शनिवार, 28 मार्च 2026

शेखचिल्ली: हास्य कथाओं का नायक या आध्यात्मिक गुरु..!!


…जैसे ही कोई हमारे बीच लंबी चौड़ी हांकने की कोशिश करता है, तो हम तुरंत कह देते हैं न कि शेख चिल्ली मत बनो। आमतौर, शेख चिल्ली की छवि एक मजाकिया, भोले भाले, अनपढ़ और ख्यालीपुलाव पकाने वाले किरदार की है। शेखचिल्ली पर केंद्रित न जाने कितनी ऐसी कहानियां और मुहावरे प्रचलित हैं जिनमें उसे बढ़ चढ़कर सोचने वाला या ख्यालीपुलाव पकाने वाला बताया गया है।

एक कहानी में शेख चिल्ली को उसकी माँ दही बेचने बाज़ार भेजती है। रास्ते में दही का कटोरा सिर पर रखे चलते हुए वह सोचता है कि दही बिकेगा तो पैसे आएँगे, इन पैसों से मैं पहले बकरियाँ खरीदूँगा, फिर बकरियाँ बच्चे देंगी, बकरी का दूध बेचकर भेड़ खरीद लूंगा और फिर ऊन बेचूँगा। जब ज्यादा पैसा जमा हो जाएगा तो घोड़ा खरीद लूंगा और फिर घोड़े पर सवार होकर निकलूँगा तो राजकुमारी मुझ पर फिदा हो जाएगी और फिर हमारी शादी हो जाएगी। शादी के बाद बच्चे होंगे लेकिन यदि बच्चे शैतानी करेंगे तो मैं डाँटूँगा भी और मारूंगा भी... बस, फिर क्या था सोचते हुए शेखचिल्ली बच्चों को मारने लगता है और कटोरा गिर जाता है और सारा दही फैल जाता है । खाली हाथ घर लौटने पर माँ पूछती है कि दही कहाँ है? तो शेख चिल्ली जवाब देता है कि माँ, मेरे बच्चे शैतानी कर रहे थे एवं मैं उन्हें डाँट रहा था..।


इसी तरह, एक और कहानी आपने भी सुनी होगी कि एक बार किसी ने शेख चिल्ली को सलाह दी कि अमीर बनना है तो कोई व्यापार करो । सलाह मानकर शेख चिल्ली अपनी जमापूंजी से एक टोकरा अंडे लेकर बाजार चल पड़ता है। आदत के मुताबिक वह रास्ते में सोचने लगता है कि अंडे बेचूँगा और फिर मिले पैसों से मुर्गियाँ खरीदूँगा। मुर्गियाँ अंडे देंगी तो फिर और मुर्गियाँ खरीद लूंगा। लेकिन, मुर्गियां दड़बों से निकलकर भागने लगी तो मुझे ही पकड़ना पड़ेगा। वह अपनी कल्पना में इतना खोया रहता है कि ख्याली मुर्गियों को पकड़ने के लिए टोकरा सिर से नीचे पटक देता है और सारे अंडे टूट गए। पास से गुजर रहे लोग चिंता करते हुए कहते हैं कि शेख साहब, आपके सारे अंडे टूट गए तो शेख चिल्ली उत्तर देता है कि अरे कोई बात नहीं, मुर्गियाँ तो बच गईं न। 


शेखचिल्ली को लेकर ऐसे ही कई किस्से कहानियां जन मानस में प्रचलित हैं लेकिन हम आज एक और शेख चिल्ली की बात कर रहे हैं। जो स्वभाव में इस शेखचिल्ली से अलग हैं। क्या आप जानते हैं कि इसी नाम के एक सूफी संत भी हुए हैं और उनके मकबरे को आज ‘कुरुक्षेत्र के ताजमहल’ के रूप जाना जाता है। अब इन दोनों शेख चिल्ली के बीच कोई संबंध है या ये दोनों एक ही व्यक्ति हैं या अलग अलग...यह शोध का विषय हो सकता है। वैसे इनके बीच अंतर्संबंध तलाशने की जुगत में हमने गूगल गुरु और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भी मदद ली लेकिन वे भी कोई सीधा या कोई सॉलिड संबंध नहीं तलाश पाए । 


वैसे, स्थानीय तौर पर इन दोनों की कहानियां कहीं कहीं परस्पर जुड़ती और कहीं अलग नज़र आती हैं। जहां तक, सूफी संत शेख चिल्ली की बात है तो उनके बारे में जरूर कुछ आधिकारिक जानकारी मिलती है और वह भी सीधे भारतीय पुरातत्व विभाग से। कुरुक्षेत्र के थानेश्वर में सूफी संत शेख चिल्ली के मकबरे में लगे बोर्ड में बताया गया है कि यह सुन्दर मकबरा सूफी सन्त अब्द-उर-रहीम उर्फ अब्द-उर-करीम से सम्बन्धित है। जिन्हें शेख चिल्ली के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये मुगल शहजादे दारा शिकोह (1650 ईस्वी) के धार्मिक गुरु थे। 


आपको यह भी बता दें कि थानेसर वही स्थान है जहां महाभारत का युद्ध हुआ था। दरअसल, इसी शेखचिल्ली के मकबरे के परिसर में पुरातत्व संग्रहालय है और यहां दर्ज आधिकारिक जानकारी के मुताबिक: पौराणिक मान्यता के अनुसार यह क्षेत्र महाभारत युद्ध का प्रमुख स्थल है । थानेसर (प्राचीन स्थाणेश्वर) एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक नगर है, जो वर्धन या पुष्यभूति वंश के प्रमुख राजा हर्षवर्धन के राज्य की राजधानी थी, जिसने उत्तर भारत के अधिकांश भू-भाग पर 606-647 ईस्वी सदी के मध्य शासन किया था । संस्कृत कवि बाणभट्ट ने अपने ग्रन्थ "हर्षचरित" में हर्षवर्धन एवं उसके थानेसर के साथ सम्बन्धों पर विस्तारपूर्वक विवरण दिया है। सन् 634 ई. में चीनी यात्री हेनसांग ने भी थानेसर की यात्रा की । उसने यहाँ अनेक हिन्दू मंदिरों तथा कई बौद्ध विहारों को देखा था । थानेसर एवं कुरूक्षेत्र का वर्णन अल्बरुनी द्वारा रचित "किताब- उल-हिन्द" में भी मिलता है जो कि गजनी के सुल्तान महमूद के साथ भारत आया था और जिसने अक्तूबर 1014 ईस्वी में थानेसर पर आक्रमण किया। यहीं पर सन् 1759 ईस्वी में मराठा सैनिकों ने अफगानों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया।

एक अष्टभुजी चबूतरे पर निर्मित यह मकबरा हल्के पीले बलुवे प्रस्तर से निर्मित है। जिसका प्रवेश दक्षिण की ओर से है तथा इसका नाशपातीनुमा गुम्बद सफेद संगमरमर से बना है। मकबरे के प्रत्येक प्रवेश द्वार में मेहराब बने हैं जो संगमरमर की जालियों से सुसज्जित हैं। छत के चारों दिशाओं में बाहर की ओर छतरियां बनी हैं जिनके गुम्बद पर हरे, नीले पीले एवं जामुनी रंग की चमकदार टाइल्स से निर्मित विभिन्न प्रकार की ज्यामितिय आकृतियां देखी जा सकती हैं।

