गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

"मिज़ाज का हिस्सा बनता स्वच्छता का संकल्प"

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल आज देश में स्वच्छता का एक नया अध्याय लिख रही है। एक समय था जब यह शहर भी अन्य शहरों की तरह कचरे और गंदगी से जूझता था। लेकिन आज यह शहर देश के सबसे स्वच्छ शहरों में शुमार है। कभी जर्दा, परदा के साथ अपनी गर्दा यानि धूल के लिए बदनाम भोपाल आज देश की स्वच्छतम राजधानी है। बीते स्वच्छ सर्वेक्षण में झीलों का शहर भोपाल सबसे स्वच्छ राज्य की राजधानियों में शीर्ष पर है और देश भर के शीर्ष 10 स्वच्छ शहरों में 5वें नंबर पर है।

इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं मसलन:

नागरिकों की जागरूकता: भोपाल के नागरिक अब स्वच्छता को लेकर जागरूक हो गए हैं। वे अपने घरों और आसपास के क्षेत्रों को साफ रखने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

नगर निगम के प्रयास: नगर निगम ने शहर को स्वच्छ बनाने के लिए कई पहल की हैं। इनमें कचरा निस्तारण की बेहतर व्यवस्था, सड़कों की नियमित सफाई, और नागरिकों को जागरूक करने के अभियान शामिल हैं।

स्वच्छ सर्वेक्षण: स्वच्छ सर्वेक्षण ने शहरों के बीच स्वच्छता को लेकर एक प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाया है। भोपाल ने इस प्रतिस्पर्धा में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है।

भोपाल में कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जाता है। शहर में कई कचरा निस्तारण संयंत्र हैं जो कचरे से ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। विगत वर्षों में भोपाल शहर में कचरा संग्रहण और प्रसंस्करण तंत्र बेहतर हुआ है, इस हेतु 719 वाहन शामिल हैं जिनमें 250 वाहन बायो सीएनजी आधारित हैं। इनके अलावा रोड स्वीपिंग हेतु 6 नए मेकेनिकल रोड स्वीपिंग वाहन अपने बेड़े में शामिल किए गए हैं। इसके अलावा भोपाल नगर निगम द्वारा 17 गार्बेज ट्रांसफर स्टेशन, ग्रीन वेस्ट मैनेजमेंट हेतु श्रेडर आदि कचरा प्रसंस्करण हेतु शामिल किए गए हैं। 

प्लास्टिक कचरे के शमन हेतु 5 टन प्रतिदिन का प्लास्टिक रिसायकल प्लांट तैयार किया गया है  जिसमें जिसमें मल्टीलेयर प्लास्टिक को निष्पादित किया जा रहा है , इसी प्रकार संभवतः देश का पहला थर्माकोल रिसायकल प्लांट और 3टन प्रतिदिन क्षमता का रिसायकल प्लांट नारियल अपशिष्ट के समाधान हेतु स्थापित किया गया है। शहर जी जरूरत के अनुसार 50 टन प्रतिदिन क्षमता का रेंडरींग प्लांट भी निगम द्वारा संचालित किया जा रहा है। जिसमें फिश, मीट मार्केट और स्लाटर हाउस से निकला हुआ अपशिष्ट निष्पादित किया जाता है। नगर निगम के इस प्रयास की भारत सरकार द्वारा भी सराहना की गयी है।

इन्हीं सब प्रयासों की वजह से भोपाल की सड़कें, पार्क, कॉलोनियाँ और सार्वजनिक स्थल साफ-सुथरे हैं। शहर में नियमित रूप से सफाई की जाती है और सड़कों पर कचरा फेंकने पर जुर्माना लगाया जाता है।


भोपाल की इस सफलता का राज नागरिकों और सरकार के बीच सहयोग में निहित है। नागरिकों ने स्वच्छता को अपना धर्म बना लिया है और सरकार ने उन्हें हर संभव मदद दी है। भोपाल को स्वच्छ शहर बनाने का सफर अभी भी जारी है। हमें और अधिक प्रयास करने होंगे। हमें सभी को मिलकर काम करना होगा ताकि भोपाल हमेशा स्वच्छ और सुंदर बना रहे जैसे अपने घर और आसपास के क्षेत्र को साफ रखें, कचरा हमेशा डस्टबिन में डालें, प्लास्टिक का उपयोग कम करें, पेड़ जरूर लगाएं और स्वच्छता अभियानों में भाग लें।

भोपाल ने स्वच्छता के क्षेत्र में जो उपलब्धि हासिल की है, वह अन्य शहरों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। भोपाल को स्वच्छता में मिल रही इस सफलता का बहुत श्रेय काफी हद तक भोपाल नगर निगम के प्रयासों को भी जाता है। 2022 में 6वें स्थान से आगे बढ़ते हुए, भोपाल अब 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में 5वां सबसे स्वच्छ शहर बन गया है। भोपाल को 5-स्टार गार्बेज फ्री सिटी रेटिंग भी मिली है, जिससे यह देश की सबसे स्वच्छ राज्य की राजधानी बन गई है।

हाल के वर्षों में भोपाल की उन्नति का श्रेय इसके सर्वोत्तम अभ्यासों, नवाचार और विशिष्टता को दिया जा सकता है। शहर में प्रतिदिन 850 टन कचरा निकलता है और पूरे कचरे का प्रसंस्करण प्रतिदिन किया जाता है। नगर निगम की केन्द्रीय पहल जैसे कचरे का वैज्ञानिक निपटान, कचरे से कंचन बनाने की परियोजनाएं, कचरे का पुनर्चक्रण, सीएनजी से चलने वाले कचरा संग्रह वाहन, रिड्यूस, रीयूज रीसाइकिल-3-आर पर जोर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कचरा संवेदनशील बिंदुओं को हटाकर शहर के सौंदर्य आकर्षण को बढ़ाया गया है। कचरे को अब सीएंडडी, बायो-सीएनजी और चारकोल संयंत्रों के माध्यम से कुशलतापूर्वक एकत्रित और संसाधित किया जाता है।


इस पूरी प्रक्रिया में मध्य प्रदेश के नागरिकों ने जिस उत्साह के साथ भागीदारी की है, वह देश के सामने एक उदाहरण बनकर उभरा है। प्रदेश के इंदौर शहर ने 7 वर्षों में स्वच्छ सर्वेक्षण में लगातार प्रथम स्थान प्राप्त कर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। इसी कारण इंदौर को गोल्ड सिटी क्लब में शामिल किया गया है। आज इंदौर देश का ऐसा पहला शहर है जहां लोग अपने घर के कूड़े को दो नहीं बल्कि छह भागों में अलग-अलग करते हैं जिससे इसकी निष्पादन लागत में काफी कमी आई है। उनका यह प्रयास वेस्ट टू वेल्थ की परिकल्पना को साकार करता है। इन प्रयासों के चलते ही इंदौर आज डस्ट-फ्री एवं बिन-फ्री शहर बन गया है। इन्हीं मानकों के आधार पर गारबेज फ्री सिटी रेटिंग में भी इंदौर सेवन-स्टार शहर घोषित किया गया है। इंदौर देश का पहला वाटर-प्लस शहर भी बना है। वॉटर-प्लस श्रेणी के अंतर्गत घरों से निकलने वाले गंदे पानी को नदी या तालाबों में जाने से पूर्व ट्रीट किया जाता है जिससे पानी के अन्य स्रोत जल प्रदूषण से मुक्त होते हैं। साथ ही, इस पानी का पुनः उपयोग किया जाता है। इंदौर ने जन भागीदारी के माध्यम से अपने शहर की जीवन-रेखा कही जाने वाली कान्ह और सरस्वती नदियों को नया जीवन प्रदान किया है।


दरअसल, स्वच्छ भारत मिशन शहरी सरकार का मात्र एक कार्यक्रम नहीं बल्कि एक जन आंदोलन है। स्वच्छता की दिशा में प्रदेश के नागरिक और अन्य हितधारकों के सामूहिक प्रयासों से मध्य प्रदेश स्वच्छ, स्वस्थ व समृद्ध प्रदेश के रूप में उभरा है। मध्य प्रदेश में स्वच्छता अभियान के तहत कई काम किए जा रहे हैं। स्वच्छता अभियान के कारण प्रदेश में स्वच्छता के स्तर में सुधार आया है।


आंकड़ों पर नजर दौडाएं तो प्रदेश के नगरीय क्षेत्रों में 7082 से अधिक मोटराइज्ड वाहनों से कचरा संग्रहण व्यवस्था का संचालन किया जा रहा है। इनमें सूखे, गीले, घरेलू हानिकारक और सेनेटरी अपशिष्ट को अलग-अलग रखने के लिये कम्पार्टमेंट बनाये गये हैं। जीपीएस और पीए सिस्टम से वाहनों की निगरानी और स्वच्छता विषयों का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। गीले कचरे के प्रसंस्करण और निष्पादन के लिये स्पॉट कंपोस्टिंग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रदेश में 850 से अधिक ठोस अपशिष्ट उत्पादकों द्वारा स्पॉट कंपोस्टिंग की जा रही है। 


प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर देश में शुरू हुए स्वच्छता अभियान में मध्यप्रदेश अनेक कीर्तिमान स्थापित कर चुका है। प्रधानमंत्री की मंशानुरूप प्रदेशवासियों ने पूरे उत्साह और जन-सहयोग से स्वच्छता के क्षेत्र में नये आयाम भी स्थापित किये हैं। इस वर्ष अभियान की थीम “स्वभाव स्वच्छता-संस्कार स्वच्छता’’ रखी गयी । स्वच्छता ही सेवा अभियान में अधिक से अधिक जन-भागीदारी और स्थानीय निकायों की भागीदारी पर जोर दिया गया । मध्यप्रदेश स्वच्छ भारत मिशन में कई मामलों में लगातार नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है । प्रदेश के सभी शहरों ने पिछले 10 वर्षों के दौरान अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयास किये हैं। जनता के सहयोग से स्वच्छ भारत मिशन अब यहाँ जन-आंदोलन का रूप ले चुका है।

शुक्रवार, 17 जनवरी 2025

सर्दियों की धूप...।

 सर्दियों की धूप...।

सर्दियों की धूप

होती है कुछ अलग सी

बिल्कुल मां बाप के आशीष सी

कम मांगों

तो ज्यादा मिल जाती है।


मुट्ठी भर धूप की 

तमन्ना की तो

अंजुरी भर गयी

और भरनी चाही अँजुरी

तो पूरे आँचल में समा गयी।


सर्दियों की धूप

होती है कुछ अलग सी

बिल्कुल मां बाप के आशीष सी।


गर रूठ गयी धूप 

समा गई बादलों के आगोश में

फिर तरसाती है

तड़फाती है

सर्दियों की धूप

बिल्कुल मां बाप के आशीष सी।


मां बाप रुठे

तो रूठ जाती है किस्मत

गर उठ गया आशीष का साया

तो थम सा जाता है

दुआओं का काफ़िला।


न बचता है मुट्ठी भर

न अँजुरी भर

और न ही आँचल भर

आशीष

बिल्कुल सर्दियों की धूप

की तरह


ज़रूरी है सहेजना

धूप भी, आशीष भी

ताकि 

जब न रहें दोनों

फिर भी

महसूस हो गरमाहट

धूप की, आशीष की

दिन भर-जीवन भर।।


सर्दियों की धूप...।

देशी मिठाइयों में विदेशी मेहमान


ये कुनाफा है..हमारे देशी मिठाई परिवार में विदेशी मेहमान। कुछ लोग इसे कुनाफ़े, कनाफ़े, कोनाफी, कुनाफ़्ता, कुनेफे और किनाफा जैसे तमाम नामों से जानते हैं। ये तुर्किए (पहले टर्की) से आकर हमारे मिठाई परिवार में घुसपैठ कर रहा है। खानपान की अरबी किताबों की कहानियों में बताया गया है कि उस दौर में और खासकर रमजान में बादशाह/अमीर/खलीफा नित नए मीठे की मांग करते थे और उनके खानसामा मिठाइयों में प्रयोग करते रहते थे और इसी प्रयोग में कुनाफा का जन्म हो गया। वैसे, तुर्की की मिठाई के नाम पर चौंकने वालों को शायद पता नहीं होगा कि हमारे शहर शहर मिलने वाली और घर घर में खाई जाने वाली रसीली और लज़ीज़ जलेबी भी यहीं से आई है। 

खैर, कुनाफा एक पारंपरिक अरब मिठाई है और पूरे अरब जगत में लोकप्रिय है। इसे अक्सर विशेष अवसरों और छुट्टियों में खाया और खिलाया जाता है। पिछले कुछ समय से भारत में भी कुनाफा के मुरीद तेजी से बढ़े हैं और अब दिल्ली मुंबई ही नहीं भोपाल इंदौर जैसे शहरों में भी यह उपलब्ध है। वैसे, भारत में आकर इसने भी पिज़्ज़ा की तरह रूप और स्वाद बदलकर भारतीय चोला पहन लिया है जैसे पिज़्ज़ा ने पनीर और कबाब के साथ साथ अब कुल्हड़ पिज़्ज़ा तक का अवतार ले लिया है। इसी तरह, अब कुनाफा भी चॉकलेट,कोकोनट,ब्लू बैरी से लेकर मैंगो तक के विविध स्वाद में मिलने लगा है।

कुनाफा खाते वक्त सबसे पहले आप कुरकुरी ‘कटेफी डो’ से रूबरू होते हैं, फिर क्रीम, मीठी सी चाशनी और ड्राई फ्रूट्स आपकी जीभ पर धीरे धीरे उतरकर स्वाद का रंग जमाते हैं। लेकिन यदि देशी अंदाज में समझाया जाए तो यह मलाई,चाशनी और काजू, किशमिस,पिस्ता,बादाम के साथ सिवइयों  का मिश्रण है। बस,इसे परोसने का अंदाज़ अलग है और वहीं कुनाफा से मुनाफा बनाने में सहायक है। मौका मिले, तो स्वाद ले ही लीजिए क्योंकि ज्यादा महंगा नहीं है…पॉकेट फ्रैंडली भी है कुनाफा।

रविवार, 12 जनवरी 2025

ये नहीं प्यारे कोई मामूली अंडा..!!

 

‘आओ सिखाऊँ तुम्हें, अंडे का फंडा इसमें छिपा है जीवन का फलसफ़ा अंडे में अंडा,फंडे में फंडा…।’ फिल्म ‘जोड़ी नंबर-एक’ का यह गाना भले ही मनोरंजन के लिए हो लेकिन अंडों में वाकई जीवन का फलसफा छिपा होता है और यदि वह अंडा ‘संडे हो या मंडे, रोज खाएं अंडे’ विज्ञापन वाला या हमारे राज्य की शान ‘कड़कनाथ’ का न होकर दुनिया के सबसे बड़े और शायद सबसे खतरनाक डायनासोर का हो तो सारा स्वाद धरा रह जाएगा।  डायनासोर तो अब इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनके अंडे जरूर इतिहास से वर्तमान को जोड़ने की अहम कड़ी हैं। अब करोड़ों साल पहले पाए जाने वाले डायनासोर के अंडे कोई समोसा या ब्रेड पकौड़ा तो हैं नहीं कि कहीं भी मिल जाएंगे। सबसे पहले तो इन अंडों का मिलना और फिर इतने साल बाद देखने का अवसर मिलना वाकई प्रकृति और विज्ञान के समन्वय के चमत्कार से कम नहीं है। वैसे, व्यंग्यात्मक अंदाज में  कहें तो असल डायनासोर भले ही नहीं बचे लेकिन इंसानों के भेष में डायनासोर लगातार बढ़ रहे हैं। इनमें से कोई अरबों रुपए खा जाता है तो कोई सोना निगलने-उगलने लगता है। खैर, मूल विषय पर लौटते हैं…हाल ही भोपाल में अंतरराष्ट्रीय वन मेले में विज्ञान ने प्रकृति की गोद में बैठकर इन अंडों का फंडा दिखा दिया। यहां डायनासोर की एक प्रजाति टाइटेनोसोर के ऐसे अंडे प्रदर्शित किए गए थे जो 650 लाख वर्ष पुराने हैं और अब अनमोल हैं। हम सभी जानते हैं कि डायनासोर, पृथ्वी पर लाखों साल पहले राज करने वाले विशालकाय जीव थे और आज तक हमेशा से वैज्ञानिकों और आम लोगों की जिज्ञासा का विषय हैं। जुरासिक पार्क, द लैंड ऑफ द लॉस्ट, डायनासोर आइसलैंड, गॉडजिला, वॉकिंग विद डायनासोर, द वैली ऑफ ग्वांगी, गोर्गो, थिओडोर रेक्स, टैमी और टी-रेक्स जैसी फिल्मों ने इन शक्तिशाली जीवों के बारे में जिज्ञासा और खौफ दोनों बढ़ाने का काम किया है।  यही वजह है कि इनके बारे में जानने के लिए वैज्ञानिक लगातार नए-नए तरीके खोज रहे हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण तरीका है डायनासोर के अंडों का अध्ययन। वैज्ञानिकों का कहना है कि डायनासोर के अंडे हमें इन प्राचीन जीवों के जीवन के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। इनसे हमें डायनासोर के आकार, आहार, प्रजनन और विकास के बारे में पता चलता है। डायनासोर के अंडे अब आमतौर पर जीवाश्म के रूप में पाए जाते हैं। जीवाश्म वे अवशेष होते हैं जो लाखों साल पहले जीवों के मरने के बाद बनते हैं। डायनासोर के अंडे के जीवाश्म आमतौर पर चट्टानों में दबे हुए पाए जाते हैं। डायनासोर के अंडे हमें डायनासोर के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। इनसे हमें डायनासोर के विकास और विलुप्त होने के कारणों के बारे में समझने में मदद मिलती है। इसके अलावा, डायनासोर के अंडे हमें पृथ्वी के इतिहास के बारे में भी बताते हैं। बताया जाता है कि दुनिया का सबसे बड़ा डायनासोर का अंडा चीन में मिला था। हमारे लिए सबसे बड़ी बात यह है कि मध्य प्रदेश भारत का एक ऐसा राज्य है जहां बड़ी संख्या में डायनासोर के अंडे मिले हैं। प्रदेश में इन अंडों की खोज वैज्ञानिकों के लिए बेहद रोमांचक है क्योंकि ये अंडे हमें डायनासोर के जीवन और मध्य प्रदेश में उनके अस्तित्व के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि मध्य प्रदेश की भौगोलिक संरचना और जलवायु लाखों साल पहले डायनासोर के रहने के लिए अनुकूल थी। इसी कारण यहां डायनासोर के अंडे, जीवाश्म और अन्य अवशेष बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।  मध्य प्रदेश के कई जिलों में डायनासोर के अंडे मिले हैं, जिनमें धार, झाबुआ और रतलाम प्रमुख हैं। एक और मजेदार तथ्य यह भी है कि मध्य प्रदेश के कुछ गांवों में तो लोग डायनासोर के अंडों को देवता मानकर पूजा करते थे। जब वैज्ञानिकों ने इन अंडों की जांच की तो पता चला कि ये वास्तव में डायनासोर के अंडे हैं।  वैज्ञानिकों का मानना है कि मध्य प्रदेश में अभी भी बड़ी मात्रा में डायनासोर के अंडे और जीवाश्म मिल सकते हैं और इनसे हमें डायनासोरों के बारे में और अधिक जानकारी मिल सकती है। आप भी देखिए, कहीं आपके आसपास भी तो कहीं डायनासोर का कोई अंडा भगवान बनकर पूजा तो नहीं जा रहा..!! 

