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बुधवार, 25 सितंबर 2024
आइए, मेघा रे मेघा रे...के कोरस से करें 'मानसून' का स्वागत
पाठकों ने इस तरह बना दिया ‘अयोध्या 22 जनवरी’ पुस्तक को दस्तावेज
शनिवार 29 जून को रीडर्स क्लब भोपाल के ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम के दिन मौसम विभाग ने पहले ही भारी बारिश की चेतावनी देकर डरा दिया था। इसके बाद दिन चढ़ते ही शैतान बादलों ने अपनी धुंआधार कलाबाजियों से मौसम विभाग की चेतावनी को सच्चाई बना दिया। हम मतलब Manoj Kumar भैया, मेरे हमनाम Sanjeev Persai ,अपनी ही राशि के Sanjay Saxena और हम कदम Manisha Sanjeev जी..फिक्रमंद थे कि ऐसी बरसात में कोई कैसे आ पाएगा? लेकिन पढ़ने/सुनने/कहने की पुस्तक प्रेमियों की चाह को बारिश की धमा चौकड़ी भी नहीं रोक पाई।
कुछ भीगते,कुछ बचते बचाते लोग जुटने लगे और चार बजे के लिए निर्धारित कार्यक्रम में साढ़े चार बजे तक 9 मसाला रेस्त्रां का सभागार खचाखच भर गया (वैसे भी, भारतीय समय तो यही है कार्यक्रम शुरू होने का)। वैसे, सर्व गुण संपन्न पत्रकार Ahmad Rashid Khan ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि बेफिक्र रहिए सर, बहुत लोग आएंगे। साथ ही, मौसम वैज्ञानिक Gurudatta Mishra जी की मौजूदगी से भी हम आश्वस्त हो गए थे कि बाकी लोगों को भी आने का मौका मिलेगा।
पहले मूल रूप से लगाई गई कुर्सियां भरी, फिर अतिरिक्त और उसके बाद व्यवस्थापकों ने हाथ खड़े कर दिए कि अब और कुर्सियां नहीं लग सकती और न ही अब कुर्सियां बची हैं। जगह की हो रही कमी को महसूस कर पहले परिजनों ने कुछ कुर्सियां छोड़ी और बाद में आकाशवाणी के साथियों ने दिल बड़ा किया ताकि मेहमान बैठ सकें। कुछ लोगों ने बाहर से रिमझिम के बीच कार्यक्रम का आनंद लिया। फिर अनुशासित प्रस्तोता और संचार विशेषज्ञ संजीव ने कमान संभाली।
चूंकि कार्यक्रम एक घंटे में समेटना था (उस सभागार में आगे भी एक कार्यक्रम था और हमने तय भी यही किया था) इसलिए वक्ता भी सीमित रखे गए थे लेकिन पाठकों पर किसी का जोर चला है क्या…!! स्थिति यह बन गई कि मूल वक्ता पीछे छूट गए और उत्साही पाठक बोलते गए। संजीव ने समय की कमी के मद्देनजर भरपूर प्रयास किए और एडवोकेट Yogesh Verma जैसे कुछ अपने लोगों को सादर न बोलने के लिए मना भी लिया तो Pushpendra Mishra जी जैसे वक्ताओं को समय की सीमा में बांध दिया। फिर भी, वरिष्ठ पत्रकार चंद्रहास शुक्ला,मौसम वैज्ञानिक और मेरे छात्रावासी जीवन के वरिष्ठ गुरुदत्त मिश्रा जी, जाने माने योग गुरु Devi Dayal Bharti जी, भारतीय सूचना सेवा के साथी Ajay Upadhyay , वरिष्ठ पत्रकार शुरैई नियाजी,जनसंपर्क अधिकारी रीतेश दुबे, जाने माने कमेंट्रैटर Prashant Singh Sengar ,समाचार वाचक Dharana Sachdev और राशिद अहमद खान को अपनी बात रखने का मौका मिल ही गया।
मनीषा जी को भी अपने मनोभाव समेटने पड़े तो मनोज भैया ने अपना संबोधन और संजीव ने अपनी पटकथा सीमित कर ली। वरिष्ठ पत्रकार Ajay Bokil , Sarman Nagele, वरिष्ठ जनसंपर्क अधिकारी Manoj Dwivedi ,भारतीय सूचना सेवा के Prashant Sharma और समीर वर्मा, मित्र @सुरेंद्र गुप्ता और Hema Gupta जी, डा अनामिका रावत, जानी मानी पत्रकार, उद्घोषक Sanyukta Banerjee , समाजसेवी और पर्यावरणविद डा रचना डेविड सहित कई विशिष्ट जनों की मौजूदगी ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ा दी।
इसके बाद शुरू हुआ अनूठा प्रश्नोत्तर सत्र। दोस्त,लेखक और संचारक संजय सक्सेना ने अपनी रोचक शैली में प्रश्नों के गोले दागे और हम भी निर्भीक सिपाही की तरह शब्दों की ढाल से उनका सामना करते गए। पुस्तक क्यों से लेकर हर पुस्तक के शीर्षक में अंकों के इस्तेमाल,हर लेख में चौपाई क्यों जैसे प्रश्नों के जरिए संजय ने ‘अयोध्या 22 जनवरी’ के लेखन के पीछे की कहानी पाठकों तक पहुंचा दी।
तब तक 9 मसाला रेस्त्रां की टीम गरमा गरम पकौड़े और चाय लेकर हाजिर हो गई। बारिश के बीच चाय पकौड़े की भारतीय मेजबानी और मनमोहक/लज़ीज़ सुगंध भी उपस्थित लोगों के बोलने/सुनने के इरादों को डिगा नहीं सकी। दरअसल, घड़ी की सुइयां शाम के 6 बजे के आगे पहुंच गई थी इसलिए अगले आयोजन की तैयारी के मद्देनजर 9 मसाला की टीम चाहती थी कि लोग जल्दी खाएं और जाएं..पर सभागार में मौजूद लोगों के इरादे थे कि खायेंगे जरूर पर जाएंगे पूरा सुन/देख कर ही।
खैर, किसी तरह बोलने सुनने का दौर थमा तो स्मृतियों को सहेजने के लिए मोबाइल के कैमरे मैदान में आ गए…अनगिनत फोटो, मौके पर खरीदी गई दर्जनों किताबों पर हस्ताक्षर का गौरव, ढेर सारी सराहना और फिर ऐसे ही किसी आयोजन में मिलने के वादे के बीच यह कार्यक्रम संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण चरण यह था कि शुरुआत में रीडर्स क्लब ने सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रोफेसर शरद पगारे को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की और दो मिनट का मौन रखा।
#अयोध्या22जनवरी
#ayodhya22january
एक सौ एक नॉट आउट…!!
सौ साल पूरे करना किसी भी प्रसारण माध्यम/संस्थान के लिए गर्व की बात है। हमारे देश में विधिवत रेडियो प्रसारण का आज 101 वां जन्मदिन है। 23 जुलाई, 1927 को इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी (IBC) अस्तित्व में आई और यहीं से रेडियो प्रसारण को सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन मिला. यही कारण है कि 23 जुलाई राष्ट्रीय प्रसारण दिवस के रूप में मनाया जाता है.
वैसे निजी तौर पर रेडियो प्रसारण 1923 से शुरू हो गया था। 8 जून 1936 को इसे ऑल इंडिया रेडियो (AIR) नाम दिया गया और 1957 में आकाशवाणी नाम अपनाकर कर यह रेडियो प्रसारण का पर्याय बन गया । हर साल नेशनल ब्रॉडकास्टिंग दिवस सेलिब्रेट करने का उद्देश्य रेडियो का महत्व याद दिलाना है।
इन सौ सालों में रेडियो ने सतत रूप से जवान होते हुए कई उपलब्धियां हासिल की हैं। अब नए नवेले डिजिटल रूप में साफ आवाज़, अल्फाज़ और अंदाज़ में यह मोबाइल फोन और कार के साउंड सिस्टम के जरिए हर घर तक पहुंच रहा है और हर दिल में जगह बना रहा है। यह हर जेब का हिस्सा भी बन चुका है।
हाल ही में रायटर और ऑक्सफोर्ड जैसे नामचीन संस्थानों के सर्वे में आकाशवाणी और आकाशवाणी से प्रसारित समाचारों को देश भर के सभी मीडिया में सबसे विश्वसनीय माना गया है।
तकनीकी के साथ कदम से कदम मिलाते हुए आकाशवाणी की सेवाएं अब रेडियो से भी आगे मोबाइल ऐप newsonair पर लाइव उपलब्ध हैं और आप दुनियाभर में कहीं से भी एक टच पर भोपाल से लेकर देश के किसी भी रेडियो स्टेशन का प्रसारण सुन सकते हैं।
इसके अलावा,हमारे समाचार बुलेटिन और समसामयिक कार्यक्रम यूट्यूब, एक्स और फेसबुक पर भी उपलब्ध हैं जिन्हें आप अपनी सुविधा से कभी भी और कहीं भी सुन सकते हैं। इसलिए,सबसे विश्वसनीय/सटीक/सहज और सहयोगी माध्यम के हमारे जीवन से जुड़ने-ज़िंदगी का हिस्सा बनने और तमाम उतार चढ़ाव के बाद भी निरंतर सहभागी के रूप में कायम रहने की बधाई। रेडियो इसी तरह फले फूले… सभी रेडियो प्रेमियों को बधाई-शुभकामनाएं🙏
क्या रेडियो डाइंग मीडियम है?
रेडियो डाइंग मीडियम है? रेडियो कौन सुनता है? आकाशवाणी में कैरियर की क्या संभावनाएं हैं? रेडियो प्रसारण कितने प्रकार के हैं?आकाशवाणी के समाचारों की कॉपी कैसे लिखी जाती है? यह अख़बार की न्यूज से कितनी अलग है? जैसे तमाम सवालों के साथ #lnctbhopal के ‘स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन’ के विद्यार्थियों की टीम तैयार थी…अवसर था-#राष्ट्रीयप्रसारणदिवस पर ‘बदलते वक्त के साथ बदलता रेडियो’ विषय पर संवाद का।
सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और इससे आगे बढ़ चुकी नई पीढ़ी के साथ सौ साल पुराने मीडियम की बात करना और उन्हें बातचीत में रुचि के साथ जोड़े रखना आसान नहीं है लेकिन #LNCT के सुलझे हुए गुरुओं Anu Shrivastava जी, @ManishkantJain और अन्य सहयोगियों की विद्वान टीम तथा अनुशासित विद्यार्थियों ने इस संवाद को आसान बना दिया और चर्चा संपन्न होने के बाद अधिकतर विद्यार्थियों की व्यक्त/अनकही प्रतिक्रिया यही थी कि- रेडियो और खासकर #आकाशवाणी में इतना कुछ है,हमें पता ही नहीं था।
कुछ विदेशी विद्यार्थियों को भी भारत के लोक प्रसारक के बारे में बताने का मौका मिला। उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि इस संवाद सत्र के बाद विद्यार्थियों की यह गलतफहमी दूर हो गई होगी कि रेडियो डाइंग मीडियम है और वे यह बात भी समझ सके होंगे कि रेडियो वक्त के साथ बदलता माध्यम है और भविष्य की संभावनाओं से भरपूर भी…कुल मिलाकर, एक अच्छा दिन,मजेदार संवाद और सिखाने से ज्यादा सीखने वाला भी।
बूंदों,बादलों,पानी और हरियाली का मेला!!
