रविवार, 21 दिसंबर 2025

अरे बाप रे…40 हजार रुपए में एक किलो सब्जी !!

यह हिमालय की राजकुमारी है.. नाज़ुक, दुर्लभतम एवं इतनी शर्मीली की लाख तलाशने पर भी नज़र नहीं आती..और कीमती इतनी की इसके सामने सोना चांदी भी शरमा जाएं। यह कोई धातु नहीं है फिर भी इसे पहाड़ों का सोना कहा जाता है..इंसान नहीं है फिर भी राजकुमारी है और दवा नहीं है फिर भी दुनिया के किसी भी बेशकीमती नुस्खे से कम नहीं है। बर्फीली चोटियों पर पूरी शान-ओ-शौकत से रहने वाली यह नाजुक सी राजकुमारी दरअसल सब्जियों की दुनिया की ‘रॉयल प्रिंसेस’ है और इसका नाम भी कुछ अलग सा है - गुच्छी। 

मधुमक्खी के छत्ते (honeycomb) सा स्पंजी क्राउन पहने यह प्रिंसेस आमतौर पर जंगलों में छिपकर रहती है। जैसे ही हिमालय की बर्फ पिघलती है तो यह हौले से लजाते हुए बाहर झांकती है, जैसे शाही परिवार का कोई चश्म-ओ-चिराग अपने महल से निकल रहा हो। लेकिन राजकुमारी गुच्छी इतनी नखरेबाज है कि आसानी से नहीं मिलती बल्कि जंगलों में घंटों भटककर एवं जोखिम उठाकर ही इसे मनाना और लाना पड़ता है। अब रही कीमत की बात तो यह सब्जियों की सरताज है क्योंकि एक किलो सूखी गुच्छी की कीमत 30,000 से 40,000 रुपये है। इतनी कीमती कि, फाइव स्टार होटल में इसे डिश में डालते वक्त शेफ भी सोचते हैं कि गलती से ज्यादा न डल जाए..आखिर यह सोने से कम कीमती थोड़ी है। वैसे भी, सोना तो दुनिया भर में दाम चुकाकर मनचाही मात्रा में ले सकते हैं लेकिन हमारी गुच्छी प्रकृति में अवतरित ही इतनी कम मात्रा में होती हैं कि आप पैसा देकर भी ज्यादा नहीं खरीद सकते।

स्वाद में जादू, सेहत का खजाना, और रुतबे में सब्जियों की क्वीन— गुच्छी वास्तव में हिमाचल प्रदेश में पैदा होने वाल एक खास किस्म का मशरूम है। यह हिमाचल की बर्फीली ऊंचाइयों में छिपा एक ऐसा खजाना है जो प्रकृति का दुर्लभ उपहार है। हिमाचल प्रदेश के साथ साथ इसने धरती पर जन्नत यानि कश्मीर और उत्तराखंड में भी अपना घर बनाया है। हिमाचल प्रदेश में मुख्य रूप से कुल्लू, शिमला, मंडी और चंबा जैसे जिलों के घने जंगलों में बर्फ पिघलने के बाद यह मशरूम रहस्यमयी तरीके से उगता है। इसकी स्पंज जैसी आकृति, मिट्टी का स्वाद और औषधीय गुण इसे राजसी व्यंजनों का सरताज बनाते हैं। 

यही वजह है कि पुलाव से लेकर ग्रेवी तक, हर डिश में यह जादू बिखेरता है लेकिन इसकी यह कीमत सिर्फ स्वाद के कारण नहीं है बल्कि इसलिए भी है क्योंकि इसे खेती करके सामान्य रूप से खेत में नहीं उगाया जा सकता। यह मशरूम मनमर्जी का मालिक है और इसे जंगलों में खोजना पड़ता है। इतना ही नहीं, कभी-कभी तो जान जोखिम में डालकर भी यह पकड़ में नहीं आता। यही वजह है कि गुच्छी को ‘पहाड़ों का सोना’ कहा जाता है।

गुच्छी बाहर से रफ-टफ, अंदर से रसीली और स्वाद में इतनी लज़ीज़ है कि एक बार चखो तो पुलाव, बिरयानी या ग्रेवी इसके बिना अधूरी लगने लगते हैं। खास बात यह है कि ये सिर्फ स्वाद नहीं, सेहत का खजाना भी है। गुच्छी एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर और गठिया,एनीमिया और ट्यूमर से लड़ने वाला सुपरफूड है।  ये पोटेशियम, कॉपर, फास्फोरस, कैल्शियम,जिंक, कई विटामिन और आयरन से समृद्ध हैं। कई बी-विटामिनों के अलावा विटामिन डी का बड़ा स्रोत है जो शरीर को कई बीमारियों से बचा सकता है। यह हृदय रोगों और मधुमेह के उपचार में उपयोगी है। यह मूड स्विंग्स और क्रेविंग को भी नियंत्रित कर सकता है।

हिमाचल प्रदेश की ऊंची पहाड़ियों और घने जंगलों में पाया जाने वाला गुच्छी मशरूम का वैज्ञानिक नाम Morchella esculenta (मोर्चेला एस्कुलेंटा) है, जिसे आमतौर पर मोरल मशरूम के नाम से भी जाना जाता है और यह एस्कोमाइकोटा (Ascomycota) परिवार से संबंधित है। यह देवदार, सेब के बागों और पाइन के जंगलों के नीचे प्राकृतिक रूप से विकसित होता है। आयुर्वेदिक ग्रंथ चरकसंहिता में इसे सर्पच्छत्रक कहा गया है। हालांकि, अब जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप के कारण इसकी पैदावार में लगातार गिरावट आ रही है। दरअसल, बर्फ पिघलने के बाद  ही मिट्टी में नमी और उचित तापमान उपलब्ध होता है इसलिए गुच्छी पहले जनवरी से अप्रैल तक उपलब्ध होती थी, लेकिन हाल के वर्षों में मौसम में बदलाव और घटती बर्फबारी के कारण इसकी पैदावार खिसककर जून तक पहुंच गई है।

हिमाचल प्रदेश में गुच्छी की पैदावार मुख्य रूप से जंगली है, और इसका कोई आधिकारिक उत्पादन रिकॉर्ड नहीं मिलता लेकिन विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्ट में उपलब्ध आंकड़े भी इसकी गिरावट को दर्शाते हैं। मसलन शिमला जिले में 2008-2010 तक प्रति सीजन एक समूह 8 किलोग्राम तक गुच्छी मशरूम इकट्ठा कर लेता था, लेकिन अब बताते हैं कि बमुश्किल आधा किलो ही मिल पाता है। 

वैसे, उत्पादन में गिरावट के बाद भी वैश्विक स्तर पर, भारत गुच्छी का प्रमुख उत्पादक है। हमारा देश हर साल तकरीबन 50 टन सूखी गुच्छी का निर्यात करता है। जानकारों के मुताबिक गुच्छी को सुखाकर रखने से इसकी सेल्फ लाइफ़ काफी बढ़ जाती है। गुच्छी की पैदावार में गिरावट का मुख्य कारण पहाड़ों पर बढ़ते तापमान और कम वर्षा से मिट्टी की नमी प्रभावित होना है। इसके अलावा, वनों की कटाई, सेब के पुराने बागों का हटना और लालच में इसका अत्यधिक संग्रहण भी अहम कारण हैं। ज्यादा मशरूम हासिल करने के लिए कई बार इसे तोड़ने के बजाए जड़ से उखाड़ लिया जाता है । इससे न केवल इसके फैलाव पर असर पड़ा है बल्कि कई इलाकों में अब यह पैदा ही नहीं हो पा रहा।

हालांकि, ‘जहां चाह वहां राह’ की तर्ज पर गुच्छी की कृत्रिम खेती में काफी प्रगति देखने को मिल रही है। शिमला के पास स्थित सोलन में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मशरूम अनुसंधान निदेशालय ने भारत में गुच्छी की सफलतापूर्वक खेती की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है लेकिन इसके मुरीदों की नजर में यह वैसा ही है जैसे प्राकृतिक सोना और प्रयोगशाला में बना सोना। फिर भी, यह मशरूम चूंकि हिमाचल प्रदेश में न केवल स्थानीय संस्कृति का हिस्सा है, साथ ही एक अहम आर्थिक स्त्रोत भी है इसलिए, उम्मीद यही है कि सरकार और वैज्ञानिकों के प्रयास रंग लायेंगे और 'पहाड़ों का सोना' अपनी चमक बरकरार रख सकेगा। हम जैसे लोग भले ही इसे खरीदकर न खा पाएं लेकिन यह सोचकर गर्व तो कर ही सकते हैं कि दुनिया की सबसे महंगी यह सब्जी हमारे देश में पैदा होती है।


शनिवार, 13 दिसंबर 2025

मीठे राजमार्ग के माथे पर क्यों लगी हैं लाल बिंदी…!!


