी कहानी सुनाती है और हमें तथा कथित वरिष्ठपने को आईना भी दिखाती है…एक पठनीय हकीकत।  

पुस्तक: अब मैं बोलूंगी 
लेखन: स्मृति आदित्य  
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन  
पृष्ठ: 78 मूल्य: 150 रुपए

रविवार, 20 अप्रैल 2025

रेल यात्रा: विरासत से विकास तक

भारतीय रेल की अब तक की यात्रा विरासत और विकास के संगम को दर्शाती है। 1853 में, जब पहली ट्रेन मुंबई से ठाणे तक दौड़ी, यह केवल एक यातायात साधन नहीं, बल्कि भारत में आधुनिकता की शुरुआत थी। उन भाप इंजनों की सीटी से लेकर आज की सेमी-हाई-स्पीड वंदे भारत एक्सप्रेस तक, भारतीय रेल ने 170 वर्षों में अभूतपूर्व प्रगति की है। यह न केवल शहरों और गांवों को जोड़ती है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक विविधता को भी एक सूत्र में पिरोती है। पुराने ज़माने की स्लीपर कोच की खिड़कियों से झांकती हवाएं हों या आधुनिक ट्रेनों की वातानुकूलित सुविधाएं, हर यात्री की कहानी भारतीय रेल के साथ जुड़ी है। आज, स्वदेशी तकनीक और डिजिटल नवाचारों के साथ, भारतीय रेल आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक बन चुकी है। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट्स, और अमृत स्टेशनों का स्मार्ट आधुनिकीकरण इसकी नई उड़ान को दर्शाते हैं। यह यात्रा केवल पटरियों पर नहीं, बल्कि भारत के सपनों और आकांक्षाओं के साथ आगे बढ़ रही है, जो विरासत को संजोते हुए विकास की नई ऊंचाइयों को छू रही है। मैने अपने इस रेल वृतांत को बंद होती मीटरगेज ट्रेन के सफर से लेकर आधुनिकतम वंदे भारत की यात्रा तक केंद्रित किया है।

विरासत को विश्राम

बराक वैली एक्सप्रेस के चालक ने जैसे ही हरी झंडी दिखाते हुए सिलचर रेलवे स्टेशन से अपनी ट्रेन आगे बढ़ाई, मानो वक्त ने मिनटों में ही लगभग दो सदी का फ़ासला तय कर लिया. हर कोई इस पल को अपनी धरोहर बनाने के लिए बेताब था. यात्रा के दौरान शायद बिना टिकट चलने वाले लोगों ने भी महज संग्रह के लिए टिकट ख़रीदे. सैकडों मोबाइल कैमरों और मीडिया के दर्जनों कैमरों ने 27 सितंबर 2014 में इस अंतिम रेल यात्रा को तस्वीरों में कैद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कोई ट्रेन के साथ,तो कोई स्टेशन पर अपनी ‘सेल्फी’ खींचने में व्यस्त था. वहीँ ट्रेन में सवार कुछ लोगों के लिए यह महज रेल यात्रा नहीं बल्कि स्वयं को इतिहास के पन्नों का हिस्सा बनाने की कवायद थी. 30 साल की सरकारी सेवा पूरी कर चुके बराक वैली एक्सप्रेस के चालक सुनीलम चक्रवर्ती के लिए भी इस मार्ग पर यह अंतिम रेल यात्रा ही थी. भावुक होकर उन्होंने कहा- “पता नहीं अब इस मार्ग पर जीते जी कभी ट्रेन चलाने का अवसर मिलता भी है या नहीं.”

दरअसल असम की बराक वैली या भौगोलिक रूप से दक्षिण असम के लोगों की डेढ़ सौ साल तक ‘लाइफ लाइन’ रही मीटर गेज ट्रेनों के पहिए अब थम गए है. रेल मंत्रालय मीटर गेज को ब्राडगेज में बदलने जा रहा है और इस काम को निर्बाध रूप से पूरा करने के लिए एक अक्तूबर से यहाँ रेल सेवाएं फिलहाल छह माह के लिए पूरी तरह से बंद कर दी गयी हैं. अभी तक पूर्वोत्तर रेलवे के लामडिंग जंक्शन तक ब्राडगेज रेल लाइन है लेकिन लामडिंग से सिलचर के बीच 201 किमी का सफ़र मीटर गेज से तय करना पड़ता था. वैसे लामडिंग से सिलचर के इस सफ़र को देश का सबसे रोमांचक और प्राकृतिक विविधता से भरपूर रेल यात्रा माना जाता है. इस सफ़र के दौरान यात्रियों को पहाड़ों की हैरतअंगेज खूबसूरती के साथ 586 पुलों और 37 सुरंगों से होते हुए 24 रेलवे स्टेशनों को पार करना पड़ता था. बताया जाता है कि तमाम तकनीकी विकास के बाद भी जिस रेल लाइन को मीटरगेज से ब्राडगेज में बदलने में अब तक़रीबन बीस साल का समय लग रहा है,वहीँ 19 वीं सदी में अंग्रेजों ने महज 15 साल में पहाड़ों को काटकर और कंदराओं को पाटकर इस रेल लाइन को अमली जामा पहना दिया था. यहाँ के इतिहास के जानकारों के मुताबिक 1882 में सर्वप्रथम जान बोयर्स नामक इंजीनियर ने सुरमा वैली (बराक वैली का विभाजन से पहले का नाम ) को ब्रह्मपुत्र वैली से जोड़ने की परिकल्पना की थी. फिर अगले पांच साल में परियोजना रिपोर्ट तैयार हुई और 1887 में तत्कालीन सलाहकार इंजीनियर गुइल्फोर्ड मोल्सवर्थ ने इस मीटर गेज रेल परियोजना को मंजूरी दे दी. फिर 1888 से यहाँ निर्माण कार्य शुरू हुआ और 1 दिसंबर 1903 से यहाँ रेल सफ़र शुरू हो गया.       

  अतीत से विकास के इस सफ़र में मीटर गेज और इस पर आज के गतिशील दौर में भी कछुआ चाल से चलने वाली ट्रेने अब संग्रहालय का हिस्सा बन जाएंगी क्योंकि पटरियों का आकर बदलने के साथ ही यहाँ सब-कुछ बदल जाएगा. सिलचर स्टेशन का विकास व विस्तार होगा और शायद स्थान भी बदलेगा.  धीमी और सुकून से चलने वाली ट्रेनों के स्थान पर राजधानी-शताब्दी जैसी चमक-दमक और गति वाली ट्रेने दौड़ती नजर आएगी. बराक वैली के साथ साथ  त्रिपुरा,मिज़ोरम तथा मणिपुर जैसे राज्य वर्षों से इस बदलाव की प्रतीक्षा कर रहे हैं लेकिन सदियों का रिश्ता एक पल में तो नहीं तोडा जा सकता इसलिए मीटर गेज को विदाई देने के लिए फूल मालाओं और ढोल-ढमाकों के साथ पूरा शहर मौजूद था. सभी दुखी थे और साथ में खुश भी क्योंकि इस विछोह में ही सुनहरे भविष्य के सपने छिपे हैं.

बदलाव से विकास

जनसैलाब शब्द भी असम के सिलचर रेलवे स्टेशन में उमड़ी भीड़ के लिए छोटा प्रतीत होता है. यदि इससे भी बड़ा कोई शब्द इस्तेमाल किया जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. चारों ओर बस सर ही सर नजर आ रहे थे. सभी ओर बस जनसमूह था- प्लेटफार्म पर,पटरियों पर, स्टेशन आने वाली सड़क पर. ऐसा लग रहा था जैसे आज शहर की सारी सड़कें एक ही दिशा में मोड़ दी गयी हों. बूढ़े, बच्चे, सजी-धजी महिलाएं और मोबाइल कैमरों से लैस नयी पीढ़ी, परिवार के परिवार. पूरा शहर उमड़ आया था वह भी बिना किसी दबाव या लालच के, अपने आप, स्व-प्रेरणा से, राजनीतिक दलों द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले वाहनों पर सवार होकर शहर घूमने आए लोगों की तरह तो बिल्कुल नहीं. मैंने तो आज तक अपने जीवन में कभी किसी रेल इंजन को देखने, उसे छूने, साथ में फोटो खिंचाने और उस पर चढ़ने की पुरजोर कसरत करते लोगों की इतनी भीड़ नहीं देखी.

दरअसल, जब इंतज़ार सारी हदें पार कर जाता है तो सब्र का बाँध भी टूटने लगता है और फिर उम्मीद की छोटी सी किरण भी उल्लास का कारण बन जाती है. कुछ ऐसा ही पूर्वोत्तर के दक्षिण असम के लोगों के साथ हुआ. बराक घाटी के नाम से विख्यात यह इलाका अब तक ‘लैंड लाक’ क्षेत्र माना जाता है अर्थात् जहाँ आना और फिर वहां से वापस लौटना एवरेस्ट शिखर पर चढ़ने जैसा दुष्कर होता है. बंगलादेश के साथ गलबैयां डाले यह क्षेत्र अपनी भाषा, संस्कृति, खान-पान के कारण पहले ही स्वयं को असम के ज्यादा निकट नहीं पाता और ऊपर से परिवहन सुविधाओं की कमी ने इसे और भी अलग-थलग कर दिया है. कुछ यही परेशानी बराक घाटी से सटे मिज़ोरम,मणिपुर और त्रिपुरा की थी लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं. दो दशकों से इस घनघोर पहाड़ी इलाक़े में छोटी लाइन पर कछुए की गति से रेंगती मीटरगेज को ब्राडगेज में बदलने का अरमान पूरा हो गया है. परिवर्तन की आहट लेकर मार्च 2015 में पहले खाली इंजन आया और अपनी गुर्राहट से लोगों को समय और गति के बदलाव का संकेत दे गया. फिर नौ डब्बों की स्पेशल ट्रेन और उसमें सवार रेलवे के आला अधिकारियों ने भी सहमति दे दी. बस रेलवे सुरक्षा आयुक्त की हरी झंडी मिलते ही भारत की सबसे रोमांचक रेल यात्राओं में से एक सिलचर-लामडिंग रेलमार्ग पर भी 70 किमी प्रति घंटा की रफ़्तार से ट्रेन दौड़ने लगेगी. दिल्ली-आगरा जैसे रेलमार्ग पर 160 – 200 किमी की रफ़्तार से पटरियों पर उड़ान भरने और अहमदाबाद-मुंबई मार्ग पर बुलेट ट्रेन का सपना देख रहे लोगों के लिए 70 किमी की स्पीड शायद खिलौना ट्रेन सी लगे परन्तु पूर्वोत्तर में अब तक छुक-छुक करती मीटरगेज पर घंटों का सफ़र दिनों में पूरा करने वाले लोगों के लिए तो यह स्पीड किसी बुलेट ट्रेन से कम नहीं है और जब महज 210 किमी की यह यात्रा 21 सुरंगों और 400 से ज्यादा छोटे-बड़े पुलों से होकर करनी हो तो फिर इस रोमांच के आगे बुलेट ट्रेन की आंधी-तूफ़ान सी गति भी फीकी लगेगी. इस मार्ग पर सबसे लम्बी सुरंग तीन किमी से ज्यादा की है तो सबसे ऊँचा पुल लगभग 180 फुट ऊँचा है. 28 जाने-अनजाने स्टेशनों से गुजरती ट्रेन कई बार 7 डिग्री तक घूमकर जायेगी. 1996-97 में तक़रीबन 600 करोड़ के बजट में तैयार की गयी यह राष्ट्रीय रेल परियोजना लगभग दो दशक बाद 2015 में जाकर 5 हज़ार करोड़ रुपए में मूर्त रूप ले पायी है. इस रेल मार्ग को हक़ीकत में तब्दील करना किसी मायने में प्रकृति की अनजानी विपदाओं से युद्ध लड़ने से कम नहीं था. कभी जमीन धंस जाती थी तो कभी चट्टान खिसक जाती थी लेकिन लगभग 70 सहयोगियों की जान गंवाने के बाद भी मानव श्रम ने हार नहीं मानी और उसी का नतीजा है कि पूरे पूर्वोत्तर में उल्लास और उत्साह का माहौल है.