चालीस साल का कलंक है, मिटने में समय तो लगेगा

जैसे-जैसे कंटेनरों का काफिला धीरे-धीरे भोपाल की सरहद को पार करते हुए आगे बढ़ रहा था वैसे-वैसे भोपाल के लोगों की जान में जान आ रही थी। आखिर, दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंककर पीता है और जब बात हजारों-लाखों परिवारों की तबाही के दर्द की हो तो अतिरिक्त सावधानी तो बनती ही है। इसलिए प्रशासन ने भी सुरक्षा,सतर्कता,सजगता, सावधानी और समझाइश में अधिकतम मानकों का पालन कर अपनी ओर से कोई कमी नहीं रहने दी।  हम बात कर रहे हैं, भोपाल में दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना की जन्मदाता यूनियन कार्बाइड फैक्टरी में जमा अवशिष्ट या सरल भाषा में कहें तो जहरीले कचरे को यहां से हटाने की । हो सकता है कि दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में कचरे के पहाड़ों के साए में रह रहे लोगों के लिए यह सामान्य कचरा प्रबंधन की कवायद हो या फिर देशव्यापी स्वच्छता मुहिम का एक हिस्सा, लेकिन भोपाल के लोगों के लिए यह 40 साल के डर के बाद चिर परिचित दुश्मन से मिली मुक्ति है, आसन्न मंडराते खौफ से छुटकारा है, नासूर बन गए घाव की मरहम पट्टी है और देश की स्वच्छतम राजधानी के माथे पर लगा कलंक कुछ कम करने जैसी उपलब्धि है।  यूनियन कार्बाइड से निकले 12 कंटेनर जब 37 किमी प्रति घंटे की धीमी रफ्तार से 250 किमी का मामूली सा फासला घंटों में तय कर रहे थे तब वे बदलाव के साथ साथ दशकों के संघर्ष, हजारों लोगों की मौत के ग़म,लाखों लोगों की बीमार जिंदगी और तिल-तिलकर मरते लोगों को भविष्य की किसी आशंका से मुक्ति के रास्ते को पाट रहे थे। हजारों लोगों की जिंदगियां लीलने वाला यह कारखाना 1984 से ही अपने इस जहरीले कचरे के कारण पूरे शहर को सदमे में रखे था। यूनियन कार्बाइड परिसर में कभी कभार दुर्घटनावश लगी मामूली सी आग भी लोगों में सिहरन और घातक दिसंबर की भयावह यादें ताजा कर देती थी।  और, ऐसा भी नहीं है कि भोपाल को अपने इस कलंक से आसानी से छुटकारा मिल गया है। यह करीब 40 साल चली लंबी लड़ाई का नतीजा है। यह आम लोगों की पीढ़ियों का संघर्ष,अदालत का दखल, सरकारों का समन्वय और विशेषज्ञों की सक्रियता के बाद नसीब हुआ है। अगस्त 2004 में आलोक प्रताप सिंह की मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में लगाई गई याचिका ने उम्मीदों को पंख लगाए थे और फिर यह पंख व्यक्तिगत गुहार से आगे बढ़कर सामूहिक अपील के जरिए मजबूत होते गए । हालांकि,अलग अलग स्तर पर समितियां बनती बिगड़ती रहीं, स्थानीय लोगों के विरोध के कारण कचरा नष्ट करने के स्थान बदलते रहे, प्रायोगिक निपटान पर केंद्रित शोध अनुसंधान के पन्ने पर पन्ने जमा होते रहे और अंततः जब सत्ता,व्यवस्था और न्यायपालिका का संगम हुआ तो इसकी अंतिम तिथि भी मुकर्रर हो गई।  आंकड़ों के लिहाज़ से भले ही 12 कंटेनर कम लगते हों लेकिन इसके पीछे लगे मानसिक और शारीरिक श्रम,मशीनरी और संसाधनों के विश्लेषण से ही असल में पता चलता है कि यह कितना ‘हरक्यूलियन टास्क’ था। सबसे पहले तो इसे भोपाल से इंदौर के पास पीथमपुर तक ले जाने के लिए करीब 250 किमी का सुरक्षित रास्ता बनाना कम आसान नहीं था। इस ‘ग्रीन कोरिडोर’ के लिए पूरे रास्ते पर चाक चौबंद व्यवस्था करनी पड़ी। किसी वीवीआईपी जैसी हैसियत रखने वाले इन 12 कंटेनरों के आगे पीछे पुलिस की गाड़ियां चली। इसके अलावा, गैस राहत विभाग,एंबुलेंस,फायर ब्रिगेड,प्रदूषण महकमे को मिलाकर 25 वाहनों का काफिला तैयार हुआ । कंटेनर की नान स्टॉप यात्रा के लिए तमाम सुरक्षा इंतजाम के साथ साथ दो दो ड्राइवर तैनात किए गए जबकि आम तौर पर इतना सफर एक ड्राइवर एक दिन में दो बार तक कर लेता है। गैस त्रासदी के कारण काले धब्बे की तरह दर्ज 2 (तब दिसंबर 1984) तारीख को शायद खासतौर पर इस काम के लिए चुना गया था और रात 9 बजे यह दुनिया का सबसे संवेदनशील काफिला अपनी मुहिम पर रवाना हुआ। इस कचरे को पैक करने में 150 से ज्यादा मजदूरों ने तीन दिन लगातार 15 शिफ्ट में काम किया।   प्रशासन इस मामले में इतना संवेदनशील था कि इस काम की निगरानी के लिए तमाम सरकारी-गैर सरकारी महकमों के करीब एक हजार छोटे-बड़े नुमाइंदे मौजूद थे और इनमें सौ से ज़्यादा तो विशेषज्ञ थे। इस नासूर से छुटकारे के लिए सरकार ने करीब सवा सौ करोड़ रुपए नियत किए हैं लेकिन जानकारों के अनुसार यह कचरा पूरी तरह से जलने में दस से बारह महीने लग जाएंगे। इसके पहले,इसे किस्तों में जलाया जाएगा और बार बार हवा,पानी,जमीन और वातावरण का परीक्षण किया जाएगा ताकि लेश मात्र भी शंका न रहे। इतना ही नहीं, यहां से निकलने वाली राख तक की कई बार जांच की जाएगी और तमाम चिंताओं/शंकाओं/आशंकाओं को निर्मूल साबित कर जहरीले कचरे का नाम-ओ-निशान मिटाया जाएगा और तब जाकर भोपाल,इंदौर या पीथमपुर ही नहीं प्रदेश के लोगों को सम्पूर्ण चैन मिल पाएगा। 

एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग..!!

हम इंसान भी विचित्र होते हैं। एक चेहरे में कई चेहरे छुपाकर रखते हैं। नए साल में नए विचार और नए संकल्प लेना भी कुछ इसी तरह का मामला होता है । हाल ही में इंदौर के एक नव निर्मित मॉल के प्ले जोन में बने ऐसे कक्ष में जाने का मौका मिला जिसमें मिरर के जरिए एक ही तस्वीर की कई इमेज रची जा रही थीं,तभी यह ख्याल आया कि वास्तविक जीवन में भी हमें कितनी भूमिकाओं का निर्वाह करना पड़ता है और इसके लिए हमें एक चेहरे में कितने चेहरे लगाने पड़ते हैं। फिल्म दाग़ में साहिर लुधियानवी भी कुछ इसी तरह की बात कह चुके हैं। उन्होंने लिखा है:

‘एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग,

जब चाहें बना ले अपना किसी को,

जब चाहें अपनों को भी, 

बेगाना बना देते हैं लोग।’

जैसा कि हम जानते हैं कि एक चेहरे में कई चेहरे छुपे होते हैं…का मतलब है कि एक व्यक्ति का बाहरी रूप या व्यक्तित्व उसके अंदर छिपे कई पहलुओं को पूरी तरह से नहीं दर्शाता। हर इंसान के अंदर एक से अधिक रूप, विचार, भावनाएँ और अनुभव होते हैं, जो समय, स्थिति और परिवेश के साथ बदलते रहते हैं। इसका मतलब यह है कि एक व्यक्ति केवल अपनी बाहरी पहचान के आधार पर नहीं पहचाना जा सकता, बल्कि उसके अंदर कई तरह की छुपी हुई सच्चाइयां और पहलू हो सकते हैं। मसलन, इंसान का व्यक्तित्व केवल एक ही रूप में नहीं होता। उसकी सोच, आदतें, भावना और प्रतिक्रियाएँ विभिन्न परिस्थितियों में बदल सकती हैं। एक व्यक्ति अपने परिवार के सामने एक अलग रूप दिखा सकता है, जबकि कार्यस्थल पर या समाज में वह कुछ और हो सकता है। इस तरह, एक चेहरे में कई चेहरे का मतलब है कि हर व्यक्ति के भीतर कई परतें होती हैं, जो समय और संदर्भ के अनुसार प्रकट होती हैं।

व्यक्ति के भीतर खुशियाँ, दुख, क्रोध, घृणा, प्रेम, और अन्य भावनाएँ एक साथ हो सकती हैं। किसी के एक ही चेहरे पर ये सभी भावनाएँ परिलक्षित हो सकती हैं, जो स्थिति के आधार पर बदलती रहती हैं। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति अपनी बाहरी मुस्कान के साथ भी अंदर से दुखी हो सकता है।

एक व्यक्ति के अनेक चेहरे होने का मतलब है कि हम सभी अलग-अलग स्थितियों और लोगों के साथ अलग-अलग तरह से व्यवहार करते हैं। ये हमारे अनुभवों, भावनाओं और सोचने के तरीके पर निर्भर करता है। जैसे घर पर हम अपने परिवार के साथ आरामदायक और सहज होते हैं लेकिन काम पर हम अधिक पेशेवर और गंभीर हो जाते हैं। वहीं,दोस्तों के साथ हम मज़ाकिया और हल्के-फुल्के होते हैं। तो अजनबियों के साथ हम थोड़े संकोची या सावधान रहते हैं।

कई बार सामाजिक अपेक्षाएं हमें व्यवहार बदलने के लिए मजबूर कर देती हैं।  समाज हमसे क्या उम्मीद करता है, इस आधार पर अपना व्यवहार बदलते हैं। कई बार अलग-अलग परिस्थितियों में हम अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया करते हैं।

कई बार, व्यक्ति समाज की अपेक्षाओं और स्वार्थ के कारण अपने असली व्यक्तित्व को छुपाता है। ऐसे में उसका मुखौटा उसकी वास्तविक पहचान से अलग होता है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को अपने सामाजिक रुतबे या प्रतिष्ठा के कारण एक आदर्श और संतुलित व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करना पड़ता है, जबकि वह असल में जटिल और भीतर से अलग विचारों से भरा हो सकता है।

एक व्यक्ति के रिश्ते भी उसके चेहरे के विभिन्न रूपों को दर्शाते हैं। किसी के साथ दोस्ती में एक रूप होता है, तो माता-पिता या ससुराल के साथ दूसरा रूप। किसी के साथ प्रेम संबंध में एक रूप दिख सकता है, जबकि प्रोफेशनल लाइफ में वह व्यक्ति कुछ और तरीके से व्यवहार करता है।

कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि इंसान को केवल उसकी बाहरी पहचान से नहीं आंकना चाहिए। हर व्यक्ति के अंदर अनेक पहलू होते हैं, और उसका असली रूप उसकी परिस्थितियों, विचारों और अनुभवों के आधार पर बदल सकता है। इसलिए, किसी व्यक्ति को समझने के लिए उसके भीतर के कई चेहरों को देखना और समझना जरूरी है।







चलो राम के धाम अयोध्या, राम बुलाते है..!!

अयोध्या में भगवान राम के भव्य और दिव्य मंदिर के लोकार्पण का 1 साल पूरा होने को है। बीते साल 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मंदिर का लोकार्पण किया था और सैकड़ो साल बाद रामलला अपने घर में ससम्मान प्रतिष्ठित हुए थे। हालांकि, मंदिर का निर्माण अभी पूरा नहीं हो पाया है और कई काम अभी बाकी है लेकिन प्राथमिक तौर पर जो मंदिर की जो भव्यता, वास्तुशिल्प और सुंदरता दिखाई पड़ रही है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब यह मंदिर पूरी तरह से निर्मित हो जाएगा तो शायद इसकी गिनती दुनिया के गिने-चुने मंदिरों में होगी। यहां रामलला के साथ उनके परम भक्त पवन पुत्र हनुमान और सप्त ऋषियों सहित भारतीय पुरातन संस्कृति की पहचान रहे विभिन्न प्रतीकों को कलात्मक रूप में देखने का अवसर मिलेगा। टेंट में मौजूद रहे रामलला और अब मंदिर में विराजमान भगवान श्री राम के इस बदलाव के बीच अयोध्या पूरी तरह से बदल गई है और लगातार संवर रही है। अब अयोध्या अविकसित सा ग्रामीण अंचल न रहकर भगवान राम की भव्यतम राजधानी में बदल रही है। इस लेख के लेखक को पहले और बाद की दोनों ही अयोध्या को करीब से देखने का सौभाग्य मिला है। यही नहीं, मंदिर के लोकार्पण पर संभवतः देश की पहली किताब ‘अयोध्या 22 जनवरी’ का लेखन भी किया है ।


सरहद पर लगी ककंटीले तारों की घनी बाड़, जगह जगह तलाशी लेते चाक चौबंद सुरक्षाकर्मी और कई किलोमीटर तक पैदल चलने के बाद नसीब होने वाले राम लला के दर्शन का दौर जिन लोगों ने देखा है, उन्हें अब शायद अयोध्या पहचान में न आए। आपको याद होगा तब इतनी परेशानी उठाने के बाद रामलला के दर्शन के लिए एक छोटी सी खिड़की से झांकना पड़ता था। तब रामलला एक मामूली से चबूतरे पर टेंट के नीचे विराजमान थे और इतने कष्ट के बाद भगवान के ये दर्शन मन को द्रवित कर देते थे।  अब स्थिति बदल गई है। अयोध्या में  राजा राम विराजमान और वे पूरे सम्मान के साथ अपनी वैभवशाली राजधानी में श्रद्धालुओं को दर्शन रहे हैं। अयोध्या में प्रवेश करते ही आपको इस बदलाव का एहसास होने लगता है। अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन पर बना गिलहरी का स्मारक आपका स्वागत करता है। वहीं, स्टेशन पर बना हवाई अड्डे जैसा विशाल कॉनकोर्स, कई तरह के खाने-पीने के लजीज अड्डे, रुकने की तमाम व्यवस्थाएं और मंदिर की शक्ल में तैयार हुआ अयोध्या धाम स्टेशन आपका पलक पांवड़े बिछाकर आपका स्वागत करता है। कुछ यही स्थिति यहां के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की है। स्टेशन से रामपथ होते हुए जैसे ही हम भगवान श्रीराम के नवीनतम मंदिर की ओर बढ़ते हैं तो सड़क के दोनों और एक ही आकार प्रकार की नेम प्लेट, मकान के एक समान रंग और हर मकान के सामने मंदिर की तरह बनी डिजाइन बरबस ही अपनी ओर आपका ध्यान खींचते है । दरअसल, दुनिया भर से आने वाले भक्तों के मन में श्रद्धा का भाव जगाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने रामपथ को खास तौर पर तैयार किया है। यहां आते ही आपको राम मंदिर की दिव्यता और भव्यता का एहसास होने लगता है। रामपथ ही क्यों मंदिर को जोड़ने वाले तमाम पथ, इसी अंदाज में सजाए और संवारे जा रहे हैं । मसलन,एयरपोर्ट से धर्मपथ के जरिए रामपथ तक पहुंचते हुए भी आपको इसी तरह का एहसास होता है। धर्मपथ पर लगे सूर्य स्तंभ सूर्यवंशी शासकों की इस नगरी की पहचान से आपको रूबरू कराते हैं। वही धर्मपथ और रामपथ के बीचो-बीच तैयार लता मंगेशकर चौक अपने सौंदर्य से आपका ध्यान आकर्षित करता है। यहां स्थापित आकर्षक वीणा सभी का मन मोह लेती है।  खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां फोटो लेने से अपने आप को नहीं रोक पाए थे । इसी चौराहे से जब आप पवित्र सरयू नदी की ओर बढ़ते हैं तो सरयू के शानदार नवनिर्मित घाट पर आप स्नान करने और दीपदान करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। मां सरयू की आरती के बाद कल कल बहता सरयू नदी का पवित्र, स्वच्छ और पारदर्शी जल का आचमन लेकर आप प्रभु श्री राम के दर्शन के लिए आगे बढ़ सकते हैं।