चेहरे के साथ अठखेलियां करती कभी नन्हीं तो कभी बादलों से तर माल उड़ाकर आईं मोटी बूंदे, कभी भिगोकर तो कभी छींटें मारकर हमारे आसपास अपनी मौजूदगी का सतत अहसास कराती रहती हैं। वहीं, काले, घने, मचलते बादल एक छोर से दूसरे छोर तक रेस लगाते से नज़र आते हैं। ऐसा लगता है अभी टूटकर बरस पड़ेंगे और आपके पास छाते में छिपकर कार में घुसने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रहेगा..लेकिन जैसे ही आप डरकर भागते हैं,ये नटखट और बदमाश बादल खिलखिलाते हुए कोलार बांध को दूर से निहारने के लिए कहीं ओर टहलने निकल जाते हैं।
आप, बादलों और बूंदों के खेल में ठीक से शामिल भी नहीं हो पाते हो कि नीचे कोलाहल करती विशाल जलराशि अपनी ओर ध्यान खींचने का पुरजोर प्रयास करती दिखती है। अथाए पानी, दूर दूर तक बस पानी ही पानी…जैसे समंदर हो। बड़े तालाब का तो फिर भी ओर-छोर दिखता है परंतु कोलार डैम में बस पानी ही पानी दिखता है। यहां पानी ने पेड़ों के समूह को खास गोलाकार अंदाज में अपनी बांहों में समेट रखा है जैसे थोड़ी-थोड़ी दूर पर पानी के गमलों में किसी ने पेड़ लगा दिए हों।
वैसे तो रहीम कह गए हैं कि ‘बिन पानी सब सून..’, लेकिन यहां पानी से भी आकर्षक है चटक हरियाली,आंखों को लुभाती, मोबाइल के कैमरों पर कब्ज़ा जमाती और हर फोटो के लिए खूबसूरत बैकग्राउंड बनाती हरियाली। आप चाहकर भी अपने आपको रोक नहीं सकते और जब पेड़ों,पानी, बादल,बूंदों (छुट्टी के दिनों में डीजल पेट्रोल भी) की मिली-जुली महक आपकी सांसों से होती हुई फेफड़ों में पहुंचती है तो वे भी फूलकर 56 इंच के होना चाहते हैं ताकि कुछ हफ्ते या महीने की शुद्ध हवा को जमा कर सकें।
कोलार रोड पर बैरागढ़ चीचली के बाद कालापानी जैसे अंतिम गांव को पार करते ही आप प्रकृति की इस लीला के साक्षी बनने लगते हैं। सड़क के दोनों ओर से ताका झांकी करते कई प्रजातियों के पेड़ आपके साथ साथ चलते हैं। रास्ते में,लाल कोयले पर सिंकते पीले भुट्टो की खुशबू से यदि आप मदहोश नहीं हुए तो अपने समय पर कोलार डैम पहुंच जायेंगे और भुट्टों ने मोहपाश में बांध लिया तो कुछ देर बाद।
हरियाली और जंगल का आलम यह है कि ऊंचाई से दिखते सड़क के कुछ टुकड़े अपने अस्तित्व के लिए लड़ते दिखते हैं। यदि आप भदभदा के गेट के दीदार और यहां जुटती भीड़ से ऊब चुके हैं तो आपके लिए कोलार डैम सर्वोत्तम विकल्प है। इसी तरह, यदि कलियासोत पर बाघ की मौजूदगी डराती है और केरवा की सड़क पर लगता जाम परेशान करता है तो जनाब,परिवार के साथ कोलार डैम का रुख करिए…यहां आपको फिलहाल प्रकृति की गोद में बैठ कर सुकून ही मिलेगा।
अंत में एक सुझाव भी: कोलार या कहीं भी प्रकृति से साक्षात्कार करने जाएं तो अपनी कार दूर खड़ी कर पैदल ही घूमे।तभी आप इतना कुछ महसूस कर पाएंगे।
समोसे-कचौरी पर क्यों मेहरबान हैं ‘सरकार’
इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट के अनुसार 20 से 79 साल की उम्र के 463 मिलियन लोग डायबिटीज की बीमारी से ग्रसित हैं। यह इस आयु वर्ग में दुनिया की 9.3 फीसदी आबादी है। रिपोर्ट कहती है कि चीन, भारत और अमेरिका में सबसे अधिक डायबिटीज के वयस्क मरीज हैं।
2021 के अध्ययन के अनुसार, भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग मधुमेह से ग्रसित हैं और इतने ही प्री-डायबिटीज थे, जबकि 31 करोड़ से ज्यादा लोगों को उच्च रक्तचाप था। इसके अलावा, 25 करोड़ से ज्यादा लोग मोटापे का शिकार हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा 2017 में जारी अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, अनुमान है कि भारत में गैर संचारी रोग के कारण होने वाली मौतों का अनुपात 1990 में 37.9 प्रतिशत से बढ़कर 2016 में 61.8 प्रतिशत हो गया है । भारत में मधुमेह और इसके दुष्प्रभावों की वजह से दस करोड़ से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है । जबकि इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट कहती है कि 20-79 आयु वर्ग को होने वाली डायबिटीज के मामले में भारत दूसरे नंबर पर है।
जिस देश में जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों की स्थिति इतनी भयानक हो और हम फिर भी शौक से हर शादी/पार्टी में जंक फूड ठूंस ठूंस कर खा रहे हैं तो हमारा भविष्य क्या और कैसा होगा,इसका सहज अंदाजा लगा सकते हैं। 2019 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि खराब आहार से वैश्विक स्तर पर तंबाकू की तुलना में ज्यादा लोगों की मौत होती है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वयस्क किसी न किसी रूप में अस्वस्थ खा रहे हैं, जिससे कुपोषण जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। हमारे आहार में जंक फूड का दायरा इतना बढ़ चुका है कि भारत में 25 प्रतिशत से ज्यादा वयस्क सप्ताह में एक बार भी हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन नहीं करते। नतीजा वे बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।
जंक फूड में मैदा और आलू से भी ज्यादा हानिकारक तेल होता है। वही तेल, जिसमें डूबते उतराते समोसे-कचौरी और ब्रेड पकौड़े देखकर हमारी लार टपकने लगती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के अनुसार एक बार खाद्य तेल के प्रयोग के बाद दोबारा उपयोग करने से कैंसर जैसी बीमारी का खतरा रहता है। तेल को बार-बार गर्म करने से धीरे-धीरे फ्री रेडिकल्स बनने से एंटी आक्सीडेंट की मात्रा खत्म होने लगती है। इसमें खतरनाक कीटाणु जन्म लेने लगते हैं, जो खाने के साथ चिपक कर हमारी सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे बॉडी में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा भी तेजी से बढ़ जाती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण की गाइडलाइन के अनुसार खाद्य तेल को तीन बार से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए । लेकिन घर से लेकर बाजार तक एक ही तेल का बार बार इस्तेमाल सामान्य बात है और मजे की बात यह है कि नियम जो भी हों परंतु तेल के बार बार उपयोग पर किसी को आपत्ति नहीं है।
भारत में जंक फूड के उत्पादन और 22सेबिक्री को नियंत्रित करने वाले कोई विशेष कानून नहीं हैं। देश में खाद्य उत्पादों की सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ही जिम्मेदार है। हालांकि, जंक फूड से संबंधित नियम इसके उपभोग से संबंधित बढ़ती चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त व्यापक नहीं है। प्राधिकरण ने उच्च वसा, नमक और चीनी वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री और विपणन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि ऐसे खाद्य पदार्थों को स्कूलों के 50 मीटर के भीतर बेचा या विज्ञापित नहीं किया जा सकता है, और इन खाद्य पदार्थों के विज्ञापन टेलीविजन पर बच्चों के कार्यक्रमों के दौरान प्रसारित नहीं किए जा सकते हैं। हालाँकि, ये दिशा-निर्देश स्वैच्छिक हैं, और इनका पालन न करने पर कोई दंड नहीं है। इसलिए सबसे जरूरी है कि जंक फूड को स्वाद के साथ सेहतमंद बनाने के लिए कुछ अनिवार्य कानूनी पहल होनी चाहिए मसलन कुछ देशों में शुरुआत हुई है जैसे कोलंबिया में ऐसे खाद्य पदार्थों पर टैक्स की दर बढ़ा दी गई है। द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित खाद्य पदार्थों पर अतिरिक्त टैक्स 10 फीसदी से शुरू होगा, जो अगले साल बढ़कर 15 प्रतिशत हो जाएगा और 2025 में 20 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। हेल्थ पॉलिसी वॉच वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार, टैक्स के दायरे में ऐसे सभी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड शामिल किए गए हैं, जिनमें ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट , सॉसेज, अनाज, जेली और जैम, प्यूरी, सॉस और मसाला शामिल हैं। मैक्सिको जैसे कुछ अन्य देशों में भी कदम उठाए गए हैं लेकिन हम नियमों और जागरूकता के अभाव में अपने पेट को बीमारियों की गोदाम और देश को बीमारियों का गढ़ बना रहे हैं।
क्या हम खानपान में कुछ अभिनव प्रयास नहीं कर सकते!! खासतौर पर ट्रेन, स्कूल कालेज की कैंटीन,सरकारी दफ्तरों की कैंटीन और सरकारी आयोजनों में मोटे अनाज से बने सेहतमंद खाद्य पदार्थ ही उपलब्ध हों, ट्रेन में शाकाहारी/मांसाहारी खाने की चॉइस के साथ साथ मधुमेह और उच्च रक्तचाप वाले लोगों के लिए अलग खाना परोसा जाए और समोसे कचौरी या आइसक्रीम को सरकारी मैन्यू से पूरीतरह बाहर कर दिया जाए। मैदे के बिस्किट और कुकीज़ को आटे या श्रीअन्न से बनाया जाए और ट्रेन/कैंटीन में पोहा,उपमा, इडली सांभर, बाजरे की खिचड़ी, चीला जैसे लज़ीज़ और सेहतमंद खानपान को शामिल किया जाए। पहले ही हम बहुत देर कर चुके हैं,यदि अभी भी जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो हमारे साथ साथ नई पीढ़ी भी बीमार बनती जाएगी और आने वाले सालों में हमारा युवा ‘डिविडेंड’ के स्थान पर देश के लिए बोझ बन जाएगा।
एक शहर से साक्षात्कार…!!