हम-आप सभी के लिए शायद महज ये रेल पटरियों का बदलना हो लेकिन बराक घाटी और त्रिपुरा-मिज़ोरम के लाखों लोगों के लिए ये विकास की उड़ान के नए पंख हैं, दो दशकों से पीढ़ी दर पीढ़ी पल रहे सपने के साकार होने की तस्वीर है और प्रगति की बाट जोह रहे पूर्वोत्तर की नए सिरे से लिखी जा रही तकदीर है। जब नई बिछी ब्राडगेज रेल लाइन पर कुलांचे भरता हुआ इंजन यहाँ पहुंचा तो उसे टकटकी लगाए निहार रही लाखों आँखों में तृप्ति की ठंडक और भविष्य की उम्मीदों की चमक आ गयी। यदि सब कुछ योजना के मुताबिक रहा तो 1 अप्रैल से दिल की धड़कनों के साथ दौड़ती ट्रेन भी पूरी रफ़्तार से दौड़ने लगेगी। तो दुआ कीजिए देश के 'ईशान कोण' के लिए क्योंकि वास्तु के मुताबिक यह कोण(हिस्सा) खुश हुआ तो देश के बाकी हिस्सों में भी खुशहाली बरसेगी।  

विकास की वाहक वंदे भारत का सफर

भारतीय रेलवे ने समय के साथ कई बदलाव देखे हैं, और इन बदलावों का सबसे चमकदार प्रतीक है वंदे भारत एक्सप्रेस। यह ट्रेन न केवल अपनी गति और आधुनिक सुविधाओं के लिए जानी जाती है, बल्कि यह भारत की प्रगति और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक है। आइए,अब चलते हैं भोपाल से दिल्ली तक वंदे भारत एक्सप्रेस में की गई एक रोचक और जीवंत यात्रा के अनुभव पर। यह यात्रा न केवल रेल के अनुभव को दर्शाती है बल्कि भारत की विविधता और इसकी प्रगति को भी उजागर करती है।

सुबह के तकरीबन 5 बजे, भोपाल का रानी कमलापति रेलवे स्टेशन एक अलग ही रंग में नजर आ रहा है। हल्की ठंडी हवा, चाय की गर्माहट और स्टेशन की हलचल यात्रा के रोमांच को और बढ़ा रहे हैं। रानी कमलापति स्टेशन, जिसे हाल ही में आधुनिक बनाया गया है, अपनी स्वच्छता और व्यवस्थित ढांचे के लिए जाना जाता है। जैसे ही मैं प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर पहुंचा, मेरी नजरें वंदे भारत एक्सप्रेस की तलाश में थीं।

तभी, नीले और सफेद रंग की एक चमकदार ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी। इसका बुलेट ट्रेन जैसा डिज़ाइन और मनमोहक बनावट तुरंत ध्यान खींच लेती है। वंदे भारत एक्सप्रेस भारत में निर्मित नई नवेली और स्मार्ट सेमी-हाई-स्पीड ट्रेन है, जो 160 किमी/घंटे की रफ्तार से दौड़ रही है। अधिकतर लोग इस बेहतरीन ट्रेन में सफ़र का अब तक आनंद ले चुके हैं इसलिए यह सभी जानते हैं कि ट्रेन के दरवाजे स्वचालित हैं। जैसे ही मैं अंदर दाखिल हुआ, मुझे एक प्रीमियम विमान के केबिन जैसा अनुभव हुआ। कोच की सजावट, आरामदायक सीटें और साफ-सुथरा माहौल तुरंत प्रभावित करता है। सीटें एर्गोनॉमिक डिज़ाइन की थीं, जिनमें एडजस्टेबल हेडरेस्ट और लेगरेस्ट की सुविधा है। मेरी सीट खिड़की के पास थी, जो मेरे लिए एक बोनस था, क्योंकि मैं बाहर के बदलते नज़ारों को देखने का शौकीन हूं।

कोच में सीसीटीवी निगरानी, फायर अलार्म और अग्निशामक यंत्रों की व्यवस्था थी, जो सुरक्षा की दृष्टि से मुझे आश्वस्त करती थी। इसके अलावा, प्रत्येक सीट के पास चार्जिंग पॉइंट और पढ़ने के लिए छोटी लाइट्स है। ट्रेन में वाई-फाई की सुविधा है। हालांकि मैंने इसे आजमाने के बजाय अपनी यात्रा का आनंद लेने का फैसला किया।

बिल्कुल सही समय पर ट्रेन ने धीरे-धीरे रानी कमलापति स्टेशन छोड़ा। जैसे ही ट्रेन ने गति पकड़ी, मुझे उसकी स्मूथनेस का अहसास हुआ। कोई झटका नहीं, कोई शोर नहीं—बस एक सहज और स्थिर गति। ट्रेन की अधिकतम गति 160 किमी/घंटा थी, और यह भोपाल से नई दिल्ली के बीच 708 किलोमीटर की दूरी को केवल 7 घंटे 45 मिनट में तय कर लेती है। यह समय सामान्य ट्रेनों की तुलना में काफी कम है, जो इस दूरी को 12-14 घंटों में तय करती हैं।

खिड़की से बाहर का नज़ारा मंत्रमुग्ध करने वाला है । भोपाल के आसपास का हरा-भरा परिदृश्य, छोटे-छोटे गांव, और खेतों में काम करते किसान—यह सब भारत की आत्मा को दर्शाता था। जैसे ही ट्रेन ने हमारे प्रदेश की सीमाओं को पार किया तो मैंने विशालकाय खिड़की से देखा कि खेतों की जगह अब छोटे-छोटे कस्बे और शहर नजर आने लगे।

लगभग एक घंटे की यात्रा के बाद, ट्रेन का स्टाफ चाय और ब्रेकफास्ट की ट्रे लेकर आ गया । वंदे भारत एक्सप्रेस में भोजन की गुणवत्ता उल्लेखनीय है। मुझे एक ट्रे में लज़ीज़ एवं गरमा-गरम इडली, सांभर, नारियल की चटनी और एक कप चाय मिली। वैसे, कॉफी का विकल्प भी था लेकिन अपन ठहरे चाय के आशिक इसलिए कॉफी के इश्क में नहीं फंसे। नाश्ते के साथ मिले हिंदी अंग्रेजी के अखबार ने बिल्कुल घर जैसा अहसास करा दिया। कुछ घंटे ही गुजरे होंगे कि भोजन की महक ने हमारी भूख जागृत कर दी…हमें दिया गया भोजन गरमागरम, ताज़ा और स्वादिष्ट था, जो इस ट्रेन की प्रीमियम सेवा के बिल्कुल अनुकूल था । वैसे,ट्रेन में एक छोटा पैंट्री सेक्शन भी है, जहां से यात्री भरपेट भोजन के बाद भी चाहे तो ब्रांडेड स्नैक्स और पेय पदार्थ खरीद सकते हैं।

भोजन के बाद, बात यात्रियों की दूसरी अनिवार्य जरूरत यानि टॉयलेट्स की।  ट्रेन के टॉयलेट्स आधुनिक और स्वच्छ हैं । इनमें टच-फ्री वॉशबेसिन, साबुन डिस्पेंसर और पर्याप्त रोशनी है। यह भारतीय रेलवे के पुराने अनुभवों से बिल्कुल अलग था और मुझे यह देखकर खुशी हुई कि हमारी रेलवे प्रणाली कितनी प्रगति कर रही है।

वंदे भारत एक्सप्रेस भोपाल से हजरत निजामुद्दीन स्टेशन के यात्रा के दौरान ग्वालियर, आगरा, और मथुरा जैसे ऐतिहासिक महत्व के स्टेशनों को हमारी स्मृतियों से जोड़ती है। प्रत्येक स्टेशन पर रुकने का समय केवल 2-5 मिनट होता है, जो ट्रेन की गति और समयबद्धता को दर्शाता है। साथ ही, बकायदा स्पष्ट अनाउंसमेंट के जरिए बताती है कि कहां रुकेगी,कितनी रुकेगी और द्वार कब बंद होंगे। 

हमारी ट्रेन के कई यात्रियों ने ग्वालियर, मथुरा और आगरा जैसे स्टेशनों से यहां की पहचान मसलन ग्वालियर की गजक,आगरा का पेठा और मथुरा के पेड़े खरीदकर ट्रेन के इन स्टॉपेज के महत्व को सही साबित कर दिया। 

आगरा में ट्रेन के रुकने पर मेरी तरह कई यात्रियों की नजरें ताजमहल को तलाश रही थीं, हालांकि स्टेशन से यह दिखाई नहीं देता लेकिन आगरा का नाम सुनते ही मन में प्रेम और इतिहास की छवियां तो उभर ही आती हैं और मथुरा हमें भगवान कृष्ण के प्रति आस्था से जोड़ देती है। ये छोटे-छोटे पड़ाव न केवल यात्रा को रोचक बना देते हैं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता को भी उजागर करते हैं।

ट्रेन में मेरे बगल वाली सीट पर बैठे एक युवा इंजीनियर बैठे सहयात्री अपनी पहली नौकरी के लिए दिल्ली जा रहे थे । उन्होंने बताया कि वंदे भारत एक्सप्रेस ने उसकी यात्रा को न केवल तेज, बल्कि सुखद भी बना दिया बल्कि महीनों पहले आरक्षण कराने की झंझट से भी छुटकारा दिला दिया। इसी तरह, मेरे सामने वाली सीट पर बैठे बुजुर्ग दंपति अपनी बेटी से मिलने दिल्ली जा रहे थे। उनकी यादों में पुराने जमाने की ट्रेन यात्राएं थीं और वे इस आधुनिक ट्रेन की सुविधाओं से लगभग अचंभित थे।

इन सहयात्रियों ने मुझे यह अहसास कराया कि वंदे भारत एक्सप्रेस केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि भारत के लोगों की नई उम्मीद है। यह ट्रेन नई पीढ़ी की आकांक्षाओं और पुरानी पीढ़ी की विरासत को एक साथ लेकर चलती है। तभी तो मैंने इस रेल वृतांत का शीर्षक विरासत से विकास रखा है।

