शनिवार, 7 मार्च 2026

फ्लैग प्वाइंट..जहां समंदर की लहरें देती हैं तिरंगे को सलामी!!

 


तिरंगा धीरे धीरे…लेकिन मजबूती के साथ ऊपर उठ रहा था और इसके साथ-साथ सैकड़ों लोगों की आशाएं, उम्मीदें और आजादी की आकांक्षा समंदर की उछाल भरती लहरों के साथ जयघोष कर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई सपना हकीकत में बदल रहा हो और समंदर स्वयं इस बात का साक्षी बन रहा हो। तिरंगा में सबसे पहले केसरिया रंग ने सूरज की किरणों के साथ आंख से आंख मिलाकर विजय का शंखनाद किया। फिर, सफेद रंग ने सत्य की ताक़त का संदेश दिया और अंत में हरे रंग ने हरे भरे द्वीप से यह स्पष्ट कर दी कि-‘अब यह धरती हमारी है।’

हम बात कर रहे हैं 30 दिसंबर 1943 की…वह दिन, जो आज भी हमारी आजादी के लोकतांत्रिक पटल पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। जब तिरंगा ध्वज स्तंभ (फ्लैग पोल) के शिखर पर पहुंचा तो ऐसा लगा जैसे सैकड़ों साल की गुलामी की जंजीरें एक साथ टूट गई हों। भारत को मिली स्वतंत्रता से करीब चार पहले तिरंगा फहराकर आजादी का ऐलान करने वाले शख़्स थे - नेताजी सुभाष चंद्र बोस और स्थान था-अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की मौजूदा राजधानी पोर्ट ब्लेयर, जिसे अब हम श्री विजयपुरम के नाम से जानते हैं । 

यह ऐतिहासिक घटना देश के स्वतंत्रता संग्राम में मील का वह पत्थर साबित हुई जिसने अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया..जहां तक नेताजी की बात है तो वे पहले ही भारतीय जनमानस को आश्वस्त कर चुके थे कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा..पोर्ट ब्लेयर से तिरंगे के जरिए दुनिया भर को दिया गया यह पैगाम इसी नारे का विस्तार था।


दरअसल,पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना ग्राउंड (जो आज नेताजी स्टेडियम कहलाता है) में तब तक ब्रिटिश यूनियन जैक लहराता था लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने तिरंगा फहराकर गुलामी के पन्ने को पलटकर आजादी का जयघोष लिख दिया। नेताजी के इस कदम ने अंडमान को देश का ऐसा पहला हिस्सा बना दिया था जिसे सबसे पहले स्वतंत्र घोषित किया गया।


हाल ही में, मीडिया के साथियों के साथ अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की यात्रा के दौरान मुझे इस पवित्र स्थल के दर्शन का सुअवसर मिला। यह किसी ‘राष्ट्रतीर्थ’ से कम नहीं है। 1943 की उस ऐतिहासिक तिथि को यादगार बनाने के लिए यहां स्मारक बनाया गया है। यह स्थान अब पोर्ट ब्लेयर में फ्लैग पॉइंट (तिरंगा मेमोरियल) के नाम से जाना जाता है। यहां अब 150 फीट ऊंचा तिरंगा ध्वज लहरा रहा है और पास में ही स्थित समुद्र की अठखेलियां करती लहरें अपने शोर के साथ हमारी स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए वीरों का जयगान करती हैं।

फ्लैग प्वाइंट में नेताजी की स्मृति में बना स्मारक भी है जिस पर उनकी तस्वीर के साथ ध्वजारोहण की उस स्वर्णिम घटना का विवरण दर्ज है। स्मारक पर लिखा है: “30 दिसम्बर सभी भारतीयों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है। इसी दिन 1943 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज और आज़ाद हिन्द की अंतरिम सरकार के सहकर्मियों के साथ पोर्ट ब्लेयर में पहली बार तिरंगा फहराया था। इसके साथ ही उन्होंने अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह को ब्रिटिश राज से आज़ाद होने वाला पहला भारतीय भू-भाग घोषित किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान की शाही सेना यहाँ 23 मार्च, 1943 से ही पदस्थापित थी । 6 नवम्बर, 1943 को जापान के प्रधानमंत्री ने टोक्यो में ग्रेटर ईस्ट एशियाटिक नेशन्स की सभा में यह घोषणा की थी कि अंडमान एवं निकोबार प्रायद्वीप को आजाद हिन्द की अंतरिम सरकार को सौंप दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि नेताजी आजाद हिन्द फोन के सर्वोच्च सेनापति थे और आजाद हिन्द की अंतरिम सरकार के मुखिया भी थे ।”

यहाँ से रॉस द्वीप (Ross Island), नॉर्थ बे (North Bay) और समुद्र का मनोरम दृश्य भी दिखाई देता है। पर्यटकों के साथ साथ स्थानीय लोगों के समुद्र के किनारे टहलने और बैठने की व्यवस्था भी है एवं एक खूबसूरत पार्क भी, जो यहां के वातावरण को और सुंदर बना रहा है । सूर्यास्त के समय तिरंगे के साथ तस्वीरें लेने के लिए यह एक बेहतरीन जगह है। 


हालांकि, व्यस्तता एवं समय की कमी के कारण हम (मैं और दैनिक भास्कर शिमला के न्यूज़ एडीटर रविंदर कुमार पनवर) रात को करीब 9 बजे यहां पहुंच पाए लेकिन तब भी यहां का माहौल,लोगों की उपस्थिति और आकर्षक लाइटिंग इसे अलग गरिमा प्रदान कर रहे थे। यहां पहुंचकर ऐसा लगता है जैसे आज भी, पोर्ट ब्लेयर में राष्ट्रीय ध्वज के साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस का वंदे मातरम् का जयघोष समुद्र की गड़गड़ाहट के साथ हवा में व्याप्त है।


बुधवार, 4 मार्च 2026

समंदर में मेट्रो..लहरों पर कीजिए अब सवारी !!

न तो कोई रेल लाइन है, न ही पटरियां बिछी हैं और न ही सड़क जैसा कोई प्लेटफार्म..फिर भी नीले समंदर में मेट्रो दौड़ाने की तैयारी है.. जी हां, हमारे आपके शहरों में दिनभर खटर पटर दौड़ने वाली रंग बिरंगी आकर्षक मेट्रो..जो सैकड़ों किलोमीटर में फैले विशाल समंदर में बसे तमाम टापुओं (द्वीपों) को परस्पर जोड़ने का जरिया बनेगी…लेकिन यहां इसका नाम दिल्ली मेट्रो/कोलकाता मेट्रो या लखनऊ/भोपाल मेट्रो नहीं होगा बल्कि..वॉटर मेट्रो होगा।

हम बात कर रहे हैं अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में प्रस्तावित वॉटर मेट्रो की। यह ऐसी मेट्रो होगी जो न किसी ट्रैफिक जाम में फंसेगी, न सड़कों की धूल-धक्कड़ से घिरेगी और न ही शोर गुल करेगी। बस, लहरों की मस्ती और द्वीपों की हरी-भरी खूबसूरती के दीदार कराएगी। यह कोई कल्पना की उड़ान नहीं है, बल्कि भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है जो जल्दी ही हकीकत के बदलने वाली है।


जी हां, वो दिन दूर नहीं जब पर्यटकों का स्वर्ग अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, स्थानीय लोगों और सैलानियों के लिए एक सुपरफास्ट जल-परिवहन नेटवर्क से जुड़ जाएंगे। वैसे भी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के हैवलॉक (अब स्वराज द्वीप) एवं नील (अब शहीद द्वीप) धीरे धीरे मॉरिशस का विकल्प बन रहे हैं क्योंकि यह कम बजट में वही आकर्षण प्रदान कर रहे हैं।