‘छोटे-छोटे शहरों से,
खाली भोर-दुपहरों से,
हम तो झोला उठाके चले।
बारिश कम-कम लगती है,
नदियां मद्धम लगती है,
हम समंदर के अंदर चले।’
वाकई, हमारा सफर कुएं से समंदर का था..अपने कस्बे से भोपाल जैसे बड़े शहर और प्रदेश की राजधानी में आना, किसी समंदर से कम नहीं था। यह बात अलग है कि प्रदेश की राजधानी भी बाद में पीछे छूट गई और कैरियर के विस्तार की रफ्तार राष्ट्रीय राजधानी तक ले गई। बहरहाल,सफर साझा था तो सामान भी,साथ भी और परस्पर सहयोग भी साझा ही था। इसका परिणाम यह हुआ कि ‘हम’ यानि मैं, इस पुस्तक के लेखक संजीव परसाई,मित्र संजय सक्सेना और अग्रज जैसे मित्र और इस पुस्तक के प्रकाशक प्रो मनोज कुमार यानि हमारे मनोज भैया और बिल्लू भैया मतलब अरविंद सिंह भाल जल्दी ही ‘मैं रंग शरबतों का तू मीठे घाट का पानी’ वाले अंदाज में इतने घुल-मिल गए कि आज तीन दशक बाद हमारी आधी दुनिया और परिवार की दूसरी पीढ़ी ने मिलकर हमारी दोस्ती को संयुक्त परिवार का सा रूप दे दिया है । हम सभी ने शहर-ए-भोपाल में सपने बुने और उन्हें पूरा भी किया। कभी शाहपुरा, तो कभी होशंगाबाद रोड, तो कभी श्यामला हिल्स होते हुए हमने भोपाल को करीब से जानने का हरसंभव प्रयास किया इसलिए जब संजीव (परसाई) ने भोपाल पर किताब लिखने का मन बनाया तो लगा कि यह किताब नहीं बल्कि साथ साथ जिए पलों की साझा यात्रा है। हम में से कुछ भोपाल से आते जाते रहे और संजीव जैसे कुछ दोस्तों के घर हमारे प्रवास का अड्डा। हमारी हर मुलाकात भोपाल को हमारे और क़रीब ले आती। शायद, ऐसी ही किसी परिस्थिति में जाने माने कवि ध्रुव शुक्ल को लिखना पड़ा होगा:
‘उसी शहर में नाल गड़ी है मेरी
उसी शहर में दाल पकी है मेरी
उसी शहर में रहते मेरे दोस्त
उसी शहर में बीवी बच्चे
उसी शहर खाल खिंची है मेरी
उसी शहर में बहुत दिनों तक
रहने से दुख होता है
उसी शहर में बहुत दिनों के बाद
लौट आने से सुख होता है।।’
संजीव अपनी लेखनी से हमें भोपाल को नए सिरे से जानने समझने का मौका देते हैं। हर पन्ने पर हमारी तीन दशकों की यादें उभर आई हैं। उनकी लेखन शैली सुसंगत और सुगम है। उन्होंने पाठकों को भोपाल की संस्कृति और इतिहास में गहराई से डुबोने के लिए प्रासंगिक संदर्भों और विवरणों का संतुलित समावेश किया है। ऐतिहासिक घटनाओं और सांस्कृतिक तत्वों का वर्णन बहुत ही सरल और स्पष्ट तरीके से किया गया है, जिससे पाठक आसानी से विषय को समझ सकते हैं। संजीव बिना कुछ कहे चुपचाप शब्दों का ऐसा मायाजाल रचते हैं कि हम भी उसमें खो जाना चाहते हैं। भोपाल को लेकर जो भाव हमारे हैं,शायद वही सोच जाने माने कवि/कलाकार हेमंत देवलेकर की भी रही होगी। तभी तो उन्होंने लिखा:
‘सुंदरता वह प्रतिभा है/जिसे रियाज़ की ज़रूरत नहीं/
भोपाल ऐसी ही प्रतिभा से संपन्न और सिद्ध/यह शहर कविताएँ लिखने के लिए पैदा हुआ/आप इसे पचमढ़ी का लाड़ला बेटा कह सकते हैं/पहाड़ यहाँ के आदिम नागरिक/झीलों ने आकर उनकी गृहस्थियाँ बसाई हैं/इस शहर में पानी की खदानें हैं/जिनमें तैर रहा है मछलियों का अक्षय खनिज भंडार/इस शहर में जितनी मीनारें हैं/उतने ही मंदिर भी/लेकिन बाग़ीचों की तादाद उन दोनों से ज़्यादा/रात भर चलते मुशायरों और क़व्वालियों के जलसों में/चाँद की तरह जागते इस शहर की नवाबी यादें/गुंबदों के उखड़ते पलस्तरों में से आज भी झाँकती हैं/इस शहर का सबसे ख़ूबसूरत वक़्त/शाम को झीलों के किनारे उतरता है/और यह शहर अपनी कमर के पट्टे ढीले कर/पहाड़ से पीठ टिका/अपने पाँव पानी में बहा देता है/और झील में दीये तैरने लगते हैं।’
अब बात पुस्तक की, ‘भोपाल: एक शहर हजार किस्से’ पुस्तक में संजीव परसाई ने भोपाल शहर की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और सामाजिक विविधताओं को अलग अलग किस्सों में पिरोया है। यह पुस्तक भोपाल शहर की तमाम कहानियाँ, अतीत के घटनाक्रम और स्थानीय किंवदंतियों को जीवंत तरीके से सिलसिलेवार पेश करती है। संजीव परसाई की धाराप्रवाह लेखनी भोपाल शहर की व्यापक और विविध तस्वीर उकेरती है। लेखक ने इस शहर के इतिहास, संस्कृति, और सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से प्रस्तुत किया है।"भोपाल: एक शहर हजार किस्से" पुस्तक में भोपाल की ऐतिहासिक घटनाएँ, प्रमुख व्यक्तित्व और सांस्कृतिक परंपराओं की विविध कहानियाँ शामिल हैं। प्रत्येक कहानी एक अलग दृष्टिकोण से शहर के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती है, जैसे कि रानी कमलापति की कथा,नवाबी दौर, विलीनीकरण आंदोलन, स्थानीय किंवदंतियाँ और शहर की सांस्कृतिक पहचान। पुस्तक बदलते और संवरते भोपाल की बहुरंगी तस्वीर पेश करती है। जब कैनवास बड़ा होता है तो उसमें रंग भी बढ़ते जाते हैं। भोपाल के विस्तारित कैनवास में भी हमें इस पुस्तक के जरिए कहीं सांस्कृतिक इंद्रधनुष देखने को मिलता है तो कहीं भोपालियों का अलग मिजाज। कहीं बड़े तालाब की विशालता आश्चर्य से आंखें फैला देती है तो कहीं कंक्रीट के नए उगते पेड़ दिल में फांस सी चुभा देते हैं। कुछ ऐसी ही स्थितियों से दो चार हुए कवि राही डूमरचीर को लिखना पड़ा होगा:
‘दरमियाँ एक तालाब था
जो नदी-सा बहता था
अब कंक्रीट के महल हैं दरमियाँ
जो पानी की क़ब्र पर उगे हैं।’
भोपाल: एक शहर,हजार किस्से’ पुस्तक की लेखन शैली कथात्मक और जीवंत है। लेखक ने भोपाल की कहानियों को एक सम्मोहक तरीके से प्रस्तुत किया है, जिससे पाठकों को शहर की प्राचीनता और आधुनिकता के समन्वय का रोचक अनुभव होता है। कहानियों की शैली और भाषा पाठकों को समय और स्थान की सीमा से परे ले जाती है।
पुस्तक में ऐतिहासिक घटनाओं के साथ-साथ सांस्कृतिक परंपराओं का भी समावेश है। पाठक भोपाल की नवाबी धरोहर, ऐतिहासिक स्थल जैसे इस्लामपुर और भारत भवन सहित स्थानीय धरोहरों की कहानियों से परिचित होते हैं। पुस्तक में प्रस्तुत तथ्य और शोध गहन और सटीक हैं। श्री परसाई ने विभिन्न स्रोतों से जानकारी एकत्र की है और उसे विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। ऐतिहासिक डेटा, सांस्कृतिक संदर्भ, और अन्य विवरण वास्तविकता पर आधारित हैं, जो पुस्तक की विश्वसनीयता को बढ़ाते हैं।
पुस्तक हमें भोपाल शहर के इतिहास,परंपरा,समृद्धि, संस्कृति और विविधता को एक नए दृष्टिकोण से समझाती है। यह न केवल इतिहास प्रेमियों के लिए है, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जो स्थानीय कहानियों और सांस्कृतिक परंपराओं में रुचि रखते हैं। "भोपाल: एक शहर हजार किस्से" एक समृद्ध और मनोरंजक पुस्तक है जो भोपाल की अनगिनत कहानियों को प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक शहर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को एक दिलचस्प और कथात्मक तरीके से उजागर करती है। यह एक उत्कृष्ट पुस्तक है जो भोपाल शहर की गहरी समझ प्रदान करती है। इसके माध्यम से पाठक भोपाल की ऐतिहासिक यात्रा और सांस्कृतिक समृद्धि के एक अनूठे दृष्टिकोण को जान सकते हैं। पुस्तक की उपयोगिता और विस्तृत विवरण इसे एक महत्वपूर्ण संदर्भ पुस्तक भी बनाते हैं।
अंत में,भोपाल एक ऐसा शहर है जहां हमें प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक विकास का एक अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है ।भोपाल विभिन्न संस्कृतियों का संगम है। यहां हिंदू, मुस्लिम और अन्य धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं। यहां की हरी भरी वादियां,तालाब झीलें,पहाड़ और सांस्कृतिक सरोकारों का असर ऐसा है कि जो एक बार यहां आता है,यहीं का होकर रह जाता है। तभी तो प्रख्यात साहित्यकार मंगलेश डबराल ने लिखा है:
‘मैंने शहर को देखा और मैं मुस्कराया
वहाँ कोई कैसे रह सकता है
यह जानने मैं गया
और वापस न आया।’
मित्र संजीव ने ‘भोपाल: एक शहर हजार किस्से’ पुस्तक के जरिए भोपाल के दो सौ सालों से ज्यादा के विस्तार को डेढ़ सौ पन्नों में समेट दिया है। भोपाल शहर के लोगों,पर्यटकों और यहां आने वाले लोगों के लिए यह पुस्तक एक ज्ञानवर्धक,मनोरंजक और भावनात्मक सहयोगी साबित होगी…बधाई और अनेक शुभकामनाएं।
अब्बू खां का कुत्ता
बड़े तालाब के किनारे बसा है भोपाल का सबसे वीआईपी और सुन्दर इलाका श्यामला हिल्स. यही की एक बस्ती में रहते थे अब्बू खां. वैसे तो अब्बू खां का भरा पूरा परिवार था लेकिन जवान होते ही बच्चे पंख फैलाकर उड़ गए और उन्होंने शहर में दीगर ठिकानों पर अपने घोंसले बना लिए. बेग़म असमय ही खुदा को प्यारी हो गयीं और अब्बू खां निपट अकेले रह गए. दरअसल, वे अपने खानदानी आशियाने का मोह छोड़ नहीं पाए और बच्चों के दड़बे नुमा घोंसलों में इतनी जगह नहीं थी कि वे अपनी हसरतों के साथ अब्बू खां की इच्छाओं को जगह दे सकें.
जैसा की होता है, अब्बू खां और बच्चों के बीच ईद का समझौता हो गया मतलब ईद पर बच्चे या तो अब्बू खां से मिलने आ जाते या फिर अब्बू खां किसी बच्चे के साथ ईद मनाने चले जाते. समय सुकून से गुजर रहा था और रही अकेलेपन की बात तो अब्बू खां को कुत्ता पालने का शौक था और वे कुत्ते को ही अपना साथी बना लेते थे,,,इससे समय भी व्यतीत हो जाता और उनका मन भी लगा रहता था.
