शनिवार, 23 मई 2026

क्या, अपने देखा है मोमबत्तियों का पेड़!!


कोई इसे मोमबत्तियों का पेड़ (कैंडल्स ट्री) कहता है तो किसी को इसमें गंगा घाट पर होने वाली आरती में इस्तेमाल होने वाली आरतियां नज़र आती हैं। किसी को यह क्रिसमस ट्री का गुलदस्ता लगता है और हमने इसमें दीपावली के रोशनी से जगमगाते दीपक देख लिए..। यह अपने अपने नजरिए की बात है और इसलिए यह ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’ वाले भाव से सभी अलग,अनूठा पर आकर्षक नजर आता है।

यह संभवतः इकलौता पेड़ होगा जो अपने फूलों का रस चूसने के लिए मधुमक्खियों को सिग्नल देता है और फिर यह भी बताता है कि कौन से फूल में रस बचा है और कौन फूल रसहीन हो गया है। आम लोगों के लिए पूर्ण परिपक्व वृक्ष गोवर्धन पर्वत की तरह विशाल छाते से कम नहीं है जो धूप एवं बारिश से बचाता है। दरअसल, इसकी बड़ी एवं लंबी पत्तियों का समूह हमारे पंजे जैसा होता है इसलिए अन्य वृक्षों की तुलना में इस पेड़ से ज्यादा छाया मिलती है। 

यह सेहत का भी पिटारा है और वैरिकोज वेंस, सूजन, बवासीर और शुक्राणु की गुणवत्ता सुधारने जैसे कई काम आता है। लेकिन सावधान, इसके कच्चे बीज, पत्तियां, छाल या फूल सामान्य रूप से इतने जहरीले हो सकते हैं कि बिना जाने उपयोग करने से गंभीर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।

सुंदरता और गुणों की खान इस वृक्ष को हिमालयन हॉर्स चेस्टनट (Aesculus indica) के नाम से जाना जाता है। वैसे, इसका एक विदेशी भाई भी है। उसे हॉर्स चेस्टनट (Aesculus hippocastanum) कहा जाता है। पादप विज्ञानियों के लिए भले ही ये अलग-अलग हों लेकिन हम जैसे लोगों को तो ये कुंभ के मेले में बिछड़े भाइयों जैसे या बाली-सुग्रीव, राम-श्याम या सीता-गीता टाइप एक समान ही लगते हैं। 

इसके बारे में ज्यादा जानकारी जुटाने पर यह पता चला कि अठारहवीं सदी के मध्य में इस पेड़ को इसकी खूबसूरती के कारण ब्रिटेन और यूरोप के अन्य हिस्सों में ले जाया गया था। अब यह वहां पार्कों और बगीचों में सजावटी पेड़ के रूप में शोभा बढ़ा रहा है। मतलब सीधा सा यह है कि जैसे अंग्रेज हमारे देश में अपने साथ कई प्रकार के पेड़ पौधे लाए तो निश्चित ही उसी तरह वे यहां से भी कई पेड़ पौधे अपने साथ ले भी गए होंगे। इसलिए मुझे हॉर्स चेस्टनट कुल के पेड़ों के कुंभ के मेले में बिछड़ने की थ्योरी सही लगती है।

हिमालयन हॉर्स चेस्टनट यानि भारतीय प्रजाति का मूल जन्म स्थान और प्राकृतिक आवास उत्तर-पश्चिमी हिमालय का पर्वतीय क्षेत्र माना जाता है। वैसे भी, यह पेड़ मुख्य रूप से 900 मीटर से 3,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित नम और छायादार घाटियों में प्राकृतिक रूप से उगता है। इसलिए यह हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू एवं कश्मीर में आमतौर पर होता है। अब तो इसने अपनी जड़ें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और नेपाल तक फैला ली हैं। 

स्थानीय तौर पर इसे कनोर, बानखोर, वन अखरोट, बैंकहोर, खनोर, गुग्गू, हनुदुन, ककरा, पांगर, कारु, घोड़े पांगरो, घोड़े का शाहबलूत और नारु जैसे तमाम जाने अनजाने नामों से जाना जाता है। इसके वैज्ञानिक नाम के पीछे भी यही कहानी बताई जाती है कि इससे घोड़ों के पैरों की सूजन ठीक की जाती थी इसलिए शायद इसका नाम ‘हॉर्स चेस्टनट’ पड़ गया।

इन दिनों, यह पेड़ अपने परवान पर है इसलिए जमकर फूल रहा है और उतना ही हरा भरा भी है। इस पेड़ को दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे किसी ने पूरे पेड़ को सफेद-गुलाबी मोमबत्तियों से सजा दिया हो या इस पर सफेद गुलाबी आइसक्रीम के कोन लगा दिए हों। हिमाचल प्रदेश के शिमला के रिज (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर यह पेड़ अपने बंधु बांधवों के साथ इन दिनों पूरे शबाव पर है। 

मजे की बात यह भी है कि इसी पेड़ के पास यहां सैलानियों को घूमने के लिए घोड़े मिलते हैं इसलिए यह हॉर्स चेस्टनट नाम सार्थक सा लगता है। मॉल रोड के सबसे बड़े हॉर्स चेस्टनट की लोकेशन एवं आकार इतना विशाल है कि आमतौर पर लोग यहां रुक कर एक दूसरे का इंतजार करते हैं इसलिए कुछ लोग इसे ‘वेटिंग ट्री’ भी कहने लगे हैं। वैसे, मॉल रोड पर इसके छोटे बड़े आधा दर्जन पेड़ हैं और पूरे इलाक़े के सौंदर्य में चार चांद लगा रहे हैं।

पहाड़ों पर मिलने वाले पेड़ पौधे हमारे मैदानी इलाकों में सामान्य तौर पर मिलने वाले आम, जामुन, पीपल, नीम, बरगद से अलग होते हैं इसलिए जब भी किसी पहाड़ी क्षेत्र में जाने का अवसर मिले इस वानस्पतिक विविधता का भी भरपूर आनंद लीजिए क्योंकि हर मौसम में यहां कोई न कोई बुरांश, देवदार, पाइन, नीला गुलमोहर या हॉर्स चेस्टनट अपनी खूबसूरती से आपका मन मोह ही लेगा।





रविवार, 17 मई 2026

इस बरफी को खाने की गलती मत करना, वरना..!!

 


क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि महज कुछ हजार की आबादी वाले एक कस्बाई शहर की एक साधारण सी मिठाई के लिए सुबह से लाइन लगती होगी और लाइन भी ऐसी की बाकायदा पुलिस लगानी पड़े!! इसके बाद भी जरूरी नहीं है कि आपके हाथ मनचाही मात्रा में मिठाई हाथ लग जाए ।..और मिठाई भी कोई अनोखी नहीं बल्कि बेसन की बरफी..जी हां, वही बेसन की बरफी जो हर गली-मोहल्ले की मिठाई की दुकान पर आसानी से मिल जाती है। 

बेसन की बरफी राजस्थान एवं गुजरात में मोहनथाल व दिलखुशाल तो कुछ राज्यों में बेसन चक्की के नाम से जानी जाती है। यह दिल्ली से लेकर उत्तरप्रदेश तक तथा राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश तक लोकप्रिय है। वही बेसन की बरफी, जो भारत में हर शादी-विवाह, तीज-त्यौहार एवं हर छोटे-बड़े अवसर पर घर-घर में  आमतौर पर बनती है और शायद सोन पापड़ी के बाद नई पीढ़ी द्वारा सबसे ज्यादा हिकारत से देखी/खाई जाती है।

लेकिन, इस कस्बे की बेसन की बरफी के स्वाद का जादू ऐसा है कि दिन भर में एक क्विंटल मतलब सौ-डेढ़ सौ किलो से ज्यादा बरफी बिक जाना सामान्य बात है जबकि खास अवसरों पर दो-तीन सौ किलो बरफी लोग खा जाते हैं। इस बेसन की बरफी का प्रताप ऐसा है कि बरफी बनाने वाली दुकान दिन भर में इस ‘स्टार प्रोडक्ट’ के सहारे एक हजार किलो मिठाई बेच लेती है और फिर भी ग्राहकों का मन नहीं भरता बल्कि दुकान ही बंद करनी पड़ती है।

हम बात कर रहे हैं चंडीगढ़ से शिमला के रास्ते में राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर पांच पर मौजूद हिमाचल प्रदेश के छोटे से कस्बे कंडाघाट की सुप्रसिद्ध बेसन की बरफी की। बरफी की खुशबू, स्वाद तथा लोकप्रियता का अंदाजा आपको कंडाघाट पहुंचते ही होने लगता है। आमतौर पर भीड़, सीमित उपलब्धता और अपनी कार से काफी दूर तक चलकर जब आपके हाथ में कंडाघाट की बरफी का डिब्बा आता है तो मैडल जीतने से कम खुशी महसूस नहीं होती।

असल मज़ा अब शुरू होता है..जब आप लक्ष्मण जी की इस दुकान से जेब के अनुकूल कीमत पर खरीदे गए एक खूबसूरत डिब्बे से सुनहरी आभा लिए मनमोहक खुशबू वाली, सुडौल, करीने से सजी बरफी का एक टुकड़ा मुंह में रखते हैं.. अहा, बरफी का कण कण मुंह में घुलने लगता है। बरफी का मुंह में हौले हौले घुलता हुआ स्वाद, देसी घी की खुशबू, बेसन का सोंधापन और चीनी की संतुलित मिठास मिलकर ऐसा एहसास कराते हैं मानो हर टुकड़ा खुशी से भरा हो। बरफी का स्वाद धीरे-धीरे जीभ पर फैलता है और उसके साथ मन बार-बार एक और टुकड़ा लेने को करता है, क्योंकि इसका स्वाद भीतर तक आनंद का एहसास करा देता है।