जैसे-जैसे ट्रेन दिल्ली के करीब पहुंची, बाहर का नज़ारा बदलने लगा। छोटे कस्बों की जगह अब बड़े शहर की चमक और व्यस्तता दिखाई देने लगी। अपनी समय सारिणी का सौ फीसदी पालन करते हुए वंदे भारत ने हमें बिल्कुल सही समय पर हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पहुंचा दिया । 

विकास में भी विरासत

वंदे भारत एक्सप्रेस न केवल एक ट्रेन है, बल्कि यह भारत के आत्मनिर्भर भारत अभियान का एक जीवंत उदाहरण है। यह ट्रेन गति, आधुनिक सुविधाओं और सुरक्षा मानकों के साथ भारतीय रेलवे के भविष्य को दर्शाती है। वंदे भारत एक्सप्रेस पर्यावरण के प्रति भी संवेदनशील है। यह इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट पर आधारित है। ट्रेन की डिज़ाइन और सुविधाएं यात्रियों को एक विश्वस्तरीय अनुभव प्रदान करती हैं, जो भारत को वैश्विक मंच पर गर्व का अनुभव कराती हैं। 

कुल मिलाकर भोपाल से दिल्ली की यह यात्रा मेरे लिए केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक की यात्रा नहीं थी, बल्कि यह भारत की प्रगति, विविधता, और एकता का अनुभव थी। वंदे भारत एक्सप्रेस ने मुझे न केवल समय पर मेरे गंतव्य तक पहुंचाया, बल्कि मुझे एक ऐसी यात्रा का अनुभव दिया, जो आरामदायक, रोमांचक, और यादगार थी। यह ट्रेन भारत के उन लाखों लोगों की कहानी कहती है, जो हर दिन अपने सपनों को साकार करने के लिए यात्रा करते हैं। यह ट्रेन भारत के भविष्य की ओर एक कदम है, और मुझे गर्व है कि मैं इस यात्रा का हिस्सा बना।

निष्कर्ष

जैसा कि इस रेल वृतांत की शुरुआत में ही लिखा है कि भारतीय रेल एक परिवहन व्यवस्था से बढ़कर देश की सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक प्रगति का प्रतीक है। यही इस रेल यात्रा का निचोड़ भी है। ब्रिटिश शासनकाल में आरंभ हुई रेल यात्रा आज एक सदी से भी अधिक समय बाद तकनीकी नवाचारों के साथ आगे बढ़ रही है। स्टीम इंजनों की सीटी और कोयले से उठते आत्मीय धुएं से लेकर वंदे भारत की रफ्तार आवाज और धुंआ रहित यात्रा तक भारतीय रेल ने समय के साथ खुद को नए रूप में प्रस्तुत किया है।

जहाँ एक ओर पुराने रेलवे स्टेशनों की भव्य वास्तुकला और धरोहर रेलगाड़ियाँ अतीत की याद दिलाती हैं, वहीं दूसरी ओर बुलेट ट्रेन की आहट, डिजिटल टिकटिंग, विद्युतीकरण, बायो टॉयलेट, स्वच्छ पटरियां और अत्याधुनिक सुविधाएँ विकास की नई तस्वीर पेश करती हैं। भारतीय रेल का यह संगम हमें यह सिखाता है कि विकास की दौड़ में भी अपनी जड़ों से जुड़ाव कितना आवश्यक है।

वहीं, रेलवे संग्रहालयों, विरासत ट्रेनों और पुनर्निर्मित अमृत स्टेशनों के माध्यम से भारत अपनी रेल विरासत को संजोए हुए है। साथ ही, हर दिन लाखों यात्रियों को जोड़े रखने वाली यह प्रणाली देश के सामाजिक और आर्थिक विकास की रीढ़ बनी हुई है। वास्तव में, भारतीय रेल विरासत और विकास का एक अद्भुत मेल है जो भारत की आत्मा को गति देता है।


शुक्रवार, 18 अप्रैल 2025

मादक गंध से अलमस्त माहौल

मौसम में धीरे-धीरे गर्माहट बढ़ने लगी है और इसके साथ ही बढ़ने लगी है आम की मंजरियों की मादक

खुशबू...हमारे आकाशवाणी परिसर में वर्षों से रेडियो प्रसारण के साक्षी आम के पेड़ों में इस बार भरपूर बौर/मंजरी/अमराई/मोंजर/Blossoms of Mango दिख रही है और पूरा परिसर इनकी मादक गंध से अलमस्त है....ऐसा लग रहा है  जैसे धरती और आकाश ने इन पेड़ों से हरी पत्तियां लेकर बदले में सुनहरे मोतियों से श्रृंगार किया है और फिर बरसात की बूंदों से ऐसी अनूठी खुशबू रच दी है जो हम इंसानों के वश में नहीं है। चाँदनी रात में अमराई की सुनहरी चमक और ग़मक वाक़ई अद्भुत दिखाई पड़ रही है।  अगर प्रकृति और इन्सान की मेहरबानी रही तो ये पेड़ बौर की ही तरह ही आम के हरे-पीले फलों से भी लदे नज़र आएंगे.....परन्तु आमतौर पर सार्वजनिक स्थानों पर लगे फलदार वृक्ष अपने फल नहीं बचा पाते क्योंकि फल बनने से पकने की प्रक्रिया के बीच ही वे फलविहीन कर दिए जाते हैं....खैर,प्रकृति ने भी तो आम को इतनी अलग अलग सुगंधों से सराबोर कर रखा है कि मन तो ललचाएगा ही..महसूस कीजिए कैसे स्वर्णिम मंजरी की मादकता चुलबुली ‘कैरी’ बनते ही भीनी भीनी खुशबू से मन को लुभाने लगती है और फिर आम के पकने के साथ ही उसकी मीठी-मीठी सुगंध...अहा... मधुमेह से परेशान लोगों के मुंह में भी पानी ला देती है ।

आम की मंजरियों की सुंदरता और मादकता ने हमेशा ही कवियों-लेखकों का मन मोहा है। तभी तो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है -“कालिदास ने आम्र कोरकों को बसंत काल का 'जीवितसर्वस्वक' कहा था। उन दिनों भारतीय लोगों का हृदय अधिक संवेदनशील था। वे सुंदर का सम्मान करना जानते थे। गृहदेवियाँ इस लाल हरे पीले आम्र कोरक में देखकर आनंद विह्वल हो जाती थी। वे इस 'ऋतुमंगल' पुष्प  को श्रद्धा और प्रीति की दृष्टि से देखती थीं। आज हमारा संवेदन भोथा हो गया है। पुरानी बातें पढ़ने से ऐसा मालूम होता है जैसे कोई अधभूला पुराना सपना है। रस मिलता है, पर प्रतीति नहीं होती।‘

वहीं,आम की मंजरियों की मादकता पर क़लम चलाने से जाने माने लेखक विद्यानिवास मिश्र भी खुद को नहीं रोक पाए। उनके शब्दों में - 'आम वसंत का अपना सगा है, क्योंकि उसके बौर की पराग-धूलि से वसंत की कोकिला का कविकंठ कषायित होकर और मादक हो जाता है. आम की बौर, नये पल्लव और नये कर्ले और अंखुए कामदेव के बाण बन जाते हैं।'

आम तो वैसे भी फलों का राजा माना जाता है इसलिए राजा साहब की शान में कशीदे काढ़ने से भला कौन रुक सकता है...लेकिन यदि हम 'आम राजा' की तारीफों में डूब गए तो शब्द कम पड़ जाएंगे इसलिए पीले/रसीले/मीठे आम पर बात फिर कभी..फ़िलहाल अपन तो बौर की मादक गंध में अलमस्त हैं और  अपनी बात का समापन कुमार रवींद्र की कविता की उन पंक्तियों से करते हैं, जो  इस मादकता से हमें झंझोड़ कर उठाते हुए आम और आज से जुड़ी वास्तविकता से रूबरू कराती है। वे लिखते हैं:

'अरे बावरे

गीत न बाँचो अमराई का

महानगर में

किसको फुर्सत

मुड़कर देखे

बौर आम पर कब आता है।'


#आम #अमराई #मंजरी #mango #blossom #blossombeauty  #कैरी

तो हो जाए एक एक समोसा... ।।

‘समोसा’ सुनते ही मुंह में पानी आ जाना स्वाभाविक है। यह तिकोना, मोटा और भूरा सा व्यंजन अपनी कद काठी के कारण अपनी बिरादरी में अलग ही नजर आता है। अपने रूप रंग में भले ही यह उन्नीस बैठता हो लेकिन स्वाद में पूरा बीस है और शायद यही कारण है कि तेल की कढ़ाई में घंटों उछलकूद करने वाला गरमागरम समोसा हर उम्र के लोगों की पहली पसंद है। शायद ही कोई अभागा हो, जिसे समोसा खाने का मौका न मिला हो क्योंकि यह तो हर छोटी-बड़ी पार्टी की शान है....लेकिन क्या आपको पता है कि आपके जन्मदिन की तरह आपके प्रिय समोसे का भी एक दिन है जिसे विश्व समोसा दिवस (World Samosa Day) जाता है।...शायद कम ही लोगों को यह पता होगा कि दुनिया भर में 5 सितम्बर को विश्व समोसा दिवस मनाया जाता है।


हमारे-आपके प्रिय समोसे का बस यह दुर्भाग्य है कि उसका दिन ‘शिक्षक दिवस’ के साथ पड़ता है और गुरुओं को समर्पित इस दिन की गरिमा-भव्यता और दिव्यता में समोसा समर्पित शिष्य की भाँति अपने दिन को कुर्बान कर देता है।...इसलिए भले ही वह शिक्षक दिवस की हर दावत में डायनिंग टेबल पर पूरी शान और गर्व से इठलाता हो लेकिन अपना दिन खुलकर नहीं माना पाता। शिक्षक दिवस और समोसे के बीच एक खास सम्बन्ध यह भी है हर व्यक्ति का और प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी का ‘समोसा गुरु’ जरुर होता है, जो यह बताता है कि ‘गुरु फलाने शहर में फलाने के समोसे बहुत गज़ब हैं’...और हर शहर-हर गली नुक्कड़ पर स्वादिष्ट समोसे का यह गुरुपन पलता-बढ़ता रहता है।