परन्तु, अब्बू खां जितने गरीब थे उससे ज्यादा बदनसीब क्योंकि वे जब भी कुत्ते के साथ मन के तार जोड़ने लगते वह बच्चों की तरह उनके लाड प्यार से किनारा कर सड़क के आवारा कुत्तों के साथ जा मिलता और बेचारे अब्बू खां उदास एवं अकेले रह जाते. प्यार-मनुहार के साथ पाले गए कुत्ते के भाग जाने के बाद अब्बू खां ठान लेते कि अब किसी और कुत्ते को नहीं पालेंगे.
कुछ दिन तो वे अकेले गुजारते लेकिन किसी ठण्ड में कांपते या हड्डियों का दांचा बनी मां के स्तनों से भूख मिटाने के व्यर्थ प्रयास में जुटे आठ-दस पिल्लों और फिर उन्हें भूख से बिलबिलाते देखकर अब्बू खां का मन पसीज जाता और वे एक पिल्ले को अपने साथ ले आते. अब्बू खां का मन तो सभी को लाने का रहता था लेकिन खुद अब्बू खां के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ मुश्किल से हो पाता था तो वे दर्जन भर पिल्लों का बंदोबस्त कहाँ से करते इसलिए मन मारकर एक ही पिल्ला गोद ले लेते थे.
अब्बू खां अपनी तरफ पिल्ले को पाल पोसकर बड़ा करने में हरसंभव प्रयास करते थे जैसे ब्रेड खिलाना,कभी कभी बिस्किट तो कभी दूध में रोटी गलाकर देना और कभी जुगाड़ हो जाए तो अपने हिस्से में से मटन-चिकन का स्वाद भी लगा ही देते थे. पिल्ला जब तक पिल्ला रहता तो दिनभर अब्बू खां के सामने कूं कूं कर दुम हिलाता रहता,उनके पैरों को कभी चाटता तो कभी लोट-पोट होता रहता.
अब्बू खां का भी मन लगा रहता था. दिक्कत पिल्ले के बड़े होने के बाद शुरू होती थी क्योंकि जैसे ही उसे बाहर की हवा लगती वह धीरे धीरे अब्बू खां से कन्नी काटने लगता और फिर किसी दिन फुर्र हो जाता. बेचारे अब्बू खां गम में डूब जाते और फिर कभी कुत्ता नहीं पालने की कस्में खाते. इस बार, तो अब्बू खां ने वाकई ठान लिया था तभी तो गली-मोहल्ले में किकियाते-चिचियाते और उनके पैरों में लोट पीट होते पिल्लों को देखकर भी उन्होंने अपना मन कड़ा कर लिया था. कुछ महीने यूँ ही बीत गए और अब पास-पड़ोस के लोग भी समझ चुके थे कि इस बार अब्बू खां अकेले रहने का मन बना चुके हैं.
सब कुछ ठीक चल रहा था तभी उनकी जिन्दगी में रुस्तम की घुसपैठ हुई. घुसपैठ इसलिए क्योंकि अब्बू खां ने तो कुत्ता नहीं पालने की जिद ठान ली थी लेकिन मासूम और पनीली आखों वाला,भूरे रंग का तथा किसी विदेशी नस्ल के कुत्ते को मात करता रुस्तम आते जाते उनकी ओर टकटकी लगाये देखता रहता और अब्बू खां के पास आते ही उनसे लिपट जाता. उसकी मासूमियत और सुन्दरता इतनी मनमोहक थी कि अब्बू खां को अपनी कसम तोडनी पड़ी और वे रुस्तम को घर ले आए.
दरअसल,रुस्तम उसका नाम नहीं था बल्कि अब्बू खां ने प्यार से उसका नाम रुस्तम रख दिया था. रुस्तम के आते ही अब्बू खां का आशियाना फिर चहल पहल का अड्डा बन गया. अडोस-पड़ोस के बच्चे रुस्तम के साथ खेलने लगे और रुस्तम के बहाने अब्बू खां के नियमित खानपान की व्यवस्था भी होने लगी.
रुस्तम वाकई में अब्बू खां के अब तक पाले गए कुत्तों से अलग था. जब वे उसे मोहल्ले के इकलौते हैंडपंप के नीचे बिठाकर नहलाते तो उसका रोम रोम खिल उठता और फिर उसके सामने श्यामला हिल्स के साहबों के यहाँ पेडिग्री खाकर एसी में मस्त गुलगुले बिछौने पर सोने वाले और मेमसाहबों की गोद में चढ़कर लड़ियाने वाले विदेशी नस्ल के महंगे पिल्ले भी फीके पड़ जाते. विदेशी नस्ल के झबरे,बड़े मुंह वाले,लम्बे मुंह वाले और बालों से आँख तक ढककर घूमने वाले कुत्ते तो कुत्ते उनके मालिक और मैडम भी रुस्तम को ईर्ष्या से देखते थे और फिर अंग्रेजी में बड़-बड़ करते हुए अपने विदेशी कुत्ते को देशी सड़क पर पूर्ण देशी अंदाज में हगा-मुताकर अन्दर ले जाते.
अब्बू खां को न उनकी अंग्रेजी समझ में आती और न ही जलन...वे तो बस, रुस्तम की मस्ती में मगन रहते. अब्बू खां का घर मस्जिद के करीब था और वैसे भी मस्जिद के मौलाना साहब गला फाड़कर इतनी ऊँची आवाज़ में अज़ान भरते थे कि गैर नमाजियों की भी हडबडाकर नींद खुल जाती थी. रुस्तम को पता नहीं क्यों मौलाना साहब की आवाज़ खूब पसंद आने लगी थी क्योंकि जब भी वे अज़ान भरते रुस्तम उनके सुर में सुर मिलाकर ऊँचा मुंह करके आवाज निकालने लगता. कुछ दिन में उसका अभ्यास और समय इतना सध गया कि मौलाना साहब के साथ उसकी सुरबंदी देखने लायक हो गयी. अब्बू खां के पैर तो जमीन पर नहीं पड़ते थे क्योंकि गली मोहल्ले के लोग भी रुस्तम के इस हुनर की जमकर प्रशंसा करते नहीं थकते थे.
अब्बू खां तो रुस्तम को ख़ुदा की नेमत मानने लगे और उसकी और भी ज्यादा देखभाल और सत्कार करने लगे. अब्बू खां और रुस्तम के सम्बन्ध समय के साथ गहरे होते गए और अब उनका दिनभर रुस्तम के साथ ही बीतते लगा. उधर,समय के साथ रुस्तम का आकार भी बढ़ने लगा और अब वह भरा-पूरा, जवान और किसी उम्दा नस्ल का कुत्ता दिखता था. रुस्तम के बड़े होने के साथ ही अब्बू खां की चिंता बढ़ने लगी और वे उसे बाहरी या यों कहें सड़क की दुनिया की हवा लगने से बचाने के लिए तमाम जतन करने लगे.
किसी तरह कबाड़ी से जुगाड़ कर अब्बू खां एक पुरानी जंजीर ले आए और रुस्तम को पहना दी. जब भी अब्बू खां रोटी-पानी के प्रबंध के लिए जाते रुस्तम को जंजीर से बाँध देते थे जिससे वो घर से बाहर नहीं जा सके. अब्बू खां अब निश्चिन्त थे कि रुस्तम अब नहीं भाग पायेगा लेकिन रुस्तम तो रुस्तम था. वह मौलाना साहब की आवाज़ के साथ साथ अपनी बिरादरी की आवाज भी पहचानने लगा था और अक्सर उनके साथ अपनी आवाज बुलंद कर अपनी मौजूदगी का अहसास भी करा ही देता था.
अब्बू खां की जंजीर ने रुस्तम को तो रोक लिया था लेकिन उसकी बिरादरी को कैसे रोकते इसलिए गाहे-बगाहे गली के आवारा कुत्तों का झुण्ड रुस्तम के दीदार को आ ही जाता. इस झुण्ड में रुस्तम की हमउम्र जैसी भूरी भी थी जो कुछ देर रूककर रुस्तम को निहार लेती थी.धीरे धीरे रुस्तम और भूरी में नैन-मटक्का शुरू हो गया और भूरी अपने झुण्ड से विद्रोह कर रुस्तम के आसपास मंडराने लगी.
अब रुस्तम को भूरी और बाहर की दुनिया अच्छी लगने लगी. आखिर बुजुर्ग अब्बू खां और उनकी पुरानी जंजीर जवान-तंदुरुस्त रुस्तम को कब तक रोक पाते. उसने एक दिन जोर लगाया और जंजीर के टुकड़े टुकड़े हो गए. फिर क्या था रुस्तम ने ‘जब हम जवां होंगे,जाने कहाँ होंगे...’ अंदाज में भूरी के साथ अब्बू खां का आशियाना छोड़ दिया.
अब्बू खां ने भरसक कोशिश की रुस्तम को रोकने की लेकिन जवानी के सामने लाचार बुढापे का क्या जोर. रुस्तम और भूरी दिनभर साथ साथ घूमे-खेले और अपनी तमाम हसरतें पूरी करते रहे. इस दौरान वे अब्बू खां के इलाक़े से काफी दूर निकल आए. अँधेरा होते ही भूरी अपने झुण्ड के साथ अपने सुरक्षित ठिकाने पर निकल गयी और रुस्तम नयी मंजिल की ओर.
रुस्तम को अब तक बाहर की दुनिया लाज़वाब लगने लगी थी क्योंकि कहाँ अब्बू खां की जरा सी झोपडी और जंजीर वाला कैदखाना और कहाँ भूरी,पार्क,सड़क,बिजली और सड़क पर मौजूद खाने-पीने के साधनों से भरी आज़ाद दुनिया...इसलिए रुस्तम ने वापस नहीं लौटने का फैसला किया. यहाँ तक की मौलाना साहब की आवाज़ भी रुस्तम को वापस नहीं बुला सकी. रात ढलते ही रुस्तम ने एक पार्क में बेंच के ऊपर अपना ठिकाना बनाया और सो गया.
कुछ ही वक्त बीता होगा कि उसने खुद को उस इलाक़े के खूंखार,गंदे,डरावने और पैने दांतों वाले दर्जन भर कुत्तों की गैंग से घिरा पाया. अब तक अब्बू खां के लाड में पले रुस्तम को लड़ना तो आता नहीं था इसलिए उसने झुककर और बचकर निकलना चाहा. गली के कुत्तों के लिए तो रुस्तम बंगलों में ऐशो आराम से पल रहे कुत्तों का प्रतिनिधि था और वे किसी भी अमीर कुत्ते को अपने बीच सुख से सोते हुए कैसे बर्दाश्त कर सकते थे इसलिए उन्होंने विदेशी कुत्तों के प्रति अपनी पूरी नाराजगी रुस्तम पर उतार दी.
रुस्तम ने हरसंभव प्रतिशोध किया लेकिन कहाँ लड़ाई में पारंगत सड़क के कुत्ते और कहाँ नाजो में पला रुस्तम...कुछ देर में ही उसकी हिम्मत जवाब दे गयी और फिर क्या था गली के कुत्तों ने नोंच नोचकर रुस्तम से विदेशी कुत्तों की शान शौकत भरी जिन्दगी के प्रति अपने विरोध का बदला ले लिया...कुछ ही देर में रुस्तम ने दुनिया छोड़ दी.