प्रभु श्री राम के मंदिर के पास पहुंचते ही आपको अपने आप ही आत्मिक शांति का अनुभव होने लगता है। यहां जगह-जगह खड़े कार्यकर्ता राम राम कहकर आपका स्वागत करते हैं और पूरा परिवेश एक खास तरह की सुगंध से आपके मन को सराबोर कर देता है। पूरे मंदिर परिसर में सुबह की आरती से लेकर शाम को शयन आरती तक महकाने वाली ये खुशबू खास प्रकार की अगरबत्तियों की है। जिन्हें यहां प्रतिदिन लगाया जाता है। करीब साढे 5 फीट ऊंची यह अगरबत्तियां दिनभर मंदिर को अपनी दिव्य सुगंध से महकाती रहती है। सुव्यवस्थित लाइन से होते हुए आप पहले अपने जूते उतारते हैं और फिर मोबाइल या इसी तरह की अन्य सामग्री जमा करते हैं और उसके बाद आप रामलला के दर्शन करने के लिए मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। यदि आप अयोध्या जा रहे हैं तो इस बात का खास ध्यान रखें कि मंदिर में किसी भी तरह की सामग्री ले जाना माना है। यहां तक की प्रसाद, फूलमाला,मोबाइल, डिजिटल घड़ी, पुस्तक या और भी कोई सामग्री पूरी तरह प्रतिबंधित है। आप यदि मंदिर में कुछ दान करना चाहते हैं तो मुख्य द्वार पर बने संस्थान के कार्यालय में जाकर जमा कर सकते हैं और वह सामग्री रामलला के चरणों तक पहुंच जाती है । इसके लिए बाकायदा आपको रसीद भी दी जाती है इसलिए भगवान के दर्शन करने के लिए खाली हाथ ही जाए। मंदिर में सबसे अच्छा इंतजाम बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए है। यहां मंदिर प्रबंधन की ओर से व्हीलचेयर उपलब्ध कराई गई है जो पूरी तरह से निशुल्क है। हां, यदि आप किसी सहयोगी को साथ ले जाना चाहते हैं तो व्हीलचेयर चलाने के एवज में उसे ₹150 का भुगतान करना पड़ता है। यह एक तरह से बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने का तरीका है। फिलहाल मंदिर प्रबंधन ने 100 व्हीलचेयर और इतने ही वॉलिंटियर तैनात किए हैं जो बुजुर्गों को आराम और सुविधा के साथ रामलला के दर्शन करा कर मंदिर प्रबंधन के कार्यालय तक वापस छोड़ देते हैं। इसी तरह पूरी अयोध्या नगरी में जगह-जगह तैनात युवक व्हीलचेयर के साथ युवक बुजुर्गों और असहाय लोगों को इस पवित्र नगरी के आसानी से दर्शन करने में सहायक बनते हैं वे मामूली सा शुल्क लेकर हनुमानगढ़ से लेकर जानकी महल तक और दशरथ महल से लेकर आपके ठहरने के स्थान तक पहुंचने का दायित्व निभाते हैं ।


जैसे ही आप नागर शैली में बना रहे रामलला के भव्य मंदिर में प्रवेश करते हैं आप अचंभित हो जाते हैं । यहां एक-एक स्तंभ पर की गई बारीक कारीगरी, आकर्षक गुंबद और पूरे मंदिर परिसर में उकेरी गई कलाकृतियां एक अलग ही एहसास कराती है। रामलला की बाल रूप वाली प्रतिमा ऐसी मनमोहक है जैसे आपसे संवाद कर रही है और अपनी मन मोहिनी मुस्कुराहट से आपके जीवन के कष्ट हर रही है। मंदिर में दर्शन के बाद हर श्रद्धालु को निशुल्क प्रसाद भी दिया जाता है । रामलला के दर्शन के बाद आप अयोध्या में हनुमान गढ़ी और जानकी महल सहित अन्य धार्मिक स्थलों का भ्रमण कर सकते हैं। हालांकि ज्यादातर स्थान जन्मभूमि मंदिर के आसपास ही है इसलिए इन स्थानों तक जाने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती।


 अयोध्या में रुकने के लिए भी अब पहले से बहुत बेहतर व्यवस्थाएं हैं। नए-नए होटल और धर्मशालाएं पहले ही श्रद्धालुओं की मदद के लिए तत्पर है, वही घर-घर में बना रहे होम स्टे भी अब आगंतुकों का खास ख्याल रख रहे हैं। आप अपने बजट में यहां सुविधाजनक रुकने का ठिकाना तलाश सकते हैं । मंदिर के बिल्कुल सामने बनी बिडला धर्मशाला भी किसी मायने में कम नहीं है। अयोध्या में रुकने के साथ-साथ खाने पीने के सस्ते और अच्छे ठिकानों की भी कमी नहीं है । खास तौर पर रामपथ के दोनों और बड़ी संख्या में छोटे-बड़े रेस्टोरेंट है जो अपने देसी स्वाद के साथ श्रद्धालुओं की पेट पूजा करते हैं। 


कुल मिलाकर अयोध्या अब वाकई में भगवान राम का धाम बन गई है। आने वाले कुछ समय में जब मंदिर का निर्माण पूरा हो जाएगा और यह अपने पूरे भव्य और दिव्य आकार में दिखने लगेगा तब यहां की छटा और आभा अलग ही होगी ।  जन्मभूमि मंदिर परिसर में सप्त ऋषियों की प्रतिमाओं को भी स्थापित किया जा रहा है । इसके अलावा उपवन और छोटे तालाब भी बनाए जा रहे हैं। तो देर किस बात की है उठाइए अपना बैग और निकल पड़िए भगवान राम के दर्शन के लिए। एक लोकप्रिय भजन में कहा भी गया है:

चलो राम के धाम अयोध्या

राम बुलाते है,

सज गई नगरी राघव की

हम खबर सुनाते हैं।

अरे चलो राम के धाम अयोध्या

राम बुलाते है।।

 


मंगलवार, 10 दिसंबर 2024

लू से भी बचिए और लू उतारने से भी..!!


आमतौर पर परस्पर बोलचाल में लू या लपट से जुड़े एक मुहावरे का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है। यह मुहावरा है ‘लू उतारना’। कहीं भी, विवाद बढ़ने पर यह कहा जाता है कि हम ‘दो मिनट में तुम्हारी लू उतार’ देंगे। इस मुहावरे में लू से आशय निश्चित तौर पर घमंड उतारने या बेइज्जती करने से है, लेकिन तकनीकी तौर पर देखें तो यह मुहावरा भी लू से जुड़ी गर्मी की वजह से ही रचा गया होगा । दिमाग पर गर्मी चढ़ना भी एक तरह से लू लगने जैसा ही  है । हम सब जानते हैं कि गर्मी के दिनों में लू किस हद तक खतरनाक होती है। अब आपके दिमाग में यह सवाल जरूर आ सकता है कि विदा लेते मानसून और ठंडक के आगमन के बीच लू का क्या काम? लू, बेमौसम बरसात की तरह अभी कैसे टपक पड़ी तो इसकी जरूरत इसलिए पड़ी है क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार ने हाल ही में लू को लेकर एक बड़ा फैसला किया है।  इस फैसले में लू को प्राकृतिक आपदा में शामिल कर लिया गया है । यह कदम उठाने वाला मप्र देश का संभवतः तीसरा या चौथा राज्य है।  अब तक केरल या दक्षिण के गंभीर लू ग्रस्त राज्यों ने ही इस दिशा में पहल की है। इस फैसले का फायदा यह होगा कि अब लू से होने वाली मृत्यु के दौरान मप्र में भी मृतक के परिजनों को उसी तरह से आर्थिक सहायता मिल सकेगी जिस तरह अन्य प्राकृतिक आपदाओं में मिलती है। हमारे प्रदेश में सामान्य तौर पर प्राकृतिक आपदाओं में मृत्यु पर 4 लाख रुपए की मुआवजा राशि या आर्थिक सहायता सरकार की ओर से दी जाती है। अब यह सहायता लू से प्रभावित परिवारों को भी मिल सकेगी। एयर कंडीशंड घरों और एसी कारों में जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए शायद लू किसी चिंता का विषय न हो लेकिन हाड़-तोड़ मेहनत कर जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए लू हर साल किसी संकट से काम नहीं है। खास तौर पर अप्रैल,मई और जून के महीने उनके लिए किसी आपदा से काम नहीं होते। आए दिन लू लगने और लू से मृत्यु की खबरें अखबार के पन्नों को रंगती रहती है लेकिन यह शायद कम लोग ही जानते होंगे की लू से होने वाली मौतें कई बीमारियों से होने वाली मौतों को भी पीछे छोड़ देती हैं। एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में हर साल लू के कारण डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु होती है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि दुनिया भर में हर साल लू से होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा सबसे ज़्यादा है। भारत के बाद चीन और रूस का नंबर आता है। आस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी में किए गए अध्ययन के मुताबिक, लू से होने वाली मौतें गर्मी से जुड़ी सभी मौतों का करीब एक तिहाई होती हैं। इसी अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों का 1 फ़ीसदी हिस्सा लू से होने वाली मौतें होती हैं। लू से हर गर्मियों में होने वाली कुल 1.53 लाख मौतों में से करीब आधी मौतें एशिया में और 30 फ़ीसदी से ज़्यादा मौतें यूरोप में होती हैं। इस रिसर्च के नतीजों के अनुसार, दुनिया भर में 30 वर्षों के बीच लू की वजह से करीब 45 लाख 92 हजार  से ज्यादा लोगों की जान गई है। अपने देश की बात करें तो यहां हर साल लू से औसतन 31 हजार 748 मौतें हुई हैं। लू से दुनिया भर में और भारत में मरने वाले लोगों के आंकड़ों की तुलना करें तो लू के कारण विश्व में होने वाली कुल मौतों में से हर 5वीं मौत भारत में हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इंसानी शरीर इस तरह से बना है कि वह एक हद तक ही गर्मी और सर्दी को झेल सकता है। अगर गर्मी के दिनों में पारा 42 डिग्री सेल्सियस से ऊपर है और लू चल रही हैं तो हम सभी को सावधानी बरतते हुए घर के अंदर ही रहना चाहिए। दरअसल गर्म हवाओं और सूरज की तीखी किरणों के कारण शरीर का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है और खून के गर्म होने पर पहले सांस लेने में दिक्कत आती है और फिर ब्लड प्रेशर कम होने लगता है । इसके बाद धीरे-धीरे शरीर के अंग काम करना बंद कर देते  हैं और कुछ देर में प्रभावित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है इसीलिए लू के दौरान घर के बाहर के सारे काम सुबह 10 बजे से पहले या शाम को 6 बजे के बाद करने की सलाह दी जाती है। सरकार द्वारा लू को प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में शामिल करने से प्रभावित परिवारों की मुश्किलें अवश्य ही कम होंगी और खासतौर पर उन परिवारों को लाभ होगा जिनके परिवार के कमाऊ सदस्य की लू के कारण मृत्यु हो जाती है। हालांकि सबसे अच्छा तरीका तो यही है कि लू से बचा जाए और तमाम सावधानियां बरती जाएं। वैसे, गुस्से में आपा खो देने वाले लोगों को भी ‘दो मिनट में लू उतार देंगे’ जैसे मुहावरे का इस्तेमाल करते समय सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि यदि सामने वाला भारी पड़ गया तो आपकी लू उतरते देर नहीं लगेगी। वक्त का तकाज़ा यही है कि लू से भी बचे और लू उतारने से भी…।

मीठा राजमार्ग…जहां बन रहे है मदहोश करने वाले फूल !!

मीठा राजमार्ग, पढ़कर अचंभा सा लगता है न क्योंकि अब तक मीठी गली, ठंडी सड़क जैसे नाम तो अमूमन सुनने को मिलते रहे हैं लेकिन ‘मीठा राजमार्ग’ कुछ अलग है। तो, आइए चलते हैं प्रदेश के एक ऐसे मीठे राजमार्ग के सफ़र पर, जहां यदि आप कुछ देर ठहर गए तो यहां बन रहे फूल की खुशबू से शर्तिया मदहोश होकर ही आगे बढ़ पाएंगे। 

तो यह है मप्र का राजमार्ग क्रमांक 45 । इन दिनों, जैसे ही आप भोपाल से बरेली होते हुए नरसिंहपुर जिले की ओर बढ़ते हैं तो आप को एक मीठी, मादक सी और जानी पहचानी सी खुशबू अपनी ओर खींचने लगती है। जैसे जैसे आप नरसिंहपुर के क़रीब पहुंचने लगते हैं राजमार्ग पर मिठास और बढ़ जाती है तथा आपको रुककर इसे महसूस करने के लिए खींचती है। यदि रुक गए तो तय है कि जुबान पर फूल की मिठास लिए बिना आगे नहीं बढ़ सकते और नहीं रुके तब भी दिल ओ दिमाग पर छा गई इस मीठी सी मदहोश कर देने वाली खुशबू से पीछा नहीं छुड़ा सकते।

 राजमार्ग क्रमांक 45 पर हर साल इन दिनों में यह मिठास और मदहोशी छाई रहती है और अब तो यह मीठापन यहां के लोगों के स्वभाव और तासीर का हिस्सा बन गया है। तभी तो ओशो यानि आचार्य रजनीश की वाणी और आज के दौर के नामी अभिनेता आशुतोष राणा की आवाज़ में तमाम मंत्र और स्त्रोत कानों में मिश्री सी घोल देते हैं।  

खास बात यह है कि साल दर साल इस राजमार्ग पर मिठास का कारोबार फैलता जा रहा है। दरअसल, यह मिठास गन्ने से बन रहे गुड़ की है। मोटे तौर पर बरेली से जबलपुर तक और खासतौर पर नरसिंहपुर जिला गन्ने की खेती के लिए प्रदेश भर में मशहूर है। यहां के गुड़ का तो यह हाल है कि नरसिंहपुर की करेली तहसील का गुड़ ‘करेली के गुड़’ के नाम से प्रदेश तो क्या देश में भी हाथों हाथ लिया जाता है। 

इन दिनों इस राजमार्ग के दोनों ओर गुड़ बनाने का काम चरम पर है और मद्धम आंच पर पकते गन्ने के रस की खुशबू इस सड़क को मीठा राजमार्ग बना रही है । थोड़ी-थोड़ी दूरी पर भट्ठियों में उबलता गन्ने का रस, कढ़ाईयों में ऊपर तैरता फूल और फिर गरमागरम खोए जैसे गुड़ से अलग अलग मात्रा और आकार प्रकार में बनती परिया। 

गुड़ को एक रेडीमेड उत्पाद समझने वाले दोस्तों को फूल और परिया जैसे शब्द अबूझ लग सकते हैं लेकिन छोता, नोरपा, जरी और मरी सुनकर और यह जानकर कि इनमें नाम के विपरीत मरी सबसे कीमती है,वे चकरा भी सकते हैं। वैसे, नोरपा पहले साल की गन्ने की फसल को कहते हैं, जरी दूसरे साल और मरी तीसरे साल की फसल है। छोता रस निकलने के बाद गन्ने के सूखे छिलके हैं और फूल रस और गुड़ के बीच की अवस्था जो सबसे स्वादिष्ट होती है।  

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक नरसिंहपुर ज़िले में करीब 65 हज़ार हेक्टेयर ज़मीन पर गन्ने की खेती हो रही है।  ज़िले में अब बड़ी मात्रा में जैविक पद्धति से गन्ना उगाने और जैविक गुड़ बनाने का काम भी होने लगा है। एक अनुमान के मुताबिक यहां मौजूद कई शुगर मिल के बाद भी  3000 से ज्यादा स्थानों पर गुड़ बनता है। 