सबसे पहले तो बात करते हैं वॉटर मेट्रो योजना की। दरअसल, 2025 में इनलैंड वाटरवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IWAI) ने 17 शहरों में अर्बन वॉटर ट्रांसपोर्ट सिस्टम की फिजिबिलिटी स्टडी शुरू की थी और इसमें अंडमान-निकोबार को सबसे खास जगह मिली। इस स्टडी का दायित्व कोच्चि मेट्रो रेल लिमिटेड (KMRL) को सौंपा गया है। इसका कारण यह है कि कोच्चि में पहले से ही वॉटर मेट्रो चल रही है। अब बाकी तटीय इलाकों में वॉटर मेट्रो चलाने की यह योजना रफ्तार पकड़ चुकी है। केंद्र सरकार ने इस पर अमल के लिए प्रारंभिक तौर पर 9 हजार 280 करोड़ की राशि का प्रावधान किया है।


जहां तक अंडमान की बात है तो यहां यह इको-फ्रेंडली वॉटर मेट्रो मुख्य रूप से फीनिक्स बे, बंबूफ्लैट और चैथम को जोड़ने का काम करेगी। इन तीनों इलाकों में आवागमन सबसे ज्यादा होता है। इस मार्ग पर रोजाना 4,000-5,000 लोग सफर करते हैं। वॉटर मेट्रो अंडमान की चाल और चेहरा दोनों बदल देगी। अभी तक स्थानीय निवासी रोजाना फेरी का इंतजार करते हैं और फेरी में बस, ट्रक, कार, साइकिल और मोटरसाइकिल के साथ चढ़कर अपने मुकाम तक पहुंचते हैं। लेकिन वॉटर मेट्रो के शुरू होने के बाद उन्हें फेरी का इंतजार करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी बल्कि इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड कैटामरान बोट्स पर सवार होकर वे मिनटों में एक द्वीप से दूसरे पर पहुंच जाएंगे।


आसान शब्दों में समझे तो वॉटर मेट्रो अत्याधुनिक सुविधाओं से सज्जित बोट्स की ऐसी सिलसिलेवार सेवा होगी जो सामान्य मेट्रो की तरह समयबद्ध रूप से चलेगी। यह सोलर एनर्जी से संचालित होगी जिससे न तो शोर होगा और न ही प्रदूषण का कोई खतरा। खासतौर पर डीजल से संचालित फेरी के स्थान पर यह पर्यावरण के लिए यह एक बड़ा कदम है, क्योंकि अंडमान जैसे संवेदनशील इकोसिस्टम में डीजल वाली फेरियां धीरे धीरे इतिहास बन जाएंगी।

वॉटर मेट्रो से सबसे ज्यादा खुश पर्यटक होंगे क्योंकि सर्वप्रथम तो उन्हें नई नवेली खूबसूरत और तेजी से चलने वाली वॉटर मेट्रो मिल जाएगी जो उनके पर्यटन अनुभव को और समृद्ध करेगी। इसके अलावा उनकी सेल्यूलर जेल से रॉस आइलैंड जैसी यात्राएं समुद्री हवाओं के साथ और आसान हो जाएंगी।

अब तक प्रस्तावित योजना में 10 द्वीपों को 76 किमी के नेटवर्क से जोड़ने की बात है। सरकार की योजना यह भी है कि ये वेसल्स इंडियन शिपयार्ड्स में बनें ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार मिले। वॉटर मेट्रो को मल्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट इंटीग्रेशन के जरिए बस परिवहन से जोड़कर आम लोगों को सहज और संतुलित परिवहन सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।

वॉटर मेट्रो पर अमल इतना आसान भी नहीं है कि पटरी बिछाई, फ्लाईओवर बनाए और चल पड़ी मेट्रो। वॉटर मेट्रो में द्वीपों की भौगोलिक स्थिति, मौसम की चाल, मानसून के तेवर, ज्वार भाटा, सुनामी एवं तूफान जैसी तमाम चुनौतियों का ध्यान रखते हुए सफर को सौ फीसदी सुरक्षित बनाना होगा। इसके अलावा, यहां की मूल जनजातियों (इंडिजेनस कम्युनिटीज) जारवा और सेंटिनेल जैसे आदिवासी समुदायों की सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा जिससे उनके प्राकृतिक जीवन में कोई व्यवधान न आए ।

कुल मिलाकर, वॉटर मेट्रो परियोजना न सिर्फ अंडमान के परिवहन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगी बल्कि पर्यटन को नई ऊंचाईयों पर ले जाएगी। जाहिर है इससे यहां की अर्थव्यवस्था को भी नई ऊंचाइयां मिलेगी।

#watermetro #Andman #PortBlair #Metro #Sea

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

अनूठा ज्वालामुखी..जिसके साथ ले सकते हैं सेल्फी !!


 ‘ज्वालामुखी’ नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं..आग का दरिया, चारों ओर बहता लाल आग सा दहकता लावा, रासायनिक गैसे और बहुत कुछ..इसके पास जाना तक नामुमकिन होता है। लेकिन हम बात कर रहे हैं एक जैसे ज्वालामुखी की जहां न आग है, न लावा, फिर भी धरती अपने अंदर जमा सामग्री बाहर उड़ेल रही है। यह ज्वालामुखी ऐसा है जिसे आप छू सकते हैं, इसके पास खड़े हो सकते हैं, फोटो खिंचवा सकते हैं और इसके बाद भी आपको घबराहट के स्थान पर सुकून मिलेगा…यह ‘मड वॉल्कानो’ यानि मिट्टी वाला ज्वालामुखी।


मड वॉल्कानो (Mud Volcano) वाकई प्रकृति का एक अनोखा और रहस्यमयी चमत्कार है। खास बात यह है कि भारत का एकमात्र सक्रिय मड वॉल्कानो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में बाराटांग द्वीप (Baratang Island) पर स्थित है। वैसे, गूगल गुरु के मुताबिक दुनिया भर में केवल 2500 के आसपास मड वॉल्कानो हैं लेकिन हमारे देश में अंडमान के अलावा ये कहीं और नहीं मिलते।

जैसा की हम सभी जानते हैं कि सामान्य ज्वालामुखी लावा उगलते हैं, लेकिन मड वॉल्कानो या मिट्टी के ज्वालामुखी ठंडी कीचड़, पानी और गैसों का मिश्रण बाहर निकालते हैं। यहाँ कोई लावा या आग नहीं होती—बस बुलबुले बनते हैं, कीचड़/मिट्टी धीरे-धीरे बहता रहता है और छोटे-छोटे गड्ढे या टीले बन जाते हैं। आमतौर पर मड वॉल्कानो का कारण पृथ्वी की गहराई में  जैविक सामग्री से मीथेन और अन्य गैसें निकलने को माना जाता हैं। ये गैसें दबाव बनाकर कीचड़ और पानी को ऊपर धकेलती हैं। जानकारों का यह भी कहना है कि अंडमान में टेक्टॉनिक प्लेटों के दबाव के कारण इसतरह के ज्वालामुखी बन रहे हैं । मड वोल्केनो का तापमान लगभग 29-30 डिग्री सेल्सियस और स्वभाव क्षारीय होता है।


अब तक मिली जानकारी के मुताबिक अंडमान द्वीपों में कुल 11 मड वोल्केनो हैं। जहां तक सबसे प्रमुख मड वॉल्कानो की बात है तो यह बाराटांग द्वीप पर है, जो पोर्ट ब्लेयर से लगभग 100-150 किमी दूर है। स्थानीय लोग इसे जलकी कहते है। वैसे, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बारे में सबसे रोचक बात यह भी है कि हमारे देश का लावा वाला एक सक्रिय ज्वालामुखी बैरन आइलैंड भी यहीं है, और कीचड़ वाला मड वॉल्कानो भी।

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अध्ययन में पता चला कि बाराटांग के मड वॉल्कानो से निकली मिट्टी ओलिगोसीन युग (Oligocene age) अर्थात् करीब 2.3 करोड़ साल पुरानी है। एकतरह से  यह मिट्टी और इससे जुड़े अध्ययन हमें पृथ्वी के उस समय के भूगर्भीय इतिहास को समझने में मदद कर सकते हैं । हम बाराटांग में जिस मड वॉल्कानो को देखने गए वह पिछले साल अक्टूबर में फटा है और यह घटना भी करीब 20 साल के बाद घटी है इसलिए यहां पर्यटकों का तांता लगा हुआ है । वन विभाग के अधिकारियों के साथ हम भी घटना स्थल तक गए। मड वॉल्कानो फटने के कारण यहां 3-4 मीटर ऊंचे टीले बन गए हैं और फुटबॉल के मैदान जैसे करीब 500-1000 वर्ग मीटर क्षेत्र में कीचड़ फैल गया । देखने में यह एरिया लावा वाले ज्वालामुखी फटने की तरह ही लगता है और यहां बने टीलों से अभी भी मिट्टी बह रही है और बुलबुले के रूप में गैस बाहर निकल रही हैं।