सन्त शेखचिल्ली की समाधि भी अष्टभुजी कक्ष के मध्य निर्मित है, जबकि वास्तविक कब्र उसके ठीक नीचे के कक्ष में बनी है जिसका प्रवेश द्वार मदरसे के एक संकरे गलियारे से हो कर जाता है। छत के पश्चिमी भाग में बलुवा प्रस्तर से निर्मित एक अन्य मकबरा है जिसका बेलनाकार गुम्बद सफेद संगमरमर से सजा हुआ है। इसे शेख की पत्नी से सम्बन्धित माना जाता है। भू-सतह में मदरसे के प्रत्येक और नौ-नौ मेहराब बने हैं तथा दालान के मध्य एक वर्गाकार जलाशय निर्मित हैं। 


मदरसे के बाहरी और दक्षिण-पश्चिम किनारे पर लाल बलुआ प्रस्तर से निर्मित 'पत्थर मस्जिद' हैं जिसकी छत चार अलंकृत स्तम्भों तथा छह अर्ध-स्तम्भों पर टिका है । वास्तु शिल्पीय विशेषताओं के आधार पर इस पत्थर मस्जिद को पूर्व तुगलक काल से सम्बन्धित माना गया है। ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह स्मारक भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। वैसे, सूफी संत शेख चिल्ली के बारे  कहीं यह भी पढ़ने को मिला कि वे शायद बलूचिस्तान से भारत आए थे। 

खैर, शेख चिल्ली की हकीकत जो भी हो लेकिन मौजूदा सच्चाई यह है कि उनका मकबरा हरियाणा के कुरुक्षेत्र के थानेश्वर इलाके में है और यह मुगलकालीन वास्तुकला का नमूना है। इसे देखने के लिए भारतीय पर्यटकों को 20 रुपए और विदेशी नागरिकों को 250 रुपए प्रवेश शुल्क देना पड़ता है। बहरहाल, हो सकता है कि दोनों शेख चिल्ली एक ही हों लेकिन उनके विविध व्यक्तित्व उन्हें अलग अलग व्यक्ति बनाते हैं जैसे एक हंसोड़, मजाकिया और हास्य कथाओं का नायक है जबकि दूसरे आध्यात्मिक गुरु।

रविवार, 22 मार्च 2026

सेल्यूलर जेल: खूबसूरत भवन की निर्मम और दर्दनाक दास्तां..!!


विशाल फूल की सात आकर्षक पंखुड़ियां कहो या घड़ी के कांटे या साइकिल के पहिए की तर्ज पर सीधी और चक्र की भांति घूमती हुई सात कतारों से बनी इमारत.. जो वास्तुकला का उत्कृष्ट एवं बेजोड़ नमूना है। न उस समय देश में इतनी आकर्षक कोई इमारत थी और न ही आज है। यह इमारत कुछ इस तरह बनी है कि यहां कभी रहने वाले छह सौ से ज्यादा लोग एक दूसरे से बात करना तो दूर परस्पर देख भी नहीं सकते थे। वे, बस अपने मन की आंखों से यह महसूस कर सकते थे कि उनके आसपास भी उनके ही जैसे लोग मौजूद हैं। लेकिन इन सैकड़ों लोगों पर नज़र रखने के लिए महज एक ही पहरेदार की जरूरत पड़ती थी और वह इमारत के बीचों बीच बैठकर सातों विंग की बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के निगरानी रखता था। 


कभी इस इमारत की खूबसूरती बढ़ाने वाली लाल ईंटे आज रक्त रंजित दिखाई पड़ती हैं। ऐसा लगता है जैसे खून से रंगी ये दीवारें चीख चीखकर निर्मम यातना के पीड़ादायक किस्से सुना रहीं हैं और इस इमारत के परिसर में मौजूद पीपल का वृक्ष इन भयावह किस्सों की गवाही दे रहा है। हम बात कर रहे हैं अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर (अब श्री विजयपुरम) में स्थित सेल्यूलर जेल की..जिसे आमतौर पर आज भी ‘काला पानी’ के रूप में जाना जाता है। 


शानदार वास्तुकला वाली सेल्यूलर जेल का निर्माण 1896 से 1906 के बीच कराया गया था। जेल के निर्माण में मुख्य रूप से कैदियों को ही मजदूर बनाकर शोषण किया गया था। इसके निर्माण के लिए ईंटें बर्मा (अब म्यांमार) से और लोहे का सामान ब्रिटेन से मंगाया गया था। बताया जाता है कि उस समय इस जेल को बनाने में 5 लाख 17 हजार 352 रुपये का खर्च आया था। इस जेल की कुल सात विंग में प्रत्येक में तीन मंज़िलें थीं और कुल मिलाकर 693 काल कोठरियाँ थीं। हर कोठरी का आकार एक समान था और उसमें हवा और प्रकाश के लिए केवल एक छोटी सी खिड़की थी। इन कोठरियों को इस प्रकार बनाया गया था कि एक कैदी दूसरे कैदी को देख या सुन न सके और न ही बाहर का कोई दृश्य उन्हें दिखाई दे..वे बस जेल की दीवारों के बीच घुटते रहे । जेल की इस संरचना का उद्देश्य कैदियों को मानसिक रूप से तोड़ना था।

सेल्यूलर जेल के नाम को लेकर विभिन्न स्त्रोत एवं स्थानीय गाइड अलग-अलग कहानियां बताते हैं। सबसे पुख्ता कहानी यह है कि जेल एक ही आकार प्रकार के अलग अलग सेल (छोटे कमरों) से मिलकर बनी है इसलिए इसे सेल्यूलर जेल नाम मिला। इसी तरह, बताते हैं कि काला पानी वास्तव में पहले ‘काल पानी’ कहा जाता था मतलब ऐसा पानी जहां काल (मृत्यु) तय है लेकिन समय के साथ यह बदलकर काला पानी हो गया। यह बात इसलिए भी सही लगती है क्योंकि अंडमान के चारों ओर फैला समंदर खूबसूरत नीली-हरी आभा लिए है। यदि समंदर के रंग से नाम रखा जाता तो इसका नाम नीला पानी/हरा पानी जैसा कुछ होता, इसलिए काल पानी वाली बात ज्यादा सही लगती है।



जब, हम सेल्यूलर जेल के मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करते हैं तो यह महज दर्शनीय स्थल की यात्रा नहीं होती बल्कि सैकड़ों दर्द भरी आंखों, हजारों तड़पते परिवारों, इंसानी चीखों, ज़ुल्म की इंतहा तथा अंग्रेजों की खौफनाक सजा से रूबरू होने की यात्रा है…और इतने ज़ुल्म-ओ-सितम के बाद भी मातृभूमि की आजादी के लिए मर मिटने वालों के जज्बे से साक्षात्कार करने का अवसर है। कभी स्वतंत्रता सेनानियों की तड़प एवं वंदे मातरम् जैसे नारों से दहल जाने वाली यहां की दीवारें अब मौन रहकर भी हकीकत बयां करती हैं। अब यह आप पर है कि आप उनसे रिसते दर्द को कितना महसूस कर पाते हैं।


यह केवल एक जेल नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की वह कठोर दंड व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य भारतीय क्रांतिकारियों के मनोबल को तोड़ना था। शायद, अंग्रेजों को भी यह अंदेशा नहीं था कि यह जेल आगे चलकर स्वतंत्रता के संघर्ष का प्रतीक बन जाएगी एवं भविष्य में राष्ट्रीय स्मारक। दस्तावेजों के मुताबिक इस जेल के पोर्ट ब्लेयर में निर्माण का आधिकारिक आदेश 13 सितंबर 1893 को जारी किया गया था। 