इन दिनों यदि आप ‘मीठे राजमार्ग’ से गुजर रहे होंगे तो आपको ताजे गुड़ की मदहोश करने वाली मिठास के साथ सड़क पर कुछ अनूठा..कुछ अलग भी नजर आएगा। ऐसा लगता है जैसे किसी ने राजमार्ग के माथे पर सुंदर सी लाल बिंदी लगा दी है। यह अनूठापन आकर्षक भी है और आपकी सुरक्षा का पहरेदार भी। मीठे राजमार्ग के बारे में और विस्तार से जानना हो तो आप इस लिंक के जरिए पढ़ सकते हैं।

मीठा राजमार्ग: जहां बन रहे मदहोश करने…

https://jugaali.blogspot.com/2024/12/blog-post_59.html

बहरहाल, अभी बात मीठे राजमार्ग के अनूठेपन की। दरअसल भोपाल से जबलपुर तक बिना किसी रुकावट के जाने के लिए बनाया गया नेशनल हाइवे क्रमांक 45 इन दिनों अपने रेड कार्पेट के कारण देश भर में चर्चा में है। ये टेबिल टॉप शैली में बने रेड कार्पेट पूरी सड़क की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे हैं। ये ऐसे लगते हैं जैसे महिलाएं माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी लगाती हैं। जैसे बिंदी सुहाग की सुरक्षा का प्रतीक मानी जाती है,इसी तरह यह रेड कार्पेट भी वाहन चालकों की सुरक्षा का प्रतीक है।

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एन एच ए आई) ने देश में संभवतः पहली बार यह अनूठा प्रयोग करते हुए नरसिंहपुर-जबलपुर के बीच पड़ने वाली सड़क पर 5 मिलीमीटर की मोटी लाल रंग की परत बिछाई गई है, इसे तकनीकी भाषा में टेबल टॉप मार्किंग नाम दिया गया है। इस लाल मोटी परत के ऊपर से गुजरते समय अंधाधुंध रफ्तार से चले आ रहे वाहन चालकों को हल्के झटके महसूस होते हैं जिससे वे सतर्क होकर अपनी स्पीड कम कर लेते हैं। वैसे भी, लाल रंग खतरे का प्रतीक है इसलिए दूर से ही इसे देखकर वाहन चालकों की रफ्तार मनोवैज्ञानिक तौर कम हो ही जाती है।

इसके अलावा, राजमार्ग पर रात में नींद या झपकी लग जाने के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए भी यहां सड़क के दोनों किनारों पर 5 मिलीमीटर मोटी सफेद पैवर शोल्डर लाइन भी बनाई  है। इसका फायदा यह है कि यदि ड्राइवर को एकाएक नींद आ जाती है और कार लहराकर सड़क के किनारे की ओर बढ़ने लगती है तो इस मोटी लाइन से टकराकर कार को झटके लगेंगे और वाहन चालक तत्काल सतर्क हो जाएगा जिससे दुर्घटना और जानमाल की क्षति भी कम होगी।

दरअसल, राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 45 का यह हिस्सा वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व और नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य की सीमा से गुजरता है। रात के समय  वन्य जीवों का सड़क पर आ जाना सामान्य बात है। इस रेड कार्पेट से वाहनों की रफ्तार तो कम हो ही जाएगी, साथ ही सड़क के बीचों बीच लाल निशान देखकर वे सतर्क भी हो जाएंगे। इसके फलस्वरूप वन्य प्राणियों की मौत और वाहनों की दुर्घटनाओं को रोकने में मदद मिलेगी। फिलहाल यह प्रयोग करीब दो किलोमीटर के इलाके में किया गया है। इस अभिनव प्रयास की सफलता का अध्ययन कर इसका भविष्य में और विस्तार किया जाएगा।

इस परियोजना की सबसे अहम खासियत यह है कि इसमें पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसमें 25 अंडरपास बनाए गए हैं ताकि अभ्यारण्य से गुजरने वाले वन्य जीव दिन या रात में कभी भी आसानी से आवाजाही कर सकें । यह राजमार्ग करीब 122 करोड़ रुपए में बनकर तैयार हुआ है। राजमार्ग के चौड़ीकरण की इस परियोजना में पहले से मौजूद डबल लेन को अब 4 लेन में बदला गया है। रेड कार्पेट, व्हाइट मार्किंग और अंडरपास सहित इन सभी प्रयासों का उद्देश्य जनहानि, दुर्घटनाओं को रोकना तथा वन्य प्राणियों की सुरक्षित आवाजाही सुरक्षित करना है और सबसे अहम बात यह है कि किसी भी प्रकार के ब्लैक स्पॉट की तत्काल पहचान कर उसे सभी के लिए सुरक्षित बनाना है।





गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

25 वें जन्मदिन पर पिता का पत्र बेटी के नाम

 🌹जन्मदिन मुबारक प्रिंसेस..🌹


हमारी नन्ही सी परी…देखते ही देखते सजीली राजकुमारी बन गई है। आज जब घड़ी ने बारह बजाए और हमने आँखें बंद कीं तो पूरे 25 साल का गुजरा समय किसी मनभावन फिल्म की भांति आंखों के सामने आ गया…11 दिसंबर, 2000 को सोमवार का दिन था और उस दिन पूर्णिमा थी। पूरी  दुनिया को दूधिया रोशनी से जगमगाते हुए तुमने रात करीब 10 बजे हमारे जीवन में हौले से कदम रखा और फिर क्या था..हमारी दुनिया भी रोशन होती चली गई।

तुमको शायद न पता हो कि 11 दिसम्बर का दिन पर्वतीय पर्यावरण के महत्व के लिए मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस के रूप में भी जाना जाता है और जन्म के बाद आज तुम्हारे 25वें जन्मदिन का जश्न भी हिमालय की गोद में पहाड़ों की रानी शिमला की बाहों में मनाने का अवसर मिला है।

जब तुमने अपने नन्हे हाथ को मेरे हाथ में रखा था तो लगा कि चांद हथेली पर उतर आया हो। जब पहली बार तुमने मेरी अंगुली पकड़ी थी तो इतना जोर लगाया था कि आज तक उसकी गर्माहट महसूस होती है और लगा जैसे तुम कह रही हो, कि पापा इसी तरह अंगुली थामे रहना। उस पल से लेकर आज तक, सच में हम लोग बस तुम्हारे लिए, तुम्हारे सपनों और तुम्हारी खुशियों के साथ साथ आगे बढ़ रहे हैं। 

इन पच्चीस साल सालों में हमने हर साल साथ साथ केक काटा है, साथ साथ खाया है और कभी रात को तो कभी दिन के उजाले में जश्न मनाया है..याद है बेटा तुमको, तुम बचपन से कैसे गपागप केक खाती आ रही हो..कई बार तो हमारे लिए भी बमुश्किल बचा था और हमने तुम्हारे केक पर लट्टू हो जाने को कितनी बार कैमरे में कैद किया है, पर तुम बिंदास..इस सबसे परे… केक का आनंद उठाती रहती हो..यह बचपना ही तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त है, इसे सम्भाल कर रखना।

मम्मी पापा के लिए तुम कितनी खास हो…याद है, जब तुमने ताइक्वांडो सीखना शुरू किया और फ़िफ्थ क्लास में ही बढ़िया करते हुए जिला स्तरीय फाइनल तक पहुंची थीं लेकिन तुम्हारे मुकाबले तुमसे दोगुनी उम्र,कद काठी की लड़की को देखकर मैंने उसे वॉक ओवर दिला दिया था जबकि हमें पता था कि तुम उसे भी जबरदस्त चुनौती देती…लेकिन मम्मी पापा का दिल तो कोमल है। हमारी फूल सी राजनंदिनी को महज एक पदक के लिए हम मारपीट करते कैसे देख सकते थे..फिर हमने तुम्हारे रजत पदक का गोल्डन जश्न दिल्ली के अंतरिक्ष रेस्त्रां में मनाया था..वही जो देश का पहला घूमता हुआ होटल था और शायद वहां फिल्म नसीब की शूटिंग भी हुई थी।