रुस्तम और कुत्तों की गैंग की इस लड़ाई को उस पार्क के पेड़ पर बैठी चिड़ियाओं का एक समूह भी देख रहा था. लड़ाई पूरी होते ही जवान चिड़ियाओं ने कहा कुत्तों का गैंग जीता,परन्तु एक बूढी चिड़िया ने कहा –रुस्तम जीता क्योंकि उसने गुलामी की बेड़ियाँ तोड़कर आज़ादी को चुना. सुबह रुस्तम को तलाशते पार्क पहुँचे अब्बू खां का कलेजा मुंह को आ गया और उन्होंने फिर कसम खाई कि अब कोई कुत्ता नहीं पालेंगे.
(पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षाविद जाकिर हुसैन की सुप्रसिद्ध कहानी ‘अब्बू खां की बकरी’ से प्रेरित)
ढाई राज्यपाल और दो मुख्यमंत्रियों वाला अनूठा शहर…!!
‘बालूशाही’ के बहाने बदलाव की बात…!!
इन दिनों पिज़्ज़ा, बर्गर,केक और पेस्ट्री में डूब-उतरा रही नयी पीढ़ी ने तो शायद बालूशाही का नाम भी नहीं सुना होगा। इस पीढ़ी को समझाने के लिए हम कह सकते हैं कि बालूशाही हमारे जमाने का मीठा बर्गर था या फिर आज का उनका प्रिय डोनट। समझाने तक तो ठीक है, लेकिन ‘कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली’ वाले अंदाज में कहें तो बालूशाही की बात और अंदाज़ ही निराला है।
मैदे और आटे की देशी घी के साथ गुत्थम गुत्था वाली नूराकुश्ती के बाद उठती सौंधी और भीनी सुगंध और फिर चीनी की चाशनी में इलायची की खुशबू के साथ गोते लगाती गोल मटोल बालू। दरअसल बालू इसलिए क्योंकि शाही सरनेम तो इसे चीनी और इलायची का आवरण ओढ़ने के बाद ही मिलता है। कई जगह इसे बालुका भी कहते हैं जिसका अर्थ होता है बाटी या गेंहू से बनी गेंद। जब यह बालुका, चाशनी को पीकर और उसमें नहाकर शाही तेवर अपनाते हुए इतनी मुलायम हो जाती है कि मुंह में रखते ही घुल जाती है।
देखने में कचौरी की छोटी-मीठी बहन और आकार में लड्डू की दीदी बालूशाही किसी समय हर शादी-ब्याह,पार्टी और पंगत का सबसे प्रमुख आकर्षण होती थी। अपने मीठे पर सूखे कलेवर के कारण इसे कहीं भी लाना-ले जाना और रिश्तेदारी में भेजना भी आसान था क्योंकि न तो यह गुलाब जामुन खानदान की तरह रस टपकाकर कपडे ख़राब करती है और न ही लड्डू की तरह भरभरा कर बिखर जाती है बल्कि यह तो ‘माँ’ की तरह ऊपर से कठोर और अन्दर से नरम स्वभाव वाली है।
हमारी बालूशाही खोया और छेना की छरहरी मिठाइयों की तरह भी नहीं है जिनके स्वाद की असलियत दो चार दिन में खुल जाती है और वे बेस्वाद हो जाती हैं जबकि बालूशाही तो कई दिनों तक अपने स्वाद को अपने अंदर सहेजे रहती है। उत्तरप्रदेश और बिहार में तो बताते हैं कि आज भी बालूशाही का राज चल रहा है और नए दौर की मिठाइयाँ इसके इर्द-गिर्द उसी तरह संख्या बढाने का काम काम करती हैं जैसे विवाह में दुल्हन की सहेलियां। उत्तरप्रदेश के बरेली के श्यामगंज में रम्कूमल की दुकान पर मिलने वाली शुद्ध देशी घी में बन रहीं करीब 100 साल पुरानी बालूशाही की मिठास आज भी लोगों को अपनी ओर खींच लाती है। बरेली का झुमका तो पहले ही बरेली के बाजार को देश भर में लोकप्रिय बना गया लेकिन यहाँ की बालूशाही ने झुमके को भी पीछे छोड़ दिया।
भारत ही क्या, हमारे हमजाया पाकिस्तान-बांग्लादेश और नेपाली व्यंजनों में भी यह ऊँचे दर्जा रखती है। बालूशाह, मक्खन बड़ा,भक्कम पेड़ा और या बाडुशा जैसे नामों से लोकप्रिय बालूशाही के नाम से भी जाना जाता है.जब बालूशाही में क्षेत्र के अनुसार कई तरह के बदलाव भी देखने को मिलते हैं मसलन उत्तर भारत में बालूशाही ज़्यादा मालदार होती है, वहीँ, दक्षिण में आमतौर पर सूखी और कम मीठी । लेकिन इस विविधता के बावजूद, बालूशाही इन दोनों ही इलाकों में अपनी खास पहचान रखती है ।
खास बात यह है कि बालूशाही पूरीतरह से स्वदेशी है और हमारे देश में ही जन्मी और सैकड़ों साल से अपने खास स्वाद के साथ विकसित हुई है। यही कारण है कि जयपुर और घनघोर मालवा में यह मक्खन बड़ा के बदले नाम से नजर आती है. इन्हीं वहीं,मक्खन बड़ा दक्षिण में बेकिंग सोडा से यारी कर यह बाडुशा कहलाने लगती है तो गोवा जाकर वहां की खुली आवोहवा में यह भक्कम पेड़ा बन जाती है.
बालूशाही की वापसी से यह बात भी साबित होती है कि किसी का भी समय सदैव एक सा नहीं रहता, वह बदलता जरूर है।बस, इसके लिए धीरज और कुछ समयानुरूप बदलाव की जरूरत होती है। इसलिए, यदि आप अभी गुमनामी के दौर से गुजर रहे हैं तो निश्चिंत रहिए वक्त आपका भी बदलेगा और आप भी अपने समाज की मुख्य धारा में एक दिन अवश्य ही वापस लौटेंगे।
और हां एक और बात, जो लोग इन दिनों सोन पापड़ी का मज़ाक बना रहे हैं वे भी ध्यान रखें कि सुनहली रंगत वाली यह मिठाई एक दिन फिर शादी-पार्टियों की शान बनेगी और तब आपको उसके डिब्बे बिना खोले किसी और के यहां भेज देने का पछतावा होगा। वैसे भी, वंदे भारत जैसी ट्रेनों में सोन पापड़ी अपने परिवार को छोड़कर अकेले नई पैकिंग में नजर आने लगी है। आप भी, समय के मुताबिक खुद में कुछ बदलाव लाइए और फिर देखिए,समाज आपको कैसे हाथों हाथ लेता है।
वे अपने से हैं, सभी के हैं, तभी तो परम प्रिय हैं गणेश…,!!
वे सहज हैं, सरल हैं और सर्व प्रिय भी। बच्चों को वे अपने बालसखा लगते हैं तो युवा उन्हें सभी परेशानियों का हल मानते हैं । बुजुर्गों के लिए वे आरोग्यदाता और विघ्नहर्ता हैं तो महिलाओं के लिए सुख समृद्धि देने वाले मंगलमूर्ति। यह देवताओं में तुलना की बात नहीं है लेकिन भगवान गणेश जैसी व्यापक, सर्व वर्ग और हर उम्र में लोकप्रियता ईश्वर के किसी भी अन्य रूप को इतने व्यापक स्तर पर हासिल नहीं है। सभी वर्ग, जाति और उम्र के लोग श्री गणेश को अपने सबसे करीब पाते हैं इसलिए वे लोक देव हैं।
उनकी भक्ति और आराधना के कोई कठोर नियम नहीं हैं। उनकी पूजा में सरलता, सार्वभौमत्व और व्यापक अपील है। आप ढाई दिन पूजिए या दस दिन, मिट्टी से बनाइए या पान सुपारी से या फिर किसी ओर सामग्री से,विधि विधान से पूजिए या केवल हाथ जोड़कर स्मरण करिए…वे आपसे खुश ही रहेंगे । गणेश जी को विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। गणेश जी को विघ्नहर्ता इसलिए माना जाता है क्योंकि वे जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं। उनकी बुद्धि और ज्ञान के किस्से घर घर में मशहूर है।
गणेश जी की सौम्य और मिलनसार छवि है, जो लोगों को उनसे जुड़ने में मदद करती है। गणेश जी सभी जाति और धर्म के लिए पूज्य हैं, इसलिए उन्हें घर घर में पूजा जाता है। भगवान गणेश को लोक देवता इस कारण से भी माना जाता है क्योंकि वे विभिन्न भारतीय परंपराओं और समाजों में व्यापक रूप से पूजित हैं। गणेश जी की पूजा हर वर्ग और जाति के लोग करते हैं, और उनकी उपस्थिति घर के हर कोने में महसूस की जाती है।
गणेश को बाधाओं को हटाने वाले और समृद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है, जिससे वे सभी लोगों के लिए प्रिय बन जाते हैं। उनकी सरलता, समर्पण, और असीमित दया के कारण वे आम जनमानस के बीच गहरे तौर पर जुड़ गए हैं। गणेश की सुंदरता, उनके विशेष रूप हाथी का सिर, मानव शरीर और उनके दया भाव की वजह से उन्हें हर उम्र के लोग पसंद करते हैं।
गणेश की कथाएँ और उपदेश जीवन की महत्वपूर्ण सीख देती हैं, जैसे धैर्य, समर्पण, और कठिनाइयों का सामना करना, जो हर उम्र के लोगों के लिए प्रेरणादायक होते हैं। कुल मिलाकर कहने का अर्थ यह है कि यदि आप सरल,सहज,मददगार और मिलनसार हैं तो आपका बेढब स्वरूप भी सब को प्रिय लगने लगते है वरना खराब स्वभाव और लोक व्यवहार की कमी आपकी सुंदरता को भी कुरूप बना सकती है। आप में क्षमता है तो आप भगवान गणेश की तरह चूहे पर बैठकर भी दुनिया जीत सकते हैं वरना जहाज भी कम पड़ जाते हैं।..और, सबसे जरूरी है सभी को साध लेने का गुण जो आपको बच्चों से लेकर महिलाओं और बुजुर्गों तक से अपनापन दिला सकता है। तो, इन दस दिनों में रिद्धि सिद्धि के दाता की भक्ति के साथ उनके स्वभाव,व्यक्तित्व और सोच की सहजता को जीवन में उतारने का प्रयास करिए और फिर देखिए कैसे समय के साथ सुख समृद्धि से आपकी झोली भरती जाएगी।
गणेश विसर्जन…मानो, मतदान की रात!!