इस निर्णय के पीछे ब्रिटिश हुकूमत का मकसद ही यही था कि भारत से बाहर तथा समुद्र से चारों ओर घिरे इन द्वीपों से भागना असंभव था और एकाकीपन के कारण क्रांतिकारियों एवं राजनीतिक बंदियों को भावनात्मक रूप से तोड़ना आसान था लेकिन गोरी सरकार का यह दांव उल्टा पड़ गया। सेल्यूलर जेल स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों का तीर्थ बन गई। इस जेल में भारत के अनेक महान क्रांतिकारियों और राजनीतिक बंदियों को सजा के लिए लाया गया एवं उन्हें अत्यंत अमानवीय यातनाएँ दी जाती थीं। कैदियों से नारियल से तेल निकालने के लिए भारी कोल्हू चलवाया जाता था। उनसे जानवरों से कई गुना अधिक श्रम और छोटी-छोटी बातों पर कठोर दंड के साथ साथ उन्हें भोजन तक नसीब नहीं होता था। कई कैदियों को तो बेड़ियों में जकड़ कर रखा जाता था और फिर भी कठोर परिश्रम से रियायत नहीं दी जाती थी।

भारत की स्वतंत्रता के बाद सेल्यूलर जेल को एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया। 11 फरवरी 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई ने इसे आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया। इसका उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और पीड़ा को सम्मान देना था। अब इस इमारत की सात में से साढ़े तीन विंग ही सुरक्षित बची हैं। कुछ विंग समय के साथ ढह गईं और कुछ विंग के स्थान पर सरकार ने स्थानीय लोगों के लिए सर्व सुविधायुक्त अस्पताल बना दिया है।

यहां अब प्रतिदिन शाम को होने वाला लाइट एंड साउंड शो पर्यटकों के लिए एक बेहद भावनात्मक अनुभव है। अंधेरे में जब जेल की दीवारों पर रोशनी पड़ती है और एक गहरी आवाज़ इतिहास में दफन दर्द की कहानी सुनाना शुरू करती है, तो लगता है जैसे जेल की दीवारें स्वयं बोल उठी हों। यहां स्थित पीपल का पेड़ इस कार्यक्रम में सूत्रधार बनकर क्रांतिकारियों पर अत्याचार की कहानी सुनाता है तो दर्शकों की आँखें नम हो जाती हैं। गाइड बताते हैं कि पुराना पीपल का पेड़ तो अब नहीं है लेकिन उसकी जगह रोपा गया नया पेड़ भी यहां के चप्पे चप्पे की यातना को बखूबी बयान करता है।


आज यहाँ आने वाले पर्यटक पीपल के पेड़, यातना कक्ष, फांसी घर, स्वातंत्र्य ज्योत, शहीद स्मारक, संग्रहालय और अन्य निशानियों के जरिए उस दौर के क्रूरतम इतिहास को करीब से महसूस करते हैं, जिसने सब कुछ सहते हुए भी भारत की आज़ादी की नींव मजबूत की। सही मायनों में, सेल्यूलर जेल केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं है, बल्कि यह उन हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान की जीवंत कहानी है, जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अपने जीवन की परवाह नहीं की।

जब हम इस ऐतिहासिक स्थल की कोठरियों के बीच से गुजरते हैं, तो एहसास होता है कि आज जिस स्वतंत्र वातावरण में हम सहज भाव से जी रहें हैं, उसके पीछे कितनी पीड़ा, संघर्ष,दर्द और बलिदान छिपा है। सेल्यूलर जेल भारत के स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐसी जीवंत स्मृति है, जो आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और त्याग का संदेश देती है। यह केवल हमारे अतीत की कहानी नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान की बुनियाद है और भविष्य की स्वर्णिम उपलब्धियों का आधार भी।

 

  


बुधवार, 18 मार्च 2026

सुकून के साथ सनातन संस्कृति का अनूठा संगम..!!

 


अक्षरधाम, बिड़ला मंदिर की तर्ज पर देवभूमि का मोहन शक्ति हेरिटेज पार्क..सुकून, शांति, सद्भाव और ध्यान का सर्वोत्तम स्थान। प्रकृति की गोद में पहाड़ियों से घिरा हुआ  बेहद शांत, स्वच्छ और निर्मल इलाका।

हवा में गूंजती भजन की मद्धम स्वर लहरी, चारों ओर से झांकते ऊंचे ऊंचे शिखर, धरती पर बिखरे रंग बिरंगे फूल, मनमोहक हवा और मंदिर में सभी देवी देवताओं के साथ विराजी मां दुर्गा की आकर्षक प्रतिमा। नवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।


मंदिर के द्वार पर सूर्यदेव और पूरे परिसर में तमाम दैविक कथाओं के साथ भूत, पिशाच की भी जीवंत प्रतिमाएं। जैसे मंदिर के प्रवेश द्वार पर सीढ़ियों के दोनों ओर देव और ऋषि की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। यहां भगवान शिव, विष्णु-लक्ष्मी, पंचमुखी हनुमान, शनि देव, नरसिंह अवतार आदि की मूर्तियां भी हैं। यहां तक कि परिसर के पार्क में बनी पशु पक्षी और इंसान की मूर्तियां भी इतनी जीवंत हैं, जैसे अभी बोल पड़ेंगी। आप जहां भी नजर दौड़ाएंगे आपको ऐसी अनेक प्रतिमाएं नजर आती हैं ।


इस राष्ट्रीय धरोहर पार्क में बनी तमाम मूर्तियां ओडिशा, पश्चिम बंगाल और राजस्थान के मूर्तिकारों की कला से जीवंत हुई हैं।  इस मंदिर सह पार्क का निर्माण भी किसी साधना से कम नहीं था क्योंकि इस पार्क को पूरा होने में 12 साल लग गए। जानकारी के मुताबिक यहां 108 देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। इस परिसर के निर्माण पर लगभग 100 करोड़ रुपये की लागत आई है।

यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित है और इसे मोहन शक्ति राष्ट्रीय धरोहर पार्क के नाम से जाना जाता है। इस पार्क का शिलान्यास पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी ने 1 दिसंबर 2002 को किया था। सोलन से लगभग 15 किमी और कालका-शिमला हाईवे से 7 किमी दूर हरठ में स्थित 40 एकड़ में फैले इस पार्क को मोहन मीकिन्स लिमिटेड ने बनवाया है। यह कंपनी के मालिक ब्रिगेडियर कपिल मोहन का ड्रीम प्रोजेक्ट बताया जाता है।


इसे उत्तर भारत का पहला ऐसा हेरिटेज पार्क कहा जाता है जो वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति को प्रदर्शित करता है। यह नई पीढ़ी को सनातन संस्कृति के बहुआयामी पहलुओं से भी रूबरू कराता है। यह पार्क भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पहचान का उत्सव तो है ही, साथ ही कला, संस्कृति और वास्तुकला का अनूठा संगम भी है।

पार्क की सबसे अच्छी विशेषताओं में साफ सफाई, हरियाली, विशाल पार्किंग, आधुनिक प्रसाधन सुविधाएं, सुरक्षा व्यवस्था और सुरम्य वातावरण भी  शामिल हैं । पार्क में प्रवेश करते ही हम इसके शांत और सुकून भरी वातावरण से मंत्रमुग्ध हो जाएंगे। पार्क का विशाल भूभाग सोच-समझकर डिजाइन किया गया है और इसे विभिन्न पारंपरिक कलाकृतियों से सजाया गया है, जो आध्यात्मिक अनुभव के लिए एक शांत वातावरण का निर्माण करता है। यदि कभी यहां से गुजरें तो मोहन शक्तिपीठ हैरिटेज पार्क आपके रुकने के लिए बेहतरीन विकल्प हो सकता है।




रविवार, 15 मार्च 2026

जांबाजों की वीरता का साक्षी है मिनी इंडिया गेट..!!


