रविवार, 7 दिसंबर 2025

कूड़ा नहीं ज़नाब, सोना कहिए सोना...!!!

एक विज्ञापन की चर्चित पंचलाइन थी कि "जब घर में पड़ा है सोना, तो फिर काहे को रोना”, और आज लगभग यही स्थिति हमारे नगरों/महानगरों में की है क्योंकि वे भी हर दिन जमा हो रहे टनों की मात्रा में कचरा अर्थात सोना रखकर रो रहे हैं। इसका कारण शायद यह है कि या तो उनको ये नहीं पता कि उनके पास जो टनों कचरा है वह दरअसल में कूड़ा नहीं बल्कि कमाऊ सोना है और या फिर वे जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं? अब यह पढ़कर एक सवाल तो आपके दिमाग में भी आ रहा होगा कि बदबूदार/गन्दा और घर के बाहर फेंकने वाला कूड़ा आखिर सोना कैसे हो सकता है?

इस पहेली को सुलझाकर आपका इस निबंध को आगे पढ़ने का उत्साह खत्म करने से पहले हम इस बात पर चर्चा करते हैं कि सही तरह से निपटान की व्यवस्था नहीं होने के कारण कैसे आज कचरा हमारे नगरों/महानगरों और गांवों के लिए संकट बन रहा है। दिल्ली में रहने वाले लोगों ने तो गाज़ियाबाद आते जाते समय अक्सर ही कचरे के पहाड़ देखे होंगे। ऊँचे-ऊँचे, प्राकृतिक पर्वत मालाओं को भी पीछे छोड़ते कूड़े के ढेर, उनसे निकलता ज़हरीला धुंआ और उस पर मंडराते चील-कौवे...ये पहाड़ शहर का सौन्दर्य बढ़ने के स्थान पर धब्बे की तरह नज़र आते हैं और यह धब्बे धीरे धीरे हमारी और हमारे बच्चों की सांसों में धीमा जहर घोलकर बीमार बना रहे है। देश के अन्य महानगरों और शहरों की हालत भी इससे अलग नहीं है। 

कचरा प्रबंधन पर काम करने वाले एक संगठन की वेबसाइट के मुताबिक, कुछ साल पहले तक दिल्ली में प्रतिदिन 9 हज़ार टन कूड़ा निकल रहा है जो सालाना तकरीबन 3.3 मिलियन टन हो जाता है। मुंबई में हर साल 2.7 मिलियन टन, चेन्नई में 1.6 मिलियन टन, हैदराबाद में 1.4 मिलियन टन और कोलकाता में 1.1 मिलियन टन कूड़ा निकल रहा है। जिसतरह से जनसँख्या/भोग-विलास की सुविधाएँ और हमारा आलसीपन बढ़ रहा है उससे तो लगता है कि ये आंकडें भी अब तक और बढ़ चुके होंगे। यह तो सिर्फ चुनिन्दा शहरों की स्थिति है, यदि इसमें देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों को जोड़ दिया जाए तो ऐसा लगेगा मानो हम कूड़े के बीच ही जीवन व्यापन कर रहे हैं।

हमारे देश में सामान्यतया प्रति व्यक्ति कूड़ा उत्पादन 350 ग्राम माना गया है परन्तु यह मात्रा 500 ग्राम तक भी हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा देश के कुछ राज्यों के कई शहरों में कराए गए अध्ययन के अनुसार शहरी ठोस कूड़े का प्रति व्यक्ति दैनिक उत्पादन 330 ग्राम से 420 ग्राम के बीच है। इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि शहरों और कस्बों के अलग-अलग आकार के बावजूद प्रति व्यक्ति उत्पादन में काफी समानता है।

यह तो हुई देश में तेज़ी से बढ़ रहे कचरे की बात लेकिन अब बात करते हैं इस लेख के मूल विषय अर्थात् कचरे को सोना कहने की। दरअसल तमिलनाडु के वेल्लोर शहर में 'गारबेज टू गोल्ड' माडल तैयार किया गया है जो अब धीरे धीरे अन्य शहरों में भी लोकप्रिय हो रहा है।  इस माडल के प्रणेता सी श्रीनिवासन ने बताया कि यदि शहरो में निकलने वाले कूड़े का सही तरह से निपटान किया जाए तो वह वाकई कमाई के लिहाज से सोना बन सकता है। श्रीनिवासन के मुताबिक फालतू समझ कर फेंका जाने वाला कूड़ा 10 रुपए प्रति किलो की कीमत तक दे सकता है जो घर में बेचे जाने वाले अखबारों के भाव के लगभग बराबर है। इसका मतलब यह हुआ जो हम घर-बाज़ार के कूड़े का जितने व्यवस्थित ढंग से निपटान करने में सहयोग करेंगे वह हमें उतनी ही अधिक कमाई देगा। यही नहीं, कूड़े के निपटान के वेल्लोर माडल से बड़ी संख्या में स्थानीय स्तर पर रोज़गार के साधन भी उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

'गारबेज टू गोल्ड' माडल में सबसे ज्यादा प्राथमिकता कूड़े के जल्द से जल्द सटीक निपटान को दी जाती है। इसके अंतर्गत कूड़े को उसके स्त्रोत (सोर्स) पर ही अर्थात् घर, वार्ड, गाँव, नगर पालिका, शिक्षण संस्थान, अस्पताल या मंदिर के स्तर पर ही अलग-अलग कर जैविक और अजैविक कूड़े में विभक्त कर लिया जाता है। फिर जैविक कूड़े को जैविक या प्राकृतिक खाद/उर्वरक के तौर पर परिवर्तित कर इस्तेमाल किया जाता है। इससे न केवल हमें भरपूर मात्रा में प्राकृतिक खाद मिल जाती है बल्कि अपने कूड़े को बेचकर अच्छी-खासी कमाई भी कर सकते हैं और इस सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें हमारे शहर को कूड़े के बढ़ते ढेरों से छुटकारा मिल जाएगा। 

महानगरों में निकलने वाले कूड़े पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक दिल्ली में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले 9 हज़ार टन कूड़े में से लगभग 50 फीसदी कूड़ा जैविक होता है और इसका उपयोग खाद बनाने में किया जा सकता है। इसके अलावा 30 फीसदी कूड़ा पुनर्चक्रीकरण (रिसाइकिलिंग) के योग्य होता है। इसका तात्पर्य यह है कि महज 20 फीसदी कूड़ा ही ऐसा है जो किसी काम का नहीं है। कमोबेश, देश के अधिकतर शहरों में यही स्थिति है इसलिए यदि वेल्लोर माडल की तर्ज पर कूड़े को उद्गम स्थल पर ही अलग अलग कर लिया जाए तो न केवल देश में गाज़ियाबाद जैसे कचरे के पहाड़ बनने पर रोक लग जाएगी, साथ ही बड़ी संख्या में बेरोज़गार युवकों को इस मुहिम से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सकेगा और देश को भरपूर मात्रा में जैविक खाद मिलने लगेगी। वैसे, केंद्र सरकार के स्वच्छता अभियान के तहत इस पर बड़े पैमाने पर अमल शुरू हो गया है और भोपाल इंदौर जैसे शहर सफाई की नई कहानी लिख रहे हैं। बस, इसके लिए इच्छाशक्ति, समर्पण, ईमानदारी जैसे मूलभूत तत्वों की ज़रुरत है।

यदि हमने एक बार यह संकल्प ले लिया तो फिर सिद्धि हासिल करने से कोई नहीं रोक सकता। प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए 'संकल्प से सिद्धि' अभियान का मूल मन्त्र भी तो यही है इसलिए बस जरुरत है देश को स्वच्छ बनाने का संकल्प लेने की और फिर उसे सिद्धि में बदलने की। एक बार हमने सच्चे मन से अपने आप को इस काम में झोंक दिया तो फिर वाकई में अब तक हमारा सिरदर्द बनने वाला कूड़ा सही मायने में सोना बन जायेगा और हमारा देश सोने की चिड़िया।


एक मुलाकात…फलों के राजा से!!


आइए, आपको मिलवाते हैं फलों के राजा हिमाचल से…जहाँ फल केवल उत्पाद नहीं बल्कि गर्व हैं। शिमला की पहाड़ियों पर लाल-गुलाबी सेब किसी राजकुमार से कम नहीं हैं। किन्नौर का अखरोट इतना चटकदार जैसे फलों का सेनापति। कुल्लू की चेरी महारानी सी लजाती है तो आड़ू गालों पर लाली लिए किसी राजकुमारी सा लगता है। नाशपाती, खुबानी, आलू बुखारा, केला, जापानी फल, मशरूम और कीवी राजा के नवरत्नों में शामिल हैं। यहाँ की मिट्टी में हिमालय का गौरव घुला मिला है…हवा में बर्फ की शान है तो धूप इतनी नफ़ासत से पड़ती है कि हर फल ‘रॉयल’ और ‘डिलिशियस’ बन जाता है। इसलिए आप जब भी कोई फल खाओ और मुँह से वाह निकले, तो समझ जाइए कि  वह फलों के राजा के दरबार से आया है।

हिमाचल प्रदेश को प्रकृति ने शिद्दत से संवारा और अपनी पूरी उदारता से नवाजा है। हिमालय की गोद में बसा यह प्रदेश केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही विख्यात नहीं है, बल्कि अपने विविध,लज़ीज़,रसीले और सेहत से भरपूर फलों के कारण भी प्रसिद्ध है इसलिए इसे भारत का फलों का टोकरा (Fruit Basket of India) भी कहा जाता है। यहाँ देश के सबसे स्वादिष्ट, रसीले और उच्च गुणवत्ता वाले फलों का उत्पादन होता है।