कबीर दास जी ने लिखा है..’लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल, लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल'...कुछ यही हाल अनंत चतुर्दशी के दिन मुंबई,भोपाल और जबलपुर जैसे तमाम शहरों का था। कबीर ने यह दोहा भले ही किसी और भाव में लिखा था लेकिन फिलहाल तो यह गणेश विसर्जन के माहौल पर सटीक लग रहा था क्योंकि
हर तरफ गणेश जी ही गणेश जी थे..कहीं छोटे से खूबसूरत गणेश तो कहीं लंबे चौड़े लंबोदर, कहीं पंडाल को छूते गणेश तो कहीं भित्ति चित्र में सिमटे गणेश। भोपाल में एक पंडाल ने तो भगवान गणेश के जरिए मां भगवती और भोले शंकर दोनों को साध लिया। उन्होंने शेर पर मां दुर्गा की वर मुद्रा वाली शैली में भगवान गणेश को बिठा दिया और उन्हें शिवशंकर की तरह जटा जूट के साथ नीले रंग में रंग दिया…मतलब, आप विघ्नहर्ता के साथ शक्ति और शिव को भी महसूस कर सकें।
खैर, अनंत चतुर्दशी के माहौल पर ही कायम रहें तो तमाम घाटों पर एक के बाद एक गणेश चले आ रहे थे। कहीं, साइकिल पर गणेश तो कहीं रिक्शे पर, मोटरसाइकिल पर, कार में और यहां तक कि ट्रैक्टर और ट्रक में भी। जहां देखो वहां बस भगवान गणेश और उनके साथ था हजारों स्त्री/पुरुष/युवाओं/बच्चों का हुजूम…जो डीजे पर बज रहे अलग अलग धुन के कानफोडू गीतों पर एक ही ढंग से नाचता-कूदता सड़कों/घाटों को रौंदने पर आमादा था।
सड़कों पर गूंजती पुलिस की सीटियां और इशारे उनके नृत्य के जोश को कम करने के बजाए बढ़ाने में ‘बघार लगाने जैसा’ काम कर रहे थे। सबसे दर्शनीय आलम तो घाटों पर था…बिल्कुल मतदान वाले दिन जैसा। कल्पना कीजिए,मतदान के बाद मतपेटी और अन्य चुनावी सामग्री जमा कराने के लिए कैसा कोहराम मचता है…सभी चाहते हैं कि उनकी वोटिंग मशीन जमा हो और वे गंगा नहाएं। कुछ यही हाल विसर्जन स्थल पर प्रतिमाएं सौंपने का था। सभी इस चक्कर में थे कि फटाफट अपनी मूर्ति सौंपे और घर पहुंचे लेकिन ‘पहले मैं,पहले मैं’ की चिल्लपो में कोई भी आगे नहीं बढ़ पा रहा था जबकि भोपाल सहित तमाम शहरों में नगर निगम और जिला प्रशासन ने क्रेन और भीमकाय मशीनों के जरिए विसर्जन की आसान व्यवस्था कायम की थी।
वैसे भी,हम भारतीय मौलिक रूप से आसान व्यवस्था को भी कठिन बनाने में माहिर हैं इसलिए किसी को भगवान गणेश को क्रेन के हवाले करने की जल्दी थी तो कोई मंडल सपरिवार यहां भी फुरसत से आरती करने में जुटा था।
बारिश और कारों की धमा चौकड़ी के कारण विसर्जन घाट में बना कीचड़ का दरिया मानो चप्पल जूतों से होकर कपड़ों पर मॉर्डन आर्ट बनाने को बेताब था । फिर भी, उसी में छप छप करके अपने साथ साथ अन्य लोगों को अपनी कीचड़-कारी का नमूना पेश करते लोगों में अपनी अपनी प्रतिमाएं सौंपने की होड़ मची थी। हड़बड़ी में कुछ लोगों ने अपने वाहन भी इतने बेतरतीब तरीके से खड़े किए थे कि गलती से भी कोई बिना कीचड़ में लिपटे न निकल सके। इस सबके बाद भी विसर्जन वीर पूरे जोश में थे और कुछ तो होश तक खो चुके थे। इस तरह के टुन्न बहादुरों को नियंत्रित करना ज्यादा मुश्किल था क्योंकि उत्साह में उनके क्रेन पर चढ़कर प्रतिमा की जगह खुद विसर्जित होने का खतरा ज्यादा था। फिर भी सरकारी अमले ने आपा नहीं खोया और विसर्जन कार्यक्रम ‘गणपति बप्पा मोरया अगले बरस तू जल्दी आ..’ की गर्जना और मंगल कामना के साथ बिना किसी अमंगल के पूरा हो गया।
शनिवार, 15 जून 2024
भारतीय पराक्रम की स्वर्णिम गाथा है… ‘विजय दिवस’
इतिहास के पन्नों में दर्ज निर्णायक तारीख जरूर 16 दिसंबर 1971 है, लेकिन पाकिस्तान की कारगुजारियों ने उसकी नींव कई साल पहले डाल दी थी । जब उसकी सेना के अत्याचारों से कराह रहे पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने मदद के लिए भारत से गुहार लगाना शुरू कर दिया था। आखिर, तत्कालीन भारत सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और फिर भारतीय सैनिकों के शौर्य और पराक्रम का स्वर्णिम पन्ना ‘विजय दिवस’ के नाम से इतिहास में दर्ज हो गया ।
16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तान की ओर से पूर्वी मोर्चे पर कमान संभाल रहे लेफ्टिनेंट जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाजी ने भारतीय सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और हजारों उत्साही लोगों की भीड़ के समक्ष आत्मसमर्पण के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। हस्ताक्षर के बाद जनरल नियाजी ने अपनी रिवाल्वर जनरल अरोड़ा को सौंपकर पराजय स्वीकार कर ली। इस ऐतिहासिक अवसर पर बांग्लादेश सशस्त्र बल के डिप्टी कमांडर-इन-चीफ एयर कमोडोर ए के खांडकर और भारत की पूर्वी कमान के लेफ्टिनेंट जनरल जे एफ आर जैकब ने आत्मसमर्पण के गवाह की भूमिका निभाई जबकि पाकिस्तान की ओर से तो उसकी सेना के सर झुकाए 90 हजार सैनिक इस पराजय के साक्षी थे।
भारतीय सेनाओं के अदम्य साहस, वीरता, बलिदान और पराक्रम के लिए दुनिया के सैन्य इतिहास की इस अमिट तिथि को हर साल विजय दिवस के रूप में याद किया जाता है। इस दिन ऐतिहासिक युद्ध में जीत हासिल करने वाले भारतीय सैनिकों को देशभर में विनम्र श्रद्धांजलि दी जाती है। इन कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री सहित देश और प्रदेश की शीर्ष हस्तियां भी शामिल होती हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा 'विजय दिवस पर, हम उन सभी बहादुर नायकों को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जिन्होंने 1971 में निर्णायक जीत सुनिश्चित करते हुए कर्तव्यनिष्ठा से भारत की सेवा की. उनकी वीरता और समर्पण राष्ट्र के लिए अत्यंत गौरव का स्रोत है. उनका बलिदान और अटूट भावना हमेशा लोगों के दिलों और हमारे देश के इतिहास में अंकित रहेगी. भारत उनके साहस को सलाम करता है और उनकी अदम्य भावना को याद करता है.' इस साल,रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने नई दिल्ली में विजय दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य लोगों के साथ नई दिल्ली में आर्मी हाउस में विजय दिवस की पूर्व संध्या पर 'एट होम' रिसेप्शन में शामिल हुईं।
आइए, अब एक नजर इस विजय दिवस की पृष्ठभूमि पर डालते हैं। दरअसल,भारत से बेमेल विभाजन के बाद बने पाकिस्तान में पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच कभी भी एका नहीं रहा और पश्चिमी पाकिस्तान के प्रभुत्व वाले शासकों ने बंगाली बहुल पूर्वी हिस्से को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह खाई जब और चौड़ी हो गई तब 1970 के दौरान हुए आम चुनावों में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग पार्टी को जबरदस्त समर्थन मिला और उसने सरकार बनाने का दावा किया, लेकिन पाकिस्तानी हुकूमत को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि उसकी नाफरमानी करने वाली कोई पार्टी वहां सत्ता संभाले।
इसलिए जुल्फिकार अली भुट्टो के नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार ने येन केन प्रकारेण इस बात के प्रयास शुरू कर दिए कि अवामी लीग को सत्ता न मिले। अपने षड्यंत्र को पूरा करने के लिए उसने सेना को भी मोर्चे पर लगा दिया। पर्याप्त जनसमर्थन के बाद भी सत्ता से दूर रखने की साजिश का अवामी लीग ने राजनीतिक स्तर पर विरोध किया और इससे पूर्वी पाकिस्तान में हालात खराब होते चले गए। लोकतंत्र की आवाज़ को दबाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया. इस कदम से विरोध हिंसक हो गया और पाकिस्तान के दोनों हिस्सों पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हालात बेकाबू होने लगे। पूर्वी पाकिस्तान में हालात बद से बदतर होने के कारण बड़ी संख्या में वहां से शरणार्थी भारत आने लगे।
भारत ने मानवीय आधार पर शरणार्थियों को हरसंभव सहायता प्रदान की। भारत की ओर से मदद देने से पाकिस्तान बौखला गया और उसने भारत को आंख दिखाते हुए हमले करने की धमकियां देना शुरू कर दिया. अपने बिगड़ते अंदरूनी हालात के कारण पाकिस्तानी शासक वास्तव में अपनी सुध बुध खो बैठे और उन्होंने परिणामों और अपने हित अहित की चिंता किए बगैर 3 दिसंबर 1971 को भारत के कई शहरों पर हमला कर दिया. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आधी रात को देश के नाम संबोधन में पाकिस्तान की ओर से किए गए हमले की जानकारी देते हुए अपनी ओर से भी युद्ध का ऐलान कर दिया।
भारत-पाकिस्तान युद्ध करीब 13 दिन तक चला और 16 दिसंबर को भारत की ऐतिहासिक जीत और बंगलादेश के निर्माण के साथ समाप्त हुआ। युद्ध के समापन पर 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेनाओं के समकक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। इस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी. इस दौरान करीब 3 हजार 900 भारतीय सैनिकों को अपना सर्वोच्च बलिदान देना पड़ा। पाकिस्तान का तो अंतर राष्ट्रीय बिरादरी के सामने न केवल सर झुका बल्कि उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा ।
