मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

क्या है ओल्ड मंक, जनरल डायर और देवभूमि का रिश्ता..!!


आजादी की लड़ाई की सबसे निर्मम घटना जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए जिम्मेदार क्रूर ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर का देवभूमि हिमाचल प्रदेश से क्या संबंध है? इसी तरह, भारत सहित दुनिया भर में मशहूर रम ‘ओल्ड मंक’ का देवभूमि से क्या रिश्ता है?..और इस सबसे जरूरी सवाल कि जनरल डायर,ओल्ड मंक एवं हिमाचल प्रदेश आपस में कैसे जुड़े हैं? 

सबसे पहले बात ओल्ड मंक की। रम का पर्याय यह ब्रांड अपनी विरासत, विशिष्ट स्वाद और कम हैंगओवर के लिए भारत ही नहीं दुनिया के 50 से ज्यादा देशों में लोकप्रिय है। वर्ष 2024-25 में ओल्ड मंक ने लगभग 1.3 करोड़ पेटी की बिक्री की जो प्रतिद्वंद्वी ब्रांड से बहुत ज़्यादा हैं लेकिन यह बात कम लोग ही जानते होंगे कि ‘बूढ़े साधू’ यानि ओल्ड मंक का जन्म देवभूमि हिमाचल प्रदेश में हुआ है। आज करीब 70 साल बाद भी यह डार्क रम सेगमेंट में मार्केट लीडर है। कंपनी की कुल बिक्री का 80 फ़ीसदी हिस्सा इसी ब्रांड से आता है।

अब रही जनरल डायर के हिमाचल कनेक्शन की बात तो ओल्ड मंक ब्रांड ने जिस डिस्टिलरी या ब्रूअरी में जन्म लिया है,उसकी स्थापना जनरल डायर के पिता ने ही की थी और यह ब्रूअरी हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित है। इसतरह खूंखार एवं निर्मम जनरल डायर के पिता द्वारा देवभूमि में स्थापित ब्रूअरी में दुनिया के इस मशहूर रम ब्रांड ने जन्म लिया और अपनी जन्मदाता कंपनी की कमाई को कई गुना बढ़ा दिया। लेकिन, इसके पीछे की कहानी इतनी सरल नहीं है। इसमें सालों की मेहनत, रिसर्च, सोच और पीढ़ीगत बदलाव की अहम भूमिका है। हम सभी जानते हैं कि अब ओल्ड मंक किसी परिचय की मोहताज नहीं है लेकिन इस ब्रांड की शुरुआत में भी कंपनी को कभी प्रचार करने की जरूरत नहीं पड़ी। इससे भी 

मजेदार बात यह है कि इस लोकप्रिय ब्रांड के पीछे एक ऐसी विरासत है जो स्क्रैप और खाली बोतलों की सप्लाई से लेकर भारत के सबसे बड़े शराब कारोबारी बनने तक के सफर की कहानी है। 

जानकारी के मुताबिक ब्रिटिश फौज को सस्ती बीयर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 1855 में एडवर्ड डायर ने हिमाचल प्रदेश के कसौली में एशिया की सबसे पहली ब्रूअरी स्थापित की। इसको  'डायर ब्रूअरी' नाम दिया गया।  यहां एशिया की सबसे पहली बीयर 'लॉयन' बनाई जाती थी। यह बीयर इतनी पसंद की गई कि यह धीरे धीरे उस दौर की शाही दावतों का हिस्सा बन गई । 

‘लॉयन’ की सफलता से उत्साहित 'डायर ब्रूअरी' ने कसौली के करीब एवं हिमाचल प्रदेश के ही सोलन में 1920 में शराब बनाने के लिए दूसरा कारखाना स्थापित किया। यह ब्रूअरी ब्रिटिश उद्योगपति एच जी मीकिन के साथ साझेदारी में स्थापित की गई थी इसलिए इसका नाम डायर मीकिन ब्रूअरी रखा गया। इन दोनों शराब कारखानों के संस्थापक एडवर्ड अब्राहम डायर थे जो जनरल डायर के नाम से कुख्यात ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर के पिता थे। 


दरअसल, इस इलाके का पानी और उसका स्वाद कुछ खास है और शराब उत्पादन के लिए बहुमूल्य भी। अंग्रेज व्यवसायियों डायर और मीकिन को भी शायद यह जानकारी थी इसलिए उन्होंने इस जिले को बीयर एवं शराब बनाने के चुना । बताया जाता है कि यह पानी करोल पर्वत से बहकर नीचे को आता है। करोल पर्वत को करोल टिब्बा भी कहा जाता है। यह हिमाचल प्रदेश के सोलन शहर की सबसे ऊंची चोटी है, जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 7,349 फीट है।

उधर, जब देश में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष ने जोर पकड़ा तो आजादी की लड़ाई का असर मौजूदा हिमाचल प्रदेश में भी दिखने लगा इसलिए अंग्रेजों की रुचि इन कारखानों में घटने लगी और 1947 में भारत के स्वतंत्र होते ही डायर और मीकिन के परिजनों ने कसौली तथा सोलन के कारखानों से पल्ला झाड़ लिया। उस दौर में एक भारतीय व्यवसायी नरेंद्र नाथ मोहन भी थे जो स्क्रैप और खाली बोतलों का व्यापार करते थे। करोल पर्वत के पानी की खासियत नरेंद्र नाथ मोहन भी बखूबी जानते थे और वे भी शराब कारोबार में उतरना चाहते थे।


इसलिए, जब नरेंद्र नाथ मोहन को पता चला कि अंग्रेज इन शराब कारखानों को बेचना चाहते हैं तो उन्होंने खरीदने में ज़रा भी देर नहीं की। देश के स्वतंत्र होते ही, दो साल के भीतर 1949 में नरेंद्र नाथ मोहन ने अंग्रेजों से डायर मीकिन ब्रूअरी खरीद ली। 1966 में इसका नाम बदलकर मोहन मीकिन लिमिटेड कर दिया गया। मोहन मीकिन आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। फुटबॉल की इसी नाम की टीम बहुत मशहूर रही है। कंपनी का कारोबार अब केवल शराब तक सीमित नहीं है। यह फलों के जूस, ब्रेकफास्ट सीरियल्स और मिनरल वाटर जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भी सक्रिय है।

नरेंद्र नाथ मोहन के निधन के बाद उनके बेटे कर्नल वेद रतन मोहन ने कंपनी को आधुनिक रूप दिया। 1950 के दशक में उन्होंने नई दिल्ली और गाजियाबाद में नई यूनिटें शुरू की और इसी दौर में 'ओल्ड मंक' का जन्म हुआ। आधिकारिक तौर पर इसे 19 दिसंबर 1954 को लॉन्च किया गया था। बताया जाता है कि वेद रतन मोहन ब्लैक मॉन्क्स (बेनेडिक्टिन मॉन्क्स) की सादगी और अनुशासन से बहुत प्रभावित थे इसलिए उन्होंने रम के अपने नए ब्रांड का नाम 'ओल्ड मंक' रखा।  ऐसा कहा जाता है कि इसका नाम उन भिक्षुओं से प्रेरित है, जो अपनी गुफाओं में शराब को लंबे समय तक सहेज कर रखते थे।

