शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

जादुई पिटारे की तरह है रेडियो


रेडियो सुनना इन दिनों कितना आसान है न? मोबाइल पर ऐप डाउनलोड करो और मनचाहे गाने और कार्यक्रम सुनो, लेकिन कुछ दशक पहले तक रेडियो ‘लग्जरी’ था। रेडियो खरीदने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। ये पढ़कर आश्चर्य हो रहा है न? हकीकत यही है कि ऐसा भी दौर था जब घर में रेडियो रखने और सुनने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था? बिल्कुल वैसे ही जैसे आज कार चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस चाहिए। तब रेडियो के लिए ब्रॉडकास्ट रिसीवर लाइसेंस जरूरी था। रेडियो सेट रखने वाले को पोस्ट ऑफिस से करीब 15 रुपए सालाना शुल्क देकर लाइसेंस लेना पड़ता था। हर साल इसको रिन्यू भी कराना पड़ता था और बिना लाइसेंस के रेडियो रखना गैर-कानूनी था।

रेडियो को हम हमारे देश में सामान्य रूप से आकाशवाणी के नाम से जानते हैं। जेन ज़ी में यह एफएम, पॉडकास्ट, रेडियो ऐप्स जैसे तमाम नामों से लोकप्रिय है। यह एक जादुई पिटारा है । आप मोबाइल से, कार में, ईयर फोन के जरिए आसानी से रेडियो सुन सकते हैं लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब रेडियो एक बड़ा सा डिब्बा होता था, जिसमें एंटीना लगाकर दूर-दूर की आवाज़ें पकड़ी जाती थीं। आज वही रेडियो जेब के छोटे से स्मार्टफोन में समा गया है। अब गाने, कहानियाँ, खबरें, पॉडकास्ट – सब कुछ उँगलियों के इशारे पर उपलब्ध हैं। दुनिया भर में लोग स्पॉटिफाई, यूट्यूब, म्यूजिक ऐप्स, न्यूज ऑन एआईआर या पॉडकास्ट ऐप्स पर रेडियो सुन रहे हैं। दरअसल,


रेडियो संचार के सबसे सस्ते और आसान माध्यमों में शामिल है। यह बैटरी से चलता है और बिजली तथा इंटरनेट न हो तो भी दुनिया भर की बातें सुनाता है। दूर-दराज के इलाकों में तो आज भी ये लाइफलाइन से कम नहीं है।

शायद, आपको जानकारी होगी कि हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस  मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन 1946 में यूएन रेडियो शुरू हुआ था। संयुक्त राष्ट्र ने 2011 में 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस घोषित किया था। इस बार विश्व रेडियो दिवस की थीम है- रेडियो और एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)। यूनेस्को की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, ये थीम रेडियो के भविष्य पर फोकस करती है। 

अब हम जानते हैं कि भारत में रेडियो ने अपने जन्म से लेकर अब तक किस प्रकार खुद को बदला है। वैसे इतना तो आप सभी जानते ही हो कि दुनिया में रेडियो के जन्म की कहानी इतालवी वैज्ञानिक जी मार्कोनी से शुरू हुई थी। उन्होंने पहली बार 1895 में बिना तार के संदेश भेजा और इसके बाद तो रेडियो क्रमशः दुनिया भर में फैल गया। हमारे देश में रेडियो का इतिहास और विकास समझना एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प यात्रा है। भारत में रेडियो की शुरुआत करीब सौ साल पहले एक छोटे से प्रयोग से हुई थी, लेकिन समय के साथ यह देश के सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक ताने बाने का अभिन्न हिस्सा बन गया। 


अब देश ही नहीं दुनिया भर में रेडियो के माध्यम से आम लोगों को न केवल सूचना और मनोरंजन प्रदान किया जाता है, बल्कि यह एक सशक्त माध्यम के रूप में समाज में जागरूकता बढ़ाने का दायित्व भी निभाता है। भारत में रेडियो की विकास यात्रा के सबसे पहले चरण को हम प्रारंभिक चरण (1923-1947) कह सकते हैं। 1923 में भारत में पहली बार रेडियो क्लब ऑफ बॉम्बे ने रेडियो प्रसारण की शुरुआत की । इसके बाद,  1927 में भारत में  इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी की स्थापना की गई। 1930 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने रेडियो प्रसारण का महत्व समझकर इसकी जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली और फिर कुछ समय बाद 1936 में ऑल इंडिया रेडियो (AIR) की स्थापना की गई। 


रेडियो की विकास यात्रा के दूसरे दौर को हम स्वतंत्रता के बाद (1947-1970) का चरण कह सकते हैं । स्वतंत्रता के बाद, 1947 में आल इंडिया रेडियो के केवल छह स्टेशन और महज 11 प्रतिशत जनसंख्या तक पहुंच थी। लेकिन रेडियो के महत्व को देखते हुए सरकार ने इसका विस्तार राष्ट्रीय एकता, शिक्षा और जागरूकता फैलाने के लिए किया। अब आकाशवाणी ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ के मूल भाव के साथ देश भर में करीब 470 प्रसारण केंद्रों के जरिए देश के लगभग 92 फीसदी क्षेत्र और कुल आबादी के 99.19 प्रतिशत हिस्से में उपलब्ध है। यह 23 भाषाओं और 179 बोलियों में कार्यक्रम प्रसारित करता है।यह 27 भाषाओं में 100 देशों में अपने कार्यक्रम प्रसारित करता है।

जहां तक रेडियो इतिहास के दिलचस्प तथ्यों की बात है तो आल इंडिया रेडियो को 1956 में आकाशवाणी नाम मिला था। इसके बाद, 

1957 में फिल्मी संगीत के लिए लोकप्रिय विविध भारती सेवा की शुरुआत हुई जबकि 1993 में  इसने एफएम रेनबो के जाइए प्रसारण की नई शुरुआत की। आकाशवाणी ने विभिन्न राज्यों में भी अलग अलग भाषाओं में अपनी क्षेत्रीय सेवाएं शुरू की और जिसने कार्यक्रमों में विविधता और अनेकता में एकता का रंग भरा। 

रेडियो की विकास यात्रा के तीसरे चरण (1990-2000) में एफएम रेडियो का विस्तार हुआ। जिसने रेडियो प्रसारण के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। एफएम रेडियो का मुख्य आकर्षण इसके बेहतर ध्वनि गुणवत्ता और संगीत पर आधारित कार्यक्रम थे। इसके बाद 1997 में प्रसार भारती का गठन कर आकाशवाणी एवं दूरदर्शन की जिम्मेदारी इसे सौंप दी। रेडियो की विकास यात्रा का चौथा चरण (2000 से अब तक) को हम डिजिटल रेडियो और इंटरनेट का युग कह सकते हैं। इंटरनेट रेडियो और डिजिटल रेडियो प्रसारण की शुरुआत के बाद से रेडियो का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। इससे ऑनलाइन रेडियो और पॉडकास्टिंग का विस्तार हुआ, जिससे रेडियो श्रोताओं के लिए नई संभावनाओं के द्वार खुले।

मौजूदा वक्त में रेडियो को लोकप्रिय बनाने में ‘मन की बात’ कार्यक्रम का बहुत योगदान है। 2014 से शुरू हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के इस मासिक कार्यक्रम ने रेडियो को फिर से जन जन तक पहुंचा दिया है। ये कार्यक्रम हर महीने के आखिरी रविवार को आता है। अपनी तरह के अनूठे मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री श्री मोदी आम लोगों की कहानियाँ, प्रेरणादायक बातें, देश की प्रगति की जानकारी और अभिभावक की तरह निजी अनुभव पर आधारित सकारात्मक सलाह देते हैं। इस कार्यक्रम को गाँव से शहर तक करोड़ों लोग सुनते हैं।

आजकल भारत में रेडियो का स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। अब यह न केवल सूचना और मनोरंजन का साधन है, बल्कि समाज के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी जानकारी देने और जागरूकता फैलाने का भी एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। आज के डिजिटल युग में रेडियो ने अपने पारंपरिक रूप में बदलाव किया है। तकनीकी बदलाव और इंटरनेट की उपलब्धता ने रेडियो के स्वरूप, प्रसारण विधि और श्रोताओं के साथ इसके संबंध को बदल दिया है। 

ऑनलाइन रेडियो और पॉडकास्ट के रूप में एक नई शुरुआत हुई है। लोग अब इंटरनेट के माध्यम से कहीं भी, कभी भी अपने पसंदीदा रेडियो चैनल्स को सुन सकते हैं। इस प्रकार, रेडियो अब सीमाओं से बाहर निकलकर विश्व भर में उपलब्ध हो गया है। आकाशवाणी का ‘न्यूज़ ऑन एआईआर’ एप भी बहुत लोकप्रिय है। इन दिनों पॉडकास्टिंग का भी जमकर विस्तार हुआ है। इसमें श्रोताओं को उनकी रुचि के अनुसार खास विषयों पर लाइव एवं रिकॉर्डेड शो उपलब्ध होते हैं, जिन्हें वे अपनी सुविधा से सुन सकते हैं। देश में इन दिनों स्पॉटीफाई, जिओ सावन, गाना, विंक म्यूजिक, एप्पल पॉडकास्ट्स, पॉकेट एफएम जैसे कई लोकप्रिय पॉडकास्ट प्लेटफार्म हैं। ऐप्स के साथ स्मार्ट स्पीकर्स (जैसे Alexa, Google Home) के जरिए भी रेडियो सुनना अब बहुत सरल हो गया है।  