यहाँ पैदा होने वाले फल स्वाद, रंग, सुगंध आकार और गुणवत्ता में देश के अन्य राज्यों की तुलना में उत्तम ही नहीं बल्कि सर्वोत्तम हैं। हिमाचल में सर्वश्रेष्ठ फलों के उत्पादन और स्वाद का सबसे बड़ा कारण यहाँ की विविध भौगोलिक स्थिति और जलवायु परिस्थितियां हैं। मैदानी क्षेत्रों से लेकर हिमालय की बुलंद चोटियों तक फैली विविधता के कारण यह राज्य फल उत्पादन के लिए आदर्श है। 

समुद्र तल से 350 मीटर से लेकर करीब 4000 मीटर से अधिक ऊँचाई तक फैले हिमाचल प्रदेश में हर ऊँचाई पर अलग-अलग जलवायु मिलती है। यहां की ठंडी-शीतोष्ण जलवायु सेब के लिए बिल्कुल आदर्श है। यहाँ गर्मियों में हल्की धूप और सर्दियों में भरपूर ठंडक मिलती है, जो सेब में मिठास, रंग और क्रंच लाती है। यही कारण है कि जब आप यहां सेब खाते हैं तो उसका कड़कपन और रस से भरा स्वाद अलग ही मज़ा देता है। 


हिमाचल प्रदेश को सेब की राजधानी भी कहा जाता है। देश में उत्पादित होने वाले कुल सेबों का लगभग 40-50 फीसदी हिस्सा अकेले हिमाचल से आता है। राज्य के शिमला, कुल्लू, मनाली, किन्नौर, रोहड़ू और ठियोग जैसे इलाके सेब के उत्पादन के लिए मशहूर हैं। यहाँ के रॉयल और गोल्डन डिलिशियस सेब पूरे देश में सबसे स्वादिष्ट माने जाते हैं।

राज्य के निचले क्षेत्रों में उप-उष्णकटिबंधीय जलवायु है और इस दायरे में आने वाले इलाके मसलन कांगड़ा, ऊना जिले आम, लीची, अमरूद, केले,नींबू और संतरा जैसे फलों का गढ़ हैं। मध्य क्षेत्रों में 1000-2000 मीटर की ऊंचाई पर शीतोष्ण जलवायु के कारण आड़ू, आलूबुखारा, खुबानी, चेरी और नाशपाती खूब होती है। लेकिन हिमाचल का असली जादू ऊपरी हिमाचल में 2000-3000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर देखने को मिलता है, जहाँ ठंडी जलवायु और भरपूर धूप में विश्वस्तरीय सेब तैयार होते हैं। सेब हिमाचल की पहचान है।  

हिमाचल में केवल सेब ही नहीं, कीवी, अखरोट, बादाम, काजू, अनार, नाशपाती, केला,अंगूर भी खूब होते हैं। किन्नौर का अखरोट और खुबानी, कुल्लू-मनाली की चेरी, रामपुर का अनार और सोलन के मशरूम भी बहुत प्रसिद्ध हैं। आर्थिक दृष्टि से बागवानी हिमाचल की रीढ़ है। राज्य के लगभग ढाई लाख से ज्यादा हेक्टेयर क्षेत्र में फल बागान हैं और 20 लाख से अधिक लोग इससे जुड़े हैं। यहां सालाना 6 से 7 लाख मीट्रिक टन फल उत्पादन हो रहा है। सिर्फ 2025 में ही फलों से होने वाली कुल आय लगभग 3,500-4,000 करोड़ रुपये रही, जो पिछले वर्षों से 10-15 प्रतिशत अधिक है। यह राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15 प्रतिशत योगदान के बराबर है।

हिमाचल प्रदेश से स्वादिष्ट फल न केवल दिल्ली, मुंबई, चेन्नई,कोलकाता जैसे बड़े शहरों में पहुँचते हैं, बल्कि बांग्लादेश, श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब से लेकर अमेरिका एवं ब्रिटेन जैसे देशों में भी निर्यात होते हैं। हिमाचल को फलों का राजा बनाने में यहां के किसानों की मेहनत के साथ वैज्ञानिक शोध और सरकारों की नीतियाँ भी शामिल हैं।  सिंचाई योजनाएँ, कोल्ड स्टोरेज, पैकिंग हाउस, मार्केटिंग और सहकारी समितियों ने भी किसानों को सशक्त बनाया है एवं किसानों ने हिमाचल को फलों का राजा।



शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

शिमला से क्यों रूठा है रूमानियत का रहबर

 


शिमला में दिलकश मौसम के कारण मॉल रोड इन दिनों प्रेमी जोड़ों और नव युगलों की रूमानियत में सराबोर है। देश भर से हनीमून मनाने के लिए शिमला पहुंचने वाले जोड़ों की संख्या रोज बढ़ रही है लेकिन अपने अद्भुत रंग,कलेवर एवं पतझड़ से पूरे वातावरण में रोमांस बिखेरने वाले चिनार पर इस रूमानियत का कोई असर नजर नहीं आ रहा। यश चोपड़ा से लेकर कई फिल्म निर्माताओं ने अपनी फिल्मों में चिनार के पीले,गुलाबी और दहकते सौंदर्य का इस्तेमाल कर जबरदस्त रोमांस दर्शाया है। शिमला में चिनार की इस बेरुखी की वजह से युवा न तो शाहरुख खान की तरह बांहे फैलाकर अपनी ‘सेनोरिटा’ को लुभा पा रहे हैं और न ही उनकी ‘बंदी’ चिनार के खूबसूरत पत्तों से इज़हार-ए-लव कर पा रही हैं।

रूमानियत के प्रतीक चिनार को पता नहीं क्यों शिमला की वादियां अब तक रास नहीं आ रहीं। कश्मीर की वादियों में तो यह अपने मनभावन रंग भरपूर बिखेरता है। एक एक पत्ता प्रेम,प्यार एवं रोमांस की पूरी कहानी का साक्षी बन जाता है लेकिन शिमला में चिनार के पेड़ न तो आतिश ए चिनार रच पा रहे हैं और न ही हरुद जैसा कुछ यहां नजर आ रहा है। गौरतलब है कि कश्मीर में चिनार के पेड़ों के पतझड़ के मौसम को हरुद कहते हैं। जब पत्ते हरे से लाल, नारंगी और पीले रंग में बदल जाते हैं, तो इस खूबसूरत दृश्य को आतिश चिनार भी कहा जाता है। 


आतिश चिनार का अर्थ है जब चिनार के पत्ते आग की तरह लाल हो जाते हैं।  इस दृश्य को यहां आतिश चिनार कहा जाता है, जिसका मतलब है-आग वाले चिनार या आग उगलते चिनार। परंतु, शिमला में आतिश चिनार तो दूर..पत्ते हरे से सीधे सूखे पत्ते में बदलकर कोई आकर्षण पैदा नहीं कर पा रहे। वैसे, आतिशे–चिनार उर्दू भाषा के विख्यात साहित्यकार शेख़ मुहम्मद अब्दुल्ला द्वारा रचित एक आत्मकथा है जिसके लिये उन्हें सन् 1988 में उर्दू भाषा के लिए मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

ऐसा नहीं है कि शिमला में लगाए गए चिनार के पेड़ों में पतझड़ नहीं हो रहा..बल्कि यहां भी भरपूर पतझड़ हो रहा  है, लेकिन यह कश्मीर की तरह मनमोहक नहीं है। खासतौर पर रिज पर लगे चिनार के पेड़ पतझड़ में आम पेड़ों की तरह ही नजर आ रहे हैं। इनके पत्ते बिना रंग बदले सूखते हैं,सिकुड़ते हैं और फिर झड़ जाते हैं जबकि कश्मीर में चिनार के पतझड़ की खूबसूरती इसके पत्तों के रंग बदलने पर ही विशेष रूप से केंद्रित है । 


इस बारे में जानकारों का कहना गए कि कश्मीर और शिमला में चिनार अलग-अलग वातावरण में उगाए गए हैं, और जलवायु में अंतर के कारण रंग और झड़ने की प्रक्रिया अलग हो सकती है।  शिमला का मौसम कश्मीर की तुलना में थोड़ा अलग है, खासकर दिन और रात के तापमान में। चिनार के पेड़ मौसम के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं और बदलते तापमान और आर्द्रता के कारण वे अलग तरह से प्रतिक्रिया करते हैं। यहां भी चिनार के पेड़ों की पत्तियां पतझड़ में रंग बदलती हैं, लेकिन यह प्रक्रिया कश्मीर की तरह खूबसूरत एवं बड़े पैमाने पर नहीं होती है।

हालांकि अब जलवायु परिवर्तन के कारण कश्मीर में भी तापमान बढ़ रहा है, जिससे चिनार के संवेदनशील पेड़ परंपरागत स्वभाव के अनुरूप व्यवहार नहीं कर पा रहे हैं। शायद, यही वजह है कि शिमला में लगाए गए चिनार के पेड़ों में भी पतझड़ तो होता है, लेकिन जलवायु में भिन्नता के कारण यह प्रक्रिया कश्मीर से अलग होती है। वैसे भी, चिनार शिमला या हिमाचल प्रदेश का मूल निवासी नहीं है इसलिए यह अब तक देवदार, ओक, चीड़ और बुरांस के साथ दोस्ती नहीं कर पाया है। हो सकता है उसे अपनी मूल जमीन से यह अलगाव पसंद नहीं आया हो। हालांकि, चिनार मूल रूप से कश्मीर का भी नहीं है। बताया जाता है कि 14 वीं शताब्दी में यह फारस से यात्रियों के साथ कश्मीर आया और धीरे धीरे यहां की आवोहवा में ढल गया। अब तो स्थिति यह है कि चिनार कश्मीर का एक प्रतिष्ठित प्रतीक बन गया है और ऐसा लगता है जैसे कश्मीर और चिनार एक दूसरे के लिए ही बने हैं।