वेद रतन मोहन के निधन के बाद उनके भाई ब्रिगेडियर कपिल मोहन ने कंपनी की कमान संभाली। वे प्रादेशिक सेना में ब्रिगेडियर थे। ब्रिगेडियर कपिल मोहन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने 'ओल्ड मंक' का कभी विज्ञापन नहीं किया। उनका मानना था कि उत्पाद की गुणवत्ता ही उसका सबसे बड़ा विज्ञापन है। ब्रिगेडियर कपिल मोहन ने लगभग 40 वर्षों तक कंपनी का नेतृत्व किया और इसे वैश्विक पहचान दिलाई। 


हालांकि 'ओल्ड मंक' को उनके भाई वेद रतन मोहन ने लॉन्च किया था, लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध करने का श्रेय ब्रिगेडियर कपिल मोहन को जाता है। उनके नेतृत्व में यह दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बिकने वाली रम बनी। मजेदार तथ्य यह भी है कि पूरी दुनिया को रम पिलाने वाले कपिल मोहन खुद चाय प्रेमी थे। उन्होंने कभी शराब को हाथ नहीं लगाया। वे समाज सेवा में भी काफी सक्रिय रहे और सोलन में बना अनूठा मोहन मीकिन विरासत पार्क कपिल मोहन की ही कल्पना का प्रतिबिंब है।

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

क्या है प्री 42, सेटलर और 10 इयर्स की कहानी..!!


प्री 42, सेटलर, 10 इयर्स और 2003/04 को पढ़कर आपके दिमाग में क्या आ रहा है? यही न, की यह कोई गणितीय पहेली है लेकिन हकीकत यह है कि यह कोई गणित का जोड़ घटाना नहीं बल्कि सुविधाएं प्रदान करने की सीमा है। वैसे, इन संख्याओं को देखकर मुझे भोपाल के बस स्टॉप की याद जरूर आ गई क्योंकि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में बस स्टॉप के नाम नहीं बल्कि नंबर हैं। यहां 6 नंबर, 7 नंबर, 10 नंबर, 11 नंबर जैसे दसियों बस स्टॉफ हैं । अब तो बस स्टॉप के नामों की संख्या पौने छह, सवा छह और साढ़े छह तक पहुंच गई है। 
खैर, अभी बात इस लेख में दी गई संख्याओं की करते हैं। आमतौर पर देश में आरक्षण या सुविधाएं देने के लिए आबादी, अनुसूचित जाति या जनजाति जैसे अलग अलग आधारों का सहारा लिया जाता है लेकिन हमारे देश में एक राज्य ऐसा भी है जहां लोगों को सुविधाएं या सुविधाओं में आरक्षण प्रदान करने के लिए वर्ष को आधार बनाया गया है। यह है अंडमान और निकोबार द्वीप समूह..जहां  स्थानीय लोगों को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए वर्ष मुख्य आधार है।


मुझे लगता है कि अब आप शायद बात को कुछ कुछ समझने लगे होंगे। फिर भी और सहज भाषा में समझे तो प्री 42, सेटलर या इसी तरह के अन्य आधार यहां मूल निवासी तय करने के लिए निर्धारित किए गए हैं। जो जितना पुराना होगा उसे मूल निवासी के हिसाब से उतनी ज्यादा सुविधाएं मिलेंगी। दरअसल,अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत का एक अनोखा संघ राज्य क्षेत्र है, जहाँ करीब 836 द्वीपों में से मात्र 31 पर ही मानव बसावट है। इससे भी उल्लेखनीय बात यह है कि यहां सरकार को अन्य राज्यों से लोगों को लाकर बसाना पड़ा है। इसी बसाहट ने यहां नंबर प्रणाली को जन्म दे दिया। 

सबसे पहले बात प्री-42 की…यह नाम अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 1942 से पहले के बसने वालों और उनके वंशजों को दिया गया है। इसका मतलब यह है कि ऐसे लोग जो इस द्वीप समूह में मार्च 1942 में जापानी कब्जे से पहले यहाँ रहते थे। ये इन द्वीपों के गैर-आदिवासी मूल निवासी माने जाते हैं, जिन्हें लोकल बोर्न या आइलैंड ओरिजिन भी कहा जाता है। प्री-42 समुदाय ब्रिटिश उपनिवेशवाद, काला पानी की सजा, विश्व युद्ध और भारत की स्वतंत्रता सहित तमाम ऐतिहासिक बदलावों का साक्षी है।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक प्री-42 समुदाय के पूर्वज मुख्य रूप से 1858 के बाद ब्रिटिश काल में अंडमान आए थे या लाए गए थे। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार ने अंडमान के द्वीपों को दंडात्मक बस्ती का रूप दे दिया । क्रांतिकारियों के साथ साथ कैदियों, सिपाहियों, मजदूरों, किसानों, शिक्षकों और प्रशासनिक कर्मचारियों को सहयोग के लिए यहाँ भेजा गया। इनमें बड़ी संख्या में बंगाल, बिहार, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे इलाकों के लोग शामिल थे । अधिकांश  लोग जबरन यहां लाए या भेजे गए थे । इन लोगों ने सब कुछ भुलाकर 1858 से 1942 तक इन द्वीपों को बसाने, खेती करने और प्रशासन चलाने में जुट गए । 


कुछ इतिहासकारों के अनुसार, प्री-42 समुदाय के सदस्यों ने तो चोल साम्राज्य के दौर को भी देखा है। वैसे, तथ्य यही बताते हैं कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सबसे पुराना इतिहास आदिवासियों का ही है और यह भी हज़ारों साल पुराना है । यहाँ मुख्य रूप से 6 जनजातियाँ निवास करती हैं, जिन्हें अंडमानी (नेग्रिटो समूह) और निकोबारी (मंगोलॉयड समूह) में बांटा गया है। वे पारंपरिक रूप से शिकार, मछली पकड़ने एवं जंगलों पर निर्भर हैं। अंडमान समूह में जारवा, सेंटिनलीज़, ओंगे और ग्रेट अंडमानी शामिल हैं जबकि निकोबार समूह में निकोबारी और शोम्पेन आदिवासी शामिल हैं। इनमें  खासतौर पर सेंटिनलीज़ और जारवा बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह कटे हुए हैं, जबकि ओंगे और महान अंडमानी आंशिक रूप से संपर्क में हैं। माना जाता है कि अंडमान के आदिवासी लगभग 60,000 साल पहले अफ्रीका से प्रवास करके यहां आए थे।