जब हमने मड वॉल्कानो के बारे में वन विभाग, अन्य संबंधित विभागों और इंटरनेट की मदद ली तो जानकारी मिली कि अंडमान के मड वॉल्कानो कहीं न कहीं 2004 के सुमात्रा-अंडमान भूकंप और उसके साथ आई सुनामी से संबंधित हैं। अब तो वैज्ञानिक इन मड वॉल्कानो को मंगल ग्रह (Mars) पर मौजूद संभावित मड वॉल्कानो के साथ मिलाकर अध्ययन कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि बाराटांग के मड वॉल्कानो की संरचना मंगल गृह की इसी तरह की संरचनाओं से काफी मिलती-जुलती है। कुल मिलाकर यह भी पृथ्वी के तमाम चमत्कारों में से एक है और आने वाले समय में अध्ययन के बाद शायद यह कहीं ऐसे रहस्य उजागर करने का जरिया बने जिन्हें पृथ्वी ने अब तक अपने गर्भ में छिपाकर रखा है।

(लेखक इन दिनों अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के भ्रमण पर हैं।)

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

क्या आपने कभी देखें..!! है नमक के खेत..!!


चने के खेत, गेहूं के खेत, गन्ने के खेत..तो हम सभी ने खूब देखें हैं और सरसों के खेत यश चोपड़ा की फिल्मों का प्रमुख आकर्षण रहा है। सरसों के खेत इतने रोमांटिक हो सकते हैं ये हमें ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ जैसी फिल्मों से ही पता चला है क्योंकि हम तो फिल्म ‘अंजाम’ के गीत ‘जोरा जोरी चने के खेत में..’ या फिल्म ‘तराजू’ के गाने ‘चल गन्ने  के खेत में अप्पा काहे शर्माए रे..’ जैसे गीतों से बेचारे खेतों का चरित्र समझते रहे हैं।

खैर, यहां हम खेतों का चरित्र चित्रण नहीं कर रहे बल्कि आपको एक ऐसे खेत से मिलवाना चाहते हैं जिसके बारे आप में से कई लोगों ने शायद सुना भी नहीं होगा। मुझे भी, इनके बारे में देखने के बाद ही पता चला। हम बात कर रहे हैं ‘नमक के खेत’ की…जी हां, सही सुना आपने नमक के खेत। नमक का दारोगा, नमक हलाल और नमक हराम के बाद नमक के खेत..बिल्कुल हमारे गांवों के खेतों की तरह, बस फर्क यह है कि इनमें गेहूं-चना नहीं नमक होता है।

हाल ही में, सोमनाथ की यात्रा के दौरान जब हम सड़क मार्ग से अहमदाबाद आ रहे थे तो गुजरात के शानदार हाईवे से गुजरते हुए भावनगर के आसपास हमें सफेदी से भरे खेत नजर आए..खेतों में सफेदी देखकर चौंकना लाज़मी था क्योंकि बरसात तो थी नहीं कि ‘फूले कांस सकल महि छाए..’ समझकर सफेदी देखें। फिर हमारे गाइड-सह-ड्राइवर-सह-इनोवा के मालिक हार्दिक भाई ने बताया कि ये नमक के खेत हैं। अब बारी थी इस नई जानकारी को समझने और विश्लेषण की।

दरअसल,खम्भात की खाड़ी के किनारे बसा भावनगर गुजरात में नमक उत्पादन का गढ़ है। दरअसल, यहाँ का नमक सिर्फ घरेलू इस्तेमाल की चीज नहीं, बल्कि औद्योगिक प्रगति एवं वित्तीय मजबूती का आधार है। यहाँ बने नमक के खेतों में समुद्री पानी से सौर वाष्पीकरण (सोलर एवापोरेशन) के पारंपरिक तरीके से नमक पैदा किया जाता है। गुजरात में जहाँ कच्छ का रण विशाल सफ़ेद रेगिस्तान की तरह दिखाई पड़ता है, वहीं भावनगर में ये खेत रंग-बिरंगे दिखाई देते हैं… नीले समुदी पानी से भरे तालाबों से लेकर चमकते सफ़ेद क्रिस्टल तक..इन खेतों को देखना किसी यादगार अनुभव की तरह है। सुबह खेतों में भरा खारा पानी आकाश का दर्पण बन जाता है तो दिन में धूप और सूरज की किरणों के साथ नीला, हरा, और बैंगनी बिखरने लगते हैं । ऐसा लगता है जैसे प्रकृति पानी पर चित्रकारी कर रही हो । 

सुबह होते ही मजदूरों के समूह के समूह काम पर लग जाते हैं। यहाँ बनने वाला नमक मरीन सॉल्ट है क्योंकि यह खाड़ी के पानी से बनता है। नमक बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहले खेतों को मेड़ों से बाँटकर तालाब की तरह बनाया जाता है। फिर समुद्री पानी को छोटे-छोटे हिस्सों में भरा जाता है। धूप की गर्मी पाकर पानी धीरे-धीरे वाष्पित होकर उड़ जाता है। पहले हल्के नमक के अलावा अन्य खनिज प्राकृतिक रूप से अलग होते हैं और फिर आखिरी चरण में शुद्ध सफ़ेद नमक के क्रिस्टल जमने लगते हैं। 

एक अनुमान के मुताबिक एक एकड़ से पचास से सौ टन तक नमक निकल आता है। भावनगर में कई कंपनियाँ ऐसी हैं जो सालाना लाखों टन नमक की खेती कर रही हैं। गुजरात भारत का सबसे बड़ा नमक उत्पादक राज्य है, जो देश की कुल नमक उत्पादन का लगभग 75-80 प्रतिशत का योगदान देता है। हालांकि जानकार यह भी बताते हैं कि मौसम में लगातार आ रहे बदलाव के कारण नमक की खेती पर गहरा असर पड़ा है। इससे नमक का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। 

आंकड़ों के मुताबिक पहले नौ महीने तक नमक का उत्पादन होता था, अब यह छह महीने तक सिमट गया है। यहां आए दिन आने वाले चक्रवातों ने भी उत्पादन में कमी ला दी है। इसका कारण यह है कि बारिश और चक्रवात के कारण खेतों में गाद जम जाती है और परिणामस्वरूप खेतों को फिर से तैयार करने में महीनों लग जाते हैं। हालांकि नमक उत्पादक मौसम से निपटने के लिए बेहतर ड्रेनेज और वाशिंग प्लांट जैसे कदम उठा रहे हैं। 

नमक हमारे भोजन में स्वाद और उत्पादकों की जेब गरम करता है लेकिन नमक के खेतों में काम करने वाले मजदूरों की सेहत पर भी गहरा असर डालता है। इसलिए अगली बार जब भी आप अपने भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए नमक डाले तो याद रखें कि हर छोटी-सी चुटकी में स्वाद और कमाई के साथ श्रमिकों का संघर्ष एवं सेहत का जोख़िम भी लगा है इसलिए इसे महज रसोई घर का एक हिस्सा न माने बल्कि जीवन का संघर्ष और देश के साथ साथ किचिन की रीढ़ भी समझे। 

इसी तरह, कभी भावनगर या इसके जैसे किसी नमक उत्पादक इलाके से गुजरे तो कार रोककर नमक के खेत जरूर देखें ताकि आप भी समझ सकें कि नमक केवल आपका स्वाद नहीं बल्कि देश के सैकड़ों लोगों के संघर्ष की कहानी है।

#Salt #Gujrat #Bhavnagar 







रविवार, 15 फ़रवरी 2026

मध्यप्रदेश के दो अद्भुत और सबसे बड़े महादेव..!!