हम इसे ‘मिनी इंडिया गेट’ कह सकते हैं..छोटा इंडिया गेट लेकिन महत्व के मामले में जरा भी पीछे नहीं..बस, आकार प्रकार, डिजाइन और शहीदों के दर्ज नामों की संख्या के लिहाज से हम इसे मिनी इंडिया गेट कह रहे हैं। वैसे, इसका वास्तविक नाम ‘घंटाघर’ है जिसे ‘क्लॉक टॉवर’ के नाम से भी जाना जाता है। देश का गौरव इंडिया गेट राष्ट्रीय राजधानी के सबसे महत्वपूर्ण इलाके में बना है जबकि घंटाघर दिल्ली से लगभग ढाई हज़ार किलोमीटर दूर एवं चारों ओर से समुद्र से घिरे पोर्ट ब्लेयर में।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर (अब श्री विजयपुरम) के बीचों बीच बना घंटाघर यहां का एक प्रमुख ऐतिहासिक स्थल और पहचान का प्रतीक है। पीले रंग का यह स्तंभ शहर का गौरव है। खास बात यह है कि इस घंटाघर में चारों ओर चार घड़ी लगीं हैं जो किसी दौर में अलग-अलग समय क्षेत्र दिखाती थीं और दशकों से इस शहर के लोगों के समय पर काम करने का माध्यम थीं । अब रखरखाव के अभाव एवं तकनीकी जटिलताओं की वजह से घड़ियों की यह खूबी तो नहीं रही लेकिन यह स्तंभ आज भी शहर की धड़कन का अहम स्थान है।


बताया जाता है कि घंटाघर का निर्माण 1921-1922 में हुआ था। यह प्रथम विश्व युद्ध  के दौरान 1914-20 में अंडमान द्वीपों की रक्षा करने वाले भारतीय और ब्रिटिश सैनिकों की स्मृति में बनाया गया था। इस पर मिलिट्री पुलिस फोर्स, ब्रिटिश कैप्टन E B fawcett, सूबेदार मुजम्मल खान, नायक मंगत चंद, लांस नायक अली शेर और सिपाही फिरोज जैसे तमाम नाम हैं जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में अपनी जांबाजी दिखाई थी। 

यह तो हम सभी जानते हैं कि इंडिया गेट का निर्माण 1921 में शुरू होकर 1931 में पूरा हुआ था। इसे ब्रिटिश सरकार ने प्रथम विश्व युद्ध और तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध में शहीद हुए ब्रिटिश-भारतीय सेना के करीब 90,000 से अधिक सैनिकों की याद में बनवाया था। इसपर 13 हजार से अधिक सैनिकों के नाम अंकित हैं।

वैसे, पोर्ट ब्लेयर का घंटाघर अकेला नहीं है। देश भर में ऐसे कई घंटाघर है जो ऐतिहासिक व्यक्तियों और घटनाओं की स्मृति को लंबे समय तक संजोने का काम कर रहे है। मसलन हुसैनाबाद घंटाघर, लखनऊ । यह भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर है, जिसकी ऊंचाई 67 मीटर है। इसका निर्माण 1881 में लेफ्टिनेंट गवर्नर जॉर्ज कूपर के सम्मान में किया गया था। इसी तरह हिमाचल प्रदेश के मंडी का घंटाघर…यह घंटाघर 1939 में बनाया गया था और इसमें एक राजा की साज़िश और युद्ध का इतिहास छिपा है। इसी श्रृंखला में सिकंदराबाद घंटाघर, हैदराबाद भी है जो 1860 में बनाया गया था और इसकी ऊंचाई 120 फुट है। दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में भी एक घंटाघर है। यह घंटाघर 1925 में बनाया गया था और इसका डिजाइन सर एडविन लुट्येंस ने तैयार किया था।

पोर्ट ब्लेयर का घंटाघर युद्ध स्मारक होने के साथ-साथ उस समय की औपनिवेशिक वास्तुकला का एक प्रभावशाली नमूना भी है। जानकार घंटाघर की वास्तुकला को ओबिलिस्क शैली कहते हैं। यह शैली प्राचीन मिस्र से प्रेरित एक कलात्मक रूप है, जो एक ऊंचे, चार-तरफ आकृति वाले पतले पत्थर के स्तंभ को प्रदर्शित करती  है। इस शैली में स्तंभ ऊपर की ओर पतला होकर एक पिरामिड के आकार बनाता है। ये स्मारक आमतौर पर ऐतिहासिक घटनाओं की याद में निर्मित किए जाते थे। यह मिस्र में सूर्य देवता को भी प्रतिबिंबित करता है।

 घंटाघर आज के पोर्ट ब्लेयर के सबसे व्यस्त एबरडीन बाजार (Aberdeen Bazaar) के ठीक बीचों-बीच स्थित है, जहाँ से शहर की धड़कन महसूस होती है। इसके चारों ओर दुकानें, लोग, अनगिनत वाहनों की आवाजाही और भरपूर शोरगुल है लेकिन यह पीला स्मारक शांति, सुकून, ठहराव और इतिहास की अनुभूति देता है। हम जैसे तमाम पर्यटकों के लिए यह आज भी आकर्षण का केंद्र है और हर कोई इसे अपनी स्मृतियों में सहेजना चाहता है। पर्यटक न केवल यहाँ आकर कुछ देर रुकते हैं एवं फोटो लेते हैं बल्कि इसके इतिहास को जानने का प्रयास भी करते हैं।

यह घंटाघर पोर्ट ब्लेयर के बदलते समय भर का नहीं बल्कि समय के साथ बदलते इतिहास की गवाही भी देता है । एक तरफ औपनिवेशिक काल की यादें, दूसरी तरफ आजादी के बाद का नया भारत। इसलिए आप पोर्ट ब्लेयर जाएं तो एबरडीन बाजार में घूमते हुए इस मिनी इंडिया गेट यानि घंटाघर के पास जरूर रुकें क्योंकि यह स्मारक अपने अंदर सैनिकों के बलिदान, समय का प्रवाह और अंडमान की अनोखी विरासत सहित कई बड़ी कहानियां समेटे है। 





शुक्रवार, 13 मार्च 2026

सादगी और सौंदर्य का संगम हैवलॉक द्वीप


हैवलॉक आइलैंड.. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे लोकप्रिय और सुंदर द्वीप है। यह पोर्ट ब्लेयर से लगभग 60-70 किमी दूर स्थित है। यह द्वीप अपने सफेद रेत के बीच, जैसे कि प्रसिद्ध राधानगर बीच एवं काला पत्थर बीच और वाटर स्पोर्ट्स के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। 

इस द्वीप की सबसे बड़ी पहचान है राधानगर बीच। यह समुद्र तट अपनी सफेद रेत और शांत वातावरण के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।  यहाँ शाम का सूर्यास्त एक ऐसा दृश्य रचता है जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। डूबते सूरज की लालिमा जब समुद्र के पानी पर फैलती है, तो पूरा वातावरण किसी चित्र की तरह सजीव हो उठता है।