अब रेडियो केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों और गांवों में भी कम्युनिटी (सामुदायिक) रेडियो स्टेशन का प्रचलन बढ़ा है। कम्युनिटी रेडियो का उद्देश्य स्थानीय विषय वस्तु, मुद्दों, संस्कृति, परंपराओं और घटनाओं पर आधारित कार्यक्रम प्रसारित करना है। सारेगामा कारवां जैसे रेडियो प्रयोगों ने भी इसकी लोकप्रियता बढाने का काम किया है। रेडियो की उपयोगिता बहुत व्यापक और महत्वपूर्ण है। यह केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज, शिक्षा, सूचना और जागरूकता फैलाने का प्रभावी माध्यम भी है। यह एक त्वरित और विश्वसनीय माध्यम है जिसके द्वारा समाचार और समसामयिक घटनाओं के बारे में तुरंत जानकारी प्राप्त होती है। यह विशेष रूप से प्राकृतिक आपदाओं, राष्ट्रीय संकटों और महत्वपूर्ण घटनाओं के समय में अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मामलों पर अद्यतन जानकारी प्रदान करता है।

रेडियो शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेषकर दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में जहां इंटरनेट और अन्य डिजिटल माध्यमों तक पहुंच नहीं होती, रेडियो शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है। कोविड महामारी के दौरान सामाजिक जागरूकता,शिक्षा और संवाद के लिए रेडियो एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ है।

कुल मिलाकर आधुनिक समय में रेडियो ने अपनी पारंपरिक सीमाओं को पार करते हुए डिजिटल, इंटरनेट, और स्मार्ट डिवाइस जैसे आधुनिक तकनीकी रूपों में ढाल लिया है। अब यह न केवल भरपूर मनोरंजन का स्रोत है, बल्कि सूचना, शिक्षा और जागरूकता फैलाने का एक अत्यधिक प्रभावी और सशक्त माध्यम बन चुका है। 

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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

सरला माहेश्वरी: समाचार प्रसारण के एक युग का अंत..!!


आज, 12 फरवरी 2026 को, भारतीय टेलीविजन इतिहास की एक चमकती हुई शख्सियत, दूरदर्शन की पूर्व समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी का निधन हो गया।  71 वर्ष की आयु में उनका यह अवसान न केवल मीडिया जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है, बल्कि उन लाखों दर्शकों के लिए भी है, जिनके घरों में उनकी शांत, मधुर और स्पष्ट आवाज़ ने समाचारों को विश्वसनीयता का पर्याय बना दिया था।

सरला माहेश्वरी, एक ऐसी महिला जो सादगी, संयम और सटीकता की मिसाल बनीं; जिन्होंने काले-सफेद टेलीविजन से रंगीन युग तक का सफर तय किया और समाचार प्रसारण को गरिमा प्रदान की। 

सरला माहेश्वरी  उस दौर की प्रतिनिधि थी जब महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और पेशेवर जीवन का संतुलन बनाना आसान नहीं था लेकिन सरला जी ने इसे न केवल संभाला, बल्कि एक मिसाल कायम की। उनकी सादगी और संयमपूर्ण व्यक्तित्व ने उन्हें हमेशा लोगों और अपनी जड़ों से जोड़े रखा ।

दूरदर्शन में उनकी शुरुआत बच्चों के कार्यक्रमों से हुई लेकिन जल्दी ही वे समाचार वाचिका बनकर उस स्थान पर आ गई जो शायद उन्हीं के लिए बना था। यह वह समय था जब भारत का टेलीविजन काले-सफेद से रंगीन युग में प्रवेश कर रहा था। सरला जी ने उस समय के कई अहम घटनाक्रम को अपनी आवाज और अंदाज से स्थायी स्मृतियों में बदल दिया।

सरला माहेश्वरी होने का मतलब था—स्पष्ट हिंदी उच्चारण, शांत मुस्कान और दर्शकों में विश्वास जगाना। वे न केवल समाचार पढ़ती थीं, बल्कि एक युग की सांस्कृतिक पहचान बनीं। आज के चीखते चिल्लाते मीडिया के लिए उनकी संयमपूर्ण शैली एक सबक है। 

सरला माहेश्वरी की यादें अब डिजिटल आर्काइव्स में जीवित रहेंगी, लेकिन उनकी आवाज़ का खालीपन हमेशा महसूस होगा। 

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें…विनम्र श्रद्धांजलि 🙏💐 


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बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

वाघा बार्डर से आंखों देखी:राष्ट्र गौरव की अमिट अभिव्यक्ति

 


ठंड की शामें उत्तर भारत में एक अनोखी रंगत भरी होती हैं। सूरज ढलते-ढलते आकाश में गुलाबी केसरिया आभा बिखेरता है, ठंडी हवाएँ हल्की सी कंपकंपी पैदा करती हैं और दूर से आती धुंध की चादर वातावरण को अपने आगोश में समेट लेती है। ऐसे में पाकिस्तान के लाहौर से महज 20 किमी और पंजाब के अमृतसर से 30 किलोमीटर दूर अटारी-वाघा बॉर्डर पर बीटिंग रिट्रीट समारोह देखना ठंड में भी गर्माहट ला देता है क्योंकि यहां प्रकृति की सर्दी देशभक्ति की गर्मी से टकराती है। 

शाम के करीब साढ़े चार बज रहे हैं। ठंड से बचने के लिए हम भी सपरिवार शॉल, स्वेटर और जैकेट जैसे सुरक्षा कवच के साथ स्टेडियम में सबसे सामने वीआईपी सीट पर अपनी जगह ले लेते हैं। वैसे, यहां लोगों के आने का सिलसिला करीब तीन बजे से शुरू हो गया था और दर्शक दीर्घा धीरे धीरे भरने लगी है। स्टेडियम के बाहर तिरंगा ध्वज से लेकर तिरंगा कैप बेचने  एवं चेहरे पर राष्ट्रीय ध्वज की छाप छोड़ने वाले कलाकार मौजूद हैं। उनके लिए भी क्रिकेट मैच की तरह यही कमाई का अवसर है। 

उधर, दर्शकों की भीड़ में बच्चे, बुजुर्ग, देशी विदेशी पर्यटक…सभी हैं और सबके चेहरे पर ग़ज़ब का जोश है । झुंड के झुंड आ रहे हैं और ‘कोई सिख, कोई जाट-मराठा, कोई गुरखा, कोई मद्रासी..’ गीत की तर्ज़ पर स्टेडियम की रौनक का हिस्सा बन रहे हैं। हवा में जरूर ठंडक है, लेकिन जोश इतना कि किसी को कोई शिकायत नहीं है। अटारी बाघा बॉर्डर पर भारत की साइड राष्ट्रभक्ति से भरपूर गाने लोगों के उत्साह को दोगुना कर रहे हैं जबकि पाकिस्तान साइड टीवी पर आतिफ असलम गुनगुना रहे हैं। भारतीय पवेलियन खचाखच भर गए हैं जबकि पाकिस्तान साइड में अब तक भारत की तुलना में मुट्ठी भर दर्शक ही हैं जबकि बाघा बार्डर अमृतसर की तुलना में लाहौर से ज्यादा पास है।


हमारी गैलरी में तैनात सुरक्षा कर्मी की सलाह पर हमने कार्यक्रम शुरू होने से पहले भारत-पाकिस्तान के मेन गेट, सीमा निर्धारित करने वाले पिलर,स्टेडियम सहित भीड़ के साथ भी फोटोग्राफी का अपना कोटा पूरा कर लिया। इसी बीच, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की अनुमति से महिलाओं की एक बड़ी टोली ने तिरंगा लेकर राष्ट्रभक्ति से सराबोर गीतों पर करीब पौन घंटे के धूमधड़ाके भरे नृत्य से माहौल में देशप्रेम घोल दिया है। 


स्टेडियम में भारतीय साइड महात्मा गांधी की आकर्षक विशाल तस्वीर है जबकि पाकिस्तान में स्क्रीन पर केवल कार्यक्रम के दौरान ही जिन्ना की फोटो दिखाई दी। स्टेडियम में रह रहकर वंदे मातरम और हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे गूंजने लगे हैं। अब शुरू हो रहा है मुख्य समारोह। भारत के ऊंचे पूरे स्मार्ट बीएसएफ जवान अपनी आकर्षक लाल पगड़ी और खाकी वर्दी में बेहतरीन मार्च पास्ट का प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके पैर इतने ऊँचे जाते हैं कि लगता है आसमान छू लेंगे और हर कदम पर दर्शकों की ज़ोरदार तालियाँ उनके उत्साह को और बढ़ा रही हैं।

जवानों के साथ सरप्राइज़ पैकेज के तौर पर बीएसएफ की महिला वॉरियर्स भी राइफलों को अंगुलियों पर नचाती हुई उपस्थित दर्शकों को हैरान कर देती हैं। महिला वॉरियर्स के करतब इस परेड में चार चांद लगा देते हैं। भारत की ओर से बीएसएस के जवान जैसे ही कदम बढ़ाते हैं, मैदान में एक नई ऊर्जा और उत्तेजना फैल जाती है। इसके फलस्वरूप जवानों की चाल, तेज़ एवं लयबद्धता और दमदार दिखाई देने लगती है। जवानों की ऊँची उठती टाँगें, एड़ी की कड़क आवाज और हवा में लहराते मजबूत हाथ, हमें हर क्षण आश्वस्त करते हैं कि देश सुरक्षित हाथों में है।