समोसा दिवस पर अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए जब हमने इस लज़ीज़-मोटे समोसे का इतिहास खंगालना शुरू किया तो गूगल गुरु ने बताया कि समोसा असल में फारसी शब्द 'सम्मोकसा' से बना है। माना जाता है कि समोसे की उत्पत्ति 10वीं शताब्दी से पहले मध्य पूर्व में कहीं हुई थी और यह 13वीं से 14वीं शताब्दी के बीच भारत में आया। ऐसा माना जाता है कि समोसा मध्य-पूर्व के व्यापारियों के साथ भारत आया और आते ही पूरा भारतीय हो गया। तभी तो आजकल हर शहर की गली,मोहल्ले और  नुक्कड पर समोसा आसानी से मिल जाता है। वैसे इन दिनों एक थ्योरी यह भी चल रही है कि अरब देशों में गेहूँ तो होता नहीं है तो उनको समोसा बनाने के लिए मैदा कहाँ से मिलेगा इसलिए समोसा पूरी तरह भारतीय पैदाइश है। बहरहाल अब तो समय के साथ समोसा रंग-रूप,आकार-प्रकार,स्वाद और गुण भी बदलता जा रहा है। शहरों में नमकीन की दुकानों पर मिलने वाले छोटे सूखे समोसों से लेकर दिल्ली के पास नोएडा में मिलने वाले गरमा-गरम छोटे समोसों और दिल्ली के ही नूडल्स वाले समोसे तक इसने लम्बा सफ़र तय किया है। अब तो इसने धीरे से मिठाइयों के बीच भी घुसपैठ कर ली है और चाकलेट और खोया भरे मीठे समोसे के रूप में भी अपने स्वाद से आमोखास की जुबान पर चढ़ने लगा है। पूर्वी दिल्ली में तो करीब 25 प्रकार के समोसे मिलते हैं। यहां आलू के साथ पास्ता, नूडल्स, पिज्जा और चॉकलेट समोसे जैसे कई प्रकार के समोसे लोगों को खूब भा रहे हैं । समोसे की लोकप्रियता का ही प्रमाण है कि दशक भर पहले बिहार के साथ साथ हिंदी पट्टी में यह नारा खूब लोकप्रिय हुआ था... ‘ जब तक रहेगा समोसे में आलू-तब तक रहेगा बिहार में लालू’...और इसीतरह ‘मिस्टर और मिसेज खिलाड़ी’ फिल्म के एक गीत ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहूँगा तेरा मैं शालू..’ ने भी समोसे की लोकप्रियता की आड़ में खूब कमाई की थी।....खैर इस फिल्म या लालूप्रसाद की लोकप्रियता तो समय के साथ कम होती गयी लेकिन हमारा समोसा आज भी पूरी आन-बान-शान के साथ स्वाद के पहले पायदान पर कायम है....तो चलिए हो जाए एक-एक समोसा.... ।।

#समोसा  #samosa #WorldSamosaDay

महबूब शहर भोपाल की चुटीली दास्तां है- ‘भोपाल टॉकीज_शहर की किस्सागोई’

सत्तर के दशक की फिल्म ‘शोले’ का यह डायलॉग बहुत मशहूर हुआ था कि ‘हमारा नाम भी सूरमा भोपाली ऐसई नई है..,’ सोचिए, जब भोपाल से जुड़े एक संवाद ने देशभर में इतनी लोकप्रियता हासिल की थी तो अगर पूरे भोपाल के मिजाज़ को जानने का मौका मिल जाए तो वह कितना जबरदस्त होगा। वैसे भी, कहते हैं न कि सयाने लोग एक चावल से अंदाजा लगा लेते हैं कि बिरयानी कैसी पकी होगी।

जाने माने संचार कर्मी, लेखक और व्यंग्यकार संजीव परसाई की नई किताब ‘भोपाल टॉकीज: शहर की किस्सागोई’ भी भोपाली बिरयानी की तरह लज़ीज़ है। यह हमें इस महबूब शहर के हर जायके से रूबरू कराती है। जब भी भोपाल की बात चलती है तो इस शहर को न केवल अपनी खूबसूरती के लिए बल्कि यहां के लोगों की जिंदादिली और स्वभाव की सहजता के लिए जाना जाता है। 

संजीव ने इसी सरलता को केंद्र में रखकर करीने से तानाबाना बुना है। मूल भोपाली अपनी चटकारेदार भाषा,चुटीली शैली और हंसी मज़ाक में करारा व्यंग्य करने के लिए मशहूर हैं इसलिए जब आप ‘भोपाल टॉकीज: शहर की किस्सागोई’ किताब के पन्ने पलटना शुरू करते हैं तो धीरे-धीरे आप शहर की संस्कृति, किस्सागोई की परंपरा और शहर की आबोहवा में गोता लगाने लगते हैं।

यह किताब और इसके लेख शहद की मिठास और कालीमिर्च के पाउडर के मिश्रण की तरह हैं जो गले में मिठास के साथ होले से झटका देते हुए निकलते हैं और आप बिना वक्त गंवाए एक के बाद एक पन्ने पलटते जाते हैं। करीब 200 पन्नों की यह किताब मोटे तौर पर चार भागों में हमें भोपाल की गलियों, घरों, लोगों, इतिहास, परंपरा और संस्कार से जुड़ी कहानियों की सैर पर ले जाती है।

 ‘रानी कमलापति से बेगमों तक भोपाल के किस्से’ नामक चैप्टर में हमें रानी कमलापति के दौर, बेगम और उनके शासन, भोपाल रियासत का भारत में विलय और रानी कमलापति के साथ हुई गद्दारी से जुड़ी गंभीर बातें हल्के-फुल्के कहानी के अंदाज में पढ़ने को मिलती हैं। वहीं, ‘भोपाल बन बिगड़ रिया है खां’ चैप्टर में लज्जतदार भाषा में भोपाल के इतिहास से लेकर मौजूदा दौर तक की यात्रा पर जाने का मौका मिलता है। खास तौर पर जीप पर सवार सूअर, जर्दा पर्दा, नामर्दा  और अब ना मुराद गैस, यह सूरमा भोपाली कौन है मियां, गुप्त रोगों की डिस्पेंसरी जैसे लेख बिना रुके पढ़ने के लिए मजबूर कर देते हैं। 

किताब का सबसे मजेदार हिस्सा ‘और सुनाओ और बताओ की जंग से निकले किस्से’ है। यहां हमें एक नहीं बल्कि दर्जनों सूरमा भोपालियों से मिलने, उनके डींगे हांकने के अनूठे अंदाज, चुटीले किस्सों और भोपाली लोगों के मूल स्वभाव से परिचित होने का मौका मिलता है। यहां संजीव परसाई भोपाली का ईगो, मोर पकड़ने की उस्तादी, गोबर के बतोले, मुजरा भोपाल का, मियां शेर अलट पलट हो लिया जैसे मनमोहक शीर्षकों के जरिए भोपाल की नब्ज पकड़ने का प्रयास करते हैं। खास तौर पर ‘यह किताब और कल्लन’ अध्याय में वे सीधे तौर पर समाज को आज पुस्तकों के प्रकाशन, हिंदी के लेखकों की स्थिति और पाठकों की घटती संख्या जैसी स्थितियों को कल्लन मियां के व्यंग्य के जरिए आईना दिखाने का प्रयास करते हैं ।

किताब का आखिरी हिस्सा ‘आज भोपाल कैसा है मियां’ चैप्टर है। इसमें भोपाल का ताल,  गैस कांड के बाद का भोपाल और पढ़ने लिखने वालों का भोपाल जैसे अध्यायों के माध्यम से संजीव बदलते-संवरते भोपाल को कलम के हुनर के जरिए विनोदी अंदाज़ में परोसते हैं। जैसा कि हम सब जानते हैं भोपाल नगर निगम भोपाल को ‘यूनेस्को सिटी आफ लिटरेचर’ का दर्जा दिलाने के लिए लगातार कोशिश कर रहा है, संजीव परसाई भी ‘पढ़ने लिखने वालों का भोपाल’ अध्याय में हमें शहर की इसी पहचान से जोड़ते हैं। 

वे हमें दुष्यंत कुमार से लेकर कैफ भोपाली तक और जावेद अख्तर से लेकर बशीर बद्र तक साहित्य के गलियारों में घुमाते हैं। वह मौजूदा दौर के सशक्त हस्ताक्षर राजेश जोशी की बात करते हैं तो गिरजा भैया (वरिष्ठ पत्रकार गिरिजा शंकर जी) के योगदान की चर्चा भी। वे रूमी जाफरी को भोपाल से जोड़ते हैं तो पद्मश्री से सम्मानित विजय दत्त श्रीधर के अवदान का भी पूरे सम्मान से स्मरण करते हैं। वे व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी, खोजी पत्रकार राजकुमार केसवानी और मध्य प्रदेश की राजनीति की गहरी समझ रखने वाले हमारे अपने दौर के दीपक तिवारी से भी अपने अंदाज में हमारी पहचान कराते हैं। 

संजीव परसाई ने इस किताब की भूमिका में खुद लिखा है कि यह भोपाल का इतिहास नहीं है बल्कि भोपाल का कर्ज चुकाने का एक प्रयास है। उन्हीं  के शब्दों को दोहराएं तो वे वाकई भोपाल का कर्ज सूद समेत चुकाने में कामयाब रहे हैं । भोपाल को इतने अलग अंदाज में एक किताब के तौर पर देखने या पढ़ने का मौका मुझे तो अब तक नहीं मिला इसलिए यदि आप भोपाल से हैं या भोपाल को जानना चाहते हैं तो ‘भोपाल टॉकीज: शहर की किस्सागोई’ किताब जरूर पढ़िए। यह किताब आपको भोपाल के बड़े तालाब से लेकर नए शहर की साफ सुथरी चौड़ी सड़कों पर तफरी कराएगी तो पुराने शहर की भूल भुलैया जैसी गलियों में छिपे कोहिनूरों की चमक भी दिखाएगी। भोपाल पर एक अच्छी,मजेदार,पठनीय किताब के लिए लेखक संजीव परसाई को बधाई। 

यह किताब अपने बेहतरीन प्रकाशनों के विख्यात 'लोक प्रकाशन', भोपाल ने प्रकाशित की है । उम्दा छपाई, आकर्षक, साफ सुथरे फोंट और पढ़ने के अनुकूल अक्षरों वाली महज ₹300 की यह किताब पैसा वसूल है। ‘भोपाल टॉकीज: शहर की किस्सागोई’ किताब आपको चंद घंटों में भोपाल के 100 साल का सफर करा देती है और सबसे अच्छी बात यह है कि आप किताब पढ़ते हुए किसी सुपरहिट फिल्म के शो की तरह भरपूर मनोरंजन के साथ इससे बाहर निकलते हैं। सही मायने में यह सूरमा भोपाली का भोपाल है जिसे हम भोपाल टॉकीज के जरिए देख पा रहे हैं।

किताब: भोपाल टॉकीज: शहर की किस्सागोई

पृष्ठ: 194

कीमत: 300 रुपए 

प्रकाशक: लोक प्रकाशन, भोपाल

अमेजन लिंक: https://amzn.in/d/0eWPfp9



#किताबीकीड़ा 

बुधवार, 16 अप्रैल 2025

टोपियों की निराली परम्परा

‘टोपी पहनाना’, ‘इसकी टोपी उसके सिर’ और ‘टोपी उछालना’ जैसे तमाम मुहावरे टोपियों की नकारात्मक छवि गढ़ने में पीछे नहीं हैं लेकिन ये बात राजनीतिक क्षेत्र की टोपियों तक ही सीमित हैं क्योंकि यदि बात हिमाचल प्रदेश की रंग बिरंगी,आकर्षक और लुभावनी टोपियों की हो तो आप भी ये तमाम मुहावरे भूलकर टोपी पहनने में पीछे नहीं रहेंगे। हिमाचल यानि देवभूमि के प्राकृतिक सौंदर्य की ही तरह यहां की टोपियां भी सबसे अलग हैं।