जहां तक शिमला से चिनार के संबंधों की बात है तो बताया जाता है कि कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने शिमला को चिनार के पाँच पेड़ उपहार में दिए थे। उस समय इनमें से दो पेड़ रिज (आम बोलचाल में मॉल रोड) पर, दो वाइसरीगल लॉज (अब भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान) में और एक यूएस क्लब में लगाए गए थे। खास बात यह है कि सभी पेड़ जीवित हैं और शहर की शोभा बढ़ा रहे हैं। हालाँकि, अब तो शिमला में चिनार के कई पेड़ रिज, माल रोड के पास नव निर्मित पार्क में सहित कई स्थानों पर देखे जा सकते हैं। 

चिनार के शिमला में आगमन को लेकर यह भी बताया जाता है कि इस पेड़ को रिज पर सबसे पहले तत्कालीन बागवानी और कृषि निदेशक एलएस नेगी ने लगाया था । अब शिमला में वन विभाग हर साल बड़ी संख्या में चिनार के पौधे लगा रहा है ताकि वे यहां भी कश्मीर के वातावरण की तरह रच बस जाएं एवं उनकी संख्या में और वृद्धि हो सके । इसलिए हम उम्मीद कर सकते हैं कि जैसे कश्मीर ने चिनार को और चिनार ने कश्मीर को गले लगा लिया, उसी तरह चिनार भविष्य में शिमला सहित हिमाचल को अपना लेंगे..और फिर यहां भी आतिश-ए-चिनार के साथ रूमानियत का की बयार बहेगी ।





गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

ब्रह्म सरोवर: इतिहास, आस्था और अद्भुत सौंदर्य का संगम


यह ब्रह्मसरोवर है…भारत की प्राचीन आध्यात्मिक धरोहरों में से एक । हर वर्ष गीता जयंती समारोह के दौरान ब्रह्मसरोवर की भव्यता चरम पर रहती है। इस वर्ष भी 25 नवंबर से 5 दिसंबर तक अंतर राष्ट्रीय गीता महोत्सव चल रहा है। कहा जाता है कि यही वह पवित्र स्थल है जहाँ सृष्टि के सृजन कर्ता भगवान ब्रह्मा ने ब्रह्मांड की रचना की थी। महाभारत में भी ब्रह्म सरोवर का विशेष महत्व देखने को मिलता है ।


हरियाणा के कुरुक्षेत्र में स्थित लगभग 3600 फुट लंबा और 1500 फुट चौड़ा यह सरोवर भारत के सबसे बड़े मानव-निर्मित जलाशयों में से एक है। चारों ओर बने घाट, शांत जल, और बीच में स्थित सर्वेश्वर महादेव मंदिर इसे दिव्यता का अनूठा स्पर्श देते हैं। देश-विदेश से आए श्रद्धालु यहाँ पवित्र स्नान कर जीवन के दोषों से मुक्त होने की कामना करते हैं। 


सिर्फ धार्मिक ही नहीं, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी ब्रह्मसरोवर अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ के घाटों, दीवारों और शिलालेखों में प्राचीन भारतीय सभ्यता के निशान आज भी महसूस किए जा सकते हैं।

 हम कह सकते हैं कि ब्रह्मसरोवर सिर्फ एक जलाशय नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास, सौंदर्य और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम है—जहाँ से हर श्रद्धालु अपने भीतर एक गहरी शांति का स्पर्श लेकर लौटता है।

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कहां कण कण में बिखरा है धर्म, कर्म और मोक्ष का ज्ञान..!!

यह कुरुक्षेत्र है.. पावन गीता के जन्म की पुण्य पावन भूमि..जहां सदियों पहले इस महाग्रंथ का प्रादुर्भाव हुआ जो आज भी दुनिया भर के लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है। कुरुक्षेत्र भारतीय इतिहास, संस्कृति, धर्म और दर्शन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह हरियाणा राज्य में स्थित वह पवित्र स्थल है जिसे भारतीय संस्कृति में धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे के नाम से जाना जाता है।

हमें भी इस पुण्य भूमि का स्पर्श करने और यहां कण कण में व्याप्त भगवान श्रीकृष्ण की कृपा को महसूस करने का अवसर मिला। इस दौरान गीता जयंती जैसा विशेष अवसर भी था। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि गीता जयंती हर साल मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस बार यह पर्व 1 दिसंबर को मोक्षदा एकादशी के दिन मनाया गया। माना जाता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था। गीता में स्वयं कहा गया है- ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेताः युयुत्सवः’ अर्थात यहाँ धर्म की स्थापना के लिए महान युद्ध हुआ। यह महान ग्रंथ कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और जीवन के हर पहलू पर गहन मार्गदर्शन देता है इसलिए कुरुक्षेत्र को गीतोपदेश स्थली भी कहा जाता है।

कुरुक्षेत्र में हर साल गीता जयंती पर लगभग एक पखवाड़े तक चलने वाले अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का आयोजन भी होता है। इसकी औपचारिक शुरुआत 2016 में हुई थी और प्रति वर्ष इस महोत्सव का फलक लगातार व्यापक होता जा रहा है। इस साल यह महोत्सव 25 नवंबर से 5 दिसंबर तक पवित्र ब्रह्म सरोवर परिसर में मनाया जा रहा है। ब्रह्म सरोवर के बारे में कहा जाता है कि सृष्टि के निर्माता ब्रह्माजी ने यही ब्रह्माण्ड की रचना की थी। सूर्यग्रहण के समय यहां स्नान-दान का विशेष महात्म्य है। पितृ तर्पण और श्राद्ध के लिए भी ब्रह्म सरोवर अत्यंत पवित्र माना जाता है।

हम मध्यप्रदेश के लोगों के लिए इस साल अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का खासतौर पर महत्व है क्योंकि मध्य प्रदेश अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव 2025 का भागीदार राज्य है और यहां हमारे प्रदेश के हस्तशिल्प, कला, कलाकारों, लोक संस्कृति और खानपान की धूम है। वहीं, इंग्लैंड को साझीदार देश घोषित किया गया।

मान्यता के अनुसार कुरुक्षेत्र के ज्योतिसर नामक स्थान पर इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत में वर्णित कौरव-पांडव युद्ध के दौरान युद्ध मैदान में विराट स्वरूप के दर्शन देते हुए अर्जुन को गीता के अनमोल वचन सुनाए थे। इसका मतलब यह हुआ कि इसी दिन अत्यंत पवित्र, पूजनीय और अनुकरणीय माने जाने वाले ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का जन्म हुआ था। कुरुक्षेत्र की इसी भूमि पर एक विशाल वट वृक्ष भी है जिसकी आयु करीब 5 हजार 126 साल बताई जाती है। इसके नीचे प्रतीकात्मक रूप में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन का रथ खड़ा हुआ है। यहीं भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप को भी दर्शाया गया है।

बताया जाता है कि अपनी हिमालय यात्रा के समय आदि गुरु शंकराचार्य ने सर्वप्रथम इस स्थान को चिन्हित किया था। सन् 1850 में महाराजा काश्मीर द्वारा यहाँ पर एक शिव मन्दिर की स्थापना की गई थी। इसके पश्चात् सन 1924 में महाराजा दरभंगा ने यहाँ पर गीता उपदेश के साक्षी वट वृक्ष के चारों ओर एक चबूतरे का निर्माण करवाया था। तीर्थ के इसी महत्व को दृष्टिगत रखते हुए सन् 1967 में कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य द्वारा मुख्य चबूतरे के साथ गीता उपदेश स्थल का निर्माण कराया गया ।

कुरुक्षेत्र के महत्व को अंतरराष्ट्रीय पटल पर और व्यापक बनाने के लिए यहां भगवान श्रीकृष्ण के शंख पाञ्चजन्य से प्रेरित ‘पाञ्चजन्य स्मारक’ की स्थापना भी गई है। इसके अलावा, ‘महाभारत अनुभव केंद्र’ भी बनाया गया है। इस अनुभव केंद्र में महाभारत की गाथा को 3 डी, लाइट एंड साउंड शो और डिजीटल तकनीकी से दिखाया जा रहा है। हम कह सकते हैं कि नई तकनीक की मदद से करीब 3 घंटे के समय और 200 रुपए का मामूली शुल्क देकर हजारों साल पहले हुए 18 दिन लंबे युद्ध को मौजूदा दौर में महसूस किया जा सकता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 25 नवंबर को इन नई सुविधाओं का शुभारंभ किया है। 

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि कुरुक्षेत्र केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का प्रतीक है जहाँ धर्म, कर्म, ज्ञान और मोक्ष की शिक्षा दी गई। इसलिए कुरुक्षेत्र को भारत का हृदयस्थल और देवभूमि भी कहा जाता है।

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गुरुवार, 27 नवंबर 2025

एक अनूठा मंदिर…जहां प्रसाद की जगह चढ़ते हैं घोड़े!!