तुमने शुरू से ही कैप्टन और एक सुलझे हुए एडमिनिस्ट्रेटर के गुण दिखाएं हैं जो आज तक कायम हैं। जब दिल्ली के मयूर पब्लिक स्कूल में शायद थर्ड क्लास में ही तुमने एनुअल डे सेलिब्रेशन की जबरदस्त एंकरिंग कर जमकर तालियां और टीचर्स की सराहना बटोरी थी तो हमारी आंखों में आंसू आ गए थे..खुशी के आंसू। शायद, तुम्हारी मम्मी तुम्हें यूं ही रेडियो/आकाशवाणी नहीं कहती ..तुम्हारी दिन भर की चटर पटर ने ही तुम्हें बड़े स्टेज पर बेझिझक संचालन का हौंसला दिया। और ये भी क्या सुखद संयोग है कि आकाशवाणी नाम तुम्हारा पड़ा और बाद में काम मुझे करना पड़ा। वैसे, बुआ लोगों ने भी बुलबुल नाम सोच समझकर ही रखा होगा।

तुम हमारी हिम्मत और हौंसला हो। याद है, जब दिल्ली से असम के अंजान और दूरदराज़ के क्षेत्र सिलचर में मेरा ट्रांसफर हुआ तो मुझे सबसे बड़ी चिंता यही थी कि अब हमारी बुलबुल के दोस्त छूट जाएंगे और उसका बचपना कुम्हला न जाए परन्तु तुमने कहा कि पापा, चिंता मत करो, मैं एक हफ्ते में दोस्त बना लूंगी और तुम्हारे इस एक वाक्य ने इतनी हिम्मत दी कि हम करीब पांच साल वहां रह गए और वहां से कई परिवार, दोस्तों और शुभचिंतकों का पूरा काफिला लेकर लौटे।

एक सच्ची बात बताएं बेटा..हम लाख हिम्मत, दिलेरी और मजबूती दिखाएं लेकिन सच यह है कि जब भी तुम घर से/हमसे दूर जाती हो तो कलेजे में हूक सी उठती है,दिल बैठ जाता है और मन उदास..पर,हम तुम्हारी उड़ान नहीं रोकना चाहते इसलिए तुम्हारे पंख लगातार मजबूत करते जाते हैं..फिर चाहे तुम्हारा भोपाल से बाहर पिकनिक पर जाना हो, दिल्ली की मशहूर ताजमहल होटल में प्रोफेशनल ट्रेनिंग हो या बीकानेरवाला में कैंपस सिलेक्शन हो या फिर ताज ग्रुप ज्वाइन करना हो..कुछ मन में अटकता तो जरूर है।

अब तुम पच्चीस की हो गई हो तो कुछ बातें भी नियत हैं कि तुम्हें एक दिन तो किसी दूसरे परिवार की पूनम बनना है इसलिए हमें यह डर तो लगता है कि हमारी नासमझ सी, भोली सी और भावुक सी बिटिया एक दिन दूर चली जाएगी और कैसे संभालेगी सब कुछ..फिर तुम्हारी मम्मी आश्वस्त होकर कहती हैं कि वो सब सम्भाल लेगी जैसे नौकरी में इंडिपेंडेंट है बिल्कुल वैसे ही हर दायित्व बेहतरीन तरीके से पूरा करेगी। मम्मी का भरोसा मुझे भी हौंसला देता है।

बहुत सारे किस्से हैं, बातें हैं, यादें हैं..तुम्हारा पहली बार स्कूल जाना,बीमार पड़ी तो अस्पताल में हमारा रात गुजारना, तुम्हारा क्लास में नाम बहुत पीछे आने के कारण संस्कृति से बदलकर आद्या करना,पहली बार खाना बनाना, वो हरी मिर्च की सब्जी, पनीर की खीर, बिना बेसन की कढ़ी, हमारी एनिवर्सरी पर खाना बनाते हुए तुम्हारा जल जाना और फिर भी अपना दर्द भूलकर बिना रुके पूरा खाना बनाकर सेलीब्रेट करना, तुम्हारे साथ ताजमहल जैसे होटल की पहली बार यात्रा, बारहवीं की परीक्षा शानदार अंकों के साथ पास करने के बाद नेशनल फुट वेयर डिजाइन इंस्टीट्यूट से लेकर सिंबायोसिस और आईएचएम जैसे नेशनल एक्जाम एक ही बार में निकालकर सभी जगह एडमिशन के झंडे गाड़ना…लिस्ट लंबी है।

आज तुम पच्चीस की हो गई हो और खूब समझदार भी । अब तुम अच्छे से जानती हो कि ज़िंदगी कितनी सहज एवं निष्ठुर हो सकती है। कौन तुम्हारा भला चाहता है और कौन बुरा..समाज में कैसे लोगों का बहुमत है। तुमने लड़ना भी सीख लिया है और जीतना भी । तुमने खोया भी, और फिर उससे ज्यादा पाया भी है। पर एक बात नहीं बदली और न कभी बदलेगी—जब भी तुम मुश्किल में होती हो या उपलब्धियों के साथ, तुम्हारी आँखें हमें ही ढूँढती हैं। बस हमारे लिए यही काफी है, तुम्हारा यह लगाव पूरी दुनिया जीत लेने की ताकत बन जाता है। अब तुम्हें कुछ सिखाने की जरूरत नहीं है बल्कि अब तो तुमसे सीखना है ।

फिर भी, हम इतना कहना चाहते हैं—जब भी थकोगी, तो हमारे कंधे तुम्हारे लिए उतने ही मज़बूत बने रहेंगे जैसे बचपन में तुम्हें कंधों पर बिठाकर घुमाया करते थे। जब भी रोना चाहोगी (आंसू खुशी में भी आते हैं), तो मेरी शर्ट और मम्मी का आंचल अभी भी उतनी ही मुलायम है। जब भी डर लगेगा, हम मजबूती से तुम्हारे पीछे खड़े हैं.. और जब भी खुश होना चाहोगी, हमारी हँसी तुम्हारी खिलखिलाहट को और बढ़ा देगी।  हमारी प्रिय बिटिया रानी, तुम हमारे लिए वो कीमती किताब हो जिसे हम बार-बार पढ़ना तथा सहेजना चाहते हैं । तुम हमारा वो प्रिय गीत हो जिसे हम सदैव गुनगुनाना चाहते हैं । तुम हमारी लिए वो दुआ हो जिसे  हम हर प्रार्थना, हर पूजा, हर साँस में माँगते हैं ।

❤️ पच्चीसवाँ जन्मदिन मुबारक हो, 

हमारी राजदुलारी..लवली प्रिंसेस ❤️

सदैव तुम्हारे पीछे मौजूद

मम्मी पापा

रविवार, 7 दिसंबर 2025

व्यंग्य: गो मूत्र से वोट कहते हैं


आवश्यकता आविष्कार की जननी है और भारत आविष्कारों (पढ़िये चमत्कारों) का देश है। आविष्कार (चमत्कार) भी ऐसे-ऐसे कि अमेरिका-जापान जैसे 'आविष्कार केंद्रित' देश और नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक भी दांतों तले अंगुली दबा लें। हमें स्कूल के दिनों से रटाया जाता है कि शून्य का आविष्कार भारत ने ही किया था। इस खोज का कितना लाभ हम उठा पाए यह तो वैदिक, ज्योतिष एवं कर्मकांडों को स्कूल-कालेजों में अनिवार्य विषय बनवाने वाले 'शिक्षा शंकराचार्य' जाने, पर इस शून्य को एक से लेकर नौ अंकों के साथ मनचाही बार प्रयुक्त कर 'रिश्वत' का आविष्कार जरूर हमने कर दिखाया है क्योंकि 'रिश्वत हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, इसे हम लेकर रहेंगे' की तर्ज पर 'रिश्वोत्री' (रिश्वत की गंगोत्री) को पूरे देश में समान गति से बहते देखकर इस आविष्कार की सार्थकता एवं कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है जैसी 'राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण' होता है। 'राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण' वाक्य का इस्तेमाल करने के लिए मैं हमारे हिन्दू मठाधीशों से माफी मांगता हूं। दरअसल इसका तो उन्हें पेटेंट करा लेना चाहिए क्योंकि बार-बार उन्हें ही इसकी जरूरत पड़ती है।  

बहरहाल, हम आविष्कारों की बात कर रहे है तो पत्तियों पर नाग-नागिन और गणेशजी के दूध पीने के कारनामे क्या और कोई देश तथा वैज्ञानिक दिखा सकता है। हो सकता है अपनी 'लेब' में 'सुपर कम्प्यूटर' का इस्तेमाल कर कोई सिरफिरा वैज्ञानिक एकाध बार ऐसा कर दिखाए, पर पूरे देश में लाखों-करोड़ों लोगों को एकजुट कर यह चमत्कार हमारे यहां ही संभव है। और हो भी क्यों न हम उस देश के वासी हैं जहां गंगा बहती है, पर अब इस गाने में 'गंगा बहती है' के स्थान पर 'गाय रहती है' कहना चाहिए क्योंकि वर्षों से 'पाप घोते-घोते' गंगा के चमत्कार तो चुक गए। अब गाय यानि गोमाता की बारी है। 