दूसरी ओर पाकिस्तानी रेंजर्स भी उसी तीव्र, आक्रामक और नाटकीय अंदाज़ में प्रदर्शन कर रहे हैं। दोनों ओर की मुद्राएं पूरे माहौल को चुनौती और जोश से भर देती हैं। इस परेड की खासियत यह है भारत और पाकिस्तानी दोनों ही साइड मिनट टू मिनट एक सी गतिविधियां होती हैं बिल्कुल ‘मिरर इमेज़’ की तरह…इसलिए पाकिस्तानी रेंजर्स भी अपनी काली वर्दी में वैसा ही जोश भरा प्रदर्शन कर रहे हैं। दोनों तरफ़ से प्रतिद्वंद्विता के साथ अनुशासन और समन्वय का अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। पहले दोनों देश अपने अपने गेट भी खोलते थे लेकिन आजकल द्वार बंद रहते हैं और दोनों पक्ष गेट के आरपार ही अपना जोश एवं जलवा बिखेरते हैं।


अब बारी है सबसे प्रतीक्षित पल की…जब दोनों ओर के जवान गेट के ठीक सामने एक साथ पहुँचते हैं। हल्की ठंड में जोशीली सांसें भाप बनकर ऊपर उठती हैं और हवा में घुल मिलकर इंसानियत और परस्पर भाईचारे का संदेश देती हैं। अब दोनों देशों के झंडे बिल्कुल तालमेल के साथ नीचे उतर रहे हैं…न बहुत तेज़, न बहुत धीमे—बस,नियंत्रित  गति से परस्पर दूरी एवं परंपरा का सम्मान करते हुए। यह दृश्य ऐसे लगता है जैसे दोनों देशों के राष्ट्रीय ध्वज हाथ में हाथ डालकर शांति की पहल करते हुए अपने अपने अवाम का सिर गर्व से ऊंचा कर रहे हैं। जैसे ही झंडे समारोहिक अंदाज में मोड़कर रखे जाते हैं, उनके सम्मान में दर्शकों की तालियाँ गूँज उठती हैं। रोशनी, संगीत, नारे सब मिलकर इसे जोश और राष्ट्रीय गर्व से भरा अनुभव बना देते हैं। 

यह समारोह सिर्फ़ एक सैन्य परेड नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और पड़ोसी के साथ जटिल रिश्ते की अनूठी अभिव्यक्ति है। वाघा बॉर्डर का यह नजारा देखकर मन जोश से भर जाता है। यहाँ आकर लगता है कि सीमाएँ भले विभाजित करें, लेकिन राष्ट्र के प्रति प्रेम, जोश और अनुशासन दोनों देशों को जोड़ते हैं। अगर आप अमृतसर जाएँ, तो इस समारोह को ज़रूर देखें, यह अनुभव जीवन भर याद रहेगा। वाघा बॉर्डर का यह दृश्य न सिर्फ दिल-ओ-दिमाग़ पर अमिट छाप छोड़कर स्थायी यादगार बन जाता है बल्कि ऐसा लगता है जैसे सीमा खुद जीवंत होकर एक कहानी सुना रही है—वीरता, सम्मान और राष्ट्रगौरव की।

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रविवार, 8 फ़रवरी 2026

हिमाचल में गंगा.. है न वाकई चमत्कार..!!

 

कल्पना कीजिए, जब चारों तरफ चमकती धूप खिली हो लेकिन इसके बाद भी एक स्थान ऐसा हो जहां पूरा पानी कांच की तरह मोटी परत में जमा हो.. पत्थर का बना फर्श इतना ठंडा हो कि पैर जम जाए, लेकिन हवा इतनी शुद्ध एवं साफ की अंतर्मन तक महसूस हो.. अकल्पनीय लगता है न..लेकिन यह हकीकत है और वह भी क्वीन ऑफ हिल्स शिमला से तकरीबन सौ सवा सौ किलोमीटर दूर। 

यहां तक पहुंचने का रास्ता भी इतना मनमोहक और रोमांचक है कि आप देश के तमाम दुर्गम सफर को भूल जाएंगे। एक तरफ पहाड़ की चोटियों से ऊंचाई में मुकाबला करता चीड़ देवदार का घना जंगल है तो ऊंचाई से विपरीत दिशा में प्रतिस्पर्धा करतीं गहरी खाई और बीच बीच में आवाजाही करते सियार एवं उनके जंगली दोस्त भी। हम भी वापसी में सियार के जोड़े से रूबरू हुए और वह भी इतने दमदार जोड़े से जो बिना डरे आंखों में आंखें डालकर देख रहे थे।

हम बात कर रहे हैं गिरी गंगा की.. हरिद्वार की तरह मां गंगा का एक पवित्र स्थान। शिमला जिले के कड़ापत्थर एरिया के पास स्थित यह स्थान अभी तक पर्यटकों की भीड़, वाहनों की चिल्लपों और शोरगुल से बचा हुआ है। हर तरफ सुकून बिखरा है और चारों ओर बिखरी है बर्फ। कहीं पारदर्शी चमकदार फर्श की तरह तो कहीं टुकड़ों में जमकर नदी के प्रवाह को रोकती हुई।

ज़ाहिर सी बात है कि अब आप के मन में सवाल आएगा कि कहां ऋषिकेश हरिद्वार और कहां ऊंचे पहाड़ों पर बसा शिमला..वहां तक गंगा मैया कैसे पहुंच गई? तो इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कहानी है। बताया जाता है कि एक पुराने ऋषि हिमाचल प्रदेश में एक ऐसी जगह बनाना चाहते थे, जिसमें काशी जैसी ही शक्ति और ऊर्जा हो। इसके लिए, उन्होंने हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के निर्मंड गांव को चुना। इसके साथ ही, वह और उनके साथ कुछ साधु हरिद्वार से अपने कमंडल में पवित्र गंगा जल ले जा रहे थे। वे शिमला में पुरानी नागन घाटी से होते हुए आगे बढ़ रहे थे। 

यह रास्ता हिमाचल प्रदेश के सबसे घने जंगलों में से एक है। इसी रास्ते में पड़ने वाले कुप्पर बुग्याल में ऋषियों ने आराम करने का फैसला किया। यह एक सुंदर मैदान होने के साथ-साथ एक चोटी भी है।

इस दौरान, वे जो गंगा जल लाए थे, वह गलती से ज़मीन पर गिर गया। उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा "गिरी गंगा" जिसका मतलब है गंगा गिर गई।  कमंडल गिरने से पानी की एक धारा बन गई और इसलिए इसे गिरी गंगा नदी कहा गया। बाद में, यहां एक मंदिर बनाया गया। कुछ संदर्भों में ऋषि का नाम जाह्नू ऋषि भी पढ़ने को मिलता है। हालांकि, उनके नाम की पुष्टि बड़े पैमाने पर नहीं हो पाई। 

इस घटना के बाद, गिरी गंगा को एक बहुत ही पवित्र और ऊर्जा से भरपूर जगह माना जाने लगा। स्थानीय देवता अपने अनुयायियों के साथ इस जगह पर आने लगे और धीरे-धीरे यह जगह लोकप्रिय हो गई। यहां मां दुर्गा और भगवान शंकर के मंदिर हैं। शिव मंदिर देखने में केदारनाथ मंदिर के छोटे प्रतिरूप की झलक देता है।

मंदिर के चारों ओर पानी का एक कुंड भी है जिसका पानी ठंड में आमतौर पर जमा रहता है। पास से गिरी गंगा की धारा बहती नजर आती है । गिरीगंगा मंदिर के बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का मानना है कि यह 13वीं सदी में बनाया गया था। हमारे लिए यह जानना बहुत दिलचस्प है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि उस समय आस-पास कोई सभ्यता नहीं थी।  गिरि गंगा मंदिर की आकर्षक वास्तुकला देखकर वाकई लगता है कि इस मंदिर को किसने और कैसे बनाया होगा । 

इस बारे में यहां प्रचलित कहानियों के अनुसार, यह पवित्र स्थान पांडवों ने बनवाया था। ऐसा माना जाता है कि पांडव अपने वनवास के दौरान इस जगह पर रहे थे। इस दौरान, उन्होंने गिरि गंगा में यह स्थान बनाया और यहाँ पूजा भी की। यह जगह उनके छिपने के लिए सबसे सुरक्षित थी क्योंकि जब तक आप खुद यहाँ नहीं पहुँचते, तब तक यह जगह कहीं से भी दिखाई नहीं देती। अभी भी यहां बस एक काम चलाऊ धर्मशाला है। हाल ही में सड़क जरूर जबरदस्त बन गई है इसलिए गाड़ियां की संख्या बढ़ने लगी है जबकि पहले यहां जाना बहुत ही दुष्कर था।

बताया जाता है कि गिरिगंगा और कुप्पर इलाका गद्दी और गुर्जर जनजातियों का रास्ता है। ये जनजातियाँ अपने मवेशियों और भेड़ों को चराने के लिए इस पुराने रास्ते का इस्तेमाल करती हैं। यह भी पढ़ने को मिलता है कि यह पुराना रास्ता उत्तराखंड में यमुनोत्री तक भी जाता है। आगे यह बद्रीनाथ और केदारनाथ तक जाता है इसलिए पुराने समय में गिरी गंगा भक्तों के बीच एक लोकप्रिय पड़ाव था। 

हिमाचल प्रदेश देवी देवताओं से जुड़ी आस्था, विश्वास, कथा, कहानियों, किस्से और किवदंतियों की भूमि है। विश्वास करेंगे तो चमत्कारों से भी रूबरू होंगे और यदि नहीं करेंगे तो बस तर्क तलाशते रह जाएंगे। खैर, गिरी गंगा ट्रैकिंग के शौकीन लोगों का स्वर्ग है। कड़ा पत्थर तक राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ा यह क्षेत्र गिरी रिजर्व फारेस्ट के अंतर्गत आता है एवं वृक्षों का घना जंगल है। यहां शीर्ष यानि कुप्पर बुग्याल पर पहुंचकर आप पीर पंजाल से लेकर पब्बर घाटी तक का विहंगम दृश्य देख सकते हैं इसलिए इसे बर्फीले ट्रैकिंग के बेहतरीन स्थानों में भी गिना जाता है।






#Himachal #Ganga #Shimla #GiriGanga #गंगा









गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

सफेद बर्फ, काली बर्फ़..में छिपी हमारी कहानी!!