…और फिर डिब्बे, हाथ एवं मुंह के बीच का फासला पता नहीं कैसे खत्म हो जाता है क्योंकि इसका ग़ज़ब का स्वाद हाथ को रुकने ही नहीं देता.. दिल-ओ-दिमाग पर ‘डोपामिन’ बनकर छाया कंडाघाट की इस बरफी के स्वाद के जादू के आगे बीपी और शुगर का डर भी पीछे छूट जाता है। इस बरफी की लोकप्रियता के पीछे दशकों का परिश्रम, विश्वास, स्वाद, शुद्धता और तमाम मिश्रण के संतुलन का जादू है इसलिए कंडाघाट में ही दूसरी कई दुकानों पर लक्ष्मण जी जैसा स्वाद नहीं मिलता। 

आलम यह है कि अब कंडाघाट, लक्ष्मण जी और बेसन की बरफी एक दूसरे की पहचान बन गए हैं क्योंकि यह कोई साधारण मिठाई नहीं – यह परंपरा, मेहनत, शुद्धता और स्वाद का अनोखा संगम है। बताया जाता है कि इस सफलता की कहानी 1940 के आसपास शुरू हुई थी जब स्थानीय व्यवसाई नंद किशोर वर्मा ने आभूषणों का काम शुरू किया था, लेकिन जल्द ही उन्होंने मिठाइयों का सफर चुन लिया। शुरू में वर्मा स्वीट्स के नाम से चली यह छोटी-सी दुकान हिमालय की बर्फ़ के स्वादिष्ट जल,पहाड़ी आवोहवा और शुद्ध परिवेश में धीरे-धीरे लोकप्रिय होने लगी लेकिन असल नाम मिला उनके बेटे लक्ष्मण दास वर्मा के परिश्रम से। 

उन्होंने न केवल इसे नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया बल्कि बेसन की बरफी के अनूठे स्वाद का ब्रांड भी बनाया। यही वजह रही कि उनके बाद की पीढ़ी ने दुकान का नाम ही ‘लक्ष्मण जी स्वीट्स’ कर दिया। आज भले ही तीसरी-चौथी पीढ़ी इसे संभाल रही है, लेकिन स्वाद अभी भी वही है। इसलिए यह छोटी सी साधारण सी दुकान आज भी बिना ब्रांडिंग, पैकेजिंग, ऑनलाइन बिक्री और बिना किसी तामझाम के बड़ी एवं नामी ब्रांड से भी ज्यादा मिठाई बेच रही है। यहां से गुजरने वाले सैलानियों के साथ साथ विदेशों में बसे भारतीयों के बीच भी इसकी जमकर मांग है। आज भी यह दुकान दिनभर नहीं खुलती और उस कम समय में भी यह बरफी हमेशा नहीं मिलती क्योंकि चुटकियों में ही इसका स्टॉक खत्म हो जाता है।

अब आप के दिमाग में भी यह सवाल कुलबुला रहा होगा कि यह बरफी इतनी खास क्यों है? इसमें, लक्ष्मण जी ऐसी क्या सीक्रेट सामग्री डालते हैं? तो जान लीजिए कि इसमें कोई रहस्य नहीं है बल्कि दशकों पुराना अनुभव, सभी सामग्रियों का शुद्ध, मिलावट रहित, संतुलित, सधा हुआ और पारंपरिक मिश्रण है। स्थानीय देसी घी का इस्तेमाल बरफी को मोहक सुगंध देता है तो धीरज से भूना जाने वाला बेसन घी के साथ मिलकर बरफी को स्मूद और परफेक्ट बनता है। 

सबसे जरूरी बात यह है कि कंडाघाट की इस बरफी में कोई आर्टिफिशियल फ्लेवर या शॉर्टकट नहीं होता । यही वजह है कि एक टुकड़ा मुंह में रखते ही बेसन की खुशबू, घी का स्वाद, हल्की मिठास और मुलायम अंदाज मुंह में घुलकर यह अहसास करा देता है कि बेसन की बरफी का असल स्वाद कैसा होता है। इसको एक बार खाने के बाद आप खुद इसे बार बार खाना चाहोगे क्योंकि यह सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि हिमाचली मेहमाननवाजी और परंपरा का स्वाद है।

#Barfi #बरफी #Shimla #himachal #hills #sweet #kandaghat 





मंगलवार, 12 मई 2026

अमेरिकी जादूगर के नीले जादू की क़ैद में हिमाचल..!!


दुनिया भर के लोगों को अपने श्वेत-बर्फीले हुस्न, आकाश छूते चीड़-देवदार और प्रकृति के हरियाली भरे श्रृंगार से अपनी ओर खींचने वाला हिमाचल प्रदेश इन दिनों एक अमेरिकी जादूगर के नीले जादू के मोहपाश में बंधा हुआ है। आमतौर पर जादूगर वैसे तो काला जादू करते हैं लेकिन इस विदेशी जादूगर ने नीला जादू किया है और आलम यह है कि देवभूमि के अधिकतर इलाके अपनी सुध बुध खोकर इस जादू के रंग में रंग गए हैं..वहीं, हिमाचल की दिव्यता एवं भव्यता को निहारने आए पर्यटक भी इस नीले जादू के सम्मोहन से बच नहीं पा रहे हैं।

इस नीली आभा का ऐसा अद्भुत असर है जैसे आसमान स्वयं धरती से आलिंगन कर रहा है। जगह जगह बिछे नरम मुलायम नीले कालीन ने इस सौंदर्य में चार चांद लगा दिए हैं। यह जादूगर दक्षिण अमेरिका का मूल निवासी है एवं ब्राजील, अर्जेंटीना, बोलीविया, पैराग्वे में जवान हुआ है और अब दबे पांव हिमाचल में घुसपैठ कर गया है। इन दिनों इसका जादू  धर्मशाला, कुल्लू, कांगड़ा और सोलन जैसे इलाकों से होते हुए पूरे राज्य में परवान चढ़ रहा है। वैसे, हिमाचल के पहले यह जादूगर अपने नीले जादू से अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, यूरोप, फ्लोरिडा, कैलिफोर्निया को भी अपने रंग में रंग चुका है। आस्ट्रेलिया में तो इस पर बाकायदा फेस्टिवल बन गए हैं।


ज्यादा पहेलियां न बुझाते हुए अब बता ही देते हैं कि कौन है यह अमेरिका जादूगर और क्या है इसका नीला जादू…हम बात कर रहे हैं जैकारंडा (Jacaranda) की जो इन दिनों हिमाचल प्रदेश सहित देश के तमाम उष्णकटिबंधीय (tropical) क्षेत्रों को अपनी नीले सौंदर्य से आकर्षित कर रहा है। इस जादूगर का पूरा नाम Jacaranda mimosifolia है। इसका नाम भी ब्राजील से उपजा है । हालांकि हमारे यहां इसे नीला गुलमोहर, फर्न ट्री, नीलकंठ, नील मोहर, नूपुर, बांग्ला में नील कृष्ण चूड़ा, केरल में नीलवाका जैसे विविध नामों से जाना जाता है। जैकारंडा का अर्थ होता है सुगंधित एवं कठोर लकड़ी। यह पेड़ अपने नीले-बैंगनी एवं पुंगी (ट्रम्पेट) के आकार वाले फूलों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। हम इसे मैदानी इलाकों को अपने चटक लाल केसरिया फूलों से दहकाने वाले गुलमोहर का दूर के रिश्ते का भाई कह सकते हैं क्योंकि यह वैज्ञानिक रूप से अलग परिवार का होने के बाद भी आकार प्रकार और सजावट में गुलमोहर जैसा ही नजर आता है।  

हमारे देश में अप्रैल से लेकर जून तक जैकारंडा का जादू सिर चढ़कर बोलता है। यह हिमाचल की प्राकृतिक सुंदरता को नया आयाम दे देता है। एक तरफ देवदार, चीड़ और बुरांश के हरे-लाल-गुलाबी रंग, दूसरी तरफ ये बैंगनी-नीला सैलानी। जैसे किसी विदेशी मेहमान ने घर आकर अपने उपहारों से पूरे परिवार को नए उत्साह से भर दिया हो। इन दिनों हिमाचल प्रदेश के तमाम इलाकों में मसलन सड़क के किनारे, होटलों के बगीचों में, मंदिरों के आसपास..हर जगह ये जादूगर बिना शोर शराबे के अपनी नीलिमा का कमाल दिखा रहा है।


इतना ही नहीं, इसकी खासियत यह भी है कि जब तक फूल खिले रहते हैं तो चारों ओर नीली आभा फैली रहती है और जब ये फूल झड़ते हैं तो ज़मीन पर नीला गलीचा सा बिछ जाता है। इसकी हवा में फैली हल्की सुगंध और मनमोहक नीला रंग मन को शांत कर देते है और हमें आध्यात्मिक सुकून का सा एहसास होता है । शायद यही वजह है कि हिमाचल में ये पेड़ भले ही सजावट बनकर आए थे लेकिन अब दिल जीतने का हिस्सा बन गए हैं । 

जैकारंडा का ये जादू सिर्फ खूबसूरत नीले रंग भर का नहीं है, बल्कि भाव का भी है। हिमाचल की ठंडी, शांत सुबह में जब सूरज की पहली किरण इन फूलों पर पड़ती है, तो पूरा माहौल जादुई हो जाता है और हम बस प्रकृति की इस अनुपम जादूगरी में खो जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे हमारी हिंदी फिल्मों के कई गीतों जैसे फिल्म ‘कलाकार’ का ‘नीले नीले अंबर पर..’ या फिर ‘हमराज’ का ‘नीले गगन के तले..’ या फिर फिल्म ‘आशा ज्योति’ का ‘नीले अंबर के दो नैना..’, लिखते समय गीतकार के दिल-ओ-दिमाग पर भी इस नीले जादूगर का जादू छाया हुआ था।

#Jacaranda  #Gulmohar  #Nature  #Tree











बुधवार, 6 मई 2026

अकेलापन..पैसे नहीं, समय मांगता है !!!