गोमाता अपने दूध, गोबर, गोमूत्र जैसे पंचद्रव्यों के माध्यम पहले ही चमत्कार दिखाती रही है। पर इस बार चमत्कार गोमाता ने नहीं, हमारे नेताओं ने दिखाया है। वे ऐसा आविष्कार करने में जुटे हैं, जो यदि सफल हो गया तो भूमंडलीकरण और मंडल कमंडल में व्यस्त देश की दिशा ही बदल जाएगी तथा धार्मिक रूप से प्रतिष्ठित गाय न केवल राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हो जाएगी साथ ही 'गो-रत्न, गो-श्री, गो-विभूषण जैसे पुरस्कारों की जन्मदात्री भी। यह आविष्कार है गोमूत्र से वोट बनाने का। अरे, वही जो हमारे लोकतंत्र का भूत-भविष्य-वर्तमान हैं, जो किसी को धरती से आसमान एवं आकाश से धरती पर ला सकता है। यह इतना शक्तिशाली है कि इसकी मार परमाणु या हाइड्रोजन बम पर भी भारी है। इसका समर्थन रंक से राजा बना सकता है।  

 गोमूत्र से वोट बनाने का फार्मूला हिंदी पट्टी की राजनीति की उपज है। एक नेता ने घोषणा कर दी कि गोमूत्र, अमृत के समान है। बस फिर क्या था, सभी राजनीतिक दलों में गोमूत्र से वोट बनाने की होड़ लग गयी। हर कोई अपने को गाय का प्रवक्ता बताना चाहता है। गोशालाएं सुधरने-संवरने लगी है। वर्षों से भूखी-मरियल गाय भरपेट, वह भी दिन में कई बार खाकर आशीष लुटाने लगी है। शहर-शहर में गाय पुज रही है, सज रही है मानो गाय न होकर सौन्दर्य स्पर्धा की तैयारी में जुटी सुन्दरी हो। 

 राजनीति के वैज्ञानिकों का कहना है गाय को जितनी सेवा कर खुश रखोगे, उतनी ही अच्छी वोटों की फसल होगी। गाय के नए झंडाबरदार तैयार होते देख राजनीति के मठाधीशों की भी नींद उड़ गयी है। अब गाय के असली उत्तराधिकारी को लेकर जंग छिड़ी है, असली-नकली बताने के पोस्टर छप रहे हैं और राजनीतिकों में एकाएक पनपें 'गो प्रेम' से हैरान गाय माता कातर निगाहों से देख रही है। 

बचपन में ऐसा ही गो-प्रेम दिखाकर परीक्षा में बिना कुछ लिखे अंक हासिल करने के लिए हमारे एक सहपाठी ने उत्तर पुस्तिका में लिख दिया था- 'गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है,' पर अंक देना तो दूर परीक्षक ने जवाब लिख भेजा-'बैल तुम्हारा बाप है, नम्बर देना पाप है।' अब देखना यह है कि चुनावी परीक्षा का परीक्षक यानि मतदाता क्या फैसला देता है, तब तक तो गायों की मौज हैं।

वर्षा विगत चुनाव ऋतु आई...

वर्षा विगत चुनाव ऋतु आई...... पढ़ कर इस गुस्ताख़ी के लिए संत तुलसीदास जी माफ़ करें क्योंकि उन्होंने तो वर्षा विगत शरद ऋतु आई... लिखा है। मौसम विभाग के बाबू भी नाराज़ न हों क्योंकि मौसम परिवर्तन की सूचना देना तो उनकी बपौती है। फिर चाहे वे गर्मी में पानी गिरने की और वर्षा में तीखी गर्मी की भविष्यवाणी क्यों न करते हों और उनके पूर्वानुमानों पर आस लगाकर कितने ही किसान हर साल बर्बाद होते हों। खैर, मौसम विभाग के किस्से तो कहानी घर घर की तरह देशभर में समान रुप से चर्चित हैं। यहाँ पेश है संत तुलसीदास की इन प्रसिद्ध पंक्तियों पर रामायण काल और आधुनिक काल की दो सखियों की बात-चीत:  

सखी (एक): हे सखी, देख वर्षा ऋतु बीतने को है। शरद ऋतु के स्वागत की तैयारियों में धरती हरियाली और रंग-बिरंगे फूलों से सज गयी है।  

सखी (दो): तुम गलत समझ रही हो सहेली, यह सजावट शरद ऋतु के स्वागत की नहीं, बल्कि चुनाव की तैयारियाँ हैं। जिसे तुम हरियाली और रंग-बिरंगे फूल समझ रही हो वे राजनीतिक पार्टियों के झंडे, बैनर, पोस्टर है। पगली ये चुनाव ऋतु है।  

सखी (एक): पर देख, फूले काँस सकल महि छाये वर्षा बूढ़ी हो रही हो? इस सफेदी से लग रहा है मानो..वर्षा विदाई की ओर है?  

सखी (दो): तुम्हे कैसे समझाऊ, यह सफेदी काँस के फूलों की नहीं, बल्कि राजनीतिक पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के नए-नए कुर्ते-पायजामों की है। चुनाव की बेला में सेठ- साहूकार- कलाकार-दलाल, सभी यह वेशभूषा धारण कर लेते हैं। तभी वे जनप्रतिनिधि कहलाने के हकदार बनते हैं।  

सखी (एक): लेकिन, दादुरों (मेंढक) के समूह कोरस में वर्षा की विदाई को अभिव्यक्त कर रहे है?  

सखी(दो): तुम निरी मूर्ख ठहरी, रीतिकाल से बाहर आओ। यह चुनाव काल है। यह मेंढक की नहीं नेताओं की आवाज़ है। पूरे पाँच साल बाद वे कोरस में अपनी उपस्थिति और जनता से किए गए वादो को दुहरा रहे हैं। 

सखी(एक): देख-देख, शरद के स्वागत में लोग अन्न-वस्त्र दान कर रहे हैं, अमृत पान करा रहे हैं।  

सखी(दो): पगली,यह शरद का स्वागत नहीं, चुनाव के दौरान वोट बटोरने का आजमाया हुआ फार्मूला है। ये लोग मतदाता हैं और वे नेता। जिसे तुम अमृत-पान समझ रही हो वह मदिरा है जिसके नशे में चूर मतदाता आँख बंद कर वोट डाल आते हैं और ज्यादातर का वोट बिना जाए ही डल जाता है।  

सखी(एक): लेकिन यह तो देख कि शरद के आगमन के साथ ही धरती रोशनी से नहा गयी है।  

सखी(दो): तुम तो कुछ समझ ही नहीं रही हो, यहाँ तीन-तीन दिन लाइट नहीं रहती, पर चुनाव आते ही घर तो घर सड़कों पर भी दिन भर लाइट रहने लगी है ताकि हम बिजली संकट भुलाकर फिर इन नेताओं झोली वोट से भर दें।  

सखी(एक): अरे अरे देखो, लगता है महाराज नगर भ्रमण पर निकले है, चलो राजमार्ग पर चल कर उनके दर्शन करें।  

सखी(दो): ये महाराज नहीं टिकट राज है और इनके दर्शन के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं क्योंकि मतदान तक ये खुद हर घर, गली, मुहल्ले में घूम घूम कर हमारे हाथ-पैर जोड़ेंगे। हाँ, चुनाव जीतते ही फिर पाँच साल तक हम इन्हें ढूंढते रह जायेंगें.. यही राजनीति है।  

सखी(एक): यह नीति है या अनीति, चल बहना, इससे तो हम रामायण काल में ही भले थे.....।

कूड़ा नहीं ज़नाब, सोना कहिए सोना...!!!

एक विज्ञापन की चर्चित पंचलाइन थी कि "जब घर में पड़ा है सोना, तो फिर काहे को रोना”, और आज लगभग यही स्थिति हमारे नगरों/महानगरों में की है क्योंकि वे भी हर दिन जमा हो रहे टनों की मात्रा में कचरा अर्थात सोना रखकर रो रहे हैं। इसका कारण शायद यह है कि या तो उनको ये नहीं पता कि उनके पास जो टनों कचरा है वह दरअसल में कूड़ा नहीं बल्कि कमाऊ सोना है और या फिर वे जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं? अब यह पढ़कर एक सवाल तो आपके दिमाग में भी आ रहा होगा कि बदबूदार/गन्दा और घर के बाहर फेंकने वाला कूड़ा आखिर सोना कैसे हो सकता है?