हिमाचल प्रदेश का सौंदर्य प्रकृति, संस्कृति और शांति का एक अनुपम संगम है। हिमालय की गोद में बसा यह राज्य अपनी बर्फ से ढकी चोटियों, हरी-भरी घाटियों, झरनों, नदियों और प्राचीन मंदिरों और विविध संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक धरोहर पर्यटकों को अपनी ओर खींच लेती है। ब्यास, सतलुज, चिनाब और रावी जैसी नदियाँ यहां फिज़ाओं में संगीत घोलती हैं तो आध्यात्मिक परंपराएं, सांस्कृतिक सौंदर्य, लोक संस्कृति,जलवायुवीय आकर्षण,शांत वातावरण,बर्फ से ढके पहाड़ और हरे-भरे जंगल मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करते हैं। 

तमाम खूबियों के बाद भी हिमाचल में टोपी ऐसी खास चीज हैं जो बिना कुछ कहे सबसे ज्यादा हमारा ध्यान खींचती है। हिमाचल प्रदेश की टोपियां न केवल राज्य की समृद्ध संस्कृति और पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं बल्कि ये टोपियां यहां के सर्द बर्फीले मौसम में गर्मी भी प्रदान करती हैं।

जैसे हिमाचल प्रदेश का सौंदर्य केवल आँखों को ही नहीं, बल्कि मन और आत्मा को भी छूता है। यहाँ की हर घाटी, हर पहाड़ और हर गाँव एक कहानी कहता है, उसी तरह यहां की हर टोपी के पीछे भी संस्कृति, परंपरा और पहचान की लंबी कहानी है।

टोपियों के रंग,डिजाइन और पहनने की परंपरा हिमाचली लोगों के गर्व और शैली को भी दर्शाती है। हिमाचल की टोपियां विभिन्न रंगों, डिजाइनों और शैलियों में उपलब्ध होती हैं, जो इस देवभूमि की क्षेत्रीय विविधता को प्रदर्शित करती हैं। 

वैसे तो हिमाचली टोपियां आमतौर पर ऊन से बनाई जाती हैं लेकिन बाहर से आने वाले पर्यटकों की सुविधा के लिए अब सामान्य दिनों में पहनी जा सकने वाली टोपियां भी बड़े पैमाने पर उपलब्ध हैं। इन टोपियों में हरा, लाल, नीला और पीला जैसे विभिन्न चटकीले रंग भरपूर देखने को मिलते हैं। कभी टोपियों पर आकर्षक फूलों की कढ़ाई होती है तो कहीं खूबसूरत ज्यामितीय पैटर्न देखने को मिलते हैं ।

वैसे तो हिमाचल प्रदेश की सभी टोपियां लोकप्रिय हैं फिर भी हिमाचल के साथ साथ अन्य राज्यों में भी यहां की कुल्लू और किन्नौरी टोपी बहुत पसंद की जाती है । कुल्लू टोपी गोल आकार की होती है, जिसमें अक्सर काली, हरी या लाल रंगीन पट्टी  होती है, जबकि किन्नौरी टोपी में जटिल बुनाई और लंबाई में डिजाइन होती है। 

हिमाचल प्रदेश में ये टोपियां आम दिनों के साथ खासतौर पर त्योहारों, शादियों और विशेष अवसरों पर भी पहनी जाती हैं। यह हिमाचल की लोक संस्कृति की प्रतीक मानी जाती हैं और अक्सर सम्मान के रूप में भी भेंट की जाती हैं। आज कल देश में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता भी अक्सर हिमाचली टोपियों के आकर्षण के बंधे दिखते हैं । कभी परंपरागत रूप से सिर को ठंड से बचाने के लिए बनाई गई हिमाचली टोपियां आज  फैशन से कदम से कदम मिलाकर चल रही  हैं।

हिमाचल प्रदेश की टोपियों का महत्व सिर्फ उपयोगिता तक सीमित नहीं है बल्कि ये राज्य की कला, शिल्प और परंपरा का जीवंत उदाहरण हैं। अब तो यहां आने वाले पर्यटक भी स्मृति चिह्न के रूप में टोपियां खरीदकर ले जाते हैं। इसलिए आपको जब भी किसी पर्वतीय राज्य में जाने का मौका मिले वहां की टोपी खरीदने का प्रयास अवश्य करें..क्योंकि आप टोपी के जरिए महज एक उत्पाद नहीं खरीदते बल्कि वहां की संस्कृति, कारीगरों की मेहनत और एक भारत श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना को भी मजबूती प्रदान करते हैं।

बुधवार, 9 अप्रैल 2025

समय से पहले आई खूबसूरती से क्यों भयभीत हैं पहाड़ के लोग!!

हिमाचल प्रदेश या पूरे हिमालय में सौंदर्य के प्रतीक से इन दिनों क्यों भयभीत है लोग? क्यों उन्हें यह सुंदरता रास नहीं आ रही ? खूबसूरती से क्यों नाखुश है पर्वतीय इलाकों के रहवासी और प्राकृतिक सौंदर्य के उपासक क्यों नहीं चाहते असमय प्रकृति की नेमत? ये ऐसे कुछ सवाल हैं जिनके जवाब हमें केवल पर्वतीय इलाकों के जानकार ही दे सकते हैं। आखिर, कोई तो बात होगी जिसके फलस्वरूप यहां के लोगों को प्राकृतिक सुंदरता पसंद नहीं आ रही?

हम बात कर रहे हैं कि पर्वतीय राज्यों के सबसे खूबसूरत वरदान बुरांश की। बुरांश का पेड़ और इसके फूल हिमाचल प्रदेश सहित देश के तमाम पर्वतीय राज्यों के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक संस्कारों से जुड़े हैं। बुरांश न केवल खूबसूरत है बल्कि सेहत की अनेक नेमतों से परिपूर्ण भी है। यह अर्थव्यवस्था का भी एक अनिवार्य हिस्सा है। बुरांश के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि आईआईटी मंडी और इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी (आईसीजीईबी) के शोधकर्ताओं ने  बुरांश की पंखुड़ियों में मौजूद फाइटोकेमिकल्स की पहचान की है जो कोविड-19 वायरस को रोक सकते हैं। एक अध्ययन में पाया गया है कि बुरांश के फूल में एंटीवायरल गुण होते हैं, जो SARS-CoV-2 से संक्रमित कोशिकाओं के इलाज में मदद कर सकते हैं। कुछ शोधों में यह भी पाया गया है कि बुरांश के जूस का सेवन दिल और लीवर के लिए फायदेमंद हो सकता है।

हिमालय को मिला प्रकृति का यह उपहार यानि बुरांश का फूल ही यहां खतरे का संकेत दे रहा है। पिछले कुछ सालों से यह फूल समय से पहले खिलने लगा है और यही पर्वतीय लोगों के साथ साथ वैज्ञानिकों के लिए भी चिंता का सबब है। बुरांश का समय से पहले खिलना बर्फबारी कम होने का संकेत है और कम वर्षा का भी। शिमला या इस जैसे तमाम पर्यटन स्थलों का सौंदर्य और आर्थिक प्रगति बर्फबारी (snow fall) पर निर्भर है। बीते कुछ सालों में न  केवल शिमला सहित अधिकतर पर्वतीय इलाकों की सर्दी कम हुई है बल्कि बर्फबारी के दिन भी कम होते जा रहे हैं। पहले शिमला शहर में ही जमकर बर्फ गिरती थी लेकिन अब बर्फबारी कुफरी,ठियोग और नारकंडा की ओर खिसकते जा रही है। इससे पर्यटन पर भी असर पड़ रहा है। इस समस्या को विकराल बनाने में पहाड़ों का सीना चीरकर दौड़ रही हजारों कारों ने भी अहम भूमिका निभाई है। इस सबसे, मौसम बदल रहा है और इसलिए बुरांश भी समय से पहले खिलने लगा है।

डाउन टू अर्थ पत्रिका में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक तापमान और वर्षा तथा बर्फ में आए बदलावों के प्रति बुरांश पौधों की संवेदनशीलता और प्रतिक्रियाओं ने चिंता बढ़ा दी है। फूलों के पैटर्न में बदलाव के लिए काफी हद तक ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार माना जा रहा है। इसके फलस्वरूप बदल रहे मौसम के तेवरों का नुकसान बुरांश के फूलों को उठाना पड़ रहा है। मसलन बारिश की कमी के कारण इनमें रसीले पन का अभाव हो जाता है। बुरांश के फूलों के फूलने की प्रक्रिया को समझे तो सामान्य रूप से जनवरी से फरवरी माह में बुरांस के फूल कलियों के रूप में रहते हैं। चूंकि उस समय तापमान बहुत कम होता है और बहुत कम तापमान में कलियां खराब न हो जाए, इसके लिए प्राकृतिक तौर पर पंखुड़ियां सुरक्षा घेरे के रूप में कलियों को बाहर से ढके रहती हैं। यह तभी हटती हैं, जब तापमान 20 से 25 डिग्री पर पहुंच जाता है। अनुकूल तापमान पाकर पेड़ का आंतरिक सूचना तंत्र (डीएनए) कोशिकाओं को संकेत भेजता है और फूलों के फूलने की प्रक्रिया के लिए हार्मोंस सक्रिय हो जाते हैं। 

यदि समय से पहले ही तापमान अधिक हो जाता है तो फूल के विकास पर असर पड़ता है और उसके रंग रूप से लेकर आर्थिक और स्वास्थ्य प्रद गुणों पर भी असर पड़ता है। इसके अलावा, अगर ये फूल समय से पहले यानी सर्दियों के अंत में ही खिलने लगते हैं तो उस समय मधुमक्खियाँ या परागण करने वाले कीड़े सक्रिय नहीं होते इसलिए परागण पूरी तरह नहीं हो पाता, जिससे पौधों के बीज या फल विकसित नहीं हो पाते। तापमान में उतार चढ़ाव से पहले से खिले फूल मुरझा जाते हैं या मर जाते हैं।

बुरांश के फूलों के जल्दी खिलने का असर पारिस्थितिकीय तंत्र पर भी पड़ता है। दरअसल, बुरांश के फूलों पर कई पक्षी, कीड़े और अन्य जीव आश्रित होते हैं। यदि फूल समय से पहले या अनियमित रूप से खिलते हैं, तो यह खाद्य श्रृंखला गड़बड़ा जाती है। बुरांश के फूलों का उपयोग सिरप और जूस आदि बनाने में होता है। अनियमित फूलों की वजह से इनमें रस कम बनता है और किसानों और स्थानीय लोगों की कमाई भी प्रभावित होती है। यही लोगों की चिंता का कारण है।

अब अगर पहाड़ों का सौंदर्य, तापमान, बर्फ,बुरांश और प्राकृतिक चक्र बनाए रखना है तो प्रकृति का संरक्षण करना होगा, अंधाधुंध फैलते कंक्रीट के जंगल की रफ्तार थामनी होगी और पहाड़ों को रौंदती मोटरगाड़ियों की संख्या को नियंत्रित करना होगा वरना पहाड़ और प्लेन में कोई अंतर नहीं रह जाएगा।

(यह लेख रागदिल्ली डॉट कॉम में भी प्रकाशित हुआ है।)


रविवार, 6 अप्रैल 2025

6 डिग्री तापमान में गर्मी..भगवान बचाए!!