महाशिवरात्रि पर आज मध्यप्रदेश के दो सबसे बड़े शिवलिंग की बात..भगवान शंकर के ये दोनों स्थान अपने शिवलिंग के बड़े आकार भर के कारण नहीं बल्कि महत्व के कारण भी प्रसिद्ध हैं इसलिए यहां महाशिवरात्रि पर आस्था का सैलाब उमड़ता है।

इनमें से एक है रायसेन जिले में और भोपाल के करीब स्थित भोजपुर मंदिर। यह मंदिर भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। चार विशाल स्तंभों वाले इस मंदिर का शिवलिंग इतना बड़ा है कि पूजा के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह शिवलिंग एक ही विशाल चट्टान से तराशा गया है, जो दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक माना जाता है। 


यहां शिवलिंग की ऊंचाई करीब 7.5 फीट और आधार सहित कुल ऊंचाई 40 फीट से अधिक है जबकि मंदिर 115 फीट लंबा, 82 फीट चौड़ा और लगभग 13 फीट ऊंचे चबूतरे पर बना है। यहां का विशाल द्वार और मंदिर का अधूरापन भी प्रमुख आकर्षण है।

बताया जाता है कि 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान राजा भोज द्वारा इस मंदिर का निर्माण शुरू किया गया था, लेकिन उस समय मंदिर के मुख्य भाग और गर्भगृह का काम ही पूरा हुआ। इसे "उत्तर भारत का सोमनाथ" भी कहा जाता है। भोजपुर मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित हर और यह यूनेस्को की अस्थायी विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है ।

दूसरा है छतरपुर जिले के खजुराहो में स्थित मतंगेश्वर महादेव मंदिर। इस मंदिर में स्थापित विशाल शिवलिंग के बारे में लोक मान्यता है कि हर साल शिवलिंग की लंबाई करीब एक इंच बढ़ रही है और मान्यता यह भी है कि जब यह शिवलिंग पाताल लोक तक पहुंच जाएगा, तब कलयुग का अंत हो जाएगा। शिवलिंग अभी करीब 9 फीट ऊंचा है और कहा जाता है कि इतना ही यह नीचे की ओर भी है।

यह मंदिर खजुराहो के पश्चिमी समूह के मंदिरों में से एक है और इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। यह मंदिर भी 11वीं शताब्दी में चंदेली शासकों द्वारा बनाया गया था। यहां विराजमान विशाल शिवलिंग को मृत्युंजय महादेव के नाम से भी जाना जाता। यह आज भी सक्रिय रूप से पूजा-अर्चना वाला यहां का एकमात्र प्राचीन मंदिर है क्योंकि खजुराहो के अन्य मंदिर मुख्य रूप से पुरातात्विक स्मारक हैं।


शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

धूप और बर्फीली हवाओं में कुश्ती!!

 


मैदानी शहरों में भले ही पारे ने 30 डिग्री तक छलांग लगाकर गर्मी की आमद की आहट दर्ज करा दी हो लेकिन पहाड़ों पर  सर्दी और गर्मी के बीच कुश्ती जारी है। जब धूप जोर मारती है तो सड़कों के किनारे जमा बर्फ की मोटी परत भी सिसकने लगती है और शरीर में लिपटी कपड़ों की लेयर चुभने लगती हैं।

..लेकिन जैसे ही बर्फीली हवाओं को मौका मिलता है वे धूप को दबोच लेती हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे कबड्डी में रेडर को दूसरी टीम के खिलाड़ी दबोचते हैं। फिर क्या है..बर्फीली हवाओं के आगोश में आकर धूप भी ठंडी हो जाती है और कपड़ों की लेयर हमारा सुरक्षा कवच। 


अधिकतम 15 डिग्री से लेकर न्यूनतम 1 डिग्री सेल्सियस के बीच सर्दी गर्मी की इस धमा चौकड़ी में आपको हर वक्त तैयार रहना पड़ता है। दक्षिण भारत और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में आ रहे सैलानियों के लिए तो अभी भी शायद यह कड़ाके की ठंड है इसलिए वे पूरे जिरह बख्तर मतलब ऊनी कपड़ों के साथ आते हैं इसलिए पहाड़ी इलाके उनकी रंग बिरंगी ऊनी टोपियों, मफलर और स्वेटर से गुलजार हैं।


...जबकि हनीमून कपल के लिए शायद यह मौसम सबसे मुफीद है इसलिए शादी के बाद लगता है वे सीधे पहाड़ों पर भाग रहे हैं । यही कारण है कि रोज और सप्ताहांत में जोड़े/ नव युगल बरसात के बादलों की तरह उमड़ घुमड़ रहे हैं...कुल मिलाकर, आपको भी पहाड़ों के बसंत से रूबरू होना है तो बस, निकल आइए।


#wintervibes #summervibes #mountains #himachalpradesh  #shimla

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

जादुई पिटारे की तरह है रेडियो


रेडियो सुनना इन दिनों कितना आसान है न? मोबाइल पर ऐप डाउनलोड करो और मनचाहे गाने और कार्यक्रम सुनो, लेकिन कुछ दशक पहले तक रेडियो ‘लग्जरी’ था। रेडियो खरीदने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। ये पढ़कर आश्चर्य हो रहा है न? हकीकत यही है कि ऐसा भी दौर था जब घर में रेडियो रखने और सुनने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था? बिल्कुल वैसे ही जैसे आज कार चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस चाहिए। तब रेडियो के लिए ब्रॉडकास्ट रिसीवर लाइसेंस जरूरी था। रेडियो सेट रखने वाले को पोस्ट ऑफिस से करीब 15 रुपए सालाना शुल्क देकर लाइसेंस लेना पड़ता था। हर साल इसको रिन्यू भी कराना पड़ता था और बिना लाइसेंस के रेडियो रखना गैर-कानूनी था।

रेडियो को हम हमारे देश में सामान्य रूप से आकाशवाणी के नाम से जानते हैं। जेन ज़ी में यह एफएम, पॉडकास्ट, रेडियो ऐप्स जैसे तमाम नामों से लोकप्रिय है। यह एक जादुई पिटारा है । आप मोबाइल से, कार में, ईयर फोन के जरिए आसानी से रेडियो सुन सकते हैं लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब रेडियो एक बड़ा सा डिब्बा होता था, जिसमें एंटीना लगाकर दूर-दूर की आवाज़ें पकड़ी जाती थीं। आज वही रेडियो जेब के छोटे से स्मार्टफोन में समा गया है। अब गाने, कहानियाँ, खबरें, पॉडकास्ट – सब कुछ उँगलियों के इशारे पर उपलब्ध हैं। दुनिया भर में लोग स्पॉटिफाई, यूट्यूब, म्यूजिक ऐप्स, न्यूज ऑन एआईआर या पॉडकास्ट ऐप्स पर रेडियो सुन रहे हैं। दरअसल,


रेडियो संचार के सबसे सस्ते और आसान माध्यमों में शामिल है। यह बैटरी से चलता है और बिजली तथा इंटरनेट न हो तो भी दुनिया भर की बातें सुनाता है। दूर-दराज के इलाकों में तो आज भी ये लाइफलाइन से कम नहीं है।

शायद, आपको जानकारी होगी कि हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस  मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन 1946 में यूएन रेडियो शुरू हुआ था। संयुक्त राष्ट्र ने 2011 में 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस घोषित किया था। इस बार विश्व रेडियो दिवस की थीम है- रेडियो और एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)। यूनेस्को की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, ये थीम रेडियो के भविष्य पर फोकस करती है। 

अब हम जानते हैं कि भारत में रेडियो ने अपने जन्म से लेकर अब तक किस प्रकार खुद को बदला है। वैसे इतना तो आप सभी जानते ही हो कि दुनिया में रेडियो के जन्म की कहानी इतालवी वैज्ञानिक जी मार्कोनी से शुरू हुई थी। उन्होंने पहली बार 1895 में बिना तार के संदेश भेजा और इसके बाद तो रेडियो क्रमशः दुनिया भर में फैल गया। हमारे देश में रेडियो का इतिहास और विकास समझना एक महत्वपूर्ण और दिलचस्प यात्रा है। भारत में रेडियो की शुरुआत करीब सौ साल पहले एक छोटे से प्रयोग से हुई थी, लेकिन समय के साथ यह देश के सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक ताने बाने का अभिन्न हिस्सा बन गया। 