पाकिस्तान के साथ इस युद्ध में विजयश्री का वरण करने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान को एक नया राष्ट्र बनाने का एलान किया, जिससे बांग्लादेश का जन्म हुआ. इस युद्ध में भारतीय सैनिकों ने साबित कर दिया कि परम पराक्रमी होने के बाद भी भारतीय नीति के पालन करते हुए कभी भी किसी देश पर हमला नहीं करते लेकिन यदि किसी देश ने गलत इरादों और दुश्मनी की मंशा से भारत पर हमला किया तो वे मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम हैं ।
उपलब्धियों का गढ़ है डीआरडीओ
सामान्य भाषा में समझे तो डीआरडीओ भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की अनुसन्धान और विकास शाखा है, जो अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकियों और महत्वपूर्ण रक्षा प्रौद्योगिकियों और प्रणालियों में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए काम कर रही है। इस संगठन का आदर्श वाक्य "बलस्य मूलम् विज्ञानम्" - विज्ञान ही शक्ति का स्रोत है । डीआरडीओ ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी विशेषकर सैन्य प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में राष्ट्र को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने में कोई कसार नहीं छोड़ी है ।
डीआरडीओ का मूल उद्देश्य विश्व स्तरीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी आधार की स्थापना द्वारा भारत को समृद्ध बनाना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी प्रणालियों और समाधान से सुसज्जित कर हमारी रक्षा सेवा को निर्णायक बढ़त प्रदान करना है । यदि हम इसके ध्येय की बात करें तो इसमें हमारी सुरक्षा सेवाओं के लिए अत्याधुनिक सेंसर, आयुद्ध प्रणाली, प्लेटफॉर्म और संबद्ध उपकरण के उत्पादन का डिजाइन विकास और नेतृत्व करना, युद्ध के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए सेनाओं को प्रौद्योगिकी समाधान प्रदान करना और सैन्य दल के कल्याण को बढ़ावा देना तथा बुनियादी सुविधाओं और प्रतिबद्ध योग्य जनशक्ति का विकास करना तथा मजबूत स्वदेशी प्रौद्योगिकी आधार का निर्माण करना है ।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के 66 वें स्थापना दिवस पर सचिव एवं डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने डीआरडीओ की विभिन्न उपलब्धियों पर प्रकाश डाला । उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि इस वर्ष 1 लाख 42 हजार करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की डीआरडीओ की कई विकसित प्रणालियों को शामिल करने हेतु आवश्यकता की स्वीकृति भी प्रदान की गई है। यह किसी भी वर्ष में डीआरडीओ द्वारा विकसित प्रणालियों के लिए दी गई अब तक की सबसे अधिक राशि है। यह रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता का एक महत्वपूर्ण घटक है।
गौरतलब है कि डीआरडीओ ने इस साल 141 से अधिक पेटेंट दाखिल किए और 212 पेटेंट प्रदान किये हैं और उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में यह संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ेगी। डीआरडीओ द्वारा 2019 में शुरू की गई पांच युवा वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं ने भी अब प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है । खास बात यह है कि अब डीआरडीओ की परीक्षण सुविधाएं उद्योग जगत के उपयोग के लिए खोल दी गई हैं। इसी तरह, अब तक डीआरडीओ द्वारा विकसित 1650 टीओटी भारतीय उद्योगों को सौंपे जा चुके हैं। वर्ष 2023 के दौरान, डीआरडीओ उत्पादों के लिए भारतीय उद्योगों के साथ 109 प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए लाइसेंसिंग समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। कुल मिलकर हम कह सकते हैं कि भारतीय सेनाओं और रक्षा तंत्र की रीढ़ यह संस्थान आत्मनिर्भरता के जरिये देश की बहुमूल्य राशि तो बचा ही रहा है साथ ही अन्य देशों पर निर्भरता घटाकर स्वदेशी तकनीक के जरिये देश को अलग पहचान,सुरक्षा और विदेशी मुद्रा दिलाने में भी अहम् भूमिका निभा रहा है।
तो,क्या रेणु-प्रेमचंद आएंगे पुस्तक का प्रचार करने
जिन्होंने जीवन में एक किताब भी न लिखी-पढ़ी है, वे भी आपको ज्ञान देते नज़र आएंगे कि यार ज्यादा पब्लिसिटी मत करो,जिसे पढ़ना होगा खुद ढूंढकर पढ़ लेगा,किताब है उत्पाद नहीं…टाइप ज्ञान की चौतरफ़ा भरमार दिखेगी। अरे भैया, हम क्या फणीश्वर नाथ रेणु हैं या मुंशी प्रेमचंद, की लोग अपने आप तलाशकर पढ़ लेंगे। कोई भी किताब अपनी विषय वस्तु,भाषा और कथन शैली से गबन, गोदान, राग दरबारी या मैला आंचल बनती है लेकिन यह तो तब पता चलेगा जब पाठकों तक वह किताब पहुंचेगी और उन पाठकों तक किताब पहुंचाने के लिए प्रचार तो जरूरी है वरना जंगल में मोर नाचा किसने देखा इसलिए मेरी किताब ‘अयोध्या 22 जनवरी’ पढ़ो या पुस्तक ‘चार देश चालीस कहानियां’ खरीदो…कहने/पोस्ट करने/मार्केटिंग/सोशल मीडिया पर शेयर करने में क्या बुराई है?
किताब कोई अमिताभ बच्चन, रजनीकांत, शाहरुख या सलमान की फिल्म तो है नहीं कि ‘पहला दिन पहला शो’ देखने वाले टूट पड़ेंगे। वैसे भी, इन नामी गिरामी अभिनेताओं को भी अपनी फिल्म चलाने के लिए कितने धतकरम करने पड़ते हैं, हम सब जानते हैं। फिल्म की लांचिंग से लेकर रिलीज तक सैकड़ों समाचार,इंटरव्यू, चटखारेदार खबरें,फोटो…और पता नहीं क्या क्या। तब जाकर फिल्म के प्रति आकर्षण बनता है और आप बेचारे नवोदित लेखक को ज्ञान दे रहे हैं कि पब्लिसिटी मत करो..क्यों?
हम सभी को रट गया है कि ‘ठंडा मतलब कोकाकोला…’, फिर भी हर गर्मी में दिनरात रटाया जाता है और कोई ज्ञानी नहीं कहता कि भैया, अब बस करो। यही नहीं, उन्हें तो अपना उत्पाद चलाने के लिए धोनी,तेंदुलकर,ऐश्वर्या से लेकर कुत्ते बिल्ली तक का सहारा लेना पड़ता है और हम यदि अपने पाठक के साथ फोटो पोस्ट कर दें तो हायतौबा मचने लगती है। फेसबुक के तमाम मठाधीश टीका टिप्पणियां जाने लगते हैं मानो कोई धर्म विरुद्ध काम हो गया। मेरा मानना है कि पुस्तक भी एक उत्पाद है जिसे लेखक ने स्वयं के पैसे लगाकर,प्रकाशन हाउस के पैसों से या फिर किसी सरकारी संस्थान की वित्तीय मदद से तैयार किया है। लेखन से लेकर प्रकाशन तक तमाम लोगों मसलन टाइपिस्ट, डिजाइनर, मशीनमैन, तकनीशियन, ले आउट बनाने वाला, कवर बनाने वाले की मेहनत जुड़ी होती है इसलिए यदि उसका ढंग से प्रचार प्रसार नहीं हुआ तो सभी के परिश्रम पर पानी फिर जाएगा।
मेरा प्रयास भी रहता है और सलाह भी यही है कि आपकी किताब आपका और सिर्फ आपका सबसे प्रिय और कीमती प्रोडक्ट है। उसे सुधी पाठकों तक पहुंचाना प्रकाशक के साथ साथ आपका भी कर्तव्य है इसलिए भरपूर प्रचार प्रसार कीजिए, हर मंच का उपयोग कीजिए जिससे आपकी रचना स्वांत: सुखाय न रहकर पाठकों के हाथों तक पहुंचे तभी आपकी अगली पुस्तक अपने आप पाठकों के आकर्षण का केंद्र बन जाएगी और अमीश त्रिपाठी,चेतन भगत जैसा नाम बनेगा ।
हमने देखा है न कि,बाजार में सैकड़ों प्रकार के साबुन उपलब्ध हैं, फिर भी आए दिन नए नए साबुन बाजार में आ रहे हैं। उनमें से कुछ मार्केट में अपने ‘यूएसपी’ के कारण जम जाते हैं। ग्राहकों को उस उत्पाद यूएसपी का पता तभी चल पाता है जब उस साबुन/उत्पाद का प्रचार होता है। जीवनदायिनी दवाइयों तक को तो प्रचार की जरूरत पड़ती है फिर ज्ञानदायिनी पुस्तकों के प्रचार में,उनके बारे में पाठकों को बताने में और उन्हें सही हाथों तक पहुंचाने में कैसा परहेज और किस बात की शर्म।
मेरा अपना अनुभव है, जब मैंने ‘चार देश चालीस कहानियां’ लिखी तो उसका व्यवस्थित प्रचार भी किया और उसे पाठकों का भरपूर समर्थन मिला जिसे प्रकाशन समूह की भाषा में ‘बेस्टसेलर’ कहते हैं। यदि मैं,किताब प्रकाशित करवाकर घर में रखकर बैठ जाता तो कौन उसे पढ़ पाता। पहली किताब के बाद दूसरी किताब ‘अयोध्या 22 जनवरी’ के लिए तुलनात्मक कम परिश्रम करना पड़ा। चूंकि पहली पुस्तक से पाठक मेरी लेखन और कथन शैली से परिचित हो गए थे इसलिए दूसरी किताब पढ़ने के लिए उनमें से कई पाठक पुनः जुड़े…इसलिए नए लेखकों से अपील है कि बिल्कुल न झेंपे, न ही डरें…खूब प्रचार करें और पाठकों को बताएं कि किताब में क्या खास है उसकी यूएसपी क्या है..तभी वे जुड़ेंगे और तभी पढ़ेंगे और तभी आप लेखक /कवि /कथाकार /व्यंग्यकार के रूप में स्थापित होंगे।
धधकते भोपाल को चाहिए हर घर में भगीरथ..!!