इस पहेली को सुलझाकर आपका इस निबंध को आगे पढ़ने का उत्साह खत्म करने से पहले हम इस बात पर चर्चा करते हैं कि सही तरह से निपटान की व्यवस्था नहीं होने के कारण कैसे आज कचरा हमारे नगरों/महानगरों और गांवों के लिए संकट बन रहा है। दिल्ली में रहने वाले लोगों ने तो गाज़ियाबाद आते जाते समय अक्सर ही कचरे के पहाड़ देखे होंगे। ऊँचे-ऊँचे, प्राकृतिक पर्वत मालाओं को भी पीछे छोड़ते कूड़े के ढेर, उनसे निकलता ज़हरीला धुंआ और उस पर मंडराते चील-कौवे...ये पहाड़ शहर का सौन्दर्य बढ़ने के स्थान पर धब्बे की तरह नज़र आते हैं और यह धब्बे धीरे धीरे हमारी और हमारे बच्चों की सांसों में धीमा जहर घोलकर बीमार बना रहे है। देश के अन्य महानगरों और शहरों की हालत भी इससे अलग नहीं है। 

कचरा प्रबंधन पर काम करने वाले एक संगठन की वेबसाइट के मुताबिक, कुछ साल पहले तक दिल्ली में प्रतिदिन 9 हज़ार टन कूड़ा निकल रहा है जो सालाना तकरीबन 3.3 मिलियन टन हो जाता है। मुंबई में हर साल 2.7 मिलियन टन, चेन्नई में 1.6 मिलियन टन, हैदराबाद में 1.4 मिलियन टन और कोलकाता में 1.1 मिलियन टन कूड़ा निकल रहा है। जिसतरह से जनसँख्या/भोग-विलास की सुविधाएँ और हमारा आलसीपन बढ़ रहा है उससे तो लगता है कि ये आंकडें भी अब तक और बढ़ चुके होंगे। यह तो सिर्फ चुनिन्दा शहरों की स्थिति है, यदि इसमें देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों को जोड़ दिया जाए तो ऐसा लगेगा मानो हम कूड़े के बीच ही जीवन व्यापन कर रहे हैं।

हमारे देश में सामान्यतया प्रति व्यक्ति कूड़ा उत्पादन 350 ग्राम माना गया है परन्तु यह मात्रा 500 ग्राम तक भी हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा देश के कुछ राज्यों के कई शहरों में कराए गए अध्ययन के अनुसार शहरी ठोस कूड़े का प्रति व्यक्ति दैनिक उत्पादन 330 ग्राम से 420 ग्राम के बीच है। इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि शहरों और कस्बों के अलग-अलग आकार के बावजूद प्रति व्यक्ति उत्पादन में काफी समानता है।

यह तो हुई देश में तेज़ी से बढ़ रहे कचरे की बात लेकिन अब बात करते हैं इस लेख के मूल विषय अर्थात् कचरे को सोना कहने की। दरअसल तमिलनाडु के वेल्लोर शहर में 'गारबेज टू गोल्ड' माडल तैयार किया गया है जो अब धीरे धीरे अन्य शहरों में भी लोकप्रिय हो रहा है।  इस माडल के प्रणेता सी श्रीनिवासन ने बताया कि यदि शहरो में निकलने वाले कूड़े का सही तरह से निपटान किया जाए तो वह वाकई कमाई के लिहाज से सोना बन सकता है। श्रीनिवासन के मुताबिक फालतू समझ कर फेंका जाने वाला कूड़ा 10 रुपए प्रति किलो की कीमत तक दे सकता है जो घर में बेचे जाने वाले अखबारों के भाव के लगभग बराबर है। इसका मतलब यह हुआ जो हम घर-बाज़ार के कूड़े का जितने व्यवस्थित ढंग से निपटान करने में सहयोग करेंगे वह हमें उतनी ही अधिक कमाई देगा। यही नहीं, कूड़े के निपटान के वेल्लोर माडल से बड़ी संख्या में स्थानीय स्तर पर रोज़गार के साधन भी उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

'गारबेज टू गोल्ड' माडल में सबसे ज्यादा प्राथमिकता कूड़े के जल्द से जल्द सटीक निपटान को दी जाती है। इसके अंतर्गत कूड़े को उसके स्त्रोत (सोर्स) पर ही अर्थात् घर, वार्ड, गाँव, नगर पालिका, शिक्षण संस्थान, अस्पताल या मंदिर के स्तर पर ही अलग-अलग कर जैविक और अजैविक कूड़े में विभक्त कर लिया जाता है। फिर जैविक कूड़े को जैविक या प्राकृतिक खाद/उर्वरक के तौर पर परिवर्तित कर इस्तेमाल किया जाता है। इससे न केवल हमें भरपूर मात्रा में प्राकृतिक खाद मिल जाती है बल्कि अपने कूड़े को बेचकर अच्छी-खासी कमाई भी कर सकते हैं और इस सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें हमारे शहर को कूड़े के बढ़ते ढेरों से छुटकारा मिल जाएगा। 

महानगरों में निकलने वाले कूड़े पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक दिल्ली में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले 9 हज़ार टन कूड़े में से लगभग 50 फीसदी कूड़ा जैविक होता है और इसका उपयोग खाद बनाने में किया जा सकता है। इसके अलावा 30 फीसदी कूड़ा पुनर्चक्रीकरण (रिसाइकिलिंग) के योग्य होता है। इसका तात्पर्य यह है कि महज 20 फीसदी कूड़ा ही ऐसा है जो किसी काम का नहीं है। कमोबेश, देश के अधिकतर शहरों में यही स्थिति है इसलिए यदि वेल्लोर माडल की तर्ज पर कूड़े को उद्गम स्थल पर ही अलग अलग कर लिया जाए तो न केवल देश में गाज़ियाबाद जैसे कचरे के पहाड़ बनने पर रोक लग जाएगी, साथ ही बड़ी संख्या में बेरोज़गार युवकों को इस मुहिम से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सकेगा और देश को भरपूर मात्रा में जैविक खाद मिलने लगेगी। वैसे, केंद्र सरकार के स्वच्छता अभियान के तहत इस पर बड़े पैमाने पर अमल शुरू हो गया है और भोपाल इंदौर जैसे शहर सफाई की नई कहानी लिख रहे हैं। बस, इसके लिए इच्छाशक्ति, समर्पण, ईमानदारी जैसे मूलभूत तत्वों की ज़रुरत है।

यदि हमने एक बार यह संकल्प ले लिया तो फिर सिद्धि हासिल करने से कोई नहीं रोक सकता। प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए 'संकल्प से सिद्धि' अभियान का मूल मन्त्र भी तो यही है इसलिए बस जरुरत है देश को स्वच्छ बनाने का संकल्प लेने की और फिर उसे सिद्धि में बदलने की। एक बार हमने सच्चे मन से अपने आप को इस काम में झोंक दिया तो फिर वाकई में अब तक हमारा सिरदर्द बनने वाला कूड़ा सही मायने में सोना बन जायेगा और हमारा देश सोने की चिड़िया।


एक मुलाकात…फलों के राजा से!!