ये न तो आपके हमारे घर के पुराने गद्दों की मैली हो चुकी रुई है और न ही सर्फ या साबुन का झाग..इन दिनों शिमला जैसे तमाम पर्वतीय इलाकों में ये नजारा आम है। ये बर्फ़ है, वही बर्फ जिसको देखने के लिए हजारों लाखों लोग पहाड़ों पर जमा होते हैं। पहाड़ों पर जब पहली बार बर्फ गिरती है, तो सब कुछ कितना सुंदर लगता है न...श्वेत चादर ओढ़े खड़े पहाड़, बिल्कुल निर्मल, चमकदार, किसी संत की तरह। लेकिन धीरे-धीरे... हवा में उड़ती धूल, धुआँ, ट्रकों की कालिख, और हमारी अपनी जिंदगी की भागदौड़—सब मिलकर उस सफेद बर्फ़ पर कालिख की परत चढ़ा देते हैं। इसके फलस्वरूप खूबसूरत सफेद बर्फ अब काली होकर बदसूरत दिखने लगती है.. गंदी और नकारात्मकता से भरपूर उदास सी। हम इसे ‘काली बर्फ़’ कह सकते हैं। वैसे पहाड़ों पर काली बर्फ़ के अंग्रेजी नाम ब्लैक आइस का अलग ही खौफ है।यह बर्फ इतनी पारदर्शी होती है कि काली सड़क पर बिल्कुल घुल मिल जाती है और इस पर चलना लगभग नामुमकिन होता है। इस पर लोग सटासट फिसलते हैं, बिल्कुल बच्चों वाली फिसल पट्टी की तरह। अनजाने में कई लोग अपनी कमर,हाथ पैर तक तुड़वा लेते हैं।

अब बात पुनः काली गंदी बर्फ की, वैसे देखा जाए तो ये सिर्फ पहाड़ों पर फैली बर्फ भर की कहानी नहीं है बल्कि ये हमारी अपनी कहानी भी है। हमारा बचपन भी तो ऐसा ही रहता है झक सफेद बर्फ की तरह बिल्कुल साफ दिल, हँसता- खिलखिलाता, बिना वजह रोता और फिर हंसता सा। कोई बैर नहीं, किसी से कोई ईर्ष्या नहीं, कोई लालच नहीं। बस, मासूमियत के साथ जीते हैं खुशमिजाजी से, खुशी से और सरलता से। समय के साथ हम बड़े होते जाते हैं..कद से,दिमाग से और हावभाव से। 

फिर दुनिया हमें सिखाना शुरू करती है जैसे परीक्षा में अच्छे नंबर लाओ, अच्छी एवं भरपूर ऊपरी कमाई वाली नौकरी करो, बड़ा सा घर लो, बड़ी वाली कार वरना लोग क्या कहेंगे... और ‘लोग क्या कहेंगे’ के पीछे भागते हुए हमारे सहज, श्वेत और सरल मन पर धीरे-धीरे जलन/तुलनाओं/ विरोधाभास की धूल जमने लगती है । फिर हम छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगते हैं, अपने ही साथियों की तरक्की देखकर ईर्ष्या करने लगते हैं, झूठ बोलकर, बहाने बनाकर, लापरवाही से काम करने लगते हैं..फिर तो रातों को नींद  हराम होना ही है। मन सवालों और अफसोस के बीच भटकने लगता है। हमारे व्यक्तित्व की सफेद बर्फ धीरे धीरे काली पड़ने लगती है बिल्कुल पहाड़ों की काली बर्फ़ की तरह.. जो फिसलन, भटकाव, अलगाव और जीवन की तमाम बुराइयां लाती है। 

लेकिन, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है दोस्तों…क्योंकि बर्फ पिघलकर पहले पानी बनती है और फिर भाप एवं कुछ दिन में नई सफेद, निर्मल,धवल और चमकदार बर्फ बनकर फिर खूबसूरती बिखेरने लगती है। हम भी चाहे तो समय के साथ अपने मन की कालिख धो सकते हैं और फिर से बर्फ़ की तरह अपने मन को निर्मल और सरल बना सकते हैं। इसके लिए ज्यादा मशक्कत भी नहीं करना है, बस छोटे छोटे प्रयास करने हैं जैसे कभी-कभी किसी की बात पर पलटकर जवाब न देकर चुप रह जाना, पुरानी बातों को छोड़ देना, किसी से माफी माँग लेना तो किसी को माफ कर देना और सारे गिले शिकवे भुलाकर अपनी शुरुआती सहजता पुनः हासिल कर लेना..कितना आसान है। 


पहाड़ों की बर्फ़ भी शायद जीवन की यही सीख देती है कि सफेद यानि बेदाग रहना आसान नहीं होता और खासतौर पर गिरकर साफ रहना तो और भी मुश्किल होता है। स्वयं को दुनियादारी की फिसलन से बचाने एवं अपने उजलेपन को बनाए रखने के लिए सच्चाई और मन का साफ होना जरूरी है। मन साफ है तो दुनिया भी सुंदर लगेगी । फिर मन के शिखर भी पहले जैसे चमकने लगेंगे..बिल्कुल बर्फ़ से ढके पहाड़ों की तरह। 


इसलिए, अब कभी पहाड़ों पर बर्फबारी देखने जाएं तो यह अवश्य याद रखें कि हमारे अंतर्मन भी बर्फ सा शांत, उजला, नरम और स्वच्छ है। यदि स्वभाव की यह खासियत खो गई है तो उसे फिर से जगाना जरूरी है एवं यदि अब तक कायम है तो उसे सहेजकर रखना भी उतना ही आवश्यक है। पहाड़ों की बर्फ़ बार बार गिरकर हमें शायद यही संदेश देती है कि हम कितने खूबसूरत थे/हैं/ और हो सकते हैं…बस, थोड़ा सा धीरज, सहजता, अपनापन और ईमानदारी चाहिए ।


बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

प्रेम तो भावनात्मक अहसास है, दिखावा नहीं…!!

 


प्रिय

ओशो के अनुसार, सच्चा प्रेम स्वतंत्रता है, न कि बंधन या स्वामित्व। उनका मानना था कि प्रेम एक अवस्था है। आप प्रेम में होते नहीं, बल्कि आप प्रेम होते हैं। जो भयमुक्त और साझा करने की भावना पर आधारित है। प्रेम, जीवन को सुंदरता और अर्थ देता है। भले ही यह बात ओशो ने कही है लेकिन तुम भी यह बात बखूबी जानती हो कि हमारा परस्पर प्यार या प्रेम भी एक अनूठा एहसास है, जो दिमाग से नहीं दिल से है और इसमें अनेक भावनाओं और अलग अलग विचारों का समावेश है। जाहिर सी बात है, आप जिससे प्यार से जुड़ जाते हैं उसका प्रेम स्नेह से लेकर खुशी के शिखर तक अपने आप पहुंचने लगता है। प्यार एक मजबूत आकर्षण और परस्पर जुड़ाव की भावना है जो सब भूलकर साथ साथ जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करती है..जैसे की हम । मेरा मानना है कि सच्चा प्यार वह होता है जो सभी हालातों में आप के साथ हो, यानी दुख में भी और सुख में भी.. आप को और आप की खुशियों और परेशानियों को अपनी खुशियां या दुख माने… जैसे मेरा और तुम्हारा प्यार। 

मनीषा, तुम मेरी पत्नी भर नहीं हो बल्कि दो दशकों से ज्यादा से मेरी हम कदम हो । प्यार का मतलब हमारे लिए सिर्फ यह नहीं कि फिल्मी दिखावे की तरह हम हमेशा साथ रहे, प्यार तो एक-दूसरे से दूर रहने पर भी बढ़ता है। हम पारिवारिक और कार्यालीन जिम्मेदारियों और उत्तरदायित्व के कारण भले ही कभी कभी दूर रहते हों लेकिन अहसास हमेशा परस्पर साथ होने के ही रहते हैं। हमारे प्रेम में ऐसी पॉजिटिव एनर्जी है जो हमें सदैव मानसिक और आंतरिक दोनों तरह की खुशी प्रदान करती है।

आज के वैलेंटाइन डे और जेन जी वाले दौर की पीढ़ी के लिए पति पत्नी के तौर पर 26 साल का समय आश्चर्य में डाल सकता है क्योंकि उनका प्यार तो हफ्ते,पखवाड़े और कुछ महीनों में मुरझाकर सूख जाता है। लेकिन हमारे लिए, ढाई दशक से भी ज्यादा का समय, ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात है। 