यदि आप अपने शहर की 40-42 डिग्री की गर्मी में 20 से 22 डिग्री पर एसी चला कर जीवन का आनंद ले रहे हों और तभी आपका कोई दोस्त या परिचित कमरे में आए और इतने कम तापमान पर भी कहे कि यार कितनी गर्मी है तुम्हारे यहां..तो पक्का मान लीजिए वह हिमाचल प्रदेश से आया है क्योंकि, 22 डिग्री तापमान में गर्मी बस यहीं के लोगों को लग सकती है। 

वाकई, शिमला,कुफरी और ठियोग जैसे तमाम इलाकों में इन दिनों कुछ ऐसा ही तापमान है और यहां के लोगों के लिए गर्मी है। वे मस्त शर्ट और टीशर्ट में घूम रहे हैं। दिन में धूप से बचने के लिए महिलाएं छाता लेकर निकलती हैं जबकि अपन जैसे मैदानी इलाकों के लोग स्वेटर और शाल में भी ठंड से कांपते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक रात में जरूर थोड़ी ठंड हो जाती है जबकि असलियत यह है कि यहां दिन का तापमान 22 से 24 और शाम से भोर तक तो 6 डिग्री और उससे भी कम हो जाता है। 

मौसम विभाग ने भी इस साल यहां एकाध दिन लू चलने की आशंका जाहिर की है जबकि यहां के निवासी भूपिंदर सिंह हेट्टा का कहना है कि अब शिमला में ठंड बची कहां है, दिसंबर तक तो गर्मी पड़ती है..बस, दो महीनों की बर्फ पड़ती थी, वह भी पता नहीं क्यों शिमला से रूठ गई है।

वैसे, शिमला में औसतन 20 से 30 सेंटीमीटर तक सालाना बर्फबारी होती है लेकिन यह मौसम और जलवायु परिवर्तन के आधार पर कम या ज्यादा भी हो सकती है। कुछ सालों में ऊपरी इलाकों जैसे कुफरी और नारकंडा में भारी बर्फबारी के कारण 50 सेंटीमीटर से अधिक भी बर्फ दर्ज की गई है। हालांकि, हाल के वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से बर्फबारी की मात्रा और नियमितता में कुछ कमी देखी गई है।

शिमला की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 2 हजार 205 मीटर यानि करीब सवा सात हजार फीट है। यह हिमालय की तलहटी में स्थित है, जिसके कारण इसकी ऊंचाई और ठंडा मौसम इसे एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल बनाते हैं। खूबसूरत मौसम की ही तरह शिमला को अपने इतिहास, प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक महत्व के कारण कई खूबसूरत नामों से जाना जाता है। इसका सबसे लोकप्रिय नाम पहाड़ों की रानी या Queen of Hills है। यह शिमला का सबसे लोकप्रिय उपनाम है, जो इसकी खूबसूरत पहाड़ियों और औपनिवेशिक आकर्षण के लिए दिया गया है। उच्चारण के लिहाज से स्थानीय लोग इसे सिमला भी कहते हैं।  यह इसका पुराना नाम है, जिसे ब्रिटिश शासन के दौरान इस्तेमाल किया जाता था क्योंकि अंग्रेजों ने इसे अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया था। 

शिमला का एक नाम शयामला भी है जो इसे कहीं न कहीं भोपाल के श्यामला हिल्स से भी जोड़ देता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, शिमला का यह नाम माता काली के एक रूप देवी श्यामला से लिया गया है, जिनका मंदिर यहाँ मॉल रोड पर स्थित है। यहां सालभर श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है। वैसे,यहां तारा देवी और कामना देवी के मंदिर बहुत लोकप्रिय हैं। आमतौर पर देवी मंदिर ऊंची पहाड़ियों पर ही होते हैं लेकिन शिमला क्या पूरा हिमाचल प्रदेश ही ऊंचे पहाड़ों पर बसा है इसलिए यहां के मंदिरों पर यह विशेषता लागू नहीं होती।

खैर, अपने मूल विषय पर लौटते हैं कि यदि आपको सर्दी में सर्दियों जैसी गर्मी या फिर भीषण गर्मी में सर्दी का लुत्फ़ उठाना है तो शिमला जरूर जाएं क्योंकि ईश्वर ने यहां प्राकृतिक एसी लगा दिया है। जब भी आपको अपने गरम कपड़ों, रंगीन चश्मों और कैप का इस्तेमाल करना हो तो यहां का एक टूर कर लीजिए, आपको निराशा नहीं होगी।


शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025

बुरांश में आग भी है और यौवन का फाग भी..!!

देश के मैदानी इलाकों में इन दिनों जहां पलाश और गुलमोहर दहक रहे हैं, वहीं पहाड़ों पर बुरांश अपनी मुस्कराहट से लालिमा बिखेर रहा है। हिमाचल प्रदेश में पेड़ों पर झुंड के झुंड बुरांश पहाड़ों को खूबसूरत बना रहे हैं। देश के अन्य पर्वतीय राज्यों का हाल भी शायद ऐसा ही होगा। पहाड़ों पर वैसे तो देवदार का कब्जा है और वे अपनी ऊंचाई से कई बार पहाड़ों के शिखर को भी बोना साबित करते नजर आते हैं लेकिन देवदार के बीच से झांकता लाल रंग का बुरांश खूबसूरती से हमारे दिल में उतर जाता है। बुरांश पर कवियों ने खूब कलम चलाई है। सुप्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत ने तो कुमाऊंनी में लिखा है:

‘सार जंगल में त्वे जस

क्वे न्हां रे बुरांश, 

खिलन क्ये छै जंगल 

जस जलि जा, सल्ल छ, दयार छ, 

पई छ, अयार छ, 

सबन में पुंगनक भार छ, 

पर त्वी में दिलै की आग छ, 

त्वी में जवानिक फाग छ।’

इसका तात्पर्य है कि बुरांश तुझ सा सारे जंगल में कोई नहीं है। जब तू फूलता है, सारा जंगल मानो जल उठता है। जंगल में और भी कई तरह के वृक्ष हैं पर एकमात्र तुझमें ही दिल की आग और यौवन का फाग दोनों मौजूद हैं।

पहाड़ी इलाकों की प्रकृति और प्रवृत्ति से अनजान लोगों की सुविधा के लिए बताते चले कि बुरांश एक खूबसूरत और औषधीय गुणों से भरपूर फूलों वाला पेड़ है जो मुख्य रूप से हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है। यह पूरीतरह से भारतीय है और पूरे हिमालयी इलाकों  के साथ साथ कई अन्य देशों में भी पाया जाता है। यह हिमाचल प्रदेश का राजकीय फूल है। जबकि उत्तराखंड में इसे राजकीय वृक्ष तो नेपाल में राष्ट्रीय पुष्प का रुतबा हासिल है। 

बुरांश को वैज्ञानिक रूप से रोडोडेंड्रोन अर्बोरियम  के नाम से जाना जाता है। रोडोडेंड्रोन दो ग्रीक शब्दों रोडन यानि गुलाब और डेंड्रोन अर्थात् पेड़ से बना है। जिसका अर्थ है गुलाब का पेड़। दरअसल बुरांश दूर से लाल गुलाब की तरह ही खूबसूरत नज़र आता है। सामान्य तौर पर मार्च और अप्रैल के महीनों में खिलने वाले बुरांश से पहाड़ मनमोहक हो जाते हैं। गर्मियों के दिनों में ऊंची पहाड़ियों पर बुरांश के सूर्ख फूलों के गुच्छों से यहां का परिदृश्य लाल हो जाता है। बताया जाता है कि बुरांश के फूल कई रंग के होते हैं लेकिन हमें तो केवल मासूमियत से भरा लाल बुरांश ही देखने को मिला।

 बुरांश केवल अपनी खूबसूरती के लिए ही नहीं, बल्कि सेहत से जुड़े फायदों और सांस्कृतिक महत्व के लिए भी प्रसिद्ध है। देवभूमि हिमाचल में इसे प्रकृति का आशीर्वाद माना जाता है। स्थानीय लोग इसे बराह या ब्रांस जैसे नामों से भी पुकारते हैं। वसंत के मौसम में इसके फूलों का खिलना एक उत्सव की तरह होता है, जो पहाड़ी जीवन की जीवंतता को दर्शाता है।

बुरांश के फूलों और पत्तियों में कई औषधीय गुण होते हैं, जिनका उपयोग आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में सदियों से किया जाता रहा है। इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटी-वायरल गुण पाए जाते हैं। बुरांश के फूलों से बना शरबत हृदय रोगियों के लिए लाभकारी माना जाता है। यह कोलेस्ट्रॉल को कम करने और रक्त संचार को बेहतर करने में मदद करता है। इसमें आयरन की अच्छी मात्रा होती है, जो खून की कमी को दूर करने और हीमोग्लोबिन बढ़ाने में सहायक है। फूलों में मौजूद कैल्शियम हड्डियों को मजबूत करता है और जोड़ों के दर्द में राहत देता है।

बुरांश के फूलों का उपयोग विभिन्न रूपों में किया जाता है। इसके फूलों से जूस, शरबत, जैम और चटनी बनाते हैं। बुरांश का महत्व केवल औषधीय ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है। बुरांश के पेड़ नमी को संरक्षित करने और पेयजल स्रोतों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के कारण इसके खिलने का समय प्रभावित हो रहा है। कई बार यह सामान्य से पहले खिल जाता है, जो ग्लोबल वार्मिंग का संकेत माना जा रहा है।

कुल मिलाकर बुरांश का फूल न केवल प्रकृति की खूबसूरती का प्रतीक है, बल्कि एक औषधीय खजाना भी है। यह पहाड़ी इलाकों में लोगों के जीवन का अभिन्न अंग है। तभी तो कवियत्री हनी हिमांशु लिखती हैं:

किसी को प्रेयसी के माथे में चमकती

लाल बिंदी सा लगता है बुरांश,

किसी को कानों में लटकती बाली सा लगता है बुरांस

कहीं अंधेरे में रोशन एक चिराग सा चमकता बुरांश,

हाँ देखो,रंग भरने 

संवारने आसमान की चादर

मुस्कुराते हुए 

खिल आया है बुरांश।

अगली बार जब आप हिमालय की वादियों में समाए किसी राज्य में घूमने जाएं, तो बुरांश के फूलों की खूबसूरती और इसके जादुई गुणों का आनंद लेना न भूलें।




 


रविवार, 23 मार्च 2025

भारत में रेडियो की विकास यात्रा

भारत में रेडियो का इतिहास एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प यात्रा है। इसकी शुरुआत करीब सौ साल पहले एक छोटे से प्रयोग से हुई थीलेकिन समय के साथ यह देश के सांस्कृतिकसामाजिकऔर राजनीतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। रेडियो के माध्यम से न केवल सूचना और मनोरंजन प्रदान किया जाता हैबल्कि यह एक सशक्त माध्यम के रूप में समाज की जागरूकता बढ़ाने का कार्य भी करता है। भारत में रेडियो की विकास यात्रा के विभिन्न चरणों पर बात करें तो हम उन्हें कुछ इस प्रकार विभाजित कर सकते हैं:

1. प्रारंभिक चरण (1920-1947)