लेकिन, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थायी बसावट ब्रिटिश काल से ही शुरू हुई। 1942 में जापानी सेना ने अंडमान-निकोबार पर कब्जा कर लिया। प्री-42 परिवारों ने इस काल में भारी कीमत चुकाई । कई लोगों ने अपनी जान गँवाई, परिवार बिखरे और अत्याचार सहन करने पड़े। 1945 में जापान की हार के बाद फिर ब्रिटिश वापस आए लेकिन इन लोगों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया। स्वतंत्रता के बाद 1947 से जरूर इन द्वीपों का स्वरूप बदलना शुरू हुआ ।

इनके बाद आता है सेटलर का नंबर। दरअसल, स्वतंत्रता के बाद सरकार ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के विभिन्न द्वीपों की आबादी बढ़ाने और खेती किसानी को बढ़ावा देने के लिए ‘सेटलर स्कीम’ चलाई। इसके अंतर्गत तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में लोगों को यहां लाया गया । इन नए बसने वाले लोगों को भूमि, सरकारी नौकरियाँ और व्यापारिक अवसर दिए गए। इसी तरह 10 ईयर की श्रेणी उन लोगों की है जो सेटलर के बाद यहां आए।  सबसे आखिरी श्रेणी में वे लोग शामिल हैं जो 2003/4 में यहां आकर बसे हैं।


हालांकि, अब जनसंख्या बढ़ने और विभिन्न राज्यों के लोगों की मौजूदगी के कारण अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भी अन्य राज्यों की तरह हो गए हैं। लेकिन एक सबसे बड़ा फर्क आज भी है..वह यह कि यह द्वीप समूह चारों ओर से समुद्र से घिरा है। यह इतना बड़ा फर्क है कि यह मैदानी राज्यों एवं यहां के द्वीपों में अंतर कम ही नहीं होने देता। यहां जरूरत की अधिकतर चीजें तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे अन्य मैदानी राज्यों से आती हैं इसलिए उनकी उपलब्धता एवं कीमत में भी फर्क साफ दिखाई देता है। यहां बाह्य संपर्क के लिए हवाई और जलमार्ग जैसे बस दो ही साधन हैं। हमारे राज्यों की तरह रेल या बस सेवा नहीं है। कुल मिलाकर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण हमारे सामान्य मैदानी राज्यों से अलग है और इसका असर यहां हर क्षेत्र में दिखाई पड़ता है।

#Andman #अंडमान #Sealife #PortBlair 

#Sea 


शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

अबोलेपन से परिवारों में बढ़ता अलगाव..!!


तकनीक ने हमारे जीवन को सहज बनाने के साथ-साथ जटिल भी बना दिया है। इसका सबसे ज्यादा असर मां-बाप और बच्चों के बीच के रिश्ते पर पड़ रहा है और परिवार एक अनजानी दूरी का शिकार हो रहे हैं । यह दूरी केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक अधिक है। अविश्वास, अबोलापन और संवाद की कमी ने इस परिवारों के करीबी रिश्तों को कहीं न कहीं खोखला करना शुरू कर दिया है। 

चिंता की बात यह है कि मां-बाप और बच्चों के बीच अविश्वास की जड़ें आमतौर पर छोटी-छोटी गलतफहमियों से शुरू होती हैं। आज के बच्चे डिजिटल दुनिया में पल रहे हैं, जहां उनकी निजता और डिजिटल स्वतंत्रता उनके लिए सर्वोपरि है। दूसरी ओर, पारंपरिक मूल्यों और अनुभवों से निर्देशित माता पिता अपने बच्चों की इस नई दुनिया को पूरी तरह समझ नहीं पाते। नतीजा यह होता है कि बच्चे अपनी बातें खुलकर साझा नहीं कर पाते हैं और माता-पिता को लगता है कि बच्चे उनसे कुछ छिपा रहे हैं। यह आगे चलकर अविश्वास का एक दुष्चक्र बन जाता है।

मसलन, एक किशोर जो अपने दोस्तों के साथ सोशल मीडिया पर घंटों समय बिताता है, वह माता-पिता की नजर में गलत संगत में पड़ सकता है। माता-पिता की बार-बार पूछताछ या ताक झांक बच्चे को खुद में और अधिक समेट देती है। वह सोचता है कि मां बाप उसे समझते ही नहीं हैं! जबकि, माता-पिता को लगता है कि उनका लाडला बच्चा भटक रहा है। इस तरह, अविश्वास की यह छोटी सी चिंगारी धीरे-धीरे रिश्ते में एक बड़ी खाई बन जाती है।

अविश्वास के साथ-साथ अबोलापन भी इस समय एक बड़ा मुद्दा है। पहले, परिवार एक साथ बैठकर भोजन करते थे, गपशप करते थे और एक-दूसरे की जिंदगी का हिस्सा बनते थे। लेकिन आज, मोबाइल फोन, ईयर फोन, बड्स, लैपटॉप और हेडफोन ने परिवार के बीच की बातचीत को लगभग खत्म कर दिया है। बच्चे अपनी दुनिया में खोए रहते हैं, और माता-पिता अपनी.. या फिर वे अपने काम में व्यस्त रहते हैं। कई बार वे बच्चों की इस आधुनिकता के साथ तालमेल बिठाने में असमर्थ हो जाते हैं।

यह अबोलापन केवल शब्दों की कमी नहीं है, बल्कि भावनाओं के आदान-प्रदान की कमी भी बन रहा है। एक मां जो अपने बेटे से पूछती है कि आज स्कूल में क्या हुआ? और जवाब में केवल कुछ नहीं सुनती है तो वह भी धीरे-धीरे पूछना बंद कर देती है। इधर, बच्चा सोचता है कि माता-पिता को उसकी जिंदगी में कोई दिलचस्पी नहीं है। समय के साथ दोनों पक्ष खामोशी की इस दीवार को और ऊंचा करते जाते हैं।

संवाद की यह कमी वह गहरी खाई है जो अविश्वास और अबोलापन को लगातार गहरा करती जाती है। हम सभी जानते हैं कि संवाद केवल बातचीत नहीं है बल्कि यह परिवार में एक-दूसरे को समझने, उनकी भावनाओं को महसूस करने और उनके दृष्टिकोण को स्वीकार करने की कला है। आज के समय में, माता-पिता और बच्चे एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दो अलग-अलग दुनियाओं में जीते हैं। यह संवादहीनता कई बार पीढ़ीगत अंतर के कारण भी बढ़ती जाती है क्योंकि माता-पिता अपने अनुभवों के आधार पर बच्चों को सलाह देते हैं, जो आज की डिजिटल और वैश्विक दुनिया में शायद उतने प्रासंगिक नहीं लगते। उधर, बच्चे चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए, न कि उनकी गलतियों पर लंबा व्याख्यान दिया जाए। 