अब देश ही नहीं दुनिया भर में रेडियो के माध्यम से आम लोगों को न केवल सूचना और मनोरंजन प्रदान किया जाता है, बल्कि यह एक सशक्त माध्यम के रूप में समाज में जागरूकता बढ़ाने का दायित्व भी निभाता है। भारत में रेडियो की विकास यात्रा के सबसे पहले चरण को हम प्रारंभिक चरण (1923-1947) कह सकते हैं। 1923 में भारत में पहली बार रेडियो क्लब ऑफ बॉम्बे ने रेडियो प्रसारण की शुरुआत की । इसके बाद,  1927 में भारत में  इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी की स्थापना की गई। 1930 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने रेडियो प्रसारण का महत्व समझकर इसकी जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली और फिर कुछ समय बाद 1936 में ऑल इंडिया रेडियो (AIR) की स्थापना की गई। 


रेडियो की विकास यात्रा के दूसरे दौर को हम स्वतंत्रता के बाद (1947-1970) का चरण कह सकते हैं । स्वतंत्रता के बाद, 1947 में आल इंडिया रेडियो के केवल छह स्टेशन और महज 11 प्रतिशत जनसंख्या तक पहुंच थी। लेकिन रेडियो के महत्व को देखते हुए सरकार ने इसका विस्तार राष्ट्रीय एकता, शिक्षा और जागरूकता फैलाने के लिए किया। अब आकाशवाणी ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ के मूल भाव के साथ देश भर में करीब 470 प्रसारण केंद्रों के जरिए देश के लगभग 92 फीसदी क्षेत्र और कुल आबादी के 99.19 प्रतिशत हिस्से में उपलब्ध है। यह 23 भाषाओं और 179 बोलियों में कार्यक्रम प्रसारित करता है।यह 27 भाषाओं में 100 देशों में अपने कार्यक्रम प्रसारित करता है।

जहां तक रेडियो इतिहास के दिलचस्प तथ्यों की बात है तो आल इंडिया रेडियो को 1956 में आकाशवाणी नाम मिला था। इसके बाद, 

1957 में फिल्मी संगीत के लिए लोकप्रिय विविध भारती सेवा की शुरुआत हुई जबकि 1993 में  इसने एफएम रेनबो के जाइए प्रसारण की नई शुरुआत की। आकाशवाणी ने विभिन्न राज्यों में भी अलग अलग भाषाओं में अपनी क्षेत्रीय सेवाएं शुरू की और जिसने कार्यक्रमों में विविधता और अनेकता में एकता का रंग भरा। 

रेडियो की विकास यात्रा के तीसरे चरण (1990-2000) में एफएम रेडियो का विस्तार हुआ। जिसने रेडियो प्रसारण के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। एफएम रेडियो का मुख्य आकर्षण इसके बेहतर ध्वनि गुणवत्ता और संगीत पर आधारित कार्यक्रम थे। इसके बाद 1997 में प्रसार भारती का गठन कर आकाशवाणी एवं दूरदर्शन की जिम्मेदारी इसे सौंप दी। रेडियो की विकास यात्रा का चौथा चरण (2000 से अब तक) को हम डिजिटल रेडियो और इंटरनेट का युग कह सकते हैं। इंटरनेट रेडियो और डिजिटल रेडियो प्रसारण की शुरुआत के बाद से रेडियो का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। इससे ऑनलाइन रेडियो और पॉडकास्टिंग का विस्तार हुआ, जिससे रेडियो श्रोताओं के लिए नई संभावनाओं के द्वार खुले।

मौजूदा वक्त में रेडियो को लोकप्रिय बनाने में ‘मन की बात’ कार्यक्रम का बहुत योगदान है। 2014 से शुरू हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के इस मासिक कार्यक्रम ने रेडियो को फिर से जन जन तक पहुंचा दिया है। ये कार्यक्रम हर महीने के आखिरी रविवार को आता है। अपनी तरह के अनूठे मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री श्री मोदी आम लोगों की कहानियाँ, प्रेरणादायक बातें, देश की प्रगति की जानकारी और अभिभावक की तरह निजी अनुभव पर आधारित सकारात्मक सलाह देते हैं। इस कार्यक्रम को गाँव से शहर तक करोड़ों लोग सुनते हैं।

आजकल भारत में रेडियो का स्वरूप पूरी तरह से बदल चुका है। अब यह न केवल सूचना और मनोरंजन का साधन है, बल्कि समाज के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी जानकारी देने और जागरूकता फैलाने का भी एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। आज के डिजिटल युग में रेडियो ने अपने पारंपरिक रूप में बदलाव किया है। तकनीकी बदलाव और इंटरनेट की उपलब्धता ने रेडियो के स्वरूप, प्रसारण विधि और श्रोताओं के साथ इसके संबंध को बदल दिया है। 

ऑनलाइन रेडियो और पॉडकास्ट के रूप में एक नई शुरुआत हुई है। लोग अब इंटरनेट के माध्यम से कहीं भी, कभी भी अपने पसंदीदा रेडियो चैनल्स को सुन सकते हैं। इस प्रकार, रेडियो अब सीमाओं से बाहर निकलकर विश्व भर में उपलब्ध हो गया है। आकाशवाणी का ‘न्यूज़ ऑन एआईआर’ एप भी बहुत लोकप्रिय है। इन दिनों पॉडकास्टिंग का भी जमकर विस्तार हुआ है। इसमें श्रोताओं को उनकी रुचि के अनुसार खास विषयों पर लाइव एवं रिकॉर्डेड शो उपलब्ध होते हैं, जिन्हें वे अपनी सुविधा से सुन सकते हैं। देश में इन दिनों स्पॉटीफाई, जिओ सावन, गाना, विंक म्यूजिक, एप्पल पॉडकास्ट्स, पॉकेट एफएम जैसे कई लोकप्रिय पॉडकास्ट प्लेटफार्म हैं। ऐप्स के साथ स्मार्ट स्पीकर्स (जैसे Alexa, Google Home) के जरिए भी रेडियो सुनना अब बहुत सरल हो गया है।  

अब रेडियो केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों और गांवों में भी कम्युनिटी (सामुदायिक) रेडियो स्टेशन का प्रचलन बढ़ा है। कम्युनिटी रेडियो का उद्देश्य स्थानीय विषय वस्तु, मुद्दों, संस्कृति, परंपराओं और घटनाओं पर आधारित कार्यक्रम प्रसारित करना है। सारेगामा कारवां जैसे रेडियो प्रयोगों ने भी इसकी लोकप्रियता बढाने का काम किया है। रेडियो की उपयोगिता बहुत व्यापक और महत्वपूर्ण है। यह केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज, शिक्षा, सूचना और जागरूकता फैलाने का प्रभावी माध्यम भी है। यह एक त्वरित और विश्वसनीय माध्यम है जिसके द्वारा समाचार और समसामयिक घटनाओं के बारे में तुरंत जानकारी प्राप्त होती है। यह विशेष रूप से प्राकृतिक आपदाओं, राष्ट्रीय संकटों और महत्वपूर्ण घटनाओं के समय में अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मामलों पर अद्यतन जानकारी प्रदान करता है।

रेडियो शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेषकर दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में जहां इंटरनेट और अन्य डिजिटल माध्यमों तक पहुंच नहीं होती, रेडियो शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है। कोविड महामारी के दौरान सामाजिक जागरूकता,शिक्षा और संवाद के लिए रेडियो एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ है।

कुल मिलाकर आधुनिक समय में रेडियो ने अपनी पारंपरिक सीमाओं को पार करते हुए डिजिटल, इंटरनेट, और स्मार्ट डिवाइस जैसे आधुनिक तकनीकी रूपों में ढाल लिया है। अब यह न केवल भरपूर मनोरंजन का स्रोत है, बल्कि सूचना, शिक्षा और जागरूकता फैलाने का एक अत्यधिक प्रभावी और सशक्त माध्यम बन चुका है। 

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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

सरला माहेश्वरी: समाचार प्रसारण के एक युग का अंत..!!