भारत में रेडियो की शुरुआत ब्रिटिश काल के दौरान हुई। 1920 मेंभारत में पहली बार रेडियो प्रसारण का प्रयोग हुआ। यह प्रसारण भारत में पहली बार कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। इसका उद्देश्य संगीतसमाचार और जानकारी फैलाना था।

·  1927 मेंभारत में 'Indian Broadcasting Company' (IBC) की स्थापना की गई। हालांकियह कंपनी आर्थिक कारणों से अधिक समय तक नहीं चल पाई। बॉम्बे प्रेसिडेंसी रेडियो क्लब और अन्य रेडियो क्लबों के कार्यक्रमों के साथ ब्रिटिश राज के दौरान जून 1923 में प्रसारण आरम्भ हुआ। 23 जुलाई 1927 को दो रेडियो स्टेशन शुरू हुए. 23 जुलाई 1927 को बॉम्बे स्टेशन आरम्भ हुआ और कलकत्ता स्टेशन 26 अगस्त 1927 को आरम्भ हुआ था। 

·  इसके बाद1930 में भारतीय सरकार ने रेडियो प्रसारण की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली और All India Radio (AIR) की स्थापना की। अप्रैल 1930 को दो वर्ष के लिए प्रायोगिक आधार पर भारतीय स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (ISBS) की शुरुआत की और मई 1932 में स्थायी रूप से ऑल इंडिया रेडियो बन गया। इसका उद्देश्य सूचना प्रसारण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का प्रसार करना था।

2. स्वतंत्रता के बाद का दौर (1947-1970)

भारत की स्वतंत्रता के बादरेडियो प्रसारण के महत्व में वृद्धि हुई। सरकार ने इसका इस्तेमाल राष्ट्रीय एकताशिक्षा और जागरूकता फैलाने के लिए किया।

·  1947 के बाद, AIR का दायरा बढ़ाया गया और इसे देशभर में फैला दिया गया। इसके माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की जीवनीसांस्कृतिक कार्यक्रम और समसामयिक घटनाओं के बारे में जानकारी दी गई।

·  1950 में, AIR ने अपनी पहली राष्ट्रीय सेवा शुरू कीजो प्रमुख रूप से समाचार और शैक्षिक कार्यक्रमों पर केंद्रित थी। विविध भारती की शुरुआत  3 अक्टूबर 1957  को हुई थी। यह देश मे सार्वजनिक क्षेत्र के रेडियो की एक प्रमुख प्रसारण सेवा है। भारत में  श्रोताओं के बीच ये सर्वाधिक सुनी जाने वाली और बहुत लोकप्रिय सेवा है।

·  1957 मेंभारत ने टेलीविजन प्रसारण की दिशा में भी कदम बढ़ाएलेकिन रेडियो का महत्व तब भी बरकरार रहा।

·  1970 के दशक मेंरेडियो का विस्तार हुआ और विभिन्न भाषाओं में कार्यक्रमों की प्रस्तुति शुरू हुई। AIR ने विभिन्न राज्यों में अपनी क्षेत्रीय सेवाएं शुरू की और इसके कार्यक्रमों में विविधता आई।

·  आकाशवाणी का समाचार सेवा प्रभाग (NSD) भारत और विदेशों में श्रोताओं को समाचार और चर्चाएँ प्रसारित करता है। 1939-40 में 27 समाचार बुलेटिनों सेआकाशवाणी आज राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और विदेशी सेवाओं में 82 भाषाओं/बोलियों में प्रतिदिन लगभग 52 घंटे में 510 से अधिक बुलेटिन प्रसारित करता है। इनमें से89 बुलेटिन प्रतिदिन अंग्रेजीहिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में दिल्ली से प्रसारित किए जाते हैं। 44 क्षेत्रीय समाचार इकाइयाँ (RNU) 67 भाषाओं में 355 दैनिक समाचार बुलेटिन प्रसारित करती हैं। इसमें 22 आकाशवाणी स्टेशनों से विशेष रूप से एफएम गोल्ड’ चैनल पर प्रसारित समाचार बुलेटिन शामिल हैं। दैनिक समाचार बुलेटिनों के अलावासमाचार सेवा प्रभाग प्रतिदिन दिल्ली और कुछ अन्य क्षेत्रीय समाचार इकाइयों से सामयिक विषयों पर कई समाचार-आधारित कार्यक्रम भी प्रसारित करता है।

3. एफएम रेडियो का आगमन (1990-2000)

1990 के दशक मेंभारत में एफएम-फ्रीक्वेंसी मॉडुलेशन रेडियो का आगमन हुआजिसने रेडियो प्रसारण के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। एफएम रेडियो का मुख्य आकर्षण इसके बेहतर ध्वनि गुणवत्ता और संगीत पर आधारित कार्यक्रम थे।

·  भारत में एफएम प्रसारण पहले केवल सरकारी नियंत्रण में था। यह प्रसारण अधिकतर शहरी इलाकों तक सीमित था। भारत सरकार ने एफएम रेडियो के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू की और निजी एफएम रेडियो चैनल्स को अनुमति दी। इससे रेडियो पर विविधता और प्रतिस्पर्धा बढ़ीऔर शहरी जनता को अधिक कार्यक्रमों का चयन करने का अवसर मिला।

  • भारत में पहली एफएम सेवा 23 जुलाई, 1977 को मद्रास में शुरू हुई थी। 1983 मेंएआईआर बड़ौदा एक सीबीएस स्टेशन बन गया जबकि 1984 मेंपहला स्थानीय स्टेशन नागरकोइल में शुरू हुआ। सरकार ने दिल्लीकोलकातामुंबई और चेन्नई में निजी एफएम प्रसारण के साथ प्रयोग किया। 2001 मेंरेडियो सिटी बैंगलोर भारत का पहला निजी एफएम रेडियो स्टेशन बन गया।

 

4. डिजिटल रेडियो और इंटरनेट का युग (2000-आजकल)

2000 के दशक के अंत मेंतकनीकी विकास के साथ रेडियो प्रसारण में भी परिवर्तन हुआ। इंटरनेट रेडियो और डिजिटल रेडियो प्रसारण की शुरुआत के बादरेडियो का स्वरूप पूरी तरह बदल गया।

·  2006 में भारत में डिजिटल रेडियो प्रसारण की शुरुआत की गई।

·  इसके अलावाइंटरनेट के माध्यम से रेडियो सुनने की प्रक्रिया भी लोकप्रिय हुई। ऑनलाइन रेडियो और पॉडकास्टिंग का विस्तार हुआजिससे रेडियो श्रोताओं के लिए नई संभावनाओं का द्वार खुला।

 

5. वर्तमान स्थिति और भविष्य

·         आजकल भारत में रेडियो का स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। अब यह न केवल सूचना और मनोरंजन का साधन हैबल्कि समाज के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी जानकारी देने और जागरूकता फैलाने का भी एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। हाल ही ऑल इंडिया रेडियो का नाम बदलकर हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी में भी आकाशवाणी कर दिया गया है.  फिलहाल आकाशवाणी के 742 ट्रांसमीटर हैं जो एफ़एम ट्रांसमीटरों का कवरेज क्षेत्र के हिसाब से 90% और जनसंख्या के हिसाब से 98%  क्षेत्र कवर कर रहे हैं . 

आज के डिजिटल युग में रेडियो ने अपने पारंपरिक रूप से एक सशक्त और आधुनिक रूप में बदलाव देखा है। टेक्नोलॉजी में तेजी से बदलाव और इंटरनेट की उपलब्धता ने रेडियो के स्वरूपप्रसारण विधि और श्रोताओं के साथ इसके संबंध को बदल दिया है। आज रेडियो केवल एक एंटरटेनमेंट का माध्यम नहींबल्कि सूचनाशिक्षा और सामाजिक जागरूकता का महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है। आइएजानते हैं आधुनिक समय में रेडियो के बदलते रूप के बारे में:

1. एफएम रेडियो का विस्तार और विविधता

एफएम रेडियो (Frequency Modulation) का आगमन पिछले कुछ दशकों में रेडियो प्रसारण का स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। एफएम रेडियो ने उच्च गुणवत्ता वाली आवाज़साफ़ ध्वनिऔर प्रचलित संगीत के कार्यक्रमों के कारण श्रोताओं को आकर्षित किया। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रसार भारती के अंतर्गत 470 से ज्यादा और निजी क्षेत्र के 388से ज्यादा चैनल हैं. जो पूरे देश का मनोरंजन कर रहे हैं. इसके अलावा, आगामी FM रेडियो स्पेक्ट्रम नीलामी में भाग लेने के लिए 20 कंपनियों ने रुचि दिखाई है। ये नीलामी 254 कस्बों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों को कवर करेगी।

·  निजी एफएम चैनलों की संख्या में वृद्धि ने रेडियो को ज्यादा प्रतिस्पर्धी और विविध बनाया है। अब विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम जैसे संगीतसमाचारटॉक शोलाइव इंटरव्यूखेलऔर शिक्षा पर आधारित शो हर प्रकार के श्रोताओं की जरूरतों को पूरा करते हैं।

·  शहरी क्षेत्रों मेंजहां रेडियो स्टेशन अधिक होते हैंएफएम चैनल्स की विविधता और स्थानीय भाषा में कार्यक्रमों का प्रसारण भी बढ़ा है।

2. डिजिटल रेडियो और इंटरनेट रेडियो

इंटरनेट के विकास के साथ रेडियो का रूप और भी अधिक वैश्विक हो गया है। अब रेडियो प्रसारण इंटरनेट के माध्यम से सुनने की सुविधा मिलती है। भारत में डिजिटल रेडियो की शुरुआत 2017 में हुई थी। भारत सरकार ने डिजिटल रेडियो को बढ़ावा देने के लिए "डिजिटल रेडियो मिशन" शुरू किया है। इस मिशन का लक्ष्य सभी रेडियो प्रसारण को डिजिटल में बदलना है। सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने भारत के 13 प्रमुख शहरों में डिजिटल FM रेडियो प्रसारण शुरू करने की योजना बनाई है। यह कदम रेडियो इंडस्ट्री को आधुनिक बनाने और स्पेक्ट्रम दक्षता को बेहतर करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

डिजिटल रेडियो का आगमन रेडियो की ध्वनि गुणवत्ता को बेहतर बनाने में सहायक हुआ है। अब सिग्नल की कोई समस्या नहीं होतीऔर श्रोता बिना किसी व्यवधान के विभिन्न कार्यक्रम सुन सकते हैं।

ऑनलाइन रेडियो और पॉडकास्ट के रूप में एक नई शुरुआत हुई है। लोग अब इंटरनेट के माध्यम से कहीं भीकभी भी अपने पसंदीदा रेडियो चैनल्स को सुन सकते हैं। इस प्रकाररेडियो अब सीमाओं से बाहर निकलकर विश्व भर में उपलब्ध हो गया है। भारत में इंटरनेट रेडियो प्लेटफ़ॉर्मऑनलाइन रेडियो स्टेशन और पॉडकास्ट को सुनने के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं मसलन ऑनलाइन रेडियो स्टेशन,पॉडकास्ट,मोबाइल ऐप,स्मार्ट स्पीकर,डेस्कटॉप और इंटरनेट रेडियो प्रसारण सॉफ़्टवेयर. आकाशवाणी का न्यूज़ ऑन एआईआर बहुत लोकप्रिय है.