दरअसल, हमें कभी अहसास ही नहीं हुआ कि एक दूसरे का हाथ थामे हमने 26 साल पूरे कर लिए हैं। याद है न, (वैसे तुम्हें तो मुझसे ज्यादा याद रहता है)  23 नवम्बर 1999 को हमने साथ साथ चलना शुरू किया था। इतने अन्तराल के बाद आजकल अमूमन जोड़े एक दूसरे के विरुद्ध शिकवा-शिकायतों का पिटारा खोले बैठे रहते हैं लेकिन शायद परस्पर प्रेम, विश्वास और आपसी समझ ही है कि हमें ऐसा लगता ही नहीं है कि हम इतने सालों से 'विवाहित' हैं उल्टा आज भी 'हनीमून पीरियड' सा अहसास होता है। 

आम जोड़ों की तरह रोज़मर्रा की कोई शिकवा शिकायत नहीं, कभी कभार चंद मिनटों की नाराजगी और मनीषा जी, आपके मुख-मंडल पर हमेशा छाई रहने वाली बेफिक्र सी, प्यारी और स्नेहिल मुस्कान सारे गिले शिकवे/परेशानियाँ निकाल बाहर फेंकती है.... आज लगभग 50 साल से अधिक की आयु के साथ बढ़ते कदमों के बाद भी यदि अपना बनाव-ठनाव या चेहरे पर कुछ नमक बाकी है तो इसका श्रेय भी आप के प्यार को ही जाता है।

ऐसा नहीं है कि हमारा यह प्रेमिल गठबंधन एक दिन में बन गया बल्कि हमने इसे अपने भाव, भावनाओं, स्नेह, प्यार, एक दूसरे के साथ, सहयोग और अपने पन से सींचकर धीरे धीरे मजबूत वट वृक्ष बनाया है..ऐसा वृक्ष जिसे जीवन का कोई झंझावात हिला तक नहीं सकता। इसमें सबसे बड़ा योगदान आपका है क्योंकि अपने से बढ़कर दूसरों ख्याल रखना और मीठी से मुस्कराहट से आगे बढ़कर सबका ध्यान रखना, तुम्हारी खूबी है। शायद जीजी (मां) को इसका अहसास हमारी शादी के तुरंत बाद ही हो गया था तभी उन्होंने आप को नया नाम 'मुस्कान' दे दिया था...।


मनीषा जी, आपको अर्धांगिनी कहना सही शब्द नहीं है क्योंकि आप तो पूर्णांगनी हो... सब कुछ सम्पूर्ण करने वाली... मुझे, मेरे व्यक्तित्व को, हमारे परिवार को, खुशियों को, रिश्तों को और संबंधों को अपने प्रेम एवं स्नेह से साल दर साल नई गरमाहट देती आ रही हो। आप मेरे अधूरे वाक्य को पूरा करने वाला पूर्ण विराम हो लेकिन भाषा में पूर्ण विराम के बाद वाक्य खत्म हो जाता है जबकि मनीषा जी आप अपने प्रेम से उसे दोगुना कर और जीवंत कर देती हो । 

प्रिय, तुम सकारात्मकता और सहजता की ऊर्जा से सराबोर हो.. अपने मीठे स्वभाव और बड़े दिल के साथ सबको अपना बनाने में माहिर हो, रिश्तों की कद्रदान हो और सबसे जरूरी हर कदम पर, हर उत्सव को और हर छोटी से छोटी उपलब्धि को भी पूरे परिवार के साथ 'सेलिब्रेट' करने की भावना से सराबोर हो। 

प्रेम की पगडंडी पर इस शानदार सफर में हम परस्पर प्रेम से एक दूसरे के लिए उत्प्रेरक बनकर अपनी ऊर्जा और पॉजिटिविटी को दोगुना करने में कामयाब रहे हैं।.. ईश्वर की कृपा और परिवार के स्नेह /आशीर्वाद से आप की यह सौम्यता / सहजता / मुस्कान और हर एक के जीवन में सहयोगी बनकर खुशियां बिखेरने की आदत और बढ़े-बढ़ती ही रहे... मेरे लिए तो आप और आपका प्रेम ही खुशनुमा जिन्दगी की चाबी है।... हमारा यह प्रेममय सफर सालों-साल इसीतरह अपनेपन और आत्मीयता के बीच उल्लासित रहे...। 

हमारे लिए तो तुम से हम बनना, नकलीपन के बीच खालिस जीवन साथी बनना, हर खुशी और विपदा में मजबूती से परस्पर हाथ थामे डटे रहना, स्वयं से ज्यादा दूसरे के बारे में सोचना ही वास्तविक प्यार है और यही प्रेम की असल परिभाषा भी..हमारा यह प्रेम जन्म जन्मांतर तक इसी तरह कायम रहे, बढ़ता रहे…आमीन।




 



मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

चुटकियों में जिंदगी का फ़लसफ़ा समझाती रोचक किस्सागोई

कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो बिना किसी गूढ़ और अलंकृत भाषा के भी जीवन के अहम फलसफे आसानी से समझा देती हैं। बिल्कुल परिवार के उस सदस्य की तरह  जो बच्चों से लेकर बड़ों तक के बीच हल्के फुल्के अंदाज में अपनी बात कह जाता है। वरिष्ठ लेखक एवं संचार विशेषज्ञ संजय सक्सेना एवं उनकी नई किताब ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ भी परिवार के सदस्य की तरह है जो बिना लाग लपेट के जरूरी संदेश दे जाती है लेकिन अंदाजे बयां ऐसा है कि आप मुस्कराते हुए उस संदेश को आत्मसात कर सकते हैं।

‘डायरी का आखिरी पन्ना’ न केवल बिना किसी बनावटीपन के आपको ज़िंदगी की सच्चाई से रूबरू कराती हैं बल्कि यह किताब आपको अपनी डायरी खोलकर कोई संदेश, कोई सबक या बस एक ईमानदार एहसास जैसा कुछ न कुछ लिखने के लिए प्रेरित भी करती है।

‘डायरी का आखिरी पन्ना’ वास्तव में रोज़मर्रा की ज़िंदगी के उन छोटे-छोटे किस्सों का संग्रह है, जो सतह पर साधारण लगते हैं, लेकिन गहराई में जीवन के गहरे संदेश छिपाए हुए हैं। यह किताब ठीक उसी तरह है जैसे हमारी अपनी डायरी का आखिरी पन्ना…जहाँ हम वे सभी बातें लिखते हैं जो कहीं और नहीं लिख पाते, जो सच्ची, ईमानदार और बिना किसी फिल्टर के होती हैं। 

लेखक संजय सक्सेना ने भी इस पुस्तक में आम आदमी की ज़िंदगी के विभिन्न पहलुओं को छुआ है। किताब ऐसे कई किस्सों का खजाना है जो हमारे आस-पास की हक़ीक़त को बिना अतिरंजना के और सरल शब्दों में पेश करते हैं। किताब की सबसे बड़ी खूबी इसकी भाषा और प्रस्तुति है। लेखक ने बड़े एहतियात और भावनात्मक आत्मीयता से हर किस्से को संवारा है। वाक्य छोटे, स्पष्ट और दिल को छूने वाले हैं। कोई भारी-भरकम दर्शन या उपदेश नहीं, बस जीवन के वे पल सफगोई से बयां किए हैं, जो हम सब जीते हैं लेकिन अक्सर अनदेखा कर देते हैं। 

किताब में हमारे आसपास के किस्सों में छिपे संदेश इतनी सहजता से उभरते हैं कि पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यह तो मेरी कहानी है, मेरे पड़ोसी की है या मेरे शहर की है। वास्तव में देखा जाए तो पाठकों के लिए यह पुस्तक भावी पीढ़ी के लिए एक दस्तावेज़ की तरह है, जो नई पीढ़ी को रोचक शैली में यह बताती है कि जिंदगी कैसे अपने अंदर बड़े संदेश छिपाए हुए है। लेखक का मकसद भी यही लगता है वे लिखना सिर्फ़ अपने लिए नहीं चाहते, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए लिख रहे हैं ताकि नई उम्र के पाठक भी समझ सकें कि जीवन के छोटे-छोटे पलों में कितनी गहराई छिपी होती है।

वैसे तो डेढ़ सौ पेज की इस किताब के अधिकतर किस्से रोचक एवं पठनीय हैं लेकिन ‘गुठली की यात्रा में जीवन का फलसफा’, ‘झुर्रियों से संवाद’, ‘एक चुटकी तसल्ली की कीमत’, ‘सवाल जो जलील करवा सकते हैं’, ‘कुछ सड़क छाप दोस्त भी जरूर होना चाहिए’, ‘कुचली उंगली फिर नहीं आती’.. जैसे कुछ किस्से इतने अच्छे बन पड़े हैं कि आप इन्हें बार बार पढ़ना चाहेंगे।

पुस्तक के कुछ अध्यायों एवं खास तौर पर अंतिम हिस्से के कुछ किस्सों को पढ़कर जरूर यह लगता है कि ये किस्से थोड़ा और विस्तार मांगते हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह भी डायरी श्रृंखला की इस दूसरी पुस्तक को संपूर्ण बनाने में अहम किरदार निभाते हैं। संजय सक्सेना इससे पहले ‘डायरी का मुड़ा हुआ पन्ना’ नामक पुस्तक भी लिख चुके हैं जो पाठकों में जबरदस्त लोकप्रिय हुई थी। 

किताब का कवर, प्रिटिंग, ले आउट, फ़ॉन्ट और उनकी साइज बहुत ही आकर्षक है जो आपको पढ़ने के लिए उत्साहित करती है। यदि आप चुटकियों में जिंदगी की गंभीर बातों को समझना चाहते हैं तो ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ आपके लिए ही है..जरूर पढ़िए। वाकई, यह एक संवेदनशील, विचारोत्तेजक और मानवीय मनोभावों को समेटे  हुए भावनात्मक संग्रह है।

पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:

पुस्तक का नाम: डायरी का आखिरी पन्ना 

लेखक: संजय सक्सेना 

कुल पृष्ठ: 154

मूल्य: 200 रुपए

प्रकाशक: लोक प्रकाशन, भोपाल

मेरी रेटिंग: 4.5/5


बुधवार, 28 जनवरी 2026

डमरू,मृदंगम और नगाड़ा पर बैठकर लीजिए भारतीय संगीत का आनंद..!!