...शहर के एक व्यस्त इलाके में राहुल नाम का एक युवक डिलीवरी बॉय का काम करता था। ज्यादातर उसकी शाम की शिफ्ट होती। एक दिन रात नौ बजे उसने आखिरी ऑर्डर उठाया। रेस्टोरेंट से पैकेट लेते समय उसने देखा — बहुत छोटा ऑर्डर था। बस सादी खिचड़ी, दही और दो केले। पता पुराने शहर का था। एक जर्जर पुरानी इमारत, तीसरी मंजिल।

सीढ़ियाँ चढ़कर उसने घंटी बजाई। दरवाजा एक वृद्ध महिला ने खोला। सफेद बाल, काँपते हाथ, मोटे चश्मे। चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी, पर आवाज में मिठास थी —"बेटा, अंदर रख दो... मेरे हाथ काँपते हैं। "राहुल ने खाना टेबल पर रखा और लौटने लगा तो अम्मा ने कहा —"बेटा, दो मिनट बैठोगे? अकेले खाना खाने में मन नहीं लगता।" राहुल ने घड़ी देखी। शिफ्ट खत्म हो चुकी थी। थकान भी हो रही थी। फिर भी कुछ अनकहा भाव उसके मन में उठा और वह बैठ गया। 

कमरा सन्नाटे में डूबा था। दीवार पर पुरानी घड़ी टिक-टिक कर रही थी। एक कोने में भगवान की छोटी सी तस्वीर। दूसरी दीवार पर परिवार की दर्जनों फोटो लगी थीं। अम्मा ने प्लेट खोली। धीरे-धीरे खिचड़ी खाने लगीं। हर दो कौर के बाद वे राहुल की ओर देखकर मुस्कुरातीं। फिर बोलीं —"बेटा, रोज बाहर का खाना नहीं मँगाती। आज बस मन किया... किसी इंसानी आवाज को सुनने का। "राहुल चुप रहा। अम्मा ने दीवार पर एक फोटो की ओर इशारा किया —"ये मेरे पति जी। रेलवे में नौकरी करते थे। पाँच साल पहले चले गए। "फिर दूसरी तस्वीर —"ये मेरा बेटा। कनाडा में है। बहुत अच्छा कर रहा है... हर महीने पैसे भेजता है। "थोड़ी देर चुप रहकर उनकी आँखें भर आईं —"बस... समय नहीं भेज पाता।"

कमरे में घड़ी की टिक-टिक अचानक बहुत तेज सुनाई देने लगी। अम्मा ने एक और कौर लिया और बोलीं —"ये मेरी बेटी। बेंगलुरु में है। अपनी दुनिया में खुश है। होना भी चाहिए। बच्चों ने उड़ना न सीखा तो हमने उन्हें पाला ही क्यों था?" आवाज भर्रा गई, लेकिन चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी — सिर्फ सूना खालीपन था। उन्होंने राहुल से पूछा —"तुम्हारी माँ है बेटा? "हाँ अम्मा।" "हर दिन फोन करते हो?" राहुल खामोश हो गया। 

सच तो यह था कि वह भी कई-कई दिन घर को फोन नहीं करता। थकान, काम, भागदौड़... हर बार सोचता, कल कर लूँगा। उसकी चुप्पी पढ़कर अम्मा ने धीरे से कहा —"बेटा, माता-पिता पैसे नहीं गिनते... वे आवाजें गिनते हैं। "राहुल के अंदर कुछ टूट गया। खाना खत्म हुआ। अम्मा ने पानी पिया। फिर पर्स से पाँच सौ रुपये निकालकर आगे बढ़ाए —"ये टिप नहीं है बेटा। ये उस आधे घंटे की कीमत है, जब तुमने मुझे अकेले नहीं खाने दिया।" राहुल ने मना किया, "नहीं अम्मा, मैं नहीं ले सकता।" अम्मा मुस्कुराईं —"ले लो। आज तुमने खाना नहीं डिलीवर किया... साथ और समय दिया है।" राहुल ने रुपये लिए, लेकिन जेब में नहीं डाले — हाथ में ही थामे रखे। जाते समय अम्मा ने कहा —"और हाँ — आज घर जाकर अपनी माँ को जरूर फोन करना।"

उस रात राहुल ने इमारत के नीचे बाइक स्टार्ट नहीं की। सबसे पहले उसने माँ को फोन लगाया। दूसरी तरफ से माँ की आवाज आई —"अरे! आज अचानक फोन? सब ठीक तो है ना?" बस इतना सुनकर राहुल का गला रुँध गया। वह बोला, "हाँ माँ... बस तुम्हारी आवाज सुननी थी।" कुछ पल खामोशी रही। फिर माँ ने पूछा, "तुमने खाना खाया?" सड़क किनारे खड़े होकर राहुल रो पड़ा। उस रात के बाद उसने रोज अपनी माँ को फोन करना शुरू कर दिया। और सिर्फ माँ को ही नहीं — अब हर डिलीवरी उसके लिए सिर्फ ऑर्डर नहीं रह गई थी। कुछ घरों को दवा चाहिए, कुछ को अकेलेपन से छुटकारा, कुछ को इंतजार का अंत, कुछ को बस एक आवाज चाहिए।

अब जब भी कोई दरवाजा खुलता, राहुल जल्दी में नहीं होता। चेहरे को देखता, आवाज सुनता और कभी-कभी पूछ लेता — "और सब ठीक है ना?"ज्यादातर लोग कह देते, "हाँ।"

कुछ मुस्कुरा देते। और कुछ चेहरे बता देते कि पूरे दिन किसी से बात ही नहीं हुई। 

दो महीने बाद उसी पते से फिर ऑर्डर आया।राहुल जल्दी से पहुँचा। इस बार पड़ोस की आंटी ने दरवाजा खोला। धीरे से बोलीं —"अम्मा पिछले हफ्ते चली गईं।" राहुल कुछ पल दरवाजे पर खड़ा रहा। हाथ खाली थे, लेकिन अंदर कुछ बहुत भारी टूट रहा था।आंटी ने अंदर से एक छोटा लिफाफा निकाला —"अम्मा ने ये तुम्हारे लिए छोड़ा था।" काँपते हाथों से राहुल ने लिफाफा खोला। अंदर पाँच सौ रुपये और एक छोटा सा नोट था। नोट पर लिखा था —"बेटा, जब यह पढ़ रहे हो, मैं चली गई हूँ। उस रात मेरे साथ खाने के लिए धन्यवाद। तुमने मुझे खाना नहीं — सम्मान दिया था। हाँ — अपनी माँ को फोन करते रहना— अम्मा।"

आज भी वे पाँच सौ रुपये राहुल के बैग के अंदर वाले पॉकेट में रखे हैं। उसने उन्हें खर्च नहीं किया क्योंकि उस रात उसे पहली बार समझ आया था —हर दरवाजे के पीछे सिर्फ ग्राहक नहीं होता।

कभी कोई माँ होती है।

कभी कोई इंतजार होता है।

कभी आखिरी मुलाकात होती है। हम सब अपनी-अपनी चाह लेकर जीते हैं —

किसी को रोटी चाहिए,

किसी को दवा,

और किसी को बस दो मिनट का साथ। इंसान को हमेशा सामान की डिलीवरी नहीं चाहिए...

कभी-कभी तो सिर्फ उपस्थिति की डिलीवरी चाहिए।

निष्कर्ष यह है कि बुढ़ापा और अकेलापन साथ आएँ तो बहुत भयानक होता है और अगर संसाधनों की कमी भी जुड़ जाए, तो यह अंतिम त्रासदी है। इसलिए, अपने माता-पिता को आज ही फोन कीजिए।

वे पैसे नहीं — आपकी आवाज गिनते हैं।

(मूल अंग्रेजी पोस्ट का हिंदी अनुवाद..पोस्ट सोशल मीडिया पर अलग अलग नामों के साथ दिख/मिल रही है।)


शनिवार, 2 मई 2026

नारद मुनि: केवल पत्रकार नहीं, प्रथम ‘सोशल मीडिया पत्रकार’..!!