आइए, आपको मिलवाते हैं फलों के राजा हिमाचल से…जहाँ फल केवल उत्पाद नहीं बल्कि गर्व हैं। शिमला की पहाड़ियों पर लाल-गुलाबी सेब किसी राजकुमार से कम नहीं हैं। किन्नौर का अखरोट इतना चटकदार जैसे फलों का सेनापति। कुल्लू की चेरी महारानी सी लजाती है तो आड़ू गालों पर लाली लिए किसी राजकुमारी सा लगता है। नाशपाती, खुबानी, आलू बुखारा, केला, जापानी फल, मशरूम और कीवी राजा के नवरत्नों में शामिल हैं। यहाँ की मिट्टी में हिमालय का गौरव घुला मिला है…हवा में बर्फ की शान है तो धूप इतनी नफ़ासत से पड़ती है कि हर फल ‘रॉयल’ और ‘डिलिशियस’ बन जाता है। इसलिए आप जब भी कोई फल खाओ और मुँह से वाह निकले, तो समझ जाइए कि  वह फलों के राजा के दरबार से आया है।

हिमाचल प्रदेश को प्रकृति ने शिद्दत से संवारा और अपनी पूरी उदारता से नवाजा है। हिमालय की गोद में बसा यह प्रदेश केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही विख्यात नहीं है, बल्कि अपने विविध,लज़ीज़,रसीले और सेहत से भरपूर फलों के कारण भी प्रसिद्ध है इसलिए इसे भारत का फलों का टोकरा (Fruit Basket of India) भी कहा जाता है। यहाँ देश के सबसे स्वादिष्ट, रसीले और उच्च गुणवत्ता वाले फलों का उत्पादन होता है।


यहाँ पैदा होने वाले फल स्वाद, रंग, सुगंध आकार और गुणवत्ता में देश के अन्य राज्यों की तुलना में उत्तम ही नहीं बल्कि सर्वोत्तम हैं। हिमाचल में सर्वश्रेष्ठ फलों के उत्पादन और स्वाद का सबसे बड़ा कारण यहाँ की विविध भौगोलिक स्थिति और जलवायु परिस्थितियां हैं। मैदानी क्षेत्रों से लेकर हिमालय की बुलंद चोटियों तक फैली विविधता के कारण यह राज्य फल उत्पादन के लिए आदर्श है। 

समुद्र तल से 350 मीटर से लेकर करीब 4000 मीटर से अधिक ऊँचाई तक फैले हिमाचल प्रदेश में हर ऊँचाई पर अलग-अलग जलवायु मिलती है। यहां की ठंडी-शीतोष्ण जलवायु सेब के लिए बिल्कुल आदर्श है। यहाँ गर्मियों में हल्की धूप और सर्दियों में भरपूर ठंडक मिलती है, जो सेब में मिठास, रंग और क्रंच लाती है। यही कारण है कि जब आप यहां सेब खाते हैं तो उसका कड़कपन और रस से भरा स्वाद अलग ही मज़ा देता है। 


हिमाचल प्रदेश को सेब की राजधानी भी कहा जाता है। देश में उत्पादित होने वाले कुल सेबों का लगभग 40-50 फीसदी हिस्सा अकेले हिमाचल से आता है। राज्य के शिमला, कुल्लू, मनाली, किन्नौर, रोहड़ू और ठियोग जैसे इलाके सेब के उत्पादन के लिए मशहूर हैं। यहाँ के रॉयल और गोल्डन डिलिशियस सेब पूरे देश में सबसे स्वादिष्ट माने जाते हैं।

राज्य के निचले क्षेत्रों में उप-उष्णकटिबंधीय जलवायु है और इस दायरे में आने वाले इलाके मसलन कांगड़ा, ऊना जिले आम, लीची, अमरूद, केले,नींबू और संतरा जैसे फलों का गढ़ हैं। मध्य क्षेत्रों में 1000-2000 मीटर की ऊंचाई पर शीतोष्ण जलवायु के कारण आड़ू, आलूबुखारा, खुबानी, चेरी और नाशपाती खूब होती है। लेकिन हिमाचल का असली जादू ऊपरी हिमाचल में 2000-3000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर देखने को मिलता है, जहाँ ठंडी जलवायु और भरपूर धूप में विश्वस्तरीय सेब तैयार होते हैं। सेब हिमाचल की पहचान है।  

हिमाचल में केवल सेब ही नहीं, कीवी, अखरोट, बादाम, काजू, अनार, नाशपाती, केला,अंगूर भी खूब होते हैं। किन्नौर का अखरोट और खुबानी, कुल्लू-मनाली की चेरी, रामपुर का अनार और सोलन के मशरूम भी बहुत प्रसिद्ध हैं। आर्थिक दृष्टि से बागवानी हिमाचल की रीढ़ है। राज्य के लगभग ढाई लाख से ज्यादा हेक्टेयर क्षेत्र में फल बागान हैं और 20 लाख से अधिक लोग इससे जुड़े हैं। यहां सालाना 6 से 7 लाख मीट्रिक टन फल उत्पादन हो रहा है। सिर्फ 2025 में ही फलों से होने वाली कुल आय लगभग 3,500-4,000 करोड़ रुपये रही, जो पिछले वर्षों से 10-15 प्रतिशत अधिक है। यह राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15 प्रतिशत योगदान के बराबर है।

हिमाचल प्रदेश से स्वादिष्ट फल न केवल दिल्ली, मुंबई, चेन्नई,कोलकाता जैसे बड़े शहरों में पहुँचते हैं, बल्कि बांग्लादेश, श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब से लेकर अमेरिका एवं ब्रिटेन जैसे देशों में भी निर्यात होते हैं। हिमाचल को फलों का राजा बनाने में यहां के किसानों की मेहनत के साथ वैज्ञानिक शोध और सरकारों की नीतियाँ भी शामिल हैं।  सिंचाई योजनाएँ, कोल्ड स्टोरेज, पैकिंग हाउस, मार्केटिंग और सहकारी समितियों ने भी किसानों को सशक्त बनाया है एवं किसानों ने हिमाचल को फलों का राजा।



शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

शिमला से क्यों रूठा है रूमानियत का रहबर

 


शिमला में दिलकश मौसम के कारण मॉल रोड इन दिनों प्रेमी जोड़ों और नव युगलों की रूमानियत में सराबोर है। देश भर से हनीमून मनाने के लिए शिमला पहुंचने वाले जोड़ों की संख्या रोज बढ़ रही है लेकिन अपने अद्भुत रंग,कलेवर एवं पतझड़ से पूरे वातावरण में रोमांस बिखेरने वाले चिनार पर इस रूमानियत का कोई असर नजर नहीं आ रहा। यश चोपड़ा से लेकर कई फिल्म निर्माताओं ने अपनी फिल्मों में चिनार के पीले,गुलाबी और दहकते सौंदर्य का इस्तेमाल कर जबरदस्त रोमांस दर्शाया है। शिमला में चिनार की इस बेरुखी की वजह से युवा न तो शाहरुख खान की तरह बांहे फैलाकर अपनी ‘सेनोरिटा’ को लुभा पा रहे हैं और न ही उनकी ‘बंदी’ चिनार के खूबसूरत पत्तों से इज़हार-ए-लव कर पा रही हैं।

रूमानियत के प्रतीक चिनार को पता नहीं क्यों शिमला की वादियां अब तक रास नहीं आ रहीं। कश्मीर की वादियों में तो यह अपने मनभावन रंग भरपूर बिखेरता है। एक एक पत्ता प्रेम,प्यार एवं रोमांस की पूरी कहानी का साक्षी बन जाता है लेकिन शिमला में चिनार के पेड़ न तो आतिश ए चिनार रच पा रहे हैं और न ही हरुद जैसा कुछ यहां नजर आ रहा है। गौरतलब है कि कश्मीर में चिनार के पेड़ों के पतझड़ के मौसम को हरुद कहते हैं। जब पत्ते हरे से लाल, नारंगी और पीले रंग में बदल जाते हैं, तो इस खूबसूरत दृश्य को आतिश चिनार भी कहा जाता है। 


आतिश चिनार का अर्थ है जब चिनार के पत्ते आग की तरह लाल हो जाते हैं।  इस दृश्य को यहां आतिश चिनार कहा जाता है, जिसका मतलब है-आग वाले चिनार या आग उगलते चिनार। परंतु, शिमला में आतिश चिनार तो दूर..पत्ते हरे से सीधे सूखे पत्ते में बदलकर कोई आकर्षण पैदा नहीं कर पा रहे। वैसे, आतिशे–चिनार उर्दू भाषा के विख्यात साहित्यकार शेख़ मुहम्मद अब्दुल्ला द्वारा रचित एक आत्मकथा है जिसके लिये उन्हें सन् 1988 में उर्दू भाषा के लिए मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

ऐसा नहीं है कि शिमला में लगाए गए चिनार के पेड़ों में पतझड़ नहीं हो रहा..बल्कि यहां भी भरपूर पतझड़ हो रहा  है, लेकिन यह कश्मीर की तरह मनमोहक नहीं है। खासतौर पर रिज पर लगे चिनार के पेड़ पतझड़ में आम पेड़ों की तरह ही नजर आ रहे हैं। इनके पत्ते बिना रंग बदले सूखते हैं,सिकुड़ते हैं और फिर झड़ जाते हैं जबकि कश्मीर में चिनार के पतझड़ की खूबसूरती इसके पत्तों के रंग बदलने पर ही विशेष रूप से केंद्रित है । 