इस अंतर को पाटने के लिए दोनों पक्षों को एक-दूसरे की ओर कदम बढ़ाने की जरूरत है। बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार अपनाकर भी इस दूरी को पाट सकते हैं । जैसे बच्चों की बातों को बिना आलोचना किए सुनना चाहिए। बच्चों के पसंदीदा गेम या सोशल मीडिया ट्रेंड के बारे में बात करके भी उनके करीब आया जा सकता है। इसी तरह खासतौर पर माता-पिता को यह समझना होगा कि आज की पीढ़ी का दबाव और चुनौतियां उनकी पीढ़ी से बिल्कुल अलग हैं। साथ ही, उन्हें अपने बच्चों को भी यह समझाना पड़ेगा कि उनकी चिंता का कारण प्रेम है, न कि नियंत्रण की इच्छा।

इसके अलावा, अभिभावकों को हर दिन कुछ समय ऐसा समय नियत करना चाहिए जब पूरा परिवार एक साथ बिना किसी डिजिटल हस्तक्षेप के समय बिताए। यह समय खाने की मेज पर, पार्क में सैर करते हुए या कोई भी साझा गतिविधि हो सकती है। इसके माध्यम से माता-पिता को अपने व्यवहार से यह दिखाना होगा कि वे बच्चों पर पूरा भरोसा करते हैं, ताकि बच्चे अपनी बातें खुलकर साझा करें।

किसी भी परिवार में परस्पर रिश्ता विश्वास, प्रेम और संवाद की नींव पर टिका होता है। अविश्वास, अबोलापन और संवाद की कमी इस नींव को कमजोर कर सकती है, लेकिन इसे ठीक करना असंभव नहीं है। बस, यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें दोनों पक्षों को धैर्य, समझ और प्रेम के साथ आगे बढ़ना होगा।

#Family #परिवार #मोबाइल #Mobile #Technology 


शनिवार, 28 मार्च 2026

शेखचिल्ली: हास्य कथाओं का नायक या आध्यात्मिक गुरु..!!


…जैसे ही कोई हमारे बीच लंबी चौड़ी हांकने की कोशिश करता है, तो हम तुरंत कह देते हैं न कि शेख चिल्ली मत बनो। आमतौर, शेख चिल्ली की छवि एक मजाकिया, भोले भाले, अनपढ़ और ख्यालीपुलाव पकाने वाले किरदार की है। शेखचिल्ली पर केंद्रित न जाने कितनी ऐसी कहानियां और मुहावरे प्रचलित हैं जिनमें उसे बढ़ चढ़कर सोचने वाला या ख्यालीपुलाव पकाने वाला बताया गया है।

एक कहानी में शेख चिल्ली को उसकी माँ दही बेचने बाज़ार भेजती है। रास्ते में दही का कटोरा सिर पर रखे चलते हुए वह सोचता है कि दही बिकेगा तो पैसे आएँगे, इन पैसों से मैं पहले बकरियाँ खरीदूँगा, फिर बकरियाँ बच्चे देंगी, बकरी का दूध बेचकर भेड़ खरीद लूंगा और फिर ऊन बेचूँगा। जब ज्यादा पैसा जमा हो जाएगा तो घोड़ा खरीद लूंगा और फिर घोड़े पर सवार होकर निकलूँगा तो राजकुमारी मुझ पर फिदा हो जाएगी और फिर हमारी शादी हो जाएगी। शादी के बाद बच्चे होंगे लेकिन यदि बच्चे शैतानी करेंगे तो मैं डाँटूँगा भी और मारूंगा भी... बस, फिर क्या था सोचते हुए शेखचिल्ली बच्चों को मारने लगता है और कटोरा गिर जाता है और सारा दही फैल जाता है । खाली हाथ घर लौटने पर माँ पूछती है कि दही कहाँ है? तो शेख चिल्ली जवाब देता है कि माँ, मेरे बच्चे शैतानी कर रहे थे एवं मैं उन्हें डाँट रहा था..।


इसी तरह, एक और कहानी आपने भी सुनी होगी कि एक बार किसी ने शेख चिल्ली को सलाह दी कि अमीर बनना है तो कोई व्यापार करो । सलाह मानकर शेख चिल्ली अपनी जमापूंजी से एक टोकरा अंडे लेकर बाजार चल पड़ता है। आदत के मुताबिक वह रास्ते में सोचने लगता है कि अंडे बेचूँगा और फिर मिले पैसों से मुर्गियाँ खरीदूँगा। मुर्गियाँ अंडे देंगी तो फिर और मुर्गियाँ खरीद लूंगा। लेकिन, मुर्गियां दड़बों से निकलकर भागने लगी तो मुझे ही पकड़ना पड़ेगा। वह अपनी कल्पना में इतना खोया रहता है कि ख्याली मुर्गियों को पकड़ने के लिए टोकरा सिर से नीचे पटक देता है और सारे अंडे टूट गए। पास से गुजर रहे लोग चिंता करते हुए कहते हैं कि शेख साहब, आपके सारे अंडे टूट गए तो शेख चिल्ली उत्तर देता है कि अरे कोई बात नहीं, मुर्गियाँ तो बच गईं न। 


शेखचिल्ली को लेकर ऐसे ही कई किस्से कहानियां जन मानस में प्रचलित हैं लेकिन हम आज एक और शेख चिल्ली की बात कर रहे हैं। जो स्वभाव में इस शेखचिल्ली से अलग हैं। क्या आप जानते हैं कि इसी नाम के एक सूफी संत भी हुए हैं और उनके मकबरे को आज ‘कुरुक्षेत्र के ताजमहल’ के रूप जाना जाता है। अब इन दोनों शेख चिल्ली के बीच कोई संबंध है या ये दोनों एक ही व्यक्ति हैं या अलग अलग...यह शोध का विषय हो सकता है। वैसे इनके बीच अंतर्संबंध तलाशने की जुगत में हमने गूगल गुरु और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भी मदद ली लेकिन वे भी कोई सीधा या कोई सॉलिड संबंध नहीं तलाश पाए । 


वैसे, स्थानीय तौर पर इन दोनों की कहानियां कहीं कहीं परस्पर जुड़ती और कहीं अलग नज़र आती हैं। जहां तक, सूफी संत शेख चिल्ली की बात है तो उनके बारे में जरूर कुछ आधिकारिक जानकारी मिलती है और वह भी सीधे भारतीय पुरातत्व विभाग से। कुरुक्षेत्र के थानेश्वर में सूफी संत शेख चिल्ली के मकबरे में लगे बोर्ड में बताया गया है कि यह सुन्दर मकबरा सूफी सन्त अब्द-उर-रहीम उर्फ अब्द-उर-करीम से सम्बन्धित है। जिन्हें शेख चिल्ली के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये मुगल शहजादे दारा शिकोह (1650 ईस्वी) के धार्मिक गुरु थे। 