आज सूचना क्रांति के दौर में जब सूचना की रफ्तार इंटरनेट और सोशल मीडिया से तय हो रही है एवं सोशल मीडिया पर हर सेकंड लाखों खबरें, रील्स और पोस्ट वायरल हो रही हैं, तब यह सवाल दिलचस्प लगता है कि क्या प्राचीन काल में भी ऐसा कोई संचार तंत्र था? इसका उत्तर पौराणिक कथाओं में ही मिलता है। पौराणिक संदर्भों में देवर्षि नारद का व्यक्तित्व इस सवाल का सटीक जवाब प्रस्तुत करता है। उन्हें केवल एक ऋषि या भक्त के रूप में नहीं, बल्कि सूचना और संवाद के प्राचीन वाहक के रूप में भी देखा जाता रहा है।

धार्मिक कथा कहानियों के अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और भगवान विष्णु के परम भक्त नारद मुनि तीनों लोकों—स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—में निर्बाध विचरण करते थे। वे जहां भी जाते, वहां की घटनाओं, परिस्थितियों और संदेशों को एकत्र कर दूसरे स्थान तक पहुंचाते। यह कार्य आधुनिक पत्रकारिता की मूल परिभाषा से काफी हद तक मेल खाता है—सूचना जुटाना, उसका संप्रेषण करना और समाज को प्रभावित करना।


नारद मुनि की सबसे प्रमुख खासियत उनकी निष्पक्षता और गतिशीलता थी। वे देवताओं, असुरों और मनुष्यों—सभी के बीच समान रूप से संवाद स्थापित करते थे। उनकी वीणा केवल संगीत का साधन नहीं, बल्कि संदेश प्रसार का माध्यम भी थी। यह आज के मोबाइल फोन और कैमरे की तरह उपयोगी थी। वे कथाओं और भजनों के जरिए सूचनाएं इस तरह प्रस्तुत करते थे कि वे जनमानस में गहराई तक उतर जाएं—कुछ वैसा ही जैसा आज पॉडकास्ट या वायरल कंटेंट करता है। आधुनिक भाषा में कहें तो वे वायरल न्यूज मेकर थे, जिनकी एक खबर पूरे ब्रह्मांड में तुरंत फैलकर आज की तरह वायरल हो जाती थी।

पौराणिक कथाओं में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जो उनकी पत्रकारिता के विविध रूपों को स्पष्ट करते हैं। जैसे एक प्रसंग में वे महर्षि बाल्मीकि के आश्रम पहुंचकर उन्हें राम कथा सुनाते हैं । यही कथा आगे चलकर रामायण जैसे महाकाव्य की प्रेरणा बन जाती है। यह घटना आधुनिक संदर्भ में एक ‘डिटेल्ड फीचर स्टोरी’ या ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ की तरह देखी जा सकती है, जिसने इतिहास रच दिया।

इसी तरह महाभारत काल में नारद मुनि ने पांडवों और कौरवों दोनों पक्षों के बीच संवाद और सूचना का आदान-प्रदान किया। उन्होंने युधिष्ठिर को राज्य नीति और धर्म के विषय में सलाह दी, वहीं दूसरी ओर कौरवों की स्थिति का भी आकलन किया। यह भूमिका आज के इन्वेस्टिगेटिव पत्रकार से कम नहीं लगती।

नारद मुनि केवल सूचना वाहक ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक संवेदना के प्रतिनिधि भी थे। उन्होंने भक्त प्रह्लाद और ध्रुव जैसे पात्रों को भक्ति का मार्ग दिखाया और उनकी स्थिति को देवताओं तक पहुंचाया। यह आधुनिक पत्रकारिता के उस पहलू से मेल खाता है, जहां मीडिया कमजोर और वंचित वर्ग की आवाज़ बनता है।


अगर सोशल मीडिया के नजरिए से देखें, तो नारद मुनि का कार्य और भी प्रासंगिक लगता है। वे उस दौर में बिना किसी तकनीक के त्वरित सूचना प्रसार करते थे। उनकी एक बात पूरे ब्रह्मांड में प्रभाव डालती थी,कुछ वैसा ही जैसा आज कोई पोस्ट वायरल हो जाती है। उनकी “नारायण-नारायण” की उद्घोषणा एक तरह से उनकी पहचान थी, जिसकी तुलना हम आज के हैशटैग से कर सकते हैं।

हालांकि नारद जी एवं आज के सोशल मीडिया के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर भी है। आज सोशल मीडिया में जहां फेक न्यूज, ट्रोलिंग और सनसनीखेज खबरें आम बात हो गई है, वहीं नारद मुनि का उद्देश्य हमेशा जनकल्याण और सत्य की स्थापना रहा। वे सूचना को हथियार नहीं, बल्कि सही संवाद का माध्यम मानते थे। वर्तमान डिजिटल युग में पत्रकारिता और सोशल मीडिया दोनों को नैतिकता की सख्त जरूरत है। नारद मुनि की तीनों लोकों की यात्राएँ हमें याद दिलाती हैं कि सच्चा संचारक वही है जो सूचना को हथियार नहीं, बल्कि समाज से जुड़ने का पुल बनाता है और धरातल पर जाकर आम लोगों की वास्तविकताओं से रूबरू कराता है।

समसामयिक संदर्भ में बात करें तो नारद मुनि का उदाहरण यह संदेश देता है कि पत्रकारिता केवल खबर देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने की जिम्मेदारी भी है। निष्पक्षता, सत्य, विश्वसनीयता और जनहित जैसे मूल्य आज भी उतने ही जरूरी हैं जितने प्राचीन काल में थे।

शायद यही कारण है कि नारद जयंती को पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाने की परंपरा विकसित हुई । यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उस विचार का सम्मान है कि सूचना का सही उपयोग समाज को जोड़ सकता है, जागरूक बना सकता है और सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

देवर्षि नारद की जयंती के अवसर पर यह याद करना प्रासंगिक है कि पत्रकारिता कोई नया पेशा नहीं है। यह सृष्टि के आरंभ से चला आ रहा एक दिव्य कर्तव्य है। यदि आज का ‘मैराथन मीडिया’ नारद मुनि की निष्पक्षता, गतिशीलता और लोकमंगल की भावना को अपनाए, तो सोशल मीडिया भी ज्ञान और सद्भाव का साधन बन सकता है।



गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

...सुकून संक्रामक है !!

एक दिन पत्नी ने यूँ ही सामान्य रूप से कहा,

“सुनो, मैं थोड़ी देर के लिए अपनी दोस्त के साथ बाहर जा रही हूँ।”


पति, जो अपने फोन में व्यस्त था, बस हल्का सी नजर उठाकर बोला,

“ठीक है। मज़े करना।”


पत्नी थोड़ी हैरान रह गई। आमतौर पर वह पूछता—“ज़रूरी है क्या?” “इतनी देर क्यों?” “जल्दी आना।”

लेकिन उस दिन—कुछ नहीं। न कोई सवाल, न कोई नाराज़गी—बस एक शांत “ठीक है।”


कुछ घंटों बाद, उनका किशोर बेटा रसोई में आया। उसके हाथ में एक पेपर था, चेहरा फीका पड़ा हुआ।

“पापा,” उसने धीरे से कहा, “मेरे मॉक एग्ज़ाम के रिज़ल्ट आ गए… और बहुत खराब हैं।”


वह वहीं खड़ा रह गया, डांट के लिए तैयार। उसे पता था कि पापा हमेशा पढ़ाई को लेकर चिंतित रहते हैं, और अब लंबा लेक्चर मिलेगा।


लेकिन पापा ने शांत स्वर में कहा,

“ठीक है।”


बेटा हैरान होकर बोला,

“बस… ठीक है?”


“हाँ,” उन्होंने नरमी से कहा।

“अगर तुम ज्यादा पढ़ोगे तो अगली बार बेहतर करोगे। नहीं पढ़ोगे तो शायद सेमेस्टर दोहराना पड़े। फैसला तुम्हारा है। मैं हर हाल में तुम्हारा साथ दूँगा।”


बेटा स्तब्ध रह गया। पापा इतने शांत कब से हो गए?


अगले दिन, उनकी बेटी घबराते हुए अंदर आई।

“पापा… मैंने कार को टक्कर मार दी। बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन डेंट पड़ गया है।”


पिता ने न डांटा, न गुस्सा किया। बस बोले,

“ठीक है। कल गाड़ी वर्कशॉप ले जाना।”


बेटी ठिठक गई।

“आप… गुस्सा नहीं हैं?”


वह हल्के से मुस्कुराए,

“गुस्सा करने से कार ठीक नहीं होगी। अगली बार ध्यान रखना।”


अब घर के सभी लोग परेशान थे। यह वही आदमी था—पति, पिता—जो पहले जल्दी गुस्सा हो जाता था, हर बात पर तनाव लेता था।

अब वह शांत, स्थिर और संतुलित लग रहा था।


आख़िरकार, उस शाम सबने उसे बैठाकर पूछा।


पत्नी ने कहा,

“सुनो, तुम बहुत बदल गए हो। हर बात पर शांत रहते हो। सब ठीक है ना?”


उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

“सब बिल्कुल ठीक है। बस मैंने एक बात समझ ली है।”


सब चुप हो गए।


उन्होंने कहा,

“कई सालों बाद मुझे समझ आया कि हर इंसान अपनी ज़िंदगी के लिए खुद ज़िम्मेदार है।”


पत्नी ने पूछा,

“मतलब?”


उन्होंने हाथ जोड़कर कहा,

“पहले मैं हर चीज़ की चिंता करता था—तुम देर से आओ तो चिंता, बच्चों के कम नंबर आएँ तो अपराधबोध, कुछ टूट जाए तो गुस्सा, कोई दुखी हो तो उसे ठीक करने की कोशिश। मैं सबकी समस्याओं को अपनी समस्या बना लेता था।

लेकिन एक दिन समझ आया—मेरी चिंता उनकी समस्या हल नहीं करती, बस मेरी शांति छीन लेती है।”


सभी चुपचाप सुन रहे थे।


उन्होंने आगे कहा,

“मेरा तनाव तुम्हारी मदद नहीं करता। मेरी परेशानी तुम्हारी ज़िंदगी आसान नहीं बनाती—बस मेरी मुश्किल बढ़ाती है।

मैं तुम्हें सलाह दे सकता हूँ, प्यार दे सकता हूँ, साथ दे सकता हूँ।

लेकिन तुम्हारी ज़िंदगी मैं नहीं जी सकता। तुम्हारे फैसलों के परिणाम—अच्छे या बुरे—तुम्हें ही झेलने होंगे।”


थोड़ी देर रुककर उन्होंने फिर कहा,

“इसलिए मैंने तय किया—मैं उस चीज़ को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करूँगा, जो मेरे नियंत्रण में नहीं है।”


बेटे ने पूछा,

“तो… अब आपको हमारी परवाह नहीं है?”