 नरसिंहपुर में गन्ने की फसल के इतिहास की बात करें तो पुराने संदर्भों से पता चलता है कि 1822 में विलियम हेनरी स्लीमन नामक गोरे अधिकारी ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से एक्साइज ऑफिसर बनकर यहां तैनात हुए और उन्होंने गन्ना की फसल लगाने का श्रीगणेश किया। पहले यहां से मजदूरों को विदेश ले जाकर गन्ने की खेती कराते थे लेकिन, फिर अंग्रेजों ने सोचा कि मजदूरों को वहां न ले जाकर यहीं अच्छी गुणवत्ता का गन्ना लाकर खेती की जाए और फिर उससे बने उत्पाद वहां ले जाएं। 

इस तरह, गन्ने का जादू यहां के लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा और अब तो गन्ना और गुड़ यहां की पहचान बन गए हैं। आंकड़ों पर नज़र दौड़ाएं तो यहां क़रीब 800 करोड़ रुपए का गुड़ उत्पादन एवं लगभग 650 करोड़ का चीनी और खांडसारी का उत्पादन हो रहा है। 

 दरअसल, इस क्षेत्र का गुड़ अपनी गुणवत्ता के लिए खासतौर पर जाना जाता है। यहां का गुड़ बहुत मीठा रहता है। अब तो अदरक और इलायची जैसे तमाम फ्लेवर के साथ जोड़ी बनाकर यह और भी स्वादिष्ट होता जा रहा है।   लैपटॉप और ईयर बड्स वाली नई हाईटेक पीढ़ी की जानकारी के लिए बताते चले कि गुड़ बनाने के लिए गन्ने का पहले रस निकाला जाता है।

 हां, बिल्कुल वही रस जो बाजार में हम अदरक,पुदीना,धनिया और नींबू के साथ मिलाकर पीते हैं। इस रस को फिर कढ़ाई में ओटाते हैं बिल्कुल दूध से खोया बनाने जैसे। कई घंटे तक उबलने के बाद यह गाढ़ा होकर गुड़ बन जाता है और सांचों में ढल कर अलग अलग आकार प्रकार ले लेता है। हालांकि, समय के साथ लाभ कमाने की चाह बढ़ती जा रही है और एक कड़ाही में पकाकर बनने वाला शुद्ध, सेहतमंद और स्वादिष्ट देशी गुड़ अब मिलावट के कारण संख्या में तो बढ़ रहा है लेकिन गुणवत्ता लगातार घट रही है। 

गन्ने की एक ओर विशेषता यह है कि इसका कोई भी हिस्सा बेकार नहीं जाता। यहां तक कि रस निकालने के बाद बचा अवशेष छोता भी  ईधन के रूप में काम आ जाता है।  

…तो इस गन्ना कथा का वास्तविक आनंद उठाने के लिए निकलिए मीठे राजमार्ग पर और मदहोशी तक डूबकर आइए मीठी खुशबू,नींबू वाले गन्ने के रस ,स्वादिष्ट फूल ,गरम गुड़ में और सहेज लाइए सालभर का कोटा क्योंकि यह मौका फिर अगले साल ही मिल पाएगा।

कब तक हमसे बचोगे धुस्का..!!

इतनी शिद्दत से यदि भगवान को भी याद किया होता तो शायद वे भी पसीज जाते लेकिन ‘धुस्का’ को मुझ पर कोई दया नहीं आई। 

धुस्का की तलाश में हमने रांची के वे सभी इलाके छान मारे, जहां आमतौर पर धुस्का की मौजूदगी पाई जाती है लेकिन तलाश पूरी नहीं हो पाई। धुस्का और इसकी उपलब्धता के इलाकों के जानकार साथियों की सहायता भी ली लेकिन उनमें से अधिकतर ने हाथ खड़े कर दिए। यहां तक कि वापिसी में एयरपोर्ट के रास्ते में हमने सभी संभावित ठिकानों पर छापेमारी की लेकिन जैसे ईडी, सीबीआई या पुलिस के डर से अपराधी छिप जाते हैं,इसी तरह धुस्का भी जैसे गायब हो गया था। 

आखिर,हमने ही हार मान ली और दिल पक्का कर अगली बार धुस्का के लिए ही झारखंड की यात्रा करने की प्रतिज्ञा के साथ वापसी की उड़ान पकड़ ली।  झारखंड-बिहार से बाहर के मित्रों के लिए धुस्का कुछ उसी तरह की अबूझ पहेली है जैसे महानगरों के लोगों और शायद नई पीढ़ी के लिए टपका। 

धुस्का और टपका वैसे तो अलग अलग विषय हैं और इनमें कोई समानता भी नहीं है।  लेकिन,हमने फिर भी एक समानता तलाश ही नहीं…पानी। टपका आमतौर पर बारिश में पैदा होता है और घर के कोने कोने में प्रकट होकर रहवासियों का जीना दूभर कर देता है। नई पीढ़ी की जानकारी के लिए टपका घर की छत से टपकते पानी को कहते हैं। पक्की छत पर तो वाटर प्रूफिंग जैसे उपायों से इसे रोक सकते हैं लेकिन कच्चे घरों में यह नींद हराम कर देता है। वहीं,धुस्का मुंह में पानी ला देता है और न मिल पाए तो मन में बैचेनी।  

खैर, ज्यादा पहेलियां न बुझाते हुए साफ कर दूं कि ‘धुस्का’ दरअसल झारखंड का एक पारंपरिक व्यंजन है जिसे सामान्य रूप से नाश्ते में खाया जाता है। शहरी अंदाज में इसे देशी स्नैक्स कह सकते हैं। आंचलिक बोलियों में इसे ढुस्का, दुष्का, दुस्का और ढूस्का जैसे तमाम नामों से जाना जाता है। बोलचाल की भाषा में और गैर झारखंडी लोगों के समझने और बनाने के तरीके के कारण हम इसे मालपुआ का गरीब भाई कह सकते और इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री के लिहाज़ से यह इडली डोसा खानदान का लगता है। यह चावल की बहुतायत वाले क्षेत्रों के अनुरूप व्यंजन है लेकिन स्वाद और ऊर्जा से भरपूर।    

धुस्का, सामान्यतः चावल,चने और उड़द की दाल को निर्धारित मात्रा में मिलाकर बनाया जाता है। थोड़ी बहुत कोशिश के बाद गूगल गुरु इसको बनाने की चुनिंदा विधियां भी पेश कर देते हैं।धुस्का बनाने के लिए चावल और दालों को रात भर पानी में फुलाने के बाद इन्हें मिक्सी में पीस लेते हैं। फिर अदरक, मिर्ची और मनचाहे मसालों के साथ थोड़ा सा ईनो मिला कर धुस्का बनाने का पहला चरण पूरा हो जाता है। फिर इस बेसन के पकौड़े जैसे घोल/बैटर को बड़े चम्मच से तेल में डालकर सुनहरा होने तक तलते हैं। 

धुस्का को आमतौर पर आलू या छोले की सब्जी के साथ खाया जाता है।  धुस्का से हमारी मुलाकात भलेहि इस दफे टल गई लेकिन उसने एक फ़िक्र भी बढ़ा दी। 


दरअसल, चिंता की बात यह है कि, झारखंड क्या सभी राज्यों से उनके मूल या पारंपरिक व्यंजन लुफ्त होते जा रहे हैं और उनका स्थान मोमो, पिज्जा, बर्गर, चाउमीन जैसे व्यंजन तेजी से ले रहे हैं। झारखंड में भी अब सार्वजनिक आयोजनों, शादी विवाह और अन्य पार्टियों में चाइनीज तो दिखता है लेकिन धुस्का गायब होता जा रहा है। अभी लिट्टी चोखा जरूर बिहार के साथ साथ यहां भी अपनी बादशाहत बनाए हुए है लेकिन यही हाल रहा तो लिट्टी भी धुस्का, छिलका रोटी या माडूआ रोटी की तरह स्थानीय खानपान का हिस्सा नहीं रह जाएगी।

यह ठेठ मालवी अंदाज़ बनाए रखिए मुख्यमंत्री जी!!

आमतौर पर राजनीतिक पत्रकार वार्ताएं नीरस होती हैं क्योंकि नेता या तो पत्रकार वार्ता के पहले ही सब बता चुके होते हैं या फिर कुछ बताना नहीं चाहते। ऐसे में यदि पत्रकार वार्ता निवेश और आर्थिक विषय पर हो तो उसके और भी बोझिल होने के खतरे रहते हैं क्योंकि हजारों लाखों करोड़ रुपए के आंकड़े और उनका घिसा पिटा सा प्रस्तुतीकरण खबर के केंद्र होता है जो रुचिकर तो नहीं हो सकता । इसलिए जब यूनाइटेड किंगडम (यूके) और जर्मनी की यात्रा से लौटने के बाद मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की पत्रकार वार्ता की सूचना मिली तो यही उम्मीद थी कि रोज छप रहे निवेश प्रस्तावों और आंकड़ों के अलावा कुछ नहीं होगा। वैसे भी पत्रकार वार्ता का विषय भी इन देशों की यात्रा से जुटाए गए निवेश की जानकारी देना था इसलिए बिना कोई उम्मीदें पाले अपन भी मुख्यमंत्री निवास पहुंच गए।

 मुख्यमंत्री निवास का सभागार ठसाठस भरा था। दर्जनों कैमरे मशीनगन की तर्ज पर सीधे उस स्थान पर निशाना साधे थे जहां मुख्यमंत्री को बैठना था। वहीं, रिवॉल्वर और बंदूकों जैसे छोटे मोटे हथियारों की तरह यूट्यूबर्स और पोर्टल वीरों के कैमरे सभागार में यत्र तत्र सर्वत्र बिखरे पड़े थे। बेचारे स्टिल कैमरे वाले अपने लिए ढंग की फोटो लेने लायक जगह जुगाड़ रहे थे। मुख्यमंत्री के हवाई अड्डे से यहां तक आने में कुछ देर हुई तो मीडिया के साथियों के लिए चाय और स्वल्पाहार के द्वार खोल दिए गए परंतु आलम यह था कि अग्रिम पंक्ति की कुर्सियां छिन जाने के डर से हम जैसे कई साथियों ने खानपान का बलिदान दे दिया और जो यह मोह नहीं छोड़ पाए उन्हें पहली से आखिरी पंक्ति में बैठना पड़ गया।

खैर, अपने चिरपरिचित अंदाज़ में मुस्कराते हुए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव हम से रूबरू हुए। कुछ देर की औपचारिक जानकारी के बाद वे अपने रंग में आ गए और ठेठ मालवी अंदाज़ में उन्होंने अपने अनुभव बांटने शुरू किए। फिर क्या था बोरिंग सी पत्रकार वार्ता में आंकड़ों के साथ हंसी और ठहाकों के रंग घुल गए। मुख्यमंत्री ने अपने निजी अनुभव से कई दिलचस्प बातें साझा की मसलन कारों की स्पीड पर उन्होंने ठेठ मालवी अंदाज़ में कहा कि कार में दो ढाई सौ की स्पीड में ऐसा लग रहा था जैसे हवा में उड़ रहे हैं और डर भी लग रहा था कि कहीं उड़ा ही न दे। एक और किस्सा बताते हुए उन्होंने कहा कि विदेशी राजनयिकों से चर्चा के दौरान जब वहां की एक महिला अधिकारी ने भारत और मध्य प्रदेश की तारीफ में कसीदे पढ़ने शुरू किए तो हमने ही इशारे से रोक दिया क्योंकि बहनजी नौकरी तो वहीं की कर रही थीं और भारत प्रेम कहीं उनकी नौकरी न ले बैठे।

जैसे जैसे बात आगे बढ़ी मुख्यमंत्री का अंदाज बिल्कुल परिवार के मुखिया या उस वरिष्ठ सदस्य की तरह होता गया जो कौतूहल के साथ अपने परिजनों को यात्रा के किस्से सुनाता है। डॉ यादव भी किस्सागो बन गए फिर चाहे वह डायनासोर को कीचड़ में फंसा कर शिकार करने की बात हो या दुनिया के इस विशालतम प्राणी को कैंसर होने की, ब्रिटेन की संसद के भीतर चर्च खोजकर उनकी धर्मनिरपेक्षता पर कटाक्ष हो या वहां राज्यसभा में मिलने वाली जीवनभर की सदस्यता…मुख्यमंत्री ने खूब चुटकियां ली। उन्होंने कहा कि वहां आप एक बार सदस्य बने तो बस फिर फोटो टंगने तक बने रहते हैं और हमारे यहां छह साल भी लोगों को भारी लगने लगते हैं। स्वामीनारायण मंदिर के निर्माण की कहानी सुना कर न केवल उन्होंने बातों ही बातों में भारतीय मंदिर निर्माण की उच्च शैली,स्थापत्य कला और एकजुटता की महत्ता साबित कर दी। 

वहीं, ब्रिटेन में डॉ भीमराव आंबेडकर के पंचतीर्थ की स्थापना के प्रति गोरों की शुरुआती प्रतिक्रिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों का उल्लेख करते हुए उन्होंने यह समझाने की कोशिश। की कि यदि सरकार मजबूत और दृढ़ इच्छा शक्ति वाली हो तो किसी भी बाधा को दूर किया जा सकता है। निवेश के आंकड़ों पर कुरेद रहे एक साथी को उन्होंने यह कहकर लाजवाब कर दिया कि 78 हजार करोड़ रुपए के निवेश प्रस्तावों का उल्लेख करने बैठूंगा तो बहुत समय लग जाएगा इसलिए आज नकारात्मकता छोड़िए,आंकड़े आप तक पहुंच जाएंगे।

कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि यदि आप पद की गरिमा के साथ अपनी सहजता,सरलता,जड़ों से जुड़ाव और अपनेपन को कायम रखते हैं तो नीरस विषय पर भी सकारात्मक और उल्लासपूर्ण बातचीत हो सकती है। यह सहजता आजकल कम देखने को मिलती है क्योंकि जैसे ही व्यक्ति उच्च पद पर पहुंचता है,वह अपनी जड़ों से दूर होने लगता है और सहज हास्य उसे अपने कद के प्रतिकूल लगने लगता है। लेकिन, डॉ मोहन यादव ने उच्च पद के बाद भी अपने मूल स्वभाव,सहजता,सरलता और खांटी मालवी शैली को नहीं छोड़ा है…अपने इस अंदाज़ को,सरलता को और ठेठ देसीपन को बनाए रखिए मुख्यमंत्री जी।


रविवार, 20 अक्टूबर 2024

मैंने नहीं कहा रेस्ट इन पीस..!!

मैंने नहीं कहा RIP या भगवान तुम्हारी आत्मा को शांति दे या न ही मैंने दी विनम्र श्रद्धांजलि..क्यों दे, श्रद्धांजलि या क्यों करें तुम्हारी आत्मा की शांति की प्रार्थना…तुमने ऐसा कौन सा तीर मार दिया जो शांति की कामना करें। अरे, कोई ऐसे अपने परिवार को बीच मँझधार में छोड़कर जाता है क्या? 

मासूम से प्रांजल का दिल कब तुम्हारी सेवा करते करते कड़ा हो गया,तुम्हें तो ढंग से पता भी नहीं है...भाभी महीनों से कैसे तुमसे अपने आंसू छिपाकर तुम्हें हौंसला देती थी और तुमने एक बार में ही उनके विश्वास को, उनकी तपस्या को तार तार कर दिया। बिटिया प्रियम तो अब तक ठीक से समझ भी नहीं पाई कि तुमने उसके सर से अपने स्नेह की छाया दूर कर दी है । वह आज भी तुम्हारे सभी दोस्तों से वैसे ही आगे बढ़कर मिल रही थी जैसे तुम्हारे सामने मिलती थी।

जब तुम एंबुलेंस में अपने पैतृक निवास ललितपुर की यात्रा के लिए लेटे थे और भाभी का करुण क्रंदन बाहर तक द्रवित कर रहा था लेकिन तुम मजबूत कलेजा किए लेटे रहे!! उस चीत्कार पर तुम्हें उठ बैठना था,दिलासा देना था भाभी को,प्रांजल को..लेकिन तुम अपनी ही दुनिया में मगन थे तो हम क्यों तुम्हारी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें।

तुम्हें, अशांत ही रहना होगा मित्र…ताकि आसपास रहकर प्रांजल के सपने पूरे होते देखो,प्रियम का सहारा बने रहो और भाभी का हौंसला बढ़ाते हुए उनकी ढाल बने रहो..यूं, साथ छोड़ना जब हम मित्रों को गवारा नहीं है तो फिर परिवार को कैसे मंजूर होगा।

तुम्हें, अभी यहीं रहना है और जब तक परिवार सम्भल नहीं जाता,आत्मनिर्भर नहीं हो जाता और तुम्हारे बिना जीने की आदत नहीं डाल लेता तब तक तुम्हें उनके आसपास ही रहना होगा भले ही किसी भी रूप में रहो…तब तक हम भी नहीं कहेंगे विनम्र श्रद्धांजलि या रेस्ट इन पीस!!