आपको यह भी बता दें कि थानेसर वही स्थान है जहां महाभारत का युद्ध हुआ था। दरअसल, इसी शेखचिल्ली के मकबरे के परिसर में पुरातत्व संग्रहालय है और यहां दर्ज आधिकारिक जानकारी के मुताबिक: पौराणिक मान्यता के अनुसार यह क्षेत्र महाभारत युद्ध का प्रमुख स्थल है । थानेसर (प्राचीन स्थाणेश्वर) एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक नगर है, जो वर्धन या पुष्यभूति वंश के प्रमुख राजा हर्षवर्धन के राज्य की राजधानी थी, जिसने उत्तर भारत के अधिकांश भू-भाग पर 606-647 ईस्वी सदी के मध्य शासन किया था । संस्कृत कवि बाणभट्ट ने अपने ग्रन्थ "हर्षचरित" में हर्षवर्धन एवं उसके थानेसर के साथ सम्बन्धों पर विस्तारपूर्वक विवरण दिया है। सन् 634 ई. में चीनी यात्री हेनसांग ने भी थानेसर की यात्रा की । उसने यहाँ अनेक हिन्दू मंदिरों तथा कई बौद्ध विहारों को देखा था । थानेसर एवं कुरूक्षेत्र का वर्णन अल्बरुनी द्वारा रचित "किताब- उल-हिन्द" में भी मिलता है जो कि गजनी के सुल्तान महमूद के साथ भारत आया था और जिसने अक्तूबर 1014 ईस्वी में थानेसर पर आक्रमण किया। यहीं पर सन् 1759 ईस्वी में मराठा सैनिकों ने अफगानों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया।

एक अष्टभुजी चबूतरे पर निर्मित यह मकबरा हल्के पीले बलुवे प्रस्तर से निर्मित है। जिसका प्रवेश दक्षिण की ओर से है तथा इसका नाशपातीनुमा गुम्बद सफेद संगमरमर से बना है। मकबरे के प्रत्येक प्रवेश द्वार में मेहराब बने हैं जो संगमरमर की जालियों से सुसज्जित हैं। छत के चारों दिशाओं में बाहर की ओर छतरियां बनी हैं जिनके गुम्बद पर हरे, नीले पीले एवं जामुनी रंग की चमकदार टाइल्स से निर्मित विभिन्न प्रकार की ज्यामितिय आकृतियां देखी जा सकती हैं।

सन्त शेखचिल्ली की समाधि भी अष्टभुजी कक्ष के मध्य निर्मित है, जबकि वास्तविक कब्र उसके ठीक नीचे के कक्ष में बनी है जिसका प्रवेश द्वार मदरसे के एक संकरे गलियारे से हो कर जाता है। छत के पश्चिमी भाग में बलुवा प्रस्तर से निर्मित एक अन्य मकबरा है जिसका बेलनाकार गुम्बद सफेद संगमरमर से सजा हुआ है। इसे शेख की पत्नी से सम्बन्धित माना जाता है। भू-सतह में मदरसे के प्रत्येक और नौ-नौ मेहराब बने हैं तथा दालान के मध्य एक वर्गाकार जलाशय निर्मित हैं। 


मदरसे के बाहरी और दक्षिण-पश्चिम किनारे पर लाल बलुआ प्रस्तर से निर्मित 'पत्थर मस्जिद' हैं जिसकी छत चार अलंकृत स्तम्भों तथा छह अर्ध-स्तम्भों पर टिका है । वास्तु शिल्पीय विशेषताओं के आधार पर इस पत्थर मस्जिद को पूर्व तुगलक काल से सम्बन्धित माना गया है। ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह स्मारक भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। वैसे, सूफी संत शेख चिल्ली के बारे  कहीं यह भी पढ़ने को मिला कि वे शायद बलूचिस्तान से भारत आए थे। 

खैर, शेख चिल्ली की हकीकत जो भी हो लेकिन मौजूदा सच्चाई यह है कि उनका मकबरा हरियाणा के कुरुक्षेत्र के थानेश्वर इलाके में है और यह मुगलकालीन वास्तुकला का नमूना है। इसे देखने के लिए भारतीय पर्यटकों को 20 रुपए और विदेशी नागरिकों को 250 रुपए प्रवेश शुल्क देना पड़ता है। बहरहाल, हो सकता है कि दोनों शेख चिल्ली एक ही हों लेकिन उनके विविध व्यक्तित्व उन्हें अलग अलग व्यक्ति बनाते हैं जैसे एक हंसोड़, मजाकिया और हास्य कथाओं का नायक है जबकि दूसरे आध्यात्मिक गुरु।

रविवार, 22 मार्च 2026

सेल्यूलर जेल: खूबसूरत भवन की निर्मम और दर्दनाक दास्तां..!!


विशाल फूल की सात आकर्षक पंखुड़ियां कहो या घड़ी के कांटे या साइकिल के पहिए की तर्ज पर सीधी और चक्र की भांति घूमती हुई सात कतारों से बनी इमारत.. जो वास्तुकला का उत्कृष्ट एवं बेजोड़ नमूना है। न उस समय देश में इतनी आकर्षक कोई इमारत थी और न ही आज है। यह इमारत कुछ इस तरह बनी है कि यहां कभी रहने वाले छह सौ से ज्यादा लोग एक दूसरे से बात करना तो दूर परस्पर देख भी नहीं सकते थे। वे, बस अपने मन की आंखों से यह महसूस कर सकते थे कि उनके आसपास भी उनके ही जैसे लोग मौजूद हैं। लेकिन इन सैकड़ों लोगों पर नज़र रखने के लिए महज एक ही पहरेदार की जरूरत पड़ती थी और वह इमारत के बीचों बीच बैठकर सातों विंग की बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के निगरानी रखता था। 


कभी इस इमारत की खूबसूरती बढ़ाने वाली लाल ईंटे आज रक्त रंजित दिखाई पड़ती हैं। ऐसा लगता है जैसे खून से रंगी ये दीवारें चीख चीखकर निर्मम यातना के पीड़ादायक किस्से सुना रहीं हैं और इस इमारत के परिसर में मौजूद पीपल का वृक्ष इन भयावह किस्सों की गवाही दे रहा है। हम बात कर रहे हैं अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर (अब श्री विजयपुरम) में स्थित सेल्यूलर जेल की..जिसे आमतौर पर आज भी ‘काला पानी’ के रूप में जाना जाता है। 


शानदार वास्तुकला वाली सेल्यूलर जेल का निर्माण 1896 से 1906 के बीच कराया गया था। जेल के निर्माण में मुख्य रूप से कैदियों को ही मजदूर बनाकर शोषण किया गया था। इसके निर्माण के लिए ईंटें बर्मा (अब म्यांमार) से और लोहे का सामान ब्रिटेन से मंगाया गया था। बताया जाता है कि उस समय इस जेल को बनाने में 5 लाख 17 हजार 352 रुपये का खर्च आया था। इस जेल की कुल सात विंग में प्रत्येक में तीन मंज़िलें थीं और कुल मिलाकर 693 काल कोठरियाँ थीं। हर कोठरी का आकार एक समान था और उसमें हवा और प्रकाश के लिए केवल एक छोटी सी खिड़की थी। इन कोठरियों को इस प्रकार बनाया गया था कि एक कैदी दूसरे कैदी को देख या सुन न सके और न ही बाहर का कोई दृश्य उन्हें दिखाई दे..वे बस जेल की दीवारों के बीच घुटते रहे । जेल की इस संरचना का उद्देश्य कैदियों को मानसिक रूप से तोड़ना था।