इस बारे में जानकारों का कहना गए कि कश्मीर और शिमला में चिनार अलग-अलग वातावरण में उगाए गए हैं, और जलवायु में अंतर के कारण रंग और झड़ने की प्रक्रिया अलग हो सकती है।  शिमला का मौसम कश्मीर की तुलना में थोड़ा अलग है, खासकर दिन और रात के तापमान में। चिनार के पेड़ मौसम के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं और बदलते तापमान और आर्द्रता के कारण वे अलग तरह से प्रतिक्रिया करते हैं। यहां भी चिनार के पेड़ों की पत्तियां पतझड़ में रंग बदलती हैं, लेकिन यह प्रक्रिया कश्मीर की तरह खूबसूरत एवं बड़े पैमाने पर नहीं होती है।

हालांकि अब जलवायु परिवर्तन के कारण कश्मीर में भी तापमान बढ़ रहा है, जिससे चिनार के संवेदनशील पेड़ परंपरागत स्वभाव के अनुरूप व्यवहार नहीं कर पा रहे हैं। शायद, यही वजह है कि शिमला में लगाए गए चिनार के पेड़ों में भी पतझड़ तो होता है, लेकिन जलवायु में भिन्नता के कारण यह प्रक्रिया कश्मीर से अलग होती है। वैसे भी, चिनार शिमला या हिमाचल प्रदेश का मूल निवासी नहीं है इसलिए यह अब तक देवदार, ओक, चीड़ और बुरांस के साथ दोस्ती नहीं कर पाया है। हो सकता है उसे अपनी मूल जमीन से यह अलगाव पसंद नहीं आया हो। हालांकि, चिनार मूल रूप से कश्मीर का भी नहीं है। बताया जाता है कि 14 वीं शताब्दी में यह फारस से यात्रियों के साथ कश्मीर आया और धीरे धीरे यहां की आवोहवा में ढल गया। अब तो स्थिति यह है कि चिनार कश्मीर का एक प्रतिष्ठित प्रतीक बन गया है और ऐसा लगता है जैसे कश्मीर और चिनार एक दूसरे के लिए ही बने हैं।

जहां तक शिमला से चिनार के संबंधों की बात है तो बताया जाता है कि कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने शिमला को चिनार के पाँच पेड़ उपहार में दिए थे। उस समय इनमें से दो पेड़ रिज (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर, दो वाइसरीगल लॉज (अब भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान) में और एक यूएस क्लब में लगाए गए थे। खास बात यह है कि सभी पेड़ जीवित हैं और शहर की शोभा बढ़ा रहे हैं। हालाँकि, अब तो शिमला में चिनार के कई पेड़ रिज, माल रोड के पास नव निर्मित पार्क में सहित कई स्थानों पर देखे जा सकते हैं। 

चिनार के शिमला में आगमन को लेकर यह भी बताया जाता है कि इस पेड़ को रिज पर सबसे पहले तत्कालीन बागवानी और कृषि निदेशक एलएस नेगी ने लगाया था । अब शिमला में वन विभाग हर साल बड़ी संख्या में चिनार के पौधे लगा रहा है ताकि वे यहां भी कश्मीर के वातावरण की तरह रच बस जाएं एवं उनकी संख्या में और वृद्धि हो सके । इसलिए हम उम्मीद कर सकते हैं कि जैसे कश्मीर ने चिनार को और चिनार ने कश्मीर को गले लगा लिया, उसी तरह चिनार भविष्य में शिमला सहित हिमाचल को अपना लेंगे..और फिर यहां भी आतिश-ए-चिनार के साथ रूमानियत का की बयार बहेगी ।





गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

ब्रह्म सरोवर: इतिहास, आस्था और अद्भुत सौंदर्य का संगम


यह ब्रह्मसरोवर है…भारत की प्राचीन आध्यात्मिक धरोहरों में से एक । हर वर्ष गीता जयंती समारोह के दौरान ब्रह्मसरोवर की भव्यता चरम पर रहती है। इस वर्ष भी 25 नवंबर से 5 दिसंबर तक अंतर राष्ट्रीय गीता महोत्सव चल रहा है। कहा जाता है कि यही वह पवित्र स्थल है जहाँ सृष्टि के सृजन कर्ता भगवान ब्रह्मा ने ब्रह्मांड की रचना की थी। महाभारत में भी ब्रह्म सरोवर का विशेष महत्व देखने को मिलता है ।


हरियाणा के कुरुक्षेत्र में स्थित लगभग 3600 फुट लंबा और 1500 फुट चौड़ा यह सरोवर भारत के सबसे बड़े मानव-निर्मित जलाशयों में से एक है। चारों ओर बने घाट, शांत जल, और बीच में स्थित सर्वेश्वर महादेव मंदिर इसे दिव्यता का अनूठा स्पर्श देते हैं। देश-विदेश से आए श्रद्धालु यहाँ पवित्र स्नान कर जीवन के दोषों से मुक्त होने की कामना करते हैं। 


सिर्फ धार्मिक ही नहीं, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी ब्रह्मसरोवर अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ के घाटों, दीवारों और शिलालेखों में प्राचीन भारतीय सभ्यता के निशान आज भी महसूस किए जा सकते हैं।

 हम कह सकते हैं कि ब्रह्मसरोवर सिर्फ एक जलाशय नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास, सौंदर्य और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम है—जहाँ से हर श्रद्धालु अपने भीतर एक गहरी शांति का स्पर्श लेकर लौटता है।

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कहां कण कण में बिखरा है धर्म, कर्म और मोक्ष का ज्ञान..!!

यह कुरुक्षेत्र है.. पावन गीता के जन्म की पुण्य पावन भूमि..जहां सदियों पहले इस महाग्रंथ का प्रादुर्भाव हुआ जो आज भी दुनिया भर के लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है। कुरुक्षेत्र भारतीय इतिहास, संस्कृति, धर्म और दर्शन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह हरियाणा राज्य में स्थित वह पवित्र स्थल है जिसे भारतीय संस्कृति में धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे के नाम से जाना जाता है।

हमें भी इस पुण्य भूमि का स्पर्श करने और यहां कण कण में व्याप्त भगवान श्रीकृष्ण की कृपा को महसूस करने का अवसर मिला। इस दौरान गीता जयंती जैसा विशेष अवसर भी था। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि गीता जयंती हर साल मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस बार यह पर्व 1 दिसंबर को मोक्षदा एकादशी के दिन मनाया गया। माना जाता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था। गीता में स्वयं कहा गया है- ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेताः युयुत्सवः’ अर्थात यहाँ धर्म की स्थापना के लिए महान युद्ध हुआ। यह महान ग्रंथ कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और जीवन के हर पहलू पर गहन मार्गदर्शन देता है इसलिए कुरुक्षेत्र को गीतोपदेश स्थली भी कहा जाता है।

कुरुक्षेत्र में हर साल गीता जयंती पर लगभग एक पखवाड़े तक चलने वाले अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का आयोजन भी होता है। इसकी औपचारिक शुरुआत 2016 में हुई थी और प्रति वर्ष इस महोत्सव का फलक लगातार व्यापक होता जा रहा है। इस साल यह महोत्सव 25 नवंबर से 5 दिसंबर तक पवित्र ब्रह्म सरोवर परिसर में मनाया जा रहा है। ब्रह्म सरोवर के बारे में कहा जाता है कि सृष्टि के निर्माता ब्रह्माजी ने यही ब्रह्माण्ड की रचना की थी। सूर्यग्रहण के समय यहां स्नान-दान का विशेष महात्म्य है। पितृ तर्पण और श्राद्ध के लिए भी ब्रह्म सरोवर अत्यंत पवित्र माना जाता है।

हम मध्यप्रदेश के लोगों के लिए इस साल अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का खासतौर पर महत्व है क्योंकि मध्य प्रदेश अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव 2025 का भागीदार राज्य है और यहां हमारे प्रदेश के हस्तशिल्प, कला, कलाकारों, लोक संस्कृति और खानपान की धूम है। वहीं, इंग्लैंड को साझीदार देश घोषित किया गया।

मान्यता के अनुसार कुरुक्षेत्र के ज्योतिसर नामक स्थान पर इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत में वर्णित कौरव-पांडव युद्ध के दौरान युद्ध मैदान में विराट स्वरूप के दर्शन देते हुए अर्जुन को गीता के अनमोल वचन सुनाए थे। इसका मतलब यह हुआ कि इसी दिन अत्यंत पवित्र, पूजनीय और अनुकरणीय माने जाने वाले ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का जन्म हुआ था। कुरुक्षेत्र की इसी भूमि पर एक विशाल वट वृक्ष भी है जिसकी आयु करीब 5 हजार 126 साल बताई जाती है। इसके नीचे प्रतीकात्मक रूप में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन का रथ खड़ा हुआ है। यहीं भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप को भी दर्शाया गया है।