आज, 12 फरवरी 2026 को, भारतीय टेलीविजन इतिहास की एक चमकती हुई शख्सियत, दूरदर्शन की पूर्व समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी का निधन हो गया।  71 वर्ष की आयु में उनका यह अवसान न केवल मीडिया जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है, बल्कि उन लाखों दर्शकों के लिए भी है, जिनके घरों में उनकी शांत, मधुर और स्पष्ट आवाज़ ने समाचारों को विश्वसनीयता का पर्याय बना दिया था।

सरला माहेश्वरी, एक ऐसी महिला जो सादगी, संयम और सटीकता की मिसाल बनीं; जिन्होंने काले-सफेद टेलीविजन से रंगीन युग तक का सफर तय किया और समाचार प्रसारण को गरिमा प्रदान की। 

सरला माहेश्वरी  उस दौर की प्रतिनिधि थी जब महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और पेशेवर जीवन का संतुलन बनाना आसान नहीं था लेकिन सरला जी ने इसे न केवल संभाला, बल्कि एक मिसाल कायम की। उनकी सादगी और संयमपूर्ण व्यक्तित्व ने उन्हें हमेशा लोगों और अपनी जड़ों से जोड़े रखा ।

दूरदर्शन में उनकी शुरुआत बच्चों के कार्यक्रमों से हुई लेकिन जल्दी ही वे समाचार वाचिका बनकर उस स्थान पर आ गई जो शायद उन्हीं के लिए बना था। यह वह समय था जब भारत का टेलीविजन काले-सफेद से रंगीन युग में प्रवेश कर रहा था। सरला जी ने उस समय के कई अहम घटनाक्रम को अपनी आवाज और अंदाज से स्थायी स्मृतियों में बदल दिया।

सरला माहेश्वरी होने का मतलब था—स्पष्ट हिंदी उच्चारण, शांत मुस्कान और दर्शकों में विश्वास जगाना। वे न केवल समाचार पढ़ती थीं, बल्कि एक युग की सांस्कृतिक पहचान बनीं। आज के चीखते चिल्लाते मीडिया के लिए उनकी संयमपूर्ण शैली एक सबक है। 

सरला माहेश्वरी की यादें अब डिजिटल आर्काइव्स में जीवित रहेंगी, लेकिन उनकी आवाज़ का खालीपन हमेशा महसूस होगा। 

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें…विनम्र श्रद्धांजलि 🙏💐 


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बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

वाघा बार्डर से आंखों देखी:राष्ट्र गौरव की अमिट अभिव्यक्ति

 


ठंड की शामें उत्तर भारत में एक अनोखी रंगत भरी होती हैं। सूरज ढलते-ढलते आकाश में गुलाबी केसरिया आभा बिखेरता है, ठंडी हवाएँ हल्की सी कंपकंपी पैदा करती हैं और दूर से आती धुंध की चादर वातावरण को अपने आगोश में समेट लेती है। ऐसे में पाकिस्तान के लाहौर से महज 20 किमी और पंजाब के अमृतसर से 30 किलोमीटर दूर अटारी-वाघा बॉर्डर पर बीटिंग रिट्रीट समारोह देखना ठंड में भी गर्माहट ला देता है क्योंकि यहां प्रकृति की सर्दी देशभक्ति की गर्मी से टकराती है। 

शाम के करीब साढ़े चार बज रहे हैं। ठंड से बचने के लिए हम भी सपरिवार शॉल, स्वेटर और जैकेट जैसे सुरक्षा कवच के साथ स्टेडियम में सबसे सामने वीआईपी सीट पर अपनी जगह ले लेते हैं। वैसे, यहां लोगों के आने का सिलसिला करीब तीन बजे से शुरू हो गया था और दर्शक दीर्घा धीरे धीरे भरने लगी है। स्टेडियम के बाहर तिरंगा ध्वज से लेकर तिरंगा कैप बेचने  एवं चेहरे पर राष्ट्रीय ध्वज की छाप छोड़ने वाले कलाकार मौजूद हैं। उनके लिए भी क्रिकेट मैच की तरह यही कमाई का अवसर है। 

उधर, दर्शकों की भीड़ में बच्चे, बुजुर्ग, देशी विदेशी पर्यटक…सभी हैं और सबके चेहरे पर ग़ज़ब का जोश है । झुंड के झुंड आ रहे हैं और ‘कोई सिख, कोई जाट-मराठा, कोई गुरखा, कोई मद्रासी..’ गीत की तर्ज़ पर स्टेडियम की रौनक का हिस्सा बन रहे हैं। हवा में जरूर ठंडक है, लेकिन जोश इतना कि किसी को कोई शिकायत नहीं है। अटारी बाघा बॉर्डर पर भारत की साइड राष्ट्रभक्ति से भरपूर गाने लोगों के उत्साह को दोगुना कर रहे हैं जबकि पाकिस्तान साइड टीवी पर आतिफ असलम गुनगुना रहे हैं। भारतीय पवेलियन खचाखच भर गए हैं जबकि पाकिस्तान साइड में अब तक भारत की तुलना में मुट्ठी भर दर्शक ही हैं जबकि बाघा बार्डर अमृतसर की तुलना में लाहौर से ज्यादा पास है।


हमारी गैलरी में तैनात सुरक्षा कर्मी की सलाह पर हमने कार्यक्रम शुरू होने से पहले भारत-पाकिस्तान के मेन गेट, सीमा निर्धारित करने वाले पिलर,स्टेडियम सहित भीड़ के साथ भी फोटोग्राफी का अपना कोटा पूरा कर लिया। इसी बीच, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की अनुमति से महिलाओं की एक बड़ी टोली ने तिरंगा लेकर राष्ट्रभक्ति से सराबोर गीतों पर करीब पौन घंटे के धूमधड़ाके भरे नृत्य से माहौल में देशप्रेम घोल दिया है। 


स्टेडियम में भारतीय साइड महात्मा गांधी की आकर्षक विशाल तस्वीर है जबकि पाकिस्तान में स्क्रीन पर केवल कार्यक्रम के दौरान ही जिन्ना की फोटो दिखाई दी। स्टेडियम में रह रहकर वंदे मातरम और हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे गूंजने लगे हैं। अब शुरू हो रहा है मुख्य समारोह। भारत के ऊंचे पूरे स्मार्ट बीएसएफ जवान अपनी आकर्षक लाल पगड़ी और खाकी वर्दी में बेहतरीन मार्च पास्ट का प्रदर्शन कर रहे हैं। उनके पैर इतने ऊँचे जाते हैं कि लगता है आसमान छू लेंगे और हर कदम पर दर्शकों की ज़ोरदार तालियाँ उनके उत्साह को और बढ़ा रही हैं।

जवानों के साथ सरप्राइज़ पैकेज के तौर पर बीएसएफ की महिला वॉरियर्स भी राइफलों को अंगुलियों पर नचाती हुई उपस्थित दर्शकों को हैरान कर देती हैं। महिला वॉरियर्स के करतब इस परेड में चार चांद लगा देते हैं। भारत की ओर से बीएसएस के जवान जैसे ही कदम बढ़ाते हैं, मैदान में एक नई ऊर्जा और उत्तेजना फैल जाती है। इसके फलस्वरूप जवानों की चाल, तेज़ एवं लयबद्धता और दमदार दिखाई देने लगती है। जवानों की ऊँची उठती टाँगें, एड़ी की कड़क आवाज और हवा में लहराते मजबूत हाथ, हमें हर क्षण आश्वस्त करते हैं कि देश सुरक्षित हाथों में है।