उन्होंने मुस्कुराकर कहा,

“परवाह है। लेकिन परवाह और नियंत्रण में फर्क होता है।

मैं तुमसे प्यार कर सकता हूँ, तुम्हारा साथ दे सकता हूँ—लेकिन अपनी शांति खोकर नहीं।”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


उन्होंने प्यार से सबकी ओर देखते हुए कहा,

“मेरा काम है तुम्हें प्यार देना, मार्गदर्शन करना, ज़रूरतें पूरी करना और साथ देना।

लेकिन तुम्हारा काम है अपनी ज़िंदगी संभालना, फैसले लेना और उनके परिणाम स्वीकार करना।

इसी तरह इंसान सीखता है।”


उन्होंने शांत स्वर में जोड़ा,

“अब जब कुछ गलत होता है, तो मैं खुद को याद दिलाता हूँ—यह मुझे ठीक नहीं करना है। मैं शांत रहूँगा और भरोसा करूँगा कि तुम इससे सीखोगे। क्योंकि जिंदगी ऐसे ही सिखाती है।”


कुछ देर तक घर में पूरी शांति रही। लेकिन माहौल बदल चुका था।


बेटा खुद पढ़ने बैठ गया—डांट के डर से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी समझकर।


बेटी ने खुद कार ठीक करवाने की जिम्मेदारी ली और इंश्योरेंस की प्रक्रिया समझी।


पत्नी ने घर के कामों को और समझदारी से संभालना शुरू किया—मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से।


धीरे-धीरे घर हल्का लगने लगा।


अब कोई डर से नहीं, समझ से काम करता था।

किसी को डांट का भय नहीं था।


क्योंकि जब एक इंसान शांति चुनता है, तो वह पूरे घर में फैलती है। जब एक व्यक्ति नियंत्रण छोड़ देता है, तो दूसरे खुद को संभालना सीख जाते हैं। और इस तरह—शांति फैलती है, ठीक वैसे ही जैसे प्यार।


दूसरों को गुस्से, दबाव या अधिकार से नियंत्रित करने की कोशिश मत करो।

खुद जिम्मेदार बनो और दूसरों को उनकी जिम्मेदारी समझने में मदद करो।

(अंग्रेजी की मूल पोस्ट का हिंदी संस्करण)

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

गोबर 300 रुपए किलो और कंडे 9999 रुपए के..!!

चौंकिए मत और न ही यह तस्वीर देखकर नाक मुंह बनाइए… क्योंकि अब दूध,दही और पनीर से भी महंगा मिल रहा है गोबर.. जी हां, जिस गोबर को आप हम बिना गौमाता या गाय के मालिक की सहमति के मनचाही मात्रा में उठा लाते हैं,वह ऑनलाइन 299 रुपए किलो बिक रहा है। 

ऑनलाइन वेबसाइट फ्लिपकार्ट पर गाय का गीला गोबर इसी दाम पर उपलब्ध है। दरअसल, जब ऑनलाइन वेबसाइट पर दूसरे उत्पाद तलाशते हुए मेरी इस बहुमूल्य और बेशकीमती गोबर पर नज़र गई तब कंपनी ग्राहकों पर मेहरबानी दिखाते हुए 5 फीसदी छूट दे रही थी और यह मात्र 283 रुपए में उपलब्ध था..हालांकि, मजेदार बात यह भी है कि दाम में महज पांच फीसदी की कमी होते ही यह आउट ऑफ स्टॉक हो गया। मतलब, गीले गोबर के कद्रदान कम नहीं हैं।

कंपनी का कहना है कि यह गीला गोबर (Wet Cow dunk) धार्मिक कार्यों और बागवानी के लिए सर्वथा उपयुक्त है। उन्होंने बताया कि आप इसका इस्तेमाल भगवान की पूजा, गणेश चतुर्थी में, हवन में और पेड़ पौधों में बखूबी कर सकते हैं। कंपनी इसे लीक प्रूफ पैक में भेजेगी जिससे यह गीला ही आप तक आए। वैसे, कोई एक नहीं बल्कि तमाम वेबसाइट लगभग इसी कीमत पर गीला गोबर बेच रही है और सभी अपने अपने गोबर के सबसे शुद्ध होने का दावा भी कर रहे हैं।

हालांकि, इंडियामार्ट जैसी साइट गिर गाय का गोबर 30 रुपए किलो की दर पर बेच रही है लेकिन कंपनी 25 किलो से कम गोबर नहीं देती। यह भी करीब 750 रुपए में पड़ेगा। अब पूजा में इतना गोबर तो लगेगा नहीं इसलिए आप इतने गोबर के खुद कंडे बनाओ या पड़ोसियों को बनाने के लिए दो, आपकी मर्जी। जहां तक सूखे गोबर की बात है तो यह खाद के रूप में बहुतायत में और जेब के अनुकूल दाम पर तमाम जगह मिल जाता है लेकिन गीले गोबर के दाम जरूर चौंकाते हैं।

आमतौर पर गोबर के कंडे/उपले या काऊ डंक केक तो ऑनलाइन साइट पर बड़ी संख्या में उपलब्ध हैं। कई तो इतने सजावटी आकार प्रकार और पैकिंग में मिलते हैं कि लगता है उन्हें ड्राइंग रूम में सजाने के लिए बेचा जा रहा है…एक सी मोटाई के बिल्कुल गोल,साफ सुथरे कंडे। हालांकि इनकी कीमत में किसी बटर नान से कम नहीं होती।

 मसलन पूरी के आकार के खूबसूरत  36 कंडे 249 रुपए में मिल जाएंगे। वैसे, गोबर-कंडे तलाशने की मुहिम में अमेजन पर उपलब्ध कंडों के दाम ने तो समझो डरा ही दिया। यहां 9999 रुपए में 211 कंडे बिक रहे हैं। कंपनी का दावा है कि ये धूप में ही सुखाए गए हैं (जैसे हमारे यहां कंडे ओवन में सूखते हैं), केमिकल फ्री हैं और बहुत देर तक जलते रहते हैं। 

कंपनी आम ग्राहकों पर मेहरबानी करते हुए इन्हें फिलहाल 65 फीसदी डिस्काउंट पर मात्र 3499 रुपए में बेच रही है। वैसे, कहीं 71 रुपए का एक कंडा और कहीं चार से छह कंडे के पैक भी अलग अलग कीमतों पर उपलब्ध हैं..कुल मिलाकर, ऑनलाइन वेबसाइट पर कंडों का बाज़ार भरपूर फल फूल रहा है। जैसे जैसे एकल परिवारों, ऑनलाइन पंडित और असुरक्षा का भाव बढ़ रहा है..धार्मिक सामग्री के ऑनलाइन भाव भी बढ़ते जा रहे हैं।

गोबर/कंडे के बढ़ते भाव पर जब मैने एआई से ज्ञान लिया तो उसका कहना है कि ऑनलाइन गीले गोबर और कंडों की मांग बढ़ने के पीछे मुख्य कारण ऑर्गेनिक खेती का ट्रेंड, देश एवं विदेशों में बढ़ती जरूरत, धार्मिक उपयोग, पर्यावरण के प्रति जागरूकता और कचरे से कमाई का नया मॉडल है।उसके मुताबिक जो चीज पहले बेकार मानी जाती थी, अब वही “ग्रीन गोल्ड” बन गई है।


गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

“अयोध्या 22 जनवरी": अयोध्या के बारे में जानकारीपूर्ण, दिलचस्प, विस्तृत और विचारोत्तेजक विवरण

           ।।विश्व पुस्तक दिवस पर विशेष।। 

“अयोध्या 22 जनवरी" पुस्तक में, लेखक संजीव शर्मा पाठकों को भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तिथियों में से एक के माध्यम से एक मनोरंजक यात्रा पर ले जाते हैं और कुशलता से अयोध्या की मनोरम जानकारी से परिचित कराते हैं। यह पुस्तक 22 जनवरी, 2024 को राम मंदिर के ऐतिहासिक उद्घाटन से पहले और उसके बाद की घटनाओं की व्यापक समझ प्रदान करती है। 'अयोध्या 22 जनवरी' पुस्तक की कथावस्तु अयोध्या को आकार देने वाले सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य का एक विचारशील अन्वेषण है। पुस्तक में कहानी कहने का ढंग इतना आकर्षक है कि यह विद्वानों से लेकर अयोध्या की जटिलताओं से अपरिचित लोगों दोनों के लिए सरल भाषा और रोचक शैली में सामग्री उपलब्ध कराती है। पुस्तक की भाषा लेखक की पहली किताब ‘चार देश चालीस कहानियां’ की तरह रोचक और सरल दोनों है । अयोध्या के बारे में जानकारीपूर्ण, दिलचस्प, विस्तृत और विचारोत्तेजक विवरण चाहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अत्यधिक अनुशंसित पुस्तक।


“अयोध्या22जनवरी” पर कुछ पाठकों की प्रतिक्रिया 

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के तत्कालीन कुलगुरू प्रोफ़ेसर K G Suresh ने कहा:

“ #अयोध्या22जनवरी एक संग्रहणीय पुस्तक है, विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के साथ साथ सभी को पढ़नी चाहिए।”

वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने कला समीक्षक Girija Shanker जी ने कहा:

“करंट विषय पर तत्काल किताब लिखना चैलेंजिंग होता है। #ayodhya22january  अपनी शैली की अलग किताब है जो अयोध्या पर बेस मैटेरियल का काम करेगी।”

भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक प्रो Sanjay Dwivedi  ने कहा:

“आकाशवाणी, भोपाल के समाचार संपादक श्री संजीव शर्मा की नई किताब #अयोध्या22जनवरी अयोध्या प्रसंग को समझने में मदद करती है। किताब को भोपाल के लोक प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। उम्मीद है किताब पाठकों का प्यार पाएगी।”

वरिष्ठ पत्रकार और बी एस टीवी न्यूज चैनल के प्रमुख Pravin Dubey  ने कहा:

“पौराणिक और वर्तमान के सन्दर्भों को एक साथ पिरोकर बेहतरीन किताब की शक्ल में लिखा है Sanjeev Sharma जी ने...नाम है #अयोध्या22जनवरी......यदि सिर्फ इतिहास होता तो शायद बोझिल हो जाता...या सिर्फ वर्तमान की घटनाएं होती तो वो शायद आँखों देखी जैसा रिपोर्टर टाइप वर्णन हो जाता... चूँकि वे बेहतरीन पत्रकार होने के साथ साथ अच्छे लेखक भी हैं....उन्हें क़िस्सागोई भी आती है और यथार्थ का चित्रण भी..ज़ाहिर है कि ऐसे में  वो संदर्भ भी प्रस्तुत करते हैं तो प्रवाह के साथ...यदि आपने अब तक इस किताब को नहीं पढ़ा है तो पढ़िए...इसलिए भी पढ़िए कि आपका तादाम्य ये प्रभु से भी स्थापित करेगी और आपको इस सदी के सबसे बड़े धार्मिक घटनाक्रम का साक्षी भी बनाएगी.. “


संचार विशेषज्ञ, लेखक और व्यंग्यकार Sanjeev Persai ने लिखा:

#अयोध्या22जनवरी, पुस्तक रामलला की प्राणप्रतिष्ठा और मंदिर निर्माण की जानकारियों को समाहित करके लाया गया संभवतः देश का प्रथम दस्तावेज है। ये सच है कि राममंदिर का प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने जरूरत से ज्यादा कवरेज किया। लेकिन इस कवरेज में अधिकतर, जरूरत का था ही नहीं। यह पुस्तक राम मंदिर और 22 जनवरी की ऐतिहासिक घटना का विस्तारपूर्वक विवरण आपको देती है। इसमें दर्ज घटनाएं, जानकारियां, विवरण, उनकी पृष्ठभूमि पढ़ते पढ़ते आप रोमांचित भी होते हैं और यदा कदा आश्चर्यचकित भी।“

जाने माने कमेंट्रेटर और समाचार वाचक Prashant Singh Sengar  ने लिखा है:

#अयोध्या22जनवरी ....बड़ी बधाई के पात्र हैं संजीव जी..। बहुत खूब रचना है यह..। इसमें न केवल भगवान श्रीराम, न केवल अयोध्या और न ही केवल अलौकिक श्रीराम मंदिर के बारे में व्यवस्थित तरीके से जानकारी दी गई है बल्कि भव्य श्रीराम मंदिर के निर्माण से देश में उपजने वाली संभावनाओं और देश को सैंकड़ो वर्षो बाद मिली अकल्पनीय भावनात्मक उपलब्धि को भी प्रदर्शित किया गया है” । 

सामाजिक और संचार विशेषज्ञ,पत्रकार,कार्टूनिस्ट और अपनी लेखनी से गुदगुदाने  वाले लेखक श्री Sanjay Saxena ने लिखा:

“यह पुस्तक आने वाली पीढ़ी के लिए  ऐतिहासिक प्रसंग को महसूस करने का जरिया साबित होगी। इसलिए #अयोध्या22जनवरी किताब को हर परिवार को खरीद कर रखना चाहिए। ताकि संपत्ति के साथ, विचारों को भी विरासत के रूप में सौपा जा सके।"

 समाचार वाचक और प्रेजेंटर Dharana Sachdev ने लिखा है:

#अयोध्या22जनवरी एक ऐतिहासिक दिन, उस पर यह भावपूर्ण, अति सुंदर रचना, निश्चय ही सहेजने योग्य, एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है। निश्चित तौर पर सभी आयु वर्ग के पढ़ने योग्य अनमोल-अद्भुत संग्रह है। A real treasure.”

हरियाणा के Govt. PG College, Hisar में न्यूक्लियर फिजिक्स विभाग के प्रमुख रहे और इसी विषय से डॉक्टरेट करने वाले प्रोफेसर डॉ राधा कृष्ण ग्रोवर ने लिखा है:

“ये किताब सभी के लिए एक अनमोल तोहफ़ा है।  "A Real Historical Document"। श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों को जिस प्रासंगिकता के साथ हर चैप्टर में जो जोड़ा गया है, भाषा का ज्ञान व इस्तेमाल, ये सभी लेखन की खूबियों और बारीकियों को दर्शाता है। इस सब के लिए लेखक संजीव शर्मा अभिवादन और शुभकामनाओं के योग्य हैं।"

सहायक ज़िला आबकारी अधिकारी से रिटायर हुए श्री डी पी सिंह ने तो आर के नारायण के समकक्ष खड़ा कर दिया। उन्होंने बताया:

“अभी #अयोध्या22जनवरी के साथ, आर के नारायण की भी एक बुक पढ़ रहा हूं…दोनो बहुत टक्कर के लेखक हैं । अयोध्या और मौजूदा घटनाक्रम का बहुत अच्छा विस्तृत वर्णन है..बहुत अच्छा लिखा है।”

बनखेड़ी से श्री रमेश  कुमार शर्मा जी ने अपनी प्रतिक्रिया में लिखा है:

"बहुत अच्छा  उच्चतम कोटि का संकलन है। मानस की चौपाइयां को अयोध्या से जोड़ते हुए तुमने बहुत पुनीत कार्य किया है। पुस्तक में अयोध्या की सारी जानकारियां प्रमुख रूप से दी गई है, जो बहुत कम लोग जानते है।..मैने इस पुस्तक को एक ही बार में लगभग 2 से 3 घंटों में पढ़ा । ईश्वर, तुम्हारी लेखनी को इसी तरह और शानदार बनाये रखे।"

#अयोध्या22जनवरी पुस्तक पर ये चुनिंदा प्रतिक्रियाएं हैं। वैसे, प्रतिक्रियाएं तो खूब मिली हैं और समीक्षाएं और सराहना भी,इतनी कि भविष्य में एक अलग किताब बन जाए। यदि आप भी #Ayodhya22January पढ़ना चाहते हैं तो इनमें से किसी भी माध्यम से हासिल कर सकते हैं।

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मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

क्या है ओल्ड मंक, जनरल डायर और देवभूमि का रिश्ता..!!


आजादी की लड़ाई की सबसे निर्मम घटना जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए जिम्मेदार क्रूर ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर का देवभूमि हिमाचल प्रदेश से क्या संबंध है? इसी तरह, भारत सहित दुनिया भर में मशहूर रम ‘ओल्ड मंक’ का देवभूमि से क्या रिश्ता है?..और इस सबसे जरूरी सवाल कि जनरल डायर,ओल्ड मंक एवं हिमाचल प्रदेश आपस में कैसे जुड़े हैं? 

सबसे पहले बात ओल्ड मंक की। रम का पर्याय यह ब्रांड अपनी विरासत, विशिष्ट स्वाद और कम हैंगओवर के लिए भारत ही नहीं दुनिया के 50 से ज्यादा देशों में लोकप्रिय है। वर्ष 2024-25 में ओल्ड मंक ने लगभग 1.3 करोड़ पेटी की बिक्री की जो प्रतिद्वंद्वी ब्रांड से बहुत ज़्यादा हैं लेकिन यह बात कम लोग ही जानते होंगे कि ‘बूढ़े साधू’ यानि ओल्ड मंक का जन्म देवभूमि हिमाचल प्रदेश में हुआ है। आज करीब 70 साल बाद भी यह डार्क रम सेगमेंट में मार्केट लीडर है। कंपनी की कुल बिक्री का 80 फ़ीसदी हिस्सा इसी ब्रांड से आता है।

अब रही जनरल डायर के हिमाचल कनेक्शन की बात तो ओल्ड मंक ब्रांड ने जिस डिस्टिलरी या ब्रूअरी में जन्म लिया है,उसकी स्थापना जनरल डायर के पिता ने ही की थी और यह ब्रूअरी हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित है। इसतरह खूंखार एवं निर्मम जनरल डायर के पिता द्वारा देवभूमि में स्थापित ब्रूअरी में दुनिया के इस मशहूर रम ब्रांड ने जन्म लिया और अपनी जन्मदाता कंपनी की कमाई को कई गुना बढ़ा दिया। लेकिन, इसके पीछे की कहानी इतनी सरल नहीं है। इसमें सालों की मेहनत, रिसर्च, सोच और पीढ़ीगत बदलाव की अहम भूमिका है। हम सभी जानते हैं कि अब ओल्ड मंक किसी परिचय की मोहताज नहीं है लेकिन इस ब्रांड की शुरुआत में भी कंपनी को कभी प्रचार करने की जरूरत नहीं पड़ी। इससे भी 

मजेदार बात यह है कि इस लोकप्रिय ब्रांड के पीछे एक ऐसी विरासत है जो स्क्रैप और खाली बोतलों की सप्लाई से लेकर भारत के सबसे बड़े शराब कारोबारी बनने तक के सफर की कहानी है। 