बाँसुरी, डमरू, एकतारा, इसराज, मृदंगम्, नगाड़ा जैसे नाम सुनकर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन कानों में गूंजने लगी न…तो तैयार रहिए, कल नईदिल्ली में विजय चौक पर आपको इन्हीं नामों पर बैठकर इनकी ही धुनों को सुनना है..और केवल यही नहीं, पखावज, संतूर, सारंगी, सारिंदा, सरोद, शहनाई, सितार, सुरबहार, तबला और वीणा भी आपकी बैठक व्यवस्था का हिस्सा होंगे। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आपको इन वाद्य यंत्रों पर बिठाया जाएगा बल्कि पहली बार इस वर्ष बीटिंग रिट्रीट समारोह के लिए विजय चौक पर बैठने के लिए बनाए गए एंक्‍लोज़र्स के नाम भारतीय वाद्य यंत्रों के नाम पर रखे गए हैं ताकि आम लोगों को ज्यादा म्यूजिकल एवं अपनापन महसूस हो।

गौरतलब है कि बीटिंग द रिट्रीट एक पुरानी सैन्य परंपरा है। पहले युद्ध के समय शाम होते ही बिगुल बजाकर सैनिकों को संकेत दिया जाता था कि लड़ाई रोक दी जाए और सभी अपने शिविरों में लौट आएं। यही परंपरा अब बीटिंग द रिट्रीट समारोह के रूप में निभाई जाती है। अब हर साल विजय चौक पर 29 जनवरी को होने वाला ‘बीटिंग रिट्रीट’ गणतंत्र दिवस समारोहों के समापन का प्रतीक होता है । इसे सेनाओं की एकता, अनुशासन और गौरव का प्रतीक माना जाता है।

बीटिंग रिट्रीट के दौरान भारतीय थल सेना, भारतीय नौसेना, भारतीय वायु सेना तथा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के बैंड मनमोहक और जोशीली धुनें प्रस्तुत करते हैं। इस अवसर पर कल राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु, उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ साथ अन्य केंद्रीय मंत्री, अधिकारी तथा आम नागरिक मौजूद रहेंगे।

हर साल की तरह, इस वर्ष भी बीटिंग रिट्रीट समारोह में भारतीय धुनों का बोलबाला रहेगा। पिछले कुछ सालों से इस प्रतिष्ठित समारोह में भारतीय धुनों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसे हम भारतीय संगीत के महत्व को अंतरराष्ट्रीय पटल पर प्रस्तुत करने का एक तरीका भी कह सकते हैं।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार समारोह की शुरुआत संयुक्‍त बैंड द्वारा ‘कदम कदम बढ़ाए जा’ की प्रस्तुति से होगी। इसके बाद पाइप्स एंड ड्रम्स बैंड द्वारा ‘अतुल्य भारत’, ‘वीर सैनिक’, ‘मिली जुली’, ‘नृत्य सरिता’, ‘मरूनी’ तथा ‘झेलम’ जैसी मधुर धुनें प्रस्तुत की जाएंगी। वहीं केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के बैंड ‘विजय भारत’, ‘हथरोही’, ‘जय हो’ और ‘वीर सिपाही’ की प्रस्तुति देंगे।

भारतीय वायु सेना के बैंड द्वारा ‘ब्रेव वॉरियर’, ‘ट्विलाइट’, ‘अलर्ट’ और ‘फ़्लाइंग स्‍टार’ धुनें प्रस्तुत की जाएंगी, जबकि भारतीय नौसेना का बैंड ‘नमस्‍ते’, ‘सागर पवन’, ‘मातृभूमि’, ‘तेजस्‍वी’ और ‘जय भारती’ की प्रस्तुति देगा। इसके पश्चात भारतीय थल सेना का बैंड ‘विजयी भारत’, ‘आरम्‍भ है, प्रचंड है’, ‘ऐ वतन, ऐ वतन’, ‘आनन्‍द मठ’, ‘सुगम्‍य भारत’ तथा ‘सितारे हिन्‍द’ की मधुर धुनें प्रस्तुत करेगा।

इसके उपरांत संयुक्‍त बैंड्स द्वारा ‘भारत के शान’, ‘वंदे मातरम्’ और ‘ड्रमर्स कॉल’ की धुनें प्रस्तुत की जाएंगी। अंत में बुगलरों द्वारा सदाबहार और सर्वप्रिय धुन ‘सारे जहाँ से अच्छा’ की प्रस्तुति के साथ इस भव्य आयोजन का समापन होगा। इस दौरान विजय चौक मनमोहक रोशनी से जगमगा उठेगा। इसके साथ ही गणतंत्र दिवस समारोह का समापन हो जाएगा।

#BeatingRetreat #बीटिंगरिट्रीट #RepublicDay #indian #गणतंत्रदिवस #भारतीय @highlight

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

उत्सव से ज्यादा आफत है बर्फबारी


इन दिनों टीवी और अखबारों के समाचारों में आप हिमाचल, उत्तराखंड या कश्मीर में हो रही बर्फबारी का मज़ा ले रहे पर्यटकों को देख रहे होंगे। वे कैसे एक दूसरे पर बर्फ फेंक रहे हैं, नाच रहें हैं और उत्सव मना रहे हैं। आप का मन भी मचल रहा होगा कि काश हम भी जल्दी से वहां पहुंच जाए और खूब बर्फ के गोले बनाकर खेले..लेकिन यह टीवी पर देखने में ही अच्छा लगता है क्योंकि पहाड़ों पर बर्फबारी अवसर या उत्सव भर नहीं लाती बल्कि आफत तथा आपदा भी लाती है।

पहाड़ी इलाकों में सर्दियों में बर्फबारी हमेशा एक जादुई दृश्य रचती है। आसमान से गिरती सफेद रुई जैसी बर्फ, पेड़ों पर जमी बर्फ की चमकदार परत, और चारों ओर फैली सफेद चादर जैसी बर्फ… ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने खुद एक श्वेत कथा रच दी हो लेकिन इस मनभावन सुंदरता के पीछे कई कड़वी कहानियां छिपी होती हैं, जो यहां रहने वाले या फिर इस बर्फबारी को भुगतने वाले ही समझ पाते हैं। पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी के दौरान और उसके बाद कई चुनौतियां आती हैं, जैसे फिसलन भरी सड़कें, ठंड से स्वास्थ्य जोखिम, बिजली-पानी की कटौती, खाने पीने की दिक्कत,रोजगार और यात्रा में बाधाएं।


सबसे पहली और बड़ी आफत आती है सड़कों पर। बर्फबारी के बाद सड़कें पूरी तरह से ब्लॉक हो जाती हैं। वाहन फिसलने लगते हैं, यातायात थम जाता है, और लोग घंटों और कई बार तो दिनों तक फंसे रहते हैं। कल्पना कीजिए, आप सपरिवार किसी पहाड़ी स्थल पर बर्फबारी का मज़ा लेकर शहर लौट रहे हों और बीच रास्ते में जमा बर्फ आपका रास्ता रोक दे। आपके पास महज एक दो बॉटल पानी और कुछ स्नैक्स है..घंटे/आधे घंटे के उत्साह के बाद न पानी बचता है और न ही खाना। फिर बच्चे रोने लगते हैं, भूख बढ़ जाती है एवं ठंड से आप कांपने लगते हैं। आखिर जाम में फंसी गाड़ी में कितनी देर तक हीटर/ब्लोअर चलाएंगे। आपको भी आगे के सफर के लिए ईंधन की चिंता सताने लगेगी। ऐसी सूरत में आप खुद को असहाय महसूस करने लगते हैं। 


यह न केवल यात्रा की समस्या है, बल्कि एक भावनात्मक बोझ है – घर की याद, अपनों की चिंता और अनिश्चितता का डर। पहाड़ों पर अक्सर पर्यटक उत्साह में आते हैं, लेकिन आमतौर पर परेशान होकर वापस जाते हैं। वहीं, स्थानीय लोग तो रोज़ी रोटी के संकट से जूझने लगते हैं। बर्फ उनकी आजीविका को भी प्रभावित करती है। दुकानें बंद, व्यापार ठप, और रोजगार की कमी – यह सब मिलकर एक निराशा की लहर पैदा करता है। 

दूसरा बड़ा संकट यह आता है कि बर्फबारी से बिजली और पानी की किल्लत होने लगती है। बर्फ से बिजली के तार टूट जाते हैं, ट्रांसफॉर्मर फेल हो जाते हैं और घंटों (दूरदराज़ के इलाकों में कई दिनों तक)अंधेरा छा जाता है। रातें ठंडी और लंबी हो जाती हैं, न हीटर और न ही गर्म पानी.. सब्ज़ी नहीं,सामान नहीं,दूध नहीं,ब्रेड नहीं…अलाव के लिए लकड़ी/कोयला भी कब तक चलेगा। स्थानीय लोगों की आंखों में यह डर साफ दिखने लगता है कि क्या कल सुबह तक बिजली आएगी? क्या पानी की सप्लाई बहाल होगी? 