तुम बहुत याद आओगे दोस्त… जितेंद्र


उन लोगों के लिए जिन्हें जानकारी नहीं है:

वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र मोहन रिछारिया का आज 55 साल की आयु में निधन हो गया। नईदुनिया जबलपुर के संपादक पद पर रहने के दौरान उन्हें ब्रेन ट्यूमर का पता चला और फिर निरंतर उपचार के कारण उन्होंने सक्रिय पत्रकारिता से अवकाश ले लिया था।

एक अप्रैल 1969 को जन्मे जितेंद्र मोहन रिछारिया ललितपुर के मूल निवासी थे। उनका अंतिम् संस्कार कल उनके पैतृक निवास ललितपुर में ही होगा। उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी है। 

उन्होंने भोपाल के माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पहले बैच में स्नातक और फिर स्नातकोत्तर की पढ़ाई की थी। उन्होंने भोपाल के दैनिक नईदुनिया, दैनिक जागरण, सहारा टीवी, पीपुल्स समाचार, पत्रिका और नईदुनिया इंदौर सहित विभिन्न समाचार पत्रों में तीन दशक से ज्यादा समय तक अपनी सेवाएं दी।

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

रावण के बहाने समाज की बात…!!

समाज में एक बार फिर रावण ‘आकार’ लेने लगा है। हर साल इन्हीं दिनों में देश के तमाम शहरों में रावण जन्म लेने लगता है और धीरे-धीरे उसका आकार विशाल और रूप भयंकर होता जाता है। आमतौर पर मानव जीवन में बच्चों के जन्म में 9 महीने का समय लगता है लेकिन रावण तो रावण है इसलिए वह 9 महीने का सफर महज 9 दिन में पूरा कर लेता है। वैसे भी बुरी प्रवृत्तियों के विस्तार में समय कहां लगता है। अच्छाइयों को जरूर आदत बनने में कई कसौटियों से गुजरना पड़ता है।  

फिलहाल, रावण का धड़ बन गया है। इसमें अहम तथ्य यह है कि जन्म के साथ ही रावण फूलना शुरू कर देता है। यह फुलाव घमंड का हो सकता है,असीमित शक्ति का और शायद संपन्नता का भी। जैसे-जैसे रावण दहन का समय नजदीक आता जाएगा रावण का शरीर और सिर घमंड से बढ़ते जाएंगे। एक सिर वाला रावण दस सिर का हो जाएगा।…और फिर जैसा कि कहावतों/मुहावरों में कहा जाता है कि ‘पाप का घड़ा भर गया है’,’बुराई का अंत निकट है’ या फिर ‘बुराई का अंत अच्छाई से होता है,’ वाले अंदाज में तमाम बड़े आकार प्रकार के बाद भी रावण को अंततः जलना पड़ता है।  

 वैसे, इन दिनों समाज में समय के साथ-साथ रावण का कद और संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। कभी 20-21 फीट का रावण आज 100 फीट को भी पार कर गया है । इसके बाद भी न तो रावण जलाने वालों की भूख शांत हुई है और न ही रावण का घमंड कम हुआ है इसलिए मृत्यु के बाद भी रावण हर नए साल में नए रंग-रूप और आकार-प्रकार के साथ फिर जन्म ले लेता है । 

समय के साथ रावणों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। पहले किसी शहर में एक या दो जगह ही रावण दहन होता था लेकिन अब रावण जलाने वाले भी बढ़ गए हैं और रावण भी। महानगरों क्या, अब तो छोटे छोटे शहरों में भी हर गली-मोहल्ले में रावण अपने बंधु-बांधवों के साथ बच्चों के खेलने के मैदान पर कई दिन पहले से कब्ज़ा करने लगा है। 

उधर, बच्चे भी दशहरे की छुट्टियों के बाद भी मैदान में दिखने की बजाए मोबाइल में तोप तमंचे चलाने वाले खेलों में आंखें गड़ाए रहते हैं। इससे बच्चे भी खुश हैं,उनके अभिभावक भी और रावण भी फूल कर कुप्पा है।   रावण का अंत भले ही देशभर में एक साथ एक जैसा होता है लेकिन अपने जन्म से लेकर जलने तक के नौ दिनों के दौरान वह मीडिया की सुर्खियां जरूर बटोरता रहता है। कभी शहर के किसी खास क्षेत्र को ही रावण गली कहा जाता था क्योंकि रावण के सबसे ज्यादा पुतले वही बनते थे लेकिन समय के साथ रावण के जन्म स्थान का भी जमकर विस्तार हुआ है। 

अब शहर के कई इलाकों में छोटे बड़े आकार के सैंकड़ों रावण नजर आने लगे हैं।   एक बार रावण कुनबे का आकार प्रकार तय हो जाने के बाद उनके जन्मदाता उनके अंदर आतिशबाजी लगाने का काम करते हैं क्योंकि रावण के जलने में असल मजा तो बम पटाखों का ही है। जब वह अपनी भयंकर कानफोडू आवाज और आंखों को चुंधिया देने वाली रोशनी यहां वहां बिखेरता है तो दर्शक उल्लासित होकर तालियां बजाने लगते हैं। एक तरह से इस आतिशबाजी, बम की आवाज और रंग-बिरंगी रोशनी के जरिए रावण अपनी ताकत का अहसास कराता है।

   आम लोग भी वहीं सबसे ज्यादा जुटते हैं जहां का रावण सबसे ज्यादा धूम धड़ाका करता है। यह दिखावा आम जिंदगी का फलसफा भी बनता जा रहा है मतलब जो जितना ज्यादा दिखावा कर सकता है उसकी उतनी ही ज्यादा पूछ होती है। फिर भले ही वह बुराइयों का पुतला ही क्यों न हो। शायद, यही वजह है कि इन दिनों किसी अपराध में पकड़े जाने पर भी नामी लोग शर्म से चेहरा छुपाने की बजाय ‘विक्ट्री साइन’ बनाते हुए जेल जाते हैं और मात्र जमानत मिलने पर उसके समर्थक ऐसा जलसा करते हैं जैसे वह जेल से नहीं बल्कि सरहद पर दुश्मन को धूल चटाकर लौट रहे हैं।  

 समाज में बढ़ती दिखावे की यह प्रवृत्ति उच्च वर्ग से मध्यम वर्ग तक बिल्कुल वैसे ही यत्र-तत्र-सर्वत्र फैलती जा रही है जैसे दशहरे पर रावण के पुतलों की संख्या। शायद समाज को अब अपने बीच बुरी प्रवृत्ति वाले लोगों की मौजूदगी खटकती नहीं है। यदि ऐसा होता तो हर चुनाव में दागी प्रत्याशियों की संख्या नहीं बढ़ती? बुराइयों के प्रति हमारी सहनशीलता इस हद तक बढ़ गई है कि नवरात्रि के दौरान हम कन्या को देवी मानकर पूजते हैं और बिना किसी तीखे विरोध के उनके साथ बलात्कार जैसी घिनौनी घटनाओं के साक्षी भी बनते हैं। 

  यदि हमें बेहतर समाज का निर्माण करना है तो बुराइयों को विस्तार देने की बजाय इस प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। इसकी शुरुआत प्रतीकात्मक ही सही, रावण के पुतलों से की जा सकती है क्योंकि दशानन को हम जितना मजबूत और लोकप्रिय बनाकर समाज में उसकी स्वीकार्यता बढ़ाते जाएंगे उससे जुड़ी बुराइयां भी समाज में उतनी ही गहराई से जड़ जमाती जाएंगी।


 *(लेखक आकाशवाणी भोपाल में समाचार संपादक हैं और ‘चार देश चालीस कहानियां’ एवं ‘अयोध्या 22 जनवरी’ जैसी लोकप्रिय किताब लिख चुके हैं।)

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

हिंदी के हत्यारे…आप/हम,और कौन!!

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हिंदी के हत्यारे’…पढ़कर आप चौंक गए न और हो सकता है कुछ लोग शायद नाराज भी हो गए होंगे क्योंकि हमारी अपनी सर्वप्रिय और मीठी हिंदी भाषा के साथ हत्यारे जैसा क्रूर शब्द सुनना अच्छा नहीं लगता । लेकिन, जब मैं यह कहूं कि मैं,आप और हम सभी हिंदी के हत्यारे हैं तो शायद आपको और भी ज्यादा बुरा लग सकता है और लगना भी चाहिए क्योंकि जब तक बुरा नहीं लगेगा तब तक हम अपनी गलतियों को सुधारने या खुद को बेहतर बनाने के लिए प्रयास नहीं करेंगे। किसी भाषा में मिलावट, व्याकरण बिगाड़कर,उसकी अनदेखी करना और उसकी बनावट एवं बुनावट से छेड़छाड़ करते जाना उसे तिल तिल कर मारना ही तो है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी कहा कि ‘मातृभाषा का अनादर मां के अनादर के समान है।जो मातृभाषा का अनादर करता है वह देशभक्त कहलाने के लायक नहीं है।’ जब गांधी जी जैसी संजीदा और संयम वाली शख्सियत मातृभाषा का सम्मान नहीं करने वालों को देशद्रोही जैसा मानने की हद तक कट्टर हो सकती है तो हमारी हिंदी भाषा को बर्बाद करने वालों को हिंदी के हत्यारे कहने में क्या बुराई है। 

हम सब हिंदी की हत्यारे हैं। यहां हम सब का मतलब मैं/हम/आप/ मीडिया/ सिनेमा/ बाजार और सरकारी कार्यालय सभी शामिल हैं। सबसे पहले हमारी बात कि आखिर ‘हम-आप’ हिंदी की हत्यारे कैसे हुए? अगर सही मायने में देखें और समझे तो हम हर दिन हिंदी की या अपनी भाषा की हत्या करते हैं। हिंदी में लेख/कविता/कहानी लिखना हिंदी की सेवा है लेकिन दिन प्रतिदिन उसकी अवहेलना करना अपराध। उदाहरण के लिए हम, अपने परंपरागत रिश्तों को आंटी और अंकल कहकर संबोधित करते हैं। हम, अपने बच्चों से कहते हैं कि वे आगंतुकों को आंटी कहें या उन्हें अंकल कहकर बुलाएं। क्या, दादी/ नानी/ मामी/ चाचा/ मौसी/ भाभी जैसे रिश्तों को अंकल-आंटी से पूरा कर सकते हैं । जिस भाषा के पास अहम पारिवारिक रिश्तों के लिए शब्द नहीं हैं तो वह ममेरे भाई, फुफेरे भाई या चचेरी बहन जैसे विस्तृत रिश्तों के लिए संबोधन कहां से लाएगी? ऐसी कंगाल अंग्रेजी भाषा को अपनाने के लिए हम अपनी मातृभाषा को ठुकराने के लिए तत्पर हैं।

हम, दूसरी बड़ी गलती करते हैं कि अपने बच्चों को रिश्तेदारों के सामने नमूने की तरह पेश करते हुए उनसे अंग्रेजी की फलाना ढिकाना पोएम सुनाने का अनुरोध करते हैं या फिर उनसे कहते हैं बेटा 100 तक काउंटिंग सुनाओ।  हम कितनी बार यह कहते हैं कि बेटा गिनती सुनाओ या   हिंदी की कोई कविता सुनाओ । फिर हमारा यही बच्चा जब बाजार में सामान लेने जाता है और दुकानदार उससे कहता है कि उनचालीस रुपए हुए तो वह आंखें फाड़ कर मुंह ताकता रह जाता है या फिर कहता है भैया इंग्लिश में बताओ । नई पीढ़ी की इस कमी पर केंद्रित कई सारे चुटकुले बाजार में और मोबाइल पर उपलब्ध है जैसे कि दो लड़कियां एक गोलगप्पे की दुकान पर जाती है और वहां गोलगप्पे खाने के बाद वह दुकानदार से पूछती कितने पैसे हुए तो वह कहता है उन्नचास रुपए… लड़कियां सोचती है कि दुकानदार उन्हें ठगने की कोशिश कर रहा है और एक लड़की थोड़ा ज्यादा स्मार्टनेस दिखाते हुए कहती है कि भैया, हम तो हंड्रेड देंगे । बार बार समझाने के बाद अंततः दुकानदार भी सोचता है कि भाई जब बैठे ठाले दोगुने पैसे मिल रहे हैं तो लेने में क्या बुराई है। सोचिए, यह चुटकुला हकीकत भी हो सकता है। अगर उन बच्चियों के मां-बाप ने उन्हें सिखाया होता है कि 49 का मतलब एक कम 50 रुपए है तो शायद वह 100 रुपए देकर नहीं आतीं।

इसी प्रकार आम बोलचाल में हम सामान्य चीजों के भी अंग्रेजी नाम इस्तेमाल करने लगे हैं जैसे कि हम कहेंगे वीक डेज, वीकेंड, मंडे, ट्यूसडे, थर्सडे या फिर सैटरडे । हम कितनी बार कहते हैं कि सोमवार मंगलवार,बुधवार या फिर वीकेंड को हफ्ते या सप्ताहांत जैसे शब्दों से याद करते हैं। जब हम खुद दिन प्रतिदिन की प्रक्रिया में अंग्रेजी शब्दों का मोह नहीं छोड़ पा रहे  तो हम अपनी नई पीढ़ी में या अपने बच्चों में अपनी भाषा के बीज कैसे रोपित करेंगे ? कुछ यही हाल रंगों को लेकर है। अब हम नीला, हरा, गुलाबी या बैंगनी कितनी बार  कहते हैं उल्टा रेड/ग्रीन/ यलो/ पिंक या पर्पल की बात ज्यादा करते हैं। तो हुए न, हम हिंदी के हत्यारे..!! यह महज कुछ उदाहरण है जबकि भाषा की विकृतियां दिन प्रतिदिन हमारी जीवन शैली का हिस्सा बनती जा रही हैं। यदि आप खुद अपने बोले गए शब्दों का अध्ययन करने बैठे तो आप स्वयं महसूस करेंगे कि हमारी भाषा में 30 से 40 फीसदी अंग्रेजी घुस गई है और हम हिंदी के पिछड़ने का रोना रो रहे हैं। 

हिंदी के हत्यारों में दूसरा नाम है- बाजार। हम आए दिन सुनते हैं ‘यह दिल मांगे मोर’, ‘ठंडा मतलब कोका-कोला’, ‘आई एम कॉम्प्लान बॉय’, ‘यही है राइट चॉइस बेबी’ या और भी ऐसे तमाम तरह के विज्ञापन और उनकी बेसिर पैर की लाइन…जो हमें सुनने में बहुत अच्छी लगती हैं और हम उन्हें अपने व्यवहार में भी अपनाते जाते हैं। इसी तरह पैट शॉप, ग्रीटिंग कार्ड, शॉपिंग मॉल या और भी इसी तरह के तमाम शब्द जो बाजार हमारे सामने पेश करता जा रहा है और हम भी आंख बंद  कर उनको अपनाते जा रहे हैं। बाजार तो मोटे तौर पर अंग्रेजी के हवाले है ही..यदि हम अपने आसपास की कुछ स्थानीय दुकानों या और छोटे-मोटे बाजारों को छोड़ दें तो किसी भी बड़े शॉपिंग मॉल मेंअंग्रेजी का बोलबाला खुलकर दिखता है और हिंदी कहीं किसी कोने में दबी सहमी नजर आती है। 

हिंदी के हत्यारों में तीसरा नाम आता है मीडिया का । मीडिया यानि समाचार पत्र,  टीवी चैनल, पत्रिकाएं या इसी तरह के अन्य माध्यम । मीडिया में इन दिनों हिंग्लिश का इस्तेमाल परवान पर है। यदि आप अपने घर आने वाले अखबार के पन्ने पलटे तो आप आसानी से समझ जाएंगे की अंग्रेजी किस तरह से हिंदी मीडिया पर हावी होते जा रही है। हिंदी के कुछ अखबारों की सुर्खियों पर नजर डाली जाए तो इस तरह के उदाहरण रोज ही  मिल जाते हैं जैसे  ‘पेट्स को खुश रखने हजारों के गिफ्ट’, ‘केंद्रीय मंत्री को मिली क्लीन चिट’, ‘गुणवत्ता में फेल हुए नमूने’, ‘धर्म की पाठशाला में सीखा टाइम और लाइफ स्टाइल मैनेजमेंट’, ‘कैश में खरीदा टीवी’, ‘वर्क लाइफ में संतुलन साधने की चुनौती’। वहीं,टीवी चैनलों में करप्शन, क्राइम, अटैक, मर्डर जैसे शब्द बहुतायत में देखने/ सुनने/पढ़ने को मिल जाते हैं । दिल्ली के एक अखबार ने तो हिंग्लिश को लगभग अपना लिया है। 