जी हां, वाकई मंदिर में प्रसाद की जगह चढ़ते हैं घोड़े और वे भी सफेद घोड़े, लाल घोड़े, पीले, काले, नारंगी, हरे घोड़े..बस घोड़े ही घोड़े। आप देखकर अचरज में पड़ जाएंगे क्योंकि मंदिर में तो नारियल- चिरौंजी या लड्डू-पेड़े चढ़ते हैं तो फिर इतने घोड़ों का क्या काम। दरअसल समझने के लिए हम कह सकते हैं कि यहां प्रसाद के रूप में घोड़े अर्पित किए जाते हैं। 

अरे रुको जरा…आपकी बड़ी होती आंखों को थोड़ा छोटा कर लीजिए और कंफ्यूज मत होइए। हम बात कर रहे हैं खिलौने वाले घोड़ों की, न की असल की..आखिर, कितना भी बड़ा मंदिर हो वहां सैकड़ों घोड़े कैसे बन पाएंगे? लेकिन असलियत यही है कि कहानी असल घोड़ों से ही शुरू हुई थी..जो बदलते वक्त के साथ जरूर खिलौने वाले घोड़ों में तब्दील हो गई है। 


तो पहले जानते हैं असल घोड़ों की कहानी…महाभारत का युद्ध शुरू होने में बस कुछ ही दिन बचे थे। कौरवों की विशाल सेना और तैयारियों को देखकर पांडवों का मन भय से भरा था और वे कुछ विचलित नज़र आ रहे थे। यह बात युद्ध भूमि में गीता उपदेश के भी पहले की है। भगवान श्रीकृष्ण पांडवों के मन को पढ़कर मुस्कुराते हुए बोले- “जाओ, पहले माँ भद्रकाली के दर्शन कर आओ और हां, वहां घोड़ा चढ़ाना मत भूलना क्योंकि जिसने यहाँ घोड़ा चढ़ाया, वह कभी पराजित नहीं हुआ है।” पांडव भला भगवान कृष्ण का कहना कैसे टाल सकते थे इसलिए पाँचों भाई कुरुक्षेत्र से सटे थानेसर की पिहोवा रोड पर स्थित उस पवित्र भूमि पर पहुँचे जहाँ आज भी माँ भद्रकाली का मंदिर पूरी भव्यता और दिव्यता के साथ मौजूद है। मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक भद्रकाली पीठ में पांडवों ने पांच घोड़े अर्पित किए और महाभारत युद्ध का नतीजा तो सब जानते हैं कि पांडवों की ही विजय हुई। कहा जाता है कि तभी से यहां मां भद्रकाली को मनोकामना पूरी होने पर घोड़े चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।


जहां तक मंदिर की स्थापना से जुड़े इतिहास की बात है तो हम सभी जानते हैं कि शिवजी के अपमान से सती हुई मां भगवती से जुड़ी पौराणिक कथा के मुताबिक जब शिवजी माँ सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उनका क्रोध शांत करने और ब्रह्मांड को विनाश से बचाने के लिए सुदर्शन चक्र से सती की पार्थिव देह के 51 टुकड़े कर दिए थे। जिस जिस स्थान पर माता सती के अंग गिरे, वे सभी स्थान पवित्र शक्तिपीठ कहलाते हैं। हरियाणा का यह इकलौता शक्तिपीठ कुरुक्षेत्र में स्थित है। माना जाता है कि यहां माँ का दाहिना टखना (ankle) गिरा था। इसे देवीकूप, सावित्रीपीठ, देवीपीठ, कालीपीठ और आदिपीठ जैसे विभिन्न नामों से भी जाना जाता है।


आमतौर पर शक्तिपीठ पहाड़ों और दुर्गम स्थानों पर हैं लेकिन यह ऐसा मंदिर है जो समतल स्थान पर है और आप सीधे मंदिर की पार्किंग तक आसानी से पहुंच जाते हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही सन्नाटा, घंटियों की मधुर ध्वनि और सुगंध एक साथ महसूस होते हैं। गर्भगृह में माँ भद्रकाली की काले पत्थर की प्राचीन अष्ट भुजा वाली प्रतिमा है जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो मां अभी बोल पड़ेंगी। उनके सामने विशाल कमल की प्रतिकृति और राम सीता, राधा कृष्ण सहित विभिन्न प्रतिमाएं हैं।

 भद्रकाली मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यहां मौजूद सैकड़ों घोड़े और मन्नत के धागों से बना विशाल नारियल है। जो बरबस ही श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है। घोड़ों का तो यह हाल है कि आप जहां दृष्टि दौड़ाएं आपको घोड़े ही नज़र आते हैं..मिट्टी,चीनी मिट्टी और अन्य सामग्री से बने छोटे छोटे रंग बिरंगे आकर्षक घोड़े। वैसे यहां सोने और चांदी के घोड़े भी बड़ी संख्या में अर्पित किए जाते हैं। इसका कारण वही पांडव कालीन मान्यता है कि यदि आपकी कोई मन्नत है या पूरी हुई है तो मां भद्रकाली को घोड़े अर्पित करें जिससे वे प्रसन्न होती हैं और आपकी तमाम मनोकामनाएं पूरी करती हैं। 

इसी तरह मन्नत का लाल-पीला धागा बांधने की प्रथा भी है। मन्नत पूरी हुई नहीं कि लोग दौड़े चले आते हैं – कोई घोड़ा चढ़ाने, कोई नारियल फोड़ने और कोई धागा खोलने। आज भी यहां परीक्षा में पास करने, संतान प्राप्त,व्यापार में लाभ और परिवार रक्षा जैसी मुरादों को लेकर बड़ी संख्या में भक्त आते हैं।

भद्रकाली मंदिर तक पहुंचना बहुत आसान है। कुरुक्षेत्र दिल्ली से सिर्फ 160 किमी और चंडीगढ़ से करीब 100 किमी दूर है। यहां आप अपने वाहन से आ सकते हैं। वैसे कुरुक्षेत्र दिल्ली चंडीगढ़ रेलमार्ग से सीधे जुड़ा है और कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन से मंदिर महज 3 किमी दूर है। यदि आप हवाएं मार्ग से आना चाहते हैं तो चंडीगढ़ या दिल्ली कहीं भी उतर कर टैक्सी से कुछ घंटे में यहां पहुंच सकते हैं। इसलिए जब भी कुरुक्षेत्र जाएँ, ब्रह्मसरोवर, ज्योतिसर, बाण गंगा जैसे महाभारत कालीन स्थलों के साथ यहाँ जरूर आएँ।


शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

देश में इकलौता और दुनिया में सबसे अलग..क्या है ये !!


लकड़ी और पत्थर से बनी इस इमारत में कुछ तो खास बात है कि दुनिया भर से लोग इसे पैसे देकर देखने आते हैं। यहां भारतीय लोग 100 रुपए देकर और विदेशी 200 रुपए देकर अन्दर से देख सकते हैं। अचरज की बात यह है कि यह इमारत आगरा के ताजमहल या अयोध्या के राम मंदिर जैसा स्थान भी नहीं है कि दुनिया में और कहीं न हो। दुनिया भर के कई देशों में अपने हम नाम और समान आर्किटेक्चर  शैली के भाई बंधुओं के बाद भी इसका आकर्षण बरकरार है। शायद इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि इसके समकालीन साथी समय के साथ दम तोड़ चुके हैं और दूसरा कारण यह भी है कि विदेशी पर्यटक और खासकर ब्रिटेन के लोग इसे अपनी विरासत से जोड़कर देखते हैं। 

हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के मशहूर गैटी/गेयटी थिएटर (Gaiety Theatre)  की । जिसे अब गेयटी हेरिटेज कल्चरल कॉम्प्लेक्स के नाम से जाना जाता है।

जैसा कि हम जानते हैं कि अंग्रेजों ने लंबे समय तक शिमला का इस्तेमाल अपनी सत्ता के शीर्ष केंद्र की तरह किया है और इसीलिए अपने मनोरंजन के कई ठिकाने भी यहां बनाए। इनमें से मॉल रोड अंग्रेजों की शिमला को सबसे खूबसूरत देन है और इसी मॉल रोड पर स्थित है ब्रिटिश हुकूमत का एक तौर नायाब तोहफा-गेयटी थियेटर । 

30 मई 1887 से देशी विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र यह थियेटर आज भी उसी शान-ए-शौकत के साथ लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचता है। शिमला में रिज पर स्थित चर्च के बाद गेयटी थियेटर लोकप्रियता में संभवतः दूसरे स्थान पर है। अंग्रेज साहबों और मेम साहब के आमोद प्रमोद का पूरा ध्यान रखते हुए इसका डिजाइन गॉथिक व विक्टोरियन शैली के जानकार अंग्रेज आर्किटेक्ट हेनरी इरविन ने तैयार किया था। वैसे भी, उस दौर में अंग्रेज अफसरों और उनके परिवारों के अलावा किसी और का मॉल रोड पर आना प्रतिबंधित था।

बताया जाता है शिमला की शान यह गैटी या गेयटी थियेटर मूल रूप से पांच-मंज़िला इमारत थी, जिसमें थिएटर के साथ-साथ बैले रूम, शस्त्र भंडार, पुलिस कार्यालय, बार और गैलरी थीं। इसके निर्माण के लगभग दो दशकों बाद 1911 में इमारत की ऊपरी मंज़िलों को खतरनाक संरचनात्मक स्थिति के कारण गिरा दिया गया । फिर 2003 में करीब साढ़े 11 करोड़ रुपये की लागत से इसकी मरम्मत का काम शुरू हुआ और छह साल बाद 2009 में यह मौजूदा वैभव के साथ लौटा। इस मरम्मत की खासियत यह थी कि इसमें तमाम आधुनिकीकरण के बाद भी यहां के पुरानी शैली के परदे,परदे खोलने बंद करने की पारंपरिक व्यवस्था (रस्सी, पुली) जैसी कई वास्तुशिल्पीय एवं पुरातात्विक विशेषताओं से छेड़छाड़ नहीं की गई।

गॉथिक शैली में बनाई गई यह इमारत पत्थर और लकड़ी की पारंपरिक डिजाइन से सुसज्जित है। दरअसल, गॉथिक शैली 18वीं से 19वीं सदी में विकसित एक वास्तुशिल्प शैली है। इसकी मुख्य विशेषताओं में नुकीले मेहराब, ऊँची छतें,आर्च जैसी खूबियां शामिल हैं। यह शैली इमारतों में भव्यता के साथ साथ ऐतिहासिकता का बोध भी कराती है और खासतौर पर चर्चों, विश्वविद्यालयों एवं सरकारी भवनों के निर्माण में लोकप्रिय थी। ब्रिटेन का हाउस ऑफ पार्लियामेंट तथा संयुक्त राज्य अमेरिका का सेंट पैट्रिक कैथेड्रल इस शैली के लोकप्रिय उदाहरण हैं । 