बताया जाता है कि अपनी हिमालय यात्रा के समय आदि गुरु शंकराचार्य ने सर्वप्रथम इस स्थान को चिन्हित किया था। सन् 1850 में महाराजा काश्मीर द्वारा यहाँ पर एक शिव मन्दिर की स्थापना की गई थी। इसके पश्चात् सन 1924 में महाराजा दरभंगा ने यहाँ पर गीता उपदेश के साक्षी वट वृक्ष के चारों ओर एक चबूतरे का निर्माण करवाया था। तीर्थ के इसी महत्व को दृष्टिगत रखते हुए सन् 1967 में कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य द्वारा मुख्य चबूतरे के साथ गीता उपदेश स्थल का निर्माण कराया गया ।

कुरुक्षेत्र के महत्व को अंतरराष्ट्रीय पटल पर और व्यापक बनाने के लिए यहां भगवान श्रीकृष्ण के शंख पाञ्चजन्य से प्रेरित ‘पाञ्चजन्य स्मारक’ की स्थापना भी गई है। इसके अलावा, ‘महाभारत अनुभव केंद्र’ भी बनाया गया है। इस अनुभव केंद्र में महाभारत की गाथा को 3 डी, लाइट एंड साउंड शो और डिजीटल तकनीकी से दिखाया जा रहा है। हम कह सकते हैं कि नई तकनीक की मदद से करीब 3 घंटे के समय और 200 रुपए का मामूली शुल्क देकर हजारों साल पहले हुए 18 दिन लंबे युद्ध को मौजूदा दौर में महसूस किया जा सकता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 25 नवंबर को इन नई सुविधाओं का शुभारंभ किया है। 

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि कुरुक्षेत्र केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का प्रतीक है जहाँ धर्म, कर्म, ज्ञान और मोक्ष की शिक्षा दी गई। इसलिए कुरुक्षेत्र को भारत का हृदयस्थल और देवभूमि भी कहा जाता है।

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गुरुवार, 27 नवंबर 2025

एक अनूठा मंदिर…जहां प्रसाद की जगह चढ़ते हैं घोड़े!!

जी हां, वाकई मंदिर में प्रसाद की जगह चढ़ते हैं घोड़े और वे भी सफेद घोड़े, लाल घोड़े, पीले, काले, नारंगी, हरे घोड़े..बस घोड़े ही घोड़े। आप देखकर अचरज में पड़ जाएंगे क्योंकि मंदिर में तो नारियल- चिरौंजी या लड्डू-पेड़े चढ़ते हैं तो फिर इतने घोड़ों का क्या काम। दरअसल समझने के लिए हम कह सकते हैं कि यहां प्रसाद के रूप में घोड़े अर्पित किए जाते हैं। 

अरे रुको जरा…आपकी बड़ी होती आंखों को थोड़ा छोटा कर लीजिए और कंफ्यूज मत होइए। हम बात कर रहे हैं खिलौने वाले घोड़ों की, न की असल की..आखिर, कितना भी बड़ा मंदिर हो वहां सैकड़ों घोड़े कैसे बन पाएंगे? लेकिन असलियत यही है कि कहानी असल घोड़ों से ही शुरू हुई थी..जो बदलते वक्त के साथ जरूर खिलौने वाले घोड़ों में तब्दील हो गई है। 


तो पहले जानते हैं असल घोड़ों की कहानी…महाभारत का युद्ध शुरू होने में बस कुछ ही दिन बचे थे। कौरवों की विशाल सेना और तैयारियों को देखकर पांडवों का मन भय से भरा था और वे कुछ विचलित नज़र आ रहे थे। यह बात युद्ध भूमि में गीता उपदेश के भी पहले की है। भगवान श्रीकृष्ण पांडवों के मन को पढ़कर मुस्कुराते हुए बोले- “जाओ, पहले माँ भद्रकाली के दर्शन कर आओ और हां, वहां घोड़ा चढ़ाना मत भूलना क्योंकि जिसने यहाँ घोड़ा चढ़ाया, वह कभी पराजित नहीं हुआ है।” पांडव भला भगवान कृष्ण का कहना कैसे टाल सकते थे इसलिए पाँचों भाई कुरुक्षेत्र से सटे थानेसर की पिहोवा रोड पर स्थित उस पवित्र भूमि पर पहुँचे जहाँ आज भी माँ भद्रकाली का मंदिर पूरी भव्यता और दिव्यता के साथ मौजूद है। मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक भद्रकाली पीठ में पांडवों ने पांच घोड़े अर्पित किए और महाभारत युद्ध का नतीजा तो सब जानते हैं कि पांडवों की ही विजय हुई। कहा जाता है कि तभी से यहां मां भद्रकाली को मनोकामना पूरी होने पर घोड़े चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।


जहां तक मंदिर की स्थापना से जुड़े इतिहास की बात है तो हम सभी जानते हैं कि शिवजी के अपमान से सती हुई मां भगवती से जुड़ी पौराणिक कथा के मुताबिक जब शिवजी माँ सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उनका क्रोध शांत करने और ब्रह्मांड को विनाश से बचाने के लिए सुदर्शन चक्र से सती की पार्थिव देह के 51 टुकड़े कर दिए थे। जिस जिस स्थान पर माता सती के अंग गिरे, वे सभी स्थान पवित्र शक्तिपीठ कहलाते हैं। हरियाणा का यह इकलौता शक्तिपीठ कुरुक्षेत्र में स्थित है। माना जाता है कि यहां माँ का दाहिना टखना (ankle) गिरा था। इसे देवीकूप, सावित्रीपीठ, देवीपीठ, कालीपीठ और आदिपीठ जैसे विभिन्न नामों से भी जाना जाता है।


आमतौर पर शक्तिपीठ पहाड़ों और दुर्गम स्थानों पर हैं लेकिन यह ऐसा मंदिर है जो समतल स्थान पर है और आप सीधे मंदिर की पार्किंग तक आसानी से पहुंच जाते हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही सन्नाटा, घंटियों की मधुर ध्वनि और सुगंध एक साथ महसूस होते हैं। गर्भगृह में माँ भद्रकाली की काले पत्थर की प्राचीन अष्ट भुजा वाली प्रतिमा है जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो मां अभी बोल पड़ेंगी। उनके सामने विशाल कमल की प्रतिकृति और राम सीता, राधा कृष्ण सहित विभिन्न प्रतिमाएं हैं।

 भद्रकाली मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यहां मौजूद सैकड़ों घोड़े और मन्नत के धागों से बना विशाल नारियल है। जो बरबस ही श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है। घोड़ों का तो यह हाल है कि आप जहां दृष्टि दौड़ाएं आपको घोड़े ही नज़र आते हैं..मिट्टी,चीनी मिट्टी और अन्य सामग्री से बने छोटे छोटे रंग बिरंगे आकर्षक घोड़े। वैसे यहां सोने और चांदी के घोड़े भी बड़ी संख्या में अर्पित किए जाते हैं। इसका कारण वही पांडव कालीन मान्यता है कि यदि आपकी कोई मन्नत है या पूरी हुई है तो मां भद्रकाली को घोड़े अर्पित करें जिससे वे प्रसन्न होती हैं और आपकी तमाम मनोकामनाएं पूरी करती हैं। 

इसी तरह मन्नत का लाल-पीला धागा बांधने की प्रथा भी है। मन्नत पूरी हुई नहीं कि लोग दौड़े चले आते हैं – कोई घोड़ा चढ़ाने, कोई नारियल फोड़ने और कोई धागा खोलने। आज भी यहां परीक्षा में पास करने, संतान प्राप्त,व्यापार में लाभ और परिवार रक्षा जैसी मुरादों को लेकर बड़ी संख्या में भक्त आते हैं।

भद्रकाली मंदिर तक पहुंचना बहुत आसान है। कुरुक्षेत्र दिल्ली से सिर्फ 160 किमी और चंडीगढ़ से करीब 100 किमी दूर है। यहां आप अपने वाहन से आ सकते हैं। वैसे कुरुक्षेत्र दिल्ली चंडीगढ़ रेलमार्ग से सीधे जुड़ा है और कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन से मंदिर महज 3 किमी दूर है। यदि आप हवाएं मार्ग से आना चाहते हैं तो चंडीगढ़ या दिल्ली कहीं भी उतर कर टैक्सी से कुछ घंटे में यहां पहुंच सकते हैं। इसलिए जब भी कुरुक्षेत्र जाएँ, ब्रह्मसरोवर, ज्योतिसर, बाण गंगा जैसे महाभारत कालीन स्थलों के साथ यहाँ जरूर आएँ।


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