·   

·  पॉडकास्टिंग का भी विस्तार हुआ है। श्रोताओं को उनकी रुचि के अनुसार खास विषयों पर आधारित रिकॉर्डेड शो उपलब्ध होते हैंजिन्हें वे अपनी सुविधा से सुन सकते हैं। देश में इन दिनों स्पॉटीफाई, जिओ सावन, गाना, विंक म्यूजिक, एप्पल पॉडकास्ट्स, पॉकेट एफएम और सुनो इंडिया जैसे कई लोकप्रिय पॉडकास्ट प्लेटफार्म हैं.

3. मोबाइल ऐप्स और स्मार्ट डिवाइस के माध्यम से रेडियो

अब स्मार्टफोन और अन्य स्मार्ट डिवाइस के माध्यम से रेडियो सुनना बहुत ही आसान हो गया है।

·  रेडियो ऐप्स जैसे TuneIn, Gaana, JioSaavn, और अन्य प्लेटफ़ॉर्म्स के जरिए श्रोता पूरी दुनिया के रेडियो स्टेशन सुन सकते हैं। ये ऐप्स न केवल पारंपरिक रेडियोबल्कि डिजिटल और ऑनलाइन रेडियो भी उपलब्ध कराते हैं। आकाशवाणी का न्यूज़ ऑन एआईआर बहुत लोकप्रिय है.

·  स्मार्ट स्पीकर्स (जैसे Alexa, Google Home) के जरिए भी रेडियो सुनना अब बहुत सरल हो गया है। श्रोता सिर्फ एक कमांड दे कर अपने पसंदीदा रेडियो चैनल्स और कार्यक्रमों का आनंद ले सकते हैं।

4. लोकल और कम्युनिटी रेडियो

·         अब रेडियो केवल बड़े शहरों और राज्यों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों और गांवों में भी कम्युनिटी रेडियो स्टेशन का प्रचलन बढ़ा है। देश में पांच सौ से ज्यादा सामुदायिक रेडियो स्टेशन (सीआरएस) हैं. भारत में सामुदायिक रेडियो की यात्रा वर्ष 2002 में उस समय शुरू हुईजब भारत सरकार ने आईआईटी/आईआईएम सहित विभिन्न प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों को सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की स्थापना के लिए लाइसेंस देने की नीति को मंजूरी दी। पहले सामुदायिक रेडियो स्टेशन का उद्घाटन भारत रत्न श्री लालकृष्ण आडवाणी द्वारा फरवरी 2004 को किया गया। 

·  कम्युनिटी रेडियो का उद्देश्य स्थानीय समुदाय को जानकारी और शिक्षा प्रदान करना है। ये छोटे रेडियो स्टेशन स्थानीय मुद्दोंसंस्कृतिपरंपराओंऔर घटनाओं पर आधारित कार्यक्रम प्रसारित करते हैं। देश में 2024 तक सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की संख्या 481 हो गई थी.

·  लोकल कंटेंट पर आधारित रेडियो स्टेशन श्रोताओं से सीधे जुड़ते हैं और उनकी समस्याओं और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम प्रसारित करते हैं। सामुदायिक रेडियो स्वास्थ्यपोषणशिक्षाकृषि आदि से संबंधित मुद्दों पर स्थानीय समुदाय के बीच स्थानीय आवाजों को प्रसारित करने का एक मंच प्रदान करता है।

5. रेडियो और सोशल मीडिया का संयोजन

आजकल रेडियो और सोशल मीडिया के बीच कड़ी साझेदारी देखी जा रही है। देश में आकाशवाणी सहित रेडियो स्टेशन अब सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी मौजूद होते हैंजैसे Youtube,Facebook, Instagram, और Twitter (अब X) पर।

·  लाइव इंटरएक्टिव शोजश्रोता अब लाइव शो के दौरान सोशल मीडिया के माध्यम से सवाल पूछ सकते हैं या कार्यक्रम में भाग ले सकते हैं। यह श्रोताओं को कार्यक्रम से और भी अधिक जुड़ने का मौका देता है।

·  सहयोग और प्रचाररेडियो और सोशल मीडिया के बीच सहयोग से विज्ञापन और प्रचार के नए तरीके पैदा हुए हैं। यह रेडियो चैनल्स को अपने श्रोताओं के साथ अधिक प्रभावी रूप से संवाद करने का अवसर प्रदान करता है।

6. पर्सनलाइज्ड रेडियो एक्सपीरियंस

आधुनिक समय में रेडियो का अनुभव पहले से कहीं अधिक व्यक्तिगत हो गया है। अब श्रोता अपनी पसंद के अनुसार कार्यक्रमों को चुन सकते हैं और अपने हिसाब से सुन सकते हैं। सारेगामा कारवां जैसे रेडियो प्रयोगों ने भी इसकी लोकप्रियता बढाने का काम किया है.

·  कस्टमाइज्ड प्ले लिस्टश्रोता अपनी पसंद का संगीत और कंटेंट चुन सकते हैं। उदाहरण के लिए, Spotify, Apple Music, और Gaana जैसी ऐप्स श्रोताओं को उनके पसंदीदा गानेकलाकारऔर शैलियों के आधार पर प्ले लिस्ट तैयार करने की सुविधा देते हैं।

·  ऑन डिमांड कंटेंटअब श्रोता जब चाहें तब अपने पसंदीदा रेडियो शो और पॉडकास्ट को सुन सकते हैंजिससे रेडियो का अनुभव और भी व्यक्तिगत बन जाता है।

रेडियो की उपयोगिता

रेडियो की उपयोगिता बहुत व्यापक और महत्वपूर्ण है। यह केवल एक मनोरंजन का साधन नहींबल्कि समाजशिक्षासूचना और जागरूकता फैलाने का प्रभावी माध्यम भी है। निम्नलिखित बिंदुओं में रेडियो की उपयोगिता को समझा जा सकता है:

1सूचना का प्रभावी स्रोत

रेडियो का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग सूचना प्रसारण के रूप में होता है। यह एक त्वरित और विश्वसनीय माध्यम है जिसके द्वारा समाचार और समसामयिक घटनाओं के बारे में तुरंत जानकारी प्राप्त होती है। यह विशेष रूप से प्राकृतिक आपदाओंराष्ट्रीय संकटों और महत्वपूर्ण घटनाओं के समय में अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। राजनीतिकसामाजिक और आर्थिक मामलों पर अद्यतन जानकारी प्रदान करता है।

2शिक्षा का साधन

रेडियो शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेषकर दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में जहां इंटरनेट और अन्य डिजिटल माध्यमों तक पहुंच नहीं होतीरेडियो शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है।

·  व्यक्तिगत विकास और करियर मार्गदर्शन जैसे विषयों पर जागरूकता फैलाता है।

·  साक्षरता अभियानों और हेल्थ संबंधी जागरूकता के कार्यक्रमों के लिए रेडियो का उपयोग किया जाता है।

3. मनोरंजन का स्रोत

रेडियो मनोरंजन का एक सस्ता और सुलभ साधन है। यह:

·  संगीत और चर्चित कार्यक्रमों के माध्यम से श्रोताओं को मनोरंजन प्रदान करता है।

·  लाइव शोइंटरव्यूकॉमेडी और कहानी प्रसारण के द्वारा श्रोताओं का मनोरंजन करता है।

4. सामाजिक जागरूकता और संवाद

रेडियो एक महत्वपूर्ण मंच है जिसके द्वारा:

·  समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए जागरूकता फैलाई जाती है। जैसेस्वास्थ्यपर्यावरणऔर महिलाओं के अधिकारों पर कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं।

·  यह स्थानीय समुदायों को एकजुट करने और उनके मुद्दों को उजागर करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनता है।

5. आपातकालीन सेवाएं

आपातकाल के दौरानरेडियो एक तत्काल सूचना स्रोत के रूप में कार्य करता है। प्राकृतिक आपदाओंयुद्धया किसी भी अन्य संकट की स्थिति में रेडियो:

·  प्रभावित क्षेत्रों में शरणार्थियों और नागरिकों को आपातकालीन जानकारी और सहायता प्रदान करता है।

·  खतरे की चेतावनी और सुरक्षित स्थानों की जानकारी देता है।

6. लोकल और क्षेत्रीय संस्कृति का संरक्षण

रेडियो स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृतियों को जीवित रखने का एक प्रभावी तरीका है। यह:

·  स्थानीय भाषा में कार्यक्रम प्रसारित करता हैजिससे क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण होता है।

·  स्थानीय लोक संगीतकलाऔर सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिए संस्कृति को बढ़ावा देता है।

7सस्ता और सुलभ माध्यम

रेडियो अन्य मीडिया के मुकाबले एक सस्ता और सुलभ माध्यम है। यह:

·  कम लागत में अधिक श्रोताओं तक पहुंचने में सक्षम होता है।

·  विभिन्न जगहों और परिस्थितियों में आसानी से सुना जा सकता हैजैसे गाड़ी मेंघर में या खेतों में काम करते समय।

8. प्रचार और विज्ञापन का प्लेटफ़ॉर्म

व्यवसायों के लिए रेडियो एक प्रभावी विज्ञापन माध्यम बन चुका है। यह:

·  स्थानीय उत्पादों और सेवाओं के प्रचार के लिए एक सस्ता और प्रभावी तरीका प्रदान करता है।

·  स्मरणीय और आकर्षक विज्ञापन के द्वारा व्यवसायों की पहुंच बढ़ाने का एक अच्छा साधन बनता है।

आधुनिक समय में रेडियो ने अपनी पारंपरिक सीमाओं को पार करते हुए डिजिटलइंटरनेटऔर स्मार्ट डिवाइस जैसे आधुनिक तकनीकी रूपों में खुद को ढाल लिया है। अब यह न केवल एक मनोरंजन का स्रोत हैबल्कि सूचनाशिक्षाऔर जागरूकता फैलाने का एक अत्यधिक प्रभावी और पहुंच योग्य माध्यम बन चुका है। रेडियो का बदलता रूप समाज में इसके महत्व को और बढ़ाता हैऔर यह भविष्य में और भी नए रूपों में विकसित होता रहेगा।

भारत में रेडियो की विकास यात्रा न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण हैबल्कि इसका सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव भी गहरा रहा है। आज भीरेडियो एक सशक्त और सामर्थ्यवान माध्यम बना हुआ हैजो न केवल शहरोंबल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों के बीच जागरूकता फैलाने का काम कर रहा है। भविष्य में भी रेडियो के तकनीकी विकास और विविधता के साथ यह और भी अधिक प्रभावी बन सकता है।

(यह लेख शोध पत्रिका समागम में भी प्रकाशित हुआ है)

 




कुत्ते की राखी…कीमत सुनकर आप चौंक जाएंगे!

हाल ही में कृति सेनन से जुड़े एक राखी विज्ञापन को लेकर खूब विवाद हुआ। विज्ञापन में कृति के कपड़ों से लेकर उसके कथित सांस्कृतिक संदेश तक पर ब...