हैवलॉक द्वीप का नाम ब्रिटिश शासनकाल में हेनरी हैवलॉक के नाम पर रखा गया था। वे 1857 के विद्रोह के समय ब्रिटिश सेना के एक प्रमुख अधिकारी थे। लेकिन आजादी के बाद इस द्वीप को भारतीय स्वाधीनता संग्राम की स्मृति से जोड़ते हुए इसका नाम बदलकर स्वराज द्वीप कर दिया गया, जो स्वतंत्रता और आत्मगौरव का प्रतीक है।

इस द्वीप की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी है। यहाँ बड़े शहरों की भीड़-भाड़ नहीं, बल्कि प्रकृति की शांत ध्वनियाँ सुनाई देती हैं—लहरों की आवाज, हवा में झूमते नारियल के पेड़ों की सरसराहट और दूर-दूर तक फैली हरियाली। सुबह के समय जब सूरज की पहली किरणें समुद्र पर पड़ती हैं, तो लगता है जैसे पूरा द्वीप सुनहरी रोशनी से नहा गया हो।


हैवलॉक द्वीप अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता, निर्मल समुद्र तटों और जीवंत प्रवाल भित्तियों (Coral Reef) के लिए प्रसिद्ध है। काला पत्थर बीच का नाम इसके तट पर बिखरी बड़ी-बड़ी काली चट्टानों के कारण पड़ा है। दरअसल, सफेद रेत और नीले-हरे पानी के साथ ये प्राकृतिक काली चट्टानें एक गहरा विरोधाभास बनाती हैं। इसके अलावा, यह बीच, काला पत्थर गाँव के समीप स्थित है। इस वजह से भी इसका नाम शायद काला पत्थर हो गया ।

हैवलॉक द्वीप केवल सुंदरता ही नहीं, रोमांच का भी केंद्र है। यहाँ समुद्र के भीतर छिपी दुनिया को देखने का मौका मिलता है। रंग-बिरंगी मछलियाँ, मूंगे की चट्टानें और पारदर्शी पानी—सब मिलकर ऐसा अनुभव देते हैं जैसे कोई जादुई संसार हो।

यहाँ का एलीफेंट बीच विशेष रूप से स्कूबा डाइविंग और स्नॉर्कलिंग के लिए प्रसिद्ध है। समुद्र के भीतर उतरकर जब प्रवाल भित्तियों और जीवंत समुद्री जीवन को देखा जाता है तो एहसास होता है कि प्रकृति ने पानी के नीचे भी एक अलग ही दुनिया रच रखी है।


हैवलॉक द्वीप केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक अनुभव है—प्रकृति के करीब जाने का अनुभव, समुद्र की गहराइयों को महसूस करने का अनुभव और जीवन की भागदौड़ से दूर कुछ शांत क्षण बिताने का अनुभव।

जब कोई यात्री इस द्वीप से वापस लौटता है, तो उसके साथ केवल तस्वीरें ही नहीं, बल्कि समुद्र की लहरों की आवाज और उस शांत वातावरण की यादें भी लौटती हैं। शायद यही वजह है कि जो एक बार हैवलॉक द्वीप जाता है, उसके मन में यह जगह हमेशा के लिए बस जाती है।

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शनिवार, 7 मार्च 2026

फ्लैग प्वाइंट..जहां समंदर की लहरें देती हैं तिरंगे को सलामी!!

 


तिरंगा धीरे धीरे…लेकिन मजबूती के साथ ऊपर उठ रहा था और इसके साथ-साथ सैकड़ों लोगों की आशाएं, उम्मीदें और आजादी की आकांक्षा समंदर की उछाल भरती लहरों के साथ जयघोष कर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई सपना हकीकत में बदल रहा हो और समंदर स्वयं इस बात का साक्षी बन रहा हो। तिरंगा में सबसे पहले केसरिया रंग ने सूरज की किरणों के साथ आंख से आंख मिलाकर विजय का शंखनाद किया। फिर, सफेद रंग ने सत्य की ताक़त का संदेश दिया और अंत में हरे रंग ने हरे भरे द्वीप से यह स्पष्ट कर दी कि-‘अब यह धरती हमारी है।’

हम बात कर रहे हैं 30 दिसंबर 1943 की…वह दिन, जो आज भी हमारी आजादी के लोकतांत्रिक पटल पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। जब तिरंगा ध्वज स्तंभ (फ्लैग पोल) के शिखर पर पहुंचा तो ऐसा लगा जैसे सैकड़ों साल की गुलामी की जंजीरें एक साथ टूट गई हों। भारत को मिली स्वतंत्रता से करीब चार पहले तिरंगा फहराकर आजादी का ऐलान करने वाले शख़्स थे - नेताजी सुभाष चंद्र बोस और स्थान था-अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की मौजूदा राजधानी पोर्ट ब्लेयर, जिसे अब हम श्री विजयपुरम के नाम से जानते हैं । 

यह ऐतिहासिक घटना देश के स्वतंत्रता संग्राम में मील का वह पत्थर साबित हुई जिसने अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया..जहां तक नेताजी की बात है तो वे पहले ही भारतीय जनमानस को आश्वस्त कर चुके थे कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा..पोर्ट ब्लेयर से तिरंगे के जरिए दुनिया भर को दिया गया यह पैगाम इसी नारे का विस्तार था।


दरअसल,पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना ग्राउंड (जो आज नेताजी स्टेडियम कहलाता है) में तब तक ब्रिटिश यूनियन जैक लहराता था लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने तिरंगा फहराकर गुलामी के पन्ने को पलटकर आजादी का जयघोष लिख दिया। नेताजी के इस कदम ने अंडमान को देश का ऐसा पहला हिस्सा बना दिया था जिसे सबसे पहले स्वतंत्र घोषित किया गया।


हाल ही में, मीडिया के साथियों के साथ अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की यात्रा के दौरान मुझे इस पवित्र स्थल के दर्शन का सुअवसर मिला। यह किसी ‘राष्ट्रतीर्थ’ से कम नहीं है। 1943 की उस ऐतिहासिक तिथि को यादगार बनाने के लिए यहां स्मारक बनाया गया है। यह स्थान अब पोर्ट ब्लेयर में फ्लैग पॉइंट (तिरंगा मेमोरियल) के नाम से जाना जाता है। यहां अब 150 फीट ऊंचा तिरंगा ध्वज लहरा रहा है और पास में ही स्थित समुद्र की अठखेलियां करती लहरें अपने शोर के साथ हमारी स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए वीरों का जयगान करती हैं।

फ्लैग प्वाइंट में नेताजी की स्मृति में बना स्मारक भी है जिस पर उनकी तस्वीर के साथ ध्वजारोहण की उस स्वर्णिम घटना का विवरण दर्ज है। स्मारक पर लिखा है: “30 दिसम्बर सभी भारतीयों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है। इसी दिन 1943 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज और आज़ाद हिन्द की अंतरिम सरकार के सहकर्मियों के साथ पोर्ट ब्लेयर में पहली बार तिरंगा फहराया था। इसके साथ ही उन्होंने अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह को ब्रिटिश राज से आज़ाद होने वाला पहला भारतीय भू-भाग घोषित किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान की शाही सेना यहाँ 23 मार्च, 1943 से ही पदस्थापित थी । 6 नवम्बर, 1943 को जापान के प्रधानमंत्री ने टोक्यो में ग्रेटर ईस्ट एशियाटिक नेशन्स की सभा में यह घोषणा की थी कि अंडमान एवं निकोबार प्रायद्वीप को आजाद हिन्द की अंतरिम सरकार को सौंप दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि नेताजी आजाद हिन्द फोन के सर्वोच्च सेनापति थे और आजाद हिन्द की अंतरिम सरकार के मुखिया भी थे ।”