सेल्यूलर जेल के नाम को लेकर विभिन्न स्त्रोत एवं स्थानीय गाइड अलग-अलग कहानियां बताते हैं। सबसे पुख्ता कहानी यह है कि जेल एक ही आकार प्रकार के अलग अलग सेल (छोटे कमरों) से मिलकर बनी है इसलिए इसे सेल्यूलर जेल नाम मिला। इसी तरह, बताते हैं कि काला पानी वास्तव में पहले ‘काल पानी’ कहा जाता था मतलब ऐसा पानी जहां काल (मृत्यु) तय है लेकिन समय के साथ यह बदलकर काला पानी हो गया। यह बात इसलिए भी सही लगती है क्योंकि अंडमान के चारों ओर फैला समंदर खूबसूरत नीली-हरी आभा लिए है। यदि समंदर के रंग से नाम रखा जाता तो इसका नाम नीला पानी/हरा पानी जैसा कुछ होता, इसलिए काल पानी वाली बात ज्यादा सही लगती है।



जब, हम सेल्यूलर जेल के मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करते हैं तो यह महज दर्शनीय स्थल की यात्रा नहीं होती बल्कि सैकड़ों दर्द भरी आंखों, हजारों तड़पते परिवारों, इंसानी चीखों, ज़ुल्म की इंतहा तथा अंग्रेजों की खौफनाक सजा से रूबरू होने की यात्रा है…और इतने ज़ुल्म-ओ-सितम के बाद भी मातृभूमि की आजादी के लिए मर मिटने वालों के जज्बे से साक्षात्कार करने का अवसर है। कभी स्वतंत्रता सेनानियों की तड़प एवं वंदे मातरम् जैसे नारों से दहल जाने वाली यहां की दीवारें अब मौन रहकर भी हकीकत बयां करती हैं। अब यह आप पर है कि आप उनसे रिसते दर्द को कितना महसूस कर पाते हैं।


यह केवल एक जेल नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की वह कठोर दंड व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य भारतीय क्रांतिकारियों के मनोबल को तोड़ना था। शायद, अंग्रेजों को भी यह अंदेशा नहीं था कि यह जेल आगे चलकर स्वतंत्रता के संघर्ष का प्रतीक बन जाएगी एवं भविष्य में राष्ट्रीय स्मारक। दस्तावेजों के मुताबिक इस जेल के पोर्ट ब्लेयर में निर्माण का आधिकारिक आदेश 13 सितंबर 1893 को जारी किया गया था। 

इस निर्णय के पीछे ब्रिटिश हुकूमत का मकसद ही यही था कि भारत से बाहर तथा समुद्र से चारों ओर घिरे इन द्वीपों से भागना असंभव था और एकाकीपन के कारण क्रांतिकारियों एवं राजनीतिक बंदियों को भावनात्मक रूप से तोड़ना आसान था लेकिन गोरी सरकार का यह दांव उल्टा पड़ गया। सेल्यूलर जेल स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों का तीर्थ बन गई। इस जेल में भारत के अनेक महान क्रांतिकारियों और राजनीतिक बंदियों को सजा के लिए लाया गया एवं उन्हें अत्यंत अमानवीय यातनाएँ दी जाती थीं। कैदियों से नारियल से तेल निकालने के लिए भारी कोल्हू चलवाया जाता था। उनसे जानवरों से कई गुना अधिक श्रम और छोटी-छोटी बातों पर कठोर दंड के साथ साथ उन्हें भोजन तक नसीब नहीं होता था। कई कैदियों को तो बेड़ियों में जकड़ कर रखा जाता था और फिर भी कठोर परिश्रम से रियायत नहीं दी जाती थी।

भारत की स्वतंत्रता के बाद सेल्यूलर जेल को एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया। 11 फरवरी 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई ने इसे आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया। इसका उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और पीड़ा को सम्मान देना था। अब इस इमारत की सात में से साढ़े तीन विंग ही सुरक्षित बची हैं। कुछ विंग समय के साथ ढह गईं और कुछ विंग के स्थान पर सरकार ने स्थानीय लोगों के लिए सर्व सुविधायुक्त अस्पताल बना दिया है।

यहां अब प्रतिदिन शाम को होने वाला लाइट एंड साउंड शो पर्यटकों के लिए एक बेहद भावनात्मक अनुभव है। अंधेरे में जब जेल की दीवारों पर रोशनी पड़ती है और एक गहरी आवाज़ इतिहास में दफन दर्द की कहानी सुनाना शुरू करती है, तो लगता है जैसे जेल की दीवारें स्वयं बोल उठी हों। यहां स्थित पीपल का पेड़ इस कार्यक्रम में सूत्रधार बनकर क्रांतिकारियों पर अत्याचार की कहानी सुनाता है तो दर्शकों की आँखें नम हो जाती हैं। गाइड बताते हैं कि पुराना पीपल का पेड़ तो अब नहीं है लेकिन उसकी जगह रोपा गया नया पेड़ भी यहां के चप्पे चप्पे की यातना को बखूबी बयान करता है।


आज यहाँ आने वाले पर्यटक पीपल के पेड़, यातना कक्ष, फांसी घर, स्वातंत्र्य ज्योत, शहीद स्मारक, संग्रहालय और अन्य निशानियों के जरिए उस दौर के क्रूरतम इतिहास को करीब से महसूस करते हैं, जिसने सब कुछ सहते हुए भी भारत की आज़ादी की नींव मजबूत की। सही मायनों में, सेल्यूलर जेल केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं है, बल्कि यह उन हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान की जीवंत कहानी है, जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अपने जीवन की परवाह नहीं की।

जब हम इस ऐतिहासिक स्थल की कोठरियों के बीच से गुजरते हैं, तो एहसास होता है कि आज जिस स्वतंत्र वातावरण में हम सहज भाव से जी रहें हैं, उसके पीछे कितनी पीड़ा, संघर्ष,दर्द और बलिदान छिपा है। सेल्यूलर जेल भारत के स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐसी जीवंत स्मृति है, जो आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और त्याग का संदेश देती है। यह केवल हमारे अतीत की कहानी नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान की बुनियाद है और भविष्य की स्वर्णिम उपलब्धियों का आधार भी।

 

  


बुधवार, 18 मार्च 2026

सुकून के साथ सनातन संस्कृति का अनूठा संगम..!!