पहाड़ों में रहने वाले लोग प्रकृति के साथ जीते हैं, लेकिन जब वही प्रकृति क्रूर हो जाती है, तो अवसर वास्तव में आपदा बन जाता है। मरीज अस्पताल तक पहुंचने में संघर्ष करते हैं, और कभी-कभी तो जीवन की कीमत भी चुकानी पड़ जाती है। भावनात्मक रूप से देखें तो यह बर्फबारी एकाकीपन और अलगाव बढ़ाती है। परिवार बिखर जाते हैं, क्योंकि कुछ लोग शहरों में फंस जाते हैं। फोन नेटवर्क कमजोर हो जाता है, और अपनों से संपर्क टूट जाता है। ये सब मिलकर एक गहरी उदासी पैदा करते हैं। 


पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी की परेशानियां हमें याद दिलाती हैं कि प्रकृति की सुंदरता हमेशा मीठी नहीं होती इसलिए बचाव एवं सावधानी ही एकमात्र रास्ता है।  सबसे पहले ऐसे किसी भी इलाके में जाने के पहले मौसम अपडेट चेक करें और बर्फबारी का अलर्ट देखकर अनावश्यक यात्रा टाल दें । इसी तरह, गाड़ी में स्नो चेन जरूर रखें और फिसलन वाली सड़कों पर लगाएं। बिना चेन के ड्राइविंग से बचें। इसके बाद भी, धीरे-धीरे ड्राइव करें, अचानक ब्रेक या शार्प टर्न से बचें। यदि पैदल चल रहे हैं तो फुटपाथ पर चलें । पैदल चलते समय सड़क पर ग्रिप वाले जूते पहने क्योंकि इस दौरान सड़क पर ब्लैक आइस का खतरा सबसे ज्यादा होता है। काली बर्फ दिखाई नहीं देती लेकिन आपकी हड्डी टूटने जैसा दर्द देने वाली होती है।

इसी तरह घर में दरवाजे-खिड़कियां अच्छे से बंद रखें। थर्मल कपड़े, वूलन ब्लैंकेट और सुरक्षित हीटर का इस्तेमाल करें। टॉर्च, कैंडल, पावर बैंक, अतिरिक्त बैटरी साथ रखें। पानी की बोतलें पहले से भरकर रखें क्योंकि नलों के पाइप का पानी जम जाता है। खाने-पीने का स्टॉक तो कम से कम  4-5 दिनों के लिए कर ही ले।

इस सबसे बढ़कर सबसे पहले स्वास्थ्य और व्यक्तिगत सुरक्षा का खास ध्यान रखें मसलन लेयर में कपड़े पहनें  जैसे थर्मल, वूलन स्वेटर, जैकेट, दस्ताने, टोपी, मफलर और वाटरप्रूफ जूते भी । ठंड में गुनगुना पानी पीते रहें। ठंड लगने पर तुरंत गर्म जगह पर जाएं। कंपकंपी, सुन्न होना, थकान जैसे लक्षण दिखें तो डॉक्टर से संपर्क करें। इन सभी सावधानी एवं उपायों के बाद ही बर्फबारी का आप उत्सव की तरह इसका आनंद ले सकते हैं वरना आफत भुगतने के लिए तैयार रहें।


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

देवभूमि के बाग़ में (सफेद) दुशाला ओढ़े खड़ी है..!!


क्वीन ऑफ हिल्स शिमला के साथ साथ देवभूमि हिमाचल में नए साल की आज 23 जनवरी ने लोगों की खोई मुस्कान वापस लौटा दी है। यह एक ऐसा दिन है जब आसमान ने अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलटे और सफ़ेद स्याही से नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया..ऐसा अध्याय जिसे हर कोई पढ़ना चाहता है..स्थानीय लोग, पर्यटक, होटल व्यवसाई और स्वयं प्रकृति भी। 

सुबह-सुबह जब लोगों की आँखें खुलीं, तो उनकी खिड़की के शीशे पर कोई अनजान बच्चा उँगली से दिल नहीं बना रहा था—बल्कि बादल खुद बर्फ के छोटे-छोटे चमकदार सफेद टुकड़े बिखेर रहे थे। शहर का मशहूर रिज मैदान (आम लोगों के लिए मॉल रोड), जो कल तक धूप में अपनी पुरानी कॉलर वाली कोट पहने उदास सा था, आज सुबह-सुबह एकदम सफ़ेद शॉल ओढ़े खिलखिला रहा था—जैसे कोई देवदूत या परी सफेद दुशाला ओढ़े आ गई है और सबकी नज़रें उसी पर टिक गई हों। 


मॉल रोड पर आज बर्फ़ के बीच चाय की केतली से अदरक-इलायची की खुशबू ज्यादा मनमोहक लग रही है। स्कूटर, कार और घरों की लाल-हरी छतों ने जगमग सफेदी भरा दुपट्टा ओढ़ लिया है । बर्फ़ की ठंडक पाकर कई वाहन चैन की नींद सो रहे हैं और मालिक से शायद फुसफुसाकर कह भी रहे हैं.. "अरे पहले मेरी सफेद चादर तो हटाओ!" सड़कें पर चुपचाप पर्यटकों के स्वागत के लिए व्हाइट कार्पेट बिछ गया है—जैसे कोई शायर कह गया हो कि सफेदी की ख़ामोशी भी कभी इतनी सुंदर हो सकती है।

मनाली,कुफ़री, ठियोग और नारकंडा तो पहले से ही तैयार बैठे थे— स्कूल के उन पढ़ाकू बच्चों की तरह जो एग्ज़ाम से पहले ही किताब खोलकर सिलेबस पूरा कर बैठ जाते हैं लेकिन शिमला शहर की संगत ने उनको कुछ बरगला दिया था और क्वीन ऑफ हिल्स ने सूखे में उनका नेतृत्व  भी किया। तीन महीने तक सिलेबस से बाहर सूखे मौसम को पढ़ने पर मजबूर कर दिया। लोगों को बारिश बर्फबारी के लिए भरपूर इंतज़ार करवाया। यहां तक कि स्थानीय लोगों के साथ साथ पर्यटकों को यह पूछते पूछते थका दिया था कि "कब आएगी बर्फ?"...और फिर एकदम से इतनी बर्फ उड़ेल दी—जैसे कोई हीरो लास्ट सीन में एंट्री मारता है या वैसे ही जैसे लास्ट बॉल पर सिक्स मारकर कोई बल्लेबाज टीम को जिता देता है।


प्रकृति ने यह खेल इतनी खूबसूरती से रचा कि सब का गुस्सा काफूर हो गया । पर्यटक अब फोटो खींच नहीं रहे, बल्कि फोटो में खुद को बर्फ के साथ समेटने की कोशिश कर रहे हैं। बच्चे बर्फ़ में लोट-पोट होकर स्नोबॉल बना रहे हैं, और रोमांटिक जोड़े हाथ में हाथ डाले एक दूसरे को निहार रहे हैं—जैसे बर्फ़ ने उन्हें रोमांस एवं गर्मजोशी से भर दिया हो। यह बर्फ सिर्फ़ ठंड नहीं लाई, एक तरह की सामूहिक स्मृतियां भी समेट लाई है। सब कुछ इस सफ़ेद चादर के नीचे से फिर से जीवित हो उठा है।

शिमला आज फिर वही पहाड़ों की पुरानी रानी बन गई है— अब उसने सफ़ेद गाउन पहन लिया है, और आसमान उसके लिए बार-बार फूल बरसा रहा है। तो अगर आप भी ठिठुरते हुए कहीं गर्म कम्बल में बैठे हैं, तो एक बार खिड़की खोलकर देखिए—कहीं शिमला की बर्फ़ आपकी तरफ़ भी कोई छोटा-सा संदेश तो नहीं भेज रही? और हाँ, अगर मॉल रोड पर हैं तो हाथ में गरमागरम चाय का एक गर्म प्याला ज़रूर थाम लीजिए क्योंकि इससे बर्फ़ देखने का मज़ा दोगुना जाएगा..आखिर, गर्म हाथ ही तो दिल की गर्मजोशी का मार्ग प्रशस्त करते हैं । 

परामर्श: यह खूबसूरत दृश्य महसूस करने के लिए मुकम्मल तैयारी रखिए..गर्म कपड़े, जूते, छाता वगैरह और हां, बर्फ की फिसलन से जरूर बचिए क्योंकि दिल की फिसलन की तरह बर्फ की फिसलन भी ऐसे गहरे दर्द दे जाती है तो सालों साल इस सीजन की याद दिलाते हैं।


रविवार, 18 जनवरी 2026

देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क पर सफ़र !!