शाम के साढ़े सात बज रहे हैं। आकाशवाणी भोपाल के न्यूज रूम से बाहर निकलते ही ऐसा लग रहा है जैसे किसी भट्टी के पास से गुजर रहे हैं। शाम ढलते ही सूरज को भले ही रात के अंधेरे ने अपने आगोश में समेट लिया पर उसके तेवर झेलना न तो अंधेरे के वश में है और न ही आम लोगों के। ताल तलैयों का शहर भोपाल इन दिनों धधक रहा है। अपनी हरियाली पर इतराने वाला भोपाल अब गर्मी से लाल हो रहा है और यहां रहने वालों का हाल बेहाल।
हरियाली और स्वच्छता की राजधानी में तापमान 44 डिग्री सेल्सियस को भी पार कर गया है। न्यूनतम तापमान भी 31 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं सरक रहा है। अब, जब रात का सबसे कम तापमान ही 31 डिग्री सेल्सियस हो तो पंखे आग उगलेंगे ही और फाइबर के कूलरों का लड़खड़ाना लाज़िमी है। जंबो और घर के बाहर की गरम हवा को ठंडा कर अंदर भेजने वाले फौलादी कूलर खुद पानी मांग रहें हैं। कूलर का क्या कहें, पुराने एसी ही गर्मी से हांफने लगे हैं और नए रंग-बिरंगे विज्ञापनी एसियों (ACs) को भी अपनी औकात समझ में आ गई है।
सड़कों पर बेवजह चहलकदमी करती छोटी कारें सांझ ढलने का इंतज़ार करती हैं तो दिनभर सड़कों पर हुंदराने वाले बाइक और स्कूटी सवार घरों में दुबक गए हैं। लू के थपेड़ों ने घर से बाहर निकलना मुश्किल कर दिया है। सूर्योदय के बाद मॉर्निंग वॉक करने वालों की सुबह 5 बजे होने लगी है क्योंकि इसके बाद वॉक मॉर्निंग नहीं टार्चर वॉक हो जाती है। ऐसा लग रहा है मानो दुश्मन देश की सेना आग के गोले बरसा रही है। ठंडा पानी प्यास बुझाने की बजाए पेट भरने का काम ज्यादा कर रहा है।
कभी अपने खुशनुमा तेवर,मौसम और लोगों के लिए मशहूर भोपाल ‘सिटी ऑफ लेक’ से बदलकर ‘सिटी ऑफ हीट’ बन रहा है। शहर को स्मार्ट बनाने की खातिर भेंट चढ़ गए हजारों छायादार वृक्षों की आशीष भरी ठंडक पहले ही छिन गई है और अब हर साल सैंकड़ों नए लोगों को बसाने के नाम पर लाक्षागृह के साथ साथ कांक्रीट के जंगल बोकर अपनी तिजौरियां भर रहे लोगों को न शहर के बाशिंदों की परवाह है और न ही हीटर बनते इस खूबसूरत शहर के भविष्य की।
अभी भी वक्त है क्योंकि अभी नहीं चेते तो भोपाल के जयपुर, हैदराबाद और दिल्ली बनते देर नहीं लगेगी। कुछ कदम तो अनिवार्य रूप से उठाने की जरुरत है मसलन पेड़ काटने की मनमानी खत्म हो और बिना रेन वॉटर हार्वेस्टिंग/वर्षा जल संग्रहण की सुविधा के किसी को भी घर बनाने की मंजूरी नहीं दी जाए। आवासीय कालोनियों और सड़कों के किनारे चंपा, गुलमोहर और यूकेलिप्टस जैसे रूपवान तथा सजावटी पेड़ों के स्थान पर नीम, आम जामुन,पीपल, वट जैसे धीर-गंभीर,छायादार और फलदार वृक्ष लगाएं जाएं। बिना पार्किंग व्यवस्था के कार खरीदने पर पूरी तरह रोक लगाई जाए और घर-घर बिजली बनाने के लिए सौर ऊर्जा की सूर्योदय जैसी योजनाओं को खूब प्रोत्साहित किया जाए। व्यवहारिक तौर पर सोचे तो इन कामों के लिए सरकारी नियमों के साथ साथ हमारे आपके स्तर पर भी भगीरथी प्रयासों की जरूरत है और बिना घर घर में भगीरथ तैयार किए अपने शहर को बचाना मुश्किल है।
कुछ आप भी बताइए…कैसे अपने शहरों के प्राकृतिक गुण सहेजे जाएं? कैसे उन्हें आग का गोला बनने से रोका जाए और कैसे,आखिर कैसे गर्मी की अकड़ ठिकाने लगाई जाए…बताइए जरूर!!
अयोध्या पर देश का पहला दस्तावेज
अयोध्या 22 जनवरी, पुस्तक रामलला की प्राणप्रतिष्ठा और मंदिर निर्माण की जानकारियों को समाहित करके लाया गया संभवतः देश का प्रथम दस्तावेज है। ये सच है कि #राममंदिर का प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने जरूरत से ज्यादा कवरेज किया। लेकिन इस कवरेज में अधिकतर, जरूरत का था ही नहीं। यह पुस्तक राम मंदिर और 22 जनवरी की ऐतिहासिक घटना का विस्तारपूर्वक विवरण आपको देती है।
इसमें दर्ज घटनाएं, जानकारियां, विवरण, उनकी पृष्ठभूमि पढ़ते पढ़ते आप रोमांचित भी होते हैं और यदा कदा आश्चर्यचकित भी।
पुस्तक को चार भागों उल्लास, विकास, इतिहास और दृष्टि पर्व नामक चार अध्यायों में विभाजित किया गया है, जो आपके विचारों को तारतम्य देते हैं। उल्लास पर्व में अधिकतर सामग्री प्राण प्रतिष्ठा उत्सव से जुड़ी हैं, विकास पर्व में मंदिर और अयोध्या में आए बदलावों को शामिल किया गया है। इतिहास पर्व में ऐतिहासिक घटनाओं, दस्तावेजों का चित्रण साथ ही इस आयोजन पर भी प्रकाश डाला गया है। दृष्टि पर्व में विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा इस आयोजन के बारे में की गई टिप्पणियों को समावेश है।
लेखक संजीव शर्मा
एक संयमित और जिम्मेदार लेखक हैं, ये उनकी इस वर्ष ही दूसरी कृति है। वे अतिरेक से बचते हुए अपने सम्पूर्ण लेखन को प्रामाणिक बनाए रखने में सफल रहे। सुघड़ भाषा, शब्द, विन्यास पढ़ते हुए आने वाले दबाव को संतुलित करते हैं। कुल मिलाकर एक बेहतरीन श्रेणी की पुस्तक है। यह पुस्तक उनके लिए भी है, को इस आयोजन उस दौरान नहीं देख सके और वे भी जो अगले एक दो सालों में अयोध्या जाने वाले हैं। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप आयोजन और नई अयोध्या को एक दूसरे व्यापक नजरिए से भी देख सकेंगे।इसके प्रकाशक #लोक_प्रकाशन भोपाल हैं। जिन्होंने विषय को गरिमामय अंदाज से ही प्रस्तुत किया। कागज, प्रिंटिंग, कवर, फॉन्ट, लेआउट सभी कुछ शानदार है। इसके प्रमुख Manoj Kumar जी अपने हर पुस्तक के हर पक्ष को पूरा समय देते हैं। जिससे चीजें और भी बेहतर होती हैं। लेखन और प्रकाशक की इस जोड़ी ने वाकई कमाल किया है। उन्हें इस उपलब्धि पर बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं। पुस्तक अमेजन पर भी उपलब्ध है, प्रकाशक से भी मंगा सकते हैं। जरूर पढ़िए।
पुस्तक समीक्षा : अयोध्या 22 जनवरी
लेखक : श्री संजीव शर्मा
प्रकाशक : लोक प्रकाशन, भोपाल
मूल्य: 300 रुपए मात्र
समीक्षक: संजीव परसाई
लेखक के बारे में:
संजीव शर्मा आकाशवाणी भोपाल, मप्र में समाचार संपादक हैं और भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी है। अयोध्या 22 जनवरी आपकी दूसरी पुस्तक है। इससे पहले विभिन्न देशों की यात्राओं पर केंद्रित ‘चार देश चालीस कहानियां’ पुस्तक भी काफी लोकप्रिय हुई थी। आपको माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय और शोध संस्थान भोपाल और जनसंपर्क सोसायटी ऑफ इंडिया मप्र सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं।
समीक्षक के बारे में:
संजीव परसाई जाने माने संचार कर्मी और व्यंग्यकार हैं। आप मप्र में स्वच्छ भारत मिशन शहरी के टीम लीडर हैं और कई अभिनव पहल के लिए जाने जाते हैं।
#Ayodhya #RamMandir
रिश्तों की गुल्लक सी है- ‘डायरी का मुड़ा हुआ पन्ना’
हम सभी के जीवन में बचपन से दो चीज अनिवार्य तौर पर शामिल रही हैं- एक है गुल्लक और दूसरी डायरी। गुल्लक का काम माता-पिता और रिश्तेदारों से मिले पैसों को सहेजना था तो डायरी का काम इन सभी के साथ अपने रिश्ते के तानेबाने,सुख-दुख और जीवन में घट रही घटनाओं को सहेजना।
वरिष्ठ पत्रकार, व्यंग्यकार और लेखक संजय सक्सेना की पुस्तक ‘डायरी का मुड़ा हुआ पन्ना’ रिश्तों की गुल्लक के समान है। जैसे-जैसे आप इसके पन्ने पलटते हैं,आपको अपने आसपास के किरदार, आपके साथ घटी घटनाएं और रिश्तों को सहजने-समेटने का प्रयास अपना सा नजर आता है और आप इसके सहज प्रवाह में बहने लगते हैं। लेखक ने भले ही यह कहा है कि उनकी किताब फेसबुक पर लिखे हुए पोस्ट का संकलन है लेकिन हकीकत यह है कि यह किताब रिश्तों का संकलन है, उनके आसपास के किरदारों का संग्रहण है और कई सारे भावनात्मक पहलुओं का सम्मिश्रण है।
‘डायरी का मुड़ा हुआ पन्ना’ पुस्तक की छोटी-छोटी कहानी हमें हंसाती भी हैं और कई बार गंभीर भी करती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर लेखा हमें कोई न कोई सीख देकर जाता है.. चाहे फिर वह ‘हंसता हुआ नीम का पेड़ हो’, जो हमारी जीवन शैली का मजाक उड़ाता नजर आता है या फिर ‘काम से लौट कर भी काम पर लौटती है’ लेख में घर में मां, पत्नी, बहन और बेटी की भूमिका। ‘चौपाल…’ जहां दोस्तों की महफिल सजाती है तो ‘कौन सा मेंढक न है’ लेख जीवन की कुछ और हकीकतों से रूबरू कराता है।
‘डायरी का मुड़ा हुआ पन्ना’ हमें मालवा निमाड़ की सौंधी खुशबू से जोड़ती है तो साथ ही आदिवासी संस्कृति की झलक भी पेश करती है। ‘भगोरिया’ और ‘गलचूल’ पर्वों पर केंद्रित लेख जहां हमें आदिवासियों की सहज संस्कृति से जोड़ देते हैं तो ‘नमकीन सत्तू’, ‘लंगोटिया यारी का जमघट’, ‘अटल जी का एकाकीपन’ और ‘आसान नहीं है बशीर भद्र हो जाना’... जैसे लेख समाज के आदर्शों ,उसूलों और जीवन से जुड़ी घटनाओं से हमें जोड़ते हैं।
सहज, सरल और आम बोलचाल की भाषा में लिखी गई है पुस्तक डायरी का मुड़ा हुआ पन्ना वाकई रिश्तों की मजबूत गुल्लक की तरह है जिसे हर घर के महत्वपूर्ण कोने में स्थान मिलना चाहिए ताकि आप अपने रिश्तों को, भावनात्मक पहलुओं को और अपने आसपास के किरदारों को उसमें सहजेते रहें जो आज नहीं तो आने वाले कुछ सालों बाद आपके जीवन के एकाकीपन में रंग भरने का काम करेंगे। लेखक ने खुद लिखा है:
‘काग़ज की ये महक...ये नशा रूठने को है,
ये आख़िरी सदी है...किताबों से इश्क़ की।’
पुस्तक का कवर बेहद खूबसूरत है और उतना ही खूबसूरत है अधिकतर लेखों में जाने-माने शायरों के कुछ चुनिंदा शेर । पुस्तक का प्रकाशन भोपाल के लोक प्रशासन ने किया है। यह प्रकाशन अपनी साफ सुथरी, त्रुटि रहित प्रिंटिंग,पठनीय फॉन्ट और दर्शनीय कवर के लिए तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। यह पुस्तक अमेजन से लेकर इंटरनेट की तमाम लोकप्रिय साइट पर मौजूद है। महज ₹200 में उपलब्ध 155 पन्नों में फैली रिश्तों की यह गुल्लक आपको और आपकी आने वाली पीढ़ी को परस्पर संबंधों के महत्व का पाठ पढाने के लिए वाकई जरूरी है।
पुस्तक : ‘डायरी का मुड़ा हुआ पन्ना’
लेखक : श्री संजय सक्सेना
मूल्य : 200 रुपए
पृष्ठ संख्या : 155
प्रकाशन : लोक प्रकाशन
पकवान हैं या पहाड़ी मिसाइलें..!!
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