शिमला में स्थित गेयटी थिएटर करीब 300 लोगों के बैठने की क्षमता रखता है। इसके पास एक ओपन-एयर एम्फीथिएटर भी है। थिएटर में आधुनिक स्टेज लाइटिंग और साउंड सिस्टम सहित तमाम सुविधाएं हैं। गेयटी थियेटर को हम मौजूदा समय में दिल्ली के मंडी हाउस और भोपाल के भारत भवन की तरह शिमला का सांस्कृतिक केंद्र कह सकते हैं क्योंकि यहां भी नाटकों, संगीत कार्यक्रमों, लोक व शास्त्रीय नृत्य, कवि सम्मेलनों और व्याख्यान जैसे विभिन्न कार्यक्रम होते रहते हैं। इसलिए इसे गेयटी विरासत सांस्कृतिक परिसर भी कहा जाता है।

शिमला का गेयटी थिएटर इस मामले में किस्मत का धनी है कि दुनिया भर के नामचीन लोग यहां अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं जिनमें रुडयार्ड किपलिंग, पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, अनुपम खेर एवं नसीरुद्दीन शाह जैसे कई बड़े नाम शामिल है। बताया जाता है मौजूदा दौर के लोकप्रिय गायक अरिजीत सिंह का एक लोकप्रिय गाना 'पछताओगे.. ' भी यहीं फिल्माया गया है। कहने का आशय यह है कि इस थियेटर ने पृथ्वीराज कपूर से लेकर अरिजीत सिंह तक को अपने मोहपाश में बांध रखा है।

जब हम गूगल गुरू एवं इनकी नई पीढ़ी के एआई साथियों की मदद से गेयटी थियेटर का इतिहास खंगालने की कोशिश करते हैं तो अलग अलग तथ्य सामने आते हैं। मसलन कुछ स्रोतों में कहा गया है कि दुनिया में इसतरह के केवल छह थियेटर हैं लेकिन इस नाम से मिलती जुलती कुछ अन्य संस्थाएँ भी हैं।

यदि हम शिमला की तरह दुनिया में अन्य स्थानों पर निर्मित एवं लोकप्रिय गेयटी थियेटर की बात करें तो आयरलैंड के डबलिन में स्थित गेयटी थिएटर शिमला से कुछ साल पहले 27 नवम्बर 1871 को शुरू हुआ था। विक्टोरिया शैली में बना यह थियेटर अभी भी चालू है। ब्रिटेन के डगलस में भी गेयटी थिएटर सह ओपेरा हाउस है। विक्टोरियन के साथ साथ फ्रेंच शैली में बना यह थियेटर शिमला के गेयटी थियेटर के एक दशक बाद 1899 में शुरू हुआ था और यह आज भी अपना जलवा बिखेर रहा है।ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया में भी एक गेयटी थियेटर है जो 9 अक्टूबर 1898 को प्रारम्भ हुआ था। यह 19वीं सदी के ऑस्ट्रेलियाई हिस्टोरिक थिएटर भवन शैली में बना है और 2006 में पुनर्निर्माण के बाद से सिनेमा और लाइव-इंटरटेनमेंट का प्रमुख केंद्र है।

लेकिन कुछ गेयटी थियेटर ऐसे भी हैं जो प्राकृतिक आपदाओं और रखरखाव के अभाव में समय के साथ इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह गए जैसे जापान के याकोहामा में स्थित पश्चिमी-शैली का वुडन स्टेज शैली वाला गेयटी थिएटर 1908 में शुरू हुआ था लेकिन  1923 में आए विनाशकारी भूकंप में पूरी तरह नष्ट हो गया और इसे फिर से बनाने का कोई प्रयास भी नहीं हुआ। लंदन में 1864-68 के दरम्यान शुरू हुआ विक्टोरियन शैली का गेयटी थियेटर भी वक्त के झंझावतों के साथ खुलता बंद होता रहा और अंततः 1956 में अपना मूल स्वरूप गंवा बैठा। कुछ यही हाल इंग्लैंड के मैनचेस्टर में 1884 में शुरू हुए और स्कॉटलैंड के ग्लासगो में 1899 में बने गेयटी थियेटर का हुआ। ये थियेटर भी वक्त की मार बर्दाश्त नहीं कर पाए और समय के साथ अपना अस्तित्व खो बैठे।

वैसे, गेयटी थियेटर के नामकरण की कहानी भी हमारी जीवनशैली से जुड़ी है। Gaiety का अर्थ होता है- उल्लास, खुशी, प्रसन्नता, या मौज-मस्ती। मतलब गेयटी थियेटर एक ऐसा स्थान है जिसका उपयोग किसी उत्सव और आनंद के लिए किया जाता है। ब्रिटिश हुकूमत के समय से लेकर आज तक यह थियेटर अपनी इस पहचान को क़ायम रखे हुए है। शायद, यही कारण है कि शिमला सहित दुनिया में कम संख्या में शेष बचे गेयटी परिवार के सदस्य आज भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब हैं।

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सोमवार, 17 नवंबर 2025

आइए, चले…देश के आखिरी गांव !!

 


वैसे तो, पूरा हिमाचल प्रदेश ही रोमांच और प्रकृति के अबूझ रहस्यों से भरपूर है लेकिन यहां भी कुछ इलाके ऐसे हैं जहां सड़क मार्ग से गुजरकर आप देश की सबसे रोमांचक यात्राओं में से एक का आनंद ले सकते हैं। तो चलिए, हम चलते हैं हिमाचल में स्थित और भारत चीन सीमा के पास देश के सबसे आखिरी गांव की यात्रा पर।

करीब साढ़े 11,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित छितकुल की यात्रा एक रोमांचक तीर्थयात्रा की तरह है। यहां आकर हमारी सड़क यात्रा भी खत्म हो जाती है और हमारा धैर्य भी, फिर हमसे रूबरू होती हैं बर्फ़ की सफेद चादर ओढ़े हिमालय की गर्वीली चोटियां। छितकुल को भारत तिब्बत सीमा पर देश का आखिरी गांव कहा जाता है। यदि सकारात्मक अंदाज़ में कहें तो यह इस इलाके में देश का पहला गांव है क्योंकि इसके जरिए ही हम देश के दर्शन के लिए आगे बढ़ते हैं। यहाँ की हवा इतनी शुद्ध है कि इसे भारत की सबसे स्वच्छ हवा माना जाता है तो जाहिर है आपको हर सांस में ताजगी का अहसास भी होता है और आप इस शुद्धता को फेफड़ों में सहेजकर अवश्य ले जाना चाहेंगे।


हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में सतलुज और बस्पा नदियों के संगम के पास बसा भारत का आखिरी/पहला गाँव छितकुल एक ऐसी जगह है जहाँ प्रकृति पूरी शिद्दत से नजर आती है और रोमांच हर कदम पर आपका इंतजार करता है। छितकुल न केवल एक भौगोलिक आश्चर्य है, बल्कि सांस्कृतिक और प्राकृतिक वैभव का संगम भी है। यहाँ की ताज़गी से भरी हवा, बर्फीली चोटियाँ और किन्नौरी संस्कृति का अनूठा मिश्रण इसे एक ऐसी जगह बनाता है, जो हर यात्री के दिल में बस जाती है। 


छितकुल तक का सफ़र भी खट्टे मीठे अनुभवों से भरपूर है। हमें लगातार पहाड़ पर सर्पीली और पतली घुमावदार सड़कों से होकर गुजरना पड़ता है। ऐसी सड़कें, जहां आगे हमें भी नहीं पता चलता कि कितना और कैसा मोड़ हमारे सामने आ सकता है, कहां पहाड़ झुककर हमारी गाड़ी का माथा चूमना चाहता है, कब सड़क पगडंडी बन सकती है और कब आप पहाड़ के सीने को चीरते हुए निकल जाते हैं। रास्ते में कई जगह पहाड़ों की चोटी से निकलते छोटे बड़े झरने आपको भिगो सकते हैं और सड़क पर जमा विशाल चट्टानें और बड़े पत्थर बारिश में आमतौर पर यहां होने वाले भूस्खलन (लैंडस्लाइड) का डरावना अहसास भी कराते हैं। इसी तरह, नाथपा झाकड़ी और करछम-वांगटू जैसी बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं, गर्म पानी के सोते और गंगारंग जैसे पवित्र स्थान भी आपको रुक कर प्राकृतिक सौंदर्य निहारने का अवसर देते हैं। वैसे, अब सरकार ने सड़कों का इतना मजबूत जाल बिछाया है कि यह सफर मजेदार बन गया है।


अब बात छितकुल की, तो यहां की सुंदरता ऐसी है, मानो प्रकृति ने इसे अपने हाथों से सजाया हो। रास्ते में सड़क के दोनों ओर सेब के बगीचे आपका इठलाकर स्वागत करते हैं…और यदि आप ‘एप्पल सीजन’ में यहां आए हैं तो सुर्ख लाल, कत्थई,  हरे, पीले और सुनहरे रंग में रंगे सेब से लदे हुए पेड़ झुककर आपका इस्तकबाल करते हैं। पेड़ से टूटते और पेटियों में सजते सेब देखना और ‘ऑन द स्पॉट’ ताजे रसीले सेब खाने का अनुभव विलक्षण है। वहीं, सुबह की पहली किरण के साथ बर्फीली चोटियाँ के बीच किन्नर कैलाश की सुनहरी चमक अलग ही आभा बिखेरती है। सर्दियों में बर्फ का कंबल ओढ़े यह गाँव एक शांत स्वप्नलोक-सा प्रतीत होता है जबकि गर्मियों में रंग-बिरंगे जंगली फूलों के बगीचे सा। खासतौर पर गुलाबी रोडोडेंड्रोन और पीले प्राइमरोज़ की छटा देखते ही बनती है। 