यहाँ से रॉस द्वीप (Ross Island), नॉर्थ बे (North Bay) और समुद्र का मनोरम दृश्य भी दिखाई देता है। पर्यटकों के साथ साथ स्थानीय लोगों के समुद्र के किनारे टहलने और बैठने की व्यवस्था भी है एवं एक खूबसूरत पार्क भी, जो यहां के वातावरण को और सुंदर बना रहा है । सूर्यास्त के समय तिरंगे के साथ तस्वीरें लेने के लिए यह एक बेहतरीन जगह है। 


हालांकि, व्यस्तता एवं समय की कमी के कारण हम (मैं और दैनिक भास्कर शिमला के न्यूज़ एडीटर रविंदर कुमार पनवर) रात को करीब 9 बजे यहां पहुंच पाए लेकिन तब भी यहां का माहौल,लोगों की उपस्थिति और आकर्षक लाइटिंग इसे अलग गरिमा प्रदान कर रहे थे। यहां पहुंचकर ऐसा लगता है जैसे आज भी, पोर्ट ब्लेयर में राष्ट्रीय ध्वज के साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस का वंदे मातरम् का जयघोष समुद्र की गड़गड़ाहट के साथ हवा में व्याप्त है।


बुधवार, 4 मार्च 2026

समंदर में मेट्रो..लहरों पर कीजिए अब सवारी !!

न तो कोई रेल लाइन है, न ही पटरियां बिछी हैं और न ही सड़क जैसा कोई प्लेटफार्म..फिर भी नीले समंदर में मेट्रो दौड़ाने की तैयारी है.. जी हां, हमारे आपके शहरों में दिनभर खटर पटर दौड़ने वाली रंग बिरंगी आकर्षक मेट्रो..जो सैकड़ों किलोमीटर में फैले विशाल समंदर में बसे तमाम टापुओं (द्वीपों) को परस्पर जोड़ने का जरिया बनेगी…लेकिन यहां इसका नाम दिल्ली मेट्रो/कोलकाता मेट्रो या लखनऊ/भोपाल मेट्रो नहीं होगा बल्कि..वॉटर मेट्रो होगा।

हम बात कर रहे हैं अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में प्रस्तावित वॉटर मेट्रो की। यह ऐसी मेट्रो होगी जो न किसी ट्रैफिक जाम में फंसेगी, न सड़कों की धूल-धक्कड़ से घिरेगी और न ही शोर गुल करेगी। बस, लहरों की मस्ती और द्वीपों की हरी-भरी खूबसूरती के दीदार कराएगी। यह कोई कल्पना की उड़ान नहीं है, बल्कि भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है जो जल्दी ही हकीकत के बदलने वाली है।


जी हां, वो दिन दूर नहीं जब पर्यटकों का स्वर्ग अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, स्थानीय लोगों और सैलानियों के लिए एक सुपरफास्ट जल-परिवहन नेटवर्क से जुड़ जाएंगे। वैसे भी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के हैवलॉक (अब स्वराज द्वीप) एवं नील (अब शहीद द्वीप) धीरे धीरे मॉरिशस का विकल्प बन रहे हैं क्योंकि यह कम बजट में वही आकर्षण प्रदान कर रहे हैं।

सबसे पहले तो बात करते हैं वॉटर मेट्रो योजना की। दरअसल, 2025 में इनलैंड वाटरवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IWAI) ने 17 शहरों में अर्बन वॉटर ट्रांसपोर्ट सिस्टम की फिजिबिलिटी स्टडी शुरू की थी और इसमें अंडमान-निकोबार को सबसे खास जगह मिली। इस स्टडी का दायित्व कोच्चि मेट्रो रेल लिमिटेड (KMRL) को सौंपा गया है। इसका कारण यह है कि कोच्चि में पहले से ही वॉटर मेट्रो चल रही है। अब बाकी तटीय इलाकों में वॉटर मेट्रो चलाने की यह योजना रफ्तार पकड़ चुकी है। केंद्र सरकार ने इस पर अमल के लिए प्रारंभिक तौर पर 9 हजार 280 करोड़ की राशि का प्रावधान किया है।


जहां तक अंडमान की बात है तो यहां यह इको-फ्रेंडली वॉटर मेट्रो मुख्य रूप से फीनिक्स बे, बंबूफ्लैट और चैथम को जोड़ने का काम करेगी। इन तीनों इलाकों में आवागमन सबसे ज्यादा होता है। इस मार्ग पर रोजाना 4,000-5,000 लोग सफर करते हैं। वॉटर मेट्रो अंडमान की चाल और चेहरा दोनों बदल देगी। अभी तक स्थानीय निवासी रोजाना फेरी का इंतजार करते हैं और फेरी में बस, ट्रक, कार, साइकिल और मोटरसाइकिल के साथ चढ़कर अपने मुकाम तक पहुंचते हैं। लेकिन वॉटर मेट्रो के शुरू होने के बाद उन्हें फेरी का इंतजार करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी बल्कि इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड कैटामरान बोट्स पर सवार होकर वे मिनटों में एक द्वीप से दूसरे पर पहुंच जाएंगे।


आसान शब्दों में समझे तो वॉटर मेट्रो अत्याधुनिक सुविधाओं से सज्जित बोट्स की ऐसी सिलसिलेवार सेवा होगी जो सामान्य मेट्रो की तरह समयबद्ध रूप से चलेगी। यह सोलर एनर्जी से संचालित होगी जिससे न तो शोर होगा और न ही प्रदूषण का कोई खतरा। खासतौर पर डीजल से संचालित फेरी के स्थान पर यह पर्यावरण के लिए यह एक बड़ा कदम है, क्योंकि अंडमान जैसे संवेदनशील इकोसिस्टम में डीजल वाली फेरियां धीरे धीरे इतिहास बन जाएंगी।

वॉटर मेट्रो से सबसे ज्यादा खुश पर्यटक होंगे क्योंकि सर्वप्रथम तो उन्हें नई नवेली खूबसूरत और तेजी से चलने वाली वॉटर मेट्रो मिल जाएगी जो उनके पर्यटन अनुभव को और समृद्ध करेगी। इसके अलावा उनकी सेल्यूलर जेल से रॉस आइलैंड जैसी यात्राएं समुद्री हवाओं के साथ और आसान हो जाएंगी।

अब तक प्रस्तावित योजना में 10 द्वीपों को 76 किमी के नेटवर्क से जोड़ने की बात है। सरकार की योजना यह भी है कि ये वेसल्स इंडियन शिपयार्ड्स में बनें ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार मिले। वॉटर मेट्रो को मल्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट इंटीग्रेशन के जरिए बस परिवहन से जोड़कर आम लोगों को सहज और संतुलित परिवहन सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।

वॉटर मेट्रो पर अमल इतना आसान भी नहीं है कि पटरी बिछाई, फ्लाईओवर बनाए और चल पड़ी मेट्रो। वॉटर मेट्रो में द्वीपों की भौगोलिक स्थिति, मौसम की चाल, मानसून के तेवर, ज्वार भाटा, सुनामी एवं तूफान जैसी तमाम चुनौतियों का ध्यान रखते हुए सफर को सौ फीसदी सुरक्षित बनाना होगा। इसके अलावा, यहां की मूल जनजातियों (इंडिजेनस कम्युनिटीज) जारवा और सेंटिनेल जैसे आदिवासी समुदायों की सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा जिससे उनके प्राकृतिक जीवन में कोई व्यवधान न आए ।

कुल मिलाकर, वॉटर मेट्रो परियोजना न सिर्फ अंडमान के परिवहन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगी बल्कि पर्यटन को नई ऊंचाईयों पर ले जाएगी। जाहिर है इससे यहां की अर्थव्यवस्था को भी नई ऊंचाइयां मिलेगी।

#watermetro #Andman #PortBlair #Metro #Sea

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

अनूठा ज्वालामुखी..जिसके साथ ले सकते हैं सेल्फी !!