हिंदी के हत्यारों में चौथा नाम है सिनेमा का । सिनेमा ने जहां हिंदी भाषा को जनप्रिय और देशभर में फैलाने में सबसे अहम भूमिका निभाई है लेकिन भाषा को बर्बाद करने में भी यह पीछे नहीं है। उदाहरण के लिए यदि हम हिंदी फिल्मों के शीर्षकों पर ही सरसरी नज़र दौड़ाएं तो ऐसा लगता है कि हिंदी में उनके पास कोई उपयुक्त शब्द ही नहीं थे। मसलन ‘मिस्टर एंड मिसेस 55’, ‘लव इन शिमला’, ‘दाग:द फायर’, ‘गोलमाल अगेन’, ‘जेंटलमैन’, ‘सिंघम रिटर्न’ जैसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे। ऐसा नहीं है कि हिंदी नाम वाली फिल्में लोकप्रिय नहीं होती। आखिर ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और ‘जब जब फूल खिले’ से लेकर ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे’ जैसी तमाम फिल्में बहुत लोकप्रिय हुई हैं। इसके अलावा फिल्मों के सफल अभिनेता और अभिनेत्री हिंदी में रोजी-रोटी कमाकर अंग्रेजी में संवाद करके गर्वित महसूस करते हैं। कुछ यही हाल टीवी पर आ रहे तमाम धारावाहिकों का है। वे खुलेआम हिंदी की टांग तोड़ते नजर आते हैं। कोरोना दौर में जन्में ओटीटी  ने तो मानो हिंदी का समूल नाश करने की कसम ले ली है। विदेशों की नकल करती ओटीटी की विषय वस्तु और भाषा हर पल यह साबित करती है कि उसका जन्म ही मातृ भाषा से बलात्कार करने के लिए हुआ है । 

हिंदी के हत्यारों में आखिरी नाम है सरकारी कार्यालय । इन कार्यालयों में ज्यादातर अपने दैनिक कामकाज में बेवजह कठिन और दुरूह हिंदी शब्दों का इतना अधिक इस्तेमाल करते हैं कि आम व्यक्ति तो दूर शायद लिखने वालों की समझ में भी उनके पूरे अर्थ नहीं आते होंगे। उदाहरण के लिए ट्रेन के लिए लोह पथ गामिनी या मोबाइल के लिए चलित दूरभाष। शायद आप में से कुछ ही लोगों का पाला पुलिस थानों से पड़ा होगा लेकिन यदि आप इस जगह से रूबरू हुए हैं तो आपको पता होगा कि थानों में प्रथम सूचना रिपोर्ट- एफआईआर जिस भाषा में लिखी जाती है उसे समझ पाना उन हवलदार साहब के बस में भी नहीं होता जो उसे लिखते हैं।  

केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत राजभाषा विभाग ने भी सरकारी कामकाज में कठिन हिंदी शब्दों के स्थान पर सहज और सरल शब्दों के इस्तेमाल की सलाह दी है। जैसे प्रत्याभूति, मिसिल,अभिलेख और शास्ति जैसे शब्दों के स्थान पर क्रमशः गारंटी, फाइल,रिकॉर्ड और जुर्माना जैसे ज्यादा प्रचलित शब्द ।  वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग भी अपनी तरफ से हिंदी को सहज और सरल बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। 1960 में बने संस्थान ने अब तक आठ लाख से ज्यादा शब्द गढ़े हैं जो अब प्रचलन में भी हैं जैसे संगणक के लिए कंप्यूटर या संसद सदस्यों के लिए सांसद । कहने का मतलब यह है कि सरकार के स्तर पर भी भाषा को सहज एवं सरल बनाए रखने के लिए तमाम प्रयास हो रहे हैं बस जरूरत हमें उन्हें अपनाने की है।

सरकारी महकमों में एक चलन और बड़ी तेजी से बढ़ा है, वह है किसी योजना के परिष्कृत संस्करण को अंग्रेजी में लिखा जाना मसलन मोदी 3.0 या फिर उज्जवला 2.0 या इसी तरह के अन्य शब्द जबकि उनके स्थान पर मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल या उज्ज्वला का दूसरा संस्करण जैसे आसान शब्द उपलब्ध हैं।  कुल मिलाकर किसी दूसरे व्यक्ति या दूसरी भाषा को दोष देने की बजाय सबसे पहले हमें अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए कि हम खुद अपनी भाषा को बर्बाद करने में कितने और किस हद तक जिम्मेदार हैं। सबसे पहले हमें अपने आप से, अपने घर से, अपने बच्चों से,अपनी परस्पर बातचीत से और अपने दफ्तर से शुरुआत करनी होगी तभी हम अपनी भाषा के मान, सम्मान और गुणवत्ता को बरकरार रख पाएंगे। 



बुधवार, 25 सितंबर 2024

आइए, मेघा रे मेघा रे...के कोरस से करें 'मानसून' का स्वागत

मेघा रे मेघा रे...सुनते ही आँखों के सामने प्रकृति का सबसे बेहतरीन रूप साकार होने लगता है, वातावरण मनमोहक हो जाता है और पूरा परिदृश्य सुहाना लगने लगता है। भीषण गर्मी और भयंकर तपन, उमस, पसीने की चिपचिपाहट के बाद मानसून हमारे लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति,जीव जंतु और पक्षियों के लिए एक सुखद अहसास लेकर आता है। मई की चिलचिलाती गर्मी के साथ ही पूरा देश मानसून की बात जोहने लगता है और जैसे जैसे मानसून के करीब आने का संदेशा मिलता है मन का मयूर नाचने लगता है। पहली बारिश की ठंडक भरी फुहारों में भीगते लोग, पानी में धमा-चौकड़ी करती बच्चों की टोली, झमाझम बारिश के बीच गरमागरम चाय पकौड़े, कोयले की सौंधी आंच पर सिकते भुट्टे....क्या हम इससे अच्छे और मनमोहक दृश्य की कल्पना कर सकते हैं। वैसे भी,भारत में मानसून आमतौर पर 1 जून से 15 सितंबर तक 45 दिनों तक सक्रिय रहता है और देश के ज्यादातर राज्यों में दक्षिण-पश्चिम मानसून ने दस्तक दे दी है।   समुद्र की ओर बढ़ते मेघ जल की लहरों के साथ मिल जाते हैं, जो एक स्थल की खूबसूरती को दोगुना कर देते हैं। उनके संगम पर सूरज की किरणों का खेल, उनकी तेज रोशनी और चांद की रोशनी के साथ एक अद्वितीय और अविस्मरणीय दृश्य बनाता है। मेघों की सुंदरता को वर्णित करना कठिन है, क्योंकि वे प्राकृतिक रूप से बेहद आकर्षक, खूबसूरत और चमकीले होते हैं। मेघों का गगन में आवरण, उनकी बृहत्ता, और उनके रूपांतरण की रौनक देखकर आत्मा को अद्वितीय सुंदरता का अनुभव होता है। मेघों की उच्चता, गहराई, और उनकी चलने की गति से हमें व्यापकता का अनुभव होता है, जो हमें अद्भुतता का अनुभव देता है।मेघों के रंग, आकार और आकृति उन्हें एक अनूठी पहचान देती है। मेघों की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है, क्योंकि वे वर्षा की सूचना देते हैं और प्राकृतिक प्रक्रियाओं का एक अभिन्न हिस्सा हैं। इसके अलावा, मेघों शांति और संतोष की भावना पैदा करता है।   मानसून के आगमन से धरती का चेहरा बदल जाता है। यह एक ऐसा अवसर होता है जब वायु में ठंडक आ जाती है और वातावरण प्राकृतिक सौंदर्य से भर जाता है। मानसून भारतीय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो जीवन को नई ऊर्जा और उत्साह से भर देती है। मानसून के दौरान  धरती खूबसूरत हो जाती है क्योंकि वर्षा से प्राकृतिक रंग-बिरंगी वनस्पतियों की खूबसूरती और बढ़ जाती है। पेड़-पौधों का हरा रंग और फूलों की विविधता धरती को विशेष रूप से आकर्षक बनाती है। इसके साथ ही, मानसून के समय में धरती पर बरसने वाली वर्षा से प्राकृतिक जल स्रोतों की चमक बढ़ जाती है, जो नदियों और झीलों को जीवंत करती है। इस प्रकार, मानसून के समय में धरती की सुंदरता और जीवनशैली में विविधता बढ़ जाती है।   मानसून हमेशा ही फिल्मों,कवियों और संगीतकारों का पसंदीदा विषय रहा है। हिंदी फिल्मों में किसी समय में बारिश के गीत के बिना फिल्म पूरी ही नहीं होती थी। सुपर स्टार अमिताभ बच्चन से लेकर हेमा मालिनी तक और माधुरी दीक्षित-श्रीदेवी से लेकर रवीना टंडन तक ने बारिश पर केन्द्रित सुपरहिट गीत प्रस्तुत किये हैं। इन गीतों ने मानसून के उल्हास व उन्माद को सुन्दर शैली में प्रदर्शित किया है। उनमें प्रदर्शित भावनाएं हमारे हृदय को छू जाती हैं। बचपन में वर्षा के बीच छप-छप से लेकर प्रेम में सराबोर प्रेमीजोड़ों की एक दूसरे से मिलने की तड़प तक और  मानसून की बाट जोहते किसानों के बूंदे देखते ही उल्हास में परिवर्तित होते भावों को हिंदी फिल्मों के गीतों में मनमोहक चित्रण देखने को मिलता है। इन सदाबहार गीतों से तन के साथ-साथ मन भी भीग जाता है। जैसे गीत प्यार हुआ इकरार हुआ..., हाय हाय ये मजबूरी ये मौसम और ये दूरी..,इक लड़की भीगी भागी..,जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात..., काटे नहीं कटते, ये दिन ये रात...,लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है.., रिमझिम रिमझिम, रूमझुम रूमझुम...,कोई लड़की है जब वो हंसती है .., अब के सावन.., घनन घनन जब घिर आये बदरा.., बरसों रे मेघा मेघा..., आज रपट जाएं तो हमें न उठइयो..., भीगी भीगी रातों में..., टिप टिप बरसा पानी.. और जो हाल दिल का, इधर हो रहा है.. जैसे लोकप्रिय, कर्णप्रिय, दर्शनीय और मनमोहक गीतों के बिना इन फिल्मों की कल्पना की जा सकती है। बारिश पर कविताएँ हमेशा ही रोमांटिक होती हैं और तमाम नामी कवि भी बारिश के आकर्षण से बच नहीं सके हैं जैसे हरिवंश राय बच्चन ने बादल घिर आए कविता में लिखा है:  बादल घिर आए, गीत की बेला आई। आज गगन की सूनी  छाती भावों से भर आई,  चपला के पांवों की आहट  आज पवन ने पाई,  बादल घिर आए, गीत की बेला आई।  वहीं,बारिश की बूंदे कविता में कंचन अग्रवाल लिखती हैं:  छम छम पड़ती बारिश की बूंदे, भले ही बैरंग होती हैं l लेकिन जब धरती पर पड़ती हैं, तो उसका रंग निखार देती हैं l टप टप पड़ता बारिश का पानी, जब धरती की मिट्टी को गले लगाता है l इस अदृश्य मिलाप से धरती का रंग, कुछ ही दिनों में हरा भरा हो जाता है।  वहीँ, सुप्रसिद्ध गीतकार कवि गुलज़ार बारिश होती है तो कविता में कहते हैं:  बारिश होती है तो  पानी को भी लग जाते हैं पाँव दर-ओ-दीवार से टकरा के गुज़रता है गली से और उछलता है छपाकों में किसी मैच में जीते हुए लड़कों की तरह    मानसून भारतीय मौसम का एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह वर्षा के मौसम को संदर्भित करता है जो भारतीय उपमहाद्वीप में जुलाई से सितंबर तक चलता है। मानसून भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए तो और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह फसलों के लिए पानी प्रदान करता है और खेती को समृद्धि प्रदान करता है। मानसून देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग समय में प्रारंभ होता है और उसकी उस इलाके के हिसाब से अलग अलग विशेषताएं भी होती हैं। मानसून के आने से पहले, हवा ऊपरी समुद्री सतह पर संग्रहित गर्म होती है, और जब यह हवा स्थलीय तापमान से ठंडी होती है, तो वह वर्षा के रूप में गिरती है। मानसून दो प्रकार के होते हैं: उत्तरी मानसून और दक्षिणी मानसून। भारत में, उत्तरी मानसून गर्मियों में होता है जबकि दक्षिणी मानसून शीतकाल में होता है। भारत में बारिश की मात्रा क्षेत्र और समय के आधार पर भिन्न होती है। कुछ क्षेत्रों में अधिक बारिश होती है जबकि कुछ में कम। विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा की सामान्य मात्रा 500 मिमी से 3000 मिमी तक हो सकती है। उत्तर पश्चिमी और पूर्वी भारत में, बारिश का समय और मात्रा भी अलग-अलग होता है। हालांकि, मानसून के साथ हादसे भी आते हैं, जैसे की बाढ़ और चक्रवात। इन हादसों से नुकसान होता है, जिससे लोगों को पीड़ा और परेशानी का सामना करना पड़ता है। पूर्वी भारत और खासतौर पर बिहार,असम में तो मानसून जीवन मरण का कारण बन जाता है। लेकिन मानसून के न होने से खेतों में पानी की कमी हो सकती है, जिससे फसलों का प्रभावित हो सकता है और खेती पर असर पड़ सकता है। इसी तरह, मानसून के न होने से पानी की कमी हो सकती है, जो पीने के पानी और सामान्य उपयोग के लिए अधिकतम विपरीत प्रभाव डाल सकती है। मानसून के न होने से जलवायु परिवर्तन हो सकता है, जैसे कि तापमान में वृद्धि, सूखा, और वनों में पेड़ों की असामयिक मृत्यु। मानसून के न होने से सबसे ज्यादा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है, क्योंकि खेती, पर्यटन, उत्पादन और अन्य क्षेत्रों में व्यापार पर नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। जिसका असर देश की अर्थव्यवस्था और विकास पर भी पड़ सकता है...इसलिए मानसून हमारे लिए सबसे जरुरी है तो आनंद लीजिये मानसून का,रिमझिम फुहारों का और प्रकृति के बदलते नज़रों का।  छतरियां हटाके मिलिए इनसे। ये जो बूंदे हैं, बहुत दूर से आईं हैं।।  

पाठकों ने इस तरह बना दिया ‘अयोध्या 22 जनवरी’ पुस्तक को दस्तावेज

और ‘अयोध्या 22 जनवरी’ पुस्तक से दस्तावेज बन गई। अखबारों में आज छपी खबरों, मीडिया की नामचीन हस्तियों की संजीदा मौजूदगी, परिजनों,पत्रकारीय जीवन के साथियों, आकाशवाणी की टीम और विभिन्न क्षेत्रों के अनेक जाने माने लोगों की उपस्थिति और उनकी प्रतिक्रियाओं ने ‘अयोध्या 22 जनवरी’ को दस्तावेज बना दिया।  

शनिवार 29 जून को रीडर्स क्लब भोपाल के ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम के दिन मौसम विभाग ने पहले ही भारी बारिश की चेतावनी देकर डरा दिया था। इसके बाद दिन चढ़ते ही शैतान बादलों ने अपनी धुंआधार कलाबाजियों से मौसम विभाग की चेतावनी को सच्चाई बना दिया। हम मतलब Manoj Kumar  भैया, मेरे हमनाम Sanjeev Persai ,अपनी ही राशि के Sanjay Saxena  और हम कदम Manisha Sanjeev जी..फिक्रमंद थे कि ऐसी बरसात में कोई कैसे आ पाएगा? लेकिन पढ़ने/सुनने/कहने की पुस्तक प्रेमियों की चाह को बारिश की धमा चौकड़ी भी नहीं रोक पाई। 

कुछ भीगते,कुछ बचते बचाते लोग जुटने लगे और चार बजे के लिए निर्धारित कार्यक्रम में साढ़े चार बजे तक 9 मसाला रेस्त्रां का सभागार खचाखच भर गया (वैसे भी, भारतीय समय तो यही है कार्यक्रम शुरू होने का)। वैसे, सर्व गुण संपन्न पत्रकार Ahmad Rashid Khan  ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि बेफिक्र रहिए सर, बहुत लोग आएंगे। साथ ही, मौसम वैज्ञानिक Gurudatta Mishra जी की मौजूदगी से भी हम आश्वस्त हो गए थे कि बाकी लोगों को भी आने का मौका मिलेगा।

 पहले मूल रूप से लगाई गई कुर्सियां भरी, फिर अतिरिक्त और उसके बाद व्यवस्थापकों ने हाथ खड़े कर दिए कि अब और कुर्सियां नहीं लग सकती और न ही अब कुर्सियां बची हैं। जगह की हो रही कमी को महसूस कर पहले परिजनों ने कुछ कुर्सियां छोड़ी और बाद में आकाशवाणी के साथियों ने दिल बड़ा किया ताकि मेहमान बैठ सकें। कुछ लोगों ने बाहर से रिमझिम के बीच कार्यक्रम का आनंद लिया। फिर अनुशासित प्रस्तोता और संचार विशेषज्ञ संजीव ने कमान संभाली।

 चूंकि कार्यक्रम एक घंटे में समेटना था (उस सभागार में आगे भी एक कार्यक्रम था और हमने तय भी यही किया था) इसलिए वक्ता भी सीमित रखे गए थे लेकिन पाठकों पर किसी का जोर चला है क्या…!! स्थिति यह बन गई कि मूल वक्ता पीछे छूट गए और उत्साही पाठक बोलते गए। संजीव ने समय की कमी के मद्देनजर भरपूर प्रयास किए और एडवोकेट Yogesh Verma  जैसे कुछ अपने लोगों को सादर न बोलने के लिए मना भी लिया तो Pushpendra Mishra जी जैसे वक्ताओं को समय की सीमा में बांध दिया। फिर भी, वरिष्ठ पत्रकार चंद्रहास शुक्ला,मौसम वैज्ञानिक और मेरे छात्रावासी जीवन के वरिष्ठ गुरुदत्त मिश्रा जी, जाने माने योग गुरु Devi Dayal Bharti  जी, भारतीय सूचना सेवा के साथी Ajay Upadhyay , वरिष्ठ पत्रकार शुरैई नियाजी,जनसंपर्क अधिकारी रीतेश दुबे, जाने माने कमेंट्रैटर Prashant Singh Sengar ,समाचार वाचक Dharana Sachdev और राशिद अहमद खान को अपनी बात रखने का मौका मिल ही गया।