साहसिक यात्राओं, ट्रेकिंग और कैंपिंग के शौकीन लोगों के लिए तो यह स्वर्ग है। छितकुल में कैंपिंग का एक अलग ही अनुभव है। रात में तारों भरा आकाश और चारों ओर हिमालय की चोटियों की पहरेदारी के बीच स्वच्छ हवा,नदी की कलकल आवाज  और आध्यात्मिक शांति से भरपूर वातावरण इसे दुर्लभ पहचान प्रदान करता है। 

छितकुल केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है बल्कि यह किन्नौरी संस्कृति का जीवंत चित्र है। यहाँ तिब्बती प्रभाव को दर्शाते लकड़ी के घर, नक्काशी और छतें इस गाँव को एक प्राचीन आकर्षण देती हैं। स्थानीय व्यंजन, जैसे सोग, थुकपा स्वाद और संस्कृति का अनूठा संगम हैं। यहां आप देश के आखिरी पोस्ट ऑफिस और देश के अंतिम ढाबे से भी रूबरू होते हैं। इनसे भले ही ब्रांडिंग नजर आती हो लेकिन पर्यटकों के लिए यह वाकई अनूठा अनुभव होता है। 

छितकुल तक पहुँचने के लिए आपको शिमला से रिकॉन्गपिओ तक करीब 200 से 250 किमी सड़क मार्ग से आना पड़ेगा और फिर सांगला वैली होते हुए छितकुल तक की 40 से 50 किमी की सबसे रोमांचक सड़क यात्रा करनी पड़ेगी । आप चाहे तो रास्ते में ठियोग, रामपुर, सराहन, करछम, सांगला घाटी और कल्पा में रुककर खुद को रिचार्ज भी कर सकते हैं। यहां घूमने के लिए मई से अक्टूबर तक का समय सबसे उपयुक्त रहता है क्योंकि ठंड में सामान्य रूप से बर्फबारी के कारण रास्ते खुलते/बंद होते रहते हैं । 

कुल मिलाकर छितकुल कोई साधारण गंतव्य नहीं बल्कि एक असाधारण अनुभव है। जहाँ प्रकृति की विशालता और मानव की सादगी एक-दूसरे से गले मिलते हैं। यहाँ की शांति, रोमांच और सांस्कृतिक छाप आपको सीधे प्रकृति से जोड़ती है। चाहे आप ट्रेकर हों, फोटोग्राफर,पर्यटक या शांति की तलाश में निकले एक यात्री, छितकुल आपको निराश नहीं करेगा । 

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रविवार, 2 नवंबर 2025

राष्ट्रपति निवास,नाटी किंग और लज़ीज़ धाम

175 साल का सफर पूरा कर रहे मशोबरा के राष्ट्रपति निवास की पृष्ठभूमि, पहाड़ों पर बहती ठंडी हवा, देवदार के घने जंगलों से गुजरकर आती भीनी भीनी खुशबू, लोकधुनों की मिठास और हिमाचल के पारंपरिक धाम की लज़ीज़ महक और इन सबके साथ नाटी किंग कुलदीप शर्मा और उनकी दिलकश आवाज पर झूमते लोग…किसी भी दिन का इससे बेहतर आगाज और क्या हो सकता है।

तकरीबन चार घंटे का वक्त किसी मनपसंद फिल्म की तरह कब गुजर गया,पता ही नहीं चला। जब चलने की बारी आई तो मन ने कहा कुछ देर और ठहर जाएं लेकिन जिम्मेदारी ने कहा और ठहरे तो फिर काम का क्या होगा क्योंकि जो देखा है उसे ख़बर बनाकर मीडिया के साथियों को भी तो भेजना है। तभी तो, हिमाचल के लोगों को पता चल पाएगा कि राज्य में सांस्कृतिक मोर्चे पर कितना कुछ हो रहा है।

दरअसल, राष्ट्रपति निवास, शिमला में शनिवार एक नवंबर को सालाना शरद उत्सव का आयोजन किया गया था। यह तारीख हमारे लिए तो वैसे भी खास है क्योंकि यह हमारे राज्य मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस है और यदि आज हिमाचल प्रदेश में नहीं होते तो पक्का भोपाल में किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम का हिस्सा होते। शायद, मन को पढ़कर यह अवसर खुद चलकर हमारे पास आया क्योंकि रितेश भाई ने आमंत्रण भेजकर आने का आग्रह किया तो प्रकाश भाई ने समय पर कार्यक्रम स्थल तक पहुंचाने का दायित्व उठाया। राष्ट्रपति निवास में मैनेजर संजू डोगरा जी और अजय भारद्वाज जी की गर्मजोशी ने यहां आना सार्थक बना दिया।

वैसे तो,शरद उत्सव में स्कूल-कॉलेज के बच्चों के प्रदर्शन का बोलबाला था लेकिन उनकी युवा ऊर्जा, उत्साह, सांस्कृतिक परिपक्वता और प्रदर्शन इतना दमदार था कि दर्शक उनकी ताल पर ही झूमने लगे। देशप्रेम के गीत से शुरू हुआ यह सिलसिला जब हिमाचल की लोकप्रिय नाटी तक पहुंचा तो संगीत की गरमाहट में ठंड पता नहीं कहां छूमंतर हो गई। फिर तो बस नाटी ही चली..पहले विद्यार्थियों की और उसके बाद नाटी किंग कुलदीप शर्मा ने जब तान छेड़ी तो फिर किसी के लिए भी रुक पाना मुश्किल था। 

अब तक स्टेज के सामने कुर्सियों पर जमे लोग एक एक कर स्टेज के सामने आ गए और फिर क्या था..नाटी,नाटी और बस नाटी..स्टेज पर भी एवं स्टेज के चारों ओर भी। वाकई, कुलदीप शर्मा को इसलिए नाटी किंग कहा जाता है क्योंकि वे ऑडियंस से तुरंत कनेक्ट कर लेते हैं तथा सबसे अहम बात..उन्होंने युवाओं से कहा कि नशे से दूर रहो क्योंकि मैं नशे के कारण अपना जीवन तबाह कर चुका था। सही समय पर नहीं संभला होता तो आज शायद होता भी नहीं। 

आखिर में, लज़ीज़ भोज का उल्लेख करे बिना कार्यक्रम पूरा नहीं हो सकता। पारंपरिक हिमाचली धाम में सेपू बड़ी, कढ़ी, सरसों के तड़के के साथ काली दाल, बदाने का मीठा और पता नहीं क्या क्या।

बाकी हिमाचल से बाहर के लोगों के लिए नाटी का अर्थ है नृत्य/लोक नृत्य और कुलदीप शर्मा इस कला के सम्राट हैं। उनका नाम आज हिमाचल की नाटी और लोकसंगीत का सबसे बड़ा परिचय है। उनकी आवाज़ में पहाड़ों की मिट्टी की खुशबू, देवभूमि का संस्कार और लोकधुनों की आत्मा बसती है। वे सिर्फ गायक नहीं, बल्कि हिमाचली लोकसंस्कृति के गर्व और पहचान बन चुके हैं। नाटी को देश-विदेश तक पहुँचाने में उनकी भूमिका अद्भुत है। महज बारहवीं तक पढ़े (उनके शब्दों में तीन बार फेल) कुलदीप को हाल ही में लंदन में वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स द्वारा ‘इंटरनेशनल एक्सलेंस अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। अब तक सैकड़ों सम्मान हासिल कर चुके कुलदीप एक सशक्त उदाहरण हैं कि मामूली शिक्षा के बाद भी यदि जज़्बा हो तो कैसे लोक संस्कृति की महक राज्य से होते हुए देश और दुनिया में खुशबू बिखेर सकती है।

जहां तक राष्ट्रपति निवास की बात है तो यह शिमला से करीब 13 किलोमीटर दूर मशोबरा नाम की जगह में स्थित है। इसे राष्ट्रपति का समर रिट्रीट भी कहा जाता है। यह जगह ऊँचे पहाड़ों, घने देवदार-चीड़ के जंगलों और ठंडी हवा के बीच बनी है। यहाँ की शांति और ताज़गी भरी हवा इसे बहुत खास बनाती है।

क़रीब 7 हजार फीट की ऊंचाई पर बना यह भवन ब्रिटिश शासन के समय, लगभग 1850 के आसपास बनाया गया था। उस समय इसे गर्मियों में आराम करने और काम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। आज़ादी के बाद वर्ष 1965 में इस भवन को भारत के राष्ट्रपति का गर्मियों में रहने वाला आधिकारिक निवास घोषित कर दिया गया। अब भी गर्मियों में राष्ट्रपति कुछ दिन यहाँ बिताते हैं और उस समय राष्ट्रपति कार्यालय का एक हिस्सा भी यहीं से काम करता है।

राष्ट्रपति निवास की इमारत लकड़ी और पत्थरों से बनी हुई है। इसे खास पहाड़ी तरीके से बनाया गया है ताकि भूकंप से सुरक्षा मिल सके। घर के चारों तरफ हरे-भरे लॉन, फूलों के बगीचे और सेब के पेड़ हैं। यहाँ से दिखाई देने वाले पहाड़ों और आसमान का नज़ारा बेहद सुंदर लगता है। अब यह स्थान आम लोगों के लिए भी खोल दिया गया  है, लेकिन इसके लिए पहले ऑनलाइन या ऑफिस से बुकिंग करनी होती है। यहाँ आने वाले लोग इतिहास, प्रकृति और शांति का सुंदर अनुभव लेते हैं। शिमला घूमने वाले पर्यटकों के लिए राष्ट्रपति निवास एक ऐसा स्थान है जहाँ वे प्रकृति की गोद में बैठकर इतिहास को महसूस कर सकते हैं। यह जगह सच में शांति, सौंदर्य और सम्मान का संगम है।