 ‘ज्वालामुखी’ नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं..आग का दरिया, चारों ओर बहता लाल आग सा दहकता लावा, रासायनिक गैसे और बहुत कुछ..इसके पास जाना तक नामुमकिन होता है। लेकिन हम बात कर रहे हैं एक जैसे ज्वालामुखी की जहां न आग है, न लावा, फिर भी धरती अपने अंदर जमा सामग्री बाहर उड़ेल रही है। यह ज्वालामुखी ऐसा है जिसे आप छू सकते हैं, इसके पास खड़े हो सकते हैं, फोटो खिंचवा सकते हैं और इसके बाद भी आपको घबराहट के स्थान पर सुकून मिलेगा…यह ‘मड वॉल्कानो’ यानि मिट्टी वाला ज्वालामुखी।


मड वॉल्कानो (Mud Volcano) वाकई प्रकृति का एक अनोखा और रहस्यमयी चमत्कार है। खास बात यह है कि भारत का एकमात्र सक्रिय मड वॉल्कानो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में बाराटांग द्वीप (Baratang Island) पर स्थित है। वैसे, गूगल गुरु के मुताबिक दुनिया भर में केवल 2500 के आसपास मड वॉल्कानो हैं लेकिन हमारे देश में अंडमान के अलावा ये कहीं और नहीं मिलते।

जैसा की हम सभी जानते हैं कि सामान्य ज्वालामुखी लावा उगलते हैं, लेकिन मड वॉल्कानो या मिट्टी के ज्वालामुखी ठंडी कीचड़, पानी और गैसों का मिश्रण बाहर निकालते हैं। यहाँ कोई लावा या आग नहीं होती—बस बुलबुले बनते हैं, कीचड़/मिट्टी धीरे-धीरे बहता रहता है और छोटे-छोटे गड्ढे या टीले बन जाते हैं। आमतौर पर मड वॉल्कानो का कारण पृथ्वी की गहराई में  जैविक सामग्री से मीथेन और अन्य गैसें निकलने को माना जाता हैं। ये गैसें दबाव बनाकर कीचड़ और पानी को ऊपर धकेलती हैं। जानकारों का यह भी कहना है कि अंडमान में टेक्टॉनिक प्लेटों के दबाव के कारण इसतरह के ज्वालामुखी बन रहे हैं । मड वोल्केनो का तापमान लगभग 29-30 डिग्री सेल्सियस और स्वभाव क्षारीय होता है।


अब तक मिली जानकारी के मुताबिक अंडमान द्वीपों में कुल 11 मड वोल्केनो हैं। जहां तक सबसे प्रमुख मड वॉल्कानो की बात है तो यह बाराटांग द्वीप पर है, जो पोर्ट ब्लेयर से लगभग 100-150 किमी दूर है। स्थानीय लोग इसे जलकी कहते है। वैसे, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बारे में सबसे रोचक बात यह भी है कि हमारे देश का लावा वाला एक सक्रिय ज्वालामुखी बैरन आइलैंड भी यहीं है, और कीचड़ वाला मड वॉल्कानो भी।

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अध्ययन में पता चला कि बाराटांग के मड वॉल्कानो से निकली मिट्टी ओलिगोसीन युग (Oligocene age) अर्थात् करीब 2.3 करोड़ साल पुरानी है। एकतरह से  यह मिट्टी और इससे जुड़े अध्ययन हमें पृथ्वी के उस समय के भूगर्भीय इतिहास को समझने में मदद कर सकते हैं । हम बाराटांग में जिस मड वॉल्कानो को देखने गए वह पिछले साल अक्टूबर में फटा है और यह घटना भी करीब 20 साल के बाद घटी है इसलिए यहां पर्यटकों का तांता लगा हुआ है । वन विभाग के अधिकारियों के साथ हम भी घटना स्थल तक गए। मड वॉल्कानो फटने के कारण यहां 3-4 मीटर ऊंचे टीले बन गए हैं और फुटबॉल के मैदान जैसे करीब 500-1000 वर्ग मीटर क्षेत्र में कीचड़ फैल गया । देखने में यह एरिया लावा वाले ज्वालामुखी फटने की तरह ही लगता है और यहां बने टीलों से अभी भी मिट्टी बह रही है और बुलबुले के रूप में गैस बाहर निकल रही हैं।


जब हमने मड वॉल्कानो के बारे में वन विभाग, अन्य संबंधित विभागों और इंटरनेट की मदद ली तो जानकारी मिली कि अंडमान के मड वॉल्कानो कहीं न कहीं 2004 के सुमात्रा-अंडमान भूकंप और उसके साथ आई सुनामी से संबंधित हैं। अब तो वैज्ञानिक इन मड वॉल्कानो को मंगल ग्रह (Mars) पर मौजूद संभावित मड वॉल्कानो के साथ मिलाकर अध्ययन कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि बाराटांग के मड वॉल्कानो की संरचना मंगल गृह की इसी तरह की संरचनाओं से काफी मिलती-जुलती है। कुल मिलाकर यह भी पृथ्वी के तमाम चमत्कारों में से एक है और आने वाले समय में अध्ययन के बाद शायद यह कहीं ऐसे रहस्य उजागर करने का जरिया बने जिन्हें पृथ्वी ने अब तक अपने गर्भ में छिपाकर रखा है।

(लेखक इन दिनों अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के भ्रमण पर हैं।)

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

क्या आपने कभी देखें..!! है नमक के खेत..!!


चने के खेत, गेहूं के खेत, गन्ने के खेत..तो हम सभी ने खूब देखें हैं और सरसों के खेत यश चोपड़ा की फिल्मों का प्रमुख आकर्षण रहा है। सरसों के खेत इतने रोमांटिक हो सकते हैं ये हमें ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ जैसी फिल्मों से ही पता चला है क्योंकि हम तो फिल्म ‘अंजाम’ के गीत ‘जोरा जोरी चने के खेत में..’ या फिल्म ‘तराजू’ के गाने ‘चल गन्ने  के खेत में अप्पा काहे शर्माए रे..’ जैसे गीतों से बेचारे खेतों का चरित्र समझते रहे हैं।

खैर, यहां हम खेतों का चरित्र चित्रण नहीं कर रहे बल्कि आपको एक ऐसे खेत से मिलवाना चाहते हैं जिसके बारे आप में से कई लोगों ने शायद सुना भी नहीं होगा। मुझे भी, इनके बारे में देखने के बाद ही पता चला। हम बात कर रहे हैं ‘नमक के खेत’ की…जी हां, सही सुना आपने नमक के खेत। नमक का दारोगा, नमक हलाल और नमक हराम के बाद नमक के खेत..बिल्कुल हमारे गांवों के खेतों की तरह, बस फर्क यह है कि इनमें गेहूं-चना नहीं नमक होता है।