 


अक्षरधाम, बिड़ला मंदिर की तर्ज पर देवभूमि का मोहन शक्ति हेरिटेज पार्क..सुकून, शांति, सद्भाव और ध्यान का सर्वोत्तम स्थान। प्रकृति की गोद में पहाड़ियों से घिरा हुआ  बेहद शांत, स्वच्छ और निर्मल इलाका।

हवा में गूंजती भजन की मद्धम स्वर लहरी, चारों ओर से झांकते ऊंचे ऊंचे शिखर, धरती पर बिखरे रंग बिरंगे फूल, मनमोहक हवा और मंदिर में सभी देवी देवताओं के साथ विराजी मां दुर्गा की आकर्षक प्रतिमा। नवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।


मंदिर के द्वार पर सूर्यदेव और पूरे परिसर में तमाम दैविक कथाओं के साथ भूत, पिशाच की भी जीवंत प्रतिमाएं। जैसे मंदिर के प्रवेश द्वार पर सीढ़ियों के दोनों ओर देव और ऋषि की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। यहां भगवान शिव, विष्णु-लक्ष्मी, पंचमुखी हनुमान, शनि देव, नरसिंह अवतार आदि की मूर्तियां भी हैं। यहां तक कि परिसर के पार्क में बनी पशु पक्षी और इंसान की मूर्तियां भी इतनी जीवंत हैं, जैसे अभी बोल पड़ेंगी। आप जहां भी नजर दौड़ाएंगे आपको ऐसी अनेक प्रतिमाएं नजर आती हैं ।


इस राष्ट्रीय धरोहर पार्क में बनी तमाम मूर्तियां ओडिशा, पश्चिम बंगाल और राजस्थान के मूर्तिकारों की कला से जीवंत हुई हैं।  इस मंदिर सह पार्क का निर्माण भी किसी साधना से कम नहीं था क्योंकि इस पार्क को पूरा होने में 12 साल लग गए। जानकारी के मुताबिक यहां 108 देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। इस परिसर के निर्माण पर लगभग 100 करोड़ रुपये की लागत आई है।

यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित है और इसे मोहन शक्ति राष्ट्रीय धरोहर पार्क के नाम से जाना जाता है। इस पार्क का शिलान्यास पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी ने 1 दिसंबर 2002 को किया था। सोलन से लगभग 15 किमी और कालका-शिमला हाईवे से 7 किमी दूर हरठ में स्थित 40 एकड़ में फैले इस पार्क को मोहन मीकिन्स लिमिटेड ने बनवाया है। यह कंपनी के मालिक ब्रिगेडियर कपिल मोहन का ड्रीम प्रोजेक्ट बताया जाता है।


इसे उत्तर भारत का पहला ऐसा हेरिटेज पार्क कहा जाता है जो वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति को प्रदर्शित करता है। यह नई पीढ़ी को सनातन संस्कृति के बहुआयामी पहलुओं से भी रूबरू कराता है। यह पार्क भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पहचान का उत्सव तो है ही, साथ ही कला, संस्कृति और वास्तुकला का अनूठा संगम भी है।

पार्क की सबसे अच्छी विशेषताओं में साफ सफाई, हरियाली, विशाल पार्किंग, आधुनिक प्रसाधन सुविधाएं, सुरक्षा व्यवस्था और सुरम्य वातावरण भी  शामिल हैं । पार्क में प्रवेश करते ही हम इसके शांत और सुकून भरी वातावरण से मंत्रमुग्ध हो जाएंगे। पार्क का विशाल भूभाग सोच-समझकर डिजाइन किया गया है और इसे विभिन्न पारंपरिक कलाकृतियों से सजाया गया है, जो आध्यात्मिक अनुभव के लिए एक शांत वातावरण का निर्माण करता है। यदि कभी यहां से गुजरें तो मोहन शक्तिपीठ हैरिटेज पार्क आपके रुकने के लिए बेहतरीन विकल्प हो सकता है।




रविवार, 15 मार्च 2026

जांबाजों की वीरता का साक्षी है मिनी इंडिया गेट..!!


हम इसे ‘मिनी इंडिया गेट’ कह सकते हैं..छोटा इंडिया गेट लेकिन महत्व के मामले में जरा भी पीछे नहीं..बस, आकार प्रकार, डिजाइन और शहीदों के दर्ज नामों की संख्या के लिहाज से हम इसे मिनी इंडिया गेट कह रहे हैं। वैसे, इसका वास्तविक नाम ‘घंटाघर’ है जिसे ‘क्लॉक टॉवर’ के नाम से भी जाना जाता है। देश का गौरव इंडिया गेट राष्ट्रीय राजधानी के सबसे महत्वपूर्ण इलाके में बना है जबकि घंटाघर दिल्ली से लगभग ढाई हज़ार किलोमीटर दूर एवं चारों ओर से समुद्र से घिरे पोर्ट ब्लेयर में।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर (अब श्री विजयपुरम) के बीचों बीच बना घंटाघर यहां का एक प्रमुख ऐतिहासिक स्थल और पहचान का प्रतीक है। पीले रंग का यह स्तंभ शहर का गौरव है। खास बात यह है कि इस घंटाघर में चारों ओर चार घड़ी लगीं हैं जो किसी दौर में अलग-अलग समय क्षेत्र दिखाती थीं और दशकों से इस शहर के लोगों के समय पर काम करने का माध्यम थीं । अब रखरखाव के अभाव एवं तकनीकी जटिलताओं की वजह से घड़ियों की यह खूबी तो नहीं रही लेकिन यह स्तंभ आज भी शहर की धड़कन का अहम स्थान है।


बताया जाता है कि घंटाघर का निर्माण 1921-1922 में हुआ था। यह प्रथम विश्व युद्ध  के दौरान 1914-20 में अंडमान द्वीपों की रक्षा करने वाले भारतीय और ब्रिटिश सैनिकों की स्मृति में बनाया गया था। इस पर मिलिट्री पुलिस फोर्स, ब्रिटिश कैप्टन E B fawcett, सूबेदार मुजम्मल खान, नायक मंगत चंद, लांस नायक अली शेर और सिपाही फिरोज जैसे तमाम नाम हैं जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में अपनी जांबाजी दिखाई थी। 

यह तो हम सभी जानते हैं कि इंडिया गेट का निर्माण 1921 में शुरू होकर 1931 में पूरा हुआ था। इसे ब्रिटिश सरकार ने प्रथम विश्व युद्ध और तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध में शहीद हुए ब्रिटिश-भारतीय सेना के करीब 90,000 से अधिक सैनिकों की याद में बनवाया था। इसपर 13 हजार से अधिक सैनिकों के नाम अंकित हैं।

वैसे, पोर्ट ब्लेयर का घंटाघर अकेला नहीं है। देश भर में ऐसे कई घंटाघर है जो ऐतिहासिक व्यक्तियों और घटनाओं की स्मृति को लंबे समय तक संजोने का काम कर रहे है। मसलन हुसैनाबाद घंटाघर, लखनऊ । यह भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर है, जिसकी ऊंचाई 67 मीटर है। इसका निर्माण 1881 में लेफ्टिनेंट गवर्नर जॉर्ज कूपर के सम्मान में किया गया था। इसी तरह हिमाचल प्रदेश के मंडी का घंटाघर…यह घंटाघर 1939 में बनाया गया था और इसमें एक राजा की साज़िश और युद्ध का इतिहास छिपा है। इसी श्रृंखला में सिकंदराबाद घंटाघर, हैदराबाद भी है जो 1860 में बनाया गया था और इसकी ऊंचाई 120 फुट है। दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में भी एक घंटाघर है। यह घंटाघर 1925 में बनाया गया था और इसका डिजाइन सर एडविन लुट्येंस ने तैयार किया था।