जानकारी के मुताबिक ब्रिटिश फौज को सस्ती बीयर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 1855 में एडवर्ड डायर ने हिमाचल प्रदेश के कसौली में एशिया की सबसे पहली ब्रूअरी स्थापित की। इसको  'डायर ब्रूअरी' नाम दिया गया।  यहां एशिया की सबसे पहली बीयर 'लॉयन' बनाई जाती थी। यह बीयर इतनी पसंद की गई कि यह धीरे धीरे उस दौर की शाही दावतों का हिस्सा बन गई । 

‘लॉयन’ की सफलता से उत्साहित 'डायर ब्रूअरी' ने कसौली के करीब एवं हिमाचल प्रदेश के ही सोलन में 1920 में शराब बनाने के लिए दूसरा कारखाना स्थापित किया। यह ब्रूअरी ब्रिटिश उद्योगपति एच जी मीकिन के साथ साझेदारी में स्थापित की गई थी इसलिए इसका नाम डायर मीकिन ब्रूअरी रखा गया। इन दोनों शराब कारखानों के संस्थापक एडवर्ड अब्राहम डायर थे जो जनरल डायर के नाम से कुख्यात ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर के पिता थे। 


दरअसल, इस इलाके का पानी और उसका स्वाद कुछ खास है और शराब उत्पादन के लिए बहुमूल्य भी। अंग्रेज व्यवसायियों डायर और मीकिन को भी शायद यह जानकारी थी इसलिए उन्होंने इस जिले को बीयर एवं शराब बनाने के चुना । बताया जाता है कि यह पानी करोल पर्वत से बहकर नीचे को आता है। करोल पर्वत को करोल टिब्बा भी कहा जाता है। यह हिमाचल प्रदेश के सोलन शहर की सबसे ऊंची चोटी है, जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 7,349 फीट है।

उधर, जब देश में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष ने जोर पकड़ा तो आजादी की लड़ाई का असर मौजूदा हिमाचल प्रदेश में भी दिखने लगा इसलिए अंग्रेजों की रुचि इन कारखानों में घटने लगी और 1947 में भारत के स्वतंत्र होते ही डायर और मीकिन के परिजनों ने कसौली तथा सोलन के कारखानों से पल्ला झाड़ लिया। उस दौर में एक भारतीय व्यवसायी नरेंद्र नाथ मोहन भी थे जो स्क्रैप और खाली बोतलों का व्यापार करते थे। करोल पर्वत के पानी की खासियत नरेंद्र नाथ मोहन भी बखूबी जानते थे और वे भी शराब कारोबार में उतरना चाहते थे।


इसलिए, जब नरेंद्र नाथ मोहन को पता चला कि अंग्रेज इन शराब कारखानों को बेचना चाहते हैं तो उन्होंने खरीदने में ज़रा भी देर नहीं की। देश के स्वतंत्र होते ही, दो साल के भीतर 1949 में नरेंद्र नाथ मोहन ने अंग्रेजों से डायर मीकिन ब्रूअरी खरीद ली। 1966 में इसका नाम बदलकर मोहन मीकिन लिमिटेड कर दिया गया। मोहन मीकिन आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। फुटबॉल की इसी नाम की टीम बहुत मशहूर रही है। कंपनी का कारोबार अब केवल शराब तक सीमित नहीं है। यह फलों के जूस, ब्रेकफास्ट सीरियल्स और मिनरल वाटर जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भी सक्रिय है।

नरेंद्र नाथ मोहन के निधन के बाद उनके बेटे कर्नल वेद रतन मोहन ने कंपनी को आधुनिक रूप दिया। 1950 के दशक में उन्होंने नई दिल्ली और गाजियाबाद में नई यूनिटें शुरू की और इसी दौर में 'ओल्ड मंक' का जन्म हुआ। आधिकारिक तौर पर इसे 19 दिसंबर 1954 को लॉन्च किया गया था। बताया जाता है कि वेद रतन मोहन ब्लैक मॉन्क्स (बेनेडिक्टिन मॉन्क्स) की सादगी और अनुशासन से बहुत प्रभावित थे इसलिए उन्होंने रम के अपने नए ब्रांड का नाम 'ओल्ड मंक' रखा।  ऐसा कहा जाता है कि इसका नाम उन भिक्षुओं से प्रेरित है, जो अपनी गुफाओं में शराब को लंबे समय तक सहेज कर रखते थे।

वेद रतन मोहन के निधन के बाद उनके भाई ब्रिगेडियर कपिल मोहन ने कंपनी की कमान संभाली। वे प्रादेशिक सेना में ब्रिगेडियर थे। ब्रिगेडियर कपिल मोहन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने 'ओल्ड मंक' का कभी विज्ञापन नहीं किया। उनका मानना था कि उत्पाद की गुणवत्ता ही उसका सबसे बड़ा विज्ञापन है। ब्रिगेडियर कपिल मोहन ने लगभग 40 वर्षों तक कंपनी का नेतृत्व किया और इसे वैश्विक पहचान दिलाई। 


हालांकि 'ओल्ड मंक' को उनके भाई वेद रतन मोहन ने लॉन्च किया था, लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध करने का श्रेय ब्रिगेडियर कपिल मोहन को जाता है। उनके नेतृत्व में यह दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बिकने वाली रम बनी। मजेदार तथ्य यह भी है कि पूरी दुनिया को रम पिलाने वाले कपिल मोहन खुद चाय प्रेमी थे। उन्होंने कभी शराब को हाथ नहीं लगाया। वे समाज सेवा में भी काफी सक्रिय रहे और सोलन में बना अनूठा मोहन मीकिन विरासत पार्क कपिल मोहन की ही कल्पना का प्रतिबिंब है।

शनिवार, 18 अप्रैल 2026

क्या है प्री 42, सेटलर और 10 इयर्स की कहानी..!!


प्री 42, सेटलर, 10 इयर्स और 2003/04 को पढ़कर आपके दिमाग में क्या आ रहा है? यही न, की यह कोई गणितीय पहेली है लेकिन हकीकत यह है कि यह कोई गणित का जोड़ घटाना नहीं बल्कि सुविधाएं प्रदान करने की सीमा है। वैसे, इन संख्याओं को देखकर मुझे भोपाल के बस स्टॉप की याद जरूर आ गई क्योंकि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में बस स्टॉप के नाम नहीं बल्कि नंबर हैं। यहां 6 नंबर, 7 नंबर, 10 नंबर, 11 नंबर जैसे दसियों बस स्टॉफ हैं । अब तो बस स्टॉप के नामों की संख्या पौने छह, सवा छह और साढ़े छह तक पहुंच गई है। 
खैर, अभी बात इस लेख में दी गई संख्याओं की करते हैं। आमतौर पर देश में आरक्षण या सुविधाएं देने के लिए आबादी, अनुसूचित जाति या जनजाति जैसे अलग अलग आधारों का सहारा लिया जाता है लेकिन हमारे देश में एक राज्य ऐसा भी है जहां लोगों को सुविधाएं या सुविधाओं में आरक्षण प्रदान करने के लिए वर्ष को आधार बनाया गया है। यह है अंडमान और निकोबार द्वीप समूह..जहां  स्थानीय लोगों को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए वर्ष मुख्य आधार है।


मुझे लगता है कि अब आप शायद बात को कुछ कुछ समझने लगे होंगे। फिर भी और सहज भाषा में समझे तो प्री 42, सेटलर या इसी तरह के अन्य आधार यहां मूल निवासी तय करने के लिए निर्धारित किए गए हैं। जो जितना पुराना होगा उसे मूल निवासी के हिसाब से उतनी ज्यादा सुविधाएं मिलेंगी। दरअसल,अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत का एक अनोखा संघ राज्य क्षेत्र है, जहाँ करीब 836 द्वीपों में से मात्र 31 पर ही मानव बसावट है। इससे भी उल्लेखनीय बात यह है कि यहां सरकार को अन्य राज्यों से लोगों को लाकर बसाना पड़ा है। इसी बसाहट ने यहां नंबर प्रणाली को जन्म दे दिया। 

सबसे पहले बात प्री-42 की…यह नाम अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 1942 से पहले के बसने वालों और उनके वंशजों को दिया गया है। इसका मतलब यह है कि ऐसे लोग जो इस द्वीप समूह में मार्च 1942 में जापानी कब्जे से पहले यहाँ रहते थे। ये इन द्वीपों के गैर-आदिवासी मूल निवासी माने जाते हैं, जिन्हें लोकल बोर्न या आइलैंड ओरिजिन भी कहा जाता है। प्री-42 समुदाय ब्रिटिश उपनिवेशवाद, काला पानी की सजा, विश्व युद्ध और भारत की स्वतंत्रता सहित तमाम ऐतिहासिक बदलावों का साक्षी है।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक प्री-42 समुदाय के पूर्वज मुख्य रूप से 1858 के बाद ब्रिटिश काल में अंडमान आए थे या लाए गए थे। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार ने अंडमान के द्वीपों को दंडात्मक बस्ती का रूप दे दिया । क्रांतिकारियों के साथ साथ कैदियों, सिपाहियों, मजदूरों, किसानों, शिक्षकों और प्रशासनिक कर्मचारियों को सहयोग के लिए यहाँ भेजा गया। इनमें बड़ी संख्या में बंगाल, बिहार, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे इलाकों के लोग शामिल थे । अधिकांश  लोग जबरन यहां लाए या भेजे गए थे । इन लोगों ने सब कुछ भुलाकर 1858 से 1942 तक इन द्वीपों को बसाने, खेती करने और प्रशासन चलाने में जुट गए । 