बर्फ के बीच हाड़ कंपाती ठंड, मूसलाधार बारिश, आए दिन हो रहे भूस्खलन, पहाड़ से गिरते पत्थरों के बीच न डायनामाइट, न जेसीबी, न कोई ड्रिल मशीन..बस छैनी- हथौड़ी…और इंसानी हौंसला। मौत के साए में दिन रात बिना रुके काम करते हुए 18 हज़ार मज़दूरों ने मौसम की बेदर्दी और पहाड़ की कठोरता पर जीत हासिल कर दिखाई और बना दी देश की सबसे रोमांचक और खतरनाक सड़क। इसी सड़क पर हमें एनाकोंडा के चट्टानी रूप से भी रूबरू होने का मौका मिलता है।

हम बात कर रहे हैं राष्ट्रीय राजमार्ग-5 की। यह केवल एक सड़क भर नहीं, बल्कि इतिहास, साहस और रोमांच की जीवित धरोहर  है। यह इंसानी जिद का प्रमाण है। जिसमें महज हाथों ने असंभव को संभव बनाते हुए न केवल मजबूत पहाड़ों को काट डाला बल्कि झुकने पर भी मजबूर कर दिया। कभी हिंदुस्तान-तिब्बत रोड कहलाने वाली यह सड़क कालका से शुरू होकर शिमला, रामपुर, किन्नौर और शिपकिला दर्रे तक जाती है। लगभग 450 किलोमीटर लंबी यह पहाड़ी राह सतलुज नदी के साथ-साथ चलती हुई हिमालय के सबसे दुर्गम और सुंदर इलाकों से गुजरती है।

यह एक ऐसी सड़क है, जो हमें प्रकृति की विराटता, मानव साहस और इतिहास की गहराइयों से जोड़ देती है। सड़क कभी इतनी संकरी हो जाती कि लगता—अब आगे कुछ नहीं है। एक के बाद एक खतरनाक अंधे मोड़, सीधी खड़ी चट्टानों, सैकड़ों फीट नीचे पूरे वेग से बहती सतलुज नदी और सामने से एकाएक आ जाने वाले वाहनों के कारण हाथ अनायास ही स्टीयरिंग पर कस जाते हैं और सांसें खुद-ब-खुद धीमी हो जाती हैं।

हिमाचल प्रदेश की इस अनूठी सड़क की कहानी शुरू होती है 1850 में जब भारत पर अपने शासन प्रशासन की पकड़ मजबूत करने के बाद अंग्रेज सरकार ने व्यापार व्यवसाय पर अपना ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। तब तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने भारत को तिब्बत से जोड़ने के लिए इस महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना को हाथ में लिया। ब्रिटिश हुकूमत का प्राथमिक उद्देश्य भारतीय वस्तुओं को तिब्बत के रास्ते आगे तक बेचना और वहां से जरूरी सामान की भारत तक आवाजाही सुनिश्चित करना था। कहा तो यह जाता है कि खुद लॉर्ड डलहौजी ने इस भारत तिब्बत सड़क की शुरुआती रूपरेखा (डीपीआर) तैयार की और फिर इस सड़क का ब्लूप्रिंट ब्रिटिश आर्मी के कमांडर इन चीफ सर चार्ल्स नेपियर को सौंपा। इसमें मेजर ब्रिग्स की भी अहम भूमिका थी।

इस परियोजना पर अमल आसान नहीं था क्योंकि 1850 में जब इस सड़क का निर्माण शुरू हुआ था तब न तो आज की तरह पहाड़ों का सीना चीर देने वाली मशीन थीं और न ही ब्लास्टिंग तकनीक। तब केवल हाथों में छैनी और हथौड़ी लिए

आत्मविश्वास से भरपूर इंसान थे। अंग्रेजों ने सड़क निर्माण में 18 हजार भारतीय मजदूरों को अनजान से पहाड़ के सामने खड़ा कर दिया। जान की परवाह किए बिना इन मजदूरों ने अपने हाथों से विशाल पहाड़ काट दिया। उन्होंने न तो कड़कड़ाती ठंड की परवाह की,न बर्फबारी उनका हाथ रोक पाई और न ही भूस्खलन और मूसलाधार बारिश से उनके हौसलों पर कोई फर्क पड़ा। इस दुर्गम लक्ष्य को हासिल करने के दौरान कई श्रमिकों को अपना बलिदान देना पड़ा। कभी पहाड़ से गिरते भारी भरकम पत्थरों के नीचे दबकर, तो कभी प्राकृतिक आपदाओं का शिकार बनकर 122 मजदूरों को जान गंवानी पड़ी। इनकी स्मृति में जेओरी में एक गुमनाम सा स्मारक भी है।


वैसे तो यह पूरी सड़क अपने आप में मानवीय कुशलता,इंजीनियरिंग और श्रम का उत्कृष्ट नमूना है लेकिन इसमें भी सबसे खास है तरंडा ढांक क्योंकि किन्नौर जिले के इस इलाके में करीब ढाई किलोमीटर पहाड़ को बीच से काटकर सड़क बनाई गई है और पहाड़ का यह टुकड़ा विशाल एनाकोंडा के सिर की तरह नज़र आता है। यहां पहाड़ ही सड़क है और पहाड़ ही आपकी छत। इसके बीच से निकलती गाड़ियां ऐसी लगती हैं जैसे पहाड़ ने अपना जबड़ा खोलकर उन्हें रास्ता दिया हो। सड़क के इस अविश्वसनीय भाग के निर्माण का श्रेय एक भारतीय इंजीनियर राजबहादुर सिंह को दिया जाता है। हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग में कार्यरत राजबहादुर सिंह ने हिमाचल के कई दुर्गम क्षेत्रों में सड़कों का जाल फैलाया।

इस सड़क के निर्माण में एक स्थानीय व्यक्ति बाबा भलकू का भी अतुलनीय योगदान बताया जाता है। बाबा भलकू को पहाड़ों की बनावट और भूगोल ज्ञान का गहरा अनुभव था। उन्होंने हिंदुस्तान-तिब्बत रोड के सर्वेक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वजह है कि मशोबरा के ऊपर एक सड़क का नाम भी उनके सम्मान में भलकू रोड रखा गया है।

सड़क को बनने में भले ही कई साल में लग गए लेकिन तब से अब तक यह सड़क हिमाचल को सालाना लाखों करोड़ों रुपए का व्यापार देती आ रही है।  हम इसे हिमाचल की आर्थिक जीवन रेखा या इकोनॉमिक लाइफलाइन ऑफ हिमाचल भी कह सकते हैं। इस सड़क ने न केवल हिमाचल प्रदेश को व्यापार से जोड़ा बल्कि पूरे उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयां प्रदान की।  


दरअसल,उस समय ब्रिटिश हुकूमत का मकसद तिब्बत तक अपने व्यापार और प्रभाव को बढ़ाना था। तिब्बत के व्यापारी उस समय रेशम, ऊन, नक्काशीदार वस्तुएं,चमड़े का सामान,नमक और बेशकीमती मखमल लाते थे जबकि भारत के व्यापारी चावल,तेल,फल,सूखे मेवे और  किन्नौरी राजमा सहित तमाम चीजें वहां भेजते थे । शिमला जिले के रामपुर में अभी भी लगने वाला पारंपरिक लवी मेला इस व्यापार का गढ़ होता था। लवी मेला आज भी हिमाचल प्रदेश के सबसे पुराने मेलों में शामिल है। इस सड़क ने परस्पर व्यापार को नई ऊंचाइयां प्रदान की और इसी वजह से तब इसे लोगों ने सिल्क रुट ऑफ़ द हिमालय कहना भी शुरू कर दिया था।

इस सड़क की असली उपयोगिता 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान साबित हुई। बताया जाता है कि उस समय भारतीय सेना के पास सीमावर्ती इलाकों तक पहुंचने का यही एकमात्र रास्ता था और गोला बारूद से लेकर जवानों एवं राशन भेजने के लिए भी इसी रास्ते का इस्तेमाल हुआ। तब यह सड़क देश के लिए रणनीतिक जीवन रेखा बन गई थी। 


युद्ध के दौरान इस सड़क के महत्व को देखते हुए इसके रखरखाव की जिम्मेदारी सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को सौंप दी गई । वैसे इस सड़क की मजबूती और शानदार रखरखाव के महत्व का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सन 2000 में किन्नौर में सतलुज नदी में आई भयंकर बाढ़ के दौरान तमाम सड़कें टूट गई लेकिन यह सड़क लोगों की उम्मीद और राहत का जरिया बनी रही।

यह सड़क अब किन्नौर के सबसे मीठे, क्रिस्पी और लज़ीज़ सेब और मटर का मीठा स्वाद देश के अन्य इलाकों तक पहुंचाने का माध्यम है। यह हमें देश के सबसे अच्छे राजमा और चिलगोजा उपलब्ध कराती है। आर्थिक एवं रणनीतिक महत्व के कारण यह सड़क देश की किसी भी आधुनिक सड़क से पीछे नहीं है। अब जब भी आप इस सड़क से गुजरे तो हजारों श्रमिकों के परिश्रम और अनुकरणीय इंजीनियरिंग को याद करना नहीं भूलें। हिंदुस्तान-तिब्बत रोड पर चलना सिर्फ ड्राइव नहीं है—यह हिमालय से आमने-सामने संवाद है। अगर आप रोमांच चाहते हैं, डर से दोस्ती करना चाहते हैं और इतिहास को महसूस करना चाहते हैं तो इस सड़क पर एक बार ज़रूर चलिए।

सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...