 मनीषा जी को भी अपने मनोभाव समेटने पड़े तो मनोज भैया ने अपना संबोधन और संजीव ने अपनी पटकथा सीमित कर ली। वरिष्ठ पत्रकार Ajay Bokil , Sarman Nagele, वरिष्ठ जनसंपर्क अधिकारी Manoj Dwivedi ,भारतीय सूचना सेवा के Prashant Sharma और समीर वर्मा, मित्र @सुरेंद्र गुप्ता और Hema Gupta  जी, डा अनामिका रावत, जानी मानी पत्रकार, उद्घोषक Sanyukta Banerjee , समाजसेवी और पर्यावरणविद डा रचना डेविड सहित कई विशिष्ट जनों की मौजूदगी ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ा दी।

 इसके बाद शुरू हुआ अनूठा प्रश्नोत्तर सत्र। दोस्त,लेखक और संचारक संजय सक्सेना ने अपनी रोचक शैली में प्रश्नों के गोले दागे और हम भी निर्भीक सिपाही की तरह शब्दों की ढाल से उनका सामना करते गए। पुस्तक क्यों से लेकर हर पुस्तक के शीर्षक में अंकों के इस्तेमाल,हर लेख में चौपाई क्यों जैसे प्रश्नों के जरिए संजय ने ‘अयोध्या 22 जनवरी’ के लेखन के पीछे की कहानी पाठकों तक पहुंचा दी।

 तब तक 9 मसाला रेस्त्रां की टीम गरमा गरम पकौड़े और चाय लेकर हाजिर हो गई। बारिश के बीच चाय पकौड़े की भारतीय मेजबानी और मनमोहक/लज़ीज़ सुगंध भी उपस्थित लोगों के बोलने/सुनने के इरादों को डिगा नहीं सकी। दरअसल, घड़ी की सुइयां शाम के 6 बजे के आगे पहुंच गई थी इसलिए अगले आयोजन की तैयारी के मद्देनजर 9 मसाला की टीम चाहती थी कि लोग जल्दी खाएं और जाएं..पर  सभागार में मौजूद लोगों के इरादे थे कि खायेंगे जरूर पर जाएंगे पूरा सुन/देख कर ही। 

 खैर, किसी तरह बोलने सुनने का दौर थमा तो स्मृतियों को सहेजने के लिए मोबाइल के कैमरे मैदान में आ गए…अनगिनत फोटो, मौके पर खरीदी गई दर्जनों किताबों पर हस्ताक्षर का गौरव, ढेर सारी सराहना और फिर ऐसे ही किसी आयोजन में मिलने के वादे के बीच यह कार्यक्रम संपन्न हुआ। 

कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण चरण यह था कि शुरुआत में रीडर्स क्लब ने सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रोफेसर शरद पगारे को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की और दो मिनट का मौन रखा।

 #अयोध्या22जनवरी 

#ayodhya22january

एक सौ एक नॉट आउट…!!


सौ साल पूरे करना किसी भी प्रसारण माध्यम/संस्थान के लिए गर्व की बात है। हमारे देश में विधिवत रेडियो प्रसारण का आज 101 वां जन्मदिन है।  23 जुलाई, 1927 को इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी (IBC) अस्तित्व में आई और यहीं से रेडियो प्रसारण को सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन मिला. यही कारण है कि 23 जुलाई राष्ट्रीय प्रसारण दिवस के रूप में मनाया जाता है. 

वैसे निजी तौर पर रेडियो प्रसारण 1923 से शुरू हो गया था। 8 जून 1936 को इसे ऑल इंडिया रेडियो (AIR) नाम  दिया गया और 1957 में आकाशवाणी नाम अपनाकर कर यह रेडियो प्रसारण का पर्याय बन गया ।  हर साल नेशनल ब्रॉडकास्टिंग दिवस सेलिब्रेट करने का उद्देश्य रेडियो का महत्व याद दिलाना है।

 इन सौ सालों में रेडियो ने सतत रूप से जवान होते हुए कई उपलब्धियां हासिल की हैं। अब नए नवेले डिजिटल रूप में साफ आवाज़, अल्फाज़ और अंदाज़ में यह मोबाइल फोन और कार के साउंड सिस्टम के जरिए हर घर तक पहुंच रहा है और हर दिल में जगह बना रहा है। यह हर जेब का हिस्सा भी बन चुका है। 

 हाल ही में रायटर और ऑक्सफोर्ड जैसे नामचीन संस्थानों के सर्वे में आकाशवाणी और आकाशवाणी से प्रसारित समाचारों को देश भर के सभी मीडिया में सबसे विश्वसनीय माना गया है। 

तकनीकी के साथ कदम से कदम मिलाते हुए आकाशवाणी की सेवाएं अब रेडियो से भी आगे मोबाइल ऐप newsonair पर लाइव उपलब्ध हैं और आप दुनियाभर में कहीं से भी एक टच पर भोपाल से लेकर देश के किसी भी रेडियो स्टेशन का प्रसारण सुन सकते हैं।   

इसके अलावा,हमारे समाचार बुलेटिन और समसामयिक कार्यक्रम यूट्यूब, एक्स और फेसबुक पर भी उपलब्ध हैं जिन्हें आप अपनी सुविधा से कभी भी और कहीं भी सुन सकते हैं। इसलिए,सबसे विश्वसनीय/सटीक/सहज और सहयोगी माध्यम के हमारे जीवन से जुड़ने-ज़िंदगी का हिस्सा बनने और तमाम उतार चढ़ाव के बाद भी निरंतर सहभागी के रूप में कायम रहने की बधाई। रेडियो इसी तरह फले फूले… सभी रेडियो प्रेमियों को बधाई-शुभकामनाएं🙏

क्या रेडियो डाइंग मीडियम है?


रेडियो डाइंग मीडियम है? रेडियो कौन सुनता है? आकाशवाणी में कैरियर की क्या संभावनाएं हैं? रेडियो प्रसारण कितने प्रकार के हैं?आकाशवाणी के समाचारों की कॉपी कैसे लिखी जाती है? यह अख़बार की न्यूज से कितनी अलग है? जैसे तमाम सवालों के साथ #lnctbhopal के ‘स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन’ के विद्यार्थियों की टीम तैयार थी…अवसर था-#राष्ट्रीयप्रसारणदिवस पर ‘बदलते वक्त के साथ बदलता रेडियो’ विषय पर संवाद का।  

सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और इससे आगे बढ़ चुकी नई पीढ़ी के साथ सौ साल पुराने मीडियम की बात करना और उन्हें बातचीत में रुचि के साथ जोड़े रखना आसान नहीं है लेकिन #LNCT के सुलझे हुए गुरुओं Anu Shrivastava जी, @ManishkantJain और अन्य सहयोगियों की विद्वान टीम तथा अनुशासित विद्यार्थियों ने इस संवाद को आसान बना दिया और चर्चा संपन्न होने के बाद अधिकतर विद्यार्थियों की व्यक्त/अनकही प्रतिक्रिया यही थी कि- रेडियो और खासकर #आकाशवाणी में इतना कुछ है,हमें पता ही नहीं था।  

कुछ विदेशी विद्यार्थियों को भी भारत के लोक प्रसारक के बारे में बताने का मौका मिला। उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि इस संवाद सत्र के बाद विद्यार्थियों की यह गलतफहमी दूर हो गई होगी कि रेडियो डाइंग मीडियम है और वे यह बात भी समझ सके होंगे कि रेडियो वक्त के साथ बदलता माध्यम है और भविष्य की संभावनाओं से भरपूर भी…कुल मिलाकर, एक अच्छा दिन,मजेदार संवाद और सिखाने से ज्यादा सीखने वाला भी।

बूंदों,बादलों,पानी और हरियाली का मेला!!

नीचे लबालब पानी,ऊपर शरारती बूंदें और चारों ओर मानसून में नहाकर चमकदार हरे रंग में रंगे वृक्षों से भरा घना जंगल। हम किसी अबूझ द्वीप या विदेश की किसी सिनेमाई लोकेशन की बात नहीं कर रहे बल्कि अपने शहर भोपाल के इर्द गिर्द बसे कई प्राकृतिक श्वसन तंत्रों में से एक कोलार डैम की बात कर रहे हैं। इन दिनों यहां प्रकृति की नैसर्गिक सुंदरता कई गुना बढ़ गई है।  

चेहरे के साथ अठखेलियां करती कभी नन्हीं तो कभी बादलों से तर माल उड़ाकर आईं मोटी बूंदे, कभी भिगोकर तो कभी छींटें मारकर हमारे आसपास अपनी मौजूदगी का सतत अहसास कराती रहती हैं। वहीं, काले, घने, मचलते बादल एक छोर से दूसरे छोर तक रेस लगाते से नज़र आते हैं। ऐसा लगता है अभी टूटकर बरस पड़ेंगे और आपके पास छाते में छिपकर कार में घुसने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रहेगा..लेकिन जैसे ही आप डरकर भागते हैं,ये नटखट और बदमाश बादल खिलखिलाते हुए कोलार बांध को दूर से निहारने के लिए कहीं ओर टहलने निकल जाते हैं। 

आप, बादलों और बूंदों के खेल में ठीक से शामिल भी नहीं हो पाते हो कि नीचे कोलाहल करती विशाल जलराशि अपनी ओर ध्यान खींचने का पुरजोर प्रयास करती दिखती है। अथाए पानी, दूर दूर तक बस पानी ही पानी…जैसे समंदर हो। बड़े तालाब का तो फिर भी ओर-छोर दिखता है परंतु कोलार डैम में बस पानी ही पानी दिखता है। यहां पानी ने पेड़ों के समूह को खास गोलाकार अंदाज में अपनी बांहों में समेट रखा है जैसे थोड़ी-थोड़ी दूर पर पानी के गमलों में किसी ने पेड़ लगा दिए हों। 

वैसे तो रहीम कह गए हैं कि ‘बिन पानी सब सून..’, लेकिन यहां पानी से भी आकर्षक है चटक हरियाली,आंखों को लुभाती, मोबाइल के कैमरों पर कब्ज़ा जमाती और हर फोटो के लिए खूबसूरत बैकग्राउंड बनाती हरियाली। आप चाहकर भी अपने आपको रोक नहीं सकते और जब पेड़ों,पानी, बादल,बूंदों (छुट्टी के दिनों में डीजल पेट्रोल भी) की मिली-जुली महक आपकी सांसों से होती हुई फेफड़ों में पहुंचती है तो वे भी फूलकर 56 इंच के होना चाहते हैं ताकि कुछ हफ्ते या महीने की शुद्ध हवा को जमा कर सकें। 

कोलार रोड पर बैरागढ़ चीचली के बाद कालापानी जैसे अंतिम गांव को पार करते ही आप प्रकृति की इस लीला के साक्षी बनने लगते हैं। सड़क के दोनों ओर से ताका झांकी करते कई प्रजातियों के पेड़ आपके साथ साथ चलते हैं। रास्ते में,लाल कोयले पर सिंकते पीले भुट्टो की खुशबू से यदि आप मदहोश नहीं हुए तो अपने समय पर कोलार डैम पहुंच जायेंगे और भुट्टों ने मोहपाश में बांध लिया तो कुछ देर बाद।  

हरियाली और जंगल का आलम यह है कि ऊंचाई से दिखते सड़क के कुछ टुकड़े अपने अस्तित्व के लिए लड़ते दिखते हैं। यदि आप भदभदा के गेट के दीदार और यहां जुटती भीड़ से ऊब चुके हैं तो आपके लिए कोलार डैम सर्वोत्तम विकल्प है। इसी तरह, यदि कलियासोत पर बाघ की मौजूदगी डराती है और केरवा की सड़क पर लगता जाम परेशान करता है तो जनाब,परिवार के साथ कोलार डैम का रुख करिए…यहां आपको फिलहाल प्रकृति की गोद में बैठ कर सुकून ही मिलेगा। 

अंत में एक सुझाव भी: कोलार या कहीं भी प्रकृति से साक्षात्कार करने जाएं तो अपनी कार दूर खड़ी कर पैदल ही घूमे।तभी आप इतना कुछ महसूस कर पाएंगे।

समोसे-कचौरी पर क्यों मेहरबान हैं ‘सरकार’

आप इन दिनों किसी भी सरकारी या गैर सरकारी आयोजन में जाइए, वहां खाने-पीने के नाम पर जो पैकेट दिए जाते हैं या फिर जो सामग्री परोसी जाती है उसमें समोसे, कचौरी, हॉट डॉग, बर्गर और गुलाब जामुन होना सामान्य बात है। वहीं, सामान्य ट्रेन तो छोड़िए वंदे भारत, शताब्दी और राजधानी जैसी प्रीमियम ट्रेनों में भी ब्रेकफास्ट से लेकर खाने तक के मैन्यू में समोसा, कचौरी, आइसक्रीम और गुलाब जामुन मिलना आम है। समोसा कचौरी और आइसक्रीम तो ट्रेन के खानपान का सबसे अनिवार्य हिस्सा है। कोई भी मौसम हो आपको भोजन के साथ दिन हो या रात आइसक्रीम जरूर दी जाएगी। हाल ही में मुझे विज्ञान के आईआईटी-आईआईएम स्तर के एक संस्थान के कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला। वहां भी अतिथियों से लेकर विद्यार्थियों तक को खाने के नाम पर समोसा, कचौरी, हॉट डॉग और पेटिस जैसी सामग्री परोसी गई । हर सरकारी और प्राइवेट सेक्टर की कैंटीन में समोसा-कचौरी का सबसे अहम स्थान पर बैठकर इठलाना आम बात है। समोसा और कचौरी ही क्यों, गोलगप्पे, चाट, जलेबी, पकोड़े, सैंडविच, केक, ब्रेड, ब्रेड पकौड़े, मोमोज, चाउमिन, पराठे, कटलेट, फ्रेंच फ्राइज़ जैसी तमाम स्वादिष्ट और जीभ ललचाने वाली और जंक फूड परिवार का अभिन्न अंग सामग्रियां हर छोटे बड़े शहर और दफ्तर का अनिवार्य हिस्सा हैं। ये सभी सामग्रियां स्वाद से भरपूर हैं और निश्चित ही यह लेख पढ़ते वक्त आपके मुंह में भी पानी आ रहा होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि तेल, नमक, चीनी और फैट से भरपूर यह खान-पान हमारी सेहत को कितना नुकसान पहुंचा रहा है? सोचिए, जिस देश में मधुमेह से पीड़ित लोगों की संख्या करोड़ों में हो और उतनी ही संख्या में लोग बीपी यानी उच्च रक्तचाप से पीड़ित हो वहां ट्रेन से लेकर शैक्षणिक संस्थानों तक और सरकारी आयोजनों से लेकर गैर सरकारी पार्टियों तक में खुलकर जंक फूड परोसा जाता है। हम सब जानते हैं कि जंक फूड का मतलब ऐसे खाने से है जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है। फिर भी न तो इस बात की फिक्र आयोजकों को है और न ही आम तौर पर खाने वालों को। बाजार में तो जंक फूड की दुकानें सजी हुई है। रेहड़ी पटरी से लेकर लक दक मॉल में बड़े बड़े ब्रांड के खान-पान सेंटर तक में इनकी भरमार है। रही सही कसर, पिज़्ज़ा-बर्गर और इसी तरह के अन्य विदेशी खान-पान ने पूरी कर दी है। परिवार के परिवार बिना अपनी सेहत की चिंता किए आए दिन जंक फूड की पार्टियां कर रहे हैं । बाजार का तो समझ में आता है क्योंकि वह मुनाफे के लिए ही काम करता है लेकिन आम लोगों और खासकर शैक्षणिक और सरकारी संस्थाओं का क्या? उन्हें तो कम से कम इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह अपने खान-पान के जरिए आदर्श स्थापित करें। एक और सरकार मोटे अनाज को भगवान का प्रसाद यानी श्रीअन्न कहकर बढ़ावा दे रही है, वहीं उसके ही मातहत संस्थान दिन रात जंक फूड खिलाकर आम लोगों को बीमार बनाने का काम कर रहे हैं।


इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट के अनुसार 20 से 79 साल की उम्र के 463 मिलियन लोग डायबिटीज की बीमारी से ग्रसित हैं। यह इस आयु वर्ग में दुनिया की 9.3 फीसदी आबादी है। रिपोर्ट कहती है कि चीन, भारत और अमेरिका में सबसे अधिक डायबिटीज के वयस्क मरीज हैं।