कुछ इतिहासकारों के अनुसार, प्री-42 समुदाय के सदस्यों ने तो चोल साम्राज्य के दौर को भी देखा है। वैसे, तथ्य यही बताते हैं कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सबसे पुराना इतिहास आदिवासियों का ही है और यह भी हज़ारों साल पुराना है । यहाँ मुख्य रूप से 6 जनजातियाँ निवास करती हैं, जिन्हें अंडमानी (नेग्रिटो समूह) और निकोबारी (मंगोलॉयड समूह) में बांटा गया है। वे पारंपरिक रूप से शिकार, मछली पकड़ने एवं जंगलों पर निर्भर हैं। अंडमान समूह में जारवा, सेंटिनलीज़, ओंगे और ग्रेट अंडमानी शामिल हैं जबकि निकोबार समूह में निकोबारी और शोम्पेन आदिवासी शामिल हैं। इनमें  खासतौर पर सेंटिनलीज़ और जारवा बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह कटे हुए हैं, जबकि ओंगे और महान अंडमानी आंशिक रूप से संपर्क में हैं। माना जाता है कि अंडमान के आदिवासी लगभग 60,000 साल पहले अफ्रीका से प्रवास करके यहां आए थे।

लेकिन, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थायी बसावट ब्रिटिश काल से ही शुरू हुई। 1942 में जापानी सेना ने अंडमान-निकोबार पर कब्जा कर लिया। प्री-42 परिवारों ने इस काल में भारी कीमत चुकाई । कई लोगों ने अपनी जान गँवाई, परिवार बिखरे और अत्याचार सहन करने पड़े। 1945 में जापान की हार के बाद फिर ब्रिटिश वापस आए लेकिन इन लोगों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया। स्वतंत्रता के बाद 1947 से जरूर इन द्वीपों का स्वरूप बदलना शुरू हुआ ।

इनके बाद आता है सेटलर का नंबर। दरअसल, स्वतंत्रता के बाद सरकार ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के विभिन्न द्वीपों की आबादी बढ़ाने और खेती किसानी को बढ़ावा देने के लिए ‘सेटलर स्कीम’ चलाई। इसके अंतर्गत तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में लोगों को यहां लाया गया । इन नए बसने वाले लोगों को भूमि, सरकारी नौकरियाँ और व्यापारिक अवसर दिए गए। इसी तरह 10 ईयर की श्रेणी उन लोगों की है जो सेटलर के बाद यहां आए।  सबसे आखिरी श्रेणी में वे लोग शामिल हैं जो 2003/4 में यहां आकर बसे हैं।


हालांकि, अब जनसंख्या बढ़ने और विभिन्न राज्यों के लोगों की मौजूदगी के कारण अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भी अन्य राज्यों की तरह हो गए हैं। लेकिन एक सबसे बड़ा फर्क आज भी है..वह यह कि यह द्वीप समूह चारों ओर से समुद्र से घिरा है। यह इतना बड़ा फर्क है कि यह मैदानी राज्यों एवं यहां के द्वीपों में अंतर कम ही नहीं होने देता। यहां जरूरत की अधिकतर चीजें तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे अन्य मैदानी राज्यों से आती हैं इसलिए उनकी उपलब्धता एवं कीमत में भी फर्क साफ दिखाई देता है। यहां बाह्य संपर्क के लिए हवाई और जलमार्ग जैसे बस दो ही साधन हैं। हमारे राज्यों की तरह रेल या बस सेवा नहीं है। कुल मिलाकर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण हमारे सामान्य मैदानी राज्यों से अलग है और इसका असर यहां हर क्षेत्र में दिखाई पड़ता है।

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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

अबोलेपन से परिवारों में बढ़ता अलगाव..!!


तकनीक ने हमारे जीवन को सहज बनाने के साथ-साथ जटिल भी बना दिया है। इसका सबसे ज्यादा असर मां-बाप और बच्चों के बीच के रिश्ते पर पड़ रहा है और परिवार एक अनजानी दूरी का शिकार हो रहे हैं । यह दूरी केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक अधिक है। अविश्वास, अबोलापन और संवाद की कमी ने इस परिवारों के करीबी रिश्तों को कहीं न कहीं खोखला करना शुरू कर दिया है। 

चिंता की बात यह है कि मां-बाप और बच्चों के बीच अविश्वास की जड़ें आमतौर पर छोटी-छोटी गलतफहमियों से शुरू होती हैं। आज के बच्चे डिजिटल दुनिया में पल रहे हैं, जहां उनकी निजता और डिजिटल स्वतंत्रता उनके लिए सर्वोपरि है। दूसरी ओर, पारंपरिक मूल्यों और अनुभवों से निर्देशित माता पिता अपने बच्चों की इस नई दुनिया को पूरी तरह समझ नहीं पाते। नतीजा यह होता है कि बच्चे अपनी बातें खुलकर साझा नहीं कर पाते हैं और माता-पिता को लगता है कि बच्चे उनसे कुछ छिपा रहे हैं। यह आगे चलकर अविश्वास का एक दुष्चक्र बन जाता है।

मसलन, एक किशोर जो अपने दोस्तों के साथ सोशल मीडिया पर घंटों समय बिताता है, वह माता-पिता की नजर में गलत संगत में पड़ सकता है। माता-पिता की बार-बार पूछताछ या ताक झांक बच्चे को खुद में और अधिक समेट देती है। वह सोचता है कि मां बाप उसे समझते ही नहीं हैं! जबकि, माता-पिता को लगता है कि उनका लाडला बच्चा भटक रहा है। इस तरह, अविश्वास की यह छोटी सी चिंगारी धीरे-धीरे रिश्ते में एक बड़ी खाई बन जाती है।

अविश्वास के साथ-साथ अबोलापन भी इस समय एक बड़ा मुद्दा है। पहले, परिवार एक साथ बैठकर भोजन करते थे, गपशप करते थे और एक-दूसरे की जिंदगी का हिस्सा बनते थे। लेकिन आज, मोबाइल फोन, ईयर फोन, बड्स, लैपटॉप और हेडफोन ने परिवार के बीच की बातचीत को लगभग खत्म कर दिया है। बच्चे अपनी दुनिया में खोए रहते हैं, और माता-पिता अपनी.. या फिर वे अपने काम में व्यस्त रहते हैं। कई बार वे बच्चों की इस आधुनिकता के साथ तालमेल बिठाने में असमर्थ हो जाते हैं।

यह अबोलापन केवल शब्दों की कमी नहीं है, बल्कि भावनाओं के आदान-प्रदान की कमी भी बन रहा है। एक मां जो अपने बेटे से पूछती है कि आज स्कूल में क्या हुआ? और जवाब में केवल कुछ नहीं सुनती है तो वह भी धीरे-धीरे पूछना बंद कर देती है। इधर, बच्चा सोचता है कि माता-पिता को उसकी जिंदगी में कोई दिलचस्पी नहीं है। समय के साथ दोनों पक्ष खामोशी की इस दीवार को और ऊंचा करते जाते हैं।

संवाद की यह कमी वह गहरी खाई है जो अविश्वास और अबोलापन को लगातार गहरा करती जाती है। हम सभी जानते हैं कि संवाद केवल बातचीत नहीं है बल्कि यह परिवार में एक-दूसरे को समझने, उनकी भावनाओं को महसूस करने और उनके दृष्टिकोण को स्वीकार करने की कला है। आज के समय में, माता-पिता और बच्चे एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दो अलग-अलग दुनियाओं में जीते हैं। यह संवादहीनता कई बार पीढ़ीगत अंतर के कारण भी बढ़ती जाती है क्योंकि माता-पिता अपने अनुभवों के आधार पर बच्चों को सलाह देते हैं, जो आज की डिजिटल और वैश्विक दुनिया में शायद उतने प्रासंगिक नहीं लगते। उधर, बच्चे चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए, न कि उनकी गलतियों पर लंबा व्याख्यान दिया जाए। 

इस अंतर को पाटने के लिए दोनों पक्षों को एक-दूसरे की ओर कदम बढ़ाने की जरूरत है। बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार अपनाकर भी इस दूरी को पाट सकते हैं । जैसे बच्चों की बातों को बिना आलोचना किए सुनना चाहिए। बच्चों के पसंदीदा गेम या सोशल मीडिया ट्रेंड के बारे में बात करके भी उनके करीब आया जा सकता है। इसी तरह खासतौर पर माता-पिता को यह समझना होगा कि आज की पीढ़ी का दबाव और चुनौतियां उनकी पीढ़ी से बिल्कुल अलग हैं। साथ ही, उन्हें अपने बच्चों को भी यह समझाना पड़ेगा कि उनकी चिंता का कारण प्रेम है, न कि नियंत्रण की इच्छा।

इसके अलावा, अभिभावकों को हर दिन कुछ समय ऐसा समय नियत करना चाहिए जब पूरा परिवार एक साथ बिना किसी डिजिटल हस्तक्षेप के समय बिताए। यह समय खाने की मेज पर, पार्क में सैर करते हुए या कोई भी साझा गतिविधि हो सकती है। इसके माध्यम से माता-पिता को अपने व्यवहार से यह दिखाना होगा कि वे बच्चों पर पूरा भरोसा करते हैं, ताकि बच्चे अपनी बातें खुलकर साझा करें।

किसी भी परिवार में परस्पर रिश्ता विश्वास, प्रेम और संवाद की नींव पर टिका होता है। अविश्वास, अबोलापन और संवाद की कमी इस नींव को कमजोर कर सकती है, लेकिन इसे ठीक करना असंभव नहीं है। बस, यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें दोनों पक्षों को धैर्य, समझ और प्रेम के साथ आगे बढ़ना होगा।

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सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...