दूसरी ओर पाकिस्तानी रेंजर्स भी उसी तीव्र, आक्रामक और नाटकीय अंदाज़ में प्रदर्शन कर रहे हैं। दोनों ओर की मुद्राएं पूरे माहौल को चुनौती और जोश से भर देती हैं। इस परेड की खासियत यह है भारत और पाकिस्तानी दोनों ही साइड मिनट टू मिनट एक सी गतिविधियां होती हैं बिल्कुल ‘मिरर इमेज़’ की तरह…इसलिए पाकिस्तानी रेंजर्स भी अपनी काली वर्दी में वैसा ही जोश भरा प्रदर्शन कर रहे हैं। दोनों तरफ़ से प्रतिद्वंद्विता के साथ अनुशासन और समन्वय का अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। पहले दोनों देश अपने अपने गेट भी खोलते थे लेकिन आजकल द्वार बंद रहते हैं और दोनों पक्ष गेट के आरपार ही अपना जोश एवं जलवा बिखेरते हैं।


अब बारी है सबसे प्रतीक्षित पल की…जब दोनों ओर के जवान गेट के ठीक सामने एक साथ पहुँचते हैं। हल्की ठंड में जोशीली सांसें भाप बनकर ऊपर उठती हैं और हवा में घुल मिलकर इंसानियत और परस्पर भाईचारे का संदेश देती हैं। अब दोनों देशों के झंडे बिल्कुल तालमेल के साथ नीचे उतर रहे हैं…न बहुत तेज़, न बहुत धीमे—बस,नियंत्रित  गति से परस्पर दूरी एवं परंपरा का सम्मान करते हुए। यह दृश्य ऐसे लगता है जैसे दोनों देशों के राष्ट्रीय ध्वज हाथ में हाथ डालकर शांति की पहल करते हुए अपने अपने अवाम का सिर गर्व से ऊंचा कर रहे हैं। जैसे ही झंडे समारोहिक अंदाज में मोड़कर रखे जाते हैं, उनके सम्मान में दर्शकों की तालियाँ गूँज उठती हैं। रोशनी, संगीत, नारे सब मिलकर इसे जोश और राष्ट्रीय गर्व से भरा अनुभव बना देते हैं। 

यह समारोह सिर्फ़ एक सैन्य परेड नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और पड़ोसी के साथ जटिल रिश्ते की अनूठी अभिव्यक्ति है। वाघा बॉर्डर का यह नजारा देखकर मन जोश से भर जाता है। यहाँ आकर लगता है कि सीमाएँ भले विभाजित करें, लेकिन राष्ट्र के प्रति प्रेम, जोश और अनुशासन दोनों देशों को जोड़ते हैं। अगर आप अमृतसर जाएँ, तो इस समारोह को ज़रूर देखें, यह अनुभव जीवन भर याद रहेगा। वाघा बॉर्डर का यह दृश्य न सिर्फ दिल-ओ-दिमाग़ पर अमिट छाप छोड़कर स्थायी यादगार बन जाता है बल्कि ऐसा लगता है जैसे सीमा खुद जीवंत होकर एक कहानी सुना रही है—वीरता, सम्मान और राष्ट्रगौरव की।

#India #Pakistam #WaghaBorder #NationalFlag #BSF #Lahore #Amritsar #BeatingRetreet

रविवार, 8 फ़रवरी 2026

हिमाचल में गंगा.. है न वाकई चमत्कार..!!

 

कल्पना कीजिए, जब चारों तरफ चमकती धूप खिली हो लेकिन इसके बाद भी एक स्थान ऐसा हो जहां पूरा पानी कांच की तरह मोटी परत में जमा हो.. पत्थर का बना फर्श इतना ठंडा हो कि पैर जम जाए, लेकिन हवा इतनी शुद्ध एवं साफ की अंतर्मन तक महसूस हो.. अकल्पनीय लगता है न..लेकिन यह हकीकत है और वह भी क्वीन ऑफ हिल्स शिमला से तकरीबन सौ सवा सौ किलोमीटर दूर। 

यहां तक पहुंचने का रास्ता भी इतना मनमोहक और रोमांचक है कि आप देश के तमाम दुर्गम सफर को भूल जाएंगे। एक तरफ पहाड़ की चोटियों से ऊंचाई में मुकाबला करता चीड़ देवदार का घना जंगल है तो ऊंचाई से विपरीत दिशा में प्रतिस्पर्धा करतीं गहरी खाई और बीच बीच में आवाजाही करते सियार एवं उनके जंगली दोस्त भी। हम भी वापसी में सियार के जोड़े से रूबरू हुए और वह भी इतने दमदार जोड़े से जो बिना डरे आंखों में आंखें डालकर देख रहे थे।

हम बात कर रहे हैं गिरी गंगा की.. हरिद्वार की तरह मां गंगा का एक पवित्र स्थान। शिमला जिले के कड़ापत्थर एरिया के पास स्थित यह स्थान अभी तक पर्यटकों की भीड़, वाहनों की चिल्लपों और शोरगुल से बचा हुआ है। हर तरफ सुकून बिखरा है और चारों ओर बिखरी है बर्फ। कहीं पारदर्शी चमकदार फर्श की तरह तो कहीं टुकड़ों में जमकर नदी के प्रवाह को रोकती हुई।

ज़ाहिर सी बात है कि अब आप के मन में सवाल आएगा कि कहां ऋषिकेश हरिद्वार और कहां ऊंचे पहाड़ों पर बसा शिमला..वहां तक गंगा मैया कैसे पहुंच गई? तो इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कहानी है। बताया जाता है कि एक पुराने ऋषि हिमाचल प्रदेश में एक ऐसी जगह बनाना चाहते थे, जिसमें काशी जैसी ही शक्ति और ऊर्जा हो। इसके लिए, उन्होंने हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के निर्मंड गांव को चुना। इसके साथ ही, वह और उनके साथ कुछ साधु हरिद्वार से अपने कमंडल में पवित्र गंगा जल ले जा रहे थे। वे शिमला में पुरानी नागन घाटी से होते हुए आगे बढ़ रहे थे। 

यह रास्ता हिमाचल प्रदेश के सबसे घने जंगलों में से एक है। इसी रास्ते में पड़ने वाले कुप्पर बुग्याल में ऋषियों ने आराम करने का फैसला किया। यह एक सुंदर मैदान होने के साथ-साथ एक चोटी भी है।

इस दौरान, वे जो गंगा जल लाए थे, वह गलती से ज़मीन पर गिर गया। उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा "गिरी गंगा" जिसका मतलब है गंगा गिर गई।  कमंडल गिरने से पानी की एक धारा बन गई और इसलिए इसे गिरी गंगा नदी कहा गया। बाद में, यहां एक मंदिर बनाया गया। कुछ संदर्भों में ऋषि का नाम जाह्नू ऋषि भी पढ़ने को मिलता है। हालांकि, उनके नाम की पुष्टि बड़े पैमाने पर नहीं हो पाई। 

इस घटना के बाद, गिरी गंगा को एक बहुत ही पवित्र और ऊर्जा से भरपूर जगह माना जाने लगा। स्थानीय देवता अपने अनुयायियों के साथ इस जगह पर आने लगे और धीरे-धीरे यह जगह लोकप्रिय हो गई। यहां मां दुर्गा और भगवान शंकर के मंदिर हैं। शिव मंदिर देखने में केदारनाथ मंदिर के छोटे प्रतिरूप की झलक देता है।

मंदिर के चारों ओर पानी का एक कुंड भी है जिसका पानी ठंड में आमतौर पर जमा रहता है। पास से गिरी गंगा की धारा बहती नजर आती है । गिरीगंगा मंदिर के बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का मानना है कि यह 13वीं सदी में बनाया गया था। हमारे लिए यह जानना बहुत दिलचस्प है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि उस समय आस-पास कोई सभ्यता नहीं थी।  गिरि गंगा मंदिर की आकर्षक वास्तुकला देखकर वाकई लगता है कि इस मंदिर को किसने और कैसे बनाया होगा । 