पोर्ट ब्लेयर का घंटाघर युद्ध स्मारक होने के साथ-साथ उस समय की औपनिवेशिक वास्तुकला का एक प्रभावशाली नमूना भी है। जानकार घंटाघर की वास्तुकला को ओबिलिस्क शैली कहते हैं। यह शैली प्राचीन मिस्र से प्रेरित एक कलात्मक रूप है, जो एक ऊंचे, चार-तरफ आकृति वाले पतले पत्थर के स्तंभ को प्रदर्शित करती  है। इस शैली में स्तंभ ऊपर की ओर पतला होकर एक पिरामिड के आकार बनाता है। ये स्मारक आमतौर पर ऐतिहासिक घटनाओं की याद में निर्मित किए जाते थे। यह मिस्र में सूर्य देवता को भी प्रतिबिंबित करता है।

 घंटाघर आज के पोर्ट ब्लेयर के सबसे व्यस्त एबरडीन बाजार (Aberdeen Bazaar) के ठीक बीचों-बीच स्थित है, जहाँ से शहर की धड़कन महसूस होती है। इसके चारों ओर दुकानें, लोग, अनगिनत वाहनों की आवाजाही और भरपूर शोरगुल है लेकिन यह पीला स्मारक शांति, सुकून, ठहराव और इतिहास की अनुभूति देता है। हम जैसे तमाम पर्यटकों के लिए यह आज भी आकर्षण का केंद्र है और हर कोई इसे अपनी स्मृतियों में सहेजना चाहता है। पर्यटक न केवल यहाँ आकर कुछ देर रुकते हैं एवं फोटो लेते हैं बल्कि इसके इतिहास को जानने का प्रयास भी करते हैं।

यह घंटाघर पोर्ट ब्लेयर के बदलते समय भर का नहीं बल्कि समय के साथ बदलते इतिहास की गवाही भी देता है । एक तरफ औपनिवेशिक काल की यादें, दूसरी तरफ आजादी के बाद का नया भारत। इसलिए आप पोर्ट ब्लेयर जाएं तो एबरडीन बाजार में घूमते हुए इस मिनी इंडिया गेट यानि घंटाघर के पास जरूर रुकें क्योंकि यह स्मारक अपने अंदर सैनिकों के बलिदान, समय का प्रवाह और अंडमान की अनोखी विरासत सहित कई बड़ी कहानियां समेटे है। 





शुक्रवार, 13 मार्च 2026

सादगी और सौंदर्य का संगम हैवलॉक द्वीप


हैवलॉक आइलैंड.. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे लोकप्रिय और सुंदर द्वीप है। यह पोर्ट ब्लेयर से लगभग 60-70 किमी दूर स्थित है। यह द्वीप अपने सफेद रेत के बीच, जैसे कि प्रसिद्ध राधानगर बीच एवं काला पत्थर बीच और वाटर स्पोर्ट्स के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। 

इस द्वीप की सबसे बड़ी पहचान है राधानगर बीच। यह समुद्र तट अपनी सफेद रेत और शांत वातावरण के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।  यहाँ शाम का सूर्यास्त एक ऐसा दृश्य रचता है जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। डूबते सूरज की लालिमा जब समुद्र के पानी पर फैलती है, तो पूरा वातावरण किसी चित्र की तरह सजीव हो उठता है।

हैवलॉक द्वीप का नाम ब्रिटिश शासनकाल में हेनरी हैवलॉक के नाम पर रखा गया था। वे 1857 के विद्रोह के समय ब्रिटिश सेना के एक प्रमुख अधिकारी थे। लेकिन आजादी के बाद इस द्वीप को भारतीय स्वाधीनता संग्राम की स्मृति से जोड़ते हुए इसका नाम बदलकर स्वराज द्वीप कर दिया गया, जो स्वतंत्रता और आत्मगौरव का प्रतीक है।

इस द्वीप की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी है। यहाँ बड़े शहरों की भीड़-भाड़ नहीं, बल्कि प्रकृति की शांत ध्वनियाँ सुनाई देती हैं—लहरों की आवाज, हवा में झूमते नारियल के पेड़ों की सरसराहट और दूर-दूर तक फैली हरियाली। सुबह के समय जब सूरज की पहली किरणें समुद्र पर पड़ती हैं, तो लगता है जैसे पूरा द्वीप सुनहरी रोशनी से नहा गया हो।


हैवलॉक द्वीप अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता, निर्मल समुद्र तटों और जीवंत प्रवाल भित्तियों (Coral Reef) के लिए प्रसिद्ध है। काला पत्थर बीच का नाम इसके तट पर बिखरी बड़ी-बड़ी काली चट्टानों के कारण पड़ा है। दरअसल, सफेद रेत और नीले-हरे पानी के साथ ये प्राकृतिक काली चट्टानें एक गहरा विरोधाभास बनाती हैं। इसके अलावा, यह बीच, काला पत्थर गाँव के समीप स्थित है। इस वजह से भी इसका नाम शायद काला पत्थर हो गया ।

हैवलॉक द्वीप केवल सुंदरता ही नहीं, रोमांच का भी केंद्र है। यहाँ समुद्र के भीतर छिपी दुनिया को देखने का मौका मिलता है। रंग-बिरंगी मछलियाँ, मूंगे की चट्टानें और पारदर्शी पानी—सब मिलकर ऐसा अनुभव देते हैं जैसे कोई जादुई संसार हो।

यहाँ का एलीफेंट बीच विशेष रूप से स्कूबा डाइविंग और स्नॉर्कलिंग के लिए प्रसिद्ध है। समुद्र के भीतर उतरकर जब प्रवाल भित्तियों और जीवंत समुद्री जीवन को देखा जाता है तो एहसास होता है कि प्रकृति ने पानी के नीचे भी एक अलग ही दुनिया रच रखी है।


हैवलॉक द्वीप केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक अनुभव है—प्रकृति के करीब जाने का अनुभव, समुद्र की गहराइयों को महसूस करने का अनुभव और जीवन की भागदौड़ से दूर कुछ शांत क्षण बिताने का अनुभव।

जब कोई यात्री इस द्वीप से वापस लौटता है, तो उसके साथ केवल तस्वीरें ही नहीं, बल्कि समुद्र की लहरों की आवाज और उस शांत वातावरण की यादें भी लौटती हैं। शायद यही वजह है कि जो एक बार हैवलॉक द्वीप जाता है, उसके मन में यह जगह हमेशा के लिए बस जाती है।

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सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...