हाल ही में, सोमनाथ की यात्रा के दौरान जब हम सड़क मार्ग से अहमदाबाद आ रहे थे तो गुजरात के शानदार हाईवे से गुजरते हुए भावनगर के आसपास हमें सफेदी से भरे खेत नजर आए..खेतों में सफेदी देखकर चौंकना लाज़मी था क्योंकि बरसात तो थी नहीं कि ‘फूले कांस सकल महि छाए..’ समझकर सफेदी देखें। फिर हमारे गाइड-सह-ड्राइवर-सह-इनोवा के मालिक हार्दिक भाई ने बताया कि ये नमक के खेत हैं। अब बारी थी इस नई जानकारी को समझने और विश्लेषण की।

दरअसल,खम्भात की खाड़ी के किनारे बसा भावनगर गुजरात में नमक उत्पादन का गढ़ है। दरअसल, यहाँ का नमक सिर्फ घरेलू इस्तेमाल की चीज नहीं, बल्कि औद्योगिक प्रगति एवं वित्तीय मजबूती का आधार है। यहाँ बने नमक के खेतों में समुद्री पानी से सौर वाष्पीकरण (सोलर एवापोरेशन) के पारंपरिक तरीके से नमक पैदा किया जाता है। गुजरात में जहाँ कच्छ का रण विशाल सफ़ेद रेगिस्तान की तरह दिखाई पड़ता है, वहीं भावनगर में ये खेत रंग-बिरंगे दिखाई देते हैं… नीले समुदी पानी से भरे तालाबों से लेकर चमकते सफ़ेद क्रिस्टल तक..इन खेतों को देखना किसी यादगार अनुभव की तरह है। सुबह खेतों में भरा खारा पानी आकाश का दर्पण बन जाता है तो दिन में धूप और सूरज की किरणों के साथ नीला, हरा, और बैंगनी बिखरने लगते हैं । ऐसा लगता है जैसे प्रकृति पानी पर चित्रकारी कर रही हो । 

सुबह होते ही मजदूरों के समूह के समूह काम पर लग जाते हैं। यहाँ बनने वाला नमक मरीन सॉल्ट है क्योंकि यह खाड़ी के पानी से बनता है। नमक बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहले खेतों को मेड़ों से बाँटकर तालाब की तरह बनाया जाता है। फिर समुद्री पानी को छोटे-छोटे हिस्सों में भरा जाता है। धूप की गर्मी पाकर पानी धीरे-धीरे वाष्पित होकर उड़ जाता है। पहले हल्के नमक के अलावा अन्य खनिज प्राकृतिक रूप से अलग होते हैं और फिर आखिरी चरण में शुद्ध सफ़ेद नमक के क्रिस्टल जमने लगते हैं। 

एक अनुमान के मुताबिक एक एकड़ से पचास से सौ टन तक नमक निकल आता है। भावनगर में कई कंपनियाँ ऐसी हैं जो सालाना लाखों टन नमक की खेती कर रही हैं। गुजरात भारत का सबसे बड़ा नमक उत्पादक राज्य है, जो देश की कुल नमक उत्पादन का लगभग 75-80 प्रतिशत का योगदान देता है। हालांकि जानकार यह भी बताते हैं कि मौसम में लगातार आ रहे बदलाव के कारण नमक की खेती पर गहरा असर पड़ा है। इससे नमक का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। 

आंकड़ों के मुताबिक पहले नौ महीने तक नमक का उत्पादन होता था, अब यह छह महीने तक सिमट गया है। यहां आए दिन आने वाले चक्रवातों ने भी उत्पादन में कमी ला दी है। इसका कारण यह है कि बारिश और चक्रवात के कारण खेतों में गाद जम जाती है और परिणामस्वरूप खेतों को फिर से तैयार करने में महीनों लग जाते हैं। हालांकि नमक उत्पादक मौसम से निपटने के लिए बेहतर ड्रेनेज और वाशिंग प्लांट जैसे कदम उठा रहे हैं। 

नमक हमारे भोजन में स्वाद और उत्पादकों की जेब गरम करता है लेकिन नमक के खेतों में काम करने वाले मजदूरों की सेहत पर भी गहरा असर डालता है। इसलिए अगली बार जब भी आप अपने भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए नमक डाले तो याद रखें कि हर छोटी-सी चुटकी में स्वाद और कमाई के साथ श्रमिकों का संघर्ष एवं सेहत का जोख़िम भी लगा है इसलिए इसे महज रसोई घर का एक हिस्सा न माने बल्कि जीवन का संघर्ष और देश के साथ साथ किचिन की रीढ़ भी समझे। 

इसी तरह, कभी भावनगर या इसके जैसे किसी नमक उत्पादक इलाके से गुजरे तो कार रोककर नमक के खेत जरूर देखें ताकि आप भी समझ सकें कि नमक केवल आपका स्वाद नहीं बल्कि देश के सैकड़ों लोगों के संघर्ष की कहानी है।

#Salt #Gujrat #Bhavnagar 







रविवार, 15 फ़रवरी 2026

मध्यप्रदेश के दो अद्भुत और सबसे बड़े महादेव..!!


महाशिवरात्रि पर आज मध्यप्रदेश के दो सबसे बड़े शिवलिंग की बात..भगवान शंकर के ये दोनों स्थान अपने शिवलिंग के बड़े आकार भर के कारण नहीं बल्कि महत्व के कारण भी प्रसिद्ध हैं इसलिए यहां महाशिवरात्रि पर आस्था का सैलाब उमड़ता है।

इनमें से एक है रायसेन जिले में और भोपाल के करीब स्थित भोजपुर मंदिर। यह मंदिर भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। चार विशाल स्तंभों वाले इस मंदिर का शिवलिंग इतना बड़ा है कि पूजा के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह शिवलिंग एक ही विशाल चट्टान से तराशा गया है, जो दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक माना जाता है। 


यहां शिवलिंग की ऊंचाई करीब 7.5 फीट और आधार सहित कुल ऊंचाई 40 फीट से अधिक है जबकि मंदिर 115 फीट लंबा, 82 फीट चौड़ा और लगभग 13 फीट ऊंचे चबूतरे पर बना है। यहां का विशाल द्वार और मंदिर का अधूरापन भी प्रमुख आकर्षण है।

बताया जाता है कि 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान राजा भोज द्वारा इस मंदिर का निर्माण शुरू किया गया था, लेकिन उस समय मंदिर के मुख्य भाग और गर्भगृह का काम ही पूरा हुआ। इसे "उत्तर भारत का सोमनाथ" भी कहा जाता है। भोजपुर मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित हर और यह यूनेस्को की अस्थायी विश्व धरोहर सूची में भी शामिल है ।

दूसरा है छतरपुर जिले के खजुराहो में स्थित मतंगेश्वर महादेव मंदिर। इस मंदिर में स्थापित विशाल शिवलिंग के बारे में लोक मान्यता है कि हर साल शिवलिंग की लंबाई करीब एक इंच बढ़ रही है और मान्यता यह भी है कि जब यह शिवलिंग पाताल लोक तक पहुंच जाएगा, तब कलयुग का अंत हो जाएगा। शिवलिंग अभी करीब 9 फीट ऊंचा है और कहा जाता है कि इतना ही यह नीचे की ओर भी है।

यह मंदिर खजुराहो के पश्चिमी समूह के मंदिरों में से एक है और इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। यह मंदिर भी 11वीं शताब्दी में चंदेली शासकों द्वारा बनाया गया था। यहां विराजमान विशाल शिवलिंग को मृत्युंजय महादेव के नाम से भी जाना जाता। यह आज भी सक्रिय रूप से पूजा-अर्चना वाला यहां का एकमात्र प्राचीन मंदिर है क्योंकि खजुराहो के अन्य मंदिर मुख्य रूप से पुरातात्विक स्मारक हैं।


सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...