2021 के अध्ययन के अनुसार, भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग मधुमेह से ग्रसित हैं और इतने ही  प्री-डायबिटीज थे, जबकि 31 करोड़ से ज्यादा लोगों को उच्च रक्तचाप था। इसके अलावा, 25 करोड़ से ज्यादा लोग मोटापे का शिकार हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा 2017 में जारी अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, अनुमान है कि भारत में गैर संचारी रोग के कारण होने वाली मौतों का अनुपात 1990 में 37.9 प्रतिशत से बढ़कर 2016 में 61.8 प्रतिशत हो गया है । भारत में मधुमेह और इसके दुष्प्रभावों की वजह से दस करोड़ से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है । जबकि इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट कहती है कि 20-79 आयु वर्ग को होने वाली डायबिटीज के मामले में भारत दूसरे नंबर पर है। 


जिस देश में जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों की स्थिति इतनी भयानक हो और हम फिर भी शौक से हर शादी/पार्टी में जंक फूड ठूंस ठूंस कर खा रहे हैं तो हमारा भविष्य क्या और कैसा होगा,इसका सहज अंदाजा लगा सकते हैं। 2019 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि खराब आहार से वैश्विक स्तर पर तंबाकू की तुलना में ज्‍यादा लोगों की मौत होती है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वयस्‍क किसी न किसी रूप में अस्‍वस्‍थ खा रहे हैं, जिससे कुपोषण जैसी समस्‍याएं बढ़ती जा रही हैं। हमारे आहार में जंक फूड का दायरा इतना बढ़ चुका है कि भारत में 25 प्रतिशत से ज्‍यादा वयस्‍क सप्ताह में एक बार भी हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन नहीं करते। नतीजा वे बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। 


जंक फूड में मैदा और आलू से भी ज्यादा हानिकारक तेल होता है। वही तेल, जिसमें डूबते उतराते समोसे-कचौरी और ब्रेड पकौड़े देखकर हमारी लार टपकने लगती  है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के अनुसार एक बार खाद्य तेल के प्रयोग के बाद दोबारा उपयोग करने से कैंसर जैसी बीमारी का खतरा रहता है। तेल को बार-बार गर्म करने से धीरे-धीरे फ्री रेडिकल्स बनने से एंटी आक्सीडेंट की मात्रा खत्म होने लगती है। इसमें खतरनाक कीटाणु जन्म लेने लगते हैं, जो खाने के साथ चिपक कर हमारी सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे बॉडी में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा भी तेजी से बढ़ जाती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण की गाइडलाइन के अनुसार खाद्य तेल को तीन बार से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए । लेकिन घर से लेकर बाजार तक एक ही तेल का बार बार इस्तेमाल सामान्य बात है और मजे की बात यह है कि नियम जो भी हों परंतु तेल के बार बार उपयोग पर किसी को आपत्ति नहीं है।


भारत में जंक फूड के उत्पादन और 22सेबिक्री को नियंत्रित करने वाले कोई विशेष कानून नहीं हैं। देश में खाद्य उत्पादों की सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ही जिम्मेदार है। हालांकि, जंक फूड से संबंधित नियम इसके उपभोग से संबंधित बढ़ती चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त व्यापक नहीं है। प्राधिकरण ने उच्च वसा, नमक और चीनी वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री और विपणन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि ऐसे खाद्य पदार्थों को स्कूलों के 50 मीटर के भीतर बेचा या विज्ञापित नहीं किया जा सकता है, और इन खाद्य पदार्थों के विज्ञापन टेलीविजन पर बच्चों के कार्यक्रमों के दौरान प्रसारित नहीं किए जा सकते हैं। हालाँकि, ये दिशा-निर्देश स्वैच्छिक हैं, और इनका पालन न करने पर कोई दंड नहीं है। इसलिए सबसे जरूरी है कि जंक फूड को स्वाद के साथ सेहतमंद बनाने के लिए कुछ अनिवार्य कानूनी पहल होनी चाहिए मसलन कुछ देशों में शुरुआत हुई है जैसे कोलंबिया में ऐसे खाद्य पदार्थों पर टैक्स की दर बढ़ा दी गई है। द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित खाद्य पदार्थों पर अतिरिक्त टैक्‍स 10 फीसदी से शुरू होगा, जो अगले साल बढ़कर 15 प्रतिशत हो जाएगा और 2025 में 20 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। हेल्थ पॉलिसी वॉच वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार, टैक्‍स के दायरे में ऐसे सभी अल्ट्रा-प्रोसेस्‍ड फूड शामिल किए गए हैं, जिनमें ज्‍यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट , सॉसेज, अनाज, जेली और जैम, प्यूरी, सॉस और मसाला शामिल हैं। मैक्सिको जैसे कुछ अन्य देशों में भी कदम उठाए गए हैं लेकिन हम नियमों और जागरूकता के अभाव में अपने पेट को बीमारियों की गोदाम और देश को बीमारियों का गढ़ बना रहे हैं।


 क्या हम खानपान में कुछ अभिनव प्रयास नहीं कर सकते!! खासतौर पर ट्रेन, स्कूल कालेज की कैंटीन,सरकारी दफ्तरों की कैंटीन और सरकारी आयोजनों में मोटे अनाज से बने सेहतमंद खाद्य पदार्थ ही उपलब्ध हों, ट्रेन में शाकाहारी/मांसाहारी खाने की चॉइस के साथ साथ मधुमेह और उच्च रक्तचाप वाले लोगों के लिए अलग खाना परोसा जाए और समोसे कचौरी या आइसक्रीम को सरकारी मैन्यू से पूरीतरह बाहर कर दिया जाए। मैदे के बिस्किट और कुकीज़ को आटे या श्रीअन्न से बनाया जाए और ट्रेन/कैंटीन में पोहा,उपमा, इडली सांभर, बाजरे की खिचड़ी, चीला जैसे लज़ीज़ और सेहतमंद खानपान को शामिल किया जाए। पहले ही हम बहुत देर कर चुके हैं,यदि अभी भी जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो हमारे साथ साथ नई पीढ़ी भी बीमार बनती जाएगी और आने वाले सालों में हमारा युवा ‘डिविडेंड’ के स्थान पर देश के लिए बोझ बन जाएगा।


एक शहर से साक्षात्कार…!!

नब्बे के दशक में जवानी की दहलीज पर पांव रखते और आंखों में उजले सपने लिए हम लोग अपने अपने कस्बों से भोपाल के लिए उड़ चले थे। पृष्ठभूमि समान थी और परवरिश भी,सपने भी साझा थे और संघर्ष भी, पैसे भी सीमित थे और परिवारिक संस्कार भी एक जैसे, इसलिए ‘दुनिया गोल है’ के सिद्धांत पर अमल करते हुए हम साल-छह महीने के अंतराल में आखिर एक दूसरे से मिल ही गए और फिर हमने शुरू किया अपने सपनों का साझा सफर। तब एक गीत की यह पंक्तियां हमें राष्ट्रीय गीत सी लगती थी:

‘छोटे-छोटे शहरों से,

खाली भोर-दुपहरों से,

हम तो झोला उठाके चले।

बारिश कम-कम लगती है,

नदियां मद्धम लगती है,

हम समंदर के अंदर चले।’


वाकई, हमारा सफर कुएं से समंदर का था..अपने कस्बे से भोपाल जैसे बड़े शहर और प्रदेश की राजधानी में आना, किसी समंदर से कम नहीं था। यह बात अलग है कि प्रदेश की राजधानी भी बाद में पीछे छूट गई और कैरियर के विस्तार की रफ्तार राष्ट्रीय राजधानी तक ले गई। बहरहाल,सफर साझा था तो सामान भी,साथ भी और परस्पर सहयोग भी साझा ही था। इसका परिणाम यह हुआ कि ‘हम’ यानि मैं, इस पुस्तक के लेखक संजीव परसाई,मित्र संजय सक्सेना और अग्रज जैसे मित्र और इस पुस्तक के प्रकाशक प्रो मनोज कुमार यानि हमारे मनोज भैया और बिल्लू भैया मतलब अरविंद सिंह भाल जल्दी ही ‘मैं रंग शरबतों का तू मीठे घाट का पानी’ वाले अंदाज में इतने घुल-मिल गए कि आज तीन दशक बाद हमारी आधी दुनिया और परिवार की दूसरी पीढ़ी ने मिलकर हमारी दोस्ती को संयुक्त परिवार का सा रूप दे दिया है । हम सभी ने शहर-ए-भोपाल में सपने बुने और उन्हें पूरा भी किया। कभी शाहपुरा, तो कभी होशंगाबाद रोड, तो कभी श्यामला हिल्स होते हुए हमने भोपाल को करीब से जानने का हरसंभव प्रयास किया इसलिए जब संजीव (परसाई) ने भोपाल पर किताब लिखने का मन बनाया तो लगा कि यह किताब नहीं बल्कि साथ साथ जिए पलों की साझा यात्रा है। हम में से कुछ भोपाल से आते जाते रहे और संजीव जैसे कुछ दोस्तों के घर हमारे प्रवास का अड्डा। हमारी हर मुलाकात भोपाल को हमारे और क़रीब ले आती। शायद, ऐसी ही किसी परिस्थिति में जाने माने कवि ध्रुव शुक्ल को लिखना पड़ा होगा:

‘उसी शहर में नाल गड़ी है मेरी

उसी शहर में दाल पकी है मेरी

उसी शहर में रहते मेरे दोस्त

उसी शहर में बीवी बच्चे

उसी शहर खाल खिंची है मेरी

उसी शहर में बहुत दिनों तक

रहने से दुख होता है

उसी शहर में बहुत दिनों के बाद

लौट आने से सुख होता है।।’


संजीव अपनी लेखनी से हमें भोपाल को नए सिरे से जानने समझने का मौका देते हैं। हर पन्ने पर हमारी तीन दशकों की यादें उभर आई हैं। उनकी लेखन शैली सुसंगत और सुगम है। उन्होंने पाठकों को भोपाल की संस्कृति और इतिहास में गहराई से डुबोने के लिए प्रासंगिक संदर्भों और विवरणों का संतुलित समावेश किया है। ऐतिहासिक घटनाओं और सांस्कृतिक तत्वों का वर्णन बहुत ही सरल और स्पष्ट तरीके से किया गया है, जिससे पाठक आसानी से विषय को समझ सकते हैं। संजीव बिना कुछ कहे चुपचाप शब्दों का ऐसा मायाजाल रचते हैं कि हम भी उसमें खो जाना चाहते हैं। भोपाल को लेकर जो भाव हमारे हैं,शायद वही सोच जाने माने कवि/कलाकार हेमंत देवलेकर की भी रही होगी। तभी तो उन्होंने लिखा:

‘सुंदरता वह प्रतिभा है/जिसे रियाज़ की ज़रूरत नहीं/

भोपाल ऐसी ही प्रतिभा से संपन्न और सिद्ध/यह शहर कविताएँ लिखने के लिए पैदा हुआ/आप इसे पचमढ़ी का लाड़ला बेटा कह सकते हैं/पहाड़ यहाँ के आदिम नागरिक/झीलों ने आकर उनकी गृहस्थियाँ बसाई हैं/इस शहर में पानी की खदानें हैं/जिनमें तैर रहा है मछलियों का अक्षय खनिज भंडार/इस शहर में जितनी मीनारें हैं/उतने ही मंदिर भी/लेकिन बाग़ीचों की तादाद उन दोनों से ज़्यादा/रात भर चलते मुशायरों और क़व्वालियों के जलसों में/चाँद की तरह जागते इस शहर की नवाबी यादें/गुंबदों के उखड़ते पलस्तरों में से आज भी झाँकती हैं/इस शहर का सबसे ख़ूबसूरत वक़्त/शाम को झीलों के किनारे उतरता है/और यह शहर अपनी कमर के पट्टे ढीले कर/पहाड़ से पीठ टिका/अपने पाँव पानी में बहा देता है/और झील में दीये तैरने लगते हैं।’


अब बात पुस्तक की, ‘भोपाल: एक शहर हजार किस्से’ पुस्तक में संजीव परसाई ने भोपाल शहर की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और सामाजिक विविधताओं को अलग अलग किस्सों में पिरोया है। यह पुस्तक भोपाल शहर की तमाम कहानियाँ, अतीत के घटनाक्रम और स्थानीय किंवदंतियों को जीवंत तरीके से सिलसिलेवार पेश करती है। संजीव परसाई की धाराप्रवाह लेखनी  भोपाल शहर की व्यापक और विविध तस्वीर उकेरती है। लेखक ने इस शहर के इतिहास, संस्कृति, और सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से प्रस्तुत किया है।"भोपाल: एक शहर हजार किस्से" पुस्तक में भोपाल की ऐतिहासिक घटनाएँ, प्रमुख व्यक्तित्व और सांस्कृतिक परंपराओं की विविध कहानियाँ शामिल हैं। प्रत्येक कहानी एक अलग दृष्टिकोण से शहर के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती है, जैसे कि रानी कमलापति की कथा,नवाबी दौर, विलीनीकरण आंदोलन, स्थानीय किंवदंतियाँ और शहर की सांस्कृतिक पहचान। पुस्तक बदलते और संवरते भोपाल की बहुरंगी तस्वीर पेश करती है। जब कैनवास बड़ा होता है तो उसमें रंग भी बढ़ते जाते हैं। भोपाल के विस्तारित कैनवास में भी हमें इस पुस्तक के जरिए कहीं सांस्कृतिक इंद्रधनुष देखने को मिलता है तो कहीं भोपालियों का अलग मिजाज। कहीं बड़े तालाब की विशालता आश्चर्य से आंखें फैला देती है तो कहीं कंक्रीट के नए उगते पेड़ दिल में फांस सी चुभा देते हैं। कुछ ऐसी ही स्थितियों से दो चार हुए कवि राही डूमरचीर को लिखना पड़ा होगा:

‘दरमियाँ एक तालाब था

जो नदी-सा बहता था

अब कंक्रीट के महल हैं दरमियाँ

जो पानी की क़ब्र पर उगे हैं।’


भोपाल: एक शहर,हजार किस्से’ पुस्तक की लेखन शैली कथात्मक और जीवंत है। लेखक ने भोपाल की कहानियों को एक सम्मोहक तरीके से प्रस्तुत किया है, जिससे पाठकों को शहर की प्राचीनता और आधुनिकता के समन्वय का रोचक अनुभव होता है। कहानियों की शैली और भाषा पाठकों को समय और स्थान की सीमा से परे ले जाती है।


पुस्तक में ऐतिहासिक घटनाओं के साथ-साथ सांस्कृतिक परंपराओं का भी समावेश है। पाठक भोपाल की नवाबी धरोहर, ऐतिहासिक स्थल जैसे इस्लामपुर और भारत भवन सहित स्थानीय धरोहरों की कहानियों से परिचित होते हैं। पुस्तक में प्रस्तुत तथ्य और शोध गहन और सटीक हैं। श्री परसाई ने विभिन्न स्रोतों से जानकारी एकत्र की है और उसे विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। ऐतिहासिक डेटा, सांस्कृतिक संदर्भ, और अन्य विवरण वास्तविकता पर आधारित हैं, जो पुस्तक की विश्वसनीयता को बढ़ाते हैं।


पुस्तक हमें भोपाल शहर के इतिहास,परंपरा,समृद्धि, संस्कृति और विविधता को एक नए दृष्टिकोण से समझाती है। यह न केवल इतिहास प्रेमियों के लिए है, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जो स्थानीय कहानियों और सांस्कृतिक परंपराओं में रुचि रखते हैं। "भोपाल: एक शहर हजार किस्से" एक समृद्ध और मनोरंजक पुस्तक है जो भोपाल की अनगिनत कहानियों को प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक शहर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को एक दिलचस्प और कथात्मक तरीके से उजागर करती है। यह एक उत्कृष्ट पुस्तक है जो भोपाल शहर की गहरी समझ प्रदान करती है। इसके माध्यम से पाठक भोपाल की ऐतिहासिक यात्रा और सांस्कृतिक समृद्धि के एक अनूठे दृष्टिकोण को जान सकते हैं।  पुस्तक की उपयोगिता और विस्तृत विवरण इसे एक महत्वपूर्ण संदर्भ पुस्तक भी बनाते हैं।

अंत में,भोपाल एक ऐसा शहर है जहां हमें प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक विकास का एक अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है ।भोपाल विभिन्न संस्कृतियों का संगम  है। यहां हिंदू, मुस्लिम और अन्य धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं। यहां की हरी भरी वादियां,तालाब झीलें,पहाड़ और सांस्कृतिक सरोकारों का असर ऐसा है कि जो एक बार यहां आता है,यहीं का होकर रह जाता है। तभी तो प्रख्यात साहित्यकार मंगलेश डबराल ने लिखा है:

‘मैंने शहर को देखा और मैं मुस्कराया

वहाँ कोई कैसे रह सकता है

यह जानने मैं गया

और वापस न आया।’

मित्र संजीव ने ‘भोपाल: एक शहर हजार किस्से’ पुस्तक के जरिए भोपाल के दो सौ सालों से ज्यादा के विस्तार को डेढ़ सौ पन्नों में समेट दिया है। भोपाल शहर के लोगों,पर्यटकों और यहां आने वाले लोगों के लिए यह पुस्तक एक ज्ञानवर्धक,मनोरंजक और भावनात्मक सहयोगी साबित होगी…बधाई और अनेक शुभकामनाएं।




सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...