इस बारे में यहां प्रचलित कहानियों के अनुसार, यह पवित्र स्थान पांडवों ने बनवाया था। ऐसा माना जाता है कि पांडव अपने वनवास के दौरान इस जगह पर रहे थे। इस दौरान, उन्होंने गिरि गंगा में यह स्थान बनाया और यहाँ पूजा भी की। यह जगह उनके छिपने के लिए सबसे सुरक्षित थी क्योंकि जब तक आप खुद यहाँ नहीं पहुँचते, तब तक यह जगह कहीं से भी दिखाई नहीं देती। अभी भी यहां बस एक काम चलाऊ धर्मशाला है। हाल ही में सड़क जरूर जबरदस्त बन गई है इसलिए गाड़ियां की संख्या बढ़ने लगी है जबकि पहले यहां जाना बहुत ही दुष्कर था।

बताया जाता है कि गिरिगंगा और कुप्पर इलाका गद्दी और गुर्जर जनजातियों का रास्ता है। ये जनजातियाँ अपने मवेशियों और भेड़ों को चराने के लिए इस पुराने रास्ते का इस्तेमाल करती हैं। यह भी पढ़ने को मिलता है कि यह पुराना रास्ता उत्तराखंड में यमुनोत्री तक भी जाता है। आगे यह बद्रीनाथ और केदारनाथ तक जाता है इसलिए पुराने समय में गिरी गंगा भक्तों के बीच एक लोकप्रिय पड़ाव था। 

हिमाचल प्रदेश देवी देवताओं से जुड़ी आस्था, विश्वास, कथा, कहानियों, किस्से और किवदंतियों की भूमि है। विश्वास करेंगे तो चमत्कारों से भी रूबरू होंगे और यदि नहीं करेंगे तो बस तर्क तलाशते रह जाएंगे। खैर, गिरी गंगा ट्रैकिंग के शौकीन लोगों का स्वर्ग है। कड़ा पत्थर तक राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ा यह क्षेत्र गिरी रिजर्व फारेस्ट के अंतर्गत आता है एवं वृक्षों का घना जंगल है। यहां शीर्ष यानि कुप्पर बुग्याल पर पहुंचकर आप पीर पंजाल से लेकर पब्बर घाटी तक का विहंगम दृश्य देख सकते हैं इसलिए इसे बर्फीले ट्रैकिंग के बेहतरीन स्थानों में भी गिना जाता है।






#Himachal #Ganga #Shimla #GiriGanga #गंगा









गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

सफेद बर्फ, काली बर्फ़..में छिपी हमारी कहानी!!

ये न तो आपके हमारे घर के पुराने गद्दों की मैली हो चुकी रुई है और न ही सर्फ या साबुन का झाग..इन दिनों शिमला जैसे तमाम पर्वतीय इलाकों में ये नजारा आम है। ये बर्फ़ है, वही बर्फ जिसको देखने के लिए हजारों लाखों लोग पहाड़ों पर जमा होते हैं। पहाड़ों पर जब पहली बार बर्फ गिरती है, तो सब कुछ कितना सुंदर लगता है न...श्वेत चादर ओढ़े खड़े पहाड़, बिल्कुल निर्मल, चमकदार, किसी संत की तरह। लेकिन धीरे-धीरे... हवा में उड़ती धूल, धुआँ, ट्रकों की कालिख, और हमारी अपनी जिंदगी की भागदौड़—सब मिलकर उस सफेद बर्फ़ पर कालिख की परत चढ़ा देते हैं। इसके फलस्वरूप खूबसूरत सफेद बर्फ अब काली होकर बदसूरत दिखने लगती है.. गंदी और नकारात्मकता से भरपूर उदास सी। हम इसे ‘काली बर्फ़’ कह सकते हैं। वैसे पहाड़ों पर काली बर्फ़ के अंग्रेजी नाम ब्लैक आइस का अलग ही खौफ है।यह बर्फ इतनी पारदर्शी होती है कि काली सड़क पर बिल्कुल घुल मिल जाती है और इस पर चलना लगभग नामुमकिन होता है। इस पर लोग सटासट फिसलते हैं, बिल्कुल बच्चों वाली फिसल पट्टी की तरह। अनजाने में कई लोग अपनी कमर,हाथ पैर तक तुड़वा लेते हैं।

अब बात पुनः काली गंदी बर्फ की, वैसे देखा जाए तो ये सिर्फ पहाड़ों पर फैली बर्फ भर की कहानी नहीं है बल्कि ये हमारी अपनी कहानी भी है। हमारा बचपन भी तो ऐसा ही रहता है झक सफेद बर्फ की तरह बिल्कुल साफ दिल, हँसता- खिलखिलाता, बिना वजह रोता और फिर हंसता सा। कोई बैर नहीं, किसी से कोई ईर्ष्या नहीं, कोई लालच नहीं। बस, मासूमियत के साथ जीते हैं खुशमिजाजी से, खुशी से और सरलता से। समय के साथ हम बड़े होते जाते हैं..कद से,दिमाग से और हावभाव से। 

फिर दुनिया हमें सिखाना शुरू करती है जैसे परीक्षा में अच्छे नंबर लाओ, अच्छी एवं भरपूर ऊपरी कमाई वाली नौकरी करो, बड़ा सा घर लो, बड़ी वाली कार वरना लोग क्या कहेंगे... और ‘लोग क्या कहेंगे’ के पीछे भागते हुए हमारे सहज, श्वेत और सरल मन पर धीरे-धीरे जलन/तुलनाओं/ विरोधाभास की धूल जमने लगती है । फिर हम छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगते हैं, अपने ही साथियों की तरक्की देखकर ईर्ष्या करने लगते हैं, झूठ बोलकर, बहाने बनाकर, लापरवाही से काम करने लगते हैं..फिर तो रातों को नींद  हराम होना ही है। मन सवालों और अफसोस के बीच भटकने लगता है। हमारे व्यक्तित्व की सफेद बर्फ धीरे धीरे काली पड़ने लगती है बिल्कुल पहाड़ों की काली बर्फ़ की तरह.. जो फिसलन, भटकाव, अलगाव और जीवन की तमाम बुराइयां लाती है। 

लेकिन, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है दोस्तों…क्योंकि बर्फ पिघलकर पहले पानी बनती है और फिर भाप एवं कुछ दिन में नई सफेद, निर्मल,धवल और चमकदार बर्फ बनकर फिर खूबसूरती बिखेरने लगती है। हम भी चाहे तो समय के साथ अपने मन की कालिख धो सकते हैं और फिर से बर्फ़ की तरह अपने मन को निर्मल और सरल बना सकते हैं। इसके लिए ज्यादा मशक्कत भी नहीं करना है, बस छोटे छोटे प्रयास करने हैं जैसे कभी-कभी किसी की बात पर पलटकर जवाब न देकर चुप रह जाना, पुरानी बातों को छोड़ देना, किसी से माफी माँग लेना तो किसी को माफ कर देना और सारे गिले शिकवे भुलाकर अपनी शुरुआती सहजता पुनः हासिल कर लेना..कितना आसान है। 


पहाड़ों की बर्फ़ भी शायद जीवन की यही सीख देती है कि सफेद यानि बेदाग रहना आसान नहीं होता और खासतौर पर गिरकर साफ रहना तो और भी मुश्किल होता है। स्वयं को दुनियादारी की फिसलन से बचाने एवं अपने उजलेपन को बनाए रखने के लिए सच्चाई और मन का साफ होना जरूरी है। मन साफ है तो दुनिया भी सुंदर लगेगी । फिर मन के शिखर भी पहले जैसे चमकने लगेंगे..बिल्कुल बर्फ़ से ढके पहाड़ों की तरह। 


इसलिए, अब कभी पहाड़ों पर बर्फबारी देखने जाएं तो यह अवश्य याद रखें कि हमारे अंतर्मन भी बर्फ सा शांत, उजला, नरम और स्वच्छ है। यदि स्वभाव की यह खासियत खो गई है तो उसे फिर से जगाना जरूरी है एवं यदि अब तक कायम है तो उसे सहेजकर रखना भी उतना ही आवश्यक है। पहाड़ों की बर्फ़ बार बार गिरकर हमें शायद यही संदेश देती है कि हम कितने खूबसूरत थे/हैं/ और हो सकते हैं…बस, थोड़ा सा धीरज, सहजता, अपनापन और ईमानदारी चाहिए ।


सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...