शनिवार, 1 नवंबर 2025

नए राज्य: विकास, चुनौतियाँ और भविष्य की संभावनाएँ

बहु भाषा बोली, विविध संस्कृति, खानपान, क्षेत्रीय ढांचा, विशाल क्षेत्रफल से परिपूर्ण हमारा देश अपनी प्रशासनिक और क्षेत्रीय जटिलताओं के कारण हमेशा से ही दुनिया भर के आकर्षण का केंद्र रहा है। स्वतंत्रता के बाद से ही देश में नए राज्यों के गठन की मांग उठती रही है और तत्कालीन सरकारों ने समय समय पर क्षेत्रीय, भाषाई और विकास की जरूरत के आधार पर इन मांगों को पूरा भी किया है।  

 यदि हाल के वर्षों की बात करें तो वर्ष 2000 में एक साथ तीन राज्यों छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड के गठन ने भारत के संघीय ढांचे में एक नया अध्याय जोड़ दिया था। ये तीनों राज्य अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर चुके हैं और इस अवधि में इन्होंने विकास, नवाचार और सामाजिक-आर्थिक प्रगति के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। 

हालांकि, नए राज्यों के गठन के साथ देश में प्रशासनिक खर्चों में वृद्धि, संसाधनों के बंटवारे की चुनौतियाँ और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे मुद्दे भी सामने आए हैं लेकिन इन राज्यों की विकास यात्रा ने कई नए राज्यों की उम्मीदों को भी जन्म दिया है। भविष्य में नए राज्यों के गठन के फायदे और नुकसान पर बात करने से पहले हम छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड की 25 वर्षों की यात्रा पर संक्षेप में नजर डालना जरूरी है ।

 जैसा कि हम सभी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ का गठन वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश से एक हिस्से को अलग करके किया गया था। यह राज्य प्राकृतिक संपदा और आदिवासी संस्कृति का अनमोल खजाना है। इन 25 वर्षों में राज्य ने औद्योगिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की। खनिज संसाधनों से समृद्ध छत्तीसगढ़ ने इस्पात, सीमेंट और ऊर्जा क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। रायपुर और भिलाई जैसे शहर औद्योगिक विकास के केंद्र बने, जबकि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत ने पर्यटन को बढ़ावा दिया।राज्य सरकार ने ग्रामीण विकास और आदिवासी कल्याण पर विशेष ध्यान दिया। 

'नरवा, गरवा, घुरवा, बारी' जैसी योजनाओं ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त किया, वहीं जैविक खेती और हस्तशिल्प को बढ़ावा देकर स्थानीय समुदायों को रोजगार मिला। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी सुधार हुआ, जिससे साक्षरता दर और स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर हुईं।हालांकि, नक्सलवाद छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी चुनौती रहा, जिसने कई क्षेत्रों में विकास को प्रभावित किया। बुनियादी ढाँचे की कमी और ग्रामीण-शहरी असमानता भी प्रगति में बाधक रही। पर्यावरण संरक्षण और खनन के बीच संतुलन बनाना भी एक जटिल मुद्दा है।

इन चुनौतियों के बावजूद, छत्तीसगढ़ ने अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक संपदा का उपयोग कर विकास की राह पर कदम बढ़ाए। अब नक्सलवाद पर मजबूत नियंत्रण, सतत विकास और समावेशी नीतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ भारत के विकसित राज्यों में शुमार हो रहा है। हिमालय की गोद में बसा एक खूबसूरत सा राज्य उत्तराखंड भी वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर अस्तित्व में आया था। इन 25 वर्षों में उत्तराखंड ने विकास, पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। देहरादून, राज्य की राजधानी, एक प्रमुख शैक्षिक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में उभरी, जबकि हरिद्वार और ऋषिकेश आध्यात्मिक और पर्यटन स्थल के रूप में विश्व प्रसिद्ध हुए।

 चारधाम यात्रा ने न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दी। राज्य ने ऊर्जा क्षेत्र में विशेष रूप से जलविद्युत परियोजनाओं के माध्यम से भी कदम बढ़ाए हैं। टिहरी बांध इसका प्रमुख उदाहरण है। इसके अलावा, आयुष और जैविक खेती को बढ़ावा देकर उत्तराखंड ने नवाचार की दिशा में प्रगति की। शिक्षा के क्षेत्र में, आईआईटी रुड़की और अन्य संस्थानों ने राज्य को तकनीकी शिक्षा का केंद्र बनाया है। हालांकि, प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूस्खलन और बाढ़ ने विकास में जरूर कुछ बाधाएँ डालीं। पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाना उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और पलायन भी चिंता का विषय है। 

फिर भी, उत्तराखंड ने अपनी सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और विकास की संभावनाओं के बल पर एक विशिष्ट पहचान बनाई है।   वनांचल के नाम से मशहूर झारखंड 15 नवंबर 2000 को भारत के 28वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया था और इसकी 25 वर्षीय विकास यात्रा गौरव, चुनौतियों और संभावनाओं का संगम रही है। प्राकृतिक संसाधनों और खनिजों से समृद्ध इस राज्य ने अपनी स्थापना के बाद से आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। 

शुरुआती वर्षों में, झारखंड ने खनन और औद्योगिक विकास पर खास ध्यान केंद्रित किया। टाटा स्टील और सेल जैसे उद्योगों ने राज्य को औद्योगिक केंद्र के रूप में स्थापित किया। हाल के दशकों में, रांची और जमशेदपुर जैसे शहरों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी नवाचारों में प्रगति की। झारखंड ने बुनियादी ढांचे में निवेश किया, जिसमें सड़कें, रेलवे और बिजली उत्पादन शामिल हैं। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और डिजिटल कनेक्टिविटी ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों को जोड़ने का काम किया है। राज्य में सामाजिक क्षेत्र में, आदिवासी समुदायों के कल्याण के लिए योजनाएं शुरू की गईं हैं। 

शिक्षा के क्षेत्र में बिरसा मुंडा विश्वविद्यालय और आईआईटी (आईएसएम) धनबाद जैसे संस्थानों ने युवाओं को सशक्त बनाया। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, नक्सलवाद, गरीबी और बेरोजगारी जैसी कुछ चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। फिर भी, झारखंड की सांस्कृतिक समृद्धि, आदिवासी कला और पर्यटन स्थल जैसे बेतला और दस्सम फॉल्स इसे वैश्विक मंच पर आकर्षक बनाते हैं। आने वाले वर्षों में, नवीकरणीय ऊर्जा, स्टार्टअप्स और कौशल विकास पर ध्यान देकर झारखंड समृद्धि की नई ऊंचाइयों को छू रहा है।

 नए राज्यों का गठन क्यों है जरूरी:

 भारत में नए राज्यों के गठन का इतिहास पुराना है। 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम के बाद से, भाषाई, सांस्कृतिक और प्रशासनिक आधार पर कई राज्यों का निर्माण हुआ। छोटे राज्यों के गठन के पक्ष में कई तर्क दिए जाते हैं मसलन: 

प्रशासनिक दक्षता: बड़े राज्यों में प्रशासनिक जटिलताएँ और संसाधनों का असमान वितरण आम समस्याएँ हैं। छोटे राज्य स्थानीय समस्याओं पर अधिक ध्यान दे सकते हैं और शासन को जनता के करीब ला सकते हैं। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ और झारखंड में आदिवासी समुदायों की समस्याओं पर केंद्रित नीतियाँ बनाई गईं, जो बड़े राज्यों में संभव नहीं था।

 क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक संरक्षण: कई क्षेत्र अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के आधार पर अलग राज्य की माँग करते हैं। यह न केवल उनकी संस्कृति को संरक्षित करता है, बल्कि उन्हें स्वशासन का अवसर भी देता है। उत्तराखंड इसका एक उत्तम उदाहरण है, जहाँ पहाड़ी संस्कृति और भाषा को बढ़ावा मिला। 

आर्थिक विकास: छोटे राज्य अपनी विशिष्ट संसाधनों और संभावनाओं का बेहतर उपयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ ने अपने खनिज संसाधनों का उपयोग करके औद्योगिक विकास को गति दी। 

राजनीतिक सशक्तिकरण: छोटे राज्य स्थानीय नेतृत्व को उभरने का अवसर देते हैं, जिससे राजनीतिक भागीदारी बढ़ती है। यह विशेष रूप से उपेक्षित क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है। 

नए राज्यों के गठन की चुनौतियाँ  

नए राज्यों के गठन के कई लाभ हैं, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं जैसे: 

प्रशासनिक खर्च में वृद्धि: नए राज्यों के गठन से नई राजधानियाँ, सचिवालय, विधानसभाएँ और अन्य प्रशासनिक ढाँचे की आवश्यकता होती है। यह केंद्र और राज्य सरकारों पर वित्तीय बोझ बढ़ाता है। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड में देहरादून को राजधानी बनाने,छत्तीसगढ़ में नया रायपुर बसाने और नई प्रशासनिक संरचनाएँ विकसित करने में भारी लागत आई। आंध्रप्रदेश भी अपनी नई राजधानी के निर्माण पर आ रहे भारी खर्च को लेकर ऊहापोह में है। 

संसाधनों का बँटवारा: नए और पुराने राज्यों के बीच जल, बिजली, खनिज और अन्य संसाधनों के बँटवारे को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के बीच जल संसाधनों को लेकर कई बार तनाव देखा गया। क्षेत्रीय असंतुलन: नए राज्यों के गठन से कुछ क्षेत्रों में विकास तेजी से होता है, जबकि अन्य क्षेत्र उपेक्षित रह जाते हैं। यह असमानता सामाजिक और आर्थिक तनाव को बढ़ा सकती है।

 राजनीतिक अस्थिरता: नए राज्यों की माँग कभी-कभी अलगाववादी आंदोलनों को हवा दे सकती है। तेलंगाना के गठन के बाद विदर्भ, गोरखालैंड और बोडोलैंड जैसे क्षेत्रों में भी अलग राज्य की माँग तेज हुई। 

प्रशासनिक क्षमता की कमी: नए राज्यों में प्रशासनिक ढाँचे को स्थापित करने और कुशल अधिकारियों की नियुक्ति में समय लगता है, जिससे शुरुआती वर्षों में शासन प्रभावित हो सकता है। 

इन सभी विषयों के विश्लेषण के बाद हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि क्या भारत को और नए राज्यों की आवश्यकता है? इसका कारण यह है कि भारत की जनसंख्या, भौगोलिक विविधता और सांस्कृतिक बहुलता को देखते हुए नए राज्यों की माँग समय-समय पर उठती रहती है। वर्तमान में विदर्भ (महाराष्ट्र), गोरखालैंड (पश्चिम बंगाल), बोडोलैंड (असम), बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश) और सौराष्ट्र (गुजरात) जैसे क्षेत्रों में अलग राज्य की माँग तेजी पकड़ रही है। मसलन यह तर्क दिया जा है कि विदर्भ और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र लंबे समय से उपेक्षित हैं। अलग राज्य बनने से इन क्षेत्रों में केंद्रित विकास संभव हो सकता है। वहीं, गोरखालैंड के पक्ष में यह बात कही जा रही है कि इस क्षेत्र की अपनी विशिष्ट पहचान को संरक्षित करने के लिए अलग राज्य जरूरी है। एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में प्रशासनिक जटिलताएँ हैं। इसे छोटे राज्यों में विभाजित करने से शासन अधिक प्रभावी हो सकता है। 

वहीं, नए राज्यों के गठन का विरोध करने वालों का कहना है कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए नए राज्यों का निर्माण महँगा सौदा है। मौजूदा आर्थिक स्थिति में यह बोझ और बढ़ सकता है और आर्थिक संतुलन गड़बड़ा जाएगा। इसके साथ साथ नए राज्य राष्ट्रीय एकता को भी प्रभावित कर सकते हैं क्योंकि अधिक राज्यों के गठन से क्षेत्रीयता की भावना बढ़ सकती है। विश्लेषकों का यह भी मानना है कि नए राज्य बनने से विकास की गारंटी नहीं होती। झारखंड इसका उदाहरण है, जहाँ खनिज संपदा के बावजूद गरीबी और बेरोजगारी की स्थिति में आशानुरूप सुधार नहीं आ पाया है । 

 कुल मिलाकर नए राज्यों के गठन का निर्णय लेते समय आर्थिक व्यवहार्यता, सामाजिक और सांस्कृतिक एकता,प्रशासनिक क्षमता, राष्ट्रीय हित जैसे तमाम बिंदुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है। नए राज्यों के गठन के स्थान पर सरकारें कई अन्य विकल्पों पर काम कर सकती हैं मसलन केंद्र और राज्य सरकारें मौजूदा राज्यों में ही क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए विशेष क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण स्थापित कर सकती हैं जो बिना नए राज्य गठन के इन क्षेत्रों की समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। 

छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड के 25 वर्षों की यात्रा से यह साबित हुआ है कि नए राज्यों का गठन विकास और स्थानीय शासन को तो बढ़ावा दे सकता है, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियाँ भी आती हैं।  इसलिए भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में नए राज्यों के गठन का निर्णय सावधानीपूर्वक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ लिया जाना चाहिए। 

70 साल बाद भी 'यंग' है आकाशवाणी का भोपाल केंद्र..!!


मध्यप्रदेश में राजधानी भोपाल के सबसे खूबसूरत और वीवीआईपी इलाके श्यामला हिल्स में बने आकाशवाणी केंद्र में बारिश के बाद हल्की ठंडक है। सुबह सुबह स्टूडियो में मानस गान के बाद संगीत की स्वर लहरी बह रही है, जबकि पास ही न्यूज रीडर प्रदेश भर के श्रोताओं को लाइव ताजातरीन खबरें सुनाने के लिए स्वयं को तैयार कर रहा है। बाहर पार्किंग में आकाशवाणी से जुड़े स्टाफ की आवा जाही शुरू हो गई है और यहां के शांत वातावरण में कारों के हॉर्न की आवाजें गूंज रही हैं। आज यह केंद्र अपना 70 वां स्थापना दिवस मना रहा है, लेकिन उत्साह और युवा ऊर्जा से लबरेज इस केंद्र को देखकर लगता है जैसे यह कल ही शुरू हुआ हो। 

सात दशक पहले, 1956 में 31 अक्टूबर को और मध्यप्रदेश के बनने से महज एक दिन पहले भोपाल के काशाना बंगले में स्थापित यह केंद्र आज भी शिक्षा, मनोरंजन, सूचना' के मंत्र को जीवंत बनाए हुए है। यही वजह है कि 70 साल बाद भी, यह केंद्र युवा ही लगता है। आकाशवाणी भोपाल का सफर भारत के रेडियो इतिहास से जुड़ा है। 1927 में मुंबई और कोलकाता में निजी ट्रांसमीटरों से रेडियो प्रसारण की शुरुआत हुई, लेकिन 1936 में इसे 'ऑल इंडिया रेडियो' नाम मिला और 1957 में आज का स्थाई नाम 'आकाशवाणी' । 

 भोपाल में रेडियो केंद्र खोलने का उद्देश्य आम लोगों खासकर ग्रामीणों तक सरकारी योजनाओं की पहुंच, किसानों को मौसम की जानकारी, और युवाओं तक संगीत की पहुंच आसान बनाना था। एफएम और मीडियम वेव पर चलने वाला यह स्टेशन आज मध्य भारत के दिल की धड़कन है। आकाशवाणी भोपाल ने न केवल स्थानीय कलाकारों को मंच दिया बल्कि लोकगीतों से लेकर हिंदी कविताओं तक मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर का रखवाला भी बना।

70 साल का यह सफर आसान नहीं था। चाहे 1962 का भारत-चीन युद्ध हो या 1971 का भारत-पाक युद्ध, कारगिल युद्ध हो या फिर कोई अन्य सैन्य संघर्ष आकाशवाणी भोपाल ने मोर्चे पर तैनात सैनिकों के लिए विशेष कार्यक्रम चलाकर उनका और उनके परिवारों का हौंसला बुलंद किया । वहीं, भोपाल ही क्या देश के सबसे काले अध्याय 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के दौरान आकाशवाणी भोपाल के स्टाफ ने अपनी जान की परवाह नहीं करते हुए निरंतर राहत सूचनाओं का प्रसारण किया। अस्पतालों के पते, उपलब्ध सुविधाओं, सरकारी सहायता केंद्रों की सूचना, दवाओं की जानकारी और सरकारी मदद से जुड़ी खबरों एवं जानकारियों के जरिए यह केंद्र पीड़ित परिवारों की उम्मीद की किरण बन गया।

आज आकाशवाणी भोपाल सिर्फ रेडियो नहीं, एक डिजिटल हब है। फेसबुक जैसे तमाम सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भरपूर फॉलोअर्स और व्यूज के साथ यह युवा पीढ़ी का भी चहेता बन गया है।  अपने करीब 17 घंटे प्रतिदिन के प्रसारण में ‘नमस्कार भोपाल' से लेकर 'महिला मंच' तक, ‘युववाणी’ से लेकर ‘ग्राम सभा और बुंदेली समाचारों’ तक अपने विविध कार्यक्रमों के जरिए आकाशवाणी भोपाल ने खुद को हर वर्ग के साथ जोड़ लिया है। तभी तो एक बुजुर्ग श्रोता कहते हैं कि "रेडियो ने मुझे जवानी दी और आज भी मेरी शामें सजाता है।" वहीं, युवाओं की कार में विविध भारती की गूंज इसे नई पीढ़ी से जोड़ रही है। इसी तरह, स्टूडियो में काम करने वाले युवा कलाकारों और फ्रेश आवाज से यहां पारंपरिक गरिमा के बीच प्रसारण की नई कहानियां लिखी जा रही हैं।

आज 70 साल बाद भी, आकाशवाणी भोपाल का प्रसारण युवा सा और नया सा लगता है क्योंकि यह बिना अपनी जड़ें छोड़े समय के साथ खुद को बदलता रहा है । रेडियो सेट से डीटीएच, फिर मोबाइल फोन और कार के भीतर घुसपैठ कर आकाशवाणी भोपाल ने प्राइवेट एफएम चैनलों की चमक-दमक के बीच अपनी सार्वजनिक सेवा और ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ की पहचान कायम रखी है। आने वाले वर्षों में, नवाचार, डिजिटलीकरण, 5G इंटीग्रेशन और ज्यादा लोकल कंटेंट से यह केंद्र लगातार अपनी प्रतिष्ठा में चार चांद लगाता रहेगा। 

और अंत में,  "ये आकाशवाणी भोपाल है..." आवाज भले ही तरंगों के माध्यम से आकाश से आती है, लेकिन निकलती सीधे दिल से है और उतरती भी सीधे दिल में ही है। अपने सतत् विकास,बदलाव और इंद्रधनुषी कार्यक्रमों से आकाशवाणी भोपाल केंद्र ने यह साबित कर दिया है कि उम्र सिर्फ संख्या है, जज्बा हमेशा जवान रहता है..तो सुनते रहिए आकाशवाणी, क्योंकि कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं।

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सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, पूरा देश जीतता है..!!

धीरे धीरे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर उठ रहा है। इसके साथ राष्ट्रगान की पहली धुन बज रही है: "जन-गण-मन..." यह ऐसा अद्